अध्याय 6 · 41 मिनट का पठन
प्रार्थना में सामर्थ्य की शर्तें
“और जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं; और जो उसे भाता है वही करते हैं। और उसकी आज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और जैसा उसने हमें आज्ञा दी है उसी के अनुसार आपस में प्रेम रखें। और जो परमेश्वर की आज्ञाओं को मानता है, वह उसमें, और परमेश्वर उनमें बना रहता है: और इसी से, अर्थात् उस पवित्र आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है।” 1 यूहन्ना 3:22-24।
मैंने सोचा था कि आज भोर प्रार्थना के महत्व पर तुमसे बात करूँ, और मेरा उत्कट उद्देश्य यह था कि तुम्हें उभारूँ कि तुम मेरे लिये और इस स्थान में प्रभु के काम के लिये प्रार्थना करो। सचमुच, मैं नहीं समझता कि मुझे इससे अधिक गम्भीर विषय मिल सकता था, या कोई ऐसा विषय जो मेरे प्राण पर इससे अधिक बोझ बनकर रहता हो। यदि मुझे तुमसे केवल एक ही निवेदन करने की अनुमति होती, तो वह यह होता—“हे भाइयों, हमारे लिये प्रार्थना करो।” ईश्वरीय आशीष के बिना हमारी सेवकाई किस काम की हो सकती है, और हम ईश्वरीय आशीष की आशा कैसे कर सकते हैं जब तक परमेश्वर की कलीसिया उसे न ढूँढ़े? मैं तो आँसू बहाते हुए भी यही कहूँगा, “हे भाइयों, हमारे लिये प्रार्थना करो।” प्रार्थना को रोके मत रखो—इसके विपरीत, मध्यस्थता में भरपूर रहो, क्योंकि इसी रीति से, और केवल इसी रीति से, एक कलीसिया के रूप में हमारी उन्नति बढ़ सकती है, या बनी भी रह सकती है।
परन्तु तब मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि यदि कलीसिया में कुछ ऐसा हो जो हमारी प्रार्थनाओं को सफल होने से रोक दे, तो क्या होगा? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, और ऐसा प्रश्न है जिस पर तुम्हें मध्यस्थता के लिये उकसाने से पहले ही अत्यन्त गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए। जैसा हमें यशायाह के पहले अध्याय से सिखाया जा चुका है, एक अपवित्र प्रजा की प्रार्थनाएँ शीघ्र ही परमेश्वर के लिये घृणित हो जाएँगी। “जब तुम मेरी ओर हाथ फैलाओ, तब मैं तुम से मुख फेर लूँगा; तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूँगा।” कलीसियाएँ ऐसी दशा में गिर सकती हैं कि उनकी भक्ति-उपासना ही अधर्म बन जाए। “महासभा भी” प्रभु के लिये थकावट बन जाएगी। हम में से किसी के भी हृदय में ऐसी बुराइयाँ हो सकती हैं जिनके कारण परमेश्वर के लिये, अपने चरित्र और गुणों के अनुरूप रहते हुए, हमारी मध्यस्थताओं पर कुछ भी ध्यान देना असम्भव हो जाए।
यदि हम मन में अनर्थ की बात सोचें, तो प्रभु हमारी न सुनेगा। हमारे पाठ के अनुसार कुछ बातें ऐसी हैं जो प्रार्थना में प्रबल होने के लिये अनिवार्य हैं। परमेश्वर सब सच्ची प्रार्थना सुनेगा, परन्तु कुछ बातें ऐसी हैं जो परमेश्वर के लोगों में अवश्य होनी चाहिए, नहीं तो उनकी प्रार्थनाएँ निशाने तक नहीं पहुँचेंगी। पाठ हमें बताता है, “जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं; और जो उसे भाता है वही करते हैं।” तो आज भोर हमारे विचार का विषय होगा प्रार्थना में सामर्थ्य की अनिवार्य बातें—हमें क्या करना चाहिए, हमें क्या होना चाहिए, हमारे पास क्या होना चाहिए—यदि हमें प्रार्थना में परमेश्वर के साथ सदा प्रबल होना है, और वह भी एक स्थायी सच्चाई के रूप में। आओ, हम सीखें कि एलिय्याह और याकूब जैसे कैसे बनें।
I. मैं पहले प्रार्थना में सामर्थ्य की अनिवार्य बातों पर विचार करने से आरम्भ करूँगा। आरम्भ में ही हमें कुछ भेद कर लेने चाहिए। मैं समझता हूँ कि दया ढूँढ़नेवाले प्राण की प्रार्थना में और उद्धार पाए हुए मनुष्य की प्रार्थना में बड़ा अन्तर है। मैं यहाँ उपस्थित हर एक व्यक्ति से, उसका चरित्र चाहे जैसा हो, यह कहूँगा: यदि तुम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से सच्चे मन से दया ढूँढ़ो, तो वह तुम्हें मिलेगी। तुम्हारे जीवन की पिछली दशा चाहे जो रही हो, यदि तुम अब ठहराए हुए मध्यस्थ के द्वारा पश्चाताप के साथ यहोवा का मुख ढूँढ़ो, तो वह तुमको मिलेगा।
यदि पवित्र आत्मा ने तुम्हें प्रार्थना करना सिखाया है, तो अब और मत हिचकिचाओ, वरन् शीघ्र क्रूस के पास जाओ और वहाँ अपने दोषी प्राण को यीशु पर टिका दो। पापी की पहली प्रार्थना के लिये मैं सच्चाई को छोड़ और कोई योग्यता नहीं जानता, परन्तु तुम में से जो उद्धार पा चुके हैं, उनसे हमें दूसरी रीति से बात करनी होगी। अब तुम परमेश्वर के लोग बन गए हो, और यद्यपि तुम्हारी वैसे ही सुनी जाएगी जैसे पापी की सुनी जाती है, और तुम प्रतिदिन वह आवश्यक अनुग्रह पाओगे जो हर एक खोजनेवाला प्रार्थना के उत्तर में पाता है, तो भी अब तुम परमेश्वर की सन्तान हो, और तुम एक ऐसे विशेष अनुशासन के अधीन हो जो नया जन्म पाए हुए परिवार के लिये ही है। उस अनुशासन में प्रार्थनाओं के उत्तरों का बड़ा ऊँचा स्थान है और वे अत्यन्त उपयोगी हैं।
एक विश्वासी के लिये केवल उद्धार से बढ़कर भी भोगने को कुछ है। ऐसी दयाएँ, आशीषें, सान्त्वनाएँ और कृपाएँ हैं जो उसके वर्तमान जीवन को उपयोगी, सुखी और आदरणीय बनाती हैं। और ये उसे उसके चरित्र की परवाह किए बिना मिलेंगी। ये उद्धार के विषय में जीवन-मरण की बातें नहीं हैं—विश्वासी इन्हें बिना शर्त पाता है, क्योंकि ये वाचा की आशीषें हैं। परन्तु अब हम उन आदरों और घर के उन स्वादिष्ट व्यंजनों की बात करते हैं जो प्रभु की सन्तान के रूप में हमारी आज्ञाकारिता के अनुसार दिए या रोके जाते हैं। यदि तुम इनके साथ जुड़ी शर्तों की उपेक्षा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता इन्हें तुमसे रोक लेगा। अनुग्रह की वाचा की अनिवार्य आशीषें बिना किसी शर्त के स्थिर हैं—दया ढूँढ़ने का निमन्त्रण उन्हीं को दिया गया है जिनमें अपनी आवश्यकता को छोड़ कोई भी योग्यता नहीं है।
परन्तु उद्धार पाए हुए पुरुषों और स्त्रियों के रूप में ईश्वरीय परिवार के भीतर आओ, तो तुम पाओगे कि दूसरी चुनी हुई आशीषें इस बात के अनुसार दी या रोकी जाती हैं कि हम प्रभु के परिवार में उसके नियमों पर कितना ध्यान देते हैं। एक साधारण दृष्टान्त दूँ—यदि कोई भूखा मनुष्य तुम्हारे द्वार पर हो और रोटी माँगे, तो उसका चरित्र चाहे जैसा हो, तुम उसे रोटी दोगे। तुम अपनी सन्तान को भी भोजन दोगे, उसका व्यवहार चाहे जैसा हो—जो कुछ जीवन के लिये आवश्यक है, उसमें से तुम अपने बच्चे को कुछ भी देने से इनकार नहीं करोगे। तुम उसके विरुद्ध अनुशासन का कोई ऐसा मार्ग कभी न अपनाओगे जिससे उसका आवश्यक भोजन, या ठण्ड से बचानेवाला वस्त्र, उससे छिन जाए। परन्तु और बहुत सी वस्तुएँ हैं जिन्हें तुम्हारा बच्चा चाह सकता है, जो तुम उसे दोगे यदि वह आज्ञाकारी हो, और जो तुम उसे नहीं दोगे यदि वह तुमसे बलवा करे। मैं समझता हूँ कि इससे यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का पितृवत् शासन इस बात को कहाँ तक ले जाएगा और कहाँ तक नहीं।
