उकाब के समान ऊँचे उड़ो
उड़ान

अध्याय 10 · 21 मिनट का पठन

उड़ान

जब परमेश्वर किसी व्यक्ति की सेवकाई पर अपना अभिषेक रखता है, तो वह व्यक्ति — चाहे पुरुष हो या स्त्री — अनुभव करेगा कि ‘उकाबों के समान उड़ना’ क्या होता है। वह महसूस करेगा कि आत्मा की हवाएँ उसे ऊपर उठाए लिये जा रही हैं, और वह उस साधारण, फीके जीवन से बहुत ऊपर उड़ रहा है जिसे इतने सारे दूसरे विश्वासी जी रहे हैं। जूआ सहज और बोझ हलका होगा।

पिछले अध्यायों में मैंने ऐसे कई लोगों की कहानियाँ सुनाई हैं जिनके जीवन को निकट से जानने का सौभाग्य मुझे मिला। उनके उत्साह का कुछ अंश मुझ में भी आ गया है, मैंने उनके अभिषेक का कुछ अनुभव किया है, और अब अपनी सेवकाई के लिये मैं इससे कम किसी बात से सन्तुष्ट नहीं हो सकता। मेरे लिये इससे बढ़कर सन्तोष देनेवाली, इससे बढ़कर परिपूर्णता देनेवाली कोई बात नहीं कि मैं उन भूखे युवा विश्वासियों के साथ समय बिताऊँ जो प्रभु के साथ और गहरी चाल चलना चाहते हैं। यदि मैं उन्हें एक स्वस्थ मसीही जीवन-शैली में ले जा सकूँ — उन चोटों और घावों से मुक्त जिन्हें इतने लोग ढोते फिरते हैं — और वे अपने वरदान में सेवा करने लगें, तो मैं ऐसा आनन्द जानता हूँ जो ‘वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है!’ वहाँ मैं प्रभु के साथ एक ही जूए में जुते होने की निकटता का अनुभव करता हूँ, क्योंकि जो बोझ मैं उठाए हुए हूँ वह उसी का बोझ है, वही बोझ जो उसने मुझे अपने साथ उठाने के लिये दिया है।

आइए, मैं आपको कुछ और लोगों के बारे में बताऊँ जिनसे मैं मिला हूँ। उनमें से कुछ के नाम आप जानते होंगे; दूसरे आपके लिये अनजान हैं, पर प्रभु के लिये नहीं।

जैकी पुलिंगर।

जब मैं 1967-69 में जैकी को जानता था, तब हम दोनों हांगकांग में युवा शिक्षक थे।

दो बार मैं उसके साथ ‘ड्रैगन की माँद’ (कौलून का कुख्यात वॉल्ड सिटी, यानी चारदीवारी वाला नगर) में गया, जहाँ वह बच्चों की सभाएँ लेती थी। वह कोई आसान स्थिति नहीं थी, और बहुत कम लोग कभी उसके साथ वहाँ जाने का साहस करते थे।

हम तंग गलियों में बड़ी सावधानी से चलते थे कि रास्ते के बीचोंबीच बहते गंदे नाले के पानी में पाँव न पड़ जाए। एक बार हमें एक आदमी उसी गंदगी में पड़ा मिला, जो हेरोइन के नशे में ‘धुत्त’ था। मैंने जैकी की मदद की कि उसे उठाकर दीवार के सहारे टिका दें, और फिर मैं देखता रहा कि वह अपने साफ़ रूमाल से उसका मुँह धो रही है।

उस समय मैं उसे प्रभु की सेवा करना चाहनेवाली बहुत सी दूसरी युवतियों से अलग नहीं समझता था। शायद उसमें अधिकतर लोगों से थोड़ा अधिक साहस था — या, जैसा बहुत से दूसरे मिशनरी सोचते थे, थोड़ी अधिक मूर्खता — पर वह प्रभु के हाथ में बस एक और ‘निर्बल और मूर्ख वस्तु’ थी जिसे वह काम में लेनेवाला था। मैंने उसकी हताशा देखी और उसके साथ उन बहुत से लोगों की ‘निराशाजनक’ दशा के लिये प्रार्थना की, जिन्हें वह अपने उद्धारकर्ता से मिलवाने के लिये तरसती थी। इस पुस्तक को पढ़नेवाला ऐसा कोई युवक या युवती नहीं जिसके पास ‘मसीह में’ इस संसार को बदलने की वही क्षमता न हो जो जैकी पुलिंगर के पास है। वह स्वयं तुरन्त यह मान लेगी कि विजय उसने नहीं, बल्कि “उसमें मसीह” ने दिलाई।

