उकाब के समान ऊँचे उड़ो
वरदान

अध्याय 7 · 14 मिनट का पठन

वरदान

मुझे भली-भाँति याद है कि वेल्स में युवाओं के बीच सेवकाई की अगुवाई करते समय एक बार मुझे कितनी निराशा का अनुभव हुआ था।

हमारी संख्या बढ़ गई थी, और हम कलीसिया के ठीक बगल वाला एक पब्लिक हाउस (शराबख़ाना) ख़रीदने पर विचार कर रहे थे, ताकि उसे युवा-केन्द्र के रूप में इस्तेमाल कर सकें। चूँकि इसके लिये आर्थिक ज़मानत कलीसिया को ही देनी पड़ती, इसलिए मण्डली की एक सभा बुलाई गई। कलीसिया के हर वर्ग से मिला समर्थन देखकर बड़ा उत्साह हुआ। हमारा एक सदस्य वकील बनने का प्रशिक्षण ले रहा था, इसलिए ख़रीद के क़ानूनी पहलू उसके हाथों में सौंप दिए गए। एक और सदस्य की एक छोटी निर्माण कम्पनी थी, इसलिए इमारत की सुरक्षा और मरम्मत की ज़रूरतों की जाँच करने की ज़िम्मेदारी उसे दी गई। इन ‘नियुक्तियों’ पर किसी ने सवाल नहीं उठाया - इन्हें स्वाभाविक ही माना गया।

मण्डली की सभा का वह भाग संतोषजनक ढंग से पूरा हो गया, तो पासबान ने इस अवसर का लाभ उठाकर एक और चिन्ता सामने रखी। संडे स्कूल को शिक्षकों की ज़रूरत थी। जब यह स्पष्ट हो गया कि अनुमानित रिक्त स्थानों के लिये पर्याप्त स्वयंसेवक नहीं मिलेंगे, तो यह सुझाव दिया गया, और बड़े उत्साह से मान भी लिया गया, कि किशोर बच्चे ऑडियो टेप पर रिकॉर्ड किए गए पाठ सुन सकते हैं! मैंने इसका कड़ा विरोध किया, क्योंकि अपने अध्यापन के अनुभव से मैं जानता था कि हम जो कुछ सीखते हैं उसका बहुत छोटा-सा अंश ही ‘कान के द्वार’ से होकर हमारी समझ और स्मृति में प्रवेश करता है।

इससे कहीं बड़ा अंश ‘आँख के द्वार’ से प्रवेश करता है, जबकि सबसे अधिक तो स्वयं हाथ से करके अनुभव करने के द्वारा आता है।

इतना पर्याप्त नहीं था कि मैं अध्यापन के अपने पेशे में ‘शिखर पर’ था - मेरे सहकर्मियों ने मुझे स्टाफ़ का अध्यक्ष चुना था, मैं बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स में सेवा करता था, स्कूल की सबसे वरिष्ठ कक्षा का होम-रूम शिक्षक था, और शिक्षकों के उस चुने हुए पैनल में था जो मेरे विषय, भौतिकी, का राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार कर रहा था। पब्लिक हाउस ख़रीदने के क़ानूनी पहलुओं के बारे में कोई अधिक नहीं जानता था, इसलिए उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी वह काम ‘विशेषज्ञ’ को सौंप दिया।

घर की बनावट और मरम्मत के बारे में भी कोई अधिक नहीं जानता था, इसलिए वह काम भी सौंप दिया गया। परन्तु ऐसा लगता था कि मण्डली की उस सभा में हर कोई सोचता था कि उसे पढ़ाना आता है, और मेरी राय बस इतनी ही थी - एक और राय, जिसका वज़न किसी दूसरे की राय से अधिक नहीं था। यदि हर कोई पढ़ा सकता है, तो हमारे स्कूलों की कक्षाओं में इतने कमज़ोर शिक्षक क्यों हैं?