यह भी समझ लो कि पाठ इस बात की उतनी चर्चा नहीं करता कि परमेश्वर अपने दासों की कोई प्रार्थना कभी-कभार सुन लेता है—वह तो वह करेगा ही, तब भी जब उसके दास उससे भटके हुए हों और वह उनसे अपना मुख छिपा रहा हो। यहाँ प्रार्थना की जिस सामर्थ्य से अभिप्राय है, वह परमेश्वर के साथ निरन्तर और पूर्ण सामर्थ्य है, यहाँ तक कि पाठ के शब्दों में, “जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है।” इस प्रार्थना के लिये कुछ पूर्व-शर्तें और अनिवार्य बातें हैं जिनकी चर्चा अब हमें करनी है, और पहली है बालक-जैसी आज्ञाकारिता—“जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं।” यदि हममें यह नहीं है, तो प्रभु हमसे वैसा ही कह सकता है जैसा उसने अपनी प्रजा इस्राएल से कहा था, “तुम ने मुझे त्याग कर पराए देवताओं की उपासना की है; इसलिए मैं फिर तुम को न छुड़ाऊँगा। जाओ, अपने माने हुए देवताओं की दुहाई दो।”
कोई भी पिता तुम्हें बताएगा कि आज्ञा न माननेवाले बच्चे का निवेदन पूरा करना परिवार में विद्रोह को बढ़ावा देना होगा और उसके लिये अपने ही घर में शासन करना असम्भव कर देगा। माता-पिता के लिये प्रायः यह कहना आवश्यक होता है, “मेरे बच्चे, अभी तूने मेरी बात नहीं सुनी, और इसलिए मैं तेरी बात नहीं सुन सकता।” ऐसा नहीं कि पिता प्रेम नहीं करता, वरन् इसलिए कि वह बच्चे से प्रेम करता है, और अपने प्रेम के कारण वह अपने भटके हुए बच्चे का निवेदन ठुकराकर अपनी अप्रसन्नता दिखाने के लिये स्वयं को बाध्य पाता है। परमेश्वर हमसे वैसा ही व्यवहार करता है जैसा हमें अपने हठीले बच्चों के प्रति करना चाहिए। और यदि वह देखता है कि हम पाप में जाएँगे और अपराध करेंगे, तो यह उसके कृपालु पितृवत् अनुशासन का भाग है कि वह कहे, “जब तुम मेरी दुहाई दोगे, तब मैं तुम्हारी प्रार्थना को रोक दूँगा; जब तुम मुझसे विनती करोगे, तब मैं तुम्हारी न सुनूँगा; मैं तुम्हें नष्ट नहीं करूँगा, तुम उद्धार पाओगे, तुम्हें जीवन की रोटी और जीवन का जल मिलेगा, परन्तु इससे अधिक कुछ नहीं: मेरे राज्य की उत्तम वस्तुएँ तुमसे रोक ली जाएँगी, और मेरे साथ प्रार्थना में विशेष प्रबलता जैसी कोई वस्तु तुम्हारे पास न होगी।”
कि प्रभु अपने ही लोगों से ऐसा व्यवहार करता है, यह 81वें भजन से स्पष्ट है—“यदि मेरी प्रजा मेरी सुने, यदि इस्राएल मेरे मार्गों पर चले, तो मैं क्षण भर में उनके शत्रुओं को दबाऊँ, और अपना हाथ उनके द्रोहियों के विरुद्ध चलाऊँ। मैं उनको उत्तम से उत्तम गेहूँ खिलाता, और मैं चट्टान के मधु से उनको तृप्त करता।” भला, यदि परमेश्वर की आज्ञा न माननेवाली सन्तान के हाथ में यह प्रतिज्ञा दे दी जाती—“जो कुछ तुम प्रार्थना में माँगोगे वह सब तुम को मिलेगा,” तो वह निश्चय ही कुछ ऐसा माँगता जो उसे उसके विद्रोह में और भी दृढ़ कर देता! वह अपनी अभिलाषा के लिये सामग्री, और अपने विद्रोह के लिये सहायता माँगता। यह कभी सहा नहीं जा सकता! क्या परमेश्वर हमारी भ्रष्टताओं को बढ़ावा देगा? क्या वह शारीरिक वासना की लपटों के लिये ईंधन जुटाएगा?
स्वेच्छाचारी हृदय अधिक स्वतन्त्रता के लिये ललचाता है ताकि वह और भी हठी हो सके। घमण्डी आत्मा अधिक ऊँचाई की लालसा करती है ताकि वह और भी घमण्डी हो सके। आलसी आत्मा अधिक आराम माँगती है ताकि वह और भी सुस्त हो सके। और प्रभुता जतानेवाली आत्मा अधिक अधिकार माँगती है ताकि उसे अत्याचार के और अधिक अवसर मिलें। जैसा मनुष्य होगा, वैसी ही उसकी प्रार्थना होगी—विद्रोही आत्मा स्वेच्छाचारी और घमण्ड-भरी प्रार्थनाएँ करती है। क्या परमेश्वर ऐसी प्रार्थनाएँ सुनेगा? यह हो ही नहीं सकता! यदि हम उसकी आज्ञाओं को मानें, तो जो कुछ हम माँगते हैं वह हमें देगा, परन्तु यदि हम आज्ञा न माननेवाले हो जाएँ और उसके शासन को ठुकरा दें, तो वह भी हमारी प्रार्थनाओं को ठुकरा देगा और कहेगा, “यदि तुम मेरे विरुद्ध चलते ही रहो, तो मैं भी तुम्हारे विरुद्ध चलूँगा। टेढ़े के साथ मैं तिरछा बनूँगा।” धन्य होंगे हम यदि ईश्वरीय अनुग्रह से हम दाऊद के साथ कह सकें, “मैं अपने हाथों को निर्दोषता के जल से धोऊँगा, तब हे यहोवा मैं तेरी वेदी की प्रदक्षिणा करूँगा।” यह कभी पूर्ण निर्दोषता नहीं होगी, परन्तु कम से कम यह पाप के प्रेम से और परमेश्वर के विरुद्ध जान-बूझकर किए गए विद्रोह से निर्दोषता होगी।
इसके बाद विजयी प्रार्थना के लिये एक और अनिवार्य बात है—बालक-जैसा आदर-भाव। अगले वाक्य पर ध्यान दो। जो कुछ हम माँगते हैं वह हमें मिलता है, “क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं; और जो उसे भाता है वही करते हैं।” हम बच्चों को यह अनुमति नहीं देते कि जब उन्हें पिता से कोई आज्ञा मिले, तो वे उसके उचित या बुद्धिमानी-भरी होने पर प्रश्न उठाएँ। जहाँ प्रश्न उठाना आरम्भ होता है, वहीं आज्ञाकारिता समाप्त हो जाती है। बच्चे का अपने कर्तव्य का मापदण्ड पिता के आज्ञा देने के अधिकार का माप नहीं बनना चाहिए—अच्छे बच्चे कहते हैं, “पिताजी ने हमें अमुक काम करने को कहा है, और इसलिए हम उसे करेंगे, क्योंकि हमें सदा उन्हें प्रसन्न करने में आनन्द मिलता है।” प्रेम करनेवाले बच्चे के किसी काम का सबसे भारी कारण यह निश्चय होता है कि इससे उसके माता-पिता प्रसन्न होंगे। और किसी सुशील बच्चे को रोकने के लिये सबसे प्रबल बात यह प्रमाणित करना है कि ऐसा आचरण उसके माता-पिता को अप्रसन्न करेगा। परमेश्वर के प्रति हमारे साथ भी ठीक ऐसा ही है, जो सिद्ध पिता है, और इसलिए हम भूल के किसी भय के बिना सदा उसकी प्रसन्नता को उचित का नियम बना सकते हैं, जबकि अनुचित का नियम निश्चिन्त होकर वही बना रह सकता है जो उसे अप्रसन्न करे।
मान लो हम में से कोई स्वेच्छाचारी हो और कहे, “जो परमेश्वर को भाता है वह मैं नहीं करूँगा, जो मुझे भाता है वही करूँगा।” तब देखो, हमारी प्रार्थनाओं का स्वरूप क्या होगा? तब हमारी प्रार्थनाएँ इस एक निवेदन में समेटी जा सकती हैं, “मुझे मनमानी करने दे।” और क्या हम आशा कर सकते हैं कि परमेश्वर इसके लिये सहमत होगा? क्या हम केवल परमेश्वर के निज भाग पर ही नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर पर भी प्रभु बन बैठें? क्या तुम चाहोगे कि सर्वशक्तिमान अपना सिंहासन छोड़ दे ताकि एक घमण्डी नश्वर मनुष्य को वहाँ बैठाया जाए? यदि तुम्हारे घर में कोई ऐसा बच्चा हो जिसके मन में अपने पिता के प्रति कुछ भी आदर नहीं, वरन् जो कहता है, “मैं हर बात में मनमानी करना चाहता हूँ,” और यदि वह कोई निवेदन लेकर तुम्हारे पास आए, तो क्या तुम उसके आगे झुकोगे? क्या तुम उसे अपने ऊपर हुक्म चलाने दोगे और वह आदर भूल जाओगे जो तुम्हारा अधिकार है? क्या तुम कहोगे, “हाँ, मेरे प्यारे बच्चे, मैं तेरा महत्व मानता हूँ। घर में तू ही स्वामी होगा और जो कुछ तू माँगेगा, वह तुझे मिलेगा”?
वह कैसा घर होगा? मुझे डर है कि ऐसे कुछ घर हैं, क्योंकि ऐसे मूर्ख माता-पिता भी हैं जो अपने बच्चों को अपना स्वामी बन जाने देते हैं और इस प्रकार अपनी ही पीठ के लिये छड़ी तैयार करते हैं। परन्तु परमेश्वर का घर ऐसे नहीं चलता! वह अपनी स्वेच्छाचारी सन्तानों की नहीं सुनेगा, जब तक कि वह उनकी क्रोध में न सुने और कोप में उन्हें उत्तर न दे! स्मरण करो कि उसने माँस के लिये इस्राएल की प्रार्थना कैसे सुनी, और जब माँस उनके मुँह ही में था, तब वह उनके लिये शाप बन गया? बहुत से लोग अपनी ही अभिलाषाएँ पाकर ताड़ना पाते हैं, जैसे भटके हुए लोग अपनी ही युक्तियों के फल से अघा जाते हैं। हमें परमेश्वर के प्रति बालक-जैसा आदर-भाव रखना चाहिए, ताकि हम यह अनुभव करें, “हे प्रभु, जो मैं माँगता हूँ यदि वह तुझे नहीं भाता, तो वह मुझे भी न भाए। मेरी अभिलाषाएँ सुधारे जाने के लिये तेरे हाथों में सौंपी गई हैं। मेरी हर उस विनती पर कलम फेर दे जो उचित नहीं है, और हे प्रभु, जो कुछ मुझसे छूट गया है उसे जोड़ दे, चाहे स्मरण आने पर भी मैंने उसकी अभिलाषा न की होती। हे भले प्रभु, यदि मुझे उसकी अभिलाषा करनी चाहिए थी, तो मेरी ऐसे सुन मानो मैंने उसकी अभिलाषा की थी। ‘जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।’ “ अब मैं समझता हूँ कि तुम देख सकते हो कि यह झुकनेवाली आत्मा प्रार्थना में परमेश्वर के साथ निरन्तर प्रबल होने के लिये अनिवार्य है। इसका उलटा विनती में श्रेष्ठता के मार्ग में निश्चित बाधा है। जो प्रभु के चारों ओर रहते हैं, उन्हें उसका भय और आदर मानना ही होगा। उन्हें अपने हर काम और अपनी हर माँग में उसकी प्रसन्नता पर दृष्टि रखनी होगी, नहीं तो वह उन पर कृपादृष्टि नहीं करेगा।
तीसरे स्थान पर, पाठ बालक-जैसे भरोसे की आवश्यकता सुझाता है—“और उसकी आज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें।” पवित्रशास्त्र में हर कहीं परमेश्वर पर विश्वास को सफल प्रार्थना के लिये आवश्यक बताया गया है। हमें विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है, नहीं तो हमने प्रार्थना की ही नहीं। हमारे विश्वास के अनुपात में ही हमारी प्रार्थना की सफलता होगी। राज्य का यह एक स्थायी नियम है, “तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे लिये हो।” स्मरण करो कि पवित्र आत्मा प्रेरित याकूब के मुँह से कैसे बोलता है? “पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगो, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी। पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। ऐसा मनुष्य यह न समझे, कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा।”
पाठ उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास की बात करता है, जिसका अर्थ मैं यह समझता हूँ: उसके प्रकट किए गए चरित्र पर विश्वास, उसके सुसमाचार पर विश्वास, उसके प्रतिस्थापन और उद्धार के विषय में सत्य पर विश्वास। या इसका अर्थ मसीह के अधिकार पर विश्वास भी हो सकता है, कि जब मैं परमेश्वर से विनती करता हूँ और कहता हूँ, “यीशु के नाम से यह कर,” तो मेरा अर्थ होता है, “मेरे लिये वैसा कर जैसा तू यीशु के लिये करता, क्योंकि उसने मुझे अपना नाम लेने का अधिकार दिया है। मेरे लिये यह वैसे ही कर जैसे तू उसके लिये करता।” जो यीशु के नाम पर विश्वास के साथ प्रार्थना कर सकता है, वह विफल नहीं हो सकता, क्योंकि प्रभु यीशु ने कहा है, “यदि तुम मुझसे मेरे नाम से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे करूँगा।” परन्तु विश्वास होना ही चाहिए, और यदि विश्वास नहीं है तो हम सुने जाने की आशा नहीं कर सकते। क्या तुम यह
समझते हो?
आओ, हम फिर अपने पारिवारिक दृष्टान्तों पर लौटें। मान लो घर का कोई बच्चा अपने पिता की बात का विश्वास नहीं करता और बार-बार कहता रहता है कि उसका मन अपने पिता की सच्चाई के विषय में सन्देहों से भरा रहता है? मान लो, वह अपने भाइयों और बहनों से यह भी कहता है कि अपने पिता पर उसका विश्वास बहुत दुर्बल है? वह इस अभागी बात का उल्लेख करता है और ऐसी बात कहने पर उसे तनिक भी धक्का नहीं लगता, वरन् वह तो यह समझता है कि उस पर तरस खाया जाना चाहिए, मानो यह कोई ऐसी दुर्बलता हो जिससे वह
बच नहीं सकता। किसी न किसी कारण वह यह विश्वास नहीं करता कि उसका पिता सच बोलता है, और वह कहता है कि यद्यपि वह अपने पिता की प्रतिज्ञा पर विश्वास करने का यत्न करता है, तो भी कर नहीं पाता।
मैं समझता हूँ कि जिस पिता पर इतना नीच अविश्वास किया जाए, वह ऐसे पुत्र के निवेदन पूरे करने की बहुत जल्दी में न होगा। वास्तव में बहुत सम्भव है कि अविश्वासी पुत्र की विनतियाँ ऐसी हों कि उन्हें पूरा किया ही न जा सके, चाहे पिता ऐसा करने को तैयार भी हो, क्योंकि वे उसके अपने अविश्वास को तृप्त करने और उसके पिता का अनादर करने के समान होंगी! उदाहरण के लिये, मान लो यह बच्चा अपने मन में यह सन्देह ले बैठे कि उसका पिता उसे उसका प्रतिदिन का भोजन देगा या नहीं? तब वह अपने पिता के पास आकर कह सकता है, “पिताजी, मुझे इतना धन दे दीजिए जो अगले 10 वर्ष तक चले, क्योंकि तब तक मैं बड़ा हो जाऊँगा और अपना प्रबन्ध आप कर सकूँगा। मेरे डर शान्त करने के लिये मुझे अभी नकद धन दे दीजिए, क्योंकि मैं बड़ी चिन्ता में हूँ।” पिता उत्तर देता है, “मेरे पुत्र, मैं ऐसा क्यों करूँ?”
