प्रार्थना में महान सामर्थ्य
प्रार्थना की सामर्थ्य और स्तुति का आनन्द

अध्याय 11 · 42 मिनट का पठन

प्रार्थना की सामर्थ्य और स्तुति का आनन्द

“और तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे, कि जो वरदान बहुतों के द्वारा हमें मिला, उसके कारण बहुत लोग हमारी ओर से धन्यवाद करें। क्योंकि हम अपने विवेक की इस गवाही पर घमण्ड करते हैं, कि जगत में और विशेष करके तुम्हारे बीच हमारा चरित्र परमेश्वर के योग्य ऐसी पवित्रता और सच्चाई सहित था, जो शारीरिक ज्ञान से नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह के साथ था।” 2 कुरिन्थियों 1:11,12।

प्रेरित पौलुस अद्भुत ईश्वरीय विधानों के द्वारा आसिया में सिर पर मँडराते हुए संकट से छुड़ाया गया था। इफिसुस के उस बड़े बलवे के समय, जब देमेत्रियुस और उसके साथी, मन्दिर की मूरतें बनानेवाले कारीगरों ने उसके विरुद्ध बड़ा हुल्लड़ मचाया, क्योंकि उन्होंने देखा कि उनका धन्धा जोखिम में पड़ गया है, तब पौलुस का प्राण बड़े संकट में था। इसी कारण वह लिखता है, “हम ऐसे भारी बोझ से दब गए थे, जो हमारी सामर्थ्य से बाहर था, यहाँ तक कि हम जीवन से भी हाथ धो बैठे थे।” प्रेरित अपने इस अनोखे बचाव का श्रेय केवल परमेश्वर ही को देता है। और यदि उसका संकेत उस अवसर की ओर भी था जब उस पर पथराव किया गया और उसे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया गया, तो उसके धन्यवाद के ये शब्द बहुत ही उपयुक्त ठहरते हैं, “परमेश्वर, जो मरे हुओं को जिलाता है।”

इसके अतिरिक्त प्रेरित इस बात से कि परमेश्वर ने बीते समय में उसे इस प्रकार छुड़ाया था, और वह वर्तमान में भी उसका सहायक बना हुआ था, यह निष्कर्ष निकालता है कि वह भविष्य में भी उसके संग रहेगा। पौलुस सब प्रकार के हिसाब-किताब में निपुण है—उसका विश्वास सदा एक तैयार गणक-पुस्तिका के समान था—और यहाँ हम उसे विश्वासी के त्रैराशिक नियम से हिसाब लगाते हुए पाते हैं। वह बीते हुए से वर्तमान तक, और वर्तमान से आनेवाली बातों तक तर्क करता है। हमारे पाठ से पहले का पद त्रैराशिक नियम के द्वारा एक सान्त्वना भरे निष्कर्ष तक पहुँचने का एक उज्ज्वल उदाहरण है—“उसी ने हमें मृत्यु के ऐसे बड़े संकट से बचाया, और बचाएगा; और उससे हमारी यह आशा है, कि वह आगे को भी बचाता रहेगा।”

क्योंकि हमारा परमेश्वर “कल और आज और युगानुयुग एक-सा है,” इसलिए बीते समय में उसका प्रेम इस बात का अचूक आश्वासन है कि आज भी वह कृपा करेगा, और उतनी ही निश्चित जमानत है कि कल भी वह विश्वासयोग्य रहेगा। हमारी परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, हमारा मार्ग चाहे कितना ही उलझा हुआ हो, और हमारा क्षितिज चाहे कितना ही अन्धकारमय हो, यदि हम इस नियम से तर्क करें, “उसने किया है, वह करता है, वह करेगा,” तो हमारी सान्त्वना कभी नष्ट नहीं हो सकती। तो फिर, हे इस्राएल के दुःखी वंश, हियाव बाँधो। यदि तुम्हारा काम किसी बदलनेवाले परमेश्वर से पड़ता, तो तुम्हारे प्राण कड़वाहट से भर सकते थे—परन्तु क्योंकि वह “कल और आज और युगानुयुग एक-सा है,” इसलिए उसके अनुग्रह का हर बार दोहराया गया प्रकाशन तुम्हारे लिये उस पर विश्राम करना और भी सहज बना दे। उसकी सच्चाई का हर नया अनुभव उसके अनुग्रह पर तुम्हारे भरोसे को और दृढ़ करे। परम धन्य आत्मा हमें सिखाए कि हम अपने सदा विश्वासयोग्य प्रभु पर पवित्र भरोसे में बढ़ते जाएँ।

यद्यपि हमारे प्रेरित ने इस प्रकार अपने छुटकारे में परमेश्वर का हाथ, और केवल परमेश्वर ही का हाथ माना, तो भी वह इतना मूर्ख न था कि दूसरे कारणों का इन्कार करे या उन्हें तुच्छ जाने। इसके विपरीत, पहले सब प्रकार की शान्ति के परमेश्वर की स्तुति करके, अब वह उन बहुत से प्रेमी मध्यस्थों की सच्चे मन से की गई प्रार्थनाओं को कृतज्ञता के साथ स्मरण करता है। परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता कभी भी मनुष्य के प्रति कृतघ्नता का बहाना नहीं बननी चाहिए। यह सच है कि यहोवा ने अन्यजातियों के प्रेरित की रक्षा की, परन्तु उसने यह प्रार्थना के उत्तर में किया। वह चुना हुआ पात्र दुष्टों के डण्डे से टूटा नहीं, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर का बढ़ाया हुआ हाथ उसकी ढाल था—परन्तु वह हाथ इसलिए बढ़ाया गया था कि कुरिन्थुस के लोगों ने, और हर स्थान पर परमेश्वर के पवित्र लोगों ने, अपनी मिली-जुली विनतियों के द्वारा अनुग्रह के सिंहासन पर प्रबलता पाई थी।

उन सफल विनतियों का उल्लेख पाठ में कृतज्ञता के साथ किया गया है, “तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे,” और वह चाहता है कि अब भाई-बहन अपनी स्तुति को उसकी स्तुति के साथ मिलाएँ, “कि जो वरदान बहुतों के द्वारा हमें मिला, उसके कारण बहुत लोग हमारी ओर से धन्यवाद करें।” वह आगे यह भी कहता है कि उनके प्रेम पर उसका अधिकार है, क्योंकि वह उन कुछ लोगों के समान न था जो अपनी सौंपी हुई जिम्मेदारी में विश्वासघाती निकले, वरन् उसका विवेक शुद्ध था कि उसने वचन का प्रचार सीधाई और सच्चाई के साथ किया था।

जब हम इन विषयों पर बोल रहे हैं, तब अभिषेक करनेवाला आत्मा अभी उतरे कि वे हमारे लिये लाभदायक ठहरें। पहले, हम मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य को स्वीकार करेंगे। दूसरे, तुम्हें मिलकर स्तुति करने को उभारेंगे। और फिर तीसरे स्थान पर, तुम पर अपने आनन्दमय दावे पर बल देंगे—ऐसा दावा जो केवल हमारा ही नहीं, वरन् परमेश्वर के उन सब सेवकों का है जो सच्चाई से आत्माओं के लिये परिश्रम करते हैं।

I. तो पहले, प्रिय मित्रो, आज भोर मेरा कर्तव्य और मेरा सौभाग्य यह है कि मैं मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य को स्वीकार करूँ।

परमेश्वर को यह भाया है कि वह प्रार्थना को वह उमड़ती और आनन्द करती हुई नदी बनाए, जिसके द्वारा हमारी अधिकतर उत्तम दयाएँ हम तक बहकर आती हैं। वह वह सुनहरी कुंजी है जो हमारे स्वर्गीय यूसुफ के भरे-पूरे अन्नभण्डारों को खोलती है। वाचा की हर एक दया पर यह लिखा है, “इस्राएल के घराने में फिर मुझसे विनती की जाएगी कि मैं उनके लिये यह करूँ।” कुछ दयाएँ ऐसी हैं जो बिना माँगे आती हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें भी मिल जाता है जो उसे ढूँढ़ते भी न थे। परन्तु कुछ और अनुग्रह ऐसे हैं जो केवल उन्हीं मनुष्यों को दिए जाते हैं जो माँगते हैं, और इसलिए पाते हैं—जो ढूँढ़ते हैं, और इसलिए पाते हैं—जो खटखटाते हैं, और इसलिए भीतर प्रवेश पाते हैं।