बहुत वर्षों बाद जब मैंने जैकी की पुस्तक चेज़िंग द ड्रैगन पढ़ी, तो मैंने ध्यान दिया कि उसने लिखा है कि उस दुष्ट स्थान में उसे कभी डर नहीं लगा, तब भी नहीं जब वहाँ रहनेवाले नशेड़ियों और गिरोहों के सरदारों ने उसे बलात्कार और मौत की धमकियाँ दीं।

यह बात उसे स्वयं अनोखी लगी और दूसरों की समझ से बाहर थी, पर यह उसकी सेवकाई पर परमेश्वर के अभिषेक का पक्का प्रमाण थी — एक ऐसा तथ्य जिसे आज सारा मसीही जगत मानता है।

मेजर ए.एस.

मेजर एस. सैल्वेशन आर्मी (उद्धार सेना) में थे, जो अपने बड़े प्रचारकों से अधिक अपने मानव-सेवा के कामों के लिये जानी जाती है। फिर भी, विश्वविद्यालय में मेरी स्नातक-पढ़ाई के अन्तिम वर्ष में वे हमारे नगर में स्थानीय आर्मी सिटाडेल (सभा-भवन) में एक सप्ताह की सभाओं के लिये आए। पहली ही शाम के बाद सभाएँ अपोस्टोलिक चर्च में ले जानी पड़ीं, क्योंकि आनेवाले लोगों की संख्या के लिये सिटाडेल बहुत छोटा पड़ गया था। यद्यपि एस.ए. के बाहर अधिकतर लोग उन्हें नहीं जानते थे, फिर भी लोगों के मुँह से बड़े अभिषेक की ख़बर फैल गई और जल्द ही सभाओं में और भी बहुत लोग आने लगे। सप्ताह के बीच तक अपोस्टोलिक चर्च भी छोटा पड़ गया, और स्थान फिर से बदलना पड़ा!

मैं अपनी अन्तिम परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, इसलिए बहुत सी सभाओं में नहीं जा सका। फिर भी, गुरुवार की शाम मैं वहाँ उपस्थित था, जब मेजर एस. ने बोलना रोका, अपनी घड़ी पर नज़र डाली, फिर दोबारा देर तक उसे देखा और बोल उठे, “मुझे बहुत खेद है! मुझे बिलकुल पता नहीं चला कि मेरा समय कब का बीत चुका है। कृपया मुझे क्षमा करें कि मैंने आपको इतनी देर तक यहाँ रोके रखा। मैं जानता हूँ कि आप में से बहुतों को बस पकड़नी है, इसलिए मैं अब यहीं समाप्त करता हूँ और इस विषय को कल शाम आगे बढ़ाऊँगा।” कोई अपनी जगह से नहीं हिला, और तब तक सन्नाटा रहा जब तक कि मण्डली में से एक आदमी ने खड़े होकर नहीं कहा, “महोदय, आप हमें यहाँ ऐसे नहीं छोड़ सकते! हम प्रभु की उपस्थिति में हैं। कृपया बोलते रहिए।”

मेजर एस. ने कहा कि जिन्हें जाना है वे चले जाएँ, पर जब कोई नहीं हिला, तो वे लगभग आधा घंटा और बोलते रहे। उस शाम बहुत से लोगों को टैक्सी बुलानी पड़ी होगी या दोस्तों के साथ गाड़ी में घर जाना पड़ा होगा, क्योंकि आख़िरी बसें जा चुकी थीं।

आज के दिनों में, जब लोग हल्के-फुल्के, मन बहलानेवाले ‘सेरेन्डिपिटी’ उपदेश चाहते हैं और यदि कोई प्रचारक चालीस मिनट से अधिक प्रचार करे तो बहुत कम प्रचारक अपनी मण्डली को टिकाए रख पाते हैं, हम पूछ सकते हैं कि मेजर एस. के पास ऐसा क्या था जिसने हमें नब्बे मिनट से भी अधिक समय तक मंत्रमुग्ध बाँधे रखा। उत्तर है — अभिषेक।