और उसे यह उत्तर मिलता है, “प्रिय पिताजी, मुझे यह कहते हुए बड़ा खेद है, पर मैं आप पर भरोसा नहीं कर सकता। आप पर और आपके प्रेम पर मेरा विश्वास इतना दुर्बल है कि मुझे डर है कि किसी दिन आप मुझे भूखा मरने को छोड़ देंगे। और इसलिए मैं चाहता हूँ कि बैंक में मेरे पास कुछ पक्का रहे।” तुम पिताओं में से कौन ऐसे बच्चे का निवेदन सुनेगा यदि वह ऐसी वस्तु माँगे? तुम्हें दुःख होगा कि तुम्हारा ऐसा अनादर करनेवाले विचार तुम्हारे अपने ही किसी प्रिय के मन में आएँ! और तुम उनके आगे न झुकोगे, और झुक भी नहीं सकते। तो मैं तुमसे कहता हूँ कि इस दृष्टान्त को अपने ऊपर लागू करो। क्या तुमने कभी ऐसे निवेदन नहीं किए जो लगभग इसी प्रकार के थे? तुम परमेश्वर पर यह भरोसा नहीं कर पाए कि वह तुम्हें दिन-प्रतिदिन तुम्हारी प्रतिदिन की रोटी देगा, और इसलिए तुम उस वस्तु के लिये तरसते रहे हो जिसे तुम कहते हो, “भविष्य के लिये कुछ प्रबन्ध।”
तुम विधाता के प्रबन्ध से अधिक भरोसेमन्द कोई पालनहार चाहते हो, परमेश्वर की प्रतिज्ञा से अधिक पक्की कोई जमानत चाहते हो! तुम अपने स्वर्गीय पिता के वचन पर भरोसा नहीं कर पाते। किसी आधी-दिवालिया विदेशी सरकार के कुछ बॉण्डों को तुम कहीं अधिक विश्वसनीय समझते हो। तुम तुर्की के सुलतान पर, या मिस्र के वायसराय पर भरोसा कर सकते हो, परन्तु सारी पृथ्वी का परमेश्वर पर नहीं! हजार रीतियों से हम प्रभु का अपमान करते हैं, जब हम यह कल्पना करते हैं कि “देखी हुई वस्तुएँ” उसकी अनदेखी सर्वशक्ति से अधिक ठोस हैं। हम परमेश्वर से माँगते हैं कि वह हमें तुरन्त वह दे जिसकी हमें अभी आवश्यकता नहीं और शायद कभी पड़े भी नहीं! मूल में, ऐसी अभिलाषाओं का कारण उसके प्रति एक लज्जाजनक अविश्वास में पाया जा सकता है, जो हमसे यह कल्पना करवाता है कि हमारा प्रबन्ध निश्चित करने के लिये बड़े-बड़े भण्डार आवश्यक हैं।
हे भाइयो और बहनो, क्या तुम यहाँ दोषी नहीं हो, और क्या तुम आशा करते हो कि प्रभु तुम्हारी मूर्खता में तुम्हारा साथ और सहायता देगा? क्या परमेश्वर तुम्हारे अविश्वास को बढ़ावा देगा? क्या वह तुम्हें चोरों के चुराने के लिये काई लगे सोने-चाँदी का ढेर और कीड़ों के खाने के लिये वस्त्रों से भरे सन्दूक देगा? क्या तुम चाहोगे कि प्रभु ऐसा व्यवहार करे मानो उसने तुम्हारे सन्देहों को ठीक मान लिया हो और अपना अविश्वासयोग्य होना स्वीकार कर लिया हो? कदापि नहीं! इसलिए जब तुम्हारी प्रार्थना अविश्वासी हृदय से उपजी हो, तो सुने जाने की आशा मत करो— “अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा।” प्रार्थना में निरन्तर सफलता के लिये अगली अनिवार्य बात है बालक-जैसा प्रेम—“कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और जैसा उसने हमें आज्ञा दी है उसी के अनुसार आपस में प्रेम रखें।”
विश्वास के बाद बड़ी आज्ञा प्रेम है। जैसे परमेश्वर के विषय में कहा गया है, “परमेश्वर प्रेम है,” वैसे ही हम कह सकते हैं, “मसीही धर्म प्रेम है।” यदि हम में से हर एक प्रेम का देहधारी रूप होता, तो हम मसीह की पूर्ण समानता तक पहुँच गए होते। हम परमेश्वर के प्रति प्रेम में, मसीह के प्रति प्रेम में, कलीसिया के प्रति प्रेम में, पापियों के प्रति प्रेम में और हर कहीं के मनुष्यों के प्रति प्रेम में बढ़ते जाते! जब किसी मनुष्य में परमेश्वर के प्रति प्रेम नहीं होता, तो वह उस बच्चे की दशा में होता है जिसमें अपने पिता के प्रति प्रेम नहीं। क्या उसका पिता उसके प्रेमहीन, सन्तान-भाव से रहित हृदय की सब अभिलाषाएँ पूरी करने की बिना शर्त प्रतिज्ञा करेगा? या, यदि किसी बच्चे में अपने भाइयों और बहनों के प्रति प्रेम नहीं, तो क्या पिता उसे बिना शर्त की प्रतिज्ञा सौंपकर कहेगा, “माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा?” भला, प्रेमहीन पुत्र तो अपनी स्वार्थी माँगों से सारे परिवार को कंगाल कर देगा! घर के और सब लोगों की परवाह किए बिना, उसे केवल अपनी ही वासनाओं को तृप्त करने की चिन्ता होगी। थोड़े ही समय में उसका निवेदन यह होता—“पिताजी, सारी सम्पत्ति मुझे दे दीजिए।” या, “पिताजी, घर को मेरी सुविधा के अनुसार चलाइए और मेरे सब भाइयों को मेरी इच्छाओं के अधीन कर दीजिए।”
अपने रूप-रंग पर घमण्ड करनेवाला, अबशालोम के समान जिसे अपने बालों पर घमण्ड था, वह शीघ्र ही राज्य अपने लिये ढूँढ़ने लगेगा! थोड़े ही यूसुफ ऐसे हैं जो रंग-बिरंगा अंगरखा पहनकर भी घर के तानाशाह न बन जाएँ। कौन किसी उड़ाऊ पुत्र को सम्पत्ति लेकर भाग जाने देगा? कौन इतना नासमझ होगा कि किसी लालची, प्रभुता जतानेवाले भाई को उसके भाइयों और बहनों से ऊपर आदर के आसन पर बैठा दे? इसलिए तुम देखते हो कि स्वार्थ को प्रार्थना में सामर्थ्य नहीं सौंपी जा सकती। प्रेमहीन आत्माओं को, जो न परमेश्वर से प्रेम रखती हैं न मनुष्यों से, बड़ी, व्यापक, असीम प्रतिज्ञाएँ नहीं सौंपी जा सकतीं। यदि परमेश्वर को हमारी सुननी है, तो हमें परमेश्वर से प्रेम रखना होगा और अपने संगी मनुष्यों से प्रेम रखना होगा, क्योंकि जब हम परमेश्वर से प्रेम रखेंगे, तो हम किसी ऐसी वस्तु के लिये प्रार्थना नहीं करेंगे जिससे परमेश्वर का आदर न हो, और न ही यह चाहेंगे कि हमारे साथ कुछ ऐसा हो जिससे हमारे भाइयों को भी आशीष न मिले। हमारे हृदय परमेश्वर और उसके प्राणियों के प्रति सच्चाई से धड़केंगे, और हम अपने आप में ही लिपटे न रहेंगे। इससे पहले कि परमेश्वर
तुम्हें स्वर्ग की कुंजियाँ सौंप सके, तुम्हें स्वार्थ से छुटकारा पाना होगा। जब अहं मर जाता है, तब वह तुम्हें अपने भण्डार खोलने की सामर्थ्य देगा, और तुम एक राजकुमार के समान परमेश्वर से सामर्थ्य पाकर प्रबल होगे।
इसके बाद, हमारे चाल-चलन भी बालक-जैसे होने चाहिए। अगला पद पढ़ो। “जो परमेश्वर की आज्ञाओं को मानता है, वह उसमें, और परमेश्वर उनमें बना रहता है।” अपने घर से प्रेम रखना बच्चे की एक रीति है। वह अच्छा बच्चा, जिसके निवेदन उसका पिता सदा सुनता है, किसी स्थान से इतना प्रेम नहीं रखता जितना उस प्यारे पुराने घर से जहाँ उसके माता-पिता रहते हैं। अब जो परमेश्वर की आज्ञाओं से प्रेम रखता और उन्हें मानता है, उसके विषय में कहा गया है कि वह उसमें बना रहता है—उसने प्रभु को अपना धाम बना लिया है और परमेश्वर के साथ पवित्र घनिष्ठता में बना रहता है। उसमें हमारे प्रभु के ये वचन पूरे होते हैं, “यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” विश्वास और प्रेम ने, करूबों के दो पंखों के समान, विश्वासी के प्राण को संसार से ऊपर उठाया है और उसे परमेश्वर के सिंहासन के निकट पहुँचा दिया है। वह परमेश्वर के समान बन गया है, और अब उसकी प्रार्थनाएँ ऐसी हैं जिनका उत्तर परमेश्वर दे सकता है—परन्तु जब तक वह इस प्रकार ईश्वरीय मन के अनुरूप नहीं हो जाता, तब तक उसकी विनतियों की सामर्थ्य की कोई न कोई सीमा अवश्य रहेगी। परमेश्वर के साथ सामर्थ्य के लिये परमेश्वर में बने रहना आवश्यक है।