परमेश्वर को हमें प्रार्थना करने की आज्ञा देना क्यों भाया, यह जान लेना कठिन नहीं है, क्योंकि प्रार्थना मनुष्य को आराधना की सबसे दीन मुद्रा में रखकर परमेश्वर की महिमा करती है। प्रार्थना में सृष्टि अपने सृष्टिकर्ता को श्रद्धा के साथ मानती है और यह अंगीकार करती है कि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान उसी का दिया हुआ है। आँख प्रभु की महिमा को निहारने के लिये ऊपर उठती है, जबकि घुटने मानी हुई निर्बलता की दीनता में धरती की ओर झुकते हैं। यद्यपि प्रार्थना आराधना का सबसे ऊँचा रूप नहीं है, नहीं तो स्वर्ग में पवित्र लोग भी उसे करते रहते, तो भी वह सबसे दीन रूप है, और इसलिए अपूर्ण मांस और लहू को जैसी दिखाई देती है वैसी उस सिद्ध की महिमा को प्रकट करने के लिये सबसे उपयुक्त है।

“हे हमारे पिता,” से, जिसमें हम सम्बन्ध का दावा करते हैं, लेकर “राज्य और पराक्रम और महिमा,” तक, जिसे हम एकमात्र सच्चे परमेश्वर को सौंपते हैं, प्रार्थना का हर एक वाक्य परमप्रधान का आदर करता है। दीन विनती करनेवालों की आहें और आँसू उतने ही सच्चे रूप में ग्रहणयोग्य हैं जितना करूबों और सारापों का निरन्तर “पवित्र, पवित्र, पवित्र,” पुकारना। क्योंकि अपने मूल स्वभाव में व्यक्तिगत दोष के सब सच्चे अंगीकार सेनाओं के प्रभु की अनन्त सिद्धताओं को अर्पित की गई श्रद्धांजलि ही हैं। पर्दे के सामने खड़ी वेदी के पवित्र धूप के निरन्तर उठनेवाले धुएँ से भी बढ़कर प्रभु हमारी प्रार्थनाओं से आदर पाता है।

इसके अतिरिक्त, प्रार्थना करने का काम हमें हमारी अयोग्यता सिखाता है, और हम जैसे घमण्डी प्राणियों के लिये यह कोई छोटी आशीष नहीं है। यदि परमेश्वर हमें उनके लिये प्रार्थना करने को विवश किए बिना ही अनुग्रह देता, तो हम कभी न जान पाते कि हम कितने कंगाल हैं। परन्तु सच्ची प्रार्थना घटियों की सूची है, आवश्यकताओं की तालिका है, कंगाल की हैसियत से दायर की गई अर्ज़ी है, छिपे हुए घावों का उघाड़ना है, भीतर छिपी दरिद्रता का प्रकाशन है। जहाँ वह ईश्वरीय धन के लिये आवेदन है, वहीं वह मानवीय खालीपन का अंगीकार भी है। मेरा विश्वास है कि एक मसीही की सबसे स्वस्थ दशा यह है कि वह सदा खाली रहे—और आपूर्ति के लिये सदा प्रभु पर निर्भर रहे। अपने आप में सदा कंगाल और यीशु में धनी रहे—अपने आप में पानी के समान निर्बल—परन्तु बड़े काम करने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी। और इसी कारण प्रार्थना उपयोगी है—क्योंकि जहाँ वह परमेश्वर की आराधना करती है, वहीं वह सृष्टि को वहाँ लिटा देती है जहाँ उसे होना चाहिए—धूल ही में।

प्रार्थना अपने आप में, उस उत्तर से अलग जो वह लाती है, मसीही के लिये बड़ा लाभ है। जैसे दौड़नेवाला प्रतिदिन के अभ्यास से दौड़ के लिये बल प्राप्त करता है, वैसे ही जीवन की बड़ी दौड़ के लिये हम प्रार्थना के पवित्र परिश्रम के द्वारा शक्ति पाते हैं। प्रार्थना परमेश्वर के नन्हे उकाब-बच्चों के पंखों को सँवारती है, कि वे बादलों से ऊपर उड़ना सीखें। प्रार्थना परमेश्वर के योद्धाओं की कमर कसती है और उन्हें कसे हुए स्नायुओं और दृढ़ माँसपेशियों के साथ युद्ध के लिये भेजती है। सच्चे मन से विनती करनेवाला अपनी कोठरी से ऐसे निकलता है जैसे सूर्य पूर्व के कक्षों से उदय होता है, और शूरवीर के समान अपनी दौड़ दौड़ने में हर्षित होता है।

प्रार्थना मूसा का वह उठा हुआ हाथ है जो यहोशू की तलवार से भी बढ़कर अमालेकियों को भगा देता है। वह भविष्यद्वक्ता की कोठरी से छोड़ा गया वह तीर है जो अरामियों की हार की पूर्वसूचना देता है। क्या होगा यदि मैं कहूँ कि प्रार्थना विश्वासी को परमेश्वरत्व के गुणों से ढाँप देती है, मानवीय निर्बलता की कमर ईश्वरीय बल से कसती है, मानवीय मूर्खता को स्वर्गीय बुद्धि में बदल देती है, और व्याकुल नश्वरों को अमर परमेश्वर की शान्ति प्रदान करती है? मैं नहीं जानता कि ऐसा क्या है जो प्रार्थना नहीं कर सकती! हे महान परमेश्वर, मैं दया के सिंहासन के लिये तेरा धन्यवाद करता हूँ, जो तेरी अद्भुत करुणा का एक उत्तम दान है। हमारी सहायता कर कि हम उसका ठीक-ठीक उपयोग करें!

जैसे बहुत सी दयाएँ प्रार्थना के जहाज़ में स्वर्ग से लाई जाती हैं, वैसे ही बहुत से उत्तम और विशेष अनुग्रह ऐसे हैं जो केवल मिलकर की गई प्रार्थना के जहाज़ी बेड़ों के द्वारा ही हम तक पहुँचाए जा सकते हैं। बहुत सी अच्छी वस्तुएँ हैं जो परमेश्वर अपने अकेले एलिय्याहों और दानिय्येलों को देगा, परन्तु यदि तुम में से दो जन किसी बात के लिये जिसे वे माँगें, एक मन के हों, तो परमेश्वर के उदार उत्तरों की कोई सीमा नहीं। सम्भव है कि पतरस बन्दीगृह से कभी बाहर न लाया जाता, यदि सारी कलीसिया उसके लिये बिना रुके प्रार्थना न करती रहती। सम्भव है कि पिन्तेकुस्त कभी न आता, यदि सब चेले आग की जीभों के उतरने की बाट जोहते हुए “एक जगह इकट्ठे” न होते। परमेश्वर को यह भाता है कि वह एक ही विनती करनेवाले को बहुत सी दयाएँ दे, परन्तु कभी-कभी वह मानो कहता है, “तुम सब मेरे सामने उपस्थित होकर मेरी कृपा के लिये विनती करो, क्योंकि यदि तुम्हारे छोटे भाई-बहन भी तुम्हारे संग न हों, तो तुम मेरे सम्मुख न आने पाओगे।”

प्रिय मित्रो, ऐसा क्यों है? मैं समझता हूँ कि इस प्रकार हमारा अनुग्रहकारी प्रभु पवित्र लोगों की सहभागिता के प्रति अपना आदर प्रकट करता है। “मैं पवित्र लोगों की सहभागिता पर विश्वास करता हूँ” महान मसीही विश्वास-वचन का एक अनुच्छेद है, परन्तु कितने थोड़े हैं जो इसे समझते हैं। अहा, परमेश्वर के लोगों के बीच सच्ची एकता नाम की एक वस्तु है। हम अलग-अलग नामों से पुकारे जा सकते हैं—

“परन्तु हमारे राजा के सब सेवक, स्वर्ग में और पृथ्वी पर, एक ही हैं।”

हम अपने भाइयों और बहनों की सहायता और प्रेम को खोने का जोखिम नहीं उठा सकते। ऑगस्टीन कहता है, “कंगाल धनवानों के लिये बनाए गए हैं और धनवान कंगालों के लिये।” मुझे कोई सन्देह नहीं कि बलवन्त पवित्र लोग निर्बल पवित्र लोगों के लिये बनाए गए हैं, और यह कि निर्बल पवित्र लोग पूरी बढ़त पाए हुओं पर विशेष आशीषें लाते हैं। सारी देह में एक सुसंगति है—हर एक जोड़ बाकी हर एक का कुछ न कुछ ऋणी है—और सारी देह उस सहायता के द्वारा जो हर एक जोड़ पहुँचाता है, आपस में बँधी और गठी हुई है। मानव शरीर में कुछ ग्रन्थियाँ ऐसी हैं जिन्हें शरीर-रचना का विद्वान भी मुश्किल से समझ पाता है। उदाहरण के लिये, वह यकृत के विषय में कह सकता है कि वह एक बहुत मूल्यवान रस उत्पन्न करता है जो शरीर की व्यवस्था में अत्यन्त मूल्य रखता है। परन्तु कुछ और स्राव ऐसे हैं जिनका अलग मूल्य वह निश्चित नहीं कर पाता। तो भी, निःसन्देह, यदि वह ग्रन्थि निकाल दी जाए, तो सारी देह बहुत अधिक कष्ट पा सकती है।

और इसी प्रकार, प्रिय मित्रो, कुछ विश्वासी ऐसे हो सकते हैं जिनके विषय में हम कह सकते हैं, “मैं नहीं जानता कि उनका क्या उपयोग है। मैं नहीं बता सकता कि वह मसीही क्या भलाई करता है।” तो भी यदि वह तुच्छ और देखने में निकम्मा अंग हटा दिया जाए, तो सारी देह को कष्ट उठाना पड़ सकता है, सारा ढाँचा रोगी हो सकता है, और सारा हृदय मूर्छित हो सकता है। सम्भवतः यही कारण है कि स्वर्ग के प्रेम के बहुत से भारी वरदान केवल मिलकर की गई विनती के उत्तर में दिए जाते हैं—कि हम सारी देह का उपयोग पहचानें और इस प्रकार उस सच्ची, जीवित एकता को मानने के लिये विवश हों जिसे ईश्वरीय अनुग्रह ने बनाया है—और जिसे वह परमेश्वर के लोगों के बीच प्रतिदिन बनाए रखता है। प्रिय मित्रो, क्या यह आनन्द का विचार नहीं कि कलीसिया का सबसे कंगाल और सबसे अनजाना सदस्य भी देह के बल में कुछ जोड़ सकता है?

हम सब प्रचार नहीं कर सकते। हम सब शासन नहीं कर सकते। हम सब सोना और चाँदी नहीं दे सकते—परन्तु हम सब अपनी प्रार्थनाएँ दे सकते हैं। ऐसा कोई नया विश्वासी नहीं, चाहे ईश्वरीय अनुग्रह में वह केवल दो-तीन दिन ही का क्यों न हो, जो प्रार्थना न कर सके। यीशु में ऐसी कोई खाट पर पड़ी बहन नहीं जो प्रार्थना न कर सके। ऐसा कोई रोगी, बूढ़ा, दुर्बल-बुद्धि, अनजाना, अनपढ़ या कंगाल विश्वासी नहीं जो साझे भण्डार में अपनी विनतियाँ न जोड़ सके। यही कलीसिया का धन है। हम द्वार पर पेटियाँ रखते हैं कि परमेश्वर के काम के लिये तुम्हारी भेंटें ग्रहण करें—स्मरण रखो कि कलीसिया के भीतर एक आत्मिक पेटी है जिसमें हम सबको अपनी प्रेम भरी मध्यस्थता की प्रार्थनाएँ डालनी चाहिए, मानो प्रभु के भण्डार में। वह विधवा भी, जिसके पास दो दमड़ियाँ तक न हों, इस भण्डार में अपनी भेंट डाल सकती है। तो फिर, प्रिय मित्रो, देखो कि परमेश्वर के लोगों के बीच कैसी एकता और कैसी सहभागिता है, क्योंकि कुछ दयाएँ ऐसी हैं जो केवल तभी दी जाती हैं जब पवित्र लोग मिलकर प्रार्थना करते हैं।

हमें एकता के इस बन्धन का कैसा अनुभव करना चाहिए! हमें एक दूसरे के लिये कैसी प्रार्थना करनी चाहिए! जितनी बार कलीसिया विनती के लिये इकट्ठी हो, उतनी बार वहाँ उपस्थित होना हम सबको अपना बाध्य कर्तव्य कैसे समझना चाहिए! मैं चाहता हूँ कि तुम में से कुछ, जो किसी छोटे से बहाने पर प्रार्थना-सभा से अनुपस्थित रहते हैं, यह सोचें कि तुम हम सबको कितना लूटते हो। प्रार्थना-सभा एक अनमोल व्यवस्था है, जो और सब सभाओं और सेवा-कार्यों को बल पहुँचाती है। क्या तुम में से बहुत से ऐसे नहीं हैं जो अपने समय में से थोड़ा बचाकर और अपने कामों को थोड़ा समेटकर हमारे बीच कुछ अधिक बार आ सकते हैं? और यदि कभी-कभार तुम्हारा कोई ग्राहक छूट भी जाए, तो क्या तुम नहीं सोचते कि यह हानि दूसरे दिनों के तुम्हारे लाभ से भली-भाँति पूरी हो सकती है? और यदि ऐसा न भी हो, तो क्या आत्मिक लाभ किसी भी छोटी सी सांसारिक हानि से कहीं बढ़कर न होगा? “एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है।”

अब हम एक और बात कहने के लिये तैयार हैं। यह मिलकर की जानेवाली प्रार्थना विशेष करके परमेश्वर के सेवकों के लिये की जानी चाहिए। यह सार्वजनिक प्रार्थना विशेष रूप से उन्हीं के लिये ठहराई गई है। पौलुस इसे माँगता है—“हे भाइयों, हमारे लिये प्रार्थना करो।” और अन्तिम समय तक परमेश्वर के सब सेवक सदा यही मानेंगे कि यही उनके बल का गुप्त स्रोत है। लोगों की प्रार्थनाएँ ही सेवकों का पराक्रम होनी चाहिए। क्या मैं तुम्हें यह दिखाने का प्रयत्न करूँ कि कलीसिया के किसी भी और मनुष्य से बढ़कर सेवक को लोगों की सच्चे मन से की गई प्रार्थनाओं की आवश्यकता क्यों है? क्या उसका स्थान सबसे जोखिम भरा नहीं है? नरक की सेनाओं को शैतान की आज्ञा यह है, “न तो छोटे से लड़ो और न बड़े से, केवल परमेश्वर के सेवकों से युद्ध करो।” वह जानता है कि यदि वह एक बार इनमें से किसी एक के हृदय को बेध सके, तो चारों ओर गड़बड़ी मच जाएगी। क्योंकि यदि वीर मर गया, तो लोग भाग खड़े होते हैं।

झण्डा उठानेवाले के चारों ओर ही लड़ाई सबसे घनी होती है। वहीं फरसे टोपों पर बजते हैं। वहीं तीर कवच पर ताने जाते हैं, क्योंकि शत्रु जानता है कि यदि वह झण्डे को गिरा दे, या उसके उठानेवाले की खोपड़ी फाड़ दे, तो वह भारी चोट पहुँचाएगा और गहरी निराशा फैला देगा। तो फिर, हे शस्त्रधारी पुरुषो, हमारे चारों ओर घेरा बाँध लो! हे लाल क्रूस के योद्धाओ, हमारी रक्षा के लिये इकट्ठे हो जाओ, क्योंकि लड़ाई गरम होती जा रही है! हम तुम से विनती करते हैं, यदि तुम हमें सेवकाई के पद के लिये चुनते हो, तो हमारे घड़ी-घड़ी के संघर्षों में हमारे पक्ष में दृढ़ता से खड़े रहो। रॉटरडैम से लौटते समय, जब हम मास नदी के मुहाने पर रेत के टीले को पार कर रहे थे, जहाँ उतरे हुए ज्वार और प्रतिकूल हवा के कारण जहाज़ चलाना अत्यन्त जोखिम भरा था, मैंने देखा कि आदेश दिया गया—“सब लोग डेक पर आ जाओ!”

सो मुझे लगता है कि एक सेवक का जीवन इतना जोखिम भरा है कि मैं भली-भाँति पुकार सकता हूँ, “सब लोग डेक पर आ जाओ”—हर एक मनुष्य प्रार्थना में लगे! सबसे निर्बल पवित्र जन भी विनती में लौ लगाए रहे। इसके अतिरिक्त, ऐसे जोखिम भरे स्थान पर खड़े सेवक पर जिम्मेदारी का एक गम्भीर बोझ भी रखा हुआ है। हर एक मनुष्य को किसी हद तक अपने भाई का रखवाला होना चाहिए, परन्तु परमेश्वर के पहरुओं पर हाय, यदि वे विश्वासयोग्य न हों, क्योंकि आत्माओं के खून का लेखा उन्हीं से लिया जाएगा। यदि वे सुसमाचार का प्रचार पूरी रीति से और विश्वासयोग्यता से न करें, तो परमेश्वर मनुष्यों के विनाश का दोष उन्हीं के द्वार पर रखेगा।

