प्रार्थना में महान सामर्थ्य
पवित्र आत्मा में प्रार्थना करना

अध्याय 7 · 40 मिनट का पठन

पवित्र आत्मा में प्रार्थना करना

“पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते हुए।” यहूदा 1:20।

ये शब्द एक ऐसे खण्ड में आते हैं जहाँ प्रेरित भक्तिहीनों और भक्तों के बीच का अन्तर दिखा रहा है। भक्तिहीन ठट्ठा कर रहे हैं, घमण्ड की बातें बोल रहे हैं और अपनी भक्तिहीन अभिलाषाओं के अनुसार चल रहे हैं, जबकि धर्मी अपने अति पवित्र विश्वास में अपनी उन्नति कर रहे हैं, और अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखते हैं। भक्तिहीन कुड़कुड़ाकर और शिकायत करके अपने हृदयों का विष दिखा रहे हैं, जबकि धर्मी “पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते हुए” अपने भीतर के नए सिद्धान्त को प्रकट कर रहे हैं। भक्तिहीन मनुष्य अपने मुँह में नागदौना लिये फिरता है, जबकि मसीही के होठों से भक्ति का निर्मल मधु टपकता है। जैसे कहा जाता है कि मकड़ी उन्हीं फूलों में विष पाती है जिनसे मधुमक्खियाँ मधु चूसती हैं, वैसे ही दुष्ट उन्हीं दयाओं का पाप के लिये दुरुपयोग करते हैं जिनका उपयोग भक्त परमेश्वर की महिमा के लिये करते हैं।

जितना उजियाला अन्धकार से, और जीवन मृत्यु से दूर है, उतना ही एक विश्वासी भक्तिहीन से भिन्न है। आओ, हम इस अन्तर को बहुत स्पष्ट बनाए रखें। जब दुष्ट और भी अधिक दुष्ट होते जाते हैं, तब हम और अधिक पवित्र, और अधिक प्रार्थनाशील, और अधिक भक्त बनते जाएँ, और भले बूढ़े यहोशू के साथ कहें, “दूसरे जैसा चाहें वैसा करें, परन्तु मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूँगा।” ध्यान दो कि यह पाठ प्रसंग में एक निश्चित क्रम में आता है। धर्मियों का वर्णन सबसे पहले इस रूप में किया गया है कि वे अपने अति पवित्र विश्वास में अपनी उन्नति करते हैं। विश्वास पहला ईश्वरीय अनुग्रह है, धर्मपरायणता की जड़, पवित्रता की नींव, भक्ति का भोर—इसी पर सबसे पहले ध्यान दिया जाना चाहिए।

परन्तु हमें आरम्भ की शिक्षाओं पर ही ठहरे नहीं रहना चाहिए। आगे बढ़ना ही हमारा मार्ग है! तो फिर विश्वास के ठीक पीछे-पीछे क्या आता है? विश्वास की पहलौठी सन्तान कौन है? जब विश्वास की दाखलता बलवन्त हो जाती है और पवित्रता के लिये फल लाती है, तो पहला पका हुआ गुच्छा कौन-सा है? क्या वह प्रार्थना नहीं—“पवित्र आत्मा में प्रार्थना”? जिस मनुष्य में प्रार्थना नहीं, उसमें विश्वास भी नहीं; और जो मनुष्य विश्वास में बढ़ता जाता है, वह शीघ्र ही विनती में भी बढ़ता जाएगा। विश्वास माता है और प्रार्थना सन्तान, और ये दोनों विरले ही एक दूसरे से अलग होते हैं। विश्वास प्रार्थना को अपनी गोद में उठाए रहता है, और प्रार्थना विश्वास के स्तन से जीवन पाती है। विश्वास में उन्नति विनती में उत्साह की ओर ले जाती है। एलिय्याह पहले बाल के याजकों के सामने अपना विश्वास प्रकट करता है, और फिर कर्मेल पर परमेश्वर से मल्लयुद्ध करने को चला जाता है।

हमारे पाठ को ध्यान से पढ़ो और देखो कि “पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते हुए” के बाद क्या आता है। “अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो।” प्रार्थना के बाद हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम का स्थायी बोध, और परमेश्वर की ओर हमारे प्रेम का उमड़ना आता है। प्रार्थना वेदी बनाती है और बलिदान और लकड़ी को क्रम से सजाती है, और तब प्रेम, याजक के समान, स्वर्ग से पवित्र आग लाकर भेंट को धधका देता है! जैसा हम कह चुके हैं, विश्वास अनुग्रह की जड़ है। प्रार्थना सोसन का डंठल है, और प्रेम उसका निष्कलंक फूल। विश्वास उद्धारकर्ता को देखता है, प्रार्थना उसके पीछे-पीछे घर में जाती है, परन्तु प्रेम संगमरमर का पात्र तोड़कर बहुमूल्य इत्र उसके सिर पर उण्डेल देता है।

तो भी प्रेम के पवित्र आनन्दों से भी आगे एक सीढ़ी है! भवन को पूरा करने के लिये एक चोटी का पत्थर अभी शेष है—वह है आशा के साथ विश्वास करना—“अनन्त जीवन के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह की दया की आशा देखते रहो।” दूरदर्शी आशा उस सीढ़ी पर चढ़ती है जिसे विश्वास ने बनाया है, और प्रार्थना के घुटनों पर झुककर उस खिड़की से झाँकती है जिसे प्रेम ने खोला है, और प्रभु यीशु मसीह को अपनी महिमा में आते हुए, और अपने सब लोगों को वह अनन्त जीवन प्रदान करते हुए देखती है जो उनका भाग होनेवाला है। तो देखो, प्रार्थना का कितना मूल्य है—वह विश्वास के होने का चिह्न है, और प्रेम के बल और बढ़ती की पूर्व-छाया भी है और उसका सहारा भी।

सीधे पाठ पर आते हुए, हम कहते हैं कि प्रेरित प्रार्थना की चर्चा करता है, परन्तु वह प्रार्थना करने के केवल एक ही प्रकार का उल्लेख करता है। एक दृष्टि से देखें तो प्रार्थनाएँ बहुत प्रकार की होती हैं। मैं समझता हूँ कि भिन्न-भिन्न मनुष्यों की कोई भी दो सच्ची प्रार्थनाएँ ठीक एक-सी नहीं हो सकतीं। निपुण चित्रकार प्रायः एक ही चित्र को बार-बार नहीं बनाते—जितनी बार वे तूलिका उठाते हैं, वे नए विचारों को रूप देना ही पसन्द करते हैं। और वैसे ही वह महान चित्रकार, पवित्र आत्मा, जो प्रार्थना का रचयिता है, अपने लोगों के हृदय की पटियाओं पर प्रायः ऐसी दो प्रार्थनाएँ नहीं रचता जो ठीक एक-सी हों।

प्रार्थनाओं को कई भिन्न-भिन्न श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। एक निवारण की प्रार्थना है, जिसमें हम परमेश्वर के क्रोध को टालने की याचना करते हैं, और उससे विनती करते हैं कि वह अपना भड़का हुआ कोप दूर करे, अपनी छड़ी हटा ले, अपनी तलवार म्यान में रख ले। निवारण की प्रार्थनाएँ उन सब समयों में चढ़ाई जानी चाहिए जब विपत्ति का डर हो, और जब पाप ने प्रभु को जलन दिलाई हो। फिर याचना की प्रार्थनाएँ हैं, जिनमें हम परमेश्वर के उदार हाथ से आशीषें माँगते और दयाओं के लिये गिड़गिड़ाते हैं, और अपने स्वर्गीय पिता से विनती करते हैं कि वह अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है हमारी घटी को पूरी करे। कुछ प्रार्थनाएँ व्यक्तिगत होती हैं, जिनमें विनती करनेवाला मुख्यतः अपने ही विषय में गिड़गिड़ाता है। और कुछ विनतियाँ मध्यस्थता की होती हैं, जिनमें, अब्राहम के समान, निवेदक सदोम के लिये मध्यस्थता करता है, या विनती करता है कि इश्माएल परमेश्वर की दृष्टि में बना रहे।