डॉ. मार्टिन लॉयड जोन्स

जिस किसी को इस महान प्रचारक की सेवकाई के अधीन बैठने का सौभाग्य मिला, वह उनके अभिषेक पर सन्देह नहीं कर सकता। मैंने उन्हें सप्ताह के बीच की शामों में रोमियों की पुस्तक से एक ऐसी मण्डली को शिक्षा देते देखा है जिसमें अधिकतर लंदन विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों के विद्यार्थी होते थे। जब वे वेस्टमिन्स्टर चैपल के अपने ऊँचे मंच पर खड़े होकर वचन सुनाते थे, तो अनुमान है कि सुननेवाले लगभग पाँच हज़ार होते थे। मुझे पक्का नहीं पता कि वे माइक और लाउडस्पीकर का प्रयोग करते थे या नहीं — जो आज सबसे छोटे चर्च-भवनों में भी इतना आवश्यक है — पर उनकी आवाज़ इतनी गूँजदार थी कि मुझे उसकी आवश्यकता पर सन्देह है। वे बोलते समय शरीर से बहुत कम हाव-भाव करते थे, उनके पहनावे या शैली में कोई दिखावा नहीं था, उनमें आकर्षक व्यक्तित्व का करिश्मा कम था, परन्तु आत्मा के वरदान निःसन्देह थे — और अभिषेक था।

वाई. आर.

वाई. इतना बुरी तरह हकलाता था कि उससे बातचीत कर पाना असम्भव था। जवानी में उस पर चोरी का आरोप लगा था, और वह गिरोह के दूसरे सदस्यों के साथ अपने मुक़दमे की प्रतीक्षा कर रहा था, जब उसने अपना जीवन प्रभु को सौंप दिया।

उसके साथियों को बाल-सुधार गृहों में भेज दिया गया, पर वाई. को, यद्यपि वह गिरोह का सरगना था, एक स्थानीय पासबान की देख-रेख में छोड़ दिया गया। वह बुद्धिमान न्यायाधीश जानता था कि बरबाद हुए जीवन को सुधारने में परमेश्वर जेल में बिताए गए वर्षों से कहीं अधिक समर्थ है। कुछ वर्षों बाद, जिनके दौरान वह और मैं अच्छे मित्र बन गए थे, एक दिन वाई. ने चाहा कि मैं उसके गृह-नगर में उसके लिये एक सभा का प्रबन्ध करूँ, ताकि वह सब को बता सके कि प्रभु ने उसके लिये क्या किया है।

उसकी हकलाती ज़बान के कारण मैंने उसे रोकने की कोशिश की, पर वह अड़ा रहा, और मुझे विस्मय से पीछे खड़े होकर देखना पड़ा कि प्रभु ने उस निर्बल पात्र को लिया, उसके द्वारा स्पष्टता से बोला और उसकी सेवकाई का अभिषेक किया। कुछ ही समय बाद मुझे उसका भेद पता चला: लगभग हर शाम वह बगीचे के एक छोटे से छप्पर में चला जाता था, जहाँ उसने एक मेज़, एक कुर्सी, एक बत्ती और एक बाइबल रखी थी। ऊँची शिक्षा न पाने पर भी वाई. यीशु के चरणों में बैठनेवाला विद्यार्थी बन गया। वह सामान्य प्रचारकों के मण्डल में नियमित वक्ता बन गया, और उसका अभिषिक्त प्रचार सुनने के लिये बड़ी-बड़ी भीड़ आती थी। वह दो बार सेवकाई के लिये कनाडा जा चुका है, और उसे वहाँ तथा ग्रेट ब्रिटेन में पासबान बनने के निमंत्रणों को अस्वीकार करना पड़ा है।

ए.जे.

ए. शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालय में थी, जब काम के सारे दबाव और घनिष्ठ मित्रों की कमी ने उसे आत्महत्या के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन जब वह समुद्र-तट पर चल रही थी, तो उसने रेत पर उड़ता हुआ काग़ज़ का एक टुकड़ा देखा। वह सुसमाचार का एक पर्चा था, और जब उसने उसे पढ़ा, तो प्रभु का आत्मा उसके प्राण पर ऐसा कार्य करने लगा कि वह वहीं तट पर घुटने टेककर रोते हुए प्रभु से माँगने लगी कि वह उसे बचा ले। वह हमारी कलीसिया में आने लगी। कुछ ही समय बाद उसने पूछा कि क्या वह रविवार की आराधना में एक कविता सुना सकती है।