ऐसे समय आते हैं जब प्रभु का यह बोझ परमेश्वर के सेवकों पर इतना भारी पड़ता है कि वे पीड़ा से चिल्ला उठते हैं, मानो उनके हृदय वेदना से फट जाएँगे। जब हम उस टीले को पार कर रहे थे, तब मैंने देखा कि कप्तान स्वयं समुद्र में गहराई नापने का सीसा डाल रहा था। और जब किसी ने पूछा कि वह यह काम मल्लाहों से क्यों नहीं करवाता, तो उसने कहा, “इस स्थान पर, ठीक इस समय, मैं सीसा डालने के लिये अपने सिवा किसी और मनुष्य पर भरोसा करने का साहस नहीं करता, क्योंकि हमारे जहाज़ और तल के बीच मुश्किल से छः इंच का अन्तर है।” और सचमुच, हमें एक-दो बार जहाज़ का तल से छूना बड़ा अप्रिय लगा। इसी प्रकार सुसमाचार के हर प्रचारक पर—यदि वह वैसा है जैसा उसे होना चाहिए—ऐसे समय आएँगे जब वह अपने सुननेवालों के लिये भयानक दुविधा में होगा। वह अपना कर्तव्य किसी और के द्वारा पूरा न कर सकेगा, वरन् उसे स्वयं मनुष्यों के लिये परिश्रम करना पड़ेगा—यहाँ तक कि प्रचार के लिये अपने आप पर भी भरोसा न रखकर—अपने परमेश्वर को सहायता के लिये पुकारते हुए, क्योंकि अब वह मनुष्यों के प्राणों के बोझ से दबा जा रहा है।

अहा, हमारे लिये प्रार्थना अवश्य करो! यदि परमेश्वर हमें तुम्हें देता है, और यदि तुम उस दान को बड़े आनन्द से ग्रहण करते हो, तो परमेश्वर और हम दोनों को इतना तुच्छ न जानो कि अपनी प्रार्थनाएँ रोककर हमें कंगाल और दरिद्र छोड़ दो। इसके अतिरिक्त, सेवक की रक्षा कलीसिया के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण बातों में से एक है। तुम जहाज़ से एक मल्लाह को खो सकते हो, और यह उसके लिये भी और तुम्हारे लिये भी बहुत बुरा है। परन्तु यदि मार्गदर्शक जहाज़ से गिर पड़े, या कप्तान रोग से मारा जाए, या पतवार थामनेवाला लहरों में बह जाए, तो फिर जहाज़ क्या करे? इसलिए, यद्यपि कलीसिया के हर एक और व्यक्ति के लिये भी प्रार्थना की जानी चाहिए, तो भी सेवक के लिये वह सबसे पहले और सबसे बढ़कर की जानी चाहिए, उस स्थान के कारण जिस पर वह है।

और फिर, तुम्हारी अपेक्षा उससे कितना अधिक माँगा जाता है? यदि तुम्हें व्यक्तिगत शिक्षा के लिये एक निजी मेज़ लगानी है, तो उसे, मानो, एक सार्वजनिक मेज़ लगानी है, सब आनेवालों के लिये अच्छी-अच्छी वस्तुओं का भोज। और यदि उसका स्वामी उसे भरपूर सामग्री न दे, तो वह यह कैसे कर सकेगा? तुम्हें घर में एक दीपक के समान चमकना है—सेवक को एक प्रकाश-स्तम्भ के समान होना है—कि वह गहरे समुद्र के पार दूर तक दिखाई दे। और यदि उसका स्वामी उसकी बत्ती न सँवारे, और उसे स्वर्ग से नया तेल न दिया जाए, तो वह सारी रात कैसे चमकेगा? उसका प्रभाव तुम्हारे प्रभाव से अधिक विस्तृत है—यदि वह बुराई के लिये हो, तो वह एक घातक विष-वृक्ष ठहरेगा, जिसकी फैली हुई डालियाँ उसकी छाया के नीचे की हर वस्तु को विषैला कर देंगी। परन्तु यदि परमेश्वर उसे अपने दाहिने हाथ का तारा बनाए, तो उसके प्रकाश की किरण अपने सुखद प्रभाव से सारी जातियों को, और युगों के युगों को आनन्दित करेगी। यदि इन सब बातों में कुछ भी सच्चाई है, तो मैं तुम से विनती करता हूँ, अपनी प्रार्थनाओं की सहायता हमें उदारता से और निरन्तर देते रहो।

मैं पाता हूँ कि मूल भाषा में “मिलकर सहायता करने” के लिये जो शब्द है, उसमें बहुत ही सच्चे मन से किए गए परिश्रम का भाव है। कुछ लोगों की प्रार्थनाओं में कोई परिश्रम नहीं होता। परन्तु परमेश्वर के सामने प्रबल होनेवाली एकमात्र प्रार्थना सच्चे मेहनतकश की प्रार्थना है—जिसमें विनती करनेवाला शिमशोन के समान दया के फाटकों को झकझोर डालता है, और भीतर जाने से वंचित किए जाने के बदले उन्हें उखाड़ डालने का परिश्रम करता है। हमें उँगलियों के पोरों वाली प्रार्थनाएँ नहीं चाहिए, जो बोझ को केवल छूकर रह जाती हैं—हमें कन्धों वाली प्रार्थनाएँ चाहिए—जो सच्ची लगन का बोझ उठाती हैं, और जिन्हें उनकी अभिलाषा से वंचित नहीं किया जा सकता। हमें दया के द्वार पर वे नाज़ुक, खटखटाकर भाग जानेवाली थपकियाँ नहीं चाहिए, जो धर्म के दावेदार प्रार्थना-सभाओं में दिखावा करते समय देते हैं। हम ऐसे मनुष्य की खटखटाहट माँगते हैं जो पाने की ठान चुका है, और यह ठान चुका है कि जब तक दया का फाटक खुल न जाए और उसकी सारी आवश्यकता पूरी न हो जाए, तब तक वह वहीं ठहरा रहेगा।

उस मनुष्य की उत्साही, प्रचण्ड प्रबलता, जिसे मना नहीं किया जा सकता, वरन् जो तब तक स्वर्ग को धावा बोलकर जीतने की ठाने रहता है जब तक वह अपने मन की अभिलाषा न पा ले—यही वह प्रार्थना है जिसकी लालसा सेवक अपने लोगों से करते हैं। कहा जाता है कि मेलांकथन को यह समाचार पाकर बड़ी सान्त्वना मिली कि कुछ कंगाल जुलाहे, स्त्रियाँ और बच्चे सुधार-आन्दोलन के लिये प्रार्थना करने को इकट्ठे हुए थे। हाँ, मेलांकथन—यहाँ सान्त्वना के लिये ठोस आधार था। इस बात पर भरोसा रखो, सुधार-आन्दोलन को जो कुछ वह बना, वह केवल लूथर ने नहीं बनाया, वरन् उन हज़ारों कंगाल लोगों ने, जो हल की मूठ पकड़े भजन गाते थे, और उन सैकड़ों सेवकों और सेविकाओं ने, जिन्होंने विनतियाँ चढ़ाईं।

पॉलुस फेगियस के विषय में, जो इब्रानी भाषा का एक प्रसिद्ध विद्वान था और इस देश में सुधार-आन्दोलन को लाने में बड़ा उपयोगी रहा, हमें बताया जाता है कि वह अपने छोटे शिष्यों से बार-बार यह विनती किया करता था कि वे प्रार्थना में लगे रहें, ताकि परमेश्वर उनकी प्रार्थनाओं के उत्तर में आशीष उण्डेलने को प्रसन्न हो। क्या मैंने सौ बार नहीं कहा कि परमेश्वर ने यहाँ जो सब आशीषें हमें दी हैं, हमारी कलीसिया की जो सारी बढ़ती हुई है, वह परमेश्वर के अधीन तुम्हारी सच्चे मन से की गई, उत्कट विनतियों के कारण हुई है? इस भवन में भी और न्यू पार्क स्ट्रीट में भी स्वर्ग को हिला देनेवाले समय आए हैं। हम पर ऐसे समय आए हैं जब हमें लगा कि बिना सुने जाने से तो मर जाना भला। जब हमने अपनी कलीसिया को अपनी छाती से लगाए रखा, जैसे माता अपने बालक को उठाए रहती है। जब हमने मनुष्यों के प्राणों के लिये तड़प और प्रसव की सी पीड़ा का अनुभव किया।

जब हम अपनी कलीसिया को प्रतिदिन बढ़ते, और भीड़ की भीड़ को अब भी वचन सुनने के लिये हमारे होंठों से लटके हुए देखते हैं, तो हम सचमुच कह सकते हैं, “परमेश्वर ने क्या ही विचित्र काम किया है?” क्या अब हम अपनी प्रार्थनाएँ बन्द कर दें? क्या अब हम महान महायाजक से कहें, “बस, इतना बहुत है”? क्या अब हम वेदी पर से दहकते अंगारे उठाकर जलते हुए धूप को बुझा दें? क्या अब हम प्रार्थना और स्तुति के भोर और साँझ के मेम्नों को बलि के लिये लाने से इन्कार करें? हे एप्रैमियो, क्या तुम शस्त्रधारी और धनुर्धारी होने पर भी, युद्ध के समय पीठ दिखाओगे? जल-धारा तुम्हारे आगे दो भाग हो गई है। यरदन नदी उलटी बही है! क्या तुम गहरे जल में से होकर कूच करने से इन्कार करोगे? परमेश्वर, हाँ, तुम्हारा परमेश्वर, तुम्हारे आगे-आगे चढ़ा जाता है। तुम्हारी सेनाओं के बीच राजा की सी ललकार सुनाई देती है!

