अध्याय 12 · 41 मिनट का पठन
प्रार्थना, चिन्ता का उपचार
“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।” फिलिप्पियों 4:6-7।
हम में आगे की सोचने की क्षमता है, परन्तु हमारी सब क्षमताओं के समान यह भी बिगड़ गई है, और प्रायः इसका दुरुपयोग होता है। मनुष्य के लिये यह भला है कि उसमें एक पवित्र चिन्ता हो और वह अपने जीवन की हर एक बात पर उचित ध्यान दे, परन्तु हाय, इसे एक अपवित्र चिन्ता बना लेना, और परमेश्वर के हाथ से ईश्वरीय प्रबन्ध का वह पद छीनने का प्रयत्न करना जो उसी का है, हमारा नहीं, बहुत ही सहज है। लूथर को पक्षियों के विषय में, और इस विषय में कि परमेश्वर किस प्रकार उनकी सुधि लेता है, बातें करना कितना प्रिय था! जब वह अपनी चिन्ताओं से घिरा होता, तब वह प्रायः पक्षियों से डाह किया करता था, क्योंकि वे ऐसा स्वतंत्र और सुखी जीवन बिताते थे। वह डॉक्टर गौरैया, डॉक्टर कस्तूरा और औरों की चर्चा करता है, जो आकर डॉक्टर लूथर से बातें करते और उसे बहुत सी भली बातें बताते थे! हे भाइयो और बहनो, तुम जानते हो कि वहाँ बाहर खुले में रहनेवाले पक्षी, जिनकी सुधि परमेश्वर लेता है, उन पक्षियों से कहीं अच्छी दशा में रहते हैं जिनकी सुधि मनुष्य लेता है। लन्दन की एक छोटी लड़की ने, जो गाँव में गई हुई थी, एक बार कहा, “माँ, उस बेचारी नन्ही चिड़िया को तो देखो। उसके पास कोई पिंजरा ही नहीं है!” मुझे तो यह बात चिड़िया की कोई हानि न जान पड़ती—और यदि तुम और मैं अपने पिंजरे, दानों के डिब्बे और पानी की कटोरी के बिना होते, तो परमेश्वर पर दीन निर्भरता के जीवन की महिमामय स्वतंत्रता में छोड़ दिए जाना हमारे लिये कोई बड़ी हानि न होती!
शारीरिक भरोसे का वही पिंजरा और दानों का वही डिब्बा, जिन्हें भरने में हम सदा परिश्रम करते रहते हैं, इस नश्वर जीवन की सारी व्याकुलता का कारण है। परन्तु जिसके पास अपने पंख फैलाकर उड़ जाने—और ईश्वरीय भरोसे के खुले मैदान में पहुँच जाने—का अनुग्रह है, वह दिन भर गा सकता है और सदा यही उसकी धुन रह सकती है—
“हे नश्वर मनुष्य, श्रम और शोक छोड़ दे; कल का प्रबन्ध परमेश्वर करता है।”
तो पाठ की शिक्षा यह है—“किसी भी बात की चिन्ता मत करो।” हमारी अंग्रेज़ी बाइबल में यहाँ जो शब्द, “केयरफुल,” आया है, आज उसका ठीक वही अर्थ नहीं रहा जो बाइबल के अनुवाद के समय था। कम से कम मेरे लिये उसका अर्थ वह नहीं जो अनुवादकों के लिये था। आज उस शब्द का अर्थ है सावधान, और मैं तो कहूँगा कि हमें सावधान रहना चाहिए। “सावधान रहो,” लड़कों और युवाओं के लिये, जब वे जीवन आरम्भ करते हैं, एक अच्छा पाठ है। परन्तु अनुवादकों के समय में यह शब्द, “चिन्ता-भरा,” के अर्थ में समझा जाता था, और उस अर्थ में हमें ऐसा नहीं होना चाहिए, अर्थात् चिन्ता से भरे हुए। पाठ का अर्थ है, व्याकुल मत हो—इस नश्वर जीवन की आवश्यकताओं के विषय में निरन्तर सोचते मत रहो। मैं इसे फिर से पढ़ूँगा, शब्द को थोड़ा खींचकर, और तब तुम इसका अर्थ समझ जाओगे—“किसी भी बात के लिये चिन्ता से भरे मत रहो।” हाय, कि परमेश्वर हमें सिखाए कि यहाँ जिस बुराई का निषेध किया गया है उससे कैसे बचें, और उस पवित्र निश्चिन्तता के साथ कैसे जीएँ जो मसीही जीवन की सच्ची शोभा है—जब हमारी सारी चिन्ता परमेश्वर पर डाल दी जाती है, और हम उसकी उस देखभाल में, जो वह अपने प्रबन्ध के द्वारा हमारी करता है, आनन्दित और मगन हो सकते हैं!
“आह,” कोई कहता है, “मैं चिन्ता किए बिना रह ही नहीं सकता।” अच्छा, तो आज रात का विषय इसी में तुम्हारी सहायता करने के लिये है कि तुम चिन्ता करना या कुढ़ना छोड़ दो। और पहले, यहाँ चिन्ता के विकल्प पर विचार करो। किसी भी बात की चिन्ता मत करो, परन्तु हर एक बात के लिये प्रार्थना करो—यही चिन्ता का विकल्प है, “प्रार्थना और विनती।” दूसरे, इस प्रार्थना के विशेष स्वभाव पर ध्यान दो, जो व्याकुलता का विकल्प बननेवाली है—“हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” और तब, मुझे आशा है, हमारे पास कुछ मिनट बचेंगे जिनमें हम इस प्रार्थना के मधुर फल पर विचार करें—“परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”
I. तो आरम्भ करें: यहाँ पहली बात है—चिन्ता या व्याकुलता का विकल्प।
मैं समझता हूँ कि हम में से बहुतों के विषय में यह सच है कि हमारी चिन्ताएँ अनगिनत हैं। यदि तुम एक बार चिन्तातुर, व्याकुल और कुढ़नेवाले बन गए, तो तुम अपनी चिन्ताओं को कभी गिन न सकोगे, चाहे तुम अपने सिर के बाल भले ही गिन लो। और चिन्ताएँ उन लोगों के लिये
कई गुना बढ़ जाया करती हैं जो चिन्ता से भरे रहते हैं, और जब तुम उतने चिन्ता से भर जाओ जितना तुम समझते हो कि भर सकते हो, तब तुम्हें निश्चय ही अपने चारों ओर चिन्ताओं की एक और फसल उगती मिलेगी। व्याकुलता की इस बुरी आदत में लिप्त रहने का परिणाम यह होता है कि वह जीवन पर प्रभुता कर लेती है, यहाँ तक कि जीवन के विषय में हमारी चिन्ता के कारण जीवन जीने योग्य ही नहीं रहता। चिन्ताएँ अनगिनत हैं, इसलिए तुम्हारी प्रार्थनाएँ भी उतनी ही अनगिनत हों। हर उस बात को, जो चिन्ता है, प्रार्थना में बदल दो। तुम्हारी चिन्ताएँ तुम्हारी प्रार्थनाओं का कच्चा माल बन जाएँ, और जैसे कीमियागर आशा करते थे कि वे मैल को सोने में बदल देंगे, वैसे ही तुम एक पवित्र कीमिया के द्वारा सचमुच उस बात को, जो स्वभाव से चिन्ता बन जाती, प्रार्थना के रूप में आत्मिक धन में बदल दो! हर एक व्याकुलता को पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो—और इस प्रकार उसे आशीष बना दो!
क्या तुम्हें कुछ पाने की चिन्ता है? चौकस रहो कि वह चिन्ता तुम्हें ही न पा ले! क्या तुम लाभ कमाना चाहते हो? ध्यान रखो कि अपने लाभों के द्वारा तुम जितना कमाते हो उससे अधिक गँवा न बैठो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, लाभ की उतनी ही चिन्ता रखो जितनी को प्रार्थना में बदलने का साहस तुम कर सको! जो वस्तु परमेश्वर से माँगने का साहस तुम नहीं कर सकते, उसकी लालसा ही मत करो। अपनी अभिलाषाओं को आत्मिक मापदण्ड से नापो, और इस प्रकार तुम लोभ जैसी किसी भी बात से बचे रहोगे। बहुतों पर चिन्ताएँ उनकी हानियों के कारण आती हैं—जो कुछ उन्होंने कमाया था, वह उनसे खो जाता है। अच्छा, यह ऐसा संसार है जिसमें खोने की प्रवृत्ति बनी ही रहती है। ज्वार के बाद भाटा आता है, और जाड़ा ग्रीष्म के फूलों को कुचल डालता है। यदि तुम भी दूसरे लोगों के समान खो बैठो, तो अचम्भा मत करो, परन्तु अपनी हानियों के विषय में प्रार्थना करो। उन्हें लेकर परमेश्वर के पास जाओ—और कुढ़ने के बदले उन्हें प्रभु की बाट जोहने का अवसर बना लो, और यह कहो—“यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है। मुझे बता दे, कि तू किस कारण मुझसे मुकद्दमा लड़ता है, और मैं तुझसे विनती करता हूँ, अपने दास को सदा इससे बचाए रख कि तू मुझसे जो कुछ भी खो जाने दे, उसके कारण मैं कभी तेरी शिकायत करूँ!”
कदाचित् तुम कहते हो कि तुम्हारी चिन्ता न तो कमाने के विषय में है और न खोने के विषय में, वरन् अपनी प्रतिदिन की रोटी के विषय में है। आह, ठीक है, उसके लिये तो तुम्हारे पास प्रतिज्ञाएँ हैं, तुम जानते ही हो! प्रभु ने कहा है, “तब तू देश में बसा रहेगा, और निश्चय तेरा पेट भरा जाएगा।” वह तुम्हें मधुर प्रोत्साहन देता है जब वह कहता है कि वह मैदान की घास को ऐसा वस्त्र पहनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्यों न पहनाएगा? और प्रभु यीशु तुम्हें आज्ञा देता है कि आकाश के पक्षियों को देखो, कि वे न बोते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तो भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। तो अपनी सारी चिन्ताओं को लेकर अपने परमेश्वर के पास जाओ! यदि तुम्हारा परिवार बड़ा है, आय थोड़ी है, और दोनों सिरे मिलाने और सब लोगों के निकट भली बातों का प्रबन्ध करने में बड़ी खींचतान होती है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर का द्वार खटखटाने के उतने ही अधिक बहाने हैं—अनुग्रह के सिंहासन के सामने बार-बार पाए जाने के उतने ही अधिक कारण हैं! मैं तुमसे विनती करता हूँ, इनका भला उपयोग करो। जब सचमुच किसी मित्र से मेरा कोई काम होता है, तब मैं निःसंकोच उसके पास जाता हूँ—और जब आवश्यकताएँ तुम पर दबाव डालें, तब तुम भी साहस के साथ परमेश्वर को पुकार सकते हो। किसी भी वस्तु के लिये व्याकुल चिन्ता करने के बदले, उसे तुरन्त नई लगन से प्रार्थना करने का कारण बना लो।
“आह,” कोई कहता है, “परन्तु मैं उलझन में हूँ। मैं नहीं जानता कि क्या करूँ।” अच्छा, तो प्रिय मित्र, जब तुम यह न बता सको कि दाहिनी ओर का मार्ग ठीक है, या बाईं ओर का, या सीधा आगे का, या तुम्हें लौट जाना चाहिए, तब तो तुम्हें निश्चय प्रार्थना करनी चाहिए! सच तो यह है कि जब तुम ऐसे कोहरे में हो कि अगला दीपक भी दिखाई न दे, तभी प्रार्थना करने का समय है। मार्ग तुम्हारे सामने अचानक ही साफ हो जाएगा। मुझे स्वयं प्रायः यह उपाय आजमाना पड़ा है—और मैं गवाही देता हूँ कि जब मैंने अपने आप पर भरोसा रखा, तब मैं बहुत बड़ा मूर्ख ठहरा! परन्तु जब मैंने परमेश्वर पर भरोसा रखा, तब वह मुझे सीधे ठीक मार्ग पर ले चला, और उसमें कोई भूल नहीं हुई! मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की सन्तान कठिन बातों की अपेक्षा सीधी-सादी बातों में प्रायः अधिक बड़ी भूलें करती है। तुम जानते हो कि इस्राएल के साथ क्या हुआ, जब वे गिबोनी अपने पुराने जूते और पुराने कपड़े पहने आए, और फफूँदी लगी वह रोटी दिखाई जिसके विषय में उन्होंने कहा कि हमने इसे अपने तन्दूरों से ताज़ा निकाला था। इस्राएलियों ने सोचा, “यह तो स्पष्ट मामला है। ये लोग परदेशी हैं, ये दूर देश से आए हैं, इसलिए हम इनसे वाचा बाँध सकते हैं।” उन्हें निश्चय था कि उनकी आँखों का प्रमाण सिद्ध करता है कि ये कनानी नहीं हैं, इसलिए उन्होंने परमेश्वर से सलाह नहीं ली! सारा मामला इतना सीधा लगा कि उन्होंने गिबोनियों से वाचा बाँध ली, जो उसके बाद सदा उनके लिये कष्ट का कारण बनी रही! यदि हम हर एक बात में प्रार्थना में परमेश्वर के पास जाएँ, तो हमारी उलझनें हमें हमारी सीधी-सादी बातों से अधिक भूलों में न डालेंगी—और सीधी और कठिन, दोनों प्रकार की बातों में परमप्रधान हमारी अगुवाई करेगा।
कदाचित् कोई दूसरा मित्र कहता है, “परन्तु मैं तो भविष्य के विषय में सोच रहा हूँ।” सचमुच? अच्छा, तो पहले मैं तुमसे यह पूछने की अनुमति चाहता हूँ कि भविष्य से तुम्हारा क्या काम? क्या तुम जानते हो कि दिन भर में क्या होगा? तुम यह सोचते रहे हो कि जब तुम बूढ़े हो जाओगे तब तुम्हारा क्या होगा, परन्तु क्या तुम्हें निश्चय है कि तुम कभी बूढ़े होगे भी? मैं एक मसीही स्त्री को जानता था जो इस बात को लेकर अपने आपको व्याकुल किया करती थी कि उसे गाड़ा कैसे जाएगा। उस प्रश्न ने मुझे कभी परेशान नहीं किया, और ऐसी और भी बहुत सी बातें हैं जिनके विषय में हमें अपने आपको व्याकुल करने की आवश्यकता नहीं। कुत्ते को पीटने के लिये लाठी तो सदा मिल ही जाती है, और यदि तुम्हें चिन्ता चाहिए, तो अपने ही प्राणों को पीटने के लिये कोई न कोई चिन्ता तुम्हें प्रायः मिल ही जाएगी! परन्तु यह तुम में से किसी के लिये भी एक घटिया धन्धा है। ऐसा करने के बदले, हर उस बात को, जो चिन्ता का विषय बन सकती है, प्रार्थना का विषय बना दो। तुम्हें चिन्ता का कोई विषय मिलने में देर न लगेगी, इसलिए प्रार्थना के विषय के बिना भी तुम देर तक न रहोगे। उस शब्द, “चिन्ता,” को काट दो, और उसके स्थान पर बस यह शब्द, “प्रार्थना,” लिख दो—और तब, चाहे तुम्हारी चिन्ताएँ अनगिनत हों, तुम्हारी प्रार्थनाएँ भी अनगिनत होंगी।
प्रिय मित्रो, फिर इस बात पर ध्यान दो कि अनुचित चिन्ता परमेश्वर के अधिकार-क्षेत्र में घुसपैठ है। यह सन्तान होने के बदले अपने आपको घर का पिता बना लेना है—यह उस दास के बदले, जिसकी रसद का प्रबन्ध स्वामी करता है, अपने आपको स्वामी बना लेना है। अब, यदि ऐसा करने के बदले तुम चिन्ता को प्रार्थना में बदल दो, तो कोई घुसपैठ न होगी, क्योंकि तुम ढिठाई का दोष लगे बिना प्रार्थना में परमेश्वर के पास आ सकते हो। वह तुम्हें प्रार्थना करने का निमंत्रण देता है। नहीं, यहाँ तो वह अपने सेवक के द्वारा तुम्हें आज्ञा देता है, “हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” एक बार फिर, चिन्ताएँ हमारे किसी काम की नहीं, और वे हमें बड़ी हानि पहुँचाती हैं। यदि तुम जितनी देर चाहो उतनी देर कुढ़ते रहो, तो भी तुम अपना कद एक इंच भी नहीं बढ़ा सकते, न अपने सिर पर एक और बाल उगा सकते हो, न एक बाल को भी उजला या काला कर सकते हो! उद्धारकर्ता हमसे यही कहता है, और वह पूछता है कि जब चिन्ता ऐसी छोटी-छोटी बातों में असफल रहती है, तो परमेश्वर के प्रबन्ध की बड़ी बातों में चिन्ता क्या कर सकती है? वह कुछ भी नहीं कर सकती! एक किसान अपने खेतों में खड़ा होकर कहने लगा, “मैं नहीं जानता कि हम सब का क्या होगा। यदि यह वर्षा ऐसे ही होती रही तो गेहूँ नष्ट हो जाएगा। जब तक कुछ अच्छा मौसम न हो, हमारी कोई फसल होगी ही नहीं।” वह हाथ मलता, कुढ़ता और अपने सारे घराने को बेचैन करता हुआ इधर-उधर टहलता रहा। और अपनी सारी व्याकुलता से वह धूप की एक किरण भी न ला सका—वह अपनी सारी चिड़चिड़ी बातों से एक भी बादल को फूँककर उड़ा न सका, और न अपने सारे कुड़कुड़ाने से वर्षा की एक बूँद को रोक सका।
तो जब तुम्हें उससे कुछ भी नहीं मिलता, तब अपने ही हृदय को कुतरते रहने से क्या लाभ? इसके अतिरिक्त, यह अपनी सहायता करने की हमारी सामर्थ्य को, और विशेष करके परमेश्वर की महिमा करने की हमारी सामर्थ्य को, निर्बल कर देती है। चिन्ता से भरा हृदय हमें बहुत सी बातों में ठीक-ठीक परखने से रोकता है। मैंने प्रायः यह उदाहरण दिया है (इससे अच्छा मैं नहीं जानता) कि हम एक दूरबीन लें, उस पर अपनी व्याकुलता की गर्म साँस छोड़ें, उसे अपनी आँख से लगाएँ, और तब कहें कि हमें बादलों के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता! निश्चय ही नहीं देगा, और जब तक हम उस पर साँस छोड़ते रहेंगे तब तक कभी दिखाई भी न देगा। यदि हम केवल शान्त, स्थिर, अपने आप पर संयम रखनेवाले और परमेश्वर के वश में रहनेवाले हों, तो हम ठीक काम करेंगे। कठिनाई के समय हम, जैसा कहा जाता है, “पूरे होश में” रहेंगे। वही मनुष्य सूझ-बूझ के बने रहने की आशा रख सकता है जिसके साथ परमेश्वर की उपस्थिति बनी रहती है। यदि हम प्रार्थना करना भूल जाएँ, तो क्या तुम्हें अचम्भा होता है कि हम सब हड़बड़ी और व्याकुलता में पड़ जाते हैं, और जो बात पहले सूझती है वही कर बैठते हैं—जो प्रायः सबसे बुरी होती है—इसके बदले कि हम तब तक ठहरें जब तक यह न देख लें कि क्या करना चाहिए, और तब उसे परमेश्वर की दृष्टि में भरोसे और विश्वास के साथ करें? चिन्ता, या व्याकुलता, हानिकारक है, परन्तु यदि तुम इस चिन्ता को प्रार्थना में बदल दो, तो हर एक व्याकुलता तुम्हारे लिये लाभदायक हो जाएगी।
प्रार्थना आत्मिक भवन को खड़ा करने की अद्भुत सामग्री है। प्रार्थना से हमारी अपनी उन्नति होती है। हम प्रार्थना से अनुग्रह में बढ़ते हैं, और यदि हम हर क्षण अपनी विनतियाँ लेकर परमेश्वर के पास आएँ, तो हम तेज़ी से बढ़नेवाले मसीही होंगे! आज भोर मैंने किसी से कहा, “मेरे लिये प्रार्थना करो, यह आवश्यकता का समय है,” और उसने उत्तर दिया, “जब से मैं जागी हूँ, मैंने और कुछ किया ही नहीं।” मैंने कई औरों से भी यही निवेदन किया है, और उन्होंने कहा है कि वे मेरे लिये प्रार्थना करते रहे हैं। मुझे बड़ा आनन्द हुआ, न केवल अपने लिये, क्योंकि मुझे उनकी प्रार्थनाओं से लाभ मिला था, वरन् उनके लिये भी, क्योंकि इससे वे निश्चय ही बढ़ेंगे! जब नन्हे पक्षी अपने पंख फड़फड़ाते रहते हैं, तब वे उड़ना सीख रहे होते हैं। उनकी नसें और मजबूत हो जाएँगी और थोड़े ही समय में पक्षी घोंसला छोड़ देंगे। पंखों का वह फड़फड़ाना ही एक शिक्षा है—और प्रार्थना करने का प्रयत्न—प्रार्थनाशील आत्मा का कराहना, आहें भरना और पुकारना—अपने आप में एक आशीष है! तो चिन्ता की इस हानिकारक आदत को छोड़ दो और प्रार्थना की इस धनी बनानेवाली आदत को अपना लो! देखो, इस प्रकार तुम कैसे दोहरा लाभ कमाओगे—पहले तो एक हानि से बचकर, और दूसरे, वह पाकर जो सचमुच तुम्हें और दूसरों को भी लाभ पहुँचाएगा!
फिर, चिन्ताएँ इस बात को भूल जाने का परिणाम हैं कि मसीह हमारे कितने निकट है। क्या तुमने ध्यान दिया कि प्रसंग कैसे चलता है? “प्रभु निकट है। किसी भी बात की चिन्ता मत करो।” प्रभु यीशु मसीह ने फिर आने की प्रतिज्ञा की है, और वह आज रात ही आ सकता है। वह किसी भी क्षण प्रगट हो सकता है! इसलिए पौलुस लिखता है, “प्रभु निकट है। किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” हाय, कि हम इस पृथ्वी पर ऐसे खड़े रह सकें मानो वह एक छाया मात्र हो! कि हम उन लोगों के समान जी सकें जो शीघ्र ही इस बेचारे क्षणभंगुर जीवन से निपट चुके होंगे! यदि हम हर एक पार्थिव वस्तु को बहुत ढीले हाथ से पकड़ें, तो हम चिन्ता, व्याकुलता और कुढ़न में न पड़े रहेंगे—वरन् प्रार्थना में लग जाएँगे, क्योंकि इस प्रकार हम उसे थाम लेंगे जो वास्तविक और ठोस है, और अपने पाँव उस अदृश्य पर जमा देंगे जो आखिरकार अनन्त है! हे प्रिय मित्रो, यह पाठ, जिसे मैंने तुम्हें बार-बार पढ़कर सुनाया है, अब तुम्हारे हृदयों में ऐसे गिरे जैसे कोई कंकड़ पहाड़ी झील में गिरता है, और जैसे ही वह भीतर जाए, वह तुम्हारे प्राण की ठीक सतह पर सान्त्वना के घेरे बना दे!
II. अब हमें पाठ को थोड़ा और ध्यान से देखना है, कि दूसरे स्थान पर हम यह देखें—इस प्रार्थना का विशेष स्वभाव। किस प्रकार की प्रार्थना है जो हमें चिन्ता से छुटकारा देगी?
अच्छा, पहले तो यह ऐसी प्रार्थना है जो हर एक बात से सम्बन्ध रखती है। “हर एक बात में” “तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” तुम सबसे छोटी बात के विषय में भी प्रार्थना कर सकते हो और सबसे बड़ी बात के विषय में भी—तुम न केवल पवित्र आत्मा के लिये प्रार्थना कर सकते हो, वरन् जूतों की एक नई जोड़ी के लिये भी प्रार्थना कर सकते हो। तुम जो रोटी खाते हो, जो पानी पीते हो, जो वस्त्र पहनते हो, उनके विषय में परमेश्वर के पास जा सकते हो, और हर एक बात के विषय में उससे प्रार्थना कर सकते हो। कोई रेखा मत खींचो और यह मत कहो, “यहाँ तक की बातें परमेश्वर की देखभाल में रहें।” अरे, तो फिर बाकी जीवन का तुम क्या करोगे? क्या वह एक प्रकार की नास्तिकता की मुरझा देनेवाली झुलस के नीचे बिताया जाएगा? परमेश्वर न करे! हाय, कि हम अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ परमेश्वर में जीएँ, क्योंकि हमारा अस्तित्व ऐसा है कि हम उसे बाँट नहीं सकते! हमारी देह, प्राण और आत्मा एक हैं, और जब तक परमेश्वर हमें इस संसार में रखता है और हमारी ऐसी आवश्यकताएँ हैं जो हमारी देह की दशा से उत्पन्न होती हैं,
तब तक हमें अपनी शारीरिक आवश्यकताएँ प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लानी ही चाहिए। और तुम पाओगे कि महान परमेश्वर इन बातों में तुम्हारी सुनेगा। यह मत कहो कि वे इतनी छोटी हैं कि वह उन पर ध्यान न दे—उसकी तुलना में तो हर वस्तु छोटी है! जब मैं सोचता हूँ कि वह कैसा महान परमेश्वर है, तब मुझे ऐसा लगता है कि हमारा यह बेचारा छोटा-सा संसार ब्रह्माण्ड के समुद्र-तट पर रेत का बस एक तुच्छ कण है—और किसी भी ध्यान के योग्य नहीं। सारी पृथ्वी प्रकृति के विशाल जगत में एक बिन्दु मात्र है, और यदि परमेश्वर उस पर ध्यान देने के लिये झुकता है, तो वह थोड़ा और नीचे झुककर हम पर भी ध्यान दे सकता है! और वह ऐसा करता भी है, क्योंकि वह कहता है, “तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं।” इसलिए हर एक बात में तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।
जो प्रार्थना हमें चिन्ता से बचाती है वह ऐसी प्रार्थना है जो बार-बार की जाती है—“हर एक बात में प्रार्थना और विनती के द्वारा।” परमेश्वर से प्रार्थना करो और फिर प्रार्थना करो—“प्रार्थना और विनती के द्वारा।” यदि प्रभु पहली बार तुम्हें उत्तर न दे, तो बहुत कृतज्ञ हो कि तुम्हारे पास फिर से प्रार्थना करने का एक अच्छा कारण है! यदि वह दूसरी बार भी तुम्हारी विनती पूरी न करे, तो विश्वास करो कि वह तुमसे इतना प्रेम करता है कि वह तुम्हारा स्वर फिर सुनना चाहता है! और यदि वह तुम्हें तब तक बाट जोहने दे जब तक तुम सात बार उसके पास न जा चुको, तो अपने आप से कहो, “अब मैं जानता हूँ कि मैं एलिय्याह के परमेश्वर की आराधना करता हूँ, क्योंकि एलिय्याह के परमेश्वर ने आशीष देने से पहले उसे सात बार फिर-फिर जाने दिया था।” परमेश्वर के दूत से मल्लयुद्ध करने की अनुमति पाने को सम्मान समझो! परमेश्वर अपने राजकुमारों को इसी रीति से बनाता है! यदि याकूब पहली ही बार माँगने पर दूत से आशीष पा लेता तो वह कभी इस्राएल न बनता—परन्तु जब उसे तब तक मल्लयुद्ध करते रहना पड़ा जब तक वह प्रबल न हुआ, तब वह परमेश्वर के सामने एक राजकुमार बन गया! जो प्रार्थना चिन्ता को मार डालती है, वह लगातार और आग्रह के साथ की जानेवाली प्रार्थना है।
फिर, यह समझ-बूझकर की जानेवाली प्रार्थना है—“तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” मैंने एक मुसलमान के विषय में सुना जो, मेरे विचार में, प्रतिदिन छः घण्टे प्रार्थना में बिताता था, और कहीं ऐसा न हो कि जहाज़ पर रहते हुए वह सो जाए, इसलिए वह सीधा खड़ा रहता था और उसके आगे आर-पार केवल एक रस्सी तनी रहती थी, जिससे वह उसके सहारे टिक सके। और यदि वह सो जाता, तो गिर पड़ता। उसका उद्देश्य यह था कि जिसे वह प्रार्थना कहता था, उसमें छः घण्टे लगा रहे। “अच्छा,” मैंने किसी से कहा जो उसे जानता था, और जिसने उसे नील नदी पर उसकी नाव में देखा था, “वह कैसी प्रार्थना थी?” “अरे,” मेरे मित्र ने उत्तर दिया, “वह बार-बार यही दोहराता रहता था, ‘परमेश्वर के सिवा कोई परमेश्वर नहीं, और मुहम्मद परमेश्वर का नबी है,’ वही एक बात बार-बार, बार-बार, बार-बार।” मैंने कहा, “क्या उसने कुछ माँगा?” “अरे, नहीं!” “क्या वह परमेश्वर से कुछ देने की विनती कर रहा था?” “नहीं, वह बस कुछ शब्दों को लगातार दोहराता रहता था, ठीक वैसे ही जैसे कोई जादूगरनी कोई मंत्र दोहराती है।”
क्या तुम समझते हो कि प्रार्थना करने की उस रीति में कुछ है? यदि तुम घुटनों के बल होकर बस कोई रटा हुआ सूत्र दोहराते हो, तो वह केवल मुँह भर शब्द होंगे। ऐसी प्रार्थना की परमेश्वर को क्या परवाह? “तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” यही सच्ची प्रार्थना है! परमेश्वर जानता है कि तुम्हारे निवेदन क्या हैं, परन्तु तुम्हें उससे ऐसे प्रार्थना करनी है मानो वह न जानता हो। तुम्हें अपने निवेदन उसके सम्मुख उपस्थित करने हैं—उन्हें प्रगट करना है—इसलिए नहीं कि प्रभु नहीं जानता, वरन् कदाचित् इसलिए कि तुम नहीं जानते। और जब तुम अपने निवेदन उस पर प्रगट कर दोगे, जैसा पाठ तुमसे कहता है, तब तुमने उन्हें अपने आप पर भी अधिक स्पष्ट रीति से प्रगट कर दिया होगा। जब तुमने समझ-बूझकर माँगा हो, यह जानते हुए कि तुमने क्या माँगा है, और यह जानते हुए कि तुमने उसे क्यों माँगा है, तब कदाचित् तुम रुककर अपने आप से कहोगे, “नहीं, आखिरकार मुझे वह विनती नहीं करनी चाहिए।” कभी-कभी, जब तुम किसी ऐसी वस्तु के लिये प्रार्थना करते रहे हो जो परमेश्वर तुम्हें नहीं देता, तो हो सकता है कि तुम्हारे मन में चुपके से यह निश्चय समा जाए कि तुम ठीक मार्ग पर नहीं हो, और तुम्हारी प्रार्थना का वह परिणाम अपने आप में तुम्हारा भला करेगा, और तुम्हारे लिये आशीष ठहरेगा।
परन्तु तुम्हें अपने निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित करते हुए प्रार्थना करनी है। अर्थात्, सीधी-सादी भाषा में, जो तुम्हें चाहिए वह कह दो, क्योंकि यही सच्ची प्रार्थना है। अकेले में जाओ और प्रभु को बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए—उसके सामने अपना मन उण्डेल दो। यह मत सोचो कि परमेश्वर को किसी लच्छेदार भाषा की आवश्यकता है! नहीं, तुम्हें अपनी प्रार्थना-पुस्तक लेने ऊपर दौड़कर जाने और कोई निर्धारित प्रार्थना खोजने की आवश्यकता नहीं—यदि तुम सचमुच प्रार्थना कर रहे हो, तो कोई ऐसी निर्धारित प्रार्थना ढूँढ़ने में तुम्हें बहुत समय लगेगा जो तुम पर ठीक बैठे! जो तुम्हें चाहिए उसके लिये ऐसे ही प्रार्थना करो जैसे तुम अपनी माँ को या अपने सबसे प्रिय मित्र को अपनी आवश्यकता बता रहे हो। उसी रीति से परमेश्वर के पास जाओ, क्योंकि यही वास्तविक प्रार्थना है, और यही वह प्रार्थना है जो तुम्हारी चिन्ताओं को भगा देगी।
तो, प्रिय मित्रो, फिर, जो प्रार्थना चिन्ता से छुटकारा दिलाती है वह परमेश्वर के साथ संगति है। यदि तुमने परमेश्वर से बात नहीं की, तो तुमने सचमुच प्रार्थना नहीं की। किसी छोटे बच्चे के विषय में यह जाना गया है (मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारे बच्चों ने भी ऐसा किया होगा) कि उसने जाकर एक चिट्ठी नाली की जाली में डाल दी, और निश्चय ही इस प्रकार डाली गई चिट्ठी का कभी कोई उत्तर नहीं आया। यदि चिट्ठी डाक-पेटी में न डाली जाए, जिससे वह उस व्यक्ति तक पहुँचे जिसके नाम वह लिखी गई है, तो उसका क्या लाभ? इसी प्रकार प्रार्थना परमेश्वर के साथ वास्तविक सम्पर्क है। तुम्हें यह अनुभव करना चाहिए कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है, नहीं तो तुम प्रार्थना नहीं कर सकते। वह तुम्हारे लिये एक वास्तविकता हो, एक जीवित वास्तविकता, और तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि वह प्रार्थना सुनता है, और तब तुम्हें उससे बात करनी चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि जो कुछ तुमने उससे माँगा, वह तुमने पा लिया है—और इस प्रकार वह तुम्हें मिलेगा। उसने विश्वास के साथ की गई प्रार्थना का आदर करने में आज तक कभी चूक नहीं की। वह तुम्हें कुछ समय तक बाट जोहने दे सकता है, परन्तु देर इनकार नहीं है, और उसने प्रायः ऐसी प्रार्थना का उत्तर, जिसमें चाँदी माँगी गई थी, सोना देकर दिया है! हो सकता है उसने पार्थिव धन देने से इनकार किया हो, परन्तु उसने उससे दस हज़ार गुना मूल्य का स्वर्गीय धन दिया है—और विनती करनेवाला उस अदला-बदली से बढ़कर सन्तुष्ट हुआ है! “तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।”
मैं जानता हूँ कि जब तुम संकट में होते हो तब क्या करते हो—तुम अपने पड़ोसी के पास जाते हो, परन्तु तुम्हारा पड़ोसी ऐसे काम के लिये तुम्हें इतनी बार देखना नहीं चाहता। कदाचित् तुम अपने भाई के पास जाते हो, परन्तु एक पद है जो तुम्हें चिताता है कि अपनी विपत्ति के दिन, अपने भाई के घर न जाना। जब तुम तंगी में हो तब तुम किसी मित्र के यहाँ बहुत बार जा सकते हो—वह तुम्हें देखकर तब तक बड़ा प्रसन्न हो सकता है जब तक वह यह न सुन ले कि तुम किस काम से आए हो! परन्तु यदि तुम अपने परमेश्वर के पास जाओ, तो वह तुम्हारे साथ कभी रूखा बर्ताव न करेगा। वह कभी न कहेगा कि तुम बहुत बार आते हो। इसके विपरीत, वह तो तुम्हें इस कारण डाँटेगा कि तुम उसके पास पर्याप्त बार नहीं आते!
एक शब्द है जिसे मैं अभी छोड़ गया था, क्योंकि मैं उसे इस विषय पर अपनी अन्तिम बात के लिये रख छोड़ना चाहता था— “तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” अब इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि जो प्रार्थना चिन्ता को मार डालती है वह ऐसी प्रार्थना है जो प्रसन्नता से, आनन्द से, धन्यवाद के साथ माँगती है। “हे प्रभु, मैं कंगाल हूँ। मुझे अपनी कंगाली के लिये तुझे धन्य कहने दे, और तब, हे प्रभु, क्या तू मेरी सब घटियाँ पूरी न करेगा?” प्रार्थना करने की यही रीति है। “हे प्रभु, मैं रोगी हूँ। इस क्लेश के लिये मैं तुझे धन्य कहता हूँ, क्योंकि मुझे निश्चय है कि इसका अर्थ मेरे लिये कोई भलाई है। अब, मैं तुझसे विनती करता हूँ, कृपा करके मुझे चंगा कर!” “हे प्रभु, मैं बड़े संकट में हूँ, परन्तु मैं इस संकट के लिये तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इसमें एक आशीष छिपी है, चाहे उसका लिफ़ाफ़ा काली किनारीवाला ही क्यों न हो! हे प्रभु, मेरे संकट में से मुझे पार कर!” यही वह प्रार्थना है जो चिन्ता को मार डालती है—“विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ।” इन दोनों वस्तुओं को भली भाँति मिलाओ! एक ड्राम—नहीं, दो ड्राम प्रार्थना—प्रार्थना और विनती, फिर एक ड्राम धन्यवाद! इन्हें एक साथ घोंटो और ये चिन्ता की एक धन्य औषधि बन जाएँगी। प्रभु हमें औषधि बनानेवाले की यह पवित्र कला बरतना सिखाए!
III. मैं इस तीसरी बात के साथ समाप्त करता हूँ—इस प्रार्थना का मधुर फल—“तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”
यदि तुम बुरी व्याकुलता में लिप्त रहने के बदले इस रीति से प्रार्थना कर सको, तो परिणाम यह होगा कि एक असाधारण शान्ति चुपके से तुम्हारे हृदय और मन पर छा जाएगी। असाधारण, क्योंकि वह “परमेश्वर की शान्ति” होगी। परमेश्वर की शान्ति क्या है? अनन्त आनन्दमय परमेश्वर की अविचल स्थिरता, पूर्ण रूप से सन्तुष्ट परमेश्वर का अनन्त चैन! यही तुम्हारे हृदय और मन पर अधिकार कर लेगी। ध्यान दो कि पौलुस उसका वर्णन कैसे करता है—“परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है।” दूसरे लोग उसे नहीं समझेंगे। वे यह नहीं समझ पाएँगे कि तुम इतने शान्त कैसे रह सकते हो। इससे भी बढ़कर, तुम उन्हें बता भी नहीं सकोगे, क्योंकि यदि वह सारी समझ से परे है, तो निश्चय ही वह सारे वर्णन से भी परे है! और इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है—तुम स्वयं भी उसे नहीं समझोगे!
वह ऐसी शान्ति होगी जो तुम्हारे लिये अथाह और अपरिमित होगी। जब एक शहीद मसीह के लिये जलाया जानेवाला था, तब उसने उस न्यायाधीश से, जो चिता सुलगाने की आज्ञा दे रहा था, कहा, “क्या आप आकर अपना हाथ मेरे हृदय पर रखेंगे? “न्यायाधीश ने ऐसा ही किया। “क्या यह तेज़ी से धड़क रहा है?” शहीद ने पूछा। “क्या मुझमें भय का कोई चिह्न दिखता है?” “नहीं,” न्यायाधीश ने कहा। “अब अपना हाथ अपने ही हृदय पर रखिए और देखिए कि क्या आप मुझसे अधिक उत्तेजित नहीं हैं।” परमेश्वर के उस जन के विषय में सोचो जो, जिस भोर उसे जलाया जाना था, ऐसी गहरी नींद में सोया हुआ था कि उसे जगाने के लिये उन्हें झकझोरना पड़ा—उसे जलाए जाने के लिये उठना पड़ा! और यह जानते हुए भी कि ऐसा ही होना है, उसे परमेश्वर पर ऐसा भरोसा था कि वह मीठी नींद सोया। यही “परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है” है। दियोक्लेशियन के उन पुराने सतावों में, जब शहीद जंगली पशुओं से फाड़े जाने के लिये रंगशाला में लाए जाते थे—जब एक को लाल तपती हुई लोहे की कुर्सी पर बैठाया गया, और दूसरे पर शहद पोता गया कि ततैये और मधुमक्खियाँ डंक मार-मारकर उसे मार डालें—तब भी वे कभी नहीं डगमगाए!
उस वीर पुरुष के विषय में सोचो जिसे जीवित भूनकर मार डालने के लिये लोहे की जाली पर रखा गया, और जिसने अपने सतानेवालों से कहा, “तुमने मेरी एक ओर तो सेंक ली। अब मुझे दूसरी ओर पलट दो।” ऐसी परिस्थितियों में यह शान्ति क्यों? यह “परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है” थी। आजकल हमें उस प्रकार दुःख नहीं उठाना पड़ता, परन्तु यदि कभी कुछ वैसी नौबत आ पड़े, तो यह अद्भुत है कि एक मसीही कैसी शान्ति का आनन्द लेता है! एक बड़ी आँधी के बाद, स्वामी नाव के अगले भाग में खड़ा हुआ और उसने हवाओं से कहा, “थम जा।” और हम पढ़ते हैं, “बड़ा चैन हो गया।” क्या तुमने कभी इसका अनुभव किया है? यदि तुमने हर एक बात में अपने निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित करने की यह पवित्र कला सीख ली है, और परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रख रही है, तो आज रात तुम इसका अनुभव कर रहे हो।
यह धन्य शान्ति हमारे हृदयों और विचारों की रखवाली करती है—यह एक पहरेदार शान्ति है। यूनानी शब्द से गढ़ में बैठी सैनिक-टुकड़ी का भाव निकलता है। क्या यह विचित्र बात नहीं कि यहाँ एक सैनिक शब्द बरता गया है, और यह शान्ति ही है जो हृदय और मन की पहरेदार का काम करती है? परमेश्वर की सन्तान की रक्षा करनेवाली परमेश्वर की शान्ति ही है—विचित्र परन्तु सुन्दर उपमा! मैंने सुना है कि भय मसीही का घर सँभालनेवाला है। अच्छा, कुत्तों को बाहर रखने के लिये भय एक अच्छा पहरेदार हो सकता है, परन्तु उसका भण्डार भरा नहीं रहता! परन्तु शान्ति, चाहे वह निर्बलता जान पड़े, बल का सार है, और जब वह रखवाली करती है, तब वह हमें खिलाती भी है और हमारी सब आवश्यकताएँ पूरी करती है।
यह ऐसी शान्ति भी है जो हमें यीशु से जोड़ती है—“परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को सुरक्षित रखेगी।” अर्थात्, तुम्हारे स्नेहों और तुम्हारे विचारों को, तुम्हारी अभिलाषाओं और तुम्हारी बुद्धि को—तुम्हारे हृदय को—कि वह न डरे।
तुम्हारे विचारों को, अर्थात् तुम्हारे मन को, कि वह किसी प्रकार की उलझन को न जाने—“परमेश्वर की शान्ति तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।” यह सब “मसीह यीशु में” है, और इसलिए यह हमारे लिये दोगुना मधुर और बहुमूल्य है!
हे मेरे प्रिय सुननेवालो, तुम में से कुछ लोग बृहस्पतिवार की रातों को यहाँ आते हैं, और तुम परमेश्वर की इस शान्ति के विषय में कुछ भी नहीं जानते, और कदाचित् तुम्हें अचम्भा होता है कि हम मसीही लोग अपने धर्म को लेकर इतनी धूम क्यों मचाते हैं! आह, यदि तुम जानते, तो कदाचित् तुम हमसे भी अधिक धूम मचाते, क्योंकि यदि परलोक न भी होता—और हम जानते हैं कि परलोक है—तो भी प्रार्थना में परमेश्वर के पास जाने और अपनी सारी चिन्ता उस पर डाल देने की धन्य आदत हमें इस जीवन में भी अत्यन्त आनन्द से जीने में सहायता करती है! हम लौकिकतावाद में विश्वास नहीं करते, परन्तु यदि करते भी, तो पार्थिव जीवन के लिये परमेश्वर के लिये जीने और परमेश्वर में जीने जैसी कोई तैयारी न होती! यदि तुम्हारा परमेश्वर एक नकली परमेश्वर है, और तुम बस चर्च या चैपल चले जाते हो, और अपनी प्रार्थना-पुस्तक या अपनी भजन-पुस्तक साथ ले जाते हो, और इसलिए समझते हो कि तुम मसीही हो, तो तुम अपने आपको धोखा दे रहे हो! परन्तु यदि तुम्हारा परमेश्वर जीवित परमेश्वर है, और उसके साथ तुम्हारी सच्ची संगति है, और तुम निरन्तर, एक आदत के रूप में, सर्वशक्तिमान के पंखों की छाया तले रहते हो, तो तुम ऐसी शान्ति का आनन्द लोगे जो दूसरों को चकित करेगी और तुम्हें स्वयं भी विस्मित करेगी, अर्थात्, “परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है।” हे मेरे प्रिय सुननेवालो, परमेश्वर मसीह के निमित्त यह तुम्हें प्रदान करे! आमीन।
सी. एच. स्पर्जन द्वारा व्याख्या: फिलिप्पियों 4
पद 1. इसलिए हे मेरे प्रिय भाइयों, जिनमें मेरा जी लगा रहता है, जो मेरे आनन्द और मुकुट हो, हे प्रिय भाइयों, प्रभु में इसी प्रकार स्थिर रहो। तुम जानते हो कि फिलिप्पी की कलीसिया प्रेरित के हृदय को बहुत प्रिय थी। वह उस समय को कभी नहीं भूल सकता था जब उसने और सीलास ने नदी के किनारे उन स्त्रियों के साथ प्रार्थना की थी, और बाद में बन्दीगृह में प्रार्थना करते हुए परमेश्वर के भजन गाए थे, और कैदी उनकी सुन रहे थे। लुदिया और उसका घराना, और फिलिप्पी का दरोगा, फिलिप्पी में पौलुस के काम के पहले फलों में से थे, और उसके और उस स्थान की कलीसिया के सदस्यों के बीच सदा बड़ा घनिष्ठ प्रेम बना रहा। वे उसकी चिन्ता करते थे और वह उनकी चिन्ता करता था। इस एक ही पद में वह दो बार उन्हें अपने “प्रिय” कहता है। वह कहता है कि उनमें “उसका जी लगा रहता है, वह उनसे आमने-सामने मिलने को तरसता है, वह चाहता है कि वे प्रभु में ऊँचे से ऊँचे अंश तक आनन्दित रहें। इसलिए वह कहता है, “हे मेरे प्रिय भाइयों, जिनमें मेरा जी लगा रहता है, जो मेरे आनन्द हो।” उसके लिये उनके विषय में यह सोचना भी कितना बड़ा आनन्द था कि वे उसकी आत्मिक सन्तान हैं, और विशेष करके यह देखना कि वे कैसी भक्ति और उदारता के साथ आचरण करते थे। हाँ, और वह उन्हें अपना “मुकुट” कहता है—एक विजय-माला जो उसने आत्मिक मल्लयुद्ध में जीती थी! मसीही के द्वारा मन फिराए हुए लोग यहाँ उसका आनन्द हैं, और वे स्वर्ग में सदा के लिये उसका मुकुट होंगे। पौलुस ने इन फिलिप्पियों से कहा, “प्रभु में स्थिर रहो।” स्थिर रहना बहुत सरल बात जान पड़ती है, परन्तु जो ऐसा करने का प्रयत्न करते हैं वे जानते हैं कि यह कितना कठिन काम है।
2. मैं यूओदिया से निवेदन करता हूँ, और सुन्तुखे से भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें। केवल दो स्त्रियाँ थीं जिनमें आपस में अनबन हो गई थी, परन्तु प्रेरित सिद्ध एकता के लिये इतना उत्सुक है कि वह उनमें से हर एक के लिये मानो अलग से एक “निवेदन” रखता है। वह यह नहीं कहता कि कौन ठीक थी और कौन गलत, परन्तु वह चाहता है कि वे “प्रभु में एक मन” रहें। छोटे-छोटे मतभेद, चाहे वे कलीसिया के साधारण सदस्यों के बीच ही क्यों न हों, परमेश्वर के आत्मा के काम में बाधा डाल सकते हैं। पवित्र आत्मा कबूतर के समान है—और कबूतरों को शान्त स्थान प्रिय होते हैं—वे वहाँ नहीं आते जहाँ शोर और झगड़ा होता है। हाय, आओ हम एक दूसरे के प्रति प्रेम बढ़ाएँ! और यदि किसी समय किसी बात में हमारे बीच मतभेद हुआ हो, तो हम यह समझें कि हम आज रात पौलुस को यह कहते सुन रहे हैं, “मैं यूओदिया से निवेदन करता हूँ, और सुन्तुखे से भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें।” मेरी बहनो, मेल कर लो! मेरे भाइयो, मेल कर लो! झगड़ा चाहे जो हो, उसे समाप्त करो और “प्रभु में एक मन रहो।” एक ही बहुमूल्य लहू से मोल लिए गए, एक ही सिद्ध धार्मिकता का वस्त्र पहने हुए, एक ही स्वर्ग के मार्ग पर चलते हुए, “प्रभु में एक मन रहो।”
3. हे सच्चे सहकर्मी, मैं तुझ से भी विनती करता हूँ, कि तू उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं। हम नहीं जानते कि यह “सच्चा सहकर्मी” कौन था। बहुत सम्भव है कि वह इपफ्रुदीतुस था, जो यह पत्री फिलिप्पी को ले गया था। वह जो भी रहा हो, वह कोई ऐसा व्यक्ति था जिसने पौलुस के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर, मानो एक ही जूए में, काम किया था। यदि दो बैल एक ही जूआ उठाएँ और फिर भी उनमें मेल न हो, तो वे एक दूसरे के लिये बड़ी असुविधा खड़ी कर देते हैं। यदि एक लेटना चाहे और दूसरा खड़ा होना चाहे, या यदि एक दूसरे से तेज़ चले, तो जूआ दुगुना कष्टदायक हो जाता है। पौलुस यहाँ किसी को अपना “सच्चा सहकर्मी” कहता है—और वह उससे कहता है, “उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में परिश्रम किया।”
प्रभु यीशु मसीह की सेवा में स्त्रियों ने सदा कैसा प्रतिष्ठित स्थान पाया है, और यहाँ पौलुस उनके विषय में कहता है कि उन्होंने सुसमाचार में उसके साथ परिश्रम किया! निश्चय ही लुदिया उनमें से एक रही होगी। “क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।” कुछ विद्वान टीकाकारों के अनुसार किसी मनुष्य का नाम कुछ समय के लिये जीवन की पुस्तक में हो सकता है, परन्तु वह मिटाया भी जा सकता है। यदि उनकी शिक्षा सच हो, तो वह पुस्तक बहुत कटी-पिटी और धब्बों से भरी होगी। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं ऐसी किसी पुस्तक पर विश्वास नहीं करता! यदि प्रभु यीशु मसीह ने मेरा नाम जीवन की पुस्तक में, छुड़ाए हुओं की उस महान पारिवारिक वंशावली में, लिख दिया है, तो मैं नरक के सब शैतानों को चुनौती देता हूँ कि वे उसे कभी मिटाकर दिखाएँ!
4. प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो। यदि तुम कभी प्रभु में आनन्दित होते हो, तो तुम सदा प्रभु में आनन्दित रह सकते हो, क्योंकि वह सदा एक-सा है, और सदा अनुग्रहकारी है! परमेश्वर में आनन्दित होने का कारण एक समय में भी उतना ही है जितना दूसरे समय में, क्योंकि वह कभी नहीं बदलता।
5. तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो। हमारी अंग्रेज़ी बाइबल में जिस शब्द का अनुवाद, “संयम,” किया गया है, वह यूनानी में ऐसा शब्द है जिसका अंग्रेज़ी में अनुवाद करना बहुत कठिन है। उसका अर्थ वह संयम नहीं जिस अर्थ में कुछ लोग यह शब्द बरतते हैं, क्योंकि वे तो, मेरी समझ में, उसे लगभग एक शापित शब्द बना देते हैं। “तुम्हारी कोमलता”—तुम्हारी नम्रता, तुम्हारा मान जाना, तुम्हारी सहनशीलता—“सब मनुष्यों पर प्रगट हो।” इसका अर्थ यही है। अपने अधिकारों को बहुत दूर तक मत खींचो—जो तुम उचित रीति से माँग सकते हो उससे कुछ पहले ही रुक जाओ, और जब किसी समय तुम अपने स्वभाव में थोड़ी उग्रता अनुभव करो, तो अपने आपको रोको—अपने आपको वश में रखो, सहो और सहते रहो। अपने अधिकारों की रक्षा करने में उतनी दूर मत जाओ जितनी दूर तुम जा सकते हो, न उतनी दूर भी जितनी दूर कुछ लोग समझते हैं कि तुम्हें जाना चाहिए। तुम्हारी कोमलता, तुम्हारा झुक जाने का स्वभाव, सब मनुष्यों पर प्रगट हो।
5. प्रभु निकट है। मसीह आ रहा है—तुम अपने आपको क्यों व्याकुल करते हो? प्रभु तुम्हारी सहायता करने को तुम्हारे निकट है—तुम इतने अधिक चिन्तित क्यों हो? तुम इस वर्तमान क्षणिक परीक्षा से इतने क्यों बह जाते हो? “प्रभु निकट है।”
6. किसी भी बात की चिन्ता मत करो। किसी भी बात के लिये व्याकुल होकर चिन्ता मत करो! फेबर के साथ गाओ—
“हे धन्य प्रभु, मुझे कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि मेरी सारी चिन्ताएँ तेरी हैं।”
6-8. परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी। इसलिए, हे भाइयों, जो-जो बातें सत्य हैं, और जो-जो बातें आदरणीय हैं, और जो-जो बातें उचित हैं, और जो-जो बातें पवित्र हैं, और जो-जो बातें सुहावनी हैं, और जो-जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात्, जो भी सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो। इस प्रकार की हर एक बात तुमसे सम्बन्ध रखती है, इसलिए जहाँ तक हो सके उसकी सहायता करो। हर उस उद्देश्य का पक्ष लो जिसका इस प्रकार वर्णन किया जा सके। यदि वह सत्य, खराई, श्रद्धा, धर्म, शुद्धता, पवित्रता का समर्थन करता है—तो उसी पक्ष में रहो। यदि कोई बात इसके उलटी हो, तो उससे कोई सम्बन्ध मत रखो, परन्तु यदि संसार में कोई ऐसा आन्दोलन है जो उन बातों को आगे बढ़ाने में सहायता करेगा जो सत्य, आदरणीय, उचित, पवित्र, सुहावनी और मनभावनी हैं, तो “उन्हीं पर ध्यान लगाया करो,” और उन पर ऐसे ध्यान लगाओ कि मनुष्यों के बेटों और बेटियों के बीच उनका प्रभाव बढ़े!
9. जो बातें तुम ने मुझसे सीखी, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्हीं का पालन किया करो। जब कोई प्रचारक ऐसा कह सके तो भला है—जब उसे यह न कहना पड़े, “जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो, जैसा मैं करता हूँ वैसा नहीं,” परन्तु जब वह प्रेरित के समान कह सके—“जो बातें तुम ने मुझसे सीखी, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्हीं का पालन किया करो।”
9. तब परमेश्वर जो शान्ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा। शान्ति का सोता परमेश्वर उनके साथ सदा रहता है जो उसके प्रिय पुत्र को ग्रहण करते हैं और जो उसके सुसमाचार की सहायता करते हैं। सच्चे विश्वासियों के विशेषाधिकारों में से एक यह है कि शान्ति का सोता परमेश्वर निरन्तर उनके साथ रहेगा।
10. मैं प्रभु में बहुत आनन्दित हूँ कि अब इतने दिनों के बाद तुम्हारा विचार मेरे विषय में फिर जागृत हुआ है; निश्चय तुम्हें आरम्भ में भी इसका विचार था, पर तुम्हें अवसर न मिला। पौलुस रोम में बन्दी था, और इन फिलिप्पियों ने चन्दा इकट्ठा किया था। और उन्होंने प्रेरित की कंगाली में उसकी सहायता करने के लिये इपफ्रुदीतुस को उसके साथ भेजा था, इसलिए उसने उनसे कहा, “तुमने पहले भी मेरी सुधि ली थी; परन्तु कुछ समय तक तुम्हें मेरी सहायता करने का अवसर न मिला, और अब तुमने फिर मेरी सुधि ली है, इसलिए मैं प्रभु में बहुत आनन्दित हूँ।”
11. यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूँ; क्योंकि मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ। क्या यह विद्या का एक उत्तम अंश नहीं? पौलुस एक विद्वान पुरुष था, और यदि तुमने यह पाठ सीख लिया है तो तुम भी विद्वान हो! हो सकता है तुम अपने नाम के बाद डी.डी. या एलएल.डी. न लगा सको, परन्तु यदि तुम कह सको, “मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ।” तो तुम विद्वान मनुष्य हो।
12. मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ। सीखने के लिये ये दो बड़ी बातें हैं। कुछ लोग हैं जो पहली बात जानते हैं, परन्तु दूसरी नहीं जानते। मैंने परमेश्वर की कई सन्तानों को जाना है जो दीन दशा में भक्ति में बड़ी प्रसिद्ध जान पड़ती थीं, परन्तु धनी हो जाने के बाद वे किसी काम की न रहीं। वे बढ़ना नहीं जानती थीं—उनका सिर भारी हो गया और वे अपनी औकात से बहुत बड़ी हो गईं! प्रेरित के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि वह सच्चाई से कह सकता था, “मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।”
12. हर एक बात और सब दशाओं में मैंने तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है। क्या वह कलाओं का सच्चा स्वामी—सच्चा मास्टर ऑफ़ आर्ट्स—नहीं था? उसने बिना कुड़कुड़ाए भूखा रहने की कला, बिना घमण्ड किए तृप्त रहने की कला, बिना अधीर हुए घटी सहने की कला, और सांसारिक वस्तुओं पर मन लगाए बिना बढ़ने की कला में निपुणता पा ली थी। वह सचमुच सबसे ऊँची श्रेणी का कलाओं का स्वामी था!
13. मैं सब कुछ कर सकता हूँ—यह तो डींग मारने जैसा लगता है, है न? वाक्य पूरा करो।
14. मसीह के द्वारा, जो मुझे सामर्थ्य देता है। यहाँ कोई अनुचित घमण्ड नहीं, क्योंकि पौलुस मसीह की महान सामर्थ्य के द्वारा सब कुछ कर सकता था! यह ठीक ही कहा गया है कि स्वर्गदूत बल में श्रेष्ठ हैं, परन्तु पवित्र लोग अपनी निर्बलता में श्रेष्ठ हैं। जब हम सबसे निर्बल होते हैं, और मसीह हमें सामर्थ्य देता है, तभी सबसे उत्तम सद्गुण उत्पन्न होते हैं।
14-17. तो भी तुम ने भला किया कि मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। हे फिलिप्पियों, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में जब मैंने मकिदुनिया से कूच किया तब तुम्हें छोड़ और किसी कलीसिया ने लेने-देने के विषय में मेरी सहायता नहीं की। इसी प्रकार जब मैं थिस्सलुनीके में था; तब भी तुम ने मेरी घटी पूरी करने के लिये एक बार क्या वरन् दो बार कुछ भेजा था। यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूँ, जो तुम्हारे लाभ के लिये बढ़ता जाए। उनकी उदारता परमेश्वर की पुस्तक में उनके खाते में लिख दी गई।
18, 19. मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध और ग्रहण करने के योग्य बलिदान है, जो परमेश्वर को भाता है। और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। पौलुस का परमेश्वर ही था जिसने फिलिप्पियों की सुधि ली, और पौलुस का परमेश्वर ही है जो तुम्हारी और मेरी सुधि लेगा! “मेरा परमेश्वर,” पौलुस कहता है, “तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा—उस प्रकार नहीं जैसे तुमने अपनी कंगाली में से मेरी घटी पूरी की, वरन् अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है”! यह मत सोचो कि तुम परमेश्वर के महिमामय धन को कभी चुका दोगे, या उसकी सर्वपर्याप्तता के राजकोष को कभी खाली कर दोगे—ऐसा हो ही नहीं सकता।
20. हमारे परमेश्वर और पिता की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन। वह हमें आशीष देता है, आओ हम उसे धन्य कहें! वह अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित है हमारी सब घटियाँ पूरी करता है—आओ हम उसकी महिमा का युगानुयुग गुणगान करें।
21. हर एक पवित्र जन को जो यीशु मसीह में हैं नमस्कार कहो। उससे हाथ मिलाओ। कहो, “मेरे भाई, तुम कैसे हो? मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ।” ऐसे हार्दिक नमस्कार हर एक मसीही सभा में साधारण बात होने चाहिए। मैं उस अद्भुत प्रतिष्ठा-प्रियता की सदा निन्दा करता हूँ जो आराधना के कुछ स्थानों में पाई जाती है, जहाँ कोई किसी को नहीं जानता। वे इतने प्रतिष्ठित हैं कि अपने भाइयों से जान-पहचान नहीं करते। यदि तुम मसीह यीशु में हो, तो एक दूसरे को जानो! “हर एक पवित्र जन को जो यीशु मसीह में हैं नमस्कार कहो।”
21, 22. जो भाई मेरे साथ हैं तुम्हें नमस्कार कहते हैं। सब पवित्र लोग, विशेष करके जो कैसर के घराने के हैं तुम को नमस्कार कहते हैं। मैं समझता हूँ कि इनमें से अधिकांश सम्राट के घराने में केवल दास थे। कदाचित् उनमें एक-दो ऊँचे वर्ग के भी रहे हों, परन्तु पूरी सम्भावना यही है कि सुसमाचार पहले रोमी राजमहल के दासों तक पहुँचा, उस बुराई के नरक-धाम तक, जहाँ काम-वासना और क्रूरता का बोलबाला था। वहाँ भी पवित्र लोग थे—और परमेश्वर के कुछ रत्न आज भी घूरों पर पड़े हैं!
23. हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम्हारी आत्मा के साथ रहे। आमीन।
अध्याय 12 पूरा हुआ
प्रार्थना, चिन्ता का उपचार