उकाब के समान ऊँचे उड़ो
अभिषेक

अध्याय 9 · 19 मिनट का पठन

अभिषेक

अध्याय दो में मैंने अभिषेक की परिभाषा यह दी थी कि परमेश्वर किसी व्यक्ति या सेवकाई पर अपनी मुहर, अपनी स्वीकृति लगाता है, जिससे उन लोगों के जीवन पर अनन्त प्रभाव पड़ता है जिनके बीच सेवा की जा रही है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह कुछ सेवकाइयों का अभिषेक करता है, और ऐसे अद्भुत परिणाम दिखाई देते हैं जिन्हें कोई भी मनुष्य अपनी युक्ति से कभी उत्पन्न नहीं कर सकता था। उदाहरण के लिये, इस समय (1999 में) एक मेल-मिलाप पदयात्रा चल रही है, जिसमें विश्वासियों के छोटे-छोटे दल उन्हीं रास्तों पर फिर से चल रहे हैं जिन पर नौ सौ वर्ष पहले क्रूसेडर (धर्मयुद्ध के योद्धा) चले थे। उन आरम्भिक मसीहियों को उन हत्याओं, बलात्कारों और लूटपाट के लिये याद किया जाता है जो उन्होंने पवित्र नगर को मुसलमानों से छुड़ाने के लिये यरूशलेम जाते हुए यूरोप भर में अपने कूच के दौरान किए।

जिस मुसलमान या यहूदी को भी वे पकड़ पाते, लगभग उन सब को मार डाला गया। उन्होंने उस घृणा और गलतफहमी के बीज बोए जो आज का मुसलमान मसीही के प्रति रखता है। आज के इन तीर्थयात्रियों का उद्देश्य बिल्कुल भिन्न है। वे जहाँ कहीं जाते हैं, मुसलमान अगुवों के पास एक लिखित क्षमा-याचना लेकर जाते हैं, जो अरबी, अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा में पढ़कर सुनाई जाती है। इसके साथ कोई शर्त नहीं जुड़ी होती; यह बस बहुत पहले क्रूस के झण्डे तले किए गए अन्यायों के साथ दीनता से अपनी पहचान जोड़ना और उन्हें स्वीकार करना है। वे आशा करते हैं कि 1999 के अन्त तक वे पश्चाताप और मेल-मिलाप का अपना सन्देश लेकर यरूशलेम पहुँच जाएँगे।

इमामों और मस्जिदों के अगुवों की प्रतिक्रिया आश्चर्य और स्वीकृति की रही है; कुछ ने तो इन मसीहियों के आगमन की तुलना एक ईश-प्रकटन (एपिफ़नी) से की है — अर्थात् परमेश्वर का अपने लोगों के बीच सार्वजनिक रूप से प्रकट होना। राष्ट्रीय समाचार-पत्रों, टेलीविज़न और रेडियो ने अपने-अपने देशों के सब लोगों तक इसके विषय में बहुत-सी सकारात्मक खबरें पहुँचाई हैं।

इस अद्भुत घटना के साथ कई पुरुषों और स्त्रियों के नाम जुड़े हैं, परन्तु वे सब पृष्ठभूमि में ही रहना चाहते हैं, जबकि परमेश्वर यूरोप के मुसलमान लोगों के हृदयों में कार्य कर रहा है। सचमुच उसका अभिषेक इस सेवकाई पर है।

मुझे विश्वास है कि आप भी ऐसी सेवकाइयों के बारे में सोच सकते हैं जिन पर परमेश्वर की प्रसन्नता स्पष्ट दिखाई देती है और जिनके द्वारा बड़ा अनन्त प्रभाव पड़ रहा है। फिर भी, और बहुत-से कार्यक्रम ऐसे हैं जिनका जन्म परमेश्वर के हृदय में नहीं, बल्कि मनुष्य के मन में हुआ। उन्हें आरम्भ करनेवाला इस कार्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता में सच्चा और लगनशील हो सकता है — और परमेश्वर उसकी विश्वासयोग्यता का आदर करने के लिये उसे कुछ मात्रा में सफलता भी दे सकता है — परन्तु उस पर अभिषेक बहुत कम होता है, या होता ही नहीं। मैं स्वयं ऐसी बड़ी सेवकाइयों का भाग रहा हूँ जहाँ मैंने सुसमाचार को बढ़ावा देने के नाम पर अनैतिक आचरण और मानवतावादी सोच के बहुत-से उदाहरण देखे।

लोगों पर राजनीतिक दबाव डाला गया, नौकरियाँ छीन लेने की धमकियाँ दी गईं, परिस्थितियों को तोड़ा-मरोड़ा गया, आधे-सच बोले गए (वे झूठ से कुछ भिन्न नहीं होते!), केवल इसलिए कि हमारा कार्यक्रम बिना अधिक अड़चनों के चलता रहे। बहुत-से प्राणों का उद्धार हुआ — क्या परमेश्वर का अनुग्रह अद्भुत नहीं है? — परन्तु फिर लोगों ने यह मान लिया कि उद्देश्य ही साधनों को उचित ठहरा देता है, और वे अपने अगले कार्यक्रम की योजना उसी डगमगाती नींव पर बनाते रहे। यदि हमने उसके सामने खराई और दीनता बनाए रखी होती, तो हम परमेश्वर के अनुग्रह को और कितना अधिक देख पाते?

आज बहुत-से लोग बड़ी-बड़ी ‘सेवकाइयाँ’ चला रहे हैं, जो यदि कोई सांसारिक व्यवसाय आरम्भ करते तो उसमें भी उतने ही सफल होते। उनकी सेवकाई परमेश्वर के करिस्माता (आत्मा के वरदानों) और अभिषेक पर नहीं, बल्कि उनके अपने करिश्मे (व्यक्तिगत आकर्षण) या व्यावसायिक सूझ-बूझ पर बनी होती है। निश्चय ही यह एक मुख्य कारण है कि हमारी कलीसियाओं में इतने लोगों का विश्वास उथला है और वे वैसे जयवन्त नहीं बन पा रहे जैसा बनने के लिये यीशु हमें बुलाता है और हमसे अपेक्षा करता है; कि इतनी कलीसियाएँ और पासबान संघर्ष कर रहे हैं, और जिसे हम कलीसिया कहते हैं उसके बड़े भाग पर अधोलोक के फाटक प्रबल हो रहे हैं; और कि हमारी सरकारों की सांसारिक, मानवतावादी सोच पर इतना कम प्रभाव पड़ रहा है।

हमें ऐसे पुरुषों, स्त्रियों और कार्यक्रमों की अत्यन्त आवश्यकता है जिन पर परमेश्वर का अभिषेक हो। वह उन कार्यक्रमों का अभिषेक क्यों करे जिन्हें उसने आरम्भ नहीं किया, और उन लोगों का क्यों करे जिन्हें उसने उस सेवकाई के लिये, जिसमें वे लगे हुए हैं, न तो तैयार किया और न ही उसमें मुक्त किया? उसने लोगों पर बोझ डाला है, उन्हें तैयार किया है, और वह प्रतीक्षा कर रहा है कि वे उसकी सेवकाई के लिये मुक्त किए जाएँ, ताकि वह उनके द्वारा बड़े अभिषेक के साथ अपनी महिमा प्रकट कर सके।

कभी-कभी मुक्त किए जाने की आवश्यकता कलीसिया के साधारण सदस्यों को नहीं, बल्कि पासबानों और पादरियों को होती है!