क्या अब तुम कायर बनकर चढ़ाई करने और देश को अपने अधिकार में लेने से इन्कार करोगे? क्या अब तुम अपना पहला सा प्रेम खो दोगे? क्या इस मिलापवाले तम्बू के माथे पर “ईकाबोद” लिखा जाएगा? क्या यह कहा जाएगा कि परमेश्वर ने तुम्हें त्याग दिया है? क्या वह दिन आएगा जिसमें पलिश्तियों की बेटियाँ आनन्दित होंगी, और अराम के पुत्र जयजयकार करेंगे? यदि नहीं, तो प्रार्थना के सारे बल के साथ फिर से अपने घुटनों पर आओ! यदि नहीं, तो एक बार फिर अपनी प्रचण्ड विनतियों में लग जाओ! यदि नहीं, यदि तुम भलाई को मुरझाते और बुराई को विजयी होते नहीं देखना चाहते, तो फिर से हाथ से हाथ मिलाओ—और उसके नाम से जो विनती करने को सर्वदा जीवित है—एक बार फिर प्रार्थना में प्रबल हो जाओ, कि आशीष फिर से उतरे! “तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे।”

II. अब हमें तुम्हें स्तुति करने के लिये उभारना है। उत्तर पाई हुई प्रार्थना के बाद सदा स्तुति होनी चाहिए। जैसे-जैसे स्वर्ग के प्रेम का सूर्य भूमि को गरमाता है, वैसे-वैसे पृथ्वी की कृतज्ञता का कुहरा ऊपर उठना चाहिए। क्या प्रभु ने तुम पर अनुग्रह किया है, और तुम्हारी विनती के शब्द की ओर कान लगाया है? तो जीवन भर उसकी स्तुति करो। जिसने तुम्हारी प्रार्थना का उत्तर दिया है, और तुम्हें तुम्हारे मन की अभिलाषा दी है, उससे गीत को मत रोको। परमेश्वर की दयाओं पर चुप रहना घोर कृतघ्नता का दोषी बनना है, और कृतघ्नता सबसे बुरे अपराधों में से एक है।

प्रिय मित्रो, मुझे भरोसा है कि तुम उन नौ कोढ़ियों के समान ऐसी नीचता का काम न करोगे, जो अपने कोढ़ से चंगे हो जाने के बाद चंगा करनेवाले प्रभु का धन्यवाद करने को नहीं लौटे। परमेश्वर की स्तुति करना भूल जाना अपने ही लाभ से इन्कार करना है, क्योंकि स्तुति, प्रार्थना के समान, आत्मिक मनुष्य के लिये अत्यन्त उपयोगी है। यह एक ऊँचा और स्वास्थ्यवर्धक अभ्यास है। दाऊद के समान प्रभु के सम्मुख नाचना नसों में लहू को फुर्तीला करना और नाड़ी को और स्वस्थ गति से धड़काना है। स्तुति हमें सुलैमान के भोज के समान एक बड़ा भोज देती है, जिसने हर एक मनुष्य को माँस का एक अच्छा टुकड़ा और दाखमधु का एक कुप्पा दिया।

स्तुति मसीही कर्तव्यों में सबसे अधिक स्वर्गीय है। स्वर्गदूत प्रार्थना नहीं करते, परन्तु वे रात-दिन स्तुति करना नहीं छोड़ते। पाई हुई दयाओं के लिये परमेश्वर को धन्य कहना अपने संगी मनुष्यों को लाभ पहुँचाना है—“नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे।” वे दूसरे लोग, जो ऐसी ही परिस्थितियों में रहे हैं, सान्त्वना पाएँगे यदि हम कह सकें, “मेरे साथ यहोवा की बड़ाई करो, और आओ हम मिलकर उसके नाम की स्तुति करें; इस दीन जन ने पुकारा तब यहोवा ने सुन लिया।” जिनकी जीभ बँधी है ऐसे मसीही कलीसिया के लिये दुःखद अपमान हैं। हमारे बीच ऐसे कुछ हैं—कुछ ऐसे जिनके मुँह पर शैतान ने लगाम कस दी है—और सबसे ऊँचा संगीत जो वे कभी निकालते हैं, वह तब होता है जब वे अपनी चुप्पी की लगाम को चबाते हैं। हे भाइयो और बहनो, मैं चाहता हूँ कि ऐसे सब लोगों में गूँगे अपनी जीभ से जयजयकार करें।

यहाँ एक कदम और आगे बढ़ें। जैसे स्तुति भली और मनभावनी है, मनुष्य को आशीष देती और परमेश्वर की महिमा करती है, वैसे ही मिलकर की गई स्तुति की बहुत ही विशेष सराहना है। मिलकर की गई स्तुति वाद्यवृन्द के संगीत के समान है। एक वाद्य का स्वर अत्यन्त मधुर होता है, परन्तु जब सैकड़ों वाद्य, फूँककर बजनेवाले भी और तारवाले भी, सब मिल जाते हैं, तब वाद्यवृन्द सुरों की एक भव्य धारा निकालता है। एक मसीही की स्तुति परमेश्वर के सामने धूप के एक दाने के समान ग्रहण की जाती है, परन्तु बहुतों की स्तुति लोबान से भरे धूपदान के समान है जो प्रभु के सामने धुआँ देता हुआ ऊपर उठता है। मिलकर की गई स्तुति स्वर्ग का पूर्व-स्वाद है, क्योंकि उस साधारण सभा में वे सब एक साथ, एक मन और एक स्वर से प्रभु की स्तुति करते हैं—

“दस हज़ार हज़ार हैं उनकी जीभें, पर उन सबका आनन्द एक ही है।”

सार्वजनिक स्तुति स्वयं मसीही के लिये भी बहुत सुखद है। उसने कितने बोझ उतार दिए हैं? मुझे निश्चय है कि जब मैं इस भवन में स्तुति का जयघोष सुनता हूँ तो मेरा हृदय गरम हो उठता है। कभी-कभी वह मेरी रुचि के लिये कुछ अधिक धीमा होता है, और मुझे तुम से आग्रह करना पड़ता है कि अपनी गति तेज़ करो, कि महिमामय स्तुति की उमड़ती लहरें अपना पूरा बल दिखा सकें! तो भी सब कमियों के रहते, मेरे हृदय के लिये तुम्हारे संगीत जैसा कोई संगीत नहीं। मेरे डच मित्र प्रभु की स्तुति इतनी धीमी गति से करते हैं कि कोई उनकी लम्बी खिंची हुई तानों से लोरी पाकर भली-भाँति सो जाए। तो भी वहाँ भी बहुत से स्वर मिलकर स्तुति का एक भव्य सुरमेल बना देते हैं।

मुझे परमेश्वर के लोगों को गाते सुनना अच्छा लगता है जब वे सचमुच गाते हैं, न कि जब वह सुरमेल और बेसुरेपन के बीच की कोई खिंची हुई चीज़ हो। अहा, एक पवित्र गीत के लिये, ऊँची स्तुति के एक जयघोष के लिये, जिसमें हर एक मनुष्य का प्राण ताल देता हो, और हर एक मनुष्य की जीभ धुन निकालती हो—और हर एक गानेवाला कृतज्ञता और प्रेम में अपने संगी से बढ़ जाने की ऊँची अभिलाषा रखता हो! परमेश्वर की आराधना में सच्चे हृदयों के मिलन में कुछ अत्यन्त आनन्ददायक बात है—और जब ये हृदय गीत में प्रकट होते हैं— तब वे मनोहर स्वर कितने मधुर लगते हैं। मैं सोचता हूँ कि हमें सप्ताह में एक बार स्तुति-सभा करनी चाहिए। हमारी प्रार्थना-सभा हर सोमवार होती है, और प्रार्थना-सभा हर शनिवार होती है, और प्रार्थना-सभा हर भोर होती है, परन्तु हम स्तुति-सभा क्यों नहीं करते? निश्चय ही कुछ समय ऐसी आराधनाओं के लिये अलग किए जाने चाहिए जो आरम्भ से अन्त तक स्तुति ही से भरी हों। आओ, इस योजना को तुरन्त आज़माएँ।

जैसा मैंने मिलकर की गई प्रार्थना के विषय में कहा कि वह विशेष करके सेवकों के लिये की जानी चाहिए, वैसे ही मिलकर की गई स्तुति को भी प्रायः यही रूप लेना चाहिए। सारी मण्डली को उस दया के लिये परमेश्वर की स्तुति करनी और उसे धन्य कहना चाहिए जो कलीसिया को उसके पास्टरों के द्वारा दी गई है। सुनो, हमारा प्रेरित इसे फिर कैसे कहता है—“कि जो वरदान बहुतों के द्वारा हमें मिला, उसके कारण बहुत लोग हमारी ओर से धन्यवाद करें।” हे भाइयो, हमें अच्छे सेवकों के लिये परमेश्वर की स्तुति करनी चाहिए कि वे जीवित हैं—क्योंकि जब वे मरते हैं तो उनका बहुत सा काम उनके साथ ही मर जाता है। यह आश्चर्य की बात है कि जब तक लूथर और कैल्विन जीवित रहते हैं तब तक सुधार-आन्दोलन कैसे आगे बढ़ता जाता है, और सुधारकों के मरते ही वह कैसे थम जाता है।