मान लो तुम में से किसी का एक लड़का हो, जो कहे, “पिताजी, मुझे अपना घर अच्छा नहीं लगता, मुझे आपकी कोई परवाह नहीं, और मैं परिवार के नियमों के बन्धन नहीं सहूँगा। मैं परायों के साथ रहने जा रहा हूँ, पर ध्यान रखिए, पिताजी, मैं हर सप्ताह आपके पास आऊँगा और आपसे बहुत सी वस्तुएँ माँगूँगा। और मैं आशा रखूँगा कि जो कुछ मैं आपसे माँगूँ वह आप मुझे देंगे”? भला, यदि तुम घर के मुखिया होने के कुछ भी योग्य हो, तो तुम कहोगे, “मेरे पुत्र, तू मुझसे ऐसी रीति से कैसे बात कर सकता है? यदि तू इतना स्वेच्छाचारी है कि मेरा घर छोड़ रहा है, तो क्या तू आशा कर सकता है कि मैं तेरा कहा करूँगा? यदि तू मेरी पूरी तरह उपेक्षा करता है, तो क्या तू आशा कर सकता है कि मैं तेरी क्रूर निष्ठुरता और दुष्ट अवज्ञा में तेरा साथ दूँ? नहीं, मेरे पुत्र, यदि तू मेरे साथ नहीं रहेगा और मुझे पिता नहीं मानेगा, तो मैं तुझसे किसी बात की प्रतिज्ञा नहीं कर सकता।”
और परमेश्वर के साथ भी ऐसा ही है। यदि हम उसके साथ बने रहें और उससे संगति रखें, तो वह हमें सब कुछ देगा। यदि हम उससे वैसा प्रेम रखें जैसा प्रेम उससे रखा जाना चाहिए, और उस पर वैसा भरोसा रखें जैसा उस पर रखा जाना चाहिए, तो वह हमारे निवेदन सुनेगा। परन्तु यदि नहीं, तो इसकी आशा करना उचित नहीं। वास्तव में, यदि वह अपवित्र अभिलाषाओं को पूरा करे और बुरी सनकों को तृप्त करे, तो यह ईश्वरीय चरित्र पर एक कलंक होगा। “यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा,” परन्तु यदि तुम्हें परमेश्वर में कोई सुख नहीं और वह तुम्हारा धाम नहीं है, तो वह तुम्हें उत्तर नहीं देगा। वह तुम्हें विपत्ति की रोटी और दुःख का जल दे सकता है और तुम्हारा जीवन कड़वा कर सकता है, परन्तु वह निश्चय ही तुम्हें वह नहीं देगा जिसकी तुम्हारा हृदय अभिलाषा करता है।
एक बात और—पाठ से प्रकट होता है कि हममें बालक-जैसी आत्मा होनी चाहिए, क्योंकि, “इसी से, अर्थात् उस पवित्र आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है।” यह लेपालकपन की आत्मा को छोड़ और क्या है—वह आत्मा जो परमेश्वर की सब सन्तानों में राज्य करता है? जो हठीले लोग परमेश्वर से भिन्न सोचते, अनुभव करते और काम करते हैं, वे यह आशा न रखें कि परमेश्वर उनके सोचने, अनुभव करने और काम करने के ढंग पर आ जाएगा! जो स्वार्थी घमण्ड की आत्मा से प्रेरित होते हैं, और जो आलसी आराम के प्रेम से प्रेरित होते हैं, वे यह आशा न रखें कि परमेश्वर उनकी मनमानी पूरी करेगा! पवित्र आत्मा, यदि वह हम में राज्य करता है, तो हमारे स्वभाव को अपने शासन के अधीन कर देगा, और तब जो प्रार्थनाएँ हमारे नये किए गए हृदयों से उपजेंगी वे परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होंगी—और ऐसी प्रार्थनाएँ स्वाभाविक रूप से सुनी जाएँगी।
कोई भी माता-पिता किसी हठीले बच्चे की सुनने की बात न सोचेगा, ऐसे बच्चे की जो कहे, “मैं जानता हूँ कि मेरे पिता नहीं चाहते कि यह मुझे मिले, पर मैं इसे लेकर ही रहूँगा।” भला, एक पुरुष होकर तुम किसी उद्दण्ड छोकरे के हाथों इस प्रकार नचाए न जाओगे! क्या परमेश्वर हमें वह देगा जो हम माँगते हैं, जब वह उसके पवित्र मन के विरुद्ध हो? ऐसा नहीं होना चाहिए! ऐसी सम्भावना सोची भी नहीं जा सकती! हम में भी वैसा ही स्वभाव होना चाहिए जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था, और तब हम कह सकेंगे, “मैं जानता हूँ, कि तू सदा मेरी सुनता है।” परन्तु हमें आगे बढ़ना होगा और कुछ मिनटों के लिये इसी विषय की एक और शाखा पर तुम्हारा ध्यान लगाना होगा।
II. दूसरे स्थान पर हम इन अनिवार्य बातों की प्रबलता पर ध्यान देंगे। यदि ये बातें हम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएँ, तो हमारी प्रार्थनाएँ निकम्मी या निष्फल नहीं हो सकतीं। पहला, यदि हमें परमेश्वर पर विश्वास है, तो परमेश्वर के हमारी प्रार्थना सुनने में कोई प्रश्न ही नहीं। यदि हम विश्वास से यीशु के नाम और लहू की दुहाई दे सकें, तो हमें शान्ति के उत्तर अवश्य मिलेंगे। परन्तु हजारों तर्क उठाए जाते हैं। मान लो ये प्रार्थनाएँ प्रकृति के नियमों से सम्बन्ध रखती हों? तब वैज्ञानिक लोग हमारे विरुद्ध हैं। तो क्या हुआ? मैं इन वैज्ञानिकों को पूरी छूट देने में गर्व करूँगा—मैं तो लगभग कहने ही वाला था, पूरी छूट।
मैं ऐसी किसी प्रार्थना को नहीं जानता जो करने योग्य हो और किसी न किसी प्राकृतिक नियम से न टकराती हो, तो भी मैं प्रार्थनाओं के सुने जाने पर विश्वास करता हूँ! कहा जाता है कि परमेश्वर हमारे लिये प्रकृति के नियमों को नहीं बदलेगा, और मैं उत्तर देता हूँ, “किसने कहा कि वह बदलेगा?” प्रभु के पास चमत्कार किए बिना या नियमों को रोके बिना हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देने के मार्ग हैं। पहले वह चमत्कार के द्वारा प्रार्थना सुना करता था, परन्तु जैसा मैंने तुमसे प्रायः कहा है, वह अपना उद्देश्य पूरा करने की एक अधिक भोंडी रीति जान पड़ती है—यह ऐसा है जैसे किसी छोटे से परिणाम के लिये एक विशाल मशीन को रोक देना—वह जानता है कि न जाने किन गुप्त साधनों से अपने उद्देश्य कैसे पूरे करे और हमारी प्रार्थनाएँ कैसे सुने।
सम्भव है कि और भी शक्तियाँ और नियम हों जिन्हें उसने ठीक उन्हीं समयों पर काम में लाने का प्रबन्ध कर रखा है जब प्रार्थना भी काम करती है। ऐसे नियम जो उतने ही स्थिर हैं और ऐसी शक्तियाँ जो उतनी ही प्राकृतिक हैं जितनी वे जिन्हें हमारे विद्वान सिद्धान्तकार खोज पाए हैं। सबसे बुद्धिमान मनुष्य भी उन सब नियमों को नहीं जानते जो विश्व पर शासन करते हैं, नहीं, उनका दसवाँ भाग भी नहीं! हम विश्वास करते हैं कि मसीहियों की प्रार्थनाएँ विधाता के प्रबन्ध की मशीनरी का एक भाग हैं, नियति के बड़े पहिये के दाँते हैं—और जब परमेश्वर अपनी सन्तानों को प्रार्थना करने की ओर ले चलता है, तो वह पहले से ही एक ऐसा पहिया चला चुका होता है जो वह परिणाम उत्पन्न करेगा जिसके लिये प्रार्थना की गई है, और की गई प्रार्थनाएँ उस पहिये के एक भाग के रूप में घूम रही होती हैं। यदि परमेश्वर पर विश्वास भर हो, तो परमेश्वर को या तो अस्तित्व में रहना छोड़ना होगा, या सच्चा रहना छोड़ना होगा, नहीं तो उसे प्रार्थना सुननी ही होगी!
पाठ से पहलेवाला पद कहता है, “यदि हमारा मन हमें दोष न दे, तो हमें परमेश्वर के सामने साहस होता है; जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है।” जिसका विवेक शुद्ध है, वह साहस के साथ परमेश्वर के पास आता है, और विश्वास का वह साहस उसकी प्रार्थना का उत्तर उसके लिये निश्चित कर देता है। बालक-जैसा साहस हमसे ऐसी प्रार्थना करवाता है जैसी और कोई नहीं कर सकता। यह मनुष्य से उन बड़ी बातों के लिये प्रार्थना करवाता है जिन्हें वह कभी न माँगता यदि उसने यह साहस न सीखा होता। यह उससे उन छोटी बातों के लिये प्रार्थना करवाता है जिन्हें माँगने से बहुत से लोग डरते हैं, क्योंकि उन्होंने अभी तक परमेश्वर के प्रति बच्चों का सा साहस अनुभव नहीं किया। मैंने प्रायः कहा है कि किसी बड़ी बात की अपेक्षा किसी छोटी बात के विषय में परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिये उस पर अधिक भरोसे की आवश्यकता होती है। हम समझते हैं कि हमारी बड़ी बातें कुछ-कुछ परमेश्वर के ध्यान के योग्य हैं, यद्यपि वास्तव में वे उसके लिये बहुत छोटी हैं! और फिर हम कल्पना करते हैं कि हमारी छोटी बातें इतनी तुच्छ होंगी कि उन्हें उसके सामने लाना लगभग उसका अपमान होगा, जबकि हमें जानना चाहिए कि जो बात बच्चे के लिये बहुत बड़ी है वह उसके माता-पिता के लिये बहुत छोटी हो सकती है—और फिर भी माता-पिता उस बात को अपनी दृष्टि से नहीं, वरन् बच्चे की दृष्टि से मापते हैं।
उस दिन तुमने अपने छोटे बेटे को फूट-फूटकर रोते सुना। उसकी माँ ने उसे बुलाकर पूछा कि उसे क्या हुआ? उसकी उँगली में एक फाँस चुभ गई थी। अच्छा, यह तो छोटी सी बात थी। तुम उसे निकालने के लिये तीन शल्य-चिकित्सकों को नहीं बुलाना चाहते थे, न ही समाचार-पत्रों में हो-हल्ला मचाना चाहते थे! सुई लाओ, हम अभी ठीक कर देते हैं। पर हाय, उस नन्हे प्यारे पीड़ित के लिये वह कितनी बड़ी बात थी, जब वह पीड़ा के आँसुओं से भीगी आँखें लिये वहाँ खड़ा था। उसके लिये वह बड़ी चिन्ता की बात थी! अब, क्या उस लड़के को यह सूझा कि उसकी पीड़ा इतनी छोटी बात है कि उसकी माँ उस पर ध्यान न दे? कदापि नहीं! माता और पिता बने ही किसलिए हैं, यदि छोटे बच्चों की छोटी-छोटी आवश्यकताओं की देखभाल के लिये नहीं? और परमेश्वर, हमारा पिता, एक भला पिता है। जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही वह हम पर दया करता है और झुककर हम तक आता है। वह तारों को गिनता, और उनमें से एक-एक का नाम रखता है, तो भी वह खेदित मनवालों को चंगा करता है, और उनके घाव पर मरहम-पट्टी बाँधता है। वही परमेश्वर जो सूर्य को प्रज्वलित करता है, उसने कहा है, “मैं टिमटिमाती बत्ती को न बुझाऊँगा।” यदि तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा भर हो, तो तुम अपनी बड़ी बातें और अपनी छोटी बातें उसके पास ले जाओगे, और वह तुम्हारे भरोसे को कभी झूठा न ठहराएगा—क्योंकि उसने कहा है कि जो उस पर भरोसा रखते हैं वे युग-युग वरन् अनन्तकाल तक न तो कभी लज्जित और न कभी व्याकुल होंगे। विश्वास अवश्य सफल होगा!
परन्तु इसके बाद, प्रेम भी अवश्य सफल होगा, क्योंकि हम देख चुके हैं कि जो मनुष्य मसीही अर्थ में प्रेम करता है, वह परमेश्वर के साथ एक मन होता है। यदि तुम अपने प्रेम को अपने परिवार तक ही सीमित रखते हो, तो तुम्हें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर भी ऐसा करेगा, और उस घेरे में सिकुड़ी हुई प्रार्थनाओं की वह अनदेखी करेगा। यदि कोई मनुष्य अपने छोटे से आप से प्रेम करता है और यह आशा करता है कि हर किसी की गेहूँ की फसल बिगड़ जाए, ताकि उसकी अपनी उपज का ऊँचा दाम मिले, तो वह निश्चय ही यह आशा नहीं कर सकता कि प्रभु ऐसे ओछे स्वार्थ से सहमत होगा! यदि किसी मनुष्य का हृदय इतना बड़ा है कि वह परमेश्वर के सब प्राणियों को अपने स्नेह में समेट ले, जबकि वह विश्वासी भाइयों के लिये विशेष रूप से प्रार्थना करता है, तो उसकी प्रार्थनाएँ ईश्वरीय मन के अनुसार होंगी। उसका प्रेम और परमेश्वर की भलाई साथ-साथ बहते हैं। यद्यपि परमेश्वर का प्रेम एक विशाल उमड़ती नदी के समान है और उसका प्रेम एक पतले से नाले के समान, तो भी दोनों एक ही दिशा में बहते हैं और दोनों एक ही अन्त तक पहुँचेंगे। परमेश्वर प्रेम करनेवाले मनुष्य की प्रार्थनाएँ सदा सुनता है, क्योंकि वे प्रार्थनाएँ उसकी अपनी आज्ञप्तियों की छायाएँ हैं।
फिर, आज्ञाकारी मनुष्य वही है जिसकी परमेश्वर सुनेगा, क्योंकि उसका आज्ञाकारी हृदय उसे नम्रता और अधीनता के साथ प्रार्थना करने की ओर ले जाता है, क्योंकि वह अनुभव करता है कि उसकी सबसे ऊँची अभिलाषा यही है कि प्रभु की इच्छा पूरी हो। इसी कारण आज्ञाकारी हृदयवाला मनुष्य एक भविष्यद्वक्ता के समान प्रार्थना करता है—उसकी प्रार्थनाएँ भविष्यद्वाणियाँ हैं। क्या वह परमेश्वर के साथ एक नहीं है? क्या वह ठीक वही नहीं चाहता और माँगता जो परमेश्वर का अभिप्राय है? ऐसे धनुष से छोड़ी गई प्रार्थना अपने निशाने तक पहुँचने से कैसे चूक सकती है? यदि तुम्हारा प्राण परमेश्वर के प्राण के साथ एक-स्वर हो जाए, तो तुम परमेश्वर की अपनी ही इच्छाएँ चाहोगे! कठिनाई यह है कि हम, जैसा कहा जाता है, परमेश्वर के साथ तालमेल में नहीं बने रहते। परन्तु यदि हम बने रहते, तो हम वही सुर छेड़ते जो परमेश्वर छेड़ता है, और यद्यपि उसका सुर गर्जन के समान और हमारा फुसफुसाहट के समान सुनाई देता, तो भी पूर्ण एक-स्वरता होती—पृथ्वी पर प्रार्थना से छेड़ा गया सुर उस सुर से मेल खाता जो स्वर्ग में आज्ञप्तियों से गूँजता है।
फिर, जो मनुष्य परमेश्वर के साथ संगति में जीता है, वह प्रार्थना में निश्चय ही प्रबल होगा, क्योंकि यदि वह परमेश्वर में बना रहता है और परमेश्वर उसमें, तो वह वही चाहेगा जो परमेश्वर चाहता है। प्रभु के साथ संगति में रहनेवाला विश्वासी मनुष्य की भलाई चाहता है, और परमेश्वर भी यही चाहता है। वह मसीह की महिमा चाहता है, और परमेश्वर भी। वह कलीसिया की उन्नति चाहता है, और परमेश्वर भी। वह चाहता है कि वह स्वयं पवित्रता का एक नमूना बने, और परमेश्वर भी यही चाहता है। यदि उस मनुष्य में कभी कोई ऐसी अभिलाषा हो जो
परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है, तो यह अज्ञानता का परिणाम है, क्योंकि मनुष्य तो मनुष्य ही है, परमेश्वर नहीं। अपनी सबसे अच्छी दशा में भी वह भूल अवश्य करेगा, परन्तु इस कमी का प्रबन्ध वह अपनी प्रार्थना के रूप के द्वारा कर लेता है, जिसके अन्त में सदा यह परिशिष्ट जुड़ा रहता है—“हे प्रभु, यदि मैंने अपनी इस प्रार्थना में कोई ऐसी वस्तु माँगी है जो तेरे मन के अनुसार नहीं, तो मैं तुझसे विनती करता हूँ, मेरी न सुन। और यदि कोई भी इच्छा जो मैंने तेरे सामने प्रकट की है—चाहे वह ऐसी अभिलाषा हो जो मेरे हृदय में और सब इच्छाओं से बढ़कर धधकती है—तेरी दृष्टि में उचित नहीं, तो हे मेरे पिता, मेरी न सुन, वरन् अपने असीम प्रेम और करुणा से अपने दास के लिये उससे कुछ अच्छा कर, जो तेरा दास माँगना जानता है।”
अब, जब प्रार्थना इस ढंग की हो, तो वह विफल कैसे हो सकती है? प्रभु स्वर्ग के झरोखों से बाहर झाँकता है और ऐसी प्रार्थना को अपनी ओर आते देखता है, जैसे नूह ने कबूतरी को जहाज की ओर लौटते देखा था, और वह उस प्रार्थना की ओर अपना हाथ बढ़ाता है। और जैसे नूह ने हाथ बढ़ाकर उसे अपने पास जहाज में ले लिया, वैसे ही परमेश्वर उस प्रार्थना को अपने पास खींच लेता है और उसे अपनी छाती से लगा लेता है, और कहता है, “तू मेरी ही छाती से निकली थी, और मैं तेरा अपने पास फिर से स्वागत करता हूँ—मेरे आत्मा ने तुझे रचा था, इसलिए मैं तुझे उत्तर दूँगा।” और यहाँ, फिर से, हम कहें कि हमारा पाठ मसीही मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा से भरा हुआ बताता है—“उस पवित्र आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है।” मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा? वैसे ही, परमेश्वर की बातें कौन जानता है, केवल परमेश्वर का आत्मा? और यदि परमेश्वर का आत्मा हम में वास करता है, तो वह हमें बताता है कि परमेश्वर का मन क्या है। वह पवित्र लोगों में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है!
कभी-कभी यह समझा जाता है कि जो मनुष्य प्रार्थना में प्रबल हैं, वे जो चाहें उसके लिये प्रार्थना कर सकते हैं, परन्तु मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि उनमें से कोई भी तुम्हें बताएगा कि ऐसा नहीं है। तुम ऐसे किसी मनुष्य के पास जाकर उससे अपने लिये प्रार्थना करने को कह सकते हो, परन्तु वह प्रतिज्ञा नहीं कर सकता कि वह करेगा। ऐसे मनुष्यों पर विचित्र रोक आ पड़ती है, जब वे अनुभव करते हैं—वे नहीं जानते कैसे या क्यों—कि कुछ विशेष मामलों में वे प्रभावशाली, उत्कट प्रार्थनाएँ नहीं कर सकते, यद्यपि वे ऐसा करना चाहें। पौलुस के समान, जब उसने बितूनिया में जाना चाहा और आत्मा ने उसे जाने न दिया, वैसे ही कुछ निवेदन ऐसे होते हैं जिन्हें हम स्वभाव से करना चाहेंगे, परन्तु आत्मा में हम बँधे होते हैं। हो सकता है प्रार्थना में प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी आपत्तिजनक न हो, परन्तु यहोवा के भेद को वही जानते हैं जो उससे डरते हैं, और वह गुप्त संकेत देता है कि उसके चुने हुए कब और कहाँ प्रबल होने की आशा रख सकते हैं। वह तुम्हें यह प्रतिज्ञा देता है कि वह तुम्हारी विश्वास-भरी प्रार्थना सुनेगा, क्योंकि तुम ऐसे मनुष्य हो जो उसके साथ चलता है और उसके आत्मा से भरा है। परन्तु वह उसी समय तुम्हें हर उस बात के विषय में विश्वास नहीं देता जो कोई भी तुम्हारे सामने रखना चाहे—इसके विपरीत वह तुम्हें विवेक, परख और बुद्धि देता है—और आत्मा पवित्र लोगों में
परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है।
इस प्रकार मैं समझता हूँ कि मैंने सिद्धान्त को काफी स्पष्ट रूप से रख दिया है। अब कुछ मिनट व्यावहारिक उपयोग के लिये, जैसा पुराने प्यूरिटन कहा करते थे। मेरी बस यही इच्छा है कि यह हम में से बहुतों के लिये सचमुच उपयोगी हो। पहली बात यह है कि हम एक कलीसिया के रूप में एक बड़ी आशीष के लिये प्रार्थना करना चाहते हैं। मैं समझता हूँ कि यदि मैं कहूँ कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहते हैं कि वह सारी कलीसिया पर आशीष भेजे, तो तुम सब मेरे पक्ष में मत दोगे। बहुत अच्छा। क्या हमारे पास सफलता के लिये अनिवार्य बातें हैं? क्या हम यीशु मसीह के नाम पर विश्वास कर रहे हैं? अच्छा, मैं समझता हूँ कि कर रहे हैं। मैं नहीं समझता कि हमारे विश्वास की खराई में कोई दोष निकाला जा सकता है, यद्यपि उसकी दुर्बलता के विषय में बहुत कुछ मान लेना पड़ेगा।
आओ, अगले प्रश्न पर चलें। क्या हम परमेश्वर के प्रति और एक दूसरे के प्रति प्रेम से भरे हैं? दोहरी आज्ञा यह है कि हम यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और आपस में प्रेम रखें। क्या हम आपस में प्रेम रखते हैं? क्या हम प्रेम में चल रहे हैं? हम में से कोई भी इसमें सिद्ध नहीं है। मैं यह मानकर अंगीकार आरम्भ करूँगा कि इस विषय में मैं वैसा नहीं हूँ जैसा मुझे होना चाहिए। क्या तुम इस अंगीकार को सब में घूमने दोगे, और हर एक सोचे कि हमने कितनी बार प्रेमहीन काम किए हैं, प्रेमहीन बातें सोची हैं, प्रेमहीन बातें कही हैं, प्रेमहीन चुगली सुनी है, जब हमें सहायता करनी चाहिए थी तब प्रेमहीनता से अपना हाथ रोक लिया है, और गिरते हुए मनुष्य को नीचे धकेलने के लिये प्रेमहीनता से अपना हाथ बढ़ाया है? यदि परमेश्वर की कलीसिया में प्रेम की घटी है, तो हम आशा नहीं कर सकते कि प्रार्थना सुनी जाएगी, क्योंकि परमेश्वर कहेगा, “तुम उन्नति माँगते हो। किसलिए? ऐसी मण्डली में और लोग जोड़ने के लिये जो अभी आपस में भी प्रेम नहीं रखती? तुम मन-फिराव माँगते हो। क्या? औरों को एक प्रेमहीन मण्डली में सम्मिलित होने के लिये लाने को?”