मैं ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैण्ड में एक युवा दम्पति, जिम और कैथी, के घर गया। जिम उन छोटे व्यवसायों का सलाहकार था जो अपना विस्तार करने की सोच रहे होते थे और जिन्हें ऐसे कदम के सम्भावित खतरों के विषय में किसी विशेषज्ञ की समझ की आवश्यकता होती थी। उसने मुझे बताया कि कुछ वर्षों तक उन्हें आर्थिक तंगी झेलनी पड़ी, क्योंकि कुछ कम्पनियाँ उसकी सेवाएँ नहीं लेती थीं, इस कारण कि वह कम्पनी के निदेशकों की ‘मुट्ठी गर्म करने’ में भाग लेने से इनकार करता था। जिम और कैथी जिस कलीसिया में जाते थे, वहाँ उपस्थिति शायद ही कभी चालीस लोगों से अधिक होती थी।

एक वर्ष वह और उसका पासबान पापुआ न्यू गिनी की मिशन यात्रा पर गए, जो ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट के पास स्थित सबसे निकट का अविकसित राष्ट्र है। घर लौटकर जिम बड़े उत्साह से बताने लगा कि प्रभु ने किस प्रकार उनकी सेवकाई का, विशेषकर उनके पासबान की सेवकाई का, अभिषेक किया था।

“कैथी,” उसने कहा, “पापुआ न्यू गिनी के लोगों के बीच सेवा करते समय हमारे पासबान पर बड़ा अभिषेक था। प्रभु के आत्मा ने अद्भुत रीति से उनका उपयोग किया, और बहुत-से लोग मसीह पर विश्वास में आए। हमें उन्हें वहाँ और अधिक बार भेजना चाहिए, परन्तु मैं जानता हूँ कि न तो वे इसका खर्च उठा सकते हैं और न अभी कलीसिया। क्या हम अपनी आमदनी को थोड़ा खींचकर हर महीने कुछ पैसे अलग रख सकते हैं, ताकि पासबान को और अधिक बार मिशन यात्रा पर भेजने के लिये एक कोष बना सकें?”

उन्होंने ऐसा करने का निश्चय किया। वे अपने पासबान को उनकी ठहराई हुई सेवकाई के लिये मुक्त करेंगे। जब एक वर्ष बाद जिम ने मुझे यह कहानी सुनाई, तो उसने एक अद्भुत बात और जोड़ी। उस एक वर्ष में उसके व्यवसाय को पिछले किसी भी वर्ष की तुलना में दस गुना आमदनी हुई थी, और वे न केवल अपने पासबान को कई बार पापुआ न्यू गिनी भेज पाए थे, बल्कि कलीसिया के कई और लोगों का खर्च भी उठा पाए थे, ताकि वे सेवकाई में उनके साथ जा सकें!

जिम के काम की मात्रा उतनी ही थी, परन्तु अब जो कम्पनियाँ उसे काम पर रखती थीं, वे उसे पहले से कहीं अधिक कमीशन देती थीं। परमेश्वर न केवल उनके पासबान की सेवकाई का अभिषेक कर रहा था, बल्कि वह जिम और कैथी की ‘उदारता से दान देने’ की सेवकाई का भी अभिषेक कर रहा था। हो सकता है जिम कभी प्रचारक या सुसमाचार प्रचारक न बने, परन्तु उसने अपनी सेवकाई पा ली है और वह बड़ी परिपूर्णता का अनुभव करता है — उकाब के समान उड़ता हुआ।

अगली बार जब मैं जिम और कैथी से मिलने गया, तो कहानी और भी अद्भुत थी। उसने मुझे बताया कि जब से मैं वहाँ गया था, उसकी आमदनी हर वर्ष दुगनी होती गई है, इसलिए अब वह पहले की कमाई से आठ गुना पा रहा था। “फिर भी,” उसने आगे कहा, “आप देखेंगे कि मैं अब भी उसी घर में रहता हूँ और मेरे घर के आगे अब भी वही (छोटी) कार खड़ी रहती है। इसका कारण यह है कि पिछले चार वर्षों में हमने अपनी कलीसिया के हर सदस्य को मिशन क्षेत्र में भेजा है, कुछ को तो कई बार। जब हमें प्रभु की सेवा करने में इतना आनन्द आ रहा है, तो हम बड़ा घर या बढ़िया कार क्यों चाहें?”