भले मनुष्यों की आत्माएँ केवल एक अर्थ में अमर हैं। इस युग में परमेश्वर की कलीसियाएँ न्यायियों के समय के इस्राएलियों के समान हैं। जब न्यायी मर जाते, तब वे फिर खुदी हुई मूरतों के पीछे चले जाते थे। और आज भी ऐसा ही है। जब तक परमेश्वर उस मनुष्य को जीवित रखता है, कलीसिया फलती-फूलती है, परन्तु जब वह मनुष्य मर जाता है, तो जिस उत्साह को उसने फूँक-फूँककर ज्वाला बना दिया था, वह दस में से नौ बार, यदि सौ में से निन्यानवे बार नहीं, राख के बीच सुलगता भर रह जाता है। किसी कलीसिया की समृद्धि सेवक के जीवन पर टिकी होती है। परमेश्वर हमें दीन करने के लिये ऐसा ठहराता है। तो फिर, बचाए गए जीवन के लिये कृतज्ञता होनी चाहिए।

परन्तु सुरक्षित रखे गए चरित्र के लिये तो बड़ी कृतज्ञता होनी चाहिए, क्योंकि अहा, जब कोई सेवक गिरता है, तो वह कैसा कलंक होता है! देखो, जब तुम पुलिस के समाचारों में रेवरेंड श्रीमान _ का दुःखद मामला पढ़ते हो, जिसने अपने आप को बैपटिस्ट सेवक कहलाना चुना था, तो हर कोई कहता है, “कैसी लज्जा की बात है! ये बैपटिस्ट लोग कैसे बुरे होंगे।” अब, संसार का कोई भी मूर्ख अपने आप को बैपटिस्ट सेवक कह सकता है। हमारी स्वतन्त्रता इतनी पूरी है कि कोई नियम या व्यवस्था है ही नहीं। जो कोई मनुष्य दर्जन भर लोगों को अपना प्रचार सुनने के लिये इकट्ठा कर ले, वह सेवक है, कम से कम उनके लिये। इसलिए तुम यह नहीं मान सकते कि ऐसे कुछ कपटी न होंगे जो किसी न किसी प्रकार की प्रतिष्ठा पाने के लिये यह नाम धारण कर लेंगे।

यदि सच्चा सेवक सम्भाला जाता है और अपनी खराई को दृढ़ता से थामे रहने दिया जाता है, तो उसकी ओर से परमेश्वर का निरन्तर धन्यवाद होना चाहिए। यदि सेवक को अच्छी सामग्री से भरपूर रखा जाता है। यदि वह उमड़ते हुए सोते के समान है। यदि परमेश्वर उसे यह वरदान देता है कि वह अपने भण्डार से नई और पुरानी वस्तुएँ निकालकर उसके लोगों को खिलाए, तो हार्दिक धन्यवाद होना चाहिए। और यदि वह खरा बना रहता है, यदि वह न एक ओर तत्त्वज्ञान की ओर मुड़ता है, न दूसरी ओर सिद्धान्त की संकीर्णता की ओर, तो वहाँ भी धन्यवाद होना चाहिए। यदि परमेश्वर जनसाधारण को उसे सुनने की इच्छा देता है, और सबसे बढ़कर, यदि आत्माओं का मन फिरता है और पवित्र लोगों की उन्नति होती है, तो परमेश्वर का आदर और स्तुति कभी न थमनी चाहिए।

अहा, मैं अभी उस विषय में बोल रहा हूँ जिसे तुम सब जानते हो, और तुम बस उस पर सिर हिला देते हो, और सोचते हो कि इसमें कुछ विशेष नहीं। परन्तु यदि तुम्हें थोड़े समय के लिये हॉलैंड में रहना पड़े, तो तुम शीघ्र ही इन बातों का मूल्य समझ जाओगे। वहाँ यात्रा करते समय मैं भक्त मनुष्यों के घरों में ठहरा—परमेश्वर के ऐसे जनों के साथ जिनसे मैं मधुर संगति कर सका—जो उस स्थान में नहीं जा सकते जो कभी उनका आराधना-स्थल था। क्यों नहीं? “महोदय,” वे कहते हैं, “मैं ऐसे आराधना-स्थल में कैसे जाऊँ जहाँ अधिकतर सेवक पवित्रशास्त्र के हर एक वचन का इन्कार करते हैं? केवल रिफॉर्म्ड कलीसिया के ही नहीं, वरन् हॉलैंड के हर एक सम्प्रदाय के! मैं उन विश्वासघातियों की बात कैसे सुनूँ जो कैल्विनवादी या लूथरवादी धर्म-सूत्रों की शपथ खाते हैं, और फिर पुलपिट पर जाकर पुनरुत्थान की वास्तविकता का इन्कार करते हैं, या यह दावा करते हैं कि यीशु का स्वर्गारोहण केवल एक आत्मिक दृष्टान्त है?”

मैं पाता हूँ कि नीदरलैंड्स में वे अविश्वास में हमसे पचास वर्ष आगे हैं। यदि एक विशेष विचारधारा के वे सज्जन, जिन्हें मैं जानता हूँ, बढ़ने दिए गए तो हम शीघ्र ही उनकी बराबरी पर पहुँच जाएँगे। डच धर्मविज्ञानियों ने नव-मतवाद में बड़े-बड़े डग भरे हैं, यहाँ तक कि अब लोग परमेश्वर के सत्य से प्रेम रखते हैं और भीड़ की भीड़ उसे सुनने को तैयार है। परन्तु ये लोग कलीसिया में जाने से पूरी रीति से इन्कार करने को विवश हैं, कहीं ऐसा न हो कि वे किसी रीति से उन विधर्मी और झूठी शिक्षाओं का समर्थन करते दिखें जो हर रविवार उन्हें सुनाई जाती हैं।

अहा, यदि परमेश्वर एक बार इंग्लैंड से उन सेवकों को उठा ले जो साहस और स्पष्टता से सुसमाचार का प्रचार करते हैं, तो तुम परमेश्वर से पुकार उठोगे कि वह दीवट तुम्हें लौटा दे। हम इंग्लैंड के विषय में सचमुच कह सकते हैं—

“तेरे सब दोषों के रहते भी मैं तुझ से अब भी प्रेम करता हूँ।” हमारे यहाँ एक औपनिवेशिक बिशप है जो खुलकर अपना अविश्वास मानता है। हमारे यहाँ सब सम्प्रदायों के कुछ मनुष्य हैं जो चुपके-चुपके सत्य से फिसलते जा रहे हैं। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, वे अभी तक कुछ भी नहीं हैं। मसीह की कलीसियाओं की तुलना में वे डोल की एक बूँद भर हैं, और हमारे बीच के उन लोगों की तुलना में भी जो उतने कैल्विनवादी नहीं हैं जितना हम चाहते। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि बहुत से ऐसे हैं जो कभी पवित्रशास्त्र की ईश्वर-प्रेरणा पर विवाद नहीं करते, और न विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के महान सत्य पर सन्देह करते हैं। हमारे बीच अब भी ऐसे मनुष्य बचे हुए हैं जो परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य हैं, और जैसा यीशु में सत्य है, वैसा ही पूरे सत्य का प्रचार करते हैं।

मैं फिर कहता हूँ, अपने सेवकों के लिये धन्यवादी रहो, क्योंकि यदि तुम वहाँ रखे जाते जहाँ कुछ विश्वासी हैं, तो तुम अपने परमेश्वर की दोहाई देते—“हे प्रभु, अपने भविष्यद्वक्ताओं को हमारे पास लौटा दे। चाहे हम पर अन्न का अकाल भेज या पानी का अकाल, परन्तु परमेश्वर के वचन का अकाल हम पर न भेज!”

आज भोर तुम्हारे सेवक के नाते मैं अपने लिये यह माँगता हूँ कि तुम्हारे धन्यवाद मेरे धन्यवाद के साथ मिलकर उस सहायता के लिये परमेश्वर की स्तुति करें जो उसने पिछले पखवाड़े के अत्यन्त कठिन काम में मुझ पर अनुग्रह करके दी। परमेश्वर की स्तुति हो उस ग्रहणयोग्यता के लिये जो उसने मुझे उस देश में लोगों के सब वर्गों के बीच दी। मैं यह उसकी स्तुति के लिये कहता हूँ, अपनी नहीं, क्योंकि मेरी यह मन्नत रही है कि यदि परमेश्वर मुझे कटनी दे, तो मैं उसमें से अन्न की एक बाल भी अपने लिये न रखूँगा, वरन् सब कुछ उसी का होगा। जहाँ-जहाँ मैं गया, वहाँ मैंने लोगों की बड़ी भीड़ पाई, ऐसी भीड़ जो प्रचारक की भाषा समझ नहीं सकती थी, परन्तु उसका मुँह देखना चाहती थी, क्योंकि परमेश्वर ने उसके अनुवादित उपदेशों के द्वारा उनके प्राणों को आशीष दी थी।

भीड़ की भीड़ ने भाईचारे की प्रीति से मेरा हाथ थामा और, आँखों में आँसू भरकर, डच भाषा में मेरे सिर पर हर आशीष माँगी। मुझे आशा थी कि मैं कुछ पचासों और सैकड़ों को प्रचार करूँगा, परन्तु उसके बदले इतने लोग थे कि बड़े-बड़े गिरजाघर भी बड़े न पड़े। इससे मुझे आश्चर्य हुआ, और मैं प्रसन्न हुआ—और मैं परमेश्वर में आनन्दित हुआ—और मैं तुम से कहता हूँ कि मेरे साथ आनन्द करो। मैं उस ग्रहणयोग्यता के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ जो उसने मुझे लोगों के सब वर्गों के बीच दी। जहाँ कंगाल हाथ मिलाने के लिये ऐसी भीड़ लगाते थे कि उन्होंने मुझे लगभग खींचकर टुकड़े-टुकड़े कर डाला, वहीं परमेश्वर को यह भाया कि वह हॉलैंड की महारानी के मन को उभारे कि वह मुझे बुलवाए, और सवा घण्टे तक मुझे यह सौभाग्य मिला कि मैं उनसे उन बातों के विषय में बातें करूँ जिनसे हमारी शान्ति होती है।

मैंने उनसे भेंट के लिये कोई प्रयत्न नहीं किया था। यह उनकी अपनी इच्छा थी। और तब मैंने अपना प्राण परमेश्वर की ओर उठाया कि मैं मसीह को छोड़ और किसी विषय पर बात न करूँ, और उन्हें यीशु को छोड़ और किसी का प्रचार न करूँ। और स्वामी को यह भाया कि वह मेरी सहायता करे। और मैंने उस अत्यन्त सुशील महिला से विदा ली, और मैं परमेश्वर की सारी मनसा बताने से न झिझका था। सचमुच मुझे बड़ा सन्तोष हुआ कि सब सम्प्रदायों ने मेरा हार्दिक स्वागत किया, यहाँ तक कि शनिवार को ऐम्स्टर्डम में मैंने भोर को मेनोनाइट कलीसिया में प्रचार किया, और साँझ को पुरानी डच रिफॉर्म्ड कलीसिया में। अगले रविवार की भोर को इंग्लिश प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में, और फिर साँझ को डच फ्री कलीसिया में।

कभी-कभी मुझे बड़े-बड़े गिरजाघरों में प्रचार करने दिया गया, जैसे यूट्रेक्ट के डोम गिरजाघर में, और लाइडन के पीटर्स गिरजाघर में, जहाँ केवल कंगाल ही नहीं, वरन् देश के कुलीन और प्रतिष्ठित लोग भी थे, जो निःसन्देह अधिकतर कंगालों से अच्छी अंग्रेज़ी समझ सकते थे, क्योंकि उन कंगालों को उसे सीखने का कोई अवसर नहीं मिला। नगर-नगर जाते हुए मैंने अनुभव किया कि स्वामी प्रचार करने में निरन्तर मेरी सहायता कर रहा है। अपने जीवन में मैंने पहले कभी आत्मा की ऐसी स्फूर्ति, हृदय की ऐसी उछाल नहीं जानी थी। और मैं लौटकर आया हूँ, थका-माँदा नहीं, यद्यपि प्रतिदिन दो बार प्रचार करता था, वरन् जब मैं पहली बार निकला था उससे भी अधिक बल और स्फूर्ति से भरा हुआ!

मैं परमेश्वर को उन बहुत से प्राणों के लिये महिमा देता हूँ जिनके विषय में मैंने सुना है कि छपे हुए उपदेशों को पढ़ने के द्वारा उनका मन फिरा है, और उन लोगों की प्रेम भरी आशीषों के लिये भी जो बहुत आँसू बहाते हुए जल के किनारे तक हमारे पीछे-पीछे आए और हम से कहते रहे—“जाड़े से पहले फिर चले आने का प्रयत्न कर,” और हमसे आग्रह करते रहे कि हम एक बार फिर उस देश में वचन का प्रचार करें। हो सकता है कि इसमें कुछ आत्म-प्रशंसा भी मिली हुई हो। प्रभु जानता है कि ऐसा है या नहीं, परन्तु मुझे इसका बोध नहीं। मैं सचमुच उसके नाम की स्तुति करता और उसे धन्य कहता हूँ कि ऐसे देश में, जहाँ इतना तत्त्वज्ञान है, उसने मुझे अपना सत्य इतनी सीधाई से प्रचार करने में सहायता दी कि मैंने कभी एक भी शब्द केवल सिद्धान्तवादी के रूप में नहीं कहा, वरन् मसीह का, और मसीह को छोड़ और किसी का नहीं, प्रचार किया। हे मेरे प्रिय भाइयो और बहनो, मेरे साथ आनन्द करो। मुझे चाहिए कि तुम इसमें आनन्द करो, नहीं तो यदि तुम न करोगे, तो मुझे अकेले ही आनन्द करना पड़ेगा, परन्तु मेरी स्तुति की रोटी इतनी बड़ी है कि मैं उसे अकेले पूरी नहीं खा सकता।

III. और अब हम समापन पर आते हैं। मुझे उन आनन्दमय दावों पर बल देना है जो प्रेरित बारहवें पद में इस बात के कारण के रूप में देता है कि प्रार्थना और स्तुति क्यों होनी चाहिए। “क्योंकि हम अपने विवेक की इस गवाही पर घमण्ड करते हैं, कि जगत में और विशेष करके तुम्हारे बीच हमारा चरित्र परमेश्वर के योग्य ऐसी पवित्रता और सच्चाई सहित था, जो शारीरिक ज्ञान से नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह के साथ था।”

अहा, आख़िरकार, परमेश्वर के सिद्ध किए हुए उद्धार के बाद, मनुष्य की सान्त्वना उसके अपने विवेक की गवाही से ही आनी चाहिए। और एक सेवक के लिये यह कैसी गवाही है कि उसने सुसमाचार का प्रचार सीधाई से किया है, जिसके दो अर्थ हैं— उसने उसका प्रचार दुचित्तेपन से नहीं किया—कहा कुछ और, मतलब कुछ और। और उसने उसका प्रचार वैसे नहीं किया जैसे नाव खेनेवाले खेते हैं—देखते एक ओर हैं और खींचते दूसरी ओर—वरन् जो कहा उसका वही अर्थ रखकर प्रचार किया, एक सच्चे हृदय के साथ, परमेश्वर की महिमा और मनुष्यों के उद्धार की अभिलाषा रखते हुए।

और यह कैसी आशीष है कि उसने उसका प्रचार सीधे-सादे ढंग से किया, अर्थात् बिना कठिन शब्दों के, बिना चमकीले वाक्यांशों के, वक्तृत्व-कला की शोभा का कभी अध्ययन न करते हुए, भाषण-कला की सजावट के पीछे कभी न दौड़ते हुए। उस मनुष्य का जीवन कैसा शापित होगा जो वाक्पटुता की प्रतिष्ठा के लिये पुलपिट को अपवित्र करता है! उसकी मृत्युशय्या कैसी निराशा भरी होगी जब वह स्मरण करेगा कि उसने आत्माओं को जीतने वाली ठोस बातों के बदले अपनी वाक्-शक्ति का प्रदर्शन किया! वह विवेक भली-भाँति निश्चिन्त रह सकता है जो यह कह सके कि उसने परमेश्वर के सत्य को सीधाई से बरता है।

प्रेरित यह भी कहता है कि उसने उसका प्रचार सच्चाई के साथ किया था। अर्थात्, उसने उसका प्रचार मन से मानकर, अनुभव करते हुए किया था—ऐसा प्रचार किया कि कोई उस पर झूठा होने का दोष न लगा सके। यूनानी शब्द में कुछ-कुछ सूर्य के प्रकाश का भाव है, और परमेश्वर का सच्चा सेवक वही है जो ऐसी बातों का प्रचार करता है जिन्हें वह सूर्य के प्रकाश में टाँगा जाना चाहेगा, या जिसके आर-पार सूर्य का प्रकाश चमकता है। मुझे डर है कि हम में से कोई भी सफ़ेद काँच के समान नहीं है—हम में से अधिकतर थोड़े-बहुत रंगे हुए हैं—परन्तु धन्य वह है जो उस रंग को जितना हो सके उतना दूर करने का यत्न करता है, कि सुसमाचार का प्रकाश, जैसा वह धार्मिकता के सूर्य से आता है वैसा ही निर्मल, सीधा उसके आर-पार चमके।