पासबान ने थोड़ी झिझक के साथ हाँ कह दी, क्योंकि कलीसिया में ऐसा आमतौर पर नहीं होता था, पर हम बहुत आभारी हैं कि उन्होंने हाँ कही। हर हृदय छू गया, और हर चेहरे पर आनन्द के गर्म आँसू थे, जब ए. अपने अभिषिक्त शब्दों के द्वारा हमें प्रभु के साथ एक नए अनुभव में ले गई। मुझे भी कविता सुनाना अच्छा लगता है, पर मैं कभी लोगों को इस प्रकार नहीं छू सका! हम हर उस अवसर की प्रतीक्षा करते थे जब ए. उस अभिषेक में सेवा करेगी।

एच. डब्ल्यू.

एच. किशोरावस्था में प्रभु के पास आया, जब वह सड़क पर एक झगड़े में फँस गया था और उसे लगा कि उसने किसी आदमी को मार डाला है। सौभाग्य से उसका डर निराधार निकला, पर अपने डर में वह अगली सुबह हमारी कलीसिया में आया, पहली बार सुसमाचार सुना और अपने आप को प्रभु को सौंप दिया। उसे न सिद्धान्तों की कोई समझ थी, न सम्प्रदायों की, इसलिए जहाँ भी उसे खुला द्वार दिखता, वह एक कलीसिया से दूसरी कलीसिया में चला जाता और भीतर जाकर जो भी सभा चल रही होती उसमें शामिल हो जाता। यदि वह प्रार्थना-सभा होती, तो जल्दी ही वह खड़े होकर प्रार्थना करने लगता। मैं कितनी ही ऐसी सभाओं में बैठा हूँ जो धूल की तरह सूखी थीं, जब तक कि एच. प्रार्थना करने खड़ा न हुआ। तब मानो आकाश खुल जाता था, और परमेश्वर हमारे बीच अपनी उपस्थिति प्रगट करता था। इस सीधे-सादे आदमी की प्रार्थनाओं पर ऐसा अभिषेक था जैसा मैंने अपनी प्रार्थनाओं पर कभी नहीं जाना, क्योंकि वह कुछ ही शब्दों से स्वर्ग को हिला सकता था।

सी.मैक.

मैं कितनी ही सभाओं में बैठा हूँ और प्रेज़ & वर्शिप टीम (स्तुति और आराधना दल) की अगुवाई में होनेवाला गायन सुना है । मुझे निर्देश दिया जाता था कि कब ताली बजानी है और कब बैठना या खड़ा होना है; कहा जाता था कि और ज़ोर से गाओ, या कब केवल वाद्य-यन्त्र सुनने हैं। कभी-कभी जब गीत के शब्द मुझे आते थे तो मैं भी साथ गा सका हूँ, पर मैं मानता हूँ कि ऐसा अब कम से कम होता जा रहा है।

पी&डब्ल्यू का अर्थ एक साथ मिलकर गाने-बजाने के कार्यक्रम से बढ़कर कुछ नहीं रह गया था, जिसमें जो सच्चे आराधक थे वे अकेले में आराधना कर सकते थे (यदि वे उस शोर को अपने से दूर रख पाते जो अक्सर उन्हें चारों ओर से घेरे रहता था!)

फिर भी, जब सी. पियानो पर बैठता और हमें आराधना में ले चलता, तो सारे शब्द जानना आवश्यक नहीं रहता था, क्योंकि वह हमें प्रभु की उपस्थिति में ले जाता था, और हम ‘विस्मय, प्रेम और स्तुति में खो जाते’ थे। वह आराधना करता था और हम आराधना करते थे। वह गीत उनकी संगीत-शैली, सुरों की बनावट या लय के कारण नहीं चुनता था, बल्कि इसलिए चुनता था कि वे हमें यीशु की ओर ले जाते थे। वह हमें यो-यो की तरह ऊपर-नीचे नहीं नचाता था — गवाही या आत्मिक युद्ध के गीतों को आराधना-भरी भक्ति के गीतों के साथ बारी-बारी से बदलते हुए, कभी क्षैतिज (एक-दूसरे के लिये गाना) और कभी ऊर्ध्व (प्रभु को सम्बोधित करना) के बीच आते-जाते हुए। आराधना की अगुवाई की उसकी सेवकाई अभिषिक्त थी, और वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति यह जानता था।