यीशु ‘पवित्र आत्मा से जन्मा’ था; इसमें हम में से कोई भी उसके समान नहीं है, क्योंकि हमें उसी आत्मा से ‘नये सिरे से जन्म लेना’ आवश्यक है, ताकि हम भी उसके समान परमेश्वर के पुत्र कहलाएँ। परमेश्वर का आत्मा मनुष्य यीशु में वास करता था।

सचमुच वह परमेश्वर का देहधारी पुत्र था। वचन (परमेश्वर का स्वयं को प्रकट करना) देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया। एक दिन यीशु अपने रिश्ते के भाई यूहन्ना के पास आया, जो यरदन में लोगों को बपतिस्मा दे रहा था। उसका बपतिस्मा न तो नये जन्म का था, न विश्वास के सार्वजनिक अंगीकार का, बल्कि मन फिराव का और व्यवस्था की खरी शिक्षा की ओर लौटने का था।

“मुझे बपतिस्मा दे, यूहन्ना,” यीशु ने कहा।

“मैं तुझे बपतिस्मा नहीं दे सकता, यीशु। तुझे ही मुझे बपतिस्मा देना चाहिए!” यूहन्ना ने कहा।

“मुझे बपतिस्मा दे, यूहन्ना,” यीशु ने फिर कहा, “ताकि सब धार्मिकता पूरी हो।”

तब यूहन्ना ने उसे बपतिस्मा दिया।

“और पवित्र आत्मा शारीरिक रूप में कबूतर के समान उस पर उतरा, और यह आकाशवाणी हुई “तू मेरा प्रिय पुत्र है, मैं तुझ से प्रसन्न हूँ।””

तुरन्त आत्मा उसे जंगल में ले गया, जहाँ उसे चालीस मौन दिन बिताने थे। वे केवल इस अर्थ में मौन हैं कि उस अवधि के अन्त में शैतान द्वारा उसकी परीक्षा होने तक क्या हुआ, इसका हमारे पास कोई लेखा नहीं है। अनुमान लगाने में कोई हानि नहीं, जब तक हम उसे सिद्धान्त न बना लें; परन्तु मैंने बहुधा सोचा है कि पवित्र आत्मा उसे इस प्रकार क्यों ले गया।

मैं इस विश्वास तक पहुँचा हूँ कि वे चालीस दिन अपने पिता के साथ संगति में बीते, जहाँ उसने उस मार्ग के विषय में सीखा जो उसके सामने रखा गया था — गतसमनी और कलवरी से होकर जानेवाली वह यात्रा, जो अकेली ही हमारा छुटकारा मोल ले सकती थी। उसे उसकी सेवकाई दी गई।

अपने नगर नासरत लौटकर यीशु आराधनालय में गया, पवित्रशास्त्र उठाया और पढ़ा, “प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिए कि उसने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है, और मुझे इसलिए भेजा है, कि बन्दियों को छुटकारे का और अंधों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूँ और कुचले हुओं को छुड़ाऊँ, और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूँ।”

...और वह यही करने लगा। उसने दूसरों की माँगों और इच्छाओं के कारण स्वयं को अपने मार्ग से भटकने नहीं दिया।

जब यूहन्ना को हेरोदेस के महल के नीचे की कालकोठरियों में डाल दिया गया, तो उसने आशा की थी कि उसका रिश्ते का भाई यीशु इसके विषय में कुछ करेगा। आखिर, क्या वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करने नहीं जा रहा था?

क्या वह हेरोदेसों समेत रोमी साम्राज्य को उलट देने नहीं जा रहा था? क्या वह बन्दियों को छुड़ाने नहीं जा रहा था? थोड़े समय बाद बपतिस्मा देनेवाले को स्पष्ट हो गया कि यीशु नहीं आनेवाला — सच तो यह है कि उसने अपने बन्दी सम्बन्धी को जल्दी रिहाई की शुभकामना वाला एक कार्ड तक नहीं भेजा! यूहन्ना ने अपने कुछ चेलों को बुलाया और उनसे कहा कि यीशु को खोजें, और जब वह मिल जाए तो उससे यह प्रश्न पूछें। “क्या तू सचमुच मसीह है, या हम दूसरे की प्रतीक्षा करें?”