क्या तुम आशा करते हो कि परमेश्वर उन पापियों का उद्धार करे जिनसे तुम प्रेम नहीं रखते, और उन प्राणों का मन फिराए जिनकी तुम्हें रत्ती भर भी परवाह नहीं? हमें प्रेम के द्वारा प्राणों को मसीह में लाना होगा, क्योंकि परमेश्वर के पवित्र आत्मा के अधीन, संसार को जीतने का बड़ा साधन प्रेम है! यदि मसीही मुसलमानों और यहूदियों से अधिक प्रेम करेंगे, तो वे मुसलमानों और यहूदियों पर जय पाएँगे! और यदि वे कम प्रेम दिखाएँगे, तो मुसलमान और यहूदी उन पर जय पाएँगे! आत्मा की तलवार जो परमेश्वर का वचन है, सबसे बड़ा हथियार है। परन्तु उसके बाद अपने संगी मनुष्यों के प्रति मसीहियों का प्रेम-भरा आचरण और उदार चाल-चलन आता है। उसमें से हमारे पास कितना है? क्या मैं कहूँ, कितना कम?
आगे, क्या हम वह कर रहे हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में भाता है? यदि नहीं, तो हम प्रार्थना के उत्तरों की आशा नहीं कर सकते। यह प्रश्न तुम सब अपने आप से पूछो। विशेषकर कलीसिया का हर एक सदस्य इस प्रश्न का उत्तर दे। क्या तुम हाल में वह करते रहे हो जिसे तुम चाहोगे कि यीशु मसीह देखे? क्या तुम्हारा घराना ऐसी रीति से चलता है कि वह परमेश्वर को भाए? मान लो यीशु
मसीह इस सप्ताह बिना बुलाए और अचानक तुम्हारे घर आया होता—जो कुछ वह वहाँ देखता, उसके विषय में वह क्या सोचता? “अरे,” कोई कहता है, “मैं जानता हूँ कि अमुक व्यक्ति बहुत असंगत आचरण करता है।” महाशय, मैं तुमसे विनती करता हूँ, अपने विषय में सोचो। बात यही है। अपने आप को सुधारो। जब तक परमेश्वर की कलीसिया के सदस्य वह नहीं करते जो उसकी दृष्टि में भाता है, वे उन्नति का द्वार बन्द कर देते हैं—वे कलीसिया की प्रार्थनाओं को सफल होने से रोकते हैं। कौन वह मनुष्य बनना चाहता है जो अपने असंगत आचरण के द्वारा परमेश्वर की कलीसिया की उन्नति के मार्ग में खड़ा हो? कौन इतना दोषी होगा? परमेश्वर तुम में से कुछ को क्षमा करे। हम कुछ लोगों के विषय में रो-रोकर भी बोल सकते हैं, क्योंकि हाय, यद्यपि वे मसीह के अनुयायी होने का दावा करते हैं, वे इतने असंगत हैं कि वे मित्र नहीं, वरन् मसीह के क्रूस के बैरी हैं।
अगला प्रश्न है, क्या हम परमेश्वर में बने रहते हैं? पाठ कहता है कि यदि हम उसकी आज्ञाओं को मानें तो परमेश्वर हम में और हम उसमें बने रहते हैं। क्या ऐसा है? मेरा अर्थ है, क्या दिन भर हम परमेश्वर के विषय में सोचते हैं? अपने कारोबार में क्या हम फिर भी परमेश्वर के साथ रहते हैं? मसीही को यह नहीं करना चाहिए कि भोर को और फिर रात को दौड़कर परमेश्वर के पास जाए, और उसे एक आश्रय और काम-चलाऊ सहारे के रूप में बरते, जैसे लोग किसी मेहराब या ड्योढ़ी को बरतते हैं जिसके नीचे वे वर्षा की बौछार में दौड़कर जा छिपते हैं। हमें उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक परमेश्वर में बने रहना और उसमें जीना है, उसे अपना प्रतिदिन का ध्यान बनाते हुए, और मानो उसकी दृष्टि में चलते हुए, सदा यह अनुभव करते हुए, “हे परमेश्वर, तू मुझे देखता है।” प्रिय मित्रो, तुम्हारी दशा कैसी है? हाय, यह प्रश्न एक आसन से दूसरे आसन तक, एक हृदय से दूसरे हृदय तक, और एक मन से दूसरे मन तक जाए—हर एक अपने लिये उत्तर दे।
अन्त में, क्या परमेश्वर का आत्मा हमें प्रेरित करता है, या कोई और आत्मा? क्या हम परमेश्वर की बाट जोहते हैं और कहते हैं, “हे प्रभु, तेरा आत्मा मुझे बताए कि इस मामले में मैं क्या कहूँ, और क्या करूँ। मेरी समझ पर शासन कर, मेरी वासनाओं को वश में कर, मेरी नीच प्रवृत्तियों को दबा रख और तेरा आत्मा मेरी अगुवाई करे। हे प्रभु, तू मेरे लिये मुझसे भी अच्छा बन। मेरे लिये प्राण और जीवन बन, और मेरी आत्मा, प्राण और देह के त्रिविध राज्य में, हे भले प्रभु, तू सर्वोच्च स्वामी बन, कि मेरे स्वभाव के हर प्रान्त में तेरी व्यवस्था स्थापित हो और तेरी इच्छा मानी जाए”? यदि हम सब इसी मन के होते, तो हम एक सामर्थी कलीसिया होते। परन्तु मिली-जुली भीड़ हमारे साथ है, वह मिली-जुली भीड़ जो मिस्र से निकल आई थी, और ये लालसा करने लगते हैं। उत्पात सदा उन्हीं से आरम्भ होता है। परमेश्वर हमें, एक कलीसिया के रूप में, अपनी उपस्थिति खोने से बचाए।
मिली-जुली भीड़ हमें परखने के लिये हमारे साथ रहेगी ही, क्योंकि प्रभु ने कहा है, “कटनी तक दोनों को एक साथ बढ़ने दो,” और यदि हम जंगली दाने उखाड़ने का यत्न करें तो गेहूँ को भी उखाड़ डालेंगे—तो भी, कुछ भी हो, आओ हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह गेहूँ को अधिक बलवन्त बनाए। कलीसिया में दो में से एक बात सदा होती है। या तो गेहूँ खरपतवार को दबा देता है, या खरपतवार गेहूँ को दबा देता है। परमेश्वर करे कि हमारे विषय में गेहूँ खरपतवार से ऊपर उठ जाए। परमेश्वर अपने दासों को अनुग्रह दे कि वे अपने चारों ओर की बुराई पर जय पाने के लिये पर्याप्त बलवन्त हों, और सब कुछ पूरा करके स्थिर रहें, कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसने हमें उस प्रिय में ग्रहणयोग्य भी ठहराया है। प्रभु तुम्हें आशीष दे, और सदा तुम्हारे साथ रहे। आमीन और आमीन।
उपदेश से पहले पढ़ा गया पवित्रशास्त्र का भाग—1 यूहन्ना 3; यशायाह 1:10-20।
अध्याय 6 पूरा हुआ
प्रार्थना में सामर्थ्य की शर्तें