पौलुस ने सीधाई और सच्चाई के साथ प्रचार किया था। और वह आगे कहता है, “शारीरिक ज्ञान से नहीं।” अहा, मैंने कैसी-कैसी कहानियाँ सुनी हैं कि शारीरिक ज्ञान क्या-क्या कर डालता है! और पिछले पखवाड़े में मैंने एक ऐसा पाठ सीखा है जो मैं चाहता हूँ कि इंग्लैंड भी सीख ले। वहाँ उस पार धर्मविज्ञान की भूल की तीन विचारधाराएँ हैं, और हर एक अपनी साथी की पीठ पर से छलाँग लगाकर आगे निकल जाती है। उनमें से कुछ मानते हैं कि पवित्रशास्त्र के सब तथ्य केवल मिथक हैं। उनमें से दूसरे कहते हैं कि बाइबल में कुछ अच्छी बातें हैं, यद्यपि उसमें बहुत सी भूलें हैं। और कुछ और उससे भी आगे जाकर उसकी ईश्वर-प्रेरणा के विषय में सारी बाइबल को ही फेंक देते हैं, यद्यपि वे अब भी उसका प्रचार करते हैं, और अब भी उस पर टिके रहते हैं, यह कहते हुए कि वे ऐसा केवल अनपढ़ जनसाधारण की उन्नति के लिये करते हैं—केवल जनता के लिये उसे थामे रहते हैं—यद्यपि मुझे यह भी जोड़ना चाहिए कि वे ऐसा केवल अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिये भी करते हैं।

दुःख की बात! दुःख की बात! दुःख की बात है कि कलीसिया यहाँ तक बढ़ गई है—वह पुरानी डच रिफॉर्म्ड कलीसिया—कैल्विनवाद का ठीक दर्पण, जो अपने विश्वास-वचनों में उन सब शिक्षाओं पर जिनसे हम प्रेम रखते हैं दृढ़ और स्थिर खड़ी है, और तो भी भटककर उदारवादी और स्वच्छन्द स्वतन्त्रता की ओर चली गई है। अहा, हमें शारीरिक ज्ञान की कैसी सच्चे मन से निन्दा करनी चाहिए! प्रिय मित्रो, मुझे डर है कि कभी-कभी तुम में से कुछ लोग, जब किसी सेवक को सुनते हो, तो चाहते हो कि वह बात को सुन्दर ढंग से कहे, और यदि वह कुछ प्रतिभा न दिखाए तो तुम दोष निकालते हो। मैं सोचता हूँ कि क्या यह पाप नहीं है? मेरा मन आधा यही मानने को करता है कि यह पाप है।

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या हमें प्रतिदिन प्रतिभा की ओर कम, और जिस सुसमाचार का प्रचार किया जाता है उसके विषय-वस्तु की ओर अधिक से अधिक नहीं देखना चाहिए। कि यदि किसी मनुष्य को वक्तृत्व की शक्ति मिली हो तो शायद हम उससे अधिक लाभ पाएँ—क्या यह एक दुर्बलता नहीं है। कि क्या हमारे लिये यही भला न होगा कि हम एक बार फिर मछुओं के दिनों में लौट जाएँ, और मनुष्यों को किसी भी प्रकार की शिक्षा न दें, वरन् बस उन्हें परमेश्वर के सत्य का सीधाई से प्रचार करने को भेज दें। यह, इसकी अपेक्षा कि हम उस सीमा तक जाएँ जहाँ तक वे अब जा रहे हैं, कि मनुष्यों को मैं नहीं जानता किस-किस प्रकार की सब विद्याएँ देते हैं जो उनके किसी भी सांसारिक काम की नहीं, वरन् केवल परमेश्वर की सीधाई को बिगाड़ने में उनकी सहायता करती हैं। मुझे अपने पाठ का यह वचन प्रिय है—“शारीरिक ज्ञान से नहीं।”

और अब, जैसा मेरा विवेक मेरी गवाही देता है, मैं अपना दावा रखता हूँ—मैं हमारे प्रेरित के इस घमण्ड पर अपना दावा रखता हूँ। मैंने परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार सीधाई से किया है। मैं नहीं जानता कि मैं उसका प्रचार इससे अधिक सीधाई से कैसे कर सकता हूँ, और न मैं उसे इससे अधिक ईमानदारी से प्रकट कर सकता हूँ। मैंने उसका प्रचार सच्चाई से किया है—सब हृदयों का जाँचनेवाला यह जानता है। और मैंने उसका प्रचार शारीरिक ज्ञान से नहीं किया, और इसका एक उत्तम कारण है—कि मेरे पास वह है ही नहीं—और मुझे विवश होकर प्रभु की सीधी-सादी गवाही पर ही टिके रहना पड़ा है। परन्तु यदि मैंने कुछ किया है, तो वह परमेश्वर के अनुग्रह से किया गया है।

यदि कोई सफलता मिली है, तो सब कुछ ईश्वरीय अनुग्रह ही ने किया है। “और विशेष करके तुम्हारे बीच।” क्योंकि यद्यपि हमारा वचन बहुत से देशों में पहुँचा है, और हमारी गवाही पृथ्वी को घेरे हुए है, तो भी “विशेष करके तुम्हारे बीच।” तुम्हें हमने चिताया है। तुम से हमने विनती की है। तुम्हें हमने समझाया है। तुम से हमने अनुनय की है। तुम पर हम रोए हैं। तुम्हारे लिये हमने प्रार्थना की है। तुम में से कुछ के लिये हम मसीह में आत्मिक माता-पिता रहे हैं। तुम में से बहुतों के लिये पालन-पोषण करनेवाले पिता के समान। तुम में से बहुतों के लिये सुसमाचार में शिक्षक और उन्नति करानेवाले के समान। और हम आशा करते हैं कि तुम सबके लिये मसीह यीशु में एक सच्चे मित्र रहे हैं। इसलिए मैं तुम्हारी प्रार्थनाओं का दावा करता हूँ—किसी और लोगों से बढ़कर तुम्हारी।

और यद्यपि ऐसे थोड़े नहीं होंगे जो अपनी विनतियों में हमें स्मरण करेंगे, तो भी मैं तुम्हें शपथ देकर कहता हूँ, क्योंकि यह “विशेष करके तुम्हारे बीच” रहा है, इसलिए विशेष करके तुम्हारी प्रार्थनाएँ मुझे मिलें। कुछ लोग कहेंगे कि मेरा यह सोचना भी निर्दयता है कि तुम प्रार्थना नहीं करते। अच्छा, मैं निर्दयता के कारण ऐसा नहीं सोचता, परन्तु कुछ ऐसे हो सकते हैं जो भूल जाते हैं—कुछ जो विनती करना भूल जाते हैं। अहा, मेरे लिये अब भी प्रार्थना अवश्य करो! सारी मण्डली का अभी उद्धार नहीं हुआ है। कुछ ऐसे हैं जो हमें सुनते हैं पर अभी उनका मन नहीं फिरा। उनके लिये परमेश्वर से विनती करो। कुछ कठोर हृदय हैं जो अभी टूटे नहीं! परमेश्वर से माँगो कि हथौड़ा चोट करे। और जब तक कुछ अभी पिघले नहीं, परमेश्वर से प्रार्थना करो कि वह वचन को आग सा बना दे!

इस महान लंदन को एक छोर से दूसरे छोर तक झकझोरे जाने की आवश्यकता है। अपने सब सेवकों के लिये प्रार्थना करो, कि परमेश्वर उन्हें सामर्थी बनाए। कलीसिया को उसकी नींद से जगाने के लिये परमेश्वर के ऊँचे शब्द की और भी आवश्यकता है। परमेश्वर से माँगो कि वह अपने भेजे हुए सब सेवकों को आशीष दे। ईश्वरीय उत्साह के साथ उससे विनती करो, कि उसका राज्य आए, और उसकी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।

अहा, काश तुम सब यीशु पर विश्वास करते! क्योंकि जब तक तुम विश्वास नहीं करते, तुम न प्रार्थना कर सकते हो न स्तुति! अहा, काश तुम सब यीशु पर विश्वास करते! स्मरण रखो, उद्धार का यही एकमात्र मार्ग है। यीशु पर भरोसा रखो, क्योंकि जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहराया जा चुका है; इसलिए कि उसने परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास नहीं किया। यीशु पर भरोसा रखो और तुम उद्धार पाओगे। मसीह अपने ही प्रेम के कारण तुम्हें अभी ग्रहण करे। आमीन।

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