यीशु की इस प्रकट उदासीनता पर यूहन्ना सचमुच खीझ उठा होगा, क्योंकि स्वयं यूहन्ना से अधिक निश्चित कोई नहीं हो सकता था कि यीशु ही मसीह है। उसने भविष्यद्वाणी की थी, कबूतर को देखा था और उस आवाज़ को सुना था जिसने उसके विषय में यही घोषणा की थी। ध्यान दीजिए कि यीशु ने यूहन्ना को क्या उत्तर भेजा।

“जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। कि अंधे देखते हैं और लँगड़े चलते फिरते हैं, कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं, और गरीबों को सुसमाचार सुनाया जाता है।

....और धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।”

दूसरे शब्दों में, “मैं ठीक वही कर रहा हूँ जिसके लिये मुझे बुलाया गया, तैयार किया गया और अभिषिक्त किया गया!”

यदि यीशु को अपनी सेवकाई पूरी करने के लिये अभिषेक की आवश्यकता थी, तो हमें इसकी कितनी अधिक आवश्यकता है?

वह जन्म से ही पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था, फिर भी अपनी सेवकाई आरम्भ करने से पहले उसे आत्मा के अभिषेक की आवश्यकता थी!

पवित्र आत्मा के इन दो अनुभवों में बड़ा अन्तर है, और हम इसे समझने में चूक जाते हैं, जिससे मसीह की देह की सेवकाई निर्बल हो जाती है।

नये जन्म के समय हमने ‘आत्मा के द्वारा मसीह की देह में बपतिस्मा’ पाया। यह पहली बार कलवरी के तीन दिन बाद चेलों के साथ हुआ, जब यीशु एक बन्द कमरे में उनके पास आया और उन पर फूँककर कहा, “पवित्र आत्मा लो!” (यूनानी का एओरिस्ट आज्ञार्थक काल, जो तुरन्त प्रभाव की माँग करता है)। उनका ‘नये सिरे से जन्म’ हुआ, जैसे लगभग दो सहस्राब्दी बाद सत्रह वर्ष की आयु में मेरा हुआ, जब वही पवित्र आत्मा मेरे जीवन में आया। इसी को हम धर्मी ठहराया जाना कहते हैं।

यूहन्ना ने लोगों को अपने बाद आनेवाले एक जन के विषय में बताया, जो उन्हें पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा। यही पिता की वह प्रतिज्ञा थी जिसका उल्लेख यीशु ने तब किया जब उसने अपने चेलों को निर्देश दिया कि “जब तक स्वर्ग से सामर्थ्य न पाओ, तब तक यरूशलेम में ठहरे रहो”। यह पहली बार पिन्तेकुस्त के दिन, कलवरी के सात सप्ताह बाद, हुआ, जब अटारी पर इकट्ठे एक सौ बीस लोग बड़ी सामर्थ्य से भर गए, जब महिमान्वित यीशु ने उन्हें पवित्र आत्मा से बपतिस्मा दिया। यह बपतिस्मा यीशु के द्वारा पवित्र आत्मा में होता है। स्पष्ट है कि पवित्रशास्त्र दो भिन्न अनुभवों की बात कर रहा है।

परमेश्वर की इच्छा है कि हर विश्वासी आत्मा से परिपूर्ण हो। यह मन-परिवर्तन के बाद होनेवाला एक निर्णायक अनुभव भी है और एक निरन्तर चलनेवाला अनुभव भी।

प्रेरित पौलुस इफिसियों 5:18 में हमें उपदेश देता है कि ‘पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ’। स्पष्ट है कि यद्यपि पवित्र आत्मा का बपतिस्मा (आरम्भिक परिपूर्णता) प्रभु का प्रभुतापूर्ण कार्य है, फिर भी निरन्तर परिपूर्ण होते रहने का उत्तरदायित्व हमारा है। कुछ है जो हम कर सकते हैं।

पौलुस आगे आत्मा से परिपूर्ण जीवन के तीन प्रमाण बताता है: पद 19: आराधना का मनोभाव; पद 20: धन्यवाद का मनोभाव; पद 21: सेवक का मनोभाव।