कलीसिया में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। परमेश्वर ने कलीसिया में अलग-अलग वरदान, प्रतिभाएँ और योग्यताएँ रखी हैं, और बुद्धिमानी इसी में है कि हम अपने लोगों में इन्हें पहचानें। उदाहरण के लिये, प्राचीन और सेवक (डीकन) के बीच एकमात्र वास्तविक अन्तर यह है कि प्राचीन “सिखाने में निपुण” होता है। यह न तो ‘अधिक आत्मिक’ होने की बात है और न ही ऊँचे पद की, बल्कि यह एक अलग वरदान है।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्राचीन को संडे स्कूल का शिक्षक बनकर कोई तय पाठ्यक्रम पढ़ाना चाहिए, बल्कि यह कि जब भी वह कलीसिया की या किसी व्यक्ति के जीवन की किसी परिस्थिति का सामना करता है, तो बाइबल की ओर मुड़कर कोई बाइबल का सिद्धान्त सिखाना उसका सहज स्वभाव होता है।

यदि कलीसिया के कुछ सदस्य आर्थिक कठिनाइयों में हों, तो प्राचीन शायद उन्हें पवित्रशास्त्र की ओर ले जाएगा, यह दिखाने के लिये कि जब भी हम स्वयं को कर्ज़ में पड़ने देते हैं, तो अपने जीवन में परमेश्वर के काम में बाधा डालते हैं। इसके बाद वह पैसों के प्रति बाइबल का दृष्टिकोण बता सकता है, और फिर उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के पास भेज सकता है जो आर्थिक परामर्श के विषय में अधिक जानकारी रखता हो। बहुत सम्भव है कि वह दूसरा व्यक्ति कोई सेवक हो, जो कलीसिया के वित्त-प्रबन्ध में सेवा करता है।

यह देखना कितना दुःखद है कि ‘प्राचीन’ ऊँच-नीच वाली कलीसियाई व्यवस्था में कलीसिया को चलाते तो हैं, पर उनमें बाइबल के नमूने और सिद्धान्त प्रस्तुत करने की योग्यता बहुत कम होती है। बहुत-से लोग इस पद पर इसलिए चुन लिये गए कि यह सेवक के रूप में उनकी विश्वासयोग्य सेवा का इनाम, एक पदोन्नति थी, या उनकी व्यापारिक सूझबूझ, राजनीतिक चतुराई या व्यक्तिगत आकर्षण के कारण - और बाइबल की माँगों पर बहुत कम ध्यान दिया गया।

हाल ही में मैं दक्षिण अमेरिका के एक देश में एक बड़ी सेवकाई में लगा था, जहाँ सारे कर्मचारियों को नाम-पट्टी लगानी होती थी, ताकि जिस दफ़्तर में हम काम करते थे वहाँ आनेवाले लोग उन्हें आसानी से पहचान सकें। मेरी पट्टी पर लिखा था, पासबान गैरेथ इवांस। मैंने उसे अपने कोट के कॉलर पर लगाया और कुछ समय तक पहने रहा, जब तक मैंने यह नहीं देखा कि बहुत से दूसरे लोग भी ‘पासबान’ कहलाते थे, यद्यपि उनमें से शायद ही किसी ने कभी वह भूमिका निभाई हो। मुझे समझाया गया कि चूँकि वे सब किसी न किसी सेवकाई में हैं, इसलिए वे सब पासबान हैं। जैसे वेल्स में मेरी कलीसिया के सब लोग सोचते थे कि वे पढ़ा सकते हैं, वैसे ही अब लगता था कि उस दफ़्तर का हर व्यक्ति सोचता है कि वह पासबानी कर सकता है! मैंने चुपचाप अपनी नाम-पट्टी उतारी और उसकी जगह ऐसी पट्टी लगा ली जिस पर केवल लिखा था, गैरेथ इवांस।

जब हम लोगों को पासबान या प्राचीन कहते हैं, जबकि प्रभु ने उन्हें ऐसा नियुक्त नहीं किया, तो हम उस पद के अधिकार को कमज़ोर करते हैं और उसका अभिषेक खो देने का जोखिम उठाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि जिन लोगों की वे अगुवाई करते हैं, वे प्रायः परमेश्वर के वचन के ठोस भोजन के लिये भूखे रह जाते हैं और उसके दूध में भिगोई रोटी पर ही पलकर बड़े होते हैं।

