अध्याय 5 · 42 मिनट का पठन
माँगो तो पाओगे
“तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं; तुम हत्या और डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकते; तुम झगड़ते और लड़ते हो; तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो।” याकूब 4:2-3।
पवित्र आत्मा की शिक्षा के द्वारा ये मार्मिक वचन हमारे लिये लाभदायक ठहरें। मनुष्य आवश्यकताओं से भरा हुआ और सदा बेचैन रहनेवाला प्राणी है, और इसलिए उसका हृदय इच्छाओं से भरा रहता है। मैं कठिनाई से ही किसी ऐसे मनुष्य की कल्पना कर सकता हूँ जिसकी किसी न किसी प्रकार की बहुत सी इच्छाएँ न हों। मनुष्य की तुलना समुद्री एनीमोन से की जा सकती है, जिसके अनगिनत स्पर्शक सदा पानी में भोजन टटोलते रहते हैं; या उन पौधों से जो चढ़ने का सहारा ढूँढ़ते हुए अपनी बेलें फैलाते रहते हैं। कवि कहता है, “मनुष्य कभी धन्य होता नहीं, परन्तु सदा धन्य होने की आस ही लगाए रहता है।” वह उसी ओर पतवार घुमाता है जिसे वह अपना बन्दरगाह समझता है, परन्तु अभी तक वह लहरों पर उछाला जा रहा है। वह आशा करता है कि किसी न किसी दिन उसे अपने मन का आनन्द मिल जाएगा, और वह कम या अधिक आशा के साथ कामना करता ही रहता है।
यह बात सबसे बुरे मनुष्यों पर भी लागू होती है और सबसे भले मनुष्यों पर भी। बुरे मनुष्यों में इच्छाएँ बिगड़कर वासनाएँ बन जाती हैं—वे उस वस्तु के पीछे लालायित रहते हैं जो स्वार्थी, विषय-भोगी और इसलिए बुरी है। उनकी इच्छाओं की धारा बड़े वेग से गलत दिशा में बहती है। ये वासनाएँ बहुत बार अत्यन्त तीव्र हो जाती हैं—वे मनुष्य को अपना दास बना लेती हैं। वे उसकी विवेक-बुद्धि पर प्रभुता करती हैं; वे उसे हिंसा के लिये उभारती हैं—वह झगड़ता और लड़ता है—सम्भवतः वह सचमुच हत्या भी कर डालता है। परमेश्वर की दृष्टि में, जो क्रोध को हत्या गिनता है, वह बहुधा हत्या करता ही है। उसकी इच्छाओं का बल ऐसा है कि उन्हें साधारणतः मनोवेग कहा जाता है। और जब ये मनोवेग पूरी तरह भड़क उठते हैं, तब वह मनुष्य स्वयं बड़े जोर से छटपटाता है, यहाँ तक कि शैतान के राज्य में बलपूर्वक प्रवेश होता है, और बलवान उसे छीन लेते हैं!
इसी बीच, अनुग्रह पाए हुए मनुष्यों में भी इच्छाएँ होती हैं। पवित्र लोगों से उनकी इच्छाएँ छीन लेना उन्हें बड़ी हानि पहुँचाना होगा, क्योंकि इन्हीं के द्वारा वे अपने निचले स्वभाव से ऊपर उठते हैं। अनुग्रह पाए हुओं की इच्छाएँ सबसे उत्तम वस्तुओं की ओर होती हैं—ऐसी बातों की ओर जो पवित्र और मेल-मिलापवाली, प्रशंसनीय और ऊपर उठानेवाली हैं। वे परमेश्वर की महिमा चाहते हैं, और इसलिए उनकी इच्छाएँ उन उद्देश्यों से कहीं ऊँचे उद्देश्यों से उपजती हैं जो नये न किए गए मन को भड़काते हैं। मसीही लोगों में ऐसी इच्छाएँ बहुधा बड़ी उत्कट और प्रबल होती हैं। उन्हें सदा ऐसी ही होना चाहिए। परमेश्वर के आत्मा से उत्पन्न वे इच्छाएँ नये किए गए स्वभाव को झकझोरती हैं, उसे उकसाती और उत्तेजित करती हैं, और मनुष्य को कराहने और वेदना तथा प्रसव-पीड़ा में व्याकुल रहने पर विवश करती हैं, जब तक वह उस वस्तु को प्राप्त न कर ले जिसकी लालसा करना परमेश्वर ने उसे सिखाया है। दुष्टों की लालसा और धर्मियों की पवित्र कामना, दोनों के तृप्ति ढूँढ़ने के अपने-अपने मार्ग हैं। दुष्टों की लालसा झगड़े में प्रकट होती है—वह हत्या करती है और पाने की लालसा रखती है; वह झगड़ती और लड़ती है। परन्तु दूसरी ओर, धर्मी की इच्छा, जब उसे ठीक मार्ग दिखाया जाता है, अपना उद्देश्य पूरा करने के लिये कहीं अधिक उत्साह भरा मार्ग अपनाती है, क्योंकि वह उत्कट और आग्रहपूर्ण प्रार्थना में प्रकट होती है। भक्त मनुष्य, जब इच्छा से भरा होता है, तब परमेश्वर के हाथ से माँगता और पाता है।
इस समय मैं, परमेश्वर की सहायता से, अपने पाठ में से यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा: पहला, लालसा की कंगाली—“तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं।” दूसरा, मैं दुःख के साथ यह दिखाऊँगा कि बहुत से मसीही कहलानेवाले लोग आत्मिक बातों में, विशेषकर कलीसिया के रूप में, कैसे कंगाल हैं—वे भी लालसा तो रखते हैं, परन्तु उन्हें मिलता नहीं। तीसरा, अन्त में हम उस धन के विषय में बात करेंगे जिससे पवित्र इच्छाओं को प्रतिफल मिलेगा, यदि हम केवल सही साधन काम में लाएँ। यदि हम माँगें तो हम पाएँगे।
पहले, लालसा की कंगाली पर विचार करो—“तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं।” शारीरिक वासनाएँ, चाहे वे कितनी भी प्रबल क्यों न हों, बहुत बार उस वस्तु को प्राप्त नहीं कर पातीं जिसके पीछे वे लगी रहती हैं। जैसा पाठ कहता है, “तुम डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकते।” मनुष्य सुखी होने के लिये तरसता है, परन्तु वह सुखी नहीं है। वह बड़ा बनने की लालसा करता है, परन्तु दिन-प्रतिदिन और भी तुच्छ होता जाता है। वह इस और उस वस्तु की आकांक्षा करता है जिसके विषय में वह सोचता है कि वह उसे सन्तुष्ट कर देगी, परन्तु वह अब भी असन्तुष्ट है। वह उस लहराते हुए समुद्र के समान है जो स्थिर नहीं रह सकता। किसी न किसी रीति से उसका जीवन निराशा ही है। वह मानो आग ही में परिश्रम करता है, परन्तु परिणाम व्यर्थता और मानो वायु को पकड़ना है। यह और कैसे हो सकता है? यदि हम वायु बोएँ, तो क्या हम बवण्डर ही न लवेंगे, और कुछ नहीं?
या यदि, सम्भवतः, किसी क्रियाशील, प्रतिभाशाली और धुन के पक्के मनुष्य की प्रबल वासनाएँ उसे वह वस्तु दिला भी दें जिसके पीछे वह लगा है, तो भी वह उसे कितनी जल्दी खो देता है! वह उसे ऐसे पाता है मानो पाया ही न हो। उसके पीछे दौड़ना तो परिश्रम भरा है, परन्तु उसका अधिकारी होना एक स्वप्न है। वह खाने बैठता है और देखो! भोज छीन लिया जाता है, प्याला होंठों तक पहुँचते ही लुप्त हो जाता है! वह खोने के लिये ही जीतता है! वह बनाता है, और उसकी रेतीली नींव उसके गुम्मट के नीचे से खिसक जाती है और उसके सारे प्रयत्न खण्डहर बनकर पड़े रहते हैं। जिसने राज्यों को जीता, वह बीच महासागर की एक सूनी चट्टान पर असन्तुष्ट होकर मरा, और जिसने उसके साम्राज्य को फिर से जीवित किया, वह ऐसा गिरा कि फिर कभी न उठा। जैसे योना का रेंड़ का पेड़ एक ही रात में मुरझा गया, वैसे ही साम्राज्य अचानक ढह गए हैं, और उनके स्वामी निर्वासन में मरे हैं। लड़-झगड़कर मनुष्य जो कुछ प्राप्त करते हैं, वह थोड़े समय के पट्टे की जायदाद है—वह प्राप्ति इतनी अस्थायी है कि यह बात अब भी सच ठहरती है, “वे लालसा रखते हैं, और उन्हें मिलता नहीं।”
या यदि ऐसे मनुष्यों में इतनी योग्यता और सामर्थ्य हो कि जो कुछ उन्होंने जीता है उसे थामे रखें, तो भी एक और अर्थ में वह उनके रहते हुए भी उनके पास नहीं होता, क्योंकि जिस सुख की उन्होंने उसमें आशा की थी, वह उसमें है ही नहीं। वे सेब तोड़ते हैं, और वह उन मृत सागर के सेबों में से एक निकलता है जो हाथ में लेते ही राख होकर बिखर जाते हैं। मनुष्य धनी है, परन्तु परमेश्वर उससे अपने धन का आनन्द भोगने की शक्ति छीन लेता है। अपनी वासनाओं और लड़ाइयों के द्वारा लम्पट मनुष्य अन्त में अपनी लालसाओं का लक्ष्य पा ही लेता है, और क्षण भर की तृप्ति के बाद वह उसी वस्तु से घिन करने लगता है जिसकी उसने इतनी तीव्र लालसा की थी! वह लुभानेवाले सुख के लिये तरसता है, उसे झपट लेता है और अपनी उतावली पकड़ से उसे कुचल डालता है!
उस लड़के को देखो जो तितली का शिकार कर रहा है; तितली फूल से फूल पर मँडराती है और वह बड़े उत्साह से उसका पीछा करता है। अन्त में वह पहुँच के भीतर आती है और वह अपनी टोपी से उसे गिरा देता है! परन्तु जब वह उसके बचे हुए बेचारे अंगों को उठाता है, तो पाता है कि वह रंगीन पतंगा उसी काम से नष्ट हो गया जिसने उसे जीता था! इसी प्रकार मनुष्य-सन्तानों की भीड़ की भीड़ के विषय में कहा जा सकता है—“तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं।” उनकी कंगाली तीन प्रकार से प्रकट की गई है। “तुम हत्या और डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकते,” “तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं।” “तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो।” यदि लालसा करनेवाले असफल होते हैं, तो इसका कारण यह नहीं कि उन्होंने अपने लक्ष्य पाने के लिये काम आरम्भ नहीं किया, क्योंकि अपने स्वभाव के अनुसार उन्होंने अपनी पहुँच के भीतर के सबसे व्यावहारिक साधनों का प्रयोग किया, और वह भी बड़ी उत्सुकता से!
शरीर की मनसा के अनुसार, किसी वस्तु को पाने का एकमात्र उपाय उसके लिये लड़ना है, और याकूब सब लड़ाइयों का यही कारण बताता है। “तुम में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आते है? क्या उन सुख-विलासों से नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ते-भिड़ते हैं?” यह उसी प्रकार का प्रयत्न है जिसके विषय में हम पढ़ते हैं, “तुम झगड़ते और लड़ते हो; तो भी तुम्हें नहीं मिलता।” मनुष्य युग-युग से इसी कार्य-प्रणाली से चिपके रहते हैं। वे मुझसे कहते हैं कि यदि किसी मनुष्य को इस संसार में आगे बढ़ना है, तो उसे अपने पड़ोसियों से होड़ करनी होगी, और उन्हें उनके लाभ के स्थान से धकेल देना होगा। उसे इसकी अधिक चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि उनका भला कैसे होगा, वरन् उसे अपने ही लाभ पर दृष्टि रखनी चाहिए और ऊपर उठने का ध्यान रखना चाहिए, चाहे उसे कितनों ही को पाँवों तले रौंदना पड़े। यदि वह अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखे, तो वह आगे बढ़ने की आशा नहीं कर सकता! यह तो खरी लड़ाई है, और हर एक मनुष्य को अपनी ही चिन्ता करनी चाहिए!
क्या तुम सोचते हो कि मैं व्यंग्य कर रहा हूँ? शायद कर रहा हूँ, परन्तु मैंने ऐसे मनुष्यों से इस प्रकार की बातें सुनी हैं जो उन्हें सचमुच मानते थे। इसलिए वे लड़ने लगते हैं, और वह लड़ाई बहुधा विजयी भी होती है, क्योंकि पाठ के अनुसार, “तुम हत्या करते हो”—अर्थात् वे ऐसे लड़ते हैं कि अपने विरोधी को पछाड़ देते हैं और उसका अन्त हो जाता है। वे बड़े बलवन्त मनुष्य हैं, ऐसे जवान सिंह जो निकलकर अपने शिकार को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर सकते हैं, और फिर भी उनके विषय में कहा गया है कि उन्हें “घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं।” परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होगी, जबकि ये लालसा करनेवाले अपनी बात मनवाने के प्रयत्नों में निरंकुश रहते हैं! वे किसी बात पर नहीं रुकते; वे हत्या करते हैं और पाने की लालसा रखते हैं।
इसके अतिरिक्त, वे बड़ी दृढ़ता से लड़ते हैं, क्योंकि पाठ कहता है, “तुम झगड़ते और लड़ते हो।” अब, लड़ना तो झगड़ने का ही सिलसिला है, जो उसे एक चढ़ाई से दूसरी चढ़ाई तक खींचता है और सैन्य-कला के नियमों के अनुसार तब तक चलाता है जब तक विजय न मिल जाए। बहुत से मनुष्य अपने ही लिये जी रहे हैं; वे यहाँ होड़ करते और वहाँ युद्ध करते हैं, और अत्यन्त दृढ़ता से अपने ही हित के लिये लड़ते हैं। इसे वे किस रीति से करेंगे, इसमें वे अधिक भेद नहीं करते। उनके लेन-देन में विवेक को हस्तक्षेप करने नहीं दिया जाता, परन्तु वह पुरानी सलाह उनके कानों में गूँजती रहती है, “धन कमाओ! हो सके तो ईमानदारी से धन कमाओ, परन्तु किसी भी उपाय से धन कमाओ।” चाहे शरीर और प्राण नष्ट हो जाएँ और दूसरे दुःख में डूब जाएँ, कोई बात नहीं—लड़ते रहो—क्योंकि इस लड़ाई से छुट्टी नहीं मिल सकती! यदि तुम्हें जीतना है, तो तुम्हें लड़ना ही होगा—और युद्ध में सब कुछ उचित है!
इसलिए वे अपनी सेनाएँ जुटाते हैं, अपने संगी मनुष्यों से संघर्ष करते हैं, जीवन की लड़ाई को और भी अधिक तीव्र बना देते हैं, प्रेम को निकाल बाहर करते हैं और कोमलता पर मूर्खता की छाप लगा देते हैं—और फिर भी, अपनी सारी युक्तियों के रहते, वे किसी भी सच्चे अर्थ में जीवन का लक्ष्य प्राप्त नहीं करते। याकूब ठीक ही कहता है, “तुम हत्या और डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकते; तुम झगड़ते और लड़ते हो; तो भी तुम्हें नहीं मिलता।” जब वे मनुष्य, जिनका मन अपने स्वार्थी उद्देश्यों पर बहुत लगा रहता है, सफल नहीं होते, तब सम्भव है वे यह सुनें कि उनकी असफलता का कारण यह है: “तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं।” तो क्या सफलता माँगने से प्राप्त होती है? पाठ तो यही संकेत करता जान पड़ता है—और धर्मी यही पाते भी हैं। तीव्र इच्छाओंवाला यह मनुष्य माँगने क्यों नहीं लगता? पहला कारण यह है कि स्वाभाविक मनुष्य के लिये प्रार्थना करना अस्वाभाविक है—उससे यह आशा करना वैसा ही है जैसे यह आशा करना कि वह उड़ने लगे!
वह विनती करने के विचार को ही तुच्छ जानता है। “प्रार्थना?” वह कहता है। “नहीं, मुझे तो काम में लगे रहना है। मैं भक्ति-कर्मों में समय नष्ट नहीं कर सकता; प्रार्थनाएँ व्यावहारिक नहीं होतीं। मुझे लड़-भिड़कर अपना मार्ग बनाना है। जब तक तुम प्रार्थना कर रहे होगे, तब तक मैं अपने प्रतिद्वन्द्वी को पछाड़ चुका होऊँगा। मैं अपने कारोबार के दफ्तर जाता हूँ और तुम्हें तुम्हारी बाइबलों और तुम्हारी प्रार्थनाओं के पास छोड़ देता हूँ।” परमेश्वर से माँगने का उसका कोई मन नहीं। वह घोषणा करता है कि पाखण्डी ढोंगियों के सिवाय प्रार्थना की परवाह कोई नहीं करता, और इस प्रकार वह मान लेता है कि यदि वह प्रार्थना करे, तो वह भी पाखण्डी ढोंगी ठहरेगा! जहाँ तक उसकी बात है, उसका माँगना तो बिलकुल दूसरे ही प्रकार का है, शिकारी का सा, और हाय उन पर जो उसके चंगुल में आ पड़ें! वे पाएँगे कि उसके लिये व्यापार व्यापार ही है, और वह भी खूब कड़ा व्यापार। वह प्रार्थना करने के लिये कभी न झुकेगा, वह बहुत घमण्डी है। परमेश्वर पर निर्भर रहना वह नहीं समझता—आत्मनिर्भरता ही उसका मूलमन्त्र है! स्व ही उसका देवता है, और सफलता के लिये वह अपने उसी देवता की ओर ताकता है!
वह इतना घमण्डी है कि अपने आप को ही अपना विधाता समझता है! उसका अपना दाहिना हाथ और उसकी फुर्तीली भुजा उसे विजय दिलाएँगे। जब वह अपने विचारों में बहुत उदार होता है, तब वह मान लेता है कि यद्यपि वह स्वयं प्रार्थना नहीं करता, तो भी उसमें कुछ भलाई हो सकती है, क्योंकि उससे लोगों के मन शान्त होते हैं और उन्हें अधिक चैन मिलता है। परन्तु जहाँ तक प्रार्थना का कभी कोई उत्तर मिलने की बात है, वह उस विचार पर हँसता है, और दार्शनिक तथा धर्मवैज्ञानिक दोनों ढंग से इस धारणा की मूर्खता पर बातें करता है कि परमेश्वर पुरुषों और स्त्रियों की प्रार्थनाओं का ध्यान करके अपने कार्य करने की रीति बदल देता है। “बेतुकी बात,” वह कहता है, “बिलकुल बेतुकी!” और इसलिए, अपनी बड़ी बुद्धि के भरोसे, वह फिर अपने झगड़ने और लड़ने में लौट जाता है, क्योंकि इन्हीं साधनों से वह अपना लक्ष्य पाने की आशा करता है। तो भी वह प्राप्त नहीं करता!
मनुष्यजाति का सारा इतिहास दिखाता है कि बुरी वासनाएँ अपना लक्ष्य पाने में असफल रहती हैं। कुछ समय तक शारीरिक मनुष्य झगड़ता और लड़ता रहता है, परन्तु आगे चलकर वह अपना मन बदल लेता है, क्योंकि वह बीमार पड़ जाता है, या डर जाता है। उसका उद्देश्य वही रहता है, परन्तु यदि वह एक रीति से पूरा नहीं हो सकता, तो वह दूसरी रीति आजमाएगा। यदि उसे माँगना ही पड़े, तो ठीक है, वह माँगेगा—वह धार्मिक बन जाएगा और इस रीति से अपना भला करेगा। वह देखता है कि कुछ धार्मिक लोग संसार में फलते-फूलते हैं, और सच्चे मसीही भी व्यापार में कदापि मूर्ख नहीं होते, और इसलिए वह उनकी युक्ति भी आजमाकर देखेगा। और अब वह हमारे पाठ की तीसरी भर्त्सना के अधीन आ जाता है—“तुम माँगते हो और पाते नहीं।” वह क्या कारण है कि जो मनुष्य अपनी वासनाओं का दास है, वह माँगने लगने पर भी अपनी इच्छा प्राप्त नहीं करता?
कारण यह है कि उसका माँगना केवल एक औपचारिकता है। उसकी उपासना में उसका मन नहीं होता। वह एक पुस्तक खरीदता है जिसमें वे बातें होती हैं जिन्हें “लिखित प्रार्थनाएँ” कहा जाता है, और वह उन्हें दोहराता रहता है, क्योंकि दोहराना प्रार्थना करने से सहज है और उसमें किसी सोच-विचार की आवश्यकता नहीं होती! यदि तुम किसी लिखित प्रार्थना के साथ सचमुच प्रार्थना करते हो, तो उसके प्रयोग पर मुझे कोई आपत्ति नहीं, परन्तु मैं बहुतेरों को जानता हूँ जो उसके साथ प्रार्थना नहीं करते, केवल शब्दों को दोहरा देते हैं। कल्पना करो कि हमारे परिवारों का क्या होगा, यदि हमारे बच्चे, जब उन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता हो, हमसे खुलकर बात करने के बदले, सदा यह आवश्यक समझें कि पुस्तकालय में जाकर कोई लिखित विनती ढूँढ़ें और हमें पढ़कर सुनाएँ! निश्चय ही घर का सारा अपनापन और प्रेम समाप्त हो जाएगा! जीवन बेड़ियों में जकड़ा हुआ चलेगा! हमारा घराना एक प्रकार का छात्रावास या छावनी बन जाएगा—और सब कुछ कवायद और औपचारिकता हो जाएगा—उन आनन्दित आँखों के बदले, जो प्रेम भरे भरोसे के साथ उन स्नेही आँखों की ओर ताकती हैं जो उत्तर देने में आनन्दित होती हैं!
बहुत से आत्मिक मनुष्य भी लिखित प्रार्थना का प्रयोग करते हैं, परन्तु शारीरिक मनुष्य तो लगभग निश्चय ही ऐसा करते हैं, क्योंकि उनकी प्रार्थना उसी पर समाप्त हो जाती है। इस मनुष्य की प्रार्थना बुरी इच्छा से माँगना है, क्योंकि वह पूरी तरह अपने ही लिये है। वह उन्नति इसलिए चाहता है कि मौज कर सके। वह केवल इसलिए बड़ा बनना चाहता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें—उसकी प्रार्थना स्व से आरम्भ होती है और स्व पर ही समाप्त होती है। ऐसी प्रार्थना की अभद्रता को देखो, चाहे वह सच्चे मन से ही क्यों न की गई हो। जब कोई मनुष्य इस प्रकार प्रार्थना करता है, तो वह परमेश्वर से माँगता है कि वह उसका सेवक बने और उसकी इच्छाएँ पूरी करे। नहीं, इससे भी बुरा! वह चाहता है कि परमेश्वर उसकी वासनाओं की सेवा में उसका साथ दे! वह अपनी वासनाएँ तृप्त करेगा, और परमेश्वर आकर इसमें उसकी सहायता करे! ऐसी प्रार्थना परमेश्वर की निन्दा है, फिर भी ऐसी प्रार्थना बड़ी मात्रा में चढ़ाई जाती है, और यह अवश्य उन बातों में से एक होगी जो स्वर्ग की देखी हुई सब बातों में परमेश्वर को सबसे अधिक क्रोध दिलाती हैं!
नहीं, यदि कोई मनुष्य अपने लिये और अपनी वासनाओं के लिये ही जीना चाहता है, तो वह ऐसा करे, और वह परमेश्वर से जितना दूर रहेगा उतना ही अधिक सुसंगत रहेगा। वह प्रभु की प्रार्थना को ऐसे न बुदबुदाए मानो परमेश्वर उसका पिता हो, न अपने लोभ को पवित्र ठहराने के लिये मसीह के पवित्र नाम को घसीटे, न अपनी व्यक्तिगत बढ़ती या अपनी स्वार्थी महत्त्वाकांक्षा के सम्बन्ध में आत्मा की धन्य सामर्थ्य की दुहाई दे! यदि वह ऐसा करता है, तो वह आरम्भ से कुछ भी अच्छी दशा में न होगा—वह माँगेगा, और उसे मिलेगा नहीं। उसका माँगना व्यर्थ जाएगा, क्योंकि वह बुरी इच्छा से माँगता है, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दे। यदि तुम्हारी इच्छाएँ पतित स्वभाव की लालसाएँ हैं; यदि तुम्हारी इच्छाएँ तुम्हीं से आरम्भ होकर तुम्हीं पर समाप्त होती हैं, और यदि जिस मुख्य उद्देश्य के लिये तुम जीते हो वह परमेश्वर की महिमा करना नहीं, वरन् अपनी महिमा करना है, तो तुम लड़ सकते हो, परन्तु तुम्हें मिलेगा नहीं!
तुम सवेरे उठ सकते हो और देर तक जागते रह सकते हो, परन्तु उससे पाने योग्य कुछ भी न निकलेगा! स्मरण करो कि प्रभु ने 37वें भजन में कैसे कहा है—“क्रोध से परे रह, और जलजलाहट को छोड़ दे! मत कुढ़, उससे बुराई ही निकलेगी। थोड़े दिन के बीतने पर दुष्ट रहेगा ही नहीं; और तू उसके स्थान को भली भाँति देखने पर भी उसको न पाएगा। परन्तु नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और बड़ी शान्ति के कारण आनन्द मनाएँगे।”
लालसा की कंगाली के विषय में इतना ही।
II. दूसरा, अब मेरे सामने एक गम्भीर काम है, और वह यह दिखाना है कि मसीही कलीसियाएँ किस प्रकार आत्मिक कंगाली भुगत सकती हैं, यहाँ तक कि वे भी “डाह करती हैं, और कुछ प्राप्त नहीं कर सकतीं।” निश्चय ही मसीही संसारी मनुष्य से ऊँची बातें खोजता है, नहीं तो वह उस नाम के योग्य ही न होता। कम से कम, अपने अंगीकार के अनुसार, उसका लक्ष्य सच्चा धन प्राप्त करना और आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर की महिमा करना है। हाँ, परन्तु देखो, हे प्रिय भाइयो और बहनो, सब कलीसियाओं को वह नहीं मिलता जो वे चाहती हैं। हमें यहाँ-वहाँ ही नहीं, वरन् बहुत से स्थानों पर ऐसी कलीसियाओं के विषय में शिकायत करनी पड़ती है जो लगभग सो रही हैं और धीरे-धीरे घटती जा रही हैं।
निश्चय ही वे बहाने ढूँढ़ लेती हैं। जनसंख्या घट रही है, या कोई दूसरा आराधना-स्थल लोगों को खींच रहा है। जब किसी मनुष्य को बहाने की आवश्यकता होती है, तो कोई न कोई बहाना सदा हाथ में रहता है। परन्तु फिर भी तथ्य अपनी जगह है—कुछ स्थानों में सार्वजनिक आराधना लगभग सूनी पड़ी है, सेवकाई में लोगों को इकट्ठा करने की कोई शक्ति नहीं रही—और जो उपस्थित होते भी हैं, वे असन्तुष्ट या उदासीन हैं। ऐसी कलीसियाओं में कोई मन-फिराव नहीं होता। यदि वर्ष भर में उनमें आधा दर्जन लोग भी जुड़ जाएँ, तो उन्हें “हालेलूय्याह कोरस” गाना पड़ेगा! परन्तु जहाँ तक हजारों को मसीह के पास लाने की बात है, वे मन ही मन डरते हैं कि यह एक अवांछनीय बात होगी, क्योंकि इसमें उत्तेजना हो सकती है—और वे इतने मर्यादावादी हैं कि ऐसी किसी भी बात से डरते हैं!
कुछ न करना और मनुष्यों को नरक में नाश होने देना, उनकी दृष्टि में, उचित और प्रतिष्ठित है। परन्तु जीवित और उत्साही होना एक जोखिम भरी दशा है, क्योंकि उससे कट्टरता और अमर्यादा फैल सकती है! वे “सनसनीखेजी” जैसी किसी भी बात से विशेष रूप से डरते हैं। उस भद्दे दिखनेवाले शब्द को वे हमारे सामने ठीक वैसे ही रखते हैं जैसे चीनी लोग अपनी ढालों पर डरावने चेहरे रंगकर अपने शत्रुओं को डराने का प्रयत्न करते हैं! उस भयानक शब्द की चिन्ता मत करो—वह किसी को हानि नहीं पहुँचाएगा! इन कलीसियाओं को “मिलता नहीं,” क्योंकि उनके उत्साह से परमेश्वर का कोई सत्य प्रबल नहीं होता; कोई पाप मारा नहीं जाता; कोई पवित्रता बढ़ाई नहीं जाती; ऐसा कुछ नहीं किया जाता जिससे परमेश्वर की महिमा हो। और इसका क्या कारण है?
पहला, अंगीकार करनेवाले मसीहियों में भी वांछनीय वस्तुओं का पीछा गलत रीति से किया जा सकता है। “तुम झगड़ते और लड़ते हो; तो भी तुम्हें नहीं मिलता,” क्या कलीसियाओं ने दूसरी कलीसियाओं से होड़ करके उन्नति करने की नहीं सोची? अमुक आराधना-स्थल में एक बड़ा चतुर मनुष्य है—हमें भी एक चतुर मनुष्य लाना चाहिए! वरन् उसे हमारे पड़ोसी के नायक से थोड़ा अधिक चतुर होना चाहिए। यही तो बात है—एक चतुर मनुष्य! हाय, कि हम ऐसे युग में जी रहे हैं जिसमें यीशु मसीह के सुसमाचार के प्रचार के विषय में चतुर मनुष्यों की बात होती है! हाय, कि यह पवित्र सेवा मनुष्य की चतुराई पर निर्भर समझी जाए! कलीसियाओं ने भवन-निर्माण में, संगीत में, वस्त्रों में और सामाजिक प्रतिष्ठा में एक-दूसरे से होड़ की है। अगुवे यह कल्पना करते हैं कि सफल होने के लिये उनके पास अपने पड़ोसियों से कुछ अधिक सुन्दर, कलात्मक या महँगा होना चाहिए—इसलिए वे गॉथिक शैली के ऐसे भवन बनाते हैं जिनमें सेवक का स्वर ऊपर की शहतीरों में जा अटकता है और कभी ठीक से सुनाई नहीं देता—या फिर वे एक ऐसा ऑर्गन खरीदते हैं जिसमें हर प्रकार का स्टॉप है, केवल पूर्ण विराम को छोड़कर!
यह धारणा व्यापक रूप से फैली हुई जान पड़ती है कि ऑर्गन में बहुत सा अनुग्रह भरा है। तातारियों के समान पवनचक्की से परमेश्वर से प्रार्थना करना तो बड़ी बेतुकी बात होगी! परन्तु पाइपों के एक समूह में से होकर जाती हवा से परमेश्वर की स्तुति करना अत्यन्त उचित है! मैंने यह भेद कभी नहीं देखा और अब भी नहीं देखता। ऑर्गन हो या न हो, यह अभी प्रश्न नहीं है, परन्तु मैं उन उदाहरणों की बात कर रहा हूँ जिनमें ये यन्त्र होड़ के कारण लगाए जाते हैं। क्या बहुतों का उद्देश्य यह नहीं है कि दूसरों से अधिक सुन्दर भवन, अधिक अच्छे संगीत और अधिक चतुर सेवकाई के द्वारा सफल हों? क्या यह भी वैसी ही होड़ की बात नहीं है जैसी बजाजों में दुकान के मुखड़े और सजी हुई खिड़की की होती है? क्या परमेश्वर का राज्य हमारे बीच इसी रीति से बढ़ेगा?
कुछ उदाहरणों में इस होड़ में कुछ कड़वाहट भी होती है। छोटे मनवालों को यह अच्छा नहीं लगता कि दूसरी कलीसियाएँ उनकी अपनी कलीसिया से अधिक उन्नति करें। हो सकता है वे हमसे अधिक उत्साही हों और परमेश्वर का काम हमसे अच्छी तरह कर रहे हों, परन्तु हम उनकी ओर ईर्ष्या की दृष्टि से देखने को बहुत तत्पर रहते हैं—और सच कहें तो, हम यही चाहेंगे कि वे इतनी अच्छी तरह आगे न बढ़ें। क्या तुम यह समझते हो, कि पवित्रशास्त्र व्यर्थ कहता है, “जो आत्मा हम में बसा है, वह डाह की लालसा करता है?” यदि हम उनमें कोई उपद्रव देख पाते, जिससे वे बिखर जाएँ और कलीसियाई रूप से मार डाले जाएँ, तो हम आनन्दित न होते। निश्चय ही नहीं! परन्तु हमें कोई प्राणघातक शोक भी न होता! कुछ कलीसियाओं में एक दुष्ट आत्मा मँडराता रहता है। मैं बुरा-भला कहकर दोष नहीं लगाता, और इसलिए इससे अधिक कुछ नहीं कहता—परमेश्वर ऐसे साधनों और ऐसी आत्मा को कभी आशीष नहीं देगा—जो उनके आगे झुक जाते हैं, वे पाने की लालसा तो रखेंगे, परन्तु कभी प्राप्त न करेंगे।
इसी बीच, उन्हें आशीष क्यों नहीं मिलती? पाठ कहता है, “तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं।” मुझे डर है कि ऐसी कलीसियाएँ हैं जो माँगती ही नहीं। हर प्रकार की प्रार्थना की बहुत उपेक्षा होती है। व्यक्तिगत प्रार्थना को क्षीण होने दिया जाता है। मैं यह बात हर मनुष्य के विवेक पर छोड़ता हूँ कि गुप्त प्रार्थना पर कितना ध्यान दिया जाता है, और हमारी कलीसियाओं के सदस्यों में एकान्त में परमेश्वर के साथ कितनी संगति होती है। निश्चय ही उसका स्वस्थ बना रहना कलीसिया की उन्नति के लिये अत्यन्त आवश्यक है। पारिवारिक प्रार्थना के विषय में निर्णय करना अधिक सहज है, क्योंकि उसे हम देख सकते हैं। मुझे डर है कि आजकल बहुतों ने पारिवारिक प्रार्थना बिलकुल छोड़ दी है। मैं तुमसे विनती करता हूँ, उनकी नकल न करो!
मैं चाहता हूँ कि तुम सब उस स्कॉटिश मजदूर के समान मन रखते, जिसे एक धनी किसान के घर में काम मिला था, जो अच्छी मजदूरी देने के लिये प्रसिद्ध था। उसके सब मित्र उससे डाह करते थे कि उसे ऐसी नौकरी मिली है। थोड़े ही समय में वह अपने गाँव लौट आया। और जब उन्होंने उससे पूछा कि उसने अपनी नौकरी क्यों छोड़ दी, तो उसने उत्तर दिया कि वह “ऐसे घर में नहीं रह सकता था जिस पर छत ही न हो।” प्रार्थना-रहित घर बिना छत का घर है! यदि हमारे परिवारों पर आशीष न हो, तो हम अपनी कलीसियाओं पर आशीष की आशा नहीं कर सकते! जहाँ तक सामूहिक प्रार्थना की बात है, अर्थात् उन सभाओं में इकट्ठा होना जिन्हें हम प्रार्थना-सभाएँ कहते हैं—क्या उसमें कमी नहीं आई है? बहुत सी जगहों में प्रार्थना-सभा को तुच्छ जाना जाता है और एक प्रकार की दूसरे दर्जे की सभा समझकर नीची दृष्टि से देखा जाता है। कलीसियाओं के ऐसे सदस्य हैं जो कभी उपस्थित नहीं होते, और अनुपस्थित रहने पर उनका विवेक उन्हें कचोटता तक नहीं।
कुछ मण्डलियाँ प्रार्थना-सभा को एक व्याख्यान के साथ मिला देती हैं, ताकि सप्ताह में केवल एक ही सभा रखनी पड़े। उस दिन मैंने इस सब के लिये एक बहाना पढ़ा—कहा जाता है कि लोग घर पर रहकर पारिवारिक कामों पर ध्यान दें तो अच्छा है। यह व्यर्थ की बात है! हममें से कौन चाहता है कि लोग अपने घरेलू कामों की उपेक्षा करें? यह पाया जाएगा कि अपने कामों पर सबसे अच्छा ध्यान वही देते हैं जो सब कुछ ठीक-ठाक करने में परिश्रमी रहते हैं, ताकि वे आराधना की सभाओं में जा सकें। परमेश्वर के भवन की उपेक्षा बहुधा उनके अपने घरों की उपेक्षा का सूचक होती है! मुझे निश्चय है कि वे अपने बच्चों को मसीह के पास नहीं ला रहे, नहीं तो वे उन्हें आराधना-सभाओं में भी लाते। जो भी हो, कलीसिया की प्रार्थनाएँ ही उसकी उन्नति का माप हैं। यदि हम प्रार्थना को रोकते हैं, तो हम आशीष को रोकते हैं।
कलीसियाओं के रूप में हमारी सच्ची सफलता केवल प्रभु से माँगकर ही प्राप्त हो सकती है। क्या हम इस विषय में सुधरने और ठीक होने को तैयार नहीं हैं? आह, कि सिय्योन की प्रसव-पीड़ा की घड़ी आ जाए, जब प्रार्थना की वेदना विश्वासियों की सारी देह को हिला दे! परन्तु कुछ लोग उत्तर देते हैं, “प्रार्थना-सभाएँ होती तो हैं, और हम आशीष माँगते भी हैं, फिर भी वह नहीं आती।” क्या इसका उत्तर पाठ के दूसरे भाग में नहीं मिलता, “तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि बुरी इच्छा से माँगते हो”? जब प्रार्थना-सभाएँ केवल एक औपचारिकता बन जाती हैं; जब भाई और बहनें खड़े होकर, उत्सुक और जलते हुए शब्दों में परमेश्वर से बात करने के बदले, अपने लम्बे भाषणों में समय गँवा देते हैं; जब आशीष की कोई आशा नहीं होती—जब प्रार्थना ठण्डी और ठिठुरी हुई होती है—तब उससे कुछ नहीं निकलेगा। जो उत्कटता के बिना प्रार्थना करता है, वह प्रार्थना करता ही नहीं! हम उस परमेश्वर से, जो भस्म करनेवाली आग है, संगति नहीं कर सकते, यदि हमारी प्रार्थनाओं में आग ही न हो!
बहुत सी प्रार्थनाएँ अपने काम में इसलिए विफल होती हैं कि उनमें विश्वास नहीं होता। सन्देह से भरी प्रार्थनाएँ मानो इनकार पाने के लिये की गई विनतियाँ हैं। कल्पना करो कि तुमने किसी मित्र को लिखा और कहा, “प्रिय मित्र, मैं बड़े संकट में हूँ, और इसलिए मैं तुम्हें बताता हूँ और तुमसे सहायता माँगता हूँ, क्योंकि ऐसा करना उचित जान पड़ता है। परन्तु यद्यपि मैं इस प्रकार लिख रहा हूँ, मुझे कोई विश्वास नहीं कि तुम मुझे कोई सहायता भेजोगे। वास्तव में, यदि तुमने भेजी तो मुझे बड़ा आश्चर्य होगा, और मैं उसे एक बड़ा अचम्भा कहूँगा।” क्या तुम सोचते हो कि तुम्हें सहायता मिलेगी? मैं तो कहूँगा कि तुम्हारा मित्र इतना समझदार होगा कि उस थोड़े से भरोसे को भाँप ले जो तुम उस पर रखते हो, और वह उत्तर देगा कि जब तुम कुछ आशा ही नहीं करते, तो वह तुम्हें चकित नहीं करेगा। उसकी उदारता के विषय में तुम्हारी राय इतनी नीची है कि वह तुम्हारे लिये कष्ट उठाने का कोई कारण नहीं देखता। जब प्रार्थनाएँ इस प्रकार की हों, तब तुम आश्चर्य नहीं कर सकते यदि “हमें इसलिए नहीं मिलता, कि बुरी इच्छा से माँगते हैं।”
इसके अतिरिक्त, यदि हमारा प्रार्थना करना, चाहे वह कितना भी उत्सुक और विश्वासपूर्ण क्यों न हो, केवल यह माँगना है कि हमारी कलीसिया इसलिए उन्नति करे कि हम उसकी उन्नति पर घमण्ड कर सकें—यदि हम अपने सम्प्रदाय को बहुत बढ़ता हुआ और उसकी प्रतिष्ठा को ऊँची होती हुई इसलिए देखना चाहते हैं कि उसके सम्मान में हमारा भी भाग हो—तो हमारी इच्छाएँ अन्त में वासनाओं के सिवाय और कुछ नहीं! क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर की सन्तान वैसी ही होड़, डाह और महत्त्वाकांक्षाएँ प्रकट करें जैसी संसार के लोग करते हैं? क्या धार्मिक काम प्रतिद्वन्द्विता और प्रतियोगिता का विषय बनेगा? आह, तब तो सफलता ढूँढ़नेवाली प्रार्थनाएँ दया के सिंहासन के सामने ग्रहण न होंगी! परमेश्वर हमारी नहीं सुनेगा, वरन् हमें चले जाने को कहेगा, क्योंकि वह उन विनतियों की परवाह नहीं करता जिनका विषय स्व हो। “तुम्हें इसलिए नहीं मिलता, कि माँगते नहीं, या इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो।”
III. तीसरा, मेरे पास एक कहीं अधिक सुखद काम है, और वह है उस धन की ओर संकेत करना जो सही साधन के प्रयोग की बाट जोह रहा है, अर्थात् परमेश्वर से ठीक रीति से माँगने की। मैं इस विषय पर तुम्हारा अत्यन्त गम्भीर ध्यान चाहता हूँ, क्योंकि यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। और मेरी पहली बात यह है—परमेश्वर हमसे जो माँग करता है, वह आखिरकार कितनी छोटी है! माँगना? अरे, यह तो सबसे छोटी बात है जिसकी वह हमसे आशा कर सकता है, और यह उससे अधिक नहीं जितना हम साधारणतः उन लोगों से चाहते हैं जिन्हें हमसे सहायता की आवश्यकता होती है! हम आशा करते हैं कि कंगाल मनुष्य माँगे, और यदि वह नहीं माँगता, तो उसकी घटी का दोष हम उसी पर डालते हैं। यदि परमेश्वर माँगने पर देगा और फिर भी हम कंगाल बने रहें, तो दोष किसका है? क्या वह दोष अत्यन्त गम्भीर नहीं? क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध बिगड़ा हुआ है, यहाँ तक कि हम उससे कोई कृपा माँगने के लिये झुकना भी नहीं चाहते? निश्चय ही हमारे हृदयों में उसके प्रति कोई छिपा हुआ बैर होगा, नहीं तो यह एक अनचाही विवशता होने के बदले एक बड़ा आनन्द समझा जाता!
तो भी, हे भाइयो और बहनो, चाहे हमें अच्छा लगे या न लगे, स्मरण रखो, माँगना ही राज्य का नियम है। “माँगो तो पाओगे।” यह एक ऐसा नियम है जो किसी के लिये कभी नहीं बदलेगा। हमारा प्रभु यीशु मसीह
परिवार का बड़ा भाई है, तो भी परमेश्वर ने उसके लिये भी इस नियम में ढील नहीं दी! यह पद स्मरण रखो—यहोवा अपने ही पुत्र से कहता है, “मुझसे माँग, और मैं जाति-जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये, और दूर-दूर के देशों को तेरी निज भूमि बनने के लिये दे दूँगा।” यदि परमेश्वर का राजसी और ईश्वरीय पुत्र भी पाने के लिये माँगने के नियम से छूट नहीं पा सकता, तो तुम और मैं यह आशा नहीं कर सकते कि हमारे पक्ष में यह नियम ढीला किया जाएगा!
ऐसा क्यों हो? कौन सा कारण दिया जा सकता है कि हमें प्रार्थना से छूट मिले? ऐसा कौन सा तर्क हो सकता है कि हम विनती के विशेषाधिकार से वंचित किए जाएँ और उसकी आवश्यकता से छुड़ाए जाएँ? मुझे तो कोई नहीं दिखता—क्या तुम्हें दिखता है? परमेश्वर एलिय्याह को आशीष देगा और इस्राएल पर वर्षा भेजेगा, परन्तु एलिय्याह को उसके लिये प्रार्थना करनी होगी। यदि चुनी हुई जाति को उन्नति करनी है, तो शमूएल को उसके लिये विनती करनी होगी। यदि यहूदियों को छुटकारा मिलना है, तो दानिय्येल को मध्यस्थता करनी होगी। परमेश्वर पौलुस को आशीष देगा और उसके द्वारा जाति-जाति के लोग मन फिराएँगे, परन्तु पौलुस को प्रार्थना करनी होगी! और उसने प्रार्थना की, निरन्तर—उसकी पत्रियाँ दिखाती हैं कि वह माँगे बिना किसी वस्तु की आशा नहीं करता था। यदि तुम माँगकर सब कुछ पा सकते हो और बिना माँगे कुछ भी नहीं, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि देखो प्रार्थना कितनी अनिवार्य है! और मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि उसमें बढ़ते जाओ।
इसके अतिरिक्त, सबसे उथला विचार करनेवाले को भी यह स्पष्ट है कि परमेश्वर की कलीसिया के लिये कुछ ऐसी आवश्यक वस्तुएँ हैं जिन्हें हम प्रार्थना के बिना नहीं पा सकते। वह चतुर मनुष्य, जिसकी मैंने चर्चा की, तुम पा सकते हो—शायद उसके विषय में तुम जितनी कम प्रार्थना करो, उतना ही अच्छा! और वह नया गिरजाघर, और नया ऑर्गन, और गायक-मण्डली भी तुम बिना प्रार्थना के पा सकते हो—परन्तु स्वर्गीय अभिषेक तुम नहीं पा सकते—परमेश्वर का दान रुपयों से मोल नहीं लिया जा सकता! अमेरिका के एक सीधे-सादे गाँव की एक कलीसिया के कुछ सदस्यों ने सोचा कि वे आराधना-भवन में एक बहुत सुन्दर झाड़-फानूस टाँगकर एक मण्डली खड़ी कर लेंगे। लोग इस झाड़-फानूस की चर्चा करने लगे और कुछ उसे देखने भी गए—परन्तु उसकी ज्योति जल्दी ही मन्द पड़ गई।
तुम हर प्रकार का कलीसियाई साज-सामान खरीद सकते हो! तुम किसी भी प्रकार का रंग-रोगन, पीतल, मलमल, नीला और लाल कपड़ा और सूक्ष्म सनी का कपड़ा खरीद सकते हो—और साथ में बाँसुरी, वीणा, सारंगी, सितार और सब प्रकार के बाजे भी—यह सब तुम बिना प्रार्थना के पा सकते हो। वास्तव में, ऐसे कूड़े-करकट के विषय में प्रार्थना करना तो धृष्टता होगी! परन्तु पवित्र आत्मा तुम बिना प्रार्थना के नहीं पा सकते। “वह जिधर चाहता है उधर चलता है।” माँगने को छोड़, हमारे वश की किसी भी प्रक्रिया या रीति से वह निकट नहीं लाया जा सकता। ऐसा कोई यान्त्रिक साधन नहीं जो उसकी अनुपस्थिति की कमी पूरी कर सके! यदि पवित्र आत्मा वहाँ नहीं है, तो तुम्हारे उस चतुर मनुष्य से क्या लाभ? क्या कोई मन फिराएगा? क्या किसी प्राण को शान्ति मिलेगी? क्या पवित्र आत्मा के बिना परमेश्वर की कोई सन्तान आत्मिक जीवन में नई की जाएगी? प्रार्थना के बिना तुम परमेश्वर के साथ संगति भी नहीं पा सकते। जो प्रार्थना नहीं करेगा, वह परमेश्वर के साथ संगति नहीं रख सकता। इससे भी बढ़कर, जब प्रार्थना बन्द हो जाती है, तब कलीसिया की अपने ही सदस्यों के साथ कोई सच्ची आत्मिक संगति नहीं रहती। प्रार्थना को सक्रिय रहना चाहिए, नहीं तो वे आशीषें, जो कलीसिया की सफलता के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं, उस तक कभी नहीं पहुँच सकतीं। प्रार्थना आत्मिक आशीष का महान द्वार है, और यदि तुम उसे बन्द कर दो, तो तुम कृपा को बाहर ही रोक देते हो।
हे प्रिय भाइयो और बहनो, क्या तुम नहीं सोचते कि यह माँगना, जिसकी परमेश्वर माँग करता है, एक बहुत बड़ा विशेषाधिकार है? मान लो कि यह राजाज्ञा निकाली जाती कि तुम्हें प्रार्थना नहीं करनी है—तब तो सचमुच बड़ी कठिनाई होती! यदि प्रार्थना आशीष की धारा को बढ़ाने के बदले रोकती, तो यह एक दुःखद विपत्ति होती। क्या तुमने कभी किसी गूँगे को देखा है जो बड़ी उत्तेजना में हो, या बड़ी पीड़ा सह रहा हो, और इसलिए बोलने को व्याकुल हो? यह बड़ा भयानक दृश्य होता है! चेहरा बिगड़ जाता है, देह बुरी तरह काँपने लगती है—वह गूँगा घोर संकट में छटपटाता और जूझता है। उसका हर अंग जीभ की सहायता करने की इच्छा में ऐंठ जाता है, परन्तु वह अपने बन्धन तोड़ नहीं पाती! छाती से खोखली ध्वनियाँ निकलती हैं, और निष्फल बोली की हकलाहट ध्यान तो खींचती है, पर अभिव्यक्ति तक नहीं पहुँच पाती। वह बेचारा प्राणी अकथनीय पीड़ा में है!
मान लो कि हम अपने आत्मिक स्वभाव में प्रबल इच्छाओं से भरे होते, और फिर भी प्रार्थना की जीभ के विषय में गूँगे होते? मैं सोचता हूँ कि यह उन सबसे भयानक विपत्तियों में से एक होती जो हम पर आ सकती हैं! हम बुरी तरह अपंग और अंग-भंग हो जाते—और हमारी वेदना असहनीय होती! उसका नाम धन्य हो, प्रभु बोलने का मार्ग ठहराता है और हमारे हृदय को आज्ञा देता है कि वह खुलकर उससे बात करे! हे प्रियो, हमें प्रार्थना करनी ही चाहिए—मुझे तो ऐसा लगता है कि आवश्यकता के समय यही सबसे पहली बात होनी चाहिए जिसे करने का विचार हमें आए। यदि मनुष्य परमेश्वर के साथ ठीक होते और सचमुच उससे प्रेम करते, तो वे ऐसे स्वाभाविक रूप से प्रार्थना करते जैसे साँस लेते हैं! मैं आशा करता हूँ कि हममें से कुछ लोग परमेश्वर के साथ ठीक हैं और उन्हें प्रार्थना की ओर हाँके जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह हमारे स्वभाव की सहज प्रवृत्ति बन गई है।
कल एक मित्र ने मुझे एक छोटे जर्मन लड़के की कहानी सुनाई—एक ऐसी कहानी जिसे उसका पास्टर सुनाना पसन्द करता था। वह प्यारा छोटा बालक अपने परमेश्वर पर विश्वास करता था और प्रार्थना में आनन्दित रहता था। उसके स्कूल-मास्टर ने विद्यार्थियों से आग्रह किया था कि वे समय पर स्कूल पहुँचें, और यह बालक सदा ऐसा ही करने का प्रयत्न करता था। परन्तु उसके माता-पिता ढीले-ढाले लोग थे, और एक सुबह, केवल उन्हीं के दोष से, वह ठीक उसी समय घर के द्वार से निकला जब घड़ी ने स्कूल खुलने का घण्टा बजाया। पास खड़े एक मित्र ने उस नन्हे को पुकारते सुना, “हे प्यारे परमेश्वर, कृपा कर कि मैं समय पर स्कूल पहुँच जाऊँ।” सुननेवाले को लगा कि इस बार तो प्रार्थना सुनी नहीं जा सकती, क्योंकि बालक को अभी अच्छी-खासी दूर चलना था और समय हो भी चुका था। वह परिणाम देखने को उत्सुक था।
अब ऐसा हुआ कि उस सुबह मास्टर ने स्कूल का द्वार खोलने का प्रयत्न करते हुए चाबी उलटी ओर घुमा दी और चिटकनी हिला न सका। द्वार खोलने के लिये उन्हें एक तालासाज को बुलवाना पड़ा। इसलिए देर हो गई, और ठीक जब द्वार
खुला, हमारा छोटा मित्र बाकी सब के साथ, बिलकुल समय पर भीतर आ गया! परमेश्वर के पास उचित इच्छाओं को पूरा करने के बहुत से उपाय हैं। यह बिलकुल स्वाभाविक था कि रोने और ठुनकने के बदले, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करनेवाला बालक अपनी कठिनाई के विषय में उससे बात करे। क्या तुम्हारे और मेरे लिये भी यह स्वाभाविक नहीं होना चाहिए कि हम अपने आप और तुरन्त प्रभु को अपने दुःख बताएँ और सहायता माँगें? क्या यह पहला सहारा नहीं होना चाहिए? हाय, पवित्रशास्त्र और देखी हुई बातों के अनुसार—और, मुझे दुःख के साथ कहना पड़ता है—अपने अनुभव के अनुसार भी, प्रार्थना बहुधा सबसे अन्तिम बात होती है!
107वें भजन में उस बीमार मनुष्य को देखो। मित्र उसके लिये तरह-तरह का भोजन लाते हैं, परन्तु उसका जी सब भाँति के भोजन से मिचलाता है। वैद्य उसे चंगा करने के लिये जो कर सकते हैं करते हैं, परन्तु उसकी दशा बिगड़ती ही जाती है, और वह मृत्यु के फाटक तक पहुँच जाता है— “तब वे संकट में यहोवा की दुहाई देते हैं।” जो पहले होना चाहिए था, वह सबसे अन्त में रखा गया! “डॉक्टर को बुलाओ। उसके लिये पौष्टिक भोजन तैयार करो। उसे फलालैन में लपेटो!” यह सब तो ठीक है, परन्तु तुम परमेश्वर से प्रार्थना कब करोगे? परमेश्वर को तभी पुकारा जाएगा जब दशा निराशाजनक हो जाएगी! उसी भजन में वर्णित मल्लाहों को देखो। जहाज टूटने ही वाला है। “वे आकाश तक चढ़ जाते, फिर गहराई में उतर आते हैं; और क्लेश के मारे उनके जी में जी नहीं रहता।” तो भी तूफान से पार निकलने के लिये वे जो कुछ कर सकते हैं, करते हैं। परन्तु जब “वे चक्कर खाते, और मतवालों की भाँति लड़खड़ाते हैं, और उनकी सारी बुद्धि मारी जाती है। तब वे संकट में यहोवा की दुहाई देते हैं।”
ओह, हाँ; परमेश्वर को तब खोजा जाता है जब हम कोने में धकेल दिए जाते हैं और नाश होने पर होते हैं! और यह कितनी बड़ी दया है कि वह ऐसी देर से की गई प्रार्थनाएँ भी सुनता है और विनती करनेवालों को उनकी सकेती से छुड़ाता है! परन्तु क्या तुम्हारे और मेरे साथ, और मसीह की कलीसियाओं के साथ ऐसा ही होना चाहिए? क्या घटती हुई कलीसिया की पहली प्रेरणा यह नहीं होनी चाहिए, “आओ, हम रात-दिन प्रार्थना करें जब तक प्रभु हमारे लिये प्रकट न हो। आओ, हम एक मन होकर एक जगह इकट्ठे हों, और जब तक आशीष हम पर न उतरे, तब तक कभी अलग न हों”? हे भाइयो और बहनो, क्या तुम जानते हो कि केवल माँगने से कितनी बड़ी-बड़ी वस्तुएँ मिल सकती हैं? क्या तुमने कभी इस पर विचार किया है? क्या यह तुम्हें उत्कटता से प्रार्थना करने को नहीं उकसाता? सारा स्वर्ग माँगनेवाले मनुष्य की पकड़ के सामने पड़ा है! परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ धनी और अक्षय हैं—और उनकी पूर्ति प्रार्थना के द्वारा प्राप्त की जा सकती है!
यीशु कहता है, “मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है,” और पौलुस कहता है, “सब कुछ तुम्हारा है, और तुम मसीह के हो।” जब सब कुछ इस प्रकार हमें सौंप दिया गया है, तो कौन प्रार्थना न करेगा? हाँ, और जो प्रतिज्ञाएँ पहले विशेष व्यक्तियों से की गई थीं, वे सब हमसे भी की गई हैं, यदि हम प्रार्थना में उन्हें आगे रखकर विनती करना जानते हों। इस्राएल युगों पहले लाल समुद्र में से होकर गया था, फिर भी हम 66वें भजन में पढ़ते हैं, “वहाँ हम उसके कारण आनन्दित हुए।” पनीएल पर केवल याकूब उपस्थित था, फिर भी होशे कहता है, “वहीं उसने हम से बातें की।” पौलुस आवश्यकता के समयों के लिये हमें एक बड़ी प्रतिज्ञा देना चाहता है, और वह पुराने नियम से उद्धृत करता है, “क्योंकि उसने आप ही कहा है, मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।” पौलुस को यह कहाँ से मिला? यह वही आश्वासन है जो प्रभु ने यहोशू को दिया था—“न तो मैं तुझे धोखा दूँगा, और न तुझको छोड़ूँगा।”
निश्चय ही वह प्रतिज्ञा केवल यहोशू के लिये थी! नहीं, वह हमारे लिये है! “पवित्रशास्त्र की कोई भी बात किसी एक की निजी व्याख्या की नहीं होती।” सारा पवित्रशास्त्र हमारा है। देखो, परमेश्वर रात को सुलैमान को कैसे दर्शन देता है और कहता है, “जो कुछ तू चाहे कि मैं तुझे दूँ, वह माँग।” सुलैमान बुद्धि माँगता है। “ओह, वह तो सुलैमान है,” तुम कहते हो। सुनो!—“यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगो।” परमेश्वर ने सुलैमान को ऊपर से धन और यश भी दे दिया! क्या यह सुलैमान के लिये ही विशेष नहीं था? नहीं, क्योंकि सच्ची बुद्धि के विषय में कहा गया है, “उसके दाहिने हाथ में दीर्घायु, और उसके बाएँ हाथ में धन और महिमा हैं”—और क्या यह हमारे उद्धारकर्ता के इन वचनों से बहुत मिलता-जुलता नहीं, “पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी”? इस प्रकार, तुम देखते हो, प्रभु की प्रतिज्ञाओं की बहुत सी पूर्तियाँ होती हैं, और वे अपने भण्डार प्रार्थना की गोद में उँडेलने की बाट जोह रही हैं! क्या यह प्रार्थना को एक ऊँचे स्तर पर नहीं उठा देता, जब परमेश्वर अपने पवित्र लोगों की जीवनियाँ हम में दोहराने को तैयार है, जब वह अनुग्रह करने की बाट जोह रहा है, और हमें अपने उपकारों से लाद देने को?
मैं परमेश्वर के एक और सत्य का उल्लेख करूँगा जो हमें प्रार्थना करने को प्रेरित करना चाहिए, और वह यह है कि यदि हम माँगें, तो परमेश्वर हमें हमारे माँगे से कहीं अधिक देगा। अब्राहम ने परमेश्वर से माँगा कि इश्माएल उसकी दृष्टि में बना रहे। उसने सोचा, “निश्चय यही प्रतिज्ञा का वंश है: मैं यह आशा नहीं कर सकता कि सारा अपने बुढ़ापे में सन्तान जनेगी। परमेश्वर ने मुझसे एक वंश की प्रतिज्ञा की है, और निश्चय वह हागार का यही बालक होगा। आह, इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे!” परमेश्वर ने उसे वह भी दिया, और साथ में इसहाक भी दिया, और वाचा की सारी आशीषें भी! याकूब को देखो। वह प्रार्थना करने को घुटने टेकता है और प्रभु से माँगता है कि उसे खाने के लिये रोटी, और पहनने के लिये कपड़ा दे। परन्तु उसके परमेश्वर ने उसे क्या दिया? जब वह बेतेल लौटा, तब उसके पास दो दल थे, हजारों भेड़-बकरियाँ और ऊँट, और बहुत धन-सम्पत्ति! परमेश्वर ने उसकी सुन ली थी और उसकी विनती से कहीं अधिक काम किया था!
दाऊद के विषय में कहा गया है, “राजा ने तुझ से जीवन माँगा, और तूने जीवनदान दिया; तूने उसको युगानुयुग का जीवन दिया है,” हाँ, उसे केवल दीर्घायु ही नहीं दी, वरन् उसके पुत्रों के लिये पीढ़ी से पीढ़ी तक एक सिंहासन भी दिया, यहाँ तक कि दाऊद भीतर जाकर प्रभु के सम्मुख बैठा, प्रभु की भलाई से अभिभूत होकर। “अच्छा,” तुम कहते हो, “परन्तु क्या यह नये नियम की प्रार्थनाओं के विषय में भी सच है? “हाँ, नये नियम के विनती करनेवालों के साथ भी ऐसा ही है, चाहे वे पवित्र जन हों या पापी! वे लकवे के मारे हुए एक मनुष्य को मसीह के पास लाए, और उससे विनती की कि वह उसे चंगा करे। और उसने कहा, “हे पुत्र, तेरे पाप क्षमा हुए।” उसने यह तो नहीं माँगा था, है न? नहीं, परन्तु परमेश्वर हमारे माँगे से बड़ी वस्तुएँ देता है!
उस बेचारे, मरते हुए डाकू की दीन प्रार्थना सुनो, “हे प्रभु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।” यीशु उत्तर देता है, “आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा”! उसने ऐसे सम्मान का स्वप्न भी नहीं देखा था!
उड़ाऊ पुत्र की कहानी भी हमें यही सिखाती है। उसने यह कहने का निश्चय किया, “अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ, मुझे अपने एक मजदूर के समान रख ले।” उत्तर क्या मिलता है? “मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है; अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पाँवों में जूतियाँ पहनाओ।” एक बार माँगनेवाले के स्थान पर आ जाओ, और तुम्हें वह मिलेगा जो तुमने कभी माँगा नहीं और जिसे पाने की कभी सोची भी नहीं! यह पद बहुधा गलत उद्धृत किया जाता है—“परमेश्वर उन सब से कहीं अधिक काम कर सकता है जो हम माँग सकते हैं, या सोच भी सकते हैं।” यदि हम कुछ अधिक समझदार होते और हममें अधिक विश्वास होता, तो हम बड़ी से बड़ी वस्तुएँ माँग सकते थे, परन्तु परमेश्वर हमें हमारे माँगे से असीम रूप से अधिक देने को तैयार है!
इस समय मेरा विश्वास है कि यदि परमेश्वर की कलीसिया अभी प्रार्थना करने को तैयार होती, तो उसे अकल्पनीय आशीषें मिल सकती थीं। क्या तुमने कभी प्रकाशितवाक्य के 8वें अध्याय के उस अद्भुत चित्र पर ध्यान दिया है? वह ध्यान से देखने योग्य है। मैं उसके सन्दर्भ में उसकी व्याख्या करने का प्रयत्न नहीं करूँगा, केवल उस चित्र की ओर संकेत करूँगा, मानो वह दीवार पर अकेला टँगा हो। आगे पढ़ो—“जब उसने सातवीं मुहर खोली, तो स्वर्ग में आधे घण्टे तक सन्नाटा छा गया।” स्वर्ग में सन्नाटा!? न कोई स्तुतिगान, न कोई हालेलूय्याह, किसी स्वर्गदूत ने एक पंख तक न हिलाया! स्वर्ग में सन्नाटा!? क्या तुम इसकी कल्पना कर सकते हो? और देखो! तुम सात स्वर्गदूतों को परमेश्वर के सामने खड़े देखते हो, और उन्हें सात तुरहियाँ दी जाती हैं। वे वहाँ हाथ में तुरही लिये प्रतीक्षा करते हैं, परन्तु कोई ध्वनि नहीं होती! एक ऐसे अन्तराल में, जो प्रबल भावना जगाने के लिये पर्याप्त लम्बा था, परन्तु अधीरता रोकने के लिये पर्याप्त छोटा, न हर्ष का कोई स्वर उठा, न चेतावनी का!
अटूट, गहरा, भययोग्य सन्नाटा स्वर्ग में छाया रहा! समस्त गतिविधि के केन्द्र, स्वर्ग में, कार्य थम गया है। “फिर एक और स्वर्गदूत सोने का धूपदान लिये हुए आया, और वेदी के निकट खड़ा हुआ।” वह वहाँ खड़ा है, परन्तु कोई भेंट नहीं चढ़ाई जाती— सब कुछ ठहर गया है। इसे फिर से कौन चला सकता है? “और उसको बहुत धूप दिया गया कि सब पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के साथ सोने की उस वेदी पर, जो सिंहासन के सामने है चढ़ाएँ।” प्रार्थना प्रभु यीशु की योग्यता के साथ चढ़ाई जाती है! अब देखो क्या होता है—“और उस धूप का धुआँ पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं सहित स्वर्गदूत के हाथ से परमेश्वर के सामने पहुँच गया।” यही सारी बात की कुंजी है!
अब तुम देखोगे—स्वर्गदूत काम करने लगता है—वह धूपदान लेता है, उसमें वेदी की आग भरता है और उसे पृथ्वी पर फेंक देता है, “और गर्जन और शब्द और बिजलियाँ और भूकम्प होने लगे।” “और वे सातों स्वर्गदूत जिनके पास सात तुरहियां थीं, फूँकने को तैयार हुए।” अब सब कुछ चल पड़ा है! ज्योंही पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ मसीह की अनन्त योग्यता के धूप के साथ मिलकर वेदी पर से धुआँ बनकर उठने लगीं, त्योंही प्रार्थना प्रभावशाली हो गई! जीवित अंगारे मनुष्य-सन्तानों के बीच नीचे गिर पड़े, और ईश्वरीय विधान के स्वर्गदूत, जो पहले चुपचाप खड़े थे, अपनी तुरहियों का गर्जन-नाद फूँकते हैं, और प्रभु की इच्छा पूरी होती है! स्वर्ग का दृश्य, किसी हद तक, आज के दिन तक भी ऐसा ही है। धूप यहाँ लाओ! पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ यहाँ लाओ! उन्हें मसीह की योग्यता की आग से सुलगाओ, और सोने की वेदी पर उन्हें परमप्रधान के सामने धुआँ देने दो! तब हम प्रभु को काम करते देखेंगे, और उसकी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी पूरी होगी! परमेश्वर मसीह के निमित्त इन वचनों के साथ अपनी आशीष भेजे। आमीन।
अध्याय 5 पूरा हुआ
माँगो तो पाओगे