अध्याय 13 · 39 मिनट का पठन
कौवों की पुकार
“वह पशुओं को और कौवे के बच्चों को जो पुकारते हैं, आहार देता है।” भजन संहिता 147:9।
मैं इस उपदेश को एक उद्धरण से आरम्भ करूँगा। मुझे कौवों के विषय में कैरिल की टिप्पणी तुम्हें उसी के शब्दों में सुनानी है। “प्रकृति के जानकार हमें बताते हैं कि जब कौआ घोंसले में अपने बच्चों को तब तक खिला चुकता है जब तक उनके पंख पूरे निकल न आएँ और वे बाहर उड़ने योग्य न हो जाएँ, तब वह उन्हें घोंसले से बाहर धकेल देता है और उन्हें वहाँ रहने नहीं देता, वरन् अपनी जीविका आप ढूँढ़ने के लिये उन्हें बाहर निकाल देता है। अब जब ये बच्चे अपने घोंसले से पहली उड़ान पर होते हैं और अपने लिये आहार जुटाने के उपायों से बहुत कम परिचित होते हैं, तब प्रभु उनके लिये आहार का प्रबन्ध करता है।
“विश्वसनीय जानकारों का कहना है कि कौआ इस बात में अद्भुत रूप से कठोर और कड़ा होता है—जैसे ही उसके बच्चे अपना प्रबन्ध आप करने योग्य हो जाते हैं, वह उनके लिये और आहार नहीं लाता। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बूढ़े कौवे उन्हें उसी प्रदेश में ठहरने तक नहीं देते जहाँ वे पले थे, और यदि ऐसा है, तो उन्हें भटकना ही पड़ता है। हम कहावत में कहते हैं, ‘आवश्यकता बुढ़िया को भी दौड़ा देती है।’ हम इतना और जोड़ सकते हैं, ‘और बच्चों को भी।’ “
कुछ माता-पिताओं की अपने बच्चों के प्रति यह रीति रही है, और सम्भवतः अब भी है, कि जैसे ही वे अपना प्रबन्ध आप करने लगते हैं और किसी भी प्रकार अपनी रोटी कमाने योग्य हो जाते हैं, वे उन्हें घर से बाहर निकाल देते हैं, जैसे कौआ अपने बच्चों को घोंसले से निकाल देता है। अब, पाठ में प्रभु ने कहा, जब कौवे के बच्चे इस संकट में होते हैं, कि वे निकाल दिए जाते हैं और निराहार उड़ते फिरते हैं, तब उनके लिये कौन प्रबन्ध करता है? “क्या मैं, प्रभु, नहीं? क्या मैं, जो बूढ़े कौवे का प्रबन्ध करता हूँ, उसके बच्चों का भी प्रबन्ध नहीं करता, चाहे वे घोंसले में रहें और चाहे निराहार उड़ते फिरते?”
सुलैमान ने आलसी को चींटियों के पास भेजा, और स्वयं चट्टानी बिज्जुओं, शिकारी कुत्तों और छिपकलियों से शिक्षा पाई! आओ, हम परमेश्वर के किसी भी प्राणी से शिक्षा पाने को तैयार रहें, और आज रात कौवों के घोंसले के पास ऐसे जाएँ मानो किसी पाठशाला में सीखने जा रहे हों। शुद्ध लोगों के लिये कुछ भी अशुद्ध नहीं, और बुद्धिमान के लिये कुछ भी तुच्छ नहीं। अन्धविश्वासी लोग कौवे को अपशकुन का पक्षी मानकर उससे डरें, और विचारहीन लोग उसमें चमकीले काले रंग के एक पंखवाले जीव के सिवाय और कुछ न देखें—हम उससे अधिक देखने को तैयार हैं, और यदि हम केवल सिखाए जाने योग्य बने रहें तो निःसन्देह बिना प्रतिफल के न रहेंगे।
नूह का कौआ उसके लिये जैतून की कोई डाली लौटाकर नहीं लाया, परन्तु हमारा ला सकता है! और यह भी हो सकता है कि आज रात कौवे हमारे लिये भोजन लाएँ, जैसे प्राचीनकाल में उन्होंने करीत नाले के पास एलिय्याह को खिलाया था। हमारे धन्य प्रभु ने एक बार कौवों से एक बड़ा प्रबल तर्क निकाला था—ऐसा तर्क, जिसका उद्देश्य अपने उन सेवकों को सान्त्वना और ढाढ़स देना था जो अपनी सांसारिक परिस्थितियों के विषय में व्यर्थ चिन्ताओं से दबे हुए थे। ऐसे लोगों से उसने कहा, “कौवों पर ध्यान दो; वे न बोते हैं, न काटते; न उनके भण्डार और न खत्ता होता है; फिर भी परमेश्वर उन्हें खिलाता है। तुम्हारा मूल्य पक्षियों से कहीं अधिक है।”
स्वामी के तर्क के पीछे चलते हुए—जिसके विषय में तुम सब मानोगे कि वह अवश्य ठोस रहा होगा, क्योंकि वह अपने तर्क में उतना ही कभी असत्य न था जितना अपने कथनों में—मैं आज रात इस रीति से तर्क करूँगा: कौवों पर ध्यान दो कि वे कैसे पुकारते हैं! कर्कश, अस्पष्ट, काँव-काँव करते स्वरों में वे अपनी आवश्यकताएँ प्रकट करते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनकी प्रार्थना का उत्तर देता और उन्हें आहार भेजता है! तुमने भी प्रार्थना करना और उसकी कृपा ढूँढ़ना आरम्भ किया है—क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते? क्या परमेश्वर कौवों की चिन्ता करता है, और क्या वह तुम्हारी चिन्ता न करेगा? क्या वह घोंसलों में पड़े उन बिना पंखवाले कौवों की दुहाई नहीं सुनता जब वे भूखे होते हैं और खिलाए जाने के लिये उसकी दुहाई देते हैं?
मैं फिर कहता हूँ, क्या वह उनकी दुहाई के उत्तर में उनकी आवश्यकता पूरी करता है, और क्या वह तुम्हें उत्तर न देगा—तुम, मनुष्यों की दीन और काँपती हुई सन्तान, जो मसीह यीशु के द्वारा उसका मुख और उसकी कृपा ढूँढ़ रहे हो? आज सन्ध्या का सारा काम बस इसी एक विचार को खोलकर समझाना होगा। आज रात पवित्र आत्मा की अगुवाई में मेरा लक्ष्य यह होगा कि मैं उनसे कुछ कहूँ जो दया के लिये प्रार्थना करते आए हैं, परन्तु अब तक उसे पा नहीं सके हैं—जो सम्भवतः महीनों से घुटनों पर रहे हैं, और एक ही अत्यन्त ऊँचे और दुःख भरे स्वर से पुकारते रहे हैं—परन्तु अब तक शान्ति का मार्ग नहीं जानते।
उनका पाप अब भी चक्की के पाट के समान उनके गले में लटका है। वे मृत्यु की छाया में बैठे हैं। उन पर कोई ज्योति नहीं चमकी, और वे हाथ मलते हुए कराहते हैं, “क्या परमेश्वर अनुग्रह करना भूल गया? क्या उसने खोजनेवाले प्राणों की प्रार्थनाओं के विरुद्ध अपना कान बन्द कर लिया है? क्या वह पापियों की करुण दुहाई को फिर कभी स्मरण न करेगा? क्या पश्चातापियों के आँसू भूमि पर गिरते रहेंगे और उसकी करुणा को फिर न उभारेंगे?” और शैतान भी, हे प्रिय मित्रो, तुमसे, जो अभी इसी मनोदशा में हो, कह रहा है कि परमेश्वर तुम्हारी कभी न सुनेगा। कि वह तुम्हें मरते दम तक पुकारने देगा! कि तुम आहें भरते और आँसू बहाते हुए अपना जीवन हाँफ-हाँफकर गँवा दोगे, और अन्त में आग की झील में डाल दिए जाओगे!
आज रात मैं तुम्हें कुछ सान्त्वना और प्रोत्साहन देने को लालायित हूँ। मैं तुमसे आग्रह करना चाहता हूँ कि और भी अधिक व्याकुलता से पुकारो! क्रूस के पास आओ और उसे थाम लो, और प्रण करो कि जब तक वह दान न पा लो जिसकी तुम्हारा प्राण लालसा करता है, तब तक उसकी छाया कभी न छोड़ोगे। मैं चाहता हूँ, यदि परमेश्वर पवित्र आत्मा मेरी सहायता करे, कि तुम्हें ऐसा उभारूँ कि तुम रानी एस्तेर के समान अपने मन में कहो, “मैं राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नाश हो गई तो हो गई।” और तुम उसमें याकूब का यह प्रण भी जोड़ो, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा!” तो यह है वह प्रश्न जो हमारे सामने है: परमेश्वर कौवे के बच्चों की सुनता है। क्या वह तुम्हारी न सुनेगा?
I. मैं तर्क करता हूँ कि वह सुनेगा—पहले तो इसलिए कि मुझे स्मरण है कि वह तुच्छ कौवे की पुकार सुनता है, और तुम किसी अर्थ में कौवे से कहीं उत्तम हो। कौआ तो केवल एक दीन अशुद्ध पक्षी है, जिसकी तत्काल मृत्यु से सृष्टि में कोई दुःखदायी रिक्तता न आएगी। यदि कल हजारों कौवों की गर्दनें मरोड़ दी जाएँ, तो मैं नहीं जानता कि ब्रह्माण्ड में उनके लिये कोई भारी शोक और दुःख होगा! बस कुछ दीन पक्षी मर गए होंगे, और इतना ही।
परन्तु तुम एक अमर प्राण हो! जीवन समाप्त होते ही कौआ चला जाता है—फिर कोई कौआ नहीं रहता। परन्तु जब तुम्हारा वर्तमान जीवन बीत जाता है, तब तुम्हारा अस्तित्व समाप्त नहीं होता—तुम तो बस जीवन के समुद्र में उतारे गए हो—तुमने तो सदा के लिये जीना अभी आरम्भ ही किया है। तुम्हारी अमर आत्मा के मिटने से पहले तुम पृथ्वी के पुराने पहाड़ों को चूर-चूर होकर शून्य होते देखोगे! चन्द्रमा का मन्द प्रकाश फीका पड़ चुका होगा, और सूर्य की और भी प्रबल ज्वालाएँ सदा के अन्धकार में बुझ चुकी होंगी, और तो भी तुम्हारी आत्मा अपने अनन्त पथ पर आगे बढ़ती ही रहेगी—दुर्दशा का एक अनन्त पथ, जब तक कि परमेश्वर तुम्हारी पुकार न सुने—
“अहा, वह विशाल सत्य, यह नश्वर अमरता धारण करेगा! मन की धड़कन कभी न थमेगी; परमेश्वर की जगाई हुई, वह सदा धड़कती है, उसकी अपनी अनन्तता के समान अनन्त! स्वर्गदूतों से ऊपर, या दुष्टात्माओं से नीचे: महिमा में ऊपर चढ़ने को, या लज्जा में नीचे उतरने को— अटल विधान से मनुष्य-जाति ठहराई गई है।” तो क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर उस दीन पक्षी की सुनेगा जो है और नहीं है—जो क्षण भर यहाँ है और फिर अस्तित्व से मिट जाता है—और तुम्हारी न सुनेगा, तुम जो एक अमर प्राण हो, जिसकी अवधि उसकी अपनी अवधि के बराबर होनी है? मुझे लगता है कि यह बात तुम्हें अवश्य सूझती होगी कि यदि वह मरते हुए कौवे की सुनता है, तो वह न मरनेवाले मनुष्य की भी सुनेगा। प्राचीन लोग जूपिटर देवता के विषय में कहते थे कि उसे छोटी बातों पर ध्यान देने का अवकाश नहीं, परन्तु यहोवा अपने सबसे छोटे प्राणियों की भी चिन्ता करने को नीचे झुकता है, और पक्षियों के घोंसलों में भी झाँकता है! क्या वह उन आत्माओं की दयापूर्वक चिन्ता न करेगा जो एक भयानक अनन्तता की उत्तराधिकारी हैं?
इसके अतिरिक्त, मैंने कभी नहीं सुना कि कौवे परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए थे! परन्तु मैं यह अवश्य पाता हूँ कि हमारी जाति चाहे कितनी ही अशुद्ध, विकृत और पतित क्यों न हो, तो भी आरम्भ में परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ।” मनुष्य में कुछ ऐसा है जो निचले प्राणियों में नहीं पाया जाता, जिनमें से सबसे उत्तम और सबसे श्रेष्ठ भी आदम की सबसे तुच्छ सन्तान से अतुलनीय रूप से नीचे हैं। मनुष्य की सृष्टि के विषय में एक सभा हुई थी, और उसके मन में, और उसके शरीर की उस बनावट में भी जो मन की सहायता के लिये है, परमप्रधान की बुद्धि का अद्भुत प्रदर्शन है।
मनुष्य-जाति में से सबसे विकृत, सबसे गुमनाम और सबसे दुष्ट को यहाँ ले आओ, और—यद्यपि मैं नैतिक रूप से मानव-स्वभाव की चापलूसी करने का साहस नहीं करता—तो भी मनुष्य होने के तथ्य में एक ऐसी गरिमा है जो मैदान के सब पशुओं में नहीं पाई जाती, वे चाहे जो हों। जलगज और लिव्यातान मनुष्य के पाँवों तले अधीन किए गए हैं। उकाब उतना ऊँचा नहीं उड़ सकता जितना मनुष्य का प्राण ऊपर चढ़ता है, और न सिंह ऐसा राजसी भोजन खाता है जिसकी भूख मनुष्य की आत्मा को होती है। और क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर कौवे जैसे इतने नीच और इतने तुच्छ प्राणी की सुनेगा और फिर भी तुम्हारी न सुनेगा, जबकि तुम उस जाति में से हो जो उसके अपने स्वरूप में रची गई?
अहा, उसके विषय में ऐसा कठोर और ऐसा मूर्खतापूर्ण विचार न करो जिसकी गति सदा एक सी है! मैं यह बात तुम्हीं से पूछता हूँ। क्या प्रकृति आप ही यह नहीं सिखाती कि आकाश के पक्षियों से बढ़कर मनुष्य की चिन्ता की जानी चाहिए? यदि तुम कौवे के बच्चों की पुकार सुनते, तो सम्भव है उन पक्षियों पर तुम्हें इतनी दया आती कि यदि तुम जानते कि उन्हें कैसे खिलाएँ, तो उन्हें आहार देते। परन्तु मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि तुम में से कोई पक्षियों की सहायता करेगा, और फिर भी उस नाश होते हुए शिशु को बचाने के लिये करुणा के पंखों पर उड़कर न जाएगा जिसकी पुकार तुम उस स्थान से सुन सकते हो जहाँ उसे क्रूर उपेक्षा के कारण फेंक दिया गया हो! यदि रात के सन्नाटे में तुम किसी ऐसे मनुष्य की करुण पुकार सुनते जो सड़कों पर बीमारी में, बिना किसी की दया पाए, दम तोड़ रहा हो, तो क्या तुम उठकर उसकी सहायता न करते?
यदि तुम कौवे की सहायता करनेवाले हो, तो मुझे निश्चय है कि तुम उसकी सहायता करते। यदि तुम्हें कौवे पर कुछ भी दया आती है, तो निश्चय ही मनुष्य पर तुम्हें कहीं अधिक दया आएगी! मैं जानता हूँ कि लोग दबी जबान से कहते हैं कि कुछ ऐसे भोले लोग हैं जो बेघर पुरुषों और स्त्रियों से अधिक बेघर कुत्तों की चिन्ता करते हैं—तो भी यह कहीं अधिक सम्भव है कि जो कुत्तों के लिये दया रखते हैं, वही मनुष्यों की सबसे कोमलता से चिन्ता करते हैं। जो भी हो, यदि मुझे सहायता की आवश्यकता होती, तो मैं उनके पक्ष में दृढ़ अनुमान रखता। और क्या तुम नहीं सोचते कि परमेश्वर, वह सर्वबुद्धिमान, जब घोंसले के इन बिना पंखवाले पक्षियों की चिन्ता करता है, तो तुम्हारी चिन्ता भी निश्चय करेगा?
तुम्हारा मन कहता है, “हाँ।” तो अब से अपने मन के अविश्वास को उत्तर दो, उसी के उचित तर्क को उसके विरुद्ध मोड़कर। परन्तु मैं तुम्हें यह कहते सुनता हूँ, “आह, परन्तु कौआ मेरे समान पापी नहीं है! वह भले ही अशुद्ध पक्षी हो, परन्तु वह नैतिक रूप से उतना अशुद्ध नहीं हो सकता जितना मैं हूँ। वह भले ही रंग में काला हो, परन्तु मैं पाप से काला हूँ! कौआ सब्त को नहीं तोड़ सकता, अपशब्द नहीं बक सकता, व्यभिचार नहीं कर सकता! कौआ पियक्कड़ नहीं हो सकता! वह अपने आप को उन बुराइयों से अशुद्ध नहीं कर सकता जिनसे मैं दूषित हूँ।”
मित्र, मैं यह सब जानता हूँ, और हो सकता है तुम्हें ऐसा लगे कि इससे तुम्हारी दशा और भी निराशाजनक हो जाती है, परन्तु मैं नहीं समझता कि वास्तव में ऐसा होता है। बस एक क्षण इस पर विचार करो। इससे क्या प्रमाणित होता है? यही कि तुम पाप करने में सक्षम प्राणी हो, और इसलिए तुम एक बुद्धिमान आत्मा हो जो ऐसे अर्थ में जीवित है जिसमें कौआ जीवित नहीं है। तुम आत्मिक जगत में चलने-फिरनेवाले प्राणी हो! तुम प्राणों के उस जगत से सम्बन्ध रखते हो जिसमें कौवे का कोई भाग नहीं। कौआ पाप नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें न आत्मा है, न प्राण। परन्तु तुम एक बुद्धिमान कर्ता हो, जिसका उत्तम भाग तुम्हारा प्राण है। अब, क्योंकि प्राण शरीर से अनन्त गुना अधिक बहुमूल्य है! और क्योंकि कौआ—मैं अभी साधारण बोलचाल की भाषा में कह रहा हूँ—केवल शरीर ही है, जबकि तुम स्पष्ट रूप से शरीर के साथ-साथ प्राण भी हो—नहीं तो तुम पाप करने में सक्षम न होते—इसलिए मैं उस काले, निरुत्साहित करनेवाले विचार में भी प्रकाश की कुछ झलक देखता हूँ!
क्या परमेश्वर माँस, लहू, हड्डियों और काले पंखों की चिन्ता करता है, और क्या वह तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारी इच्छा, तुम्हारी परख, तुम्हारे विवेक, तुम्हारे अमर प्राण की चिन्ता न करेगा? अहा, यदि तुम इस पर थोड़ा भी विचार करो, तो तुम्हें अवश्य दिखेगा कि यह सम्भव नहीं कि कौवे की पुकार को ईश्वरीय कृपालुता के कान तक पहुँच मिल जाए, और तुम्हारी प्रार्थना परमप्रधान के द्वारा तुच्छ जानी जाए और अनसुनी कर दी जाए—
“वह कीट जो नन्हे पंखों से गर्मी की एक किरण के संग बस उड़ता चला जाता है। वह फूल जिसे वसन्त की साँस आधे दिन के लिये जीवन में जगा देती है। सबसे छोटा कण, सबसे कोमल बाल, सब हमारे स्वर्गीय पिता की देखभाल का अनुभव करते हैं।” तो निश्चय ही वह दीनों की दुहाई की ओर मुँह करेगा, और उनकी प्रार्थना को तुच्छ न जानेगा!
मैं इस बिन्दु को यह कहे बिना कठिनाई से ही छोड़ सकता हूँ कि कौवे का उल्लेख पापी को प्रोत्साहित करे। जैसा एक पुराने लेखक ने लिखा है, “पक्षियों में वह बाज या शाहीन का उल्लेख नहीं करता, जिन्हें बड़ा मूल्यवान समझा जाता है और जिन्हें राजकुमार पालते हैं। परन्तु वह उस घिनौने और दुष्ट स्वभाववाले पक्षी को चुनता है, काँव-काँव करनेवाले कौवे को, जिसका कोई मनुष्य कुछ मूल्य नहीं समझता, सिवाय इसके कि वह उस सड़े माँस को खा जाता है जो उसे कष्ट दे सकता था। तो देखो, और परमेश्वर के विधान और उसकी कृपा पर अचम्भा करो, कि वह कौवे के लिये आहार का प्रबन्ध करे—ऐसे उदास रंग और ऐसे बेसुरे स्वर का प्राणी—ऐसा प्राणी जो अधिकांश मनुष्यों को घिनौना और कुछ को अपशकुनी लगता है। चींटी के लिये प्रबन्ध करने में, जो गर्मी में अपना भोजन बटोरती है, परमेश्वर का एक बड़ा विधान दिखाई देता है—परन्तु कौवे में उससे भी बड़ा, जो यद्यपि अपने लिये प्रबन्ध करना भूल जाता है या उसकी परवाह नहीं करता, तो भी परमेश्वर उसके लिये प्रबन्ध करता और उसके लिये रख छोड़ता है।”
कोई सोचेगा कि प्रभु कौवों के विषय में कहे, वे अपना प्रबन्ध आप करें या नाश हो जाएँ! नहीं, प्रभु परमेश्वर अपने हाथों के किसी काम को तुच्छ नहीं जानता। कौवे का अस्तित्व परमेश्वर से है, और इसलिए कौवे का प्रबन्ध भी वही करेगा। केवल सुन्दर निर्दोष कबूतर ही नहीं, वरन् कुरूप कौआ भी अपना आहार परमेश्वर से पाता है। इससे स्पष्ट दिखता है कि तुम में उत्तमता का अभाव, हे काले, कौवे-जैसे पापी, स्वर्ग में तुम्हारी पुकार सुने जाने में बाधा न बनेगा! अयोग्यता को यीशु का लहू दूर करेगा, और अशुद्धता को वह पूरी रीति से धो डालेगा। केवल यीशु पर विश्वास करो, और तुम शान्ति पाओगे!
II. फिर, अगले स्थान पर, तुम्हारी पुकार और कौवे की पुकार में बहुत बड़ा अन्तर है। जब कौवे के बच्चे पुकारते हैं, तो मेरी समझ में वे कठिनाई से ही जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए। उनमें एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो उनसे आहार के लिये पुकार करवाती है, परन्तु उनकी पुकार अपने आप में उनकी आवश्यकता को प्रकट नहीं करती। मैं समझता हूँ, तुम शीघ्र जान लोगे कि उनका अभिप्राय आहार से है—परन्तु उनके पास स्पष्ट वाणी नहीं—वे एक शब्द तक नहीं बोलते! यह बस एक निरन्तर, कर्कश, लालायित पुकार है, और इतना ही।
परन्तु तुम जानते हो कि तुम्हें क्या चाहिए, और तुम्हारे शब्द चाहे कितने ही थोड़े हों, तुम्हारा मन अपना ही दुःख और अपनी घोर व्यथा जानता है। तुम्हारी आहों और कराहों का अर्थ स्पष्ट है। तुम्हारी समझ तुम्हारे भूखे हृदय के दाहिने हाथ पर है। तुम जानते हो कि तुम्हें शान्ति और क्षमा चाहिए। तुम जानते हो कि तुम्हें यीशु की, उसके बहुमूल्य लहू की, उसकी सिद्ध धार्मिकता की आवश्यकता है। अब, यदि
परमेश्वर कौवे की ऐसी विचित्र, बड़बड़ाती, अस्पष्ट पुकार सुनता है, तो क्या तुम नहीं सोचते कि वह एक दीन, दरिद्र, दोषी प्राणी की उस समझदार और अर्थपूर्ण प्रार्थना को भी सुनेगा जो उसकी दुहाई देकर कहता है, “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर”? निश्चय ही तुम्हारी बुद्धि तुम्हें यह बताती है!
इसके अतिरिक्त, कौवे के बच्चे तर्क नहीं दे सकते, क्योंकि उनमें समझ नहीं है। वे वैसा नहीं कह सकते जैसा तुम कह सकते हो—
“वह जानता है मैं कौन-से तर्क लूँगा, अपने परमेश्वर से मल्लयुद्ध करने को, मैं उसकी अपनी दया के निमित्त विनती करूँगा, और एक उद्धारकर्ता के लहू के निमित्त।”
उनके पास एक ही तर्क है, अर्थात् उनकी घोर आवश्यकता, जो उनसे पुकार करवाती है, परन्तु इससे आगे वे नहीं जा सकते। और इसे भी वे न तो क्रम से रख सकते हैं, न भाषा में वर्णन कर सकते हैं। परन्तु तुम्हारे पास तो तर्कों का ढेर हाथ में तैयार है, और तुम्हारे पास वह समझ है जिससे तुम उन्हें पंक्तिबद्ध करके अनुग्रह के सिंहासन को घेरने के लिये सेना की नाईं सजा सको। निश्चय ही, यदि कौवे की अनकही आवश्यकता की केवल विनती परमेश्वर के सामने प्रबल होती है, तो यदि तुम उसके सामने अपना पक्ष रख सको और मुँह में तर्क लेकर उसके पास आओ, तो तुम परमप्रधान के सामने कहीं अधिक प्रबल होगे! आओ, हे निराश प्राणी, मेरे प्रभु को परखकर देखो! मैं तुमसे विनती करता हूँ, अब उस करुण विलाप-गीत को दया के कानों तक चढ़ने दो! उस फटते हुए हृदय को खोलो, और यदि शब्द तुम्हारे बस के बाहर हों, तो उसे आँसुओं में बह जाने दो!
तो भी मुझे डर है कि कौवे को कभी-कभी उन पापियों पर, जो प्रार्थना में परमेश्वर को खोजते हैं, एक बात में बड़ी बढ़त होती है, अर्थात् इसमें: कौवे के बच्चे अपने आहार के लिये उससे अधिक उत्सुक होते हैं जितने कुछ लोग अपने प्राणों के लिये होते हैं। तो भी यह तुम्हारे लिये निरुत्साह की बात नहीं, वरन् इसका कारण है कि तुम जितने अब तक उत्सुक रहे हो उससे अधिक उत्सुक बनो। जब कौवों को आहार चाहिए, तो वे उसे पाए बिना पुकारना बन्द नहीं करते। भूखे कौवे के बच्चे को तब तक चुप नहीं कराया जा सकता जब तक उसका मुँह भर न जाए, और न ही किसी पापी को, जब वह सचमुच उत्सुक हो, तब तक चुप कराया जा सकता है जब तक उसका हृदय ईश्वरीय दया से भर न जाए। काश तुम में से कुछ और अधिक व्याकुलता से प्रार्थना करते! “स्वर्ग के राज्य में बलपूर्वक प्रवेश होता रहा है, और बलवान उसे छीन लेते हैं।”
एक पुराने प्यूरिटन ने कहा, “प्रार्थना स्वर्ग के फाटक पर लगाई गई एक तोप है, जो उसके फाटकों को तोड़कर खोल दे।” यदि तुम नगर को पाना चाहते हो तो उसे धावा बोलकर लेना होगा! तुम गद्देदार बिछौने पर सवार होकर स्वर्ग नहीं पहुँचोगे। तुम्हें तीर्थयात्रा पर निकलना होगा—गहरी नींद में सोते हुए कोई महिमा के देश में नहीं जाता—स्वप्न देखनेवाले आलसी नरक में जागेंगे! यदि परमेश्वर ने तुम्हें अपने प्राण में उद्धार की आवश्यकता का अनुभव कराया है, तो उसके समान पुकारो जो जागता और जीवित है! उत्सुक बनो! गला खोलकर पुकारो! कुछ न रख छोड़ो! और तब मैं समझता हूँ कि तुम पाओगे कि मेरा तर्क पूरी तरह उचित है—कि हर प्रकार से एक समझदार, तर्कपूर्ण, बुद्धिमानी की प्रार्थना परमेश्वर के सामने कौवे के केवल चीखने और बड़बड़ाने के शोर से अधिक प्रबल होने की सम्भावना रखती है—और यदि वह कौवे की ऐसी पुकार सुनता है—तो यह कहीं अधिक निश्चित है कि वह तुम्हारी सुनेगा।
III. स्मरण रखो कि तुम्हारी प्रार्थना का विषय परमेश्वर के कान को आहार के लिये कौवे की पुकार से कहीं अधिक भाता है। कौवे के बच्चे केवल आहार ही माँगते हैं—उन्हें थोड़ा सा सड़ा माँस दे दो और उनका काम हो गया। तुम्हारी पुकार परमेश्वर के कान को कहीं अधिक प्रिय होनी चाहिए, क्योंकि तुम उसके प्रिय पुत्र के लहू के द्वारा क्षमा की विनती करते हो। परमप्रधान के लिये स्वाभाविक दानों की अपेक्षा आत्मिक दान देना कहीं अधिक श्रेष्ठ काम है। ईश्वरीय अनुग्रह की धाराएँ ऊपर के सोतों से बहती हैं। मैं जानता हूँ कि वह इतना दीनता से झुकनेवाला है कि जब वह कौवे के बच्चे के मुँह में आहार डालता है तब भी अपना अनादर नहीं करता, तो भी मनुष्यों की सन्तान को शान्ति, क्षमा और मेल देने के काम में अधिक आदर है।
अनन्त प्रेम ने जगत की उत्पत्ति से पहले ही दया का एक मार्ग ठहराया, और असीम बुद्धि असीम सामर्थ्य के साथ उस ईश्वरीय योजना को पूरा करने में लगी है। निश्चय ही प्रभु मनुष्यों की सन्तान का उद्धार करने में बड़ा आनन्द पाता होगा! यदि परमेश्वर मैदान के पशुओं को आहार देने से प्रसन्न होता है, तो क्या तुम नहीं सोचते कि वह अपनी सन्तान की आवश्यकताएँ पूरी करने में कहीं अधिक आनन्दित होता है? मैं समझता हूँ कि तुम्हें अपने बैल को केवल चारा डालने, या खलिहान के द्वार पर मुर्गियों के बीच जौ बिखेरने की अपेक्षा अपनी सन्तान को सिखाने में अधिक मनभावना काम मिलेगा, क्योंकि पहले काम में कुछ अधिक श्रेष्ठ होगा, जो तुम्हारी सारी शक्तियों को अधिक पूरी रीति से जगाएगा और तुम्हारे भीतरी मनुष्य को बाहर लाएगा।
मुझे यहाँ अनुमान पर नहीं छोड़ा गया है। लिखा है, “वह करुणा से प्रीति रखता है।” जब परमेश्वर अपनी सामर्थ्य का प्रयोग करता है, तो वह उदास नहीं हो सकता, क्योंकि वह आनन्दमय परमेश्वर है। परन्तु यदि ऐसी कोई बात सम्भव हो कि असीम परमेश्वर एक समय दूसरे समय से अधिक आनन्दित हो, तो वह तब होता है जब वह यीशु के बहुमूल्य लहू के द्वारा पापियों को क्षमा करता है। आह, हे पापी, जब तुम परमेश्वर की दुहाई देते हो, तो तुम उसे वह काम करने का अवसर देते हो जिसे करना उसे सबसे अधिक प्रिय है! वह क्षमा करने में, अपने एप्रैम को अपनी छाती से लगाने में, अपने उड़ाऊ पुत्र के विषय में यह कहने में आनन्दित होता है, “वह खो गया था, अब मिल गया है। वह मर गया था, फिर जी गया है।” यह पिता के हृदय को पले हुए बछड़े को खिलाने से, या हजारों पहाड़ों के जानवरों की देखभाल करने से अधिक सुखदायक है।
तो, हे प्रिय मित्रो, जबकि तुम कुछ ऐसा माँग रहे हो जिसे देने में परमेश्वर का कौवों को केवल आहार देने से कहीं अधिक आदर होगा, तो मैं समझता हूँ कि आज रात मेरे तर्क के हथौड़े की एक बहुत ही जोरदार चोट पड़ती है, जो तुम्हारे अविश्वास को टुकड़े-टुकड़े कर दे! परमेश्वर पवित्र आत्मा, सच्चा सहायक, तुम में सामर्थ्य से काम करे! निश्चय ही वह परमेश्वर जो कौवों को आहार देता है, खोजनेवाले पापियों को शान्ति और क्षमा देने से इनकार न करेगा। उसे परखकर देखो! इसी क्षण उसे परखकर देखो! नहीं, हिलो मत! अभी उसे परखकर देखो!
IV. जब सारा विषय इतना उपजाऊ है, तो हमें किसी एक बिन्दु पर ठहरना नहीं चाहिए। तुम्हारे लिये सान्त्वना का एक और स्रोत है, अर्थात् यह कि कौवों को कहीं भी पुकारने की आज्ञा नहीं दी गई। जब वे पुकारते हैं, तो उनकी विनती के पीछे ईश्वरीय मुख से निकला कोई विशेष उपदेश नहीं होता। परन्तु तुम्हारे पास ईश्वरीय उपदेशों से मिला हुआ यह अधिकार है कि प्रार्थना में परमेश्वर के सिंहासन के निकट आओ!
यदि कोई धनी मनुष्य अपना घर उनके लिये खोल दे जिन्हें निमन्त्रण नहीं दिया गया था, तो वह निश्चय ही उन्हें ग्रहण करेगा जिन्हें निमन्त्रण दिया गया था। कौवे बिना बुलाए आते हैं, तो भी वे खाली नहीं लौटाए जाते! तुम्हें तो एक निमन्त्रित अतिथि के रूप में आने की आज्ञा दी गई है—तो तुम्हें कैसे मना किया जाएगा? क्या तुम सोचते हो कि तुम्हें आने के लिये नहीं कहा गया? यह सुनो: “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।” “संकट के दिन मुझे पुकार; मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करने पाएगा।” “तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो। जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।” “प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।” “मन फिराओ, और तुम में से हर एक यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले।”
ये उपदेश चरित्र की किसी सीमा के बिना दिए गए हैं। वे तुम्हें खुलकर निमन्त्रण देते हैं—नहीं, वे तुम्हें आने की आज्ञा देते हैं। अहा, इसके बाद भी क्या तुम सोच सकते हो कि परमेश्वर तुम्हें ठुकरा देगा? खिड़की खुली है, कौआ भीतर उड़ आता है और दया का परमेश्वर उसे खदेड़कर बाहर नहीं निकालता! द्वार खुला है, और प्रतिज्ञा का वचन तुम्हें आने को कहता है—यह न सोचो कि वह तुम्हें मना करेगा, वरन् यह विश्वास करो कि वह “तुम्हें अनुग्रह से ग्रहण करेगा और सेंत-मेंत तुमसे प्रेम करेगा,” और तब तुम “उसके लिये धन्यवाद रूपी बलि चढ़ाओगे।” जो भी हो, उसे परखकर देखो! अभी भी उसे परखकर देखो!
V. फिर, एक और, और कहीं अधिक प्रबल तर्क है। कौवे के बच्चे की पुकार एक प्राणी की स्वाभाविक पुकार के सिवाय और कुछ नहीं, परन्तु तुम्हारी पुकार, यदि वह सच्ची है, तुम्हारे हृदय में ईश्वरीय अनुग्रह के काम का फल है। जब कौआ स्वर्ग की ओर पुकारता है, तो उसमें कौवे के अपने आप के सिवाय और कोई नहीं पुकारता—परन्तु जब तुम पुकारते हो, “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर”—तो वह तुम में पुकारता हुआ परमेश्वर पवित्र आत्मा है!
यह वह नया जीवन है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है, और जो उस स्रोत की ओर पुकार रहा है जहाँ से वह आया, ताकि अपने महान मूल के साथ सहभागिता और संवाद रखे। किसी मनुष्य से सिधाई और सच्चाई से प्रार्थना करवाने के लिये स्वयं परमेश्वर की आवश्यकता होती है! यदि हम इस पर विचार करें, तो हम अपने बच्चों को “प्रार्थनाएँ बोलना” तो सिखा सकते हैं, परन्तु उन्हें “प्रार्थना करना” नहीं सिखा सकते। तुम एक “प्रार्थना-पुस्तक” तो बना सकते हो, परन्तु किसी पुस्तक में “प्रार्थना” का एक कण भी नहीं डाल सकते, क्योंकि यह इतनी आत्मिक बात है कि पन्नों के बीच बन्द नहीं की जा सकती। तुम में से कुछ सम्भवतः परिवार में “प्रार्थनाएँ पढ़ते” होंगे। मैं इस रीति की निन्दा नहीं करूँगा, परन्तु इसके विषय में इतना अवश्य कहूँगा— तुम उन “प्रार्थनाओं” को सत्तर वर्ष तक पढ़ते रह सकते हो और तो भी एक बार भी प्रार्थना न करो—क्योंकि प्रार्थना केवल शब्दों से बिल्कुल भिन्न बात है।
सच्ची प्रार्थना हृदय का परमेश्वर के साथ व्यापार है, और हृदय तब तक स्वर्ग के बन्दरगाहों के साथ आत्मिक व्यापार में नहीं आता जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा पालों में पवन न भर दे और जहाज को उसके ठिकाने की ओर न बढ़ाए। “तुझे नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।” यदि तुम्हारे हृदय में कोई सच्ची प्रार्थना है, तो चाहे तुम उसका भेद न जानो, परमेश्वर पवित्र आत्मा वहाँ है! अब यदि वह उन पुकारों को सुनता है जो उससे नहीं निकलतीं, तो उन्हें कितना अधिक सुनेगा जो उससे निकलती हैं! सम्भव है तुम यह जानने के लिये उलझन में पड़े हो कि तुम्हारी पुकार स्वाभाविक है या आत्मिक। यह बहुत महत्त्वपूर्ण लग सकता है, और निःसन्देह है भी— परन्तु तुम्हारी पुकार चाहे एक हो या दूसरी, प्रभु को खोजते रहो!
सम्भव है तुम्हें सन्देह हो कि परमेश्वर स्वाभाविक पुकारें सुनता है या नहीं। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह सुनता है। मुझे स्मरण है कि एक बार मैंने एक कट्टर-कैल्विनवादी आराधना-स्थल में इस विषय पर कुछ कहा था। उस समय मैं बच्चों को उपदेश दे रहा था और उन्हें प्रार्थना करने के लिये उभार रहा था। संयोग से मैंने कहा कि किसी वास्तविक मन-फिराव से बहुत पहले मैंने साधारण दयाओं के लिये प्रार्थना की थी, और परमेश्वर ने मेरी प्रार्थनाएँ सुनी थीं। यह उस अति-परिष्कृत सम्प्रदाय के मेरे भले भाइयों को न भाया! और बाद में वे सब मुझे घेरकर आ गए, कहने को तो यह जानने के लिये कि मेरा अभिप्राय क्या था, परन्तु वास्तव में अपने स्वभाव और रीति के अनुसार नुक्ताचीनी और मीन-मेख निकालने के लिये।
“उन्होंने मुझे मधुमक्खियों के समान घेर लिया है। हाँ, मधुमक्खियों के समान उन्होंने मुझे घेर लिया!” कुछ देर बाद, जैसी मुझे आशा थी, वे अपने सामान्य मनोरंजन में लग गए, अर्थात् नाम धरने में। वे कहने लगे कि यह कैसा घोर आर्मीनियसवाद है! और एक और उपाधि, जिससे उन्होंने मुझे सम्मानित करने की कृपा की, वह थी “फुलरवादी”—एक ऐसी उपाधि जो, प्रसंगवश कहूँ, इतनी आदरणीय है कि जो कुछ मैंने कहा था उसके साथ उसे जोड़ने के लिये मैं मन से उनका धन्यवाद कर सकता था! परन्तु यह कहना कि परमेश्वर स्वाभाविक मनुष्यों की प्रार्थना सुनता है, उनके लिये आर्मीनियसवाद से भी बुरी बात थी—यदि सचमुच कोई बात उससे बुरी हो सकती हो! उन्होंने वह नकली वचन उद्धृत किया, “दुष्ट लोगों की प्रार्थना से यहोवा घृणा करता है,” जिसका मैंने तुरन्त यह पूछकर उत्तर दिया कि क्या वे वह पद मुझे परमेश्वर के वचन में ढूँढ़कर दिखाएँगे, क्योंकि मैंने यह कहने का साहस किया कि उस कथन का लेखक शैतान है, और वह बाइबल में है ही नहीं।
“दुष्ट लोगों के बलिदान से यहोवा घृणा करता है” यह तो बाइबल में है, परन्तु वह “दुष्ट लोगों की प्रार्थना” से बहुत भिन्न बात है। और इसके अतिरिक्त, वहाँ जिस दुष्ट शब्द का अभिप्राय है उसमें और उस स्वाभाविक मनुष्य में, जिसके विषय में हम वाद-विवाद कर रहे थे, निश्चित अन्तर है। मैं नहीं समझता कि जो मनुष्य किसी भी अर्थ में प्रार्थना करना आरम्भ करता है, वह पूरी तरह उन “दुष्ट लोगों” में गिना जा सकता है जिनका अभिप्राय सुलैमान ने किया, और निश्चय ही वह उनमें से नहीं है जो अपना कान व्यवस्था सुनने से मोड़ लेते हैं, जिनके विषय में लिखा है कि उनकी प्रार्थना घृणित ठहरती है।
“भला, परन्तु,” उन्होंने कहा, “यह कैसे हो सकता है कि परमेश्वर एक स्वाभाविक प्रार्थना सुने?” और जब मैं एक क्षण रुका, तो लाल लबादा ओढ़े एक बूढ़ी स्त्री धक्का देकर मेरे चारों ओर के उस छोटे घेरे में घुस आई, और इस्राएल में एक माता के समान, जैसी वह थी, बड़े जोरदार ढंग से उनसे बोली, “तुम यह प्रश्न क्यों उठाते हो, और भूल जाते हो कि परमेश्वर ने स्वयं क्या कहा है! यह तुम क्या कहते हो कि परमेश्वर स्वाभाविक प्रार्थना नहीं सुनता? अरे, क्या वह कौवे के बच्चों की नहीं सुनता जब वे उसकी दुहाई देते हैं? और क्या तुम समझते हो कि वे आत्मिक प्रार्थनाएँ करते हैं?”
तुरन्त वे योद्धा दुम दबाकर भागे—इससे अधिक पूरी हार कभी न हुई—और जीवन में कम से कम एक बार तो उन्हें लगा होगा कि वे भी सम्भवतः भूल कर सकते हैं! हे भाइयो, निश्चय ही इससे तुम्हें प्रोत्साहन और सान्त्वना मिल सकती है! मैं अभी तुम्हें यह पता लगाने के काम में नहीं लगाऊँगा कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ स्वाभाविक हैं या आत्मिक—कि वे परमेश्वर के आत्मा से आती हैं या नहीं—क्योंकि सम्भव है इससे तुम निरुत्साहित हो जाओ। यदि प्रार्थना तुम्हारे हृदय की गहराई से निकलती है, तो हम जानते हैं कि वह वहाँ कैसे पहुँची, चाहे तुम न जानो। परमेश्वर कौवों की सुनता है, और मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि वह तुम्हारी सुनेगा, और इसके अतिरिक्त मैं विश्वास करता हूँ—यद्यपि मैं अभी तुम्हारे मन में यह प्रश्न नहीं उठाना चाहता—कि वह तुम्हारी प्रार्थना इसलिए सुनता है, क्योंकि— चाहे तुम इसे न जानो—तुम्हारे भीतर परमेश्वर के आत्मा का एक गुप्त काम चल रहा है जो तुम्हें प्रार्थना करना सिखा रहा है।
VI. परन्तु मेरे पास और भी प्रबल तर्क हैं, जो निशाने के और निकट हैं। जब कौवे के बच्चे पुकारते हैं, तो वे अकेले पुकारते हैं। परन्तु जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारे साथ तुमसे कहीं अधिक सामर्थी एक और प्रार्थना कर रहा होता है! क्या तुम उस पापी को यह पुकारते सुनते हो, “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर”? सुनो! क्या तुम वह दूसरी पुकार सुनते हो जो उसकी पुकार के साथ ऊपर जाती है? नहीं, तुम उसे नहीं सुनते, क्योंकि तुम्हारे कान मन्द और भारी हैं, परन्तु परमेश्वर उसे सुनता है। एक और स्वर है, पहले से कहीं ऊँचा और मधुर, और कहीं अधिक प्रबल, जो उसी क्षण ऊपर उठता और विनती करता है, “हे पिता, इन्हें मेरे बहुमूल्य लहू के कारण क्षमा कर।”
पापी की फुसफुसाहट की प्रतिध्वनि बादल की गरज के समान प्रतापी है! कभी कोई पापी सच्चाई से प्रार्थना नहीं करता जब तक मसीह भी उसी समय प्रार्थना न कर रहा हो! तुम उसे न देख सकते हो, न सुन सकते हो, परन्तु यीशु जब भी अपने आत्मा के द्वारा तुम्हारे प्राण की गहराइयों को हिलाता है, तो उसका अपना प्राण भी हिल उठता है। अहा, हे पापी, तुम्हारी प्रार्थना जब परमेश्वर के सामने पहुँचती है, तो वह उससे बहुत भिन्न होती है जैसी वह तुमसे निकलते समय होती है!
कभी-कभी दीन लोग हमारे पास ऐसे आवेदन-पत्र लेकर आते हैं जिन्हें वे किसी कम्पनी या किसी बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति के पास भेजना चाहते हैं। वे आवेदन-पत्र लाते हैं और हमसे कहते हैं कि हम उसे उनकी ओर से प्रस्तुत करवा दें। उसकी वर्तनी बहुत बिगड़ी हुई है, वह बहुत विचित्र ढंग से लिखा है, और हम बड़ी कठिनाई से ही समझ पाते हैं कि उनका अभिप्राय क्या है। तो भी उसमें इतना तो है कि हमें पता चल जाए कि उन्हें क्या चाहिए। सबसे पहले हम उनके लिये उसकी एक साफ प्रतिलिपि बनाते हैं, और फिर उनका मामला लिखकर नीचे अपना नाम लिख देते हैं। और यदि हमारा कुछ प्रभाव है, तो निःसन्देह आवेदन-पत्र के नीचे हस्ताक्षर किए गए नाम की सामर्थ्य से उन्हें वह मिल जाता है जो वे चाहते हैं।
प्रभु यीशु मसीह हमारी दीन प्रार्थनाओं के साथ ठीक यही करता है! वह उनकी साफ प्रतिलिपि बनाता है, उन पर अपने प्रायश्चित्त के लहू की मुहर लगाता है, नीचे अपना नाम लिखता है, और इस प्रकार वे परमेश्वर के सिंहासन तक ऊपर जाती हैं। वह तुम्हारी प्रार्थना है, परन्तु अहा, वह उसकी प्रार्थना भी है! और उसका उसकी प्रार्थना होना ही उसे प्रबल बनाता है। अब, यह तो भारी हथौड़े की चोट जैसा तर्क है—यदि कौवे अकेले पुकारकर प्रबल होते हैं, यदि उनकी दीन बड़बड़ाहट अपने आप में उन्हें वह दिला देती है जिसकी उन्हें आवश्यकता है—तो उस दीन काँपते पापी की करुण बिनतियाँ कितनी अधिक प्रबल होंगी जो कह सकता है, “यीशु के निमित्त,” और जो अपने सब तर्कों को इस धन्य विनती से पक्का कर सकता है, “प्रभु यीशु मसीह इसके योग्य है! हे प्रभु, उसके निमित्त यह मुझे दे”?
मुझे पूरा भरोसा है कि ये खोजनेवाले, जिनसे मैं बात कर रहा हूँ, जो इतने समय से पुकारते आए हैं और तो भी डरते हैं कि उनकी कभी न सुनी जाएगी, उन्हें अब और अधिक प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी, वरन् शीघ्र ही उन्हें शान्ति का अनुग्रहपूर्ण उत्तर मिलेगा! और यदि उन्हें अभी अपने मन की इच्छा न मिले, तो मैं आशा करता हूँ कि वे तब तक लगे रहने को प्रोत्साहित हों जब तक अनुग्रह का दिन न निकले। तुम्हारे पास एक प्रतिज्ञा है जो कौवों के पास नहीं, और यदि समय हमें उस पर ठहरने देता तो वह एक और तर्क बन सकती थी। हे काँपनेवाले, जब तुम्हारे पास विनती में रखने को एक प्रतिज्ञा है, तो कभी मत डरो—अनुग्रह के सिंहासन पर तुम्हारी अवश्य सुनी जाएगी!
और अब, अन्त में, मैं पापी से यह कहूँ: यदि तुमने बिना सफलता के पुकारा है, तो भी पुकारते रहो। “फिर सात बार जा,” हाँ, और सात बार के सत्तर गुने तक! स्मरण रखो कि मसीह यीशु में परमेश्वर की दया ही तुम्हारी एकमात्र आशा है!
तो उसे वैसे ही थामे रहो जैसे डूबता हुआ मनुष्य पहुँच के भीतर की एकमात्र रस्सी को थामे रहता है। यदि तुम बहुमूल्य लहू के द्वारा दया के लिये प्रार्थना करते हुए नाश हो जाओ, तो तुम पहले होगे जो कभी इस प्रकार नाश हुआ! पुकारते रहो! बस पुकारते रहो! परन्तु अहा, विश्वास भी करो! क्योंकि विश्वास करना भोर का तारा और पौ का फटना ले आता है।
जब जॉन राइलैंड की पत्नी बेट्टी मृत्यु-शय्या पर थी, तो वह मन में बड़े संकट में थी, यद्यपि वह बहुत वर्षों से मसीही थी। उसके पति ने अपनी अनोखी परन्तु बुद्धिमानी की रीति से उससे कहा, “भला, बेट्टी, तुम्हें क्या कष्ट है?” “आह, जॉन, मैं मर रही हूँ, और मुझे कोई आशा नहीं, जॉन!” “परन्तु, मेरी प्रिय, तो फिर तुम कहाँ जा रही हो?” “मैं नरक जा रही हूँ!” उत्तर मिला। “भला,” उसने कहा, अपनी गहरी पीड़ा को अपने सामान्य विनोद से ढाँपते हुए, और ऐसी चोट करने के अभिप्राय से जो ठीक निशाने पर लगे और उसके सन्देहों को शीघ्र भगा दे, “जब तुम वहाँ पहुँचोगी, तो क्या करने का विचार रखती हो, बेट्टी?” वह भली स्त्री कोई उत्तर न दे सकी, और श्रीमान राइलैंड ने आगे कहा, “क्या तुम समझती हो कि वहाँ पहुँचकर तुम प्रार्थना करोगी?”
“आह, जॉन,” उसने कहा, “मैं तो कहीं भी प्रार्थना करूँगी। मैं प्रार्थना किए बिना रह ही नहीं सकती!” “तो भला,” उसने कहा, “वे कहेंगे, ‘यह बेट्टी राइलैंड यहाँ प्रार्थना कर रही है। इसे बाहर निकालो! हम यहाँ किसी को प्रार्थना करने न देंगे! इसे बाहर निकालो!” इस बात को कहने की इस अनोखी रीति से उसके प्राण में ज्योति आ गई, और उसने तुरन्त देख लिया कि यह सन्देह ही कितना बेतुका है कि कोई प्राण सचमुच मसीह को खोजे और फिर भी उसकी उपस्थिति से सदा के लिये निकाल दिया जाए! पुकारते रहो, हे प्राण! पुकारते रहो! जब तक बच्चा रो सकता है, तब तक वह जीवित है। और जब तक तुम दया के सिंहासन को घेर सकते हो, तब तक तुम्हारे लिये आशा है! परन्तु पुकारने के साथ सुनो भी, और जो सुनो उस पर विश्वास करो, क्योंकि विश्वास करने से ही शान्ति मिलती है।
परन्तु थोड़ा ठहरो, मुझे कुछ और कहना है। क्या यह सम्भव है कि जिस आशीष के लिये तुम पुकार रहे हो, वह तुम्हें पहले ही मिल चुकी हो? “आह,” तुम कहते हो, “मैं ऐसी वस्तु न माँगता जो मुझे पहले ही मिल चुकी हो! यदि मैं जानता कि वह मेरे पास है, तो मैं पुकारना छोड़कर परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने लगता।” अब, मैं नहीं जानता कि तुम सब खोजनेवाले ऐसी सुरक्षित दशा में हो या नहीं, परन्तु मुझे निश्चय है कि कुछ खोजनेवाले प्राण ऐसे हैं जिन्हें वह दया मिल चुकी है जिसके लिये वे माँग रहे हैं। प्रभु आज रात उनसे यह कहने के बदले कि “मेरे दर्शन के खोजी हो,” यह कह रहा है, “तू क्यों मेरी दुहाई दे रहा है? अपनी प्रसन्नता के समय मैंने तेरी सुन ली, और प्रसन्नता के समय में मैंने तेरी सहायता की है। मैंने तेरे अपराधों को काली घटा के समान और तेरे पापों को बादल के समान मिटा दिया है। मैंने तेरा उद्धार किया है। तू मेरा ही है। मैंने तुझे तेरे सब पापों से शुद्ध किया है। अपना मार्ग ले और आनन्द कर।”
ऐसी दशा में व्याकुल प्रार्थना की अपेक्षा विश्वास से भरी स्तुति अधिक उचित है। “आह,” तुम कहते हो, “परन्तु यह सम्भव नहीं जान पड़ता कि जब मैं अभी भी दया को खोज रहा हूँ, तब वह मेरे पास हो।” अच्छा, मैं नहीं जानता। दया कभी-कभी फाटक के बाहर मूर्छित होकर गिर पड़ती है। क्या यह सम्भव नहीं कि मूर्छा की दशा में ही उसे भीतर ले जाया जाए, और वह इस पूरे समय यही समझती रहे कि वह अब भी बाहर ही है? वह कुत्ते को अब भी भौंकते सुन सकती है, परन्तु आह, बेचारा प्राण, जब वह होश में आएगी, तो पाएगी कि वह छोटे फाटक के भीतर है और सुरक्षित है!
इसी प्रकार तुम में से कुछ ठीक उसी समय निराशा की मूर्छा में पड़ गए होंगे जब तुम मसीह के पास आ रहे थे। यदि ऐसा है, तो प्रभुतासम्पन्न अनुग्रह तुम्हें फिर से सचेत करे, और सम्भव है आज रात मैं ही ऐसा करने का साधन बनूँ। तुम किस बात की बाट जोह रहे हो? तुम में से कुछ उज्ज्वल दर्शन देखने की आशा कर रहे हैं, परन्तु मैं आशा करता हूँ कि तुम्हारी यह इच्छा कभी पूरी न हो, क्योंकि वे हजार के बदले एक पैसे के भी योग्य नहीं। आश्चर्यकर्मों के दिनों के बाद से संसार के सब दर्शन मिलाकर भी अन्त में केवल सपने ही हैं—और सपने व्यर्थता के सिवाय और कुछ नहीं! लोग रात को बहुत अधिक भोजन कर लेते हैं और फिर सपने देखते हैं—यह अपच है, या मस्तिष्क की कोई रोगी सक्रियता—और बस इतना ही! यदि मन-फिराव का तुम्हारे पास यही एकमात्र प्रमाण है, तो तुम उस पर सन्देह करो तो अच्छा करोगे। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि उससे कभी सन्तुष्ट न हो—अपनी अनन्त आशाओं को उस पर खड़ा करना निकम्मे कूड़े पर घर बनाना है।
सम्भव है तुम बहुत विचित्र भावनाओं की बाट जोह रहे हो—ठीक बिजली का झटका तो नहीं, परन्तु कुछ बहुत ही अनोखा और निराला। मेरा विश्वास करो, तुम्हें उन विचित्र हलचलों को अनुभव करने की कभी आवश्यकता नहीं जिन्हें तुम इतना मूल्यवान समझते हो। वे सब विचित्र भावनाएँ जिनकी चर्चा कुछ लोग मन-फिराव के सम्बन्ध में करते हैं, उनके लिये कुछ भली हों या न हों, परन्तु मुझे निश्चय है कि उनका मन-फिराव से वास्तव में ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं कि वे उसके लिये किसी भी रूप में आवश्यक हों!
मैं तुमसे एक-दो प्रश्न पूछूँगा। क्या तुम अपने आप को पापी मानते हो? “हाँ,” तुम कहते हो। परन्तु मान लो मैं उस “पापी” शब्द को अलग रख दूँ? क्या तुम्हारा अर्थ यह है कि तुम विश्वास करते हो कि तुमने परमेश्वर की व्यवस्था तोड़ी है, कि तुम परमेश्वर के शासन के विरुद्ध एक निकम्मे अपराधी हो? क्या तुम विश्वास करते हो कि तुमने, कम से कम अपने हृदय में, सब आज्ञाओं को तोड़ा है, और उसी के अनुसार दण्ड के योग्य हो? “हाँ,” तुम कहते हो, “मैं न केवल यह विश्वास करता हूँ, वरन् इसका अनुभव भी करता हूँ! यह एक बोझ है जिसे मैं प्रतिदिन अपने साथ लिये फिरता हूँ।”
अब कुछ और—क्या तुम विश्वास करते हो कि प्रभु यीशु मसीह तुम्हारा यह सारा पाप दूर कर सकता है? हाँ, तुम इसका विश्वास करते हो। तो क्या तुम अपने उद्धार के लिये उस पर भरोसा रख सकते हो? तुम्हें उद्धार की आवश्यकता है। तुम अपना उद्धार आप नहीं कर सकते। क्या तुम अपने उद्धार के लिये उस पर भरोसा रख सकते हो? “हाँ,” तुम कहते हो, “मैं तो पहले से ही ऐसा करता हूँ।” तो, मेरे प्रिय मित्र, यदि तुम सचमुच यीशु पर भरोसा रखते हो, तो यह निश्चित है कि तुम्हारा उद्धार हो चुका है, क्योंकि तुम्हारे पास उद्धार का वह एकमात्र प्रमाण है जो हम में से किसी के साथ निरन्तर बना रहता है! और भी प्रमाण हैं जो बाद में आते हैं, जैसे पवित्रता और आत्मा के अनुग्रह-गुण, परन्तु वह एकमात्र प्रमाण जो जीवित मनुष्यों में सबसे उत्तम के साथ भी निरन्तर बना रहता है, यह है—
“अपने हाथों में कुछ न लाता,
केवल तेरे क्रूस से लिपट जाता।”
क्या तुम फेरीवाले जैक का यह पद कह सकते हो—
“मैं दीन पापी हूँ, कुछ भी नहीं,
पर यीशु मसीह मेरा सब में सब है”?
मैं आशा करता हूँ कि आगे चलकर कुछ बातों में तुम अनुभव में इससे बहुत आगे बढ़ोगे, परन्तु अपने प्रमाण के आधार और अपनी आशा के कारण के विषय में मैं नहीं चाहता कि तुम एक इंच भी आगे बढ़ो। बस वहीं ठहरो, और यदि अब तुम अपने भीतर या बाहर की हर वस्तु से दृष्टि हटाकर यीशु मसीह की ओर देखते हो, और परमेश्वर के सामने अपने ग्रहण किए जाने के आधार के रूप में कलवरी पर उसके दुःखों और उसके सम्पूर्ण प्रायश्चित्त के काम पर भरोसा रखते हो, तो तुम्हारा उद्धार हो चुका है! तुम्हें और किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं! तुम मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुके हो। “जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती।” “जो कोई विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसी का है।”
यदि अभी, जब मैं अपने द्वार से निकलकर अपनी वस्त्र-कोठरी की ओर जाऊँ, उस गलियारे में मुझे कोई स्वर्गदूत मिले, और वह कहे—“चार्ल्स स्पर्जन, मैं स्वर्ग से तुम्हें यह बताने आया हूँ कि तुम्हें क्षमा मिल गई है,” तो मैं उससे कहूँगा—“यह तो मैं तुम्हारे कुछ भी बताए बिना जानता हूँ! मैं इसे तुम्हारे अधिकार से कहीं उत्तम अधिकार के आधार पर जानता हूँ।” और यदि वह मुझसे पूछता कि मैं यह कैसे जानता हूँ, तो मैं उत्तर देता, “परमेश्वर का वचन मेरे लिये किसी स्वर्गदूत के वचन से उत्तम है, और उसने यह कहा है—‘जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती।’ मैं उस पर विश्वास करता हूँ, और इसलिए मुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं—और यह मैं बिना किसी स्वर्गदूत के बताए जानता हूँ।”
हे व्याकुल लोगो, स्वर्गदूतों, चिह्नों, प्रमाणों और संकेतों की बाट न जोहो। यदि तुम यीशु के पूरे किए हुए काम पर टिके हो, तो तुम्हारे पास संसार में अपने उद्धार का सबसे उत्तम प्रमाण पहले से है! इसके लिये तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन है—और क्या चाहिए? क्या तुम परमेश्वर के वचन को नहीं मान सकते? तुम अपने पिता का वचन मान सकते हो। तुम अपनी माता का वचन मान सकते हो— तो तुम परमेश्वर का वचन क्यों नहीं मान सकते? अहा, हमारे हृदय कितने नीच होंगे कि हम स्वयं परमेश्वर पर सन्देह करें!
सम्भव है तुम कहो कि तुम ऐसा कभी न करोगे। अहा, परन्तु यदि तुम मसीह पर भरोसा नहीं रखते, तो तुम परमेश्वर पर सन्देह करते हो—क्योंकि, “जिसने परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया, उसने उसे झूठा ठहराया।” यदि तुम मसीह पर भरोसा नहीं रखते, तो तुम वास्तव में यह कहते हो कि परमेश्वर झूठा है! तुम ऐसा कहना नहीं चाहते, है न? अहा, परमेश्वर की सच्चाई पर विश्वास करो! परमेश्वर का आत्मा तुम्हें विवश करे कि तुम पिता की दया पर, पुत्र के लहू की सामर्थ्य पर, और पवित्र आत्मा की इस इच्छा पर विश्वास करो कि वह पापियों को अपने पास ले आए!
आओ, मेरे प्रिय सुननेवालो, इस प्रार्थना में मेरे साथ सम्मिलित हो कि ईश्वरीय अनुग्रह तुम्हें यीशु में वह सब देखने की ओर ले चले जिसकी तुम्हें आवश्यकता है—
“प्रार्थना प्राणी का बल है, उसकी साँस और उसका अस्तित्व।
प्रार्थना वह सुनहरी कुंजी है जो दया का छोटा फाटक खोल सकती है।
प्रार्थना वह अद्भुत स्वर है जिसने नियति से कहा, ऐसा ही हो।
प्रार्थना वह पतली नस है जो सर्वशक्तिमान की माँसपेशियों को चलाती है,
इसलिए, हे प्राणी, प्रार्थना कर, क्योंकि तेरी आवश्यकताएँ बहुत और बड़ी हैं।
तेरा मन, तेरा विवेक और तेरा अस्तित्व, तेरी आवश्यकताएँ तुझे प्रार्थना के लिये सौंपती हैं,
सब चिन्ताओं का उपचार, सब पीड़ाओं की महा-औषधि,
सन्देह का नाशक, विनाश का उपाय, सब व्याकुलताओं का विष-नाशक।”
अध्याय 13 पूरा हुआ
कौवों की पुकार