यदि मुझे बोलना होता, तो मैं अक्सर सभा के आरम्भ में ही बोल लेता था, ताकि अन्त में हम आराधना में आ सकें, जब किसी को तब तक जाना न पड़े जब तक उसे स्वयं न लगे कि अब जाने का समय है। कितनी ही सभाओं में, दूसरों के चले जाने के बहुत देर बाद भी कई लोग वहीं रुके रहते थे, क्योंकि उन्हें ईश्वरीय उपस्थिति में बने रहने की आवश्यकता होती थी। उसकी अभिषिक्त आराधना और अन्य स्थानों पर मेरे अनुभव में आई बहुत सी आराधना के बीच का अन्तर मुझे यह विश्वास करने को प्रेरित करता है कि प्रभु आज भी ऐसे लोगों को ढूँढ़ रहा है जो आत्मा और सच्चाई से उसकी आराधना करें।

सी.एन.

कलीसिया के पासबान के रूप में यह मेरा पहला वर्ष था, और मैं हर सप्ताह अपने लोगों के लिये अच्छा आत्मिक भोजन तैयार करने को उत्सुक रहता था। मैं शिक्षा के किसी ऐसे बँधे-बँधाए क्रम में नहीं फँसना चाहता था जिसका कई सप्ताह पहले से अनुमान लगाया जा सके, बल्कि हर उपदेश के लिये नई सामग्री पाने को प्रभु की खोज करना चाहता था।

इसलिए हर बुधवार मैं अपने कार्यालय का दरवाज़ा बन्द कर लेता, फ़ोन का तार निकाल देता, और वचन का अध्ययन करने में समय बिताता, यह खोजते हुए कि प्रभु के पास मेरे लोगों के लिये क्या है।

प्राचीनों ने आराधना-सभा का एक घंटा वचन की शिक्षा के लिये निर्धारित किया था, इसलिए वे हर रविवार उपदेश में कुछ ‘ठोस भोजन’ की अपेक्षा करते थे। कई बार मैं इस भरोसे के साथ मंच पर गया कि मेरे पास उसका वचन है, पर कई बार ऐसा भी हुआ कि मैं आशंकित था।

प्राचीनों में से एक, सी., अपनी रीति के अनुसार अक्सर आराधना-सभा के आरम्भिक भाग में पवित्रशास्त्र का एक अंश पढ़ने के लिये खड़ा होता था। कई बार, अक्सर तब जब मुझे पक्का नहीं होता था कि उस सप्ताह मैंने प्रभु से सुना है या नहीं, सी. अपने पाठ की घोषणा करता और मैं चकित होकर पीछे टिककर बैठ जाता, क्योंकि वह उस सुबह के मेरे मूल पद का पूरा प्रसंग पढ़ रहा होता था! आप सोच सकते हैं कि यह जानकर मुझे कितना भरोसा मिलता था कि मैंने सचमुच प्रभु से सुना है और उस सुबह के लिये मेरे पास सचमुच उसका सन्देश है। सी. के पास हर सप्ताह मेरे विषय या मूल पद को जानने का कोई उपाय नहीं था, पर उसने प्रभु की आवाज़ सुनी थी जो उसे उस दिन के लिये पवित्रशास्त्र के उस अंश की ओर ले जा रही थी।

यही अभिषेक है।

ए.ए.

1991 से 1994 के बीच, जब मैं मर्सी शिप एम/वी अनास्तासिस पर पासबान था, मुझे एक अफ़्रीकी भाई, ए., के साथ काम करने का सौभाग्य मिला। उसकी ज़िम्मेदारी यह देखना थी कि जहाज़ पर पानी हमेशा पीने योग्य रहे और अफ़्रीका के जल में आम पाए जानेवाले जीवाणुओं से दूषित न हो।

मंगलवार की शामों को मैं उन लोगों के लिये एक छोटी कक्षा लेता था जो भविष्य में सम्भावित पासबानी सेवकाई के लिये अपने आप को तैयार करने में समय लगाना चाहते थे, और ए. उस समूह का एक उत्साही सदस्य था। फिर भी, जब भी वह बोलता, मैं ऐसे सुनता मानो वह शिक्षक हो और मैं विद्यार्थी, क्योंकि उसकी बातें ऐसे व्यक्ति की समझ से भरी होती थीं जिसने अपने आप को वचन में डुबो दिया हो।

पश्चिम अफ़्रीका की हमारी एक मिशन-यात्रा में ए. से कहा गया कि वह मर्सी शिप्स द्वारा लगाए गए मैदानी दन्त-चिकित्सालय में भीड़ सँभालने में मदद करे। उसने अपना काम लगन से किया, और अक्सर उन मुसलमान लोगों को सुसमाचार सुनाता था जो हमारे दन्त-चिकित्सकों को दिखाने के लिये धीरज से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे होते थे। पश्चिम अफ़्रीका के मुसलमान उग्रवादी नहीं हैं, और अधिकतर को इस्लाम के सिद्धान्तों की बहुत कम समझ है, इसलिए वे किसी भी पवित्र पुरुष का आदर करते हैं , चाहे वह मुसलमान हो, मसीही हो, या जीववादी ओझा। एक दिन ए. से दो बूढ़े आदमियों के लिये प्रार्थना करने को कहा गया, जो दोनों अपंग कर देनेवाले रोगों से ग्रस्त थे, और उसने उनके अनुरोध के अनुसार प्रार्थना की, पर उन्हें ज़ोर देकर बताया कि वह केवल ‘यीशु के नाम में’ प्रार्थना करेगा। दोनों तुरन्त चंगे हो गए और उन्होंने तुरन्त स्वीकार किया कि उनकी चंगाई प्रभु की ओर से थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि उस गाँव के मुखिया ने घोषणा कर दी कि अब से वह एक “यीशु का गाँव” होगा। ए. के लिये यह कोई दुर्लभ घटना नहीं थी, और ऐसे कई और उदाहरण थे जो उसकी सेवकाई पर परमेश्वर के अभिषेक को प्रगट करते थे।

आई. & ए.

मैंने आई. और ए. का विवाह करवाया था, और मुझे बहुत कम आशा थी कि प्रभु उन्हें किसी ‘वास्तविक’ सेवकाई में काम में ले सकेगा।

वे एक सीधे-सादे दम्पति थे जो सांसारिक पद, सम्पत्ति या दबाव के झंझट से मुक्त जीवन जीना चाहते थे, इसलिए वे समुद्र-तट के पास अपने घर में जाकर एकान्त में रहने लगे थे। कई वर्षों तक मैंने उन्हें फिर नहीं देखा और उनकी जीवन-शैली के बारे में बहुत कम जानता था, जब तक कि एक मित्र मुझसे मिलने नहीं आया और उस अद्भुत परामर्श और आन्तरिक चंगाई की सेवकाई के बारे में बताने लगा जो उसे हाल ही में मिली थी।

उसने एक पुरुष और एक स्त्री के बारे में बताया जिन्होंने विवेक के अपने वरदानों और बुद्धि के वचनों से उसकी बहुत सहायता की थी, और उसके जीवन की उन बातों की ओर इशारा करके उसे चुनौती दी थी जिन्हें बदलने की आवश्यकता थी। उनकी बातें सुनते हुए वह चकित था और उसे अनुभव हो रहा था कि प्रभु उनकी अगुवाई कर रहा है। उसने आगे बताया कि यद्यपि वे किसी कलीसिया या पैरा-चर्च सेवकाई का हिस्सा नहीं थे, फिर भी देश भर से लोग उनकी सलाह और प्रार्थनाएँ पाने के लिये उन्हें फ़ोन करते थे।

मैंने इस उल्लेखनीय दम्पति से मिलने की इच्छा प्रगट की, पर जब उसने मुझे उनके नाम बताए तो मैं दंग रह गया। “ऐसा हो ही नहीं सकता!” मैं बोल उठा, “मैंने उनका विवाह करवाया था और कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रभु की सेवा में उनमें कितनी बड़ी क्षमता है!” पर प्रभु जानता था — और उसका अभिषेक उन पर है!

एम.एम.

मैं एक पासबान मित्र से इस पुस्तक के विषय पर बात कर रहा था, तब उसने मुझे यह कहानी सुनाई।

वह कनाडा के प्रेयरी प्रान्तों में एक कलीसिया की सेवा कर रहा था, जब उसे फ़ोन पर ख़बर मिली कि उसकी मण्डली का एक सदस्य बीमार है। वह तुरन्त उस बीमार आदमी से मिलने गया और उसे कुछ सान्त्वना दे सका।

कमरे से निकलते समय उसने बिस्तर के पास फूलदान में रखे जंगली फूलों के छोटे से सुन्दर गुलदस्ते की प्रशंसा की। उसे बताया गया कि “एम. ने आज दोपहर पहले ही इन्हें भिजवा दिया था।”

कुछ सप्ताह बाद मेरा मित्र एक और घर में गया और उसे दिया गया केक खा रहा था। उसने मेज़बान स्त्री की प्रशंसा की, तो उसे बताया गया कि “एम. आज दोपहर इसे मेरे लिये लाई थी।”

ऐसी ही कई घटनाओं के बाद पासबान का ध्यान इस बात पर गया कि एम. का नाम बार-बार आ रहा है। वह उसकी कलीसिया की एक बुज़ुर्ग अविवाहित स्त्री थी, जिस पर किसी भी सभा में आसानी से किसी का ध्यान न जाए। वह कभी कुछ नहीं बोलती थी और स्वभाव से बहुत संकोची थी। उसने एम. से मिलने का निश्चय किया, यह जानने के लिये कि कलीसिया में लोगों की बीमारी का उसे कैसे पता चल जाता है, परिवार द्वारा उसे ख़बर दिए जाने से भी पहले। पहले तो वह थोड़ी आशंकित थी, यह सोचकर कि पासबान बीमारों को फ़ोन करने, उनसे मिलने जाने या फूल और केक भेजने में आगे बढ़कर ढिठाई करने के लिये उसे डाँटने आया है, पर उसने तुरन्त उसे भरोसा दिलाया कि ऐसी कोई बात नहीं है।

एम. ने उसे बताया कि वह हर शाम कलीसिया के हर व्यक्ति के लिये, उनका नाम ले-लेकर प्रार्थना करती थी। एक बार एक बुज़ुर्ग विधुर का नाम इस विचार के साथ बार-बार उसके मन में आता रहा कि उसे उसको फ़ोन करना चाहिए। निश्चय ही वह ऐसा करने से हिचकिचाई, यह सोचकर कि कहीं उसके काम का ग़लत अर्थ न लगाया जाए, पर वह विचार बना रहा। आख़िरकार, बहुत टालमटोल और कई घंटों की बेचैनी के बाद, उसने फ़ोन उठाया और उसे फ़ोन किया। जब बात हुई तो स्पष्ट था कि वह विधुर किसी संकट में है और बहुत उलझन में लग रहा था।

वह गिर गया था और उसे चोट लगी थी, पर अपनी घबराहट और उलझन में उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे या किन नम्बरों पर फ़ोन करे। एम. ने उसे ढाढ़स बँधाने के लिये कुछ कहा और फिर डॉक्टर को फ़ोन किया, जो जल्दी ही उसके घर पहुँचा और उस बूढ़े आदमी की सहायता कर सका। उसे उन लम्बे घंटों का पछतावा हुआ जिनमें उसने टालमटोल की थी, और उसने ठान लिया कि आगे से जब भी प्रभु उसे प्रेरित करेगा, वह तुरन्त प्रत्युत्तर देगी — प्रभु जिस किसी के बारे में उससे बात करे, उसे फ़ोन करके या उससे मिलने जाकर।

मेरा पासबान मित्र बहुत आनन्दित था कि एम. को अपनी सेवकाई मिल गई है, और उसने उसका पूरा साथ दिया; उसे यह अच्छा काम जारी रखने को प्रोत्साहित किया और कहा कि फूल ख़रीदने, केक बनाने आदि में जो भी ख़र्च हो, उसका बिल कलीसिया को भेजने में वह कभी न डरे।

उसे अपनी सेवकाई मिल गई थी और प्रभु उसका अभिषेक कर रहा था।

एस.बी.

एस. ने नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के लिये जेल में सज़ा काटी। यद्यपि वह कुछ वर्ष पहले मसीही बन चुका था, फिर भी वह प्रभु के लिये नहीं जिया था, और कड़े नशीले पदार्थों के साथ-साथ शराब और सिगरेट का भी आदी था। उसने आत्महत्या को ही उस गड़बड़ी से निकलने का एकमात्र रास्ता समझा था जो उसका जीवन बन चुका था। जेल से छूटने पर वह ए.ए. (शराब छुड़ानेवाले समूह) की सभाओं में जाने लगा, और वहीं उसने अपना जीवन फिर से मसीह को समर्पित किया। उसके मन फिराने के बाद थोड़े ही समय में परमेश्वर ने इस आदमी को बदल दिया और उसे सारी लतों पर विजय दी।

उसे यह विश्वास हो गया कि अपना संयम बनाए रखने के लिये उसे किसी बैसाखी की आवश्यकता नहीं, बल्कि प्रभु ने उसे पूरी तरह चंगा कर दिया है — काम पूरा हो चुका है। उसने नशे के आदी लोगों के लिये एक सहायता-समूह के रूप में एक नया काम आरम्भ किया, जो वचन की इस प्रतिज्ञा पर आधारित था कि “मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है”।

इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय उसकी सेवकाई कनेक्शन टू फ़्रीडम मेरे गृह-नगर के नशे के आदी लोगों, क़ैदियों और भूतपूर्व क़ैदियों के बीच बड़ा प्रभाव डालने लगी है, और उस काम पर अभिषेक स्पष्ट दिखाई देता है, क्योंकि प्रभु ऐसे जीवनों और स्थानों के द्वार खोल रहा है जिनमें सामान्य कलीसिया प्रवेश नहीं कर पाती। एस. तुरन्त यह स्वीकार करता है कि प्रभु हमारे बीच अद्भुत काम कर रहा है, और वह जानता है कि उसकी प्रसन्नता और अभिषेक के स्थान में बने रहना कितना महत्त्वपूर्ण है।

इनमें से अधिकतर लोगों के नाम मैंने जान-बूझकर संकेताक्षरों में दिए हैं, पर वे सब मुझे भली-भाँति ज्ञात हैं। और भी बहुत से लोग हैं जिनके जीवन प्रभु के अभिषेक की ऐसी ही गवाही देते हैं, यद्यपि वे न पादरी हैं, न प्रसिद्ध, न संसार द्वारा सम्मानित। मुझे निश्चय है कि आप, मेरे पाठक, इस सूची में कई और गवाहियाँ जोड़ सकते हैं। उनकी सामर्थ्य, उनका अधिकार, उनकी सेवकाई न तो व्यक्तिगत करिश्मे के कारण है (वह तो पॉप गायकों के पास होता है), न सबके सामने अच्छी प्रस्तुति देने की योग्यता के कारण (वह नेताओं के पास होती है), न अगुवाई की चतुर तकनीकों के कारण (वे सफल व्यापारियों के पास होती हैं), बल्कि परमेश्वर की बुलाहट, उसके द्वारा सुसज्जित किए जाने और उसके अभिषेक के कारण है।

आपने शायद उस प्रसिद्ध अभिनेता की कहानी सुनी होगी जो एक कलीसिया के मेले में गया था। उससे सब के आनन्द के लिये कुछ एकल-प्रस्तुतियाँ देने का अनुरोध किया गया, और उसने ऐसा ही किया। हर प्रस्तुति के बाद उत्साह से तालियाँ बजीं, और सबसे अधिक तब, जब उसने अन्त में चरवाहे के महान भजन, भजन संहिता 23 को सुनाया।

जब तालियों की गड़गड़ाहट थमी, तो एक बुज़ुर्ग आदमी अपनी कुर्सी से उठा, माइक्रोफ़ोन तक गया और वही भजन शब्दशः दोहराया।

इस बार जब उसने समाप्त किया तो कोई ताली नहीं बजी, पर बहुत से लोग अपनी आँखों से आँसू पोंछ रहे थे और दूसरे सिर झुकाए हुए थे। अभिनेता उस बूढ़े आदमी के पास गया।

“मैंने अपने प्रशिक्षण पर हज़ारों पाउंड ख़र्च किए हैं और अपने पेशे में शिखर तक पहुँचा हूँ,” उसने कहा, “पर मैं अपने श्रोताओं को कभी उस तरह नहीं छू सका जैसे आपने अभी-अभी छुआ है। आपका भेद क्या है?”

बूढ़े आदमी ने उत्तर दिया, “आप भजन को जानते हैं — पर मैं चरवाहे को जानता हूँ!”

यही अभिषेक का भेद है — चरवाहे के साथ जुड़े रहना। उसके साथ एक जूए में जुते रहना, जब आप मिलकर उसका बोझ (जो उसने आपके लिये ठहराया है) उठाते हैं।

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