अध्याय 5 का शेष भाग और अध्याय 6 का अधिकांश भाग इस बात के उदाहरण हैं कि हम अपने जीवनसाथी, बच्चों और साथ काम करनेवालों के साथ अपने सम्बन्धों में इस आत्मा से परिपूर्ण जीवन को कैसे जीएँ।

दुःख की बात है कि हमने पवित्र आत्मा से इस परिपूर्णता (या बपतिस्मा) को आत्मा का अभिषेक समझने की भूल की है। पहला एक परिपूर्णता है — आपके भीतर; दूसरा एक सामर्थ्य देना है — आप पर। पहला सेवा की तैयारी में सुसज्जित किया जाना है; दूसरा सेवा के लिये मुक्त किए जाने के बाद आता है। पहला अब हमारे मनोभाव और खुलेपन पर निर्भर है; दूसरा अब भी परमेश्वर की प्रभुता के अधीन है।

आज कलीसिया में एक लहर है कि नये नियम के समय के सेवकाई-वरदानों को, जैसे प्रेरित और भविष्यद्वक्ता, फिर से मान्यता दी जाए। लोगों को सुसमाचार प्रचारक, पासबान या शिक्षक कहने में हमें कोई कठिनाई नहीं हुई, परन्तु इफिसियों 4 में लिखे इन अन्य दो ने हमें कुछ अधिक चिन्ता में डाला है। मेरा विश्वास है कि ये सेवकाइयाँ कलीसिया में उपस्थित होनी चाहिए और अपने अभिषेक के द्वारा प्रकट होनी चाहिए।

परन्तु दुःख की बात है कि मैं बहुत बार वहाँ उपस्थित रहा हूँ जहाँ किसी वक्ता ने मंच पर अपना समय खुलेआम बोलते हुए समाप्त किया और मण्डली के अलग-अलग लोगों को निशाना बनाकर उनके भविष्य के विषय में भविष्यद्वाणियाँ कीं। इनमें से बहुत-सी कभी पूरी नहीं हुईं, और किसी ने भी उस भविष्यद्वक्ता से उसके गलत कथनों का हिसाब नहीं माँगा। एक पासबान के रूप में मुझे ऐसी कई दुःखद परिस्थितियों को सम्भालना पड़ा है जो किसी दूसरे की भविष्यद्वाणी वाली सलाह पर चलने के कारण लोगों के जीवन में उत्पन्न हुईं। पुराने नियम के समय में, यदि भविष्यद्वक्ता का वचन सच्चा नहीं निकलता था, तो उसे मार डाला जाता था! वह तभी बोलता था जब वह जानता था कि उस पर परमेश्वर का अभिषेक है!

प्रसंगवश, मुझे उस भाई की सराहना करनी होगी जो सेवकाई के लिये एक नगर में गया था और वहाँ से जाते हुए यह दृढ़ वचन दे गया कि कलीसियाओं पर परमेश्वर के आत्मा का एक बड़ा उण्डेला जाना होने ही वाला है। “यदि मैं यहाँ पासबान होता, तो अपनी छुट्टियाँ रद्द कर देता” उसने कहा, “ताकि आनेवाले महीनों में जो बहुत-से लोग मेरी कलीसिया में आएँगे, उनके लिये मैं उपलब्ध रह सकूँ।”

कुछ पासबानों ने ठीक यही किया, और अपनी पत्नियों और बच्चों को अकेले छुट्टियों पर जाने दिया।

परन्तु जब वर्ष समाप्त होने को आया, तो स्पष्ट था कि कुछ भी विशेष नहीं हुआ, इसलिए स्थानीय पासबानों के प्रतिनिधियों ने उस भविष्यद्वक्ता को एक विनम्र पत्र भेजकर पूछा कि क्या उन्होंने कुछ ऐसा किया है जिससे परमेश्वर की आशीष उनके नगर से हट गई। उसका उत्तर दीन कर देनेवाला था; उसने स्वीकार किया कि उससे ‘भारी भूल हो गई’ थी, और इस कारण उसने कई महीनों के लिये अपनी अन्य भविष्यद्वाणी-सभाएँ रद्द कर दी थीं और स्वयं को अपनी स्थानीय कलीसिया के अगुवों के अनुशासन के अधीन कर दिया था। उसने उनसे क्षमा माँगी।

भविष्यद्वाणी के विषय में सबसे अच्छी सलाह जो मैंने कभी सुनी, वह यूथ विद ए मिशन के फ़्लॉयड मैक्क्लंग से मिली।

उन्होंने कहा, “यदि कभी कोई आपको भविष्यद्वाणी का वचन दे, तो उसे अपनी अलमारी की सबसे नीचे की दराज़ में रखकर दराज़ पर ताला लगा दीजिए। वह आपको वर्तमान मार्गदर्शन के लिये नहीं, बल्कि भविष्य के प्रोत्साहन के लिये दिया गया था।” उन्होंने आगे समझाया कि यदि भविष्यद्वाणी परमेश्वर की ओर से है, तो ऐसा समय आएगा जब आप ऐसी परिस्थिति में हो सकते हैं जहाँ आपको आश्वासन की आवश्यकता होगी। तब आपको वह भविष्यद्वाणी याद आएगी जिसने आपको बताया था कि ऐसा होगा, और परिणाम यह होगा कि आपका यह भरोसा बढ़ जाएगा कि परमेश्वर ही आपको यहाँ तक लाया है।

भविष्यद्वाणी का पूरा होना ही उसके अभिषेक का एकमात्र प्रमाण है।

लोग अभिषेक का दावा करने में तो जल्दी करते हैं, परन्तु अभिषेक के अभाव की कीमत पर ध्यान नहीं देते। यदि पुराने नियम के झूठे भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला जाता था, तो मन में प्रश्न उठता है कि प्रभु नये नियम के झूठे भविष्यद्वक्ताओं को किस दृष्टि से देखता होगा। वे उसकी उत्तम आशीष का कितना भाग खो देते हैं?

शिक्षकों के विषय में भी ऐसी ही चिन्ता व्यक्त की जा सकती है। पौलुस आरम्भिक कलीसिया को ‘झूठे’ शिक्षकों के विषय में लगातार चेतावनी देता रहा, और यह भी कि लोग “खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुत सारे उपदेशक बटोर लेंगे।”

मैंने कुछ समय लैटिन अमेरिका में बिताया है, जहाँ उत्तरी अमेरिका के कुछ शिक्षक बहुत लोकप्रिय हैं, और उनकी बहुत-सी पुस्तकें और वीडियो स्पेनिश और पुर्तगाली में अनुवादित हो चुके हैं। मैंने अपने लातीनी मित्रों के साथ ऐसे वीडियो देखे हैं जिनमें शिक्षक ने बड़े अधिकार के साथ ऐसे कथन कहे जिनका बाइबल में कोई आधार नहीं था। वह पाँच कथन कहता है, जिनमें से पहले तीन बाइबल के अनुसार ठीक हैं, परन्तु अन्तिम दो उसकी अपनी कल्पना से निकले हैं।

परन्तु उसके श्रोता पाँचों को बाइबल-आधारित मानकर ग्रहण कर रहे हैं, और बहुत-से पासबान, जिन्हें व्यक्तिगत अध्ययन और बाइबल की विद्वत्ता का अनुभव नहीं है, इसी शिक्षा को अपने सिद्धान्तों की नींव के रूप में ग्रहण कर रहे हैं। एक पासबान को प्रभावित कीजिए और आप एक कलीसिया को प्रभावित करते हैं — भलाई के लिये या बुराई के लिये।

मैंने पहले लिखा है कि प्राचीन की जो विशेषता उसे सेवक (डीकन) से अलग करती है, वह यह है कि वह ‘सिखाने में निपुण’ होता है (वचन को लागू करने में योग्य और तत्पर)। जो प्राचीन अच्छी तरह सिखाता है, उसे ‘दो गुने आदर’ के योग्य समझा जाए। उसकी सेवकाई इतनी मूल्यवान मानी जाती है कि कलीसिया ‘दो गुने आदर’ के साथ उसे अन्य सब सेवकाइयों से ऊपर रखती है। क्यों?

प्रश्न का उत्तर देने से पहले यह भी जोड़ दें कि जो प्राचीन (पासबान और शिक्षक) अपनी सेवकाई में असफल होते हैं, उन्हें सारी कलीसिया के सामने अनुशासित किया जाना है! दुगना आदर, दुगना जोखिम। यह बात कलीसिया के किसी अन्य पद पर लागू नहीं होती!

आइए प्रश्न पर लौटें। किसी शिक्षक को दुगना आदर क्यों मिले, भविष्यद्वक्ता या सुसमाचार प्रचारक या किसी अन्य को क्यों नहीं?

मैं सुझाव देना चाहता हूँ कि इसका कारण निम्नलिखित उदाहरणों से समझा जा सकता है।

यदि सुसमाचार प्रचारक अपना काम अच्छी तरह करता है, तो वह बहुत-से नये विश्वासियों को कलीसिया में लाएगा। यदि वह अपना काम ठीक से नहीं करता, तो वह कलीसिया में एक भी नया विश्वासी नहीं जोड़ेगा। परिणाम या तो शून्य होता है या बहुत, और वह जोड़ के रूप में बढ़ता है।

यदि शिक्षक अपना काम अच्छी तरह करता है, तो वह बहुत-से ऐसे चेले तैयार करेगा जो आगे अपने जैसे और चेले बनाकर कई गुना बढ़ते जाएँगे। यदि वह अपना काम ठीक से नहीं करता, तो भी वह बहुत-से चेले तैयार करेगा — बुरे चेले — जो कई गुना बढ़ते जाएँगे। परिणाम या तो बहुत सकारात्मक होता है या बहुत नकारात्मक, और दोनों में कई गुना बढ़ने की क्षमता होती है।

“परमेश्वर ने शिक्षक नियुक्त किए हैं” पौलुस ने लिखा। आगे उसने पूछा, “क्या सब उपदेशक हैं?” हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो मसीह के छिपे हुए धन को सिखाने के लिये आत्मा से अभिषिक्त हों। कलीसिया की किसी भी सेवकाई-बुलाहट का, जैसे पासबान, शिक्षक या भविष्यद्वक्ता का, दावा अपने लिये तब तक न कीजिए जब तक दूसरों ने, उस स्पष्ट बोझ और वरदान को पहचानकर जो आपने प्रभु से पाया है, आपको उस सेवकाई के लिये मुक्त न किया हो। जहाँ अभिषेक है ही नहीं, वहाँ अभिषेक का दावा करना एक खतरनाक बात है। वह विश्वास नहीं — वह ढिठाई है, एक पाप।

आज निराश विश्वासियों के बीच घरेलू कलीसियाएँ आरम्भ करने की एक लहर है। वे अपनी सम्प्रदायिक कलीसिया के पदानुक्रमी ढाँचे से ऊब चुके हैं, और मानते हैं कि वह बाइबल के विरुद्ध और नियंत्रण करनेवाला है। दुःख की बात है कि इनमें से बहुत-सी कलीसियाएँ अन्त में पुरानी कलीसिया के ही साँचे में ढल जाती हैं, जब अधिकार जतानेवाले, नियंत्रण करनेवाले ‘अगुवे’ ऊपर आ जाते हैं। जिन्हें हम अपने से निर्बल या कम योग्य समझते हैं, उन पर नियंत्रण रखना मनुष्य का स्वभाव है।

जब प्रेरित पौलुस ने आसिया माइनर में घरेलू कलीसियाएँ स्थापित कीं, तो उसने इन नई-नई मण्डलियों की देखरेख के लिये प्राचीन नियुक्त किए। यह परमेश्वर की दी हुई सेवकाई है। अगुवे का अधिकार उसके पद-नाम में नहीं, बल्कि प्राचीन के रूप में उसके अभिषेक में है।

जब वह सचमुच तीतुस और 1 तीमुथियुस में दी गई प्राचीन की बाइबल-आधारित योग्यताओं को पूरा करता है, तो उस घरेलू कलीसिया में प्रभु के अभिषेक के अधीन बढ़ने की बड़ी क्षमता होती है।

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