प्रभु ने “कुछ को प्रेरित नियुक्त करके, और कुछ को भविष्यद्वक्ता नियुक्त करके, और कुछ को सुसमाचार सुनानेवाले नियुक्त करके, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया। जिससे पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए, और मसीह की देह उन्नति पाए। जब तक कि हम सब के सब विश्वास, और परमेश्वर के पुत्र की पहचान में एक न हो जाएँ, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएँ और मसीह के पूरे डील-डौल तक न बढ़ जाएँ।” (इफिसियों 4:11-13) ये पाँच सेवकाई-वरदान उन विविध वरदानों और प्रतिभाओं का एक छोटा-सा भाग मात्र हैं, जिन्हें प्रभु ने अपनी देह, अर्थात् कलीसिया, में रखा है। प्रेरित पौलुस सब विश्वासियों की एकता में जो सम्बन्ध होना चाहिए, उसका वर्णन करने के लिये देह का उदाहरण देता है। हम एक ही देह हैं, जिसका सिर मसीह है।

(एक बात बीच में: मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि मैं देह का कौन-सा अंग हूँ। मैं मुस्कुराकर उत्तर देता हूँ, “मैं ‘पैर का अँगूठा’ हूँ!” जब समझाने को कहा जाता है, तो मैं अपने सुननेवालों को याद दिलाता हूँ कि पैर के अँगूठे की तरह, पासबान भी प्रायः लोगों के जीवन की ‘अँधेरी, बदबूदार जगहों’ में काम करता है। वह लगातार ‘दबाव में’ भी रहता है, पर मैं स्वयं को ‘पैर का अँगूठा’ मानने का नंबर 1 कारण यह है कि मैं मसीह की देह में सन्तुलन लाना चाहता हूँ।)

ध्यान देने योग्य बात है कि जिन तीन सन्दर्भों में पौलुस मसीह की देह के विषय में लिखता है, वे वही तीन स्थान हैं जहाँ वह पवित्र आत्मा के वरदानों पर ज़ोर देता है। जब हम इनका अध्ययन करते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा के वरदान कलीसिया, अर्थात् मसीह की देह, के लाभ के लिये हैं, न कि किसी एक व्यक्ति के लिये।

इफिसियों 4 ऊपर उद्धृत है।

पद 4 - 7 एक ही देह… जोड़नेवाला पद, पद 7 “पर हम में से हर एक को मसीह के दान के परिमाण से अनुग्रह मिला है।” पद 11-13 सिद्ध करने के लिये पाँच वरदान। रोमियों 12 पद 4 - 5 एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही जैसा काम नहीं।

जोड़नेवाला पद, पद 6 “और जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न-भिन्न वरदान मिले हैं, तो आओ, हम उनका उसी के अनुसार उपयोग करें:” पद 6 - 8 भविष्यद्वाणी, सेवा, सिखाना, उपदेश देना, दान देना, अगुवाई करना, दया करना। 1 कुरिन्थियों 12 पद 12 – 27 हम सब ने एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये बपतिस्मा लिया ... देह में एक ही अंग नहीं, परन्तु बहुत से हैं..... कान आँख से नहीं कह सकता ‘मुझे तेरा प्रयोजन नहीं’.... परन्तु सचमुच परमेश्वर ने अंगों को अपनी इच्छा के अनुसार एक-एक करके देह में रखा है। जोड़नेवाले पद, पद 4 – 7 “वरदान तो कई प्रकार के हैं .... सेवा भी कई प्रकार की है.... प्रभावशाली कार्य कई प्रकार के हैं.... सब के लाभ पहुँचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है।”

पद 8 – 11 बुद्धि की बातें, ज्ञान की बातें, विश्वास (का वरदान), चंगा करने के वरदान, सामर्थ्य के काम करना, भविष्यद्वाणी, आत्माओं की परख, अनेक प्रकार की भाषाएँ, भाषाओं का अर्थ बताना।

पद 28 – 30 प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, शिक्षक (इफिसियों 4 में भी) सामर्थ्य के काम, चंगा करना, भाषाएँ (इसी अध्याय में पहले भी), सहायता के काम, प्रबन्ध, (रोमियों 12 में भी - सेवा, अगुवाई) यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वरदान कितने हैं, या यह कि हम स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकें कि हर वरदान में ठीक-ठीक क्या-क्या शामिल है। महत्त्वपूर्ण यह समझना है कि इन वरदानों को पवित्र त्रिएकता ने नियुक्त किया है, मनुष्य ने नहीं। (1 कुरिन्थियों 12: 28 - “परमेश्वर ने ... नियुक्त किए हैं।” 1 कुरिन्थियों 12: 11 - “आत्मा ... बाँट देता है।” इफिसियों 4:11 - “जो ... चढ़ भी गया .. दे दिया।”)

प्रभु अपने लोगों को वरदान, प्रतिभाएँ और योग्यताएँ देता है, ताकि वे उस बोझ को उठा सकें जो प्रभु ने उन पर रखा है। ये जूए को ‘सहज’ और बोझ को ‘हलका’ बना देते हैं।

वह हमारी ‘स्वाभाविक’ योग्यताओं और प्रतिभाओं का भी उपयोग करना चाहता है, और जब इन्हें आत्मिक वरदानों के साथ मिलाकर काम में लाया जाता है, तो वह इन पर अपना अभिषेक रख सकता है।

जब परमेश्वर ने मूसा को अपने लोगों को मिस्र की दासता से निकाल लाने के लिये बुलाया, तो परमेश्वर के उस दास ने आशंका प्रकट की। “वे मुझ पर विश्वास न करेंगे,” उसने कहा। “वे यह न मानेंगे कि तूने मुझे भेजा है।” दूसरे शब्दों में, वे उसके अधिकार पर सन्देह करेंगे।

प्रभु ने कहा, “तेरे हाथ में वह क्या है?”

“केवल मेरी चरवाहे की लाठी।” “मेरे पास बस यही है, क्योंकि पिछले चालीस वर्षों से मैं भेड़ें चराता रहा हूँ।”

“बिलकुल यही,” प्रभु शायद उत्तर देता। “यह चरवाहे के रूप में तेरे अधिकार का चिह्न है। ऐसा चरवाहा जिसे मैं पिछले चालीस वर्षों से प्रशिक्षित करता और गढ़ता आया हूँ, ताकि तू वह अभिषिक्त साधन बने जिसके द्वारा मैं अगले चालीस वर्षों तक दस लाख मिमियाती, दो पैरोंवाली भेड़ों की अगुवाई करूँगा!”

“दाऊद, तेरी जेब में क्या है?”

“केवल एक गोफन, भालुओं और सिंहों को भगाने के लिये” उस चरवाहे लड़के ने उत्तर दिया।

“बहुत अच्छा! इस दानव, गोलियत, को हराने के लिये यही काफ़ी होगा, क्योंकि मैं तुझे इसी दिन के लिये प्रशिक्षित करता आया हूँ!”

“हे विधवा स्त्री, तेरे घर में क्या है?”

“केवल एक छोटी हाण्डी तेल।”

“जितने बर्तन-भाँडे इकट्ठे कर सके, कर ले। हम तेरे सब पड़ोसियों को आशीष देने जा रहे हैं!”

“पतरस, तेरी नाव में क्या है?”

“केवल मेरा मछुए का जाल।”

“उसे नाव की दूसरी ओर डाल, तो तू बहुत-सी मछलियाँ खींच लाएगा।”

“पौलुस, वह कौन-सा दस्तावेज़ है जिसकी तू इतनी सावधानी से रखवाली करता है?”

“यह मेरी रोमी नागरिकता का प्रमाणपत्र है।”

“तुझे इसकी ज़रूरत है, क्योंकि मैं तुझे रोम ले जा रहा हूँ, ताकि तू इस संसार की राजधानी में मेरा गवाह बने।”

मैं यह सामग्री एक सप्ताहान्त के रिट्रीट में लगभग पचास पुरुषों के सामने प्रस्तुत कर रहा था। शिक्षा के इसी बिन्दु पर उनमें से एक व्यक्ति खड़ा हुआ और पूछा कि क्या वह एक घटना सुना सकता है। “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे पास प्रभु को अर्पित करने के लिये कोई वरदान है,” उसने आरम्भ किया। “फिर एक दिन कलीसिया में मैंने देखा कि एक युवती, जो नियमित रूप से मेरे आगे बैठती थी, आराधना सभा में नहीं थी। अगले सप्ताह मुझे उससे बात करने का अवसर मिला, तो मैंने उससे कहा कि सबने उसकी कमी महसूस की थी। उसने मुझे बताया कि वह सभा में इसलिए नहीं आ पाई थी क्योंकि उसकी कार के ब्रेक-शू बदलने थे और उसके पास उन्हें बदलवाने के पैसे नहीं थे।

उस दिन एक मित्र उसे ले आया था, और कार अब भी बेकार खड़ी थी। उसी सप्ताह मैं उसकी कार अपने एक मित्र के पास ले गया, जिसका एक गैराज था, और उससे पूछा कि क्या वह मुझ पर कृपा करके ब्रेक-शू बदल देगा, और पैसे मैं दूँगा। वह मान गया, पर उसने ज़ोर देकर कहा कि वह भी इस युवती को आशीष देने में भागीदार बनेगा, और मुझसे केवल पुर्ज़ों का दाम लेगा। जब कार उसे लौटाई गई और हमने उसके चेहरे पर मुस्कान देखी, तो हम दोनों को बड़ी आशीष मिली। हमें ज़रा भी अन्दाज़ा नहीं था कि प्रभु क्या योजना बना रहा था।

मैं कलीसिया में चारों ओर दूसरों पर नज़र डालने लगा जिनकी मैं इसी तरह सहायता कर सकता था, विशेषकर उन युवाओं पर, जिन्हें अपनी कारों को अच्छी, चालू हालत में रखने का बहुत कम अनुभव था - और यह काम मुझे काफ़ी अच्छी तरह आता था। हर सप्ताहान्त मैं और मेरा मित्र मिलकर किसी न किसी की पुरानी खटारा गाड़ी पर काम करते, यहाँ तक कि एक दिन मुझे वरिष्ठ पासबान के सामने बुलाया गया।

‘मैं इस बात से प्रसन्न नहीं हूँ कि तुम दोनों हमारे युवाओं को इतनी आशीष दे रहे हो!’ उन्होंने कहा। मैं चौंक गया, पर तभी उन्होंने आगे कहा, ‘हर कोई तुम्हारी चर्चा कर रहा है, और बहुत से नए लोग कलीसिया में आ रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इन युवाओं से सुना है कि यह कलीसिया उनकी कितनी चिन्ता करती है। पर तुम हमें इस आशीष में अपने साथ भागीदार नहीं होने दे रहे! मैं चाहता हूँ कि तुम ज़रूरतें खोजते रहो, दूसरों को भी अपनी सहायता के लिये जोड़ो, और ख़र्च कलीसिया के खाते में डालो!’ हमने अपने बहुत से पुरुषों को सहायता की सेवकाई के लिये मुक्त होते देखा है, और इससे हमें भी उतनी ही बड़ी आशीष मिली है!”

कितने बुद्धिमान पासबान! कोई आश्चर्य नहीं कि वह कलीसिया संख्या में भी और उस समुदाय पर अपने प्रभाव में भी बढ़ रही है!

उस भाई ने अपनी योग्यता और अपना धन (लौकिक वरदान) अर्पित किया, पर प्रभु ने उन्हें और बढ़ाने के लिये उसे ‘सहायता’ का एक आत्मिक वरदान दिया था। जब उसने अपने बोझ के अनुरूप सेवा की, तो उस पर और कलीसिया पर अभिषेक उतर आया।

“पौलुस, तू इतनी यात्राएँ क्यों करता है और इतना क्यों लिखता है?”

“क्योंकि प्रभु ने मुझे अन्यजातियों के लिये प्रेरित होने का वरदान दिया है।”

“फिलिप्पुस, तू उस कूशी खोजे से बात करने जंगल में क्यों गया?”

“क्योंकि प्रभु के आत्मा ने मेरी अगुवाई की और मुझे बताया कि क्या कहना है।”

“अब से तू फिलिप्पुस सुसमाचार प्रचारक कहलाएगा।”

“तीमुथियुस, तेरी सेवकाई का रहस्य क्या है?”

“यह विश्वास का वह वरदान है जो मुझे (पौलुस के) हाथ रखने के द्वारा मिला।”

“तो उसे फिर से प्रज्वलित कर दे, क्योंकि तुझे भय की नहीं पर सामर्थ्य, और प्रेम, और संयम की आत्मा मिली है।” (2 तीमुथियुस 1:6, 7) “मेरे बच्चे, तेरे प्राण में क्या है?”

“मेरे पास मेरी ‘तेल की हाण्डी’ है - तेरे पवित्र आत्मा की उपस्थिति” (पूरे पवित्रशास्त्र में तेल सदा पवित्र आत्मा की ओर संकेत करता है)।

“वह तुझे वे वरदान देने आया है जो मैं चाहता हूँ कि तेरे पास हों, ताकि तू मेरा बोझ उठा सके, बन्दियों को छुड़ा सके, दानवों को हरा सके, अपने पड़ोसियों को आशीष दे सके, मनुष्यों का पकड़नेवाला बन सके, और अपने यरूशलेम, सामरिया और यहूदिया में और पृथ्वी की छोर तक मेरा गवाह बन सके।”

आपका वरदान

तो, प्रभु ने आपको कौन-से वरदान दिए हैं जिनका उपयोग वह अपने राज्य में कर सकता है?

दूसरे परिपक्व विश्वासियों से पूछिए कि क्या उन्हें आपमें किसी आत्मिक वरदान का प्रमाण दिखाई देता है। अपने बोझ को आपको स्वयं पहचानकर परिभाषित करना चाहिए, पर आपके वरदान को दूसरों को परिभाषित करना होगा। कुछ स्वाभाविक वरदान, प्रतिभाएँ या योग्यताएँ होती हैं, जिनका उपयोग प्रभु तब कर सकता है जब आप उन्हें प्रभु को अर्पित करते हैं। वह उन पर विशेष अभिषेक रख भी सकता है, परन्तु ऐसा करने के लिये वह बाध्य नहीं है। फिर भी, जो दीन पुरुष या स्त्री अपने बोझ के अनुरूप सेवा करते हुए उन आत्मिक वरदानों का प्रयोग करता है जो प्रभु ने उसी उद्देश्य के लिये दिए हैं, उस पर वह अपना अभिषेक सदा रखेगा।

यहाँ कुछ और वरदानों की सूची है: आत्मिक (मेरी तेल की हाण्डी): सेवक (डीकन); कोमलता; भलाई; शासन-प्रबन्ध; सहायता; आशा; आनन्द; प्रेम; नम्रता या सीखने की तत्परता; दया दिखाना; शान्ति; आत्म-संयम या संयम; ....

लौकिक (मेरे हाथ की लाठी): विमानचालक या नाविक; व्यापारिक योग्यता या पद; भोजन-व्यवस्था; कम्प्यूटर और मीडिया; वाहन और विमान चलाना; शिक्षा; अनुभव; वित्त; अतिथि-सत्कार; भाषाएँ; अच्छा वैवाहिक जीवन; नर्सिंग; दफ़्तर का काम; विज्ञान; कोई अन्य विशेष ज्ञान; खेल; अध्यापन; यात्रा और साहित्य; ....

.... अपनी सूची स्वयं लिखिए।

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