दूसरों के लिये की जानेवाली ये प्रार्थनाएँ उतनी ही बढ़ाई जानी चाहिए जितनी अपने लिये की जानेवाली प्रार्थनाएँ, कहीं ऐसा न हो कि हम दया के सिंहासन को आत्मिक स्वार्थ के प्रदर्शन का स्थान बना दें। प्रार्थना सार्वजनिक हो सकती है या एकान्त की, वाणी से या मन ही मन, लम्बी या क्षण भर की उछलती पुकार। प्रार्थना में अंगीकार का नमक हो सकता है, या धन्यवाद की सुगन्ध। वह संगीत के साथ गाई जा सकती है, या कराहते हुए आँसुओं में उण्डेली जा सकती है। जितने ग्रीष्म के फूल हैं, उतनी ही प्रार्थना की किस्में हैं! परन्तु यद्यपि प्रार्थनाएँ इन भिन्न-भिन्न श्रेणियों की होती हैं, तो भी एक बात में वे सब एक हैं, यदि वे परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हैं—उनमें से प्रत्येक को “पवित्र आत्मा में” होना चाहिए।

जो प्रार्थना पवित्र आत्मा में नहीं है, वह शरीर में है। जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है, और हमें बताया गया है कि जो शारीरिक दशा में हैं, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। जो कुछ हमारे भ्रष्ट स्वभाव से निकलता है, वह अशुद्ध और बिगड़ा हुआ है, और अति पवित्र परमेश्वर को ग्रहणयोग्य नहीं हो सकता। यदि स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं है, तो वे प्रार्थनाएँ जो पृथ्वी से जन्मी हैं, उसे कैसे ग्रहणयोग्य होंगी? ग्रहणयोग्य भक्ति का बीज स्वर्ग के भण्डार से ही आना चाहिए। केवल वही प्रार्थना परमेश्वर तक जा सकती है जो परमेश्वर से आती है! कबूतर केवल उसी दड़बे तक चिट्ठी ले जाता है जहाँ से वह आया था, और वैसे ही प्रार्थना भी, यदि वह स्वर्ग से आई है, तो स्वर्ग को लौट जाएगी। हमें प्रभु के तीर ही उसकी ओर वापस चलाने चाहिए।

जो लालसा वह हमारे हृदय पर लिखता है, वही उसके हृदय को हिलाएगी और आशीष उतार लाएगी, परन्तु शरीर की लालसाओं का उस पर कोई बल नहीं चलता। आज भोर परमेश्वर के इस महान सत्य को अपने भाइयों और बहनों के मन पर अंकित करने की इच्छा से, मैं पाठ के इन थोड़े-से शब्दों को पाँच रीतियों से काम में लाऊँगा।

I. पहले हम इस पाठ को एक कुठाली के रूप में काम में लाएँगे, जिसमें हम अपनी प्रार्थनाओं को परखें। मैं तुमसे विनती करता हूँ, बड़ी कठोर सावधानी से अपने आपको जाँचो! इस पाठ को घरिया, भट्ठी, कसौटी या कुठाली के रूप में काम में लाओ, जिससे तुम पहचान सको कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ सच्ची रही हैं या नहीं! कसौटी यह है—क्या वे सचमुच “पवित्र आत्मा में प्रार्थना” रही हैं? हे भाइयो और बहनो, हमें उन लोगों का न्याय करने की आवश्यकता नहीं जो समझ में न आनेवाली प्रार्थनाएँ करते हैं, पराई भाषा में प्रार्थनाएँ, ऐसी प्रार्थनाएँ जिन्हें वे स्वयं नहीं समझते। हम इस प्रश्न पर एक क्षण का भी विवाद किए बिना जानते हैं कि जो प्रार्थना समझी ही नहीं जाती, वह आत्मा में की गई प्रार्थना नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें मनुष्य की अपनी आत्मा तक प्रवेश नहीं करती—तो फिर परमेश्वर का आत्मा उसमें कैसे हो सकता है?

पुरोहितों के रहस्यमय शब्द या लैटिन की अटपटी बोली परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्य होकर नहीं पहुँच सकती! इसलिए आओ, हम अपना न्याय अपने ही लिये रखें। यहाँ कुछ ऐसे लोग उपस्थित हो सकते हैं जो बचपन से ही प्रार्थना के किसी रटे हुए पाठ को दोहराने के अभ्यस्त रहे हैं। कदाचित् तुम उस पाठ को खाट के पास दोहराए बिना अपने दिन के काम पर निकलने का साहस न करो। तुम्हें रात को उन शब्दों को दोहराए बिना सो जाने से डर लगेगा जिन्हें दोहराना तुमने अपना नियम बना लिया है। मेरे प्रिय मित्रो, क्या मैं तुमसे यह प्रश्न पूछ सकता हूँ—क्या तुम ईमानदारी से इसका उत्तर देने का प्रयत्न करोगे? क्या तुमने पवित्र आत्मा में प्रार्थना की है? क्या उस पाठ से पवित्र आत्मा का कुछ भी लेना-देना रहा है? क्या उसने सचमुच तुम्हें उसे अपने हृदय में अनुभव कराया है? क्या यह सम्भव नहीं कि तुमने बिना सोचे-समझे चलनेवाली जीभ पर एक गम्भीर ध्वनि रखकर परमेश्वर का उपहास किया हो? जिस बेपरवाह रीति से मनुष्य किसी जाने-पहचाने पाठ को दोहराने लगता है, उसे देखते हुए क्या यह सम्भव नहीं कि उसमें कुछ भी मन न हो—और सच्चाई का एक कण भी न हो?

क्या परमेश्वर उस बलिदान से घृणा नहीं करता जिसमें मन नहीं पाया जाता? यह कितनी दुःखद बात होगी यदि हमने अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा अपने पाप बढ़ा लिये हों! यह कितनी अभागी बात होगी यदि अन्त में यह निकले कि जब हमने, जिसे हम परमेश्वर की सेवा समझते थे, उसमें घुटने टेके, तब हम वास्तव में ऐसे शब्द बोलकर स्वर्ग के परमेश्वर का अपमान कर रहे थे जो उसे घिनौने लगे बिना रह ही नहीं सकते थे, क्योंकि हमारे मन हमारे होठों के साथ नहीं गए! आओ, हम निश्चय जान लें कि यदि सत्तर वर्ष तक हमने पुस्तक के सहारे, या रटे हुए पाठ के सहारे, समय की पाबन्दी से अपनी भक्ति की विधियाँ पूरी की हों, तो भी हो सकता है कि उन पूरे सत्तर वर्षों में हमने एक बार भी सचमुच प्रार्थना न की हो! और उस पूरी अवधि में परमेश्वर की दृष्टि में हम भक्तिहीन, प्रार्थनाहीन जीवन बिताते रहे हों, क्योंकि हमने परमेश्वर की, जो आत्मा है, आत्मा और सच्चाई से कभी आराधना नहीं की, और कभी पवित्र आत्मा में प्रार्थना नहीं की! हे भाइयो और बहनो, अपने आपको जाँचो, कि तुम दण्ड न पाओ!

परन्तु क्या हममें से कुछ और ऐसे नहीं हैं जिन्होंने कभी लिखी हुई प्रार्थना का प्रयोग नहीं किया? जिन्होंने अपने बचपन के आरम्भ से ही प्रार्थना के रटे हुए पाठों से परहेज़ किया, वरन् उनसे घृणा की, तो भी जिनके पास अपनी प्रार्थना को परखने का उतना ही उचित कारण है जितना औरों के पास? हमने बिना तैयारी के, उसी क्षण के वचनों में प्रार्थनाएँ की हैं, और ऐसे वचनों के लिये अवश्य ही मन का कुछ थोड़ा-सा अभ्यास, कुछ थोड़ा-सा ध्यान चाहिए—तो भी हो सकता है कि हम उनमें मनहीन रहे हों। मैं समझता हूँ, हम भली-भाँति जानते हैं कि हम बिना तैयारी की प्रार्थना की ऐसी आदत डाल सकते हैं कि वह वास्तव में किसी रटी हुई बात को दोहराने से बहुत थोड़ी ही अच्छी हो, या बिलकुल भी अच्छी न हो। अभ्यास से ऐसी धाराप्रवाहता आ सकती है कि मनुष्य की वाणी पाँच या दस मिनट, या पन्द्रह मिनट तक कलकल करती बहती रहे, और तो भी मन व्यर्थ बातों में भटकता रहे या उदासीनता में ठहरे हुए पानी-सा पड़ा रहे! शरीर घुटनों पर हो सकता है, परन्तु प्राण अपने पंखों पर दया के सिंहासन से बहुत दूर उड़ा हुआ हो।

आओ, हम जाँचें कि हमारी सार्वजनिक प्रार्थनाएँ कहाँ तक पवित्र आत्मा में रही हैं। यहाँ खड़ा प्रचारक परमेश्वर से विनती करता है कि वह इस विषय में उसे जाँचे। यदि उसने सार्वजनिक प्रार्थना का काम केवल इसलिए निपटा दिया है कि मण्डली की आराधना की अगुवाई करना उसका पदीय कर्तव्य है, तो उसे परमेश्वर के सामने बहुत कुछ का लेखा देना है—पवित्र आत्मा की सहायता माँगे बिना इस विशाल भीड़ की आराधना की अगुवाई करना कोई हल्का पाप नहीं! और प्रार्थना-सभाओं में की जानेवाली प्रार्थनाओं के विषय में क्या कहा जाए? क्या उनमें से बहुत-सी केवल शब्द ही नहीं होतीं? अच्छा होता कि हमारे मित्र शरीर में बोलने के बदले बिलकुल न बोलते!

मुझे निश्चय है कि केवल वही प्रार्थना, जिसमें भक्त सुननेवाला सम्मिलित हो सकता है, और जो परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है, वह है जो सचमुच हृदय की प्रार्थना है—वास्तव में, प्राण की प्रार्थना—ऐसी प्रार्थना जिसे करने के लिये पवित्र आत्मा हमें उभारता है। बाकी सब हवा पीटना और व्यर्थ समय गँवाना है। हे मेरे भाइयो, मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि इस कलीसिया से जुड़े तुममें से इतने लोग प्रार्थना का वरदान रखते हैं, और मैं चाहता हूँ कि हर मसीही कलीसिया का हर सदस्य सबके सामने प्रार्थना कर सके। तुम सबको ऐसा करने का प्रयत्न करना चाहिए, और तुममें से किसी को इसे तब तक नहीं छोड़ना चाहिए जब तक यह बिलकुल असम्भव न हो जाए। परन्तु हाय, हे मेरे भाइयो जो सबके सामने प्रार्थना करते हो, क्या कभी-कभी तुम्हारे साथ भी वैसा ही नहीं होता जैसा हममें से औरों के साथ—कि वह वरदान का अभ्यास हो, न कि ईश्वरीय अनुग्रह का उमड़ना? और यदि ऐसा है, तो प्रभु से माँगो कि वह तुम्हें ऐसी प्रार्थना के लिये क्षमा करे, और तुम्हें पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में उसकी बाट जोहने के योग्य बनाए।

हमें अपनी अधिक निजी प्रार्थनाओं को भी—पारिवारिक वेदी पर की गई अपनी विनतियों को, और सबसे बढ़कर, उस छोटी-सी कोठरी में की गई अपनी प्रार्थनाओं को जिसे हमने परमेश्वर के साथ संगति के लिये अर्पित किया है—बारीकी से जाँचना नहीं भूलना चाहिए। हे भाइयो और बहनो, यदि हम देख पाते कि हमारी प्रार्थनाएँ कितनी दीन-हीन वस्तुएँ हैं, तो हम उनसे भली-भाँति ऊब जाते! ऐसे समय भी होते हैं जब वेदी के सींगों को पकड़ लेना और यह अनुभव करना कि जो लहू वेदी पर छिड़का जाता है वह तुम पर भी छिड़का गया है—कि तुमने परमेश्वर से बातें की हैं और प्रबल हुए हो—एक मधुर और धन्य बात होती है! आह, वाचा के दूत को पकड़ लेना, और घण्टों तक उससे मल्लयुद्ध करते हुए यह कहना कितनी धन्य बात है, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा”! परन्तु मुझे डर है कि ये बातें स्थायी नहीं होतीं। हम उनके विषय में कह सकते हैं कि वे स्वर्गदूतों के आगमन के समान हैं—थोड़े और बहुत अन्तर पर।

आओ, हे मेरे भाइयो, अपनी प्रार्थनाओं को “पवित्र आत्मा में प्रार्थना” की इस कुठाली में डालो। तुम बहुत-सी धातु डालोगे, परन्तु उसमें से शुद्ध सोना थोड़ा ही निकलेगा। आओ, अपनी प्रार्थनाओं को इस खलिहान पर रखो, और उन्हें इस पाठ से दाँवो, “पवित्र आत्मा में प्रार्थना।” और हाय, कितना भूसा और कितना पुआल निकलेगा, और भली-भाँति फटका हुआ दाना कितना थोड़ा! आओ, इस खिड़की से हमारी भक्ति के खेतों को देखो, जो बिच्छू-बूटी, और झाड़ियों, और ऊँटकटारों से भर गए हैं—केवल बाहरी क्रिया-कलापों का एक जंगल! और अनुग्रह से घेरा हुआ वह छोटा-सा टुकड़ा कितना छोटा है, जिसे परमेश्वर पवित्र आत्मा ने स्वयं साफ़ किया, और खोदा, और बोया है—जिसमें से प्रार्थना का फल पककर सिद्धता तक पहुँचा है!

हमारा स्वर्गीय पिता हमें सिखाए कि हम उसकी उपस्थिति में दीन रहें, जब हम सोचते हैं कि हमारी सबसे अच्छी वस्तुओं में से भी कितनी थोड़ी उसकी खोजती हुई आँखों की परख में टिक सकेंगी; और हममें से जो उसके पवित्र लोग हैं, वे नए सिरे से उसके पास आएँ, और उससे माँगें कि वह हमें अपने आत्मा से भर दे, और अपने पुत्र में हमें ग्रहण करे!

II. आगे हम इस पाठ को हृदय को बल देनेवाली एक औषधि के रूप में काम में लाएँगे। मसीही मन के लिये यह बहुत आनन्ददायक विचार है कि परमेश्वर अपने लोगों पर दृष्टि रखता है, और उनके संघर्षों और कठिनाइयों का उदासीन दर्शक बनकर नहीं बैठा रहता। उदाहरण के लिये, वह हमारी प्रार्थनाओं में हम पर बारीकी से दृष्टि रखता है। वह जानता है कि प्रार्थना, यद्यपि उसे संसार की सबसे सरल बात होना चाहिए, वैसी नहीं है। वह जानता है कि हम भटकनेवालों के लिये विनती की सच्ची आत्मा में उसके पास आना सदा सरल नहीं होता, और वह नीचे झुककर करुणा से इसे देखता है। उन हृदयों के लिये जो बहुत दुर्बल और टूटे हुए हैं, यह एक अनमोल वचन है, “वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है।” और वह दूसरा भी, “जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।”

वह हमारी दुर्बलताओं पर, और विनती के काम में हमारी असफलताओं पर ध्यान देता है। वह अपनी सन्तान को चलना सीखते हुए गिरते देखता है, और उन आँसुओं को भी देखता है जिनसे वह अपनी दुर्बलता पर विलाप करती है। “यहोवा की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उनकी दुहाई की ओर लगे रहते हैं।” पाठ में इससे भी मधुर एक विचार शेष है, अर्थात् यह कि हमारी इन असफलताओं पर विचार करके, जिनमें से बहुत-सी पापपूर्ण हैं, हमारा प्रभु उनके कारण हम पर क्रोधित नहीं होता। और क्रोध की ओर फिरने के बदले, वह हम पर दया करने और हमसे प्रेम करने को उभारा जाता है। वह यह नहीं कहता, “यदि तू प्रार्थना नहीं कर सकता, तो तुझे कुछ न मिलेगा। यदि तुझमें

ठीक से माँगने लायक भी अनुग्रह नहीं, तो मैं तेरे विरुद्ध दया के फाटक बन्द कर दूँगा।” नहीं, वह ऐसी युक्ति करता है कि लँगड़े और निकाले हुए उसकी उपस्थिति में लाए जाएँ! वह अज्ञानियों को प्रार्थना करना सिखाता है और दुर्बलों को अपने ही बल से बलवन्त करता है!

इसमें भी वह अद्भुत काम करता है, क्योंकि जिन उपायों से वह हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, वे अत्यन्त आश्चर्य के योग्य हैं। वह सहायता किसी पुस्तक में, या किन्हीं पवित्र ठहराए गए स्थानों में कुछ निश्चित शब्दों के बोलवाए जाने में नहीं मिलती, परन्तु स्वयं परमेश्वर की झुककर दी गई सहायता में मिलती है; क्योंकि पाठ में जिसकी चर्चा है, वह परमेश्वर के सिवाय और कौन है? पवित्र आत्मा, आराध्य त्रिएकता का तीसरा व्यक्ति, हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, और ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये विनती करता है! यह परमेश्वर के अद्भुत रूप से नीचे झुकने का चिह्न है कि वह न केवल हमारी प्रार्थनाओं का, जब वे की जाती हैं, उत्तर दे, वरन् हमारे लिये हमारी प्रार्थनाएँ स्वयं रचे! राजा का निवेदक से यह कहना, “अपना मामला मेरे सामने ला और मैं तेरी इच्छा पूरी करूँगा,” कृपा है। परन्तु उसका यह कहना, “मैं तेरा लेखक बनूँगा। मैं तेरे लिये तेरा निवेदन-पत्र लिख दूँगा। मैं उसे उचित शब्दों में रखूँगा और ठीक-ठीक वाक्यांशों का प्रयोग करूँगा, जिससे तेरा निवेदन ग्रहणयोग्य रीति से तैयार हो”—यह भलाई की चरम सीमा है!

और ठीक यही पवित्र आत्मा हम मनुष्यों की दीन, अज्ञानी, डगमगाती, दुर्बल सन्तानों के लिये करता है। “पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते हुए,” इस अभिव्यक्ति से मुझे यह समझना है कि पवित्र आत्मा सचमुच प्रार्थना करने में मेरी सहायता करने को तैयार है—कि वह मुझे बताएगा कि कैसे प्रार्थना करूँ! और जब मैं ऐसी स्थिति में पहुँचूँ जहाँ मैं ठिठक जाऊँ और अपनी लालसाओं को व्यक्त न कर सकूँ, तब वह मेरी उस चरम दशा में प्रकट होगा और ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, मुझमें विनती करेगा। यीशु को अपनी पीड़ा में एक स्वर्गदूत से सामर्थ्य मिली—तुम्हें स्वयं परमेश्वर से सहायता मिलनी है! हारून और हूर ने मूसा के हाथों को सम्भाले रखा, परन्तु पवित्र आत्मा आप ही तुम्हारी दुर्बलता में सहायता करता है!

मसीह में मेरे प्रिय भाइयो और बहनो, इस विचार को वाक्पटुता के अलंकारों की कोई आवश्यकता नहीं! इसे ओपीर के सोने की एक ईंट के समान लो और इसका मूल्य समझो। यह अनमोल है, सब मूल्यों से परे। स्वयं परमेश्वर, पवित्र आत्मा, जब तुम घुटनों पर होते हो, तब तुम्हारी सहायता करने को नीचे झुकता है; और यदि तुम मनुष्यों से साधारण बातचीत में दो शब्द भी न जोड़ सको, तो भी वह परमेश्वर से बोलने में तुम्हारी सहायता करेगा! हाँ, और यदि दया के सिंहासन के सामने तुम्हारे शब्द चूक जाएँ, तो भी वास्तविकता में तुम न चूकोगे, क्योंकि तुम्हारा हृदय जय पाएगा। परमेश्वर को शब्दों की आवश्यकता नहीं। वह हमारी विनतियों को कभी बाहरी उच्चारण के अनुसार नहीं, वरन् भीतरी कराहने के अनुसार पढ़ता है। वह लालसा को, चाहत को, आह भरने को, पुकार को देखता है।

स्मरण रखो कि प्रार्थना का बाहरी रूप केवल छिलका है—प्रार्थना का भीतरी भाग ही उसकी सच्ची गिरी और सार है। यदि प्रार्थना भीड़ के गीत में, महिमामय संगीत की लहर के साथ, स्वर्ग तक पहुँचाई जाए, तो वह परमेश्वर को रत्ती भर भी अधिक ग्रहणयोग्य नहीं होती, उसकी अपेक्षा जब वह किसी उजड़ी हुई आत्मा से वेदना की कड़वी पुकार में विलाप करती हुई निकलती है। वह पुकार, जो मनुष्य के कानों को इतनी बेसुरी लगती है, परमेश्वर के कानों के लिये संगीत है—

“उसके लिये एक आह में भी संगीत है, और एक आँसू में सौन्दर्य।” तो इस पर ध्यान दो, और शान्ति पाओ।
III. यह पाठ आगे हमारे लिये एक मानचित्र का काम भी कर सकता है, जो प्रार्थना के मार्ग में हमें दिशा दिखाए। यहाँ मुझे अधिक विस्तार से बोलना होगा। कैसे प्रार्थना करना? पुस्तक से? बिना पुस्तक के? सबके सामने? एकान्त में? मार्ग में? घर में? घुटनों पर? खड़े होकर? बैठकर? घुटने टेककर? इनके विषय में कुछ नहीं कहा गया! मुद्रा, स्थान और समय सब खुले छोड़ दिए गए हैं। एक को छोड़ कोई विधि-नियम नहीं—“पवित्र आत्मा में।”

वह अनिवार्य है। वह हो, तो और कुछ भी रत्ती भर मायने नहीं रखता। यदि वह पवित्र आत्मा में प्रार्थना है, तो बाकी सब जैसा तुम चाहो वैसा हो सकता है। पवित्र आत्मा में प्रार्थना करने का अर्थ क्या है? इस शब्द का अनुवाद “पवित्र आत्मा के द्वारा,” या “पवित्र आत्मा के माध्यम से,” भी किया जा सकता है, और “पवित्र आत्मा में” भी। और इस वाक्यांश का पहला अर्थ है, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में प्रार्थना करना। शारीरिक मन इसके विषय में कुछ नहीं जानता। इस विषय पर नया जन्म न पाए हुए मनुष्य से मैं अंग्रेज़ी में बात करूँ या ऊँची डच भाषा में, एक ही बात है। परन्तु नया जन्म पाए हुए मनुष्य, जो आत्मा से जन्मे हैं और आत्मिक संसार में जीते हैं, उस आदान-प्रदान से परिचित हैं जो उनकी आत्माओं और पवित्र आत्मा के बीच होता है, जो अब परमेश्वर की कलीसिया के बीच निवास करता है।

हम जानते हैं कि ईश्वरीय आत्मा, बिना ध्वनियों के प्रयोग के, हमारे हृदयों में बोलता है। हम जानते हैं कि कानों से सुनाई देनेवाले किसी उच्चारण के बिना भी वह हमारे प्राण को अपनी उपस्थिति का बोध करा सकता है और अपना आशय समझा सकता है। वह अपने प्रभाव की आत्मिक छाया हम पर डालता है, और अपनी ही योजना और इच्छा के अनुसार हमारे विचारों और भावनाओं को रंग देता है। यह एक महान आत्मिक तथ्य है, जिसे मसीही निश्चय के साथ जानता है, कि पवित्र आत्मा, ईश्वरीय आत्मा, आत्मिक मनों से बार-बार व्यवहार करता है और उन्हें अपनी सामर्थ्य प्रदान करता है। हमारी नई जन्मी आत्मा में कुछ मात्रा में सामर्थ्य होती है, परन्तु वह सामर्थ्य कभी पूरी तरह प्रकट नहीं होती या बाहर नहीं निकाली जाती, जब तक परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्मा को जिलाकर उसे सक्रिय होने को उभार न दे।

हमारी आत्मा प्रार्थना करती है, परन्तु इसलिए कि वह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से छाई हुई और भरी हुई है। मैं अभी अपनी बात पूरी तरह समझा नहीं सकता, परन्तु मेरा आशय यह है कि यदि मैं, एक मनुष्य के नाते, अनुग्रह के सिंहासन के पास जाकर केवल वैसी ही प्रार्थना कर सकूँ जैसी मेरा शारीरिक स्वभाव करेगा, तो वह प्रार्थना ग्रहणयोग्य न होगी। परन्तु जब मैं दया के सिंहासन के पास जाता हूँ और मेरा नया स्वभाव वैसे प्रार्थना करता है जैसे पवित्र आत्मा मुझे प्रार्थना करने की सामर्थ्य देता है, तब मेरी प्रार्थना परमेश्वर के यहाँ सफल होगी। यदि मैं सिंहासन के सामने परमेश्वर के आगे वही करूँ जो मांस और लहू कर सकते हैं, और उससे अधिक कुछ नहीं, तो मैंने कुछ भी नहीं किया—क्योंकि जो शरीर का है, वह शरीर से ऊँचा नहीं चढ़ता।

परन्तु यदि, स्वर्गीय अनुग्रह के सिंहासन के सामने आते हुए, परमेश्वर का अनन्त आत्मा मेरे प्राण से बोलता है और उसे पतित मनुष्यजाति के मरे हुए समतल से ऊपर उठा लेता है। और यदि वह उसे ऊपर लाकर ईश्वरीय बल से भर देता है—यदि वह आत्मा मुझमें एक सोता है, जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहता है, यदि मैं पवित्र आत्मा की वह ईश्वरीय ज्योति और सामर्थ्य पाता हूँ—और यदि उसकी सामर्थ्य में मैं उत्साह से परमेश्वर के निकट आता हूँ, तो मेरी प्रार्थना परमेश्वर के यहाँ अवश्य प्रबल होगी! यह सामर्थ्य हर मसीही के पास हो सकती है। परमेश्वर इसे अभी अपने सब लोगों को दे, कि वे सब आत्मा में प्रार्थना करें!

मेरी समझ में, पाठ का एक अर्थ यही है—आत्मा की सामर्थ्य में प्रार्थना करना। निःसन्देह पाठ का मुख्य अर्थ है विषय-वस्तु के सम्बन्ध में आत्मा में प्रार्थना करना। हम सदा नहीं जानते कि किस बात के लिये प्रार्थना करें; और, हे भाइयो और बहनो, यदि हम कुछ मिनटों के लिये प्रार्थना से रुक जाएँ जब तक कि हम जान न लें, तो यह एक भला और बुद्धिमानी का नियम होगा। बिना तैयारी की प्रार्थना में हम जिस आदत में पड़ गए हैं—कि जो कुछ माँगना है उसे सीधे माँगने लगते हैं, बिना एक क्षण भी रुके यह सोचने के लिये कि हम क्या माँगने जा रहे हैं—वह प्रार्थना की आत्मा के लिये बहुत हानिकारक है। जब मैं अकेला होता हूँ, तब मैं चाहूँगा कि कुछ मिनट लेकर विचार करूँ कि मैं परमेश्वर से क्या माँगने जा रहा हूँ, क्योंकि नहीं तो मुझे ऐसा लगता है मानो कोई राज्य के किसी अधिकारी से भेंट का समय माँगे, और फिर कोई ऐसी वस्तु माँगे जो उसी क्षण उसके मन में आ जाए।

तुम्हें कैसा लगेगा यदि तुम लॉर्ड डर्बी से भेंट करो, और फिर एकाएक सोचने लगो कि तुम आए किसलिए थे? निश्चय ही सामान्य बुद्धि कहेगी, थोड़ा ठहरो जब तक तुम अपने मन में अपने मामले का पूरा खाका न बना लो, और फिर जब तुम स्वयं स्पष्ट जान लो कि तुम्हें क्या चाहिए, तब तुम अपनी आवश्यकता की वस्तु माँग सकोगे। क्या हमें प्रार्थना में परमेश्वर की बाट नहीं जोहनी चाहिए, और उससे नहीं माँगना चाहिए कि वह हम पर प्रकट करे कि वे कौन-सी बातें हैं जिनके विषय में हमें उससे विनती करनी चाहिए? अटकलपच्चू प्रार्थनाओं से सावधान रहो! विनती को कभी बेतरतीब काम न बनाओ। अनुग्रह के सिंहासन के पास समझ-बूझकर आओ, यह जानते हुए कि तुम्हें किस बात की आवश्यकता है।

प्रार्थना में हमारे लिये तब भला होता है जब पवित्र आत्मा मन की अगुवाई करता है। क्या सब आत्मिक मनुष्य इस बात से परिचित नहीं कि कुछ बातों के विषय में वे अपने आपको बँधा हुआ पाते हैं, और केवल किसी दूसरी दिशा में स्वतन्त्र? तो वे पवित्र आत्मा की आज्ञा मानें और जैसा वह निर्देश दे वैसे प्रार्थना करें, क्योंकि वह जानता है कि हमारी विनती क्या होनी चाहिए। अच्छा, तो फिर क्या? मेरे प्रिय भाइयो और बहनो, जिस बात के लिये परमेश्वर आत्मा तुम्हें प्रार्थना करने को उभारे, उसी के लिये प्रार्थना करो, और पवित्र आत्मा के प्रभाव के प्रति बहुत संवेदनशील रहो। मुझे वह रूपक अच्छा लगता है जिसका प्रयोग थॉमस शिलिटो ने अपनी जीवनी में किया है, जहाँ वह कहता है कि वह चाहता था कि उसका मन पानी पर तैरते काग के समान हो, जो परमेश्वर के आत्मा की हर हलचल को अनुभव करे। भला होता कि हम परमेश्वर के आत्मा के प्रति इतने संवेदनशील हों कि उसकी हल्की-से-हल्की साँस भी हमारे प्राण के समुद्र पर लहर उठा दे और उसे वैसे ही हिलाए जैसे आत्मा चाहता है।

जब परमेश्वर आत्मा और हमारी अपनी भीतरी आत्मा पूरी तरह एक स्वर में हों, तब हम पवित्रीकरण की एक ऊँची दशा तक पहुँच चुके होते हैं। हम उस अवर्णनीय रूप से धन्य दशा में पहुँचाए जाएँ! यदि हम यह सोचें कि हमें क्या चाहिए और हम क्या चाहते हैं, और फिर स्वार्थी हठ के साथ उसे माँगें, तो हम ठीक से प्रार्थना नहीं करते। हम ठीक से प्रार्थना तब करते हैं जब हम उस बात से सहमत होते हैं जो आत्मा की मनसा है, और जैसे वह हमें बोलने को उभारता है वैसे बोलते हैं। जब हम अपनी विनतियों की विषय-वस्तु भी पूरी की पूरी उसी से पाने की बाट जोहते हैं, तब हम निश्चय ही अच्छी वस्तुओं से धनी किए जाएँगे। हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा! यदि तेरी इच्छा हो, तो हमारे मनों में विचार, हमारे हृदयों में लालसाएँ, और हमारे होठों पर ठीक-ठीक शब्द भी डाल, जिससे हमारी सब प्रार्थनाएँ आत्मा में की गई प्रार्थनाएँ हों, और शरीर में नहीं।

आत्मा में प्रार्थना करने का मुख्य भाग केवल आत्मा की सामर्थ्य में, या आत्मा के द्वारा हमें विषय-वस्तु सिखाए जाने में ही नहीं, वरन् रीति में आत्मा की सहायता में होना चाहिए। हे भाइयो और बहनो, देखो कि प्रार्थना करने की कितनी ही रीतियाँ हैं जो परमेश्वर को अप्रिय हैं—उन्हें देखो और उनसे बचो! प्रार्थना करने की केवल एक ही रीति है जिसे प्रभु ग्रहण करता है। तुम जानते हो कि वह क्या है। मैं संक्षेप में उसके गुणों का वर्णन करूँगा। परमेश्वर के पास आनेवाले को स्मरण रखना चाहिए कि वह “आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्चाई से आराधना करें, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही आराधकों को ढूँढ़ता है।” प्रार्थना की सबसे पहली आवश्यकता है सच्चाई से प्रार्थना करना, और हम सच्चाई से प्रार्थना नहीं करते जब तक परमेश्वर का आत्मा हमारे व्यर्थ मनों को भक्ति की निष्कपटता और वास्तविकता में न ले जाए।

सच्चाई से प्रार्थना करना यह है—प्रार्थना की खोखली भाषा का प्रयोग करना नहीं, वरन् जो हम कहते हैं उसका सचमुच आशय रखना। यह है हृदय का परमेश्वर के साथ वेदना में जूझना और प्रबल लालसाओं से उमड़ना। और ऐसी रीति की प्रार्थना तुम आत्मिक मनुष्य के सिवाय, जब वह पवित्र आत्मा से उभारा जाता है, और कहाँ पाओगे? शारीरिक मनुष्य, यदि वह पर्याप्त मूर्ख हो, तो किसी प्रार्थना को सुर में गा सकता है। शारीरिक मनुष्य “उपासना-विधि पढ़” सकता है, और “कर्तव्य निभा” सकता है, उतना ही अच्छा जितना कोई और जो पुस्तक पढ़ सकता है, परन्तु वह प्रार्थना नहीं कर रहा! उससे कोई प्रार्थना नहीं निकल सकती। केवल आत्मिक मनुष्य ही आह भर सकता है और लालसा कर सकता है, और अपने अन्तरतम हृदय में, और अपने प्राण की कोठरी में परमेश्वर के सामने पुकार सकता है—परन्तु वह भी ऐसा तभी करेगा जब सत्य का आत्मा उसे निष्कपटता के साथ हृदय की प्रार्थना के भेद में ले जाए।

पवित्र आत्मा में प्रार्थना करना उत्साह से प्रार्थना करना है। हे मेरे भाइयो और बहनो, ठण्डी प्रार्थनाएँ प्रभु से कहती हैं कि उन्हें न सुने! जो उत्साह से विनती नहीं करते, वे विनती करते ही नहीं। गुनगुनी आग की बात करना और गुनगुनी प्रार्थना की बात करना एक समान है! आवश्यक है कि वह लाल-तप्त हो। सच्ची प्रार्थना मानो तपते लोहे से मनुष्य के प्राण में दागी जाती है, और फिर मनुष्य के प्राण से झाऊ के अंगारों के समान निकलती है, जिनमें अत्यन्त प्रचण्ड ताप होता है। ऐसी प्रार्थनाएँ पवित्र आत्मा के सिवाय और कोई नहीं दे सकता। मैंने इसी स्थान से ऐसी प्रार्थनाएँ सुनी हैं जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता, और न तुम ही उन्हें कभी भूलोगे।

पिछली जनवरी और फरवरी में ऐसे समय आए जब हमारे कुछ भाइयों को ऐसी सामर्थ्य से प्रार्थना करने में सहायता मिली कि हम दीनता में झुक गए, और उसके बाद विनती की सामर्थ्य में मानो उकाबों के पंखों पर ऊपर उठाए गए! सामर्थ्य के साथ प्रार्थना करने की एक ऐसी रीति है जिसमें मनुष्य मानो स्वर्ग के फाटक के खम्भों को पकड़ लेता है, जैसे शिमशोन ने मन्दिर के खम्भों को पकड़ा था, और ऐसा दिखता है मानो वह आशीष से चूकने के बदले सब कुछ अपने ऊपर ढा देगा। हृदय के लिये यह एक साहसी बात है कि वह प्रण करे, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा।” यही पवित्र आत्मा में प्रार्थना करना है। हम प्रभावशाली और उत्साहपूर्ण प्रार्थना चढ़ाने की कला में शिक्षा पाएँ!

उसके बाद, प्रार्थना में यह आवश्यक है कि हम धीरज से लगे रहकर प्रार्थना करें। कोई भी मनुष्य थोड़ी देर के लिये तेज़ दौड़ सकता है, परन्तु मील पर मील उसे बनाए रखना—यही असली लड़ाई है! और वैसे ही, कुछ जोशीली आत्माएँ बीच-बीच में बहुत उत्साह से प्रार्थना कर सकती हैं, परन्तु प्रार्थना में लगे रहना—यह कौन कर सकता है, जब तक परमेश्वर का आत्मा उसे सम्भाले न रहे? नश्वर आत्माएँ ढीली पड़ जाती और थक जाती हैं। केवल शारीरिक भक्ति की चाल उस घोंघे की चाल के समान है जो रेंगते-रेंगते घुलता जाता है। शारीरिक मन आगे तो बढ़ते हैं, परन्तु उनकी भक्ति धीरे-धीरे छोटी, और दयनीय रूप से और भी छोटी होती जाती है, और वे चिल्लाते हैं, “यह कैसा बड़ा उपद्रव है!” परन्तु जब पवित्र आत्मा किसी मनुष्य को भर देता है और उसे प्रार्थना में ले जाता है, तो वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता है वैसे-वैसे बल पकड़ता जाता है—और जब परमेश्वर उत्तर देने में देर करता है, तब भी और अधिक उत्साही होता जाता है! फाटक जितनी देर बन्द रहता है, वह उतनी ही अधिक प्रचण्डता से कुण्डी खटखटाता है, यहाँ तक कि उसकी प्रार्थना गर्जन बन जाती है! और वह दूत जितनी देर ठहरता है, उतना ही वह दृढ़ निश्चय करता जाता है कि यदि वह उसे मृत्यु की-सी पकड़ से पकड़ ले, तो आशीष पाए बिना उसे कभी जाने न देगा।

परमेश्वर की दृष्टि में आँसुओं से भरी और तो भी अजेय आग्रहपूर्ण विनती सुन्दर है। यीशु को यह भाता है कि कोई उसे पकड़ ले और कहे, “मैं इनकार को उत्तर मानकर नहीं लौट सकता, यह आशीष मुझे मिलनी ही चाहिए, क्योंकि तूने इसकी प्रतिज्ञा की है और तूने ही मुझे इसे माँगना सिखाया है, और मैं यह विश्वास नहीं करूँगा कि तू अपने ही वचन से मुकर सकता है।” निश्चय ही, इस प्रकार प्रार्थना करने के लिये हमें पवित्र आत्मा की सहायता चाहिए। आत्मा में प्रार्थना करते हुए हम निश्चय ही मन की पवित्र दशा में प्रार्थना करेंगे। हे भाइयो और बहनो, क्या तुम्हारा मन कभी भटकता है? “आह,” तुम कहते हो, “मैं तो यह सोचता हूँ कि वह कब नहीं भटकता।” मैं यह कहने का साहस करूँगा कि तुम बोझ से दबे हुए इस भवन में आए हो, और तो भी मार्ग में तुम कह रहे थे, “यह एक धन्य रविवार है, मुझे परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव हो रहा है।”

फिर कोई मूर्ख बकवादी तुम्हें सीढ़ियों पर मिल गया और उसने तुम्हें एक व्यर्थ कहानी सुनाई जिसने तुम्हारा मन भटका दिया। हो सकता है तुम यहाँ शान्ति से बैठ भी जाओ, और तब घर पर किसी बच्चे का स्मरण, या जो किसी ने कोई छः सप्ताह पहले कहा था उसकी याद तुम्हारे मन को ऐसा उलझा दे कि तुम प्रार्थना न कर सको। परन्तु जब पवित्र आत्मा आता है, तब वह पतली रस्सियों का कोड़ा लेकर इन बेचनेवालों और खरीदनेवालों को मन्दिर से बाहर निकाल देता है और उसे परमेश्वर के लिये खाली कर देता है। और तब तुम मन की पवित्र और भक्तिपूर्ण दशा के साथ आ सकते हो, परमेश्वर के पास पहुँचने के अपने महान लक्ष्य पर स्थिर और जमे हुए। यही आत्मा में उसके पास पहुँचना है। आह, ऐसी धन्य और अविचलित भक्ति और अधिक हो!

तो भी, मैं आत्मा में प्रार्थना करने का वर्णन पूरा नहीं कर सकता यदि मैं यह न कहूँ कि इसका अर्थ दीनता से प्रार्थना करना है, क्योंकि पवित्र आत्मा हमें कभी घमण्ड से नहीं फुलाता। वही आत्मा है जो पाप के विषय में निरुत्तर करता है, और इस प्रकार हमें पश्चात्ताप और आत्मा की टूटी दशा में झुका देता है। हमें परमेश्वर के सामने उस दीन चुंगी लेनेवाले के समान प्रार्थना करनी चाहिए, नहीं तो हम कभी उसके समान धर्मी ठहरकर न लौटेंगे। जब तक हम डी प्रोफ़न्डिस परमेश्वर से प्रार्थना न करें, हम कभी ग्लोरिया इन एक्सेल्सिस न गाएँगे—गहरे स्थानों में से हमें पुकारना होगा, नहीं तो हम सर्वोच्च स्थान की महिमा कभी न देखेंगे! सच्ची प्रार्थना, यदि वह पवित्र आत्मा में प्रार्थना है, तो प्रेमपूर्ण प्रार्थना होनी चाहिए। प्रार्थना प्रेम से सुगन्धित, प्रेम से सराबोर होनी चाहिए—अपने संगी पवित्र लोगों के प्रति प्रेम, और मसीह के प्रति प्रेम। इसके अतिरिक्त, वह विश्वास से भरी प्रार्थना होनी चाहिए। मनुष्य की प्रभावशाली, उत्साहपूर्ण प्रार्थना केवल उतनी ही प्रबल होती है जितना वह परमेश्वर पर विश्वास करता है; और पवित्र आत्मा हममें विश्वास का रचयिता है, और उसे पालता और दृढ़ करता है, जिससे हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करते हुए प्रार्थना करें।

आह, कि उत्तम अनुग्रहों का यह धन्य मेल, जो व्यापारी के सुगन्ध-द्रव्यों के समान अनमोल और मधुर है, हमारे भीतर सुगन्ध फैलाए, क्योंकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य हमारे मन में डाली गई है! समय मेरा साथ नहीं देता, इसलिए मुझे इस बात का पूरा वर्णन छोड़ना पड़ता है कि पवित्र आत्मा में प्रार्थना करना क्या है, परन्तु मुझे आशा है कि तुम इसे पाओगे और इस प्रकार इसे समझोगे।

IV. चौथे, मैं इस पाठ को एक करूब के रूप में काम में लाऊँगा, जो प्रार्थना में हमारी सफलता की घोषणा करे। आत्मा में प्रार्थना करना—कैसे धन्य शब्द! तो ऐसी प्रार्थना के साथ यह पूर्ण निश्चय है कि मैं प्रार्थना में परमेश्वर के यहाँ अवश्य सफल होऊँगा। यदि मेरी प्रार्थना केवल मेरी अपनी प्रार्थना होती, तो मैं उसके विषय में इतना निश्चित न होता। परन्तु यदि जो प्रार्थना मैं करता हूँ वह परमेश्वर की अपनी प्रार्थना है जो मेरे प्राण पर लिखी गई है, तो परमेश्वर सदा अपने आप से एक है—और जो कुछ वह हृदय पर लिखता है, वह वहाँ केवल इसीलिए लिखा जाता है क्योंकि वह उसके उद्देश्यों में लिखा हुआ है।

एक पुराने धर्मविज्ञानी ने कहा है कि प्रार्थना सर्वशक्तिमत्ता की छाया है। हमारी इच्छा, जब परमेश्वर पवित्र आत्मा उस पर प्रभाव डालता है, परमेश्वर की इच्छा की सूचक होती है। जब परमेश्वर के लोग प्रार्थना करते हैं, तो इसलिए कि आशीष आ रही है, और उनकी प्रार्थनाएँ आनेवाली आशीष की छाया हैं! हे भाइयो और बहनो, इस बात का निश्चय रखो, परमेश्वर ने कभी अपने आपको झुठलाया नहीं! उसने एक स्थान पर जो कहा, उसका दूसरे स्थान पर कभी खण्डन नहीं किया। तुम और मैं अपनी ही बात का खण्डन कर सकते हैं, न केवल असत्यता के कारण, वरन् दुर्बलता के कारण भी।

हो सकता है हम अपने वचन पर टिके न रह सकें, और हम भूल जाएँ कि हमने क्या कहा था—और इस प्रकार किसी दूसरे स्थान पर कुछ ऐसा कह दें जो उसका खण्डन करे—परन्तु परमेश्वर न तो स्मरण-शक्ति में दुर्बल है, और न इच्छा में परिवर्तनशील। जो उसने कल प्रतिज्ञा की, उसे वह आज पूरा करता है। जो उसने एक स्थान पर कहा, उसी की घोषणा वह दूसरे स्थान पर करता है। तो यदि परमेश्वर ने मेरे हृदय में कहा, “अमुक के लिये प्रार्थना कर,” तो इसलिए कि उसने यह अपने निर्णयों की पुस्तक में कहा है। हृदय में परमेश्वर के आत्मा का लेख परमेश्वर के अनन्त उद्देश्य की पुस्तक में लिखे भाग्य-लेख से सदा मेल खाता है। निश्चय जानो कि जब तुमने अपने प्राण को कागज़ के एक पन्ने के समान प्रभु के सामने बिछा दिया है और उससे माँगा है कि वह उस पर लिखे, तब तुम्हारा सफल होना निश्चित है! तब वह केवल तुम्हारी अपनी प्रार्थना नहीं रहती, वरन् आत्मा है जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार तुम्हारे भीतर विनती करता है।

ऐसे समय तुम्हें यह कहने की आवश्यकता नहीं, “मुझे आशा है कि परमेश्वर प्रार्थना का उत्तर देगा।” वह उत्तर देगा—वह ऐसा करने को वचनबद्ध है। यह कहना एक प्रकार का अविश्वास है, “मैं नहीं जानता कि प्रभु अपनी प्रतिज्ञा का सच्चा है या नहीं, परन्तु मुझे आशा है कि वह है।” वह सच्चा है! परमेश्वर सच्चा और हर एक मनुष्य झूठा ठहरे। आह, यदि तुममें से और लोग उसे वैसे परखते जैसे हममें से कुछ को परखना पड़ा है, तो तुम्हें आश्चर्य से अपने हाथ उठाकर कहना पड़ता, “सचमुच, और कुछ चाहे तथ्य हो या न हो, यह एक तथ्य है कि परमेश्वर, जो सबसे ऊँचे स्वर्ग में विराजमान है, अपने लोगों की दुहाई सुनता है, और उन्हें उनके मनोरथों के अनुसार देता है।” यदि आत्मा तुम्हें प्रार्थना करना सिखाता है, तो यह उतना ही निश्चित है जितना कि दो गुणा दो चार होते हैं, कि परमेश्वर तुम्हें वह देगा जिसे तुम खोज रहे हो।

V. तब मैं अन्त में इस पाठ को एक रथ के रूप में काम में लाऊँगा, जिसमें हम प्रार्थना के आनन्दमय अभ्यास में अपने प्राणों को आगे ले चलें। आज और कल के लिये हमें जो अभ्यास सौंपा गया है, वह आत्मा में प्रार्थना करना है। हे भाइयो और बहनो, हममें से कुछ के लिये यह विश्वास करना आनन्द की बात है कि परमेश्वर का आत्मा ही प्रार्थना की उस बड़ी लहर का रचयिता है जो इस समय उन कलीसियाओं पर उमड़ रही है जिनसे हम सम्बन्ध रखते हैं। यह हमारी युक्ति या योजना से नहीं हुआ, वरन् यह परमेश्वर के पवित्र आत्मा की प्रेरणा थी जो कुछ भाइयों पर हुई, जो एक दिन गम्भीर प्रार्थना में बिताना चाहते थे, और उन्होंने उसमें ऐसी आशीष पाई कि वे दूसरों को उसके विषय में बताए बिना न रह सके!

तब दूसरे भी अपने आप उभारे गए, और विरोध या मतभेद के एक शब्द के बिना सबने कहा, “आमीन। आओ, हम भी प्रार्थना के लिये इकट्ठे हों।” भाईचारे की कृपा, एकमतता और प्रेम की आत्मा हमारे सम्प्रदाय को दी गई, और फिर परमेश्वर से आशीष उतार लाने की सच्ची लालसा की आत्मा भी। हमने वह समय भी देखा है जब ऐसा नहीं था। हमने वह समय देखा है जब उपवास और प्रार्थना के किसी दिन को, यदि तुच्छ न भी जाना जाता, तो भी उतना सराहा न जाता जितना अब सराहा जाएगा। इस विषय में हम एक मन हैं, और बहुत-से मसीही लोगों से हुई बातचीत से मैं जानता हूँ कि परमेश्वर के बहुत-से लोग पहले से ही ऐसा अनुभव करते हैं मानो वे विशेष रूप से प्रार्थना में डूबे हों—मानो अब प्रार्थना करना कोई परिश्रम न हो, वरन् पवित्र लोगों के जागरण और पापियों के बटोरे जाने के लिये लालसा भरी विनतियाँ साँस में छोड़ना मानो अब उनकी साँस ही हो।

हे इस कलीसिया के भाइयो और बहनो, तुमने परमेश्वर की उपस्थिति पाई है। बहुत वर्षों से तुम पर यह कृपा रही है कि तुम्हें बहुत अधिक “पवित्र आत्मा में प्रार्थना” का अनुभव मिला है, और तुमने अपनी आँखों से वे बड़े-बड़े काम देखे हैं जो परमेश्वर ने विनती के उत्तर में किए हैं। क्या तुममें से कोई अब पीछे हटेगा? क्या आज या कल कोई एक भी मनुष्य ऐसा होगा जो प्रार्थना में उत्साही न हो? क्या इस कलीसिया से जुड़ा एक भी मनुष्य, या एक बालक भी, प्रार्थना में गुनगुना होगा? मैं कहूँगा, अपने भाइयों और बहनों के साथ दया के सिंहासन के पास जाने से रुककर प्रभु के विरुद्ध पाप न करो। प्रभु को ऐसा अप्रसन्न न करो कि वह तुम्हें आशीष से वंचित करे, क्योंकि तुम इस अभ्यास में सम्मिलित होने से स्वयं को वंचित रखते हो।

मेरे प्रिय मित्रो, जब वे सब एक मन होकर एक जगह इकट्ठे थे, तभी अचानक उन्होंने बड़ी आँधी के समान सनसनाहट का शब्द सुना। हम सब एक स्थान पर नहीं हो सकते, परन्तु कम-से-कम हम सब एक मन तो हों। क्या? क्या तुम कहते हो कि तुम्हारे पास प्रार्थना करने के लिये कुछ नहीं? क्या? कोई बच्चे नहीं जिनका मन-फिराव न हुआ हो, कोई मित्र नहीं जिनका उद्धार न हुआ हो, कोई पड़ोसी नहीं जो अब तक अन्धकार में हों? क्या? लन्दन में रहते हो और पापियों के लिये प्रार्थना नहीं करते? तुम रहते कहाँ हो? क्या किसी विशाल जंगल में, “छाया के किसी असीम विस्तार” के बीच, जहाँ पाप और अज्ञान की चर्चा कभी तुम्हारे कानों तक नहीं पहुँची? नहीं, तुम भक्तिहीन लाखों-लाखों के बीच रह रहे हो! लाखों, जो उस परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं जिसने उन्हें बनाया! लाखों, जो मसीह के सुसमाचार को तुच्छ जानते हैं!

लाखों, हज़ारों नहीं! इस शब्द को सुनो, और देखो कि क्या तुम उसका अर्थ बता सकते हो! लाखों, जो परमेश्वर के बिना और आशा के बिना जी रहे हैं, और नरक में उतरते जा रहे हैं! सारे राज्य में भी, खतरनाक बुराइयाँ फैलती जा रही हैं। क्या मुझे बार-बार तुम्हें उनकी याद दिलानी पड़े? अविश्वास बिशप का मुकुट पहने हुए है, और पोपवाद प्रोटेस्टेन्टवाद का स्थान छीन रहा है! भेड़िया और सिंह, सर्प और भालू तुम पर आक्रमण कर रहे हैं! हर प्रकार की बुराई निकल-निकलकर आक्रमण कर रही है

कलीसिया पर। प्रार्थना न करोगे? यदि तुम प्रार्थना न करो, तो क्या मैं कहूँ, तुम अपनी लापरवाही का दण्ड भोगो? नहीं, मैं ज़रा भी ऐसे बोलने का साहस नहीं करता मानो मैं तुम पर कोई विपत्ति माँग रहा हूँ, परन्तु निश्चय जानो, विपत्ति तुम पर आएगी! यदि मैं इसे न कहूँ, तो भी परमेश्वर इसी घड़ी यह कहेगा। “मेरोज को श्राप दो, यहोवा का दूत कहता है, क्योंकि वे यहोवा की सहायता करने को, शूरवीरों के विरुद्ध यहोवा की सहायता करने को न आए।”

इस विषय में हम तुमसे अपना धन देने को नहीं कह रहे। यदि कहते, तो प्रभु यीशु का उस पर अधिकार है, और तुम्हें उसे उदारता से देना चाहिए। न हम तुम सबसे आज के दिन प्रचार करने को कह रहे हैं। यदि कहते, तो तुममें से कुछ योग्यता की कमी के कारण छूट पा सकते थे। परन्तु हम तुम्हारी प्रार्थनाओं का दावा करते हैं, और हमें इनकार नहीं मिलना चाहिए! प्रार्थना नहीं कर सकते? तो तुम अनुग्रह-रहित, मसीह-रहित, आशाहीन, खोए हुए हो, और मैं तुमसे हमारे साथ सम्मिलित होने को नहीं कहूँगा! परन्तु मैं तुमसे यह कहता हूँ कि पहले अपने लिये परमेश्वर के पास जाओ। और यदि तुम मसीही हो तो तुम प्रार्थना कर सकते हो। कंगाली तुम्हें प्रार्थना में कंगाल नहीं बनाती। शिक्षा की कमी को घुटनों पर तुम्हारे लिये रुकावट नहीं बनना चाहिए। समाज में पद और प्रतिष्ठा की कमी तुम्हारे लिये कोई बाधा न होगी जब तुम उस परमेश्वर से व्यवहार करते हो, जो दीन जन के पुकारने पर उसकी सुनता है और ईश्वरीय अनुग्रह के उदार दान से उसे उत्तर देता है!

हे भाइयो और बहनो, यदि तुम मसीह से प्रेम करते हो, यदि तुमने कभी उसके प्रेम को अपने मन में डाला गया अनुभव किया है। यदि तुम उसके लहू में धोए गए हो। यदि तुम उसके द्वारा क्रोध से बचाए गए हो। यदि तुम उसमें नई सृष्टि हो। यदि तुम अन्त में ग्रहणयोग्य ठहरकर उसका मुख देखने की आशा रखते हो, तो मैं इसे तुम्हारे सामने एक माँग के रूप में रख सकता था! परन्तु मैं इसे भाई के नाते विनती के रूप में तुम पर डालता हूँ—पवित्र आत्मा में प्रार्थना करने में हमारे साथ सम्मिलित हो! क्या कोई पीछे हटेगा? तो सावधान रहो, यदि तुम प्रार्थना में अपने भाइयों के साथ मिलने से इनकार करते हो, कहीं ऐसा न हो कि जब तुम पुकारना चाहो तब तुम अपने आपको सकेती में और बन्दीगृह में बन्द पाओ! सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि अब, जबकि परमेश्वर का आत्मा आ गया है, प्रार्थना करने से इनकार करने के कारण, बाद में तुम अपने आपको पवित्र आत्मा की सान्त्वना देनेवाली उपस्थिति से वंचित पाओ, और देखो कि भक्ति की मिठास तुमसे जाती रही है।

प्रभु आशीष भेजे। उसे भेजनी ही होगी—यदि वह न भेजे तो हमारे हृदय टूट जाएँगे! हम अनुभव करते हैं कि वह आ रही है। हमने प्रतिज्ञा को पकड़ लिया है। हमने यहोवा से विनती की है! हमने यीशु के लहू की दुहाई दी है! हम अभी भी उसकी दुहाई दे रहे हैं! हम ठान चुके हैं कि जब तक आशीष न आए, हम ऐसी विनती में लगे रहेंगे, और हम इस पर भरोसा कर सकते हैं कि स्वर्गीय वर्षा शीघ्र ही उतरेगी! उसने याकूब के वंश से नहीं कहा, “मुझे व्यर्थ में ढूँढ़ो।” हे भाइयो और बहनो, आशा रखो, और आओ, हम सब एक मन होकर पवित्र आत्मा में प्रार्थना करने में सम्मिलित हों!

प्रिय मित्रो, प्रभु यीशु के निमित्त इस विषय में तुम्हें आशीष दे।

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