उकाब के समान ऊँचे उड़ो
बोझ

अध्याय 6 · 14 मिनट का पठन

बोझ

मुझे वह शाम अच्छी तरह याद है जब मैंने प्रभु से माँगा था कि वह मुझे जवानों के लिये एक बोझ दे। मैं जर्मनी में ब्रिटिश सेना के साथ एक स्कूल-शिक्षक था और महसूस करता था कि विद्यार्थियों के सामने मेरी मौखिक गवाही कितनी अधूरी है, इसलिए मैंने प्रार्थना में उस बोझ के लिये पुकारा, जिसके बारे में मेरा मानना था कि वह मुझे और अधिक गवाही देने की प्रेरणा देगा। मुझे तुरन्त कोई उत्तर तो दिखाई नहीं दिया, पर उनमें से कुछ से बात करने में मैंने अधिक साहस अवश्य दिखाया।

तीन वर्ष बाद, हम वेल्स में अपने घर लौट आए थे और मैं एक स्थानीय ग्रामर स्कूल में पढ़ा रहा था। कुछ किशोर लड़कियाँ स्कूल से घर लौटते समय हमारे घर आ जाया करती थीं, तो ऐन ने सुझाव दिया कि वह सप्ताह में एक बार उनके साथ थोड़ा बाइबल अध्ययन करे। वे बड़े उत्साह से मान गईं, और जल्द ही समूह में लड़के भी शामिल हो गए और गिनती दस से ऊपर पहुँच गई, तो मैंने पाया कि अगुवाई मैं सँभाल रहा हूँ, बाइबल अध्ययन तैयार कर रहा हूँ और दूसरी गतिविधियों की योजना बना रहा हूँ।

दो वर्ष बाद, हमने अठारह से अट्ठाईस वर्ष की आयु के बहुत-से युवाओं को प्रभु पर विश्वास में आते देखा था। हमारे नगर की दो कलीसियाओं में नया जीवन आ गया था और आसपास के समाज पर उसका प्रभाव काफ़ी बड़ा था। ऐसा नहीं था कि मैं कोई सुसमाचार-प्रचारक था - उससे तो मैं बहुत दूर था, पर जवान अपने मित्रों को मसीह पर विश्वास तक ले आते थे और मैं बस उनकी ‘पासबानी’ करता था, और इसके लिये हमारी कलीसिया के प्राचीनों ने मुझे पूरी छूट दे रखी थी। कुछ वर्षों बाद, उन्हीं युवकों में से एक ने, जो अब पूरे समय प्रभु की सेवकाई में है, कहा, “हम जागृति के बीच में थे, और हमने उसे पहचाना ही नहीं!”

हमारे लिये लगभग हर सप्ताह नए विश्वासियों को देखना सामान्य बात थी। मैं अपने दिन के हर खाली पल में जवानों की सेवा ही खाता, पीता, सोता और जीता था, - और मैं कभी थका नहीं! - (और मुझे कभी यह ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई कि इसके लिये मुझे वेतन मिले!)

जब कई वर्षों बाद मैं पासबान बना, तो ऐन से पूछा गया कि इतने लम्बे समय तक एक शिक्षक की पत्नी रहने के बाद, अब एक पासबान की पत्नी होने में क्या अन्तर है। उसका उत्तर था कि पहले मैं अपना सारा खाली समय जिस काम में लगाता था, अब वही काम पूरे समय कर रहा हूँ!

कभी-कभी ऐसा होता था कि काम पर एक थका देनेवाले दिन के बाद, तड़के सुबह मुझे बिस्तर से बुला लिया जाता, क्योंकि कोई जवान किसी मुसीबत से गुज़र रहा होता और उसे मदद की ज़रूरत होती - अभी के अभी! मैं अपने पजामे के ऊपर ही पतलून चढ़ा लेता, गाड़ी में बैठता और उस परेशान जवान को ढूँढ़ निकालता, और कुछ घण्टे बाद घर लौटकर, स्कूल जाने से पहले थोड़ी देर सोने के लिये बिस्तर में जा घुसता। आश्चर्य की बात यह थी कि अगली शाम मैं थका हुआ नहीं होता था और मुझे नींद पूरी करने के लिये जल्दी सोने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। ऐसा कुछ बार हुआ, तब जाकर हमने पहचाना कि यह प्रभु की ओर से एक असाधारण ताज़गी है।

यीशु ने कहा, “हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।”

मुझे ब्राज़ील की एक बड़ी कलीसिया में चार शामों तक प्रचार करना था। मेरी मेज़बानी करनेवाले पासबान मुझे अपनी कलीसिया ले जाने के लिये उस यूथ विद अ मिशन परिसर में आए जहाँ मैं ठहरा हुआ था। वे मेरी आयु से लगभग आधे थे, बड़े मिलनसार थे और बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलते थे।

“पासबान गैरेथ,” उन्होंने कहा, “आप इतने सक्रिय कैसे बने रहते हैं?” “आपमें तो जैसे असीम ऊर्जा है, जबकि मैं अपनी कलीसिया की अगुवाई करते-करते थककर चूर हो गया हूँ।” फिर उन्होंने बताया कि वे हर सुबह 6.30 बजे प्रार्थना के लिये कलीसिया पहुँच जाते हैं और हर शाम की (रोज़ रात की) सभा के बाद भवन में ताला लगाकर रात 11 बजे के बाद ही घर पहुँच पाते हैं।

मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि मैं भी थक जाता हूँ, इसलिए मुझे भी दिन में आराम करना पड़ता है, फिर मैंने उनसे पूछा कि वे किसकी कलीसिया बना रहे हैं। “अरे, निश्चय ही प्रभु की!” उन्होंने उत्तर दिया। मैंने सुझाया कि वे जो कलीसिया बना रहे हैं वह प्रभु की नहीं, उनकी अपनी है, क्योंकि स्वयं प्रभु ने कहा है कि ‘मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।’ मेरी समझ में नहीं आता कि जब पासबान मसीह के सहकर्मी हैं - उसके साथ एक ही जूए में जुते हुए हैं - और उसका बोझ हलका है, तो इतने सारे पासबान शारीरिक रूप से टूट क्यों जाते हैं! कृपया मुझसे यह मत कहिए कि ऐसा हमेशा इसलिए होता है कि पासबान होने के कारण ही शैतान उन पर हमला करता है! जब वे अपनी ही ताक़त और कार्यक्रमों के बल पर परमेश्वर का राज्य बनाने में लगे होते हैं, तब तो उसे उनके विरुद्ध आने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। ऐसी कलीसिया से वह नहीं डरता! वह केवल उस कलीसिया से डरता है जिसके विषय में यीशु ने कहा, “मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे!”

मैंने अपने ब्राज़ीली मित्र को सुझाया कि बेहतर होगा कि वे अपनी मण्डली के दूसरे लोगों को भार उठाने में हाथ बँटाने के लिये छोड़ें, जैसा कि प्रभु ने उन्हें सुसज्जित किया था और जैसा वह उनसे चाहता था। सारा काम स्वयं करके, वे उस मण्डली के लिये प्रभु के उद्देश्यों में बाधा डाल रहे थे।

उनका अपना व्यक्तिगत बोझ और स्पष्ट वरदान आराधना-अगुवे का था, पर जो बाक़ी सारा काम उन्हें लगता था कि पासबान होने के नाते उन्हें करना ही है, उसके दबाव ने उनसे वह आनन्द छीन लिया जो उन्हें अपने वरदान में सेवा करते हुए मिलता, और कलीसिया से स्तुति और आराधना के द्वारा प्रभु की उपस्थिति में अभिषिक्त प्रवेश को छीन लिया।

जब हम उसके साथ एक जूए में जुतते हैं, तो हम उसके बोझ में सहभागी होते हैं। मेरे लिये उसका बोझ जवानों की सेवकाई था; प्रेरित पौलुस के लिये वह अन्यजातियों में सुसमाचार प्रचार करना था; जैकी पुलिंजर के लिये वह कौलून की वॉल्ड सिटी के नशेड़ी थे; हडसन टेलर के लिये वह चीन के अन्यजाति लोग थे; जॉन वेस्ली के लिये वह इंग्लैंड के वे लोग थे जो कभी कलीसिया नहीं जाते थे; चक कोल्सन के लिये वह अमेरिकी जेलों के कैदी थे; ............. के लिये

आपके लिये उसका बोझ क्या है?

उसके पास आपके लिये एक बोझ है और वह प्रतीक्षा कर रहा है कि आप उसे उठा लें। दुःख की बात है कि प्रभु के काम के लिये गहरा बोझ रखनेवाले बहुत-से लोग अक्सर यह आशा करते हैं कि दूसरे उसे उठाएँ। “यह तो पासबान का काम है! वह इस बारे में कुछ करता क्यों नहीं? इस नगर में जवानों के गिरोहों की भयानक समस्या है। कलीसिया इस बारे में कुछ करती क्यों नहीं?” आप क्यों नहीं करते? निश्चय ही, जब वे बोझ किसी दुःख का भार हों, तब हमें ‘एक दूसरे के भार उठाओ’ (गलातियों 6:2) का पालन करना है, पर जब वह बोझ प्रभु की ओर से सेवकाई का बोझ हो, तब ‘हर एक व्यक्ति अपना ही बोझ उठाएगा’ (गलातियों 6:5)। जब हम अपना बोझ दूसरों पर डालने का प्रयास करते हैं, तो हम ठीक यीशु के समय के फरीसियों जैसा व्यवहार करते हैं। वे हमेशा दूसरों को बताते रहते थे कि उन्हें क्या करना चाहिए, यहाँ तक कि यीशु ने उनके विषय में कहा, “वे एक ऐसे भारी बोझ को जिनको उठाना कठिन है, बाँधकर उन्हें मनुष्यों के कंधों पर रखते हैं।”

जब कोई दूसरा व्यक्ति अपनी सेवकाई का बोझ आप पर डालता है, तो वह बहुत भारी हो सकता है; केवल वही बोझ जो यीशु आपके लिये रखता है, ‘हलका’ होगा।

कितने दुःख की बात है कि हम, जो कलीसिया के अगुवे हैं, अक्सर सबसे पहले ‘अपना बोझ’ दूसरों पर डालते हैं, और कभी-कभी उनसे अपनी इच्छा पूरी करवाने के लिये चालबाज़ी, चापलूसी या अपराध-बोध का सहारा लेते हैं।

“जॉन, हमें संडे स्कूल के एक और शिक्षक की ज़रूरत है और मुझे विश्वास है कि इस काम के लिये तुम ही सही आदमी हो!” यदि जॉन ‘सही आदमी’ है, तो उसके मन में उस काम के लिये बोझ भी होना चाहिए।

“मैरी, कुछ बहनें लोगों को हमारी आराधना-सभाओं में बुलाने के लिये घर-घर जाकर भेंट करना शुरू कर रही हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि तुम हमें निराश नहीं करोगी।”

निःसन्देह, यदि जॉन और मैरी से ये ‘सेवकाइयाँ’ करने को कहा जाए, तो वे कलीसिया की सेवा में विश्वासयोग्यता के काम के रूप में (और आशा है कि प्रभु की सेवा में भी), बिना किसी ‘बोझ’ के भी, हमेशा हामी भर सकते हैं, पर उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि वे स्वयं को ऐसी प्रतिबद्धताओं में न बाँध लें जो प्रभु की उस बुलाहट में बाधा बन जाएँ जिसके द्वारा वह उन्हें किसी दूसरी सेवकाई में बुलाना चाहता है, जो उनके लिये उनका सच्चा बोझ और उद्देश्य है। जॉन यह उत्तर दे सकता है, “हाँ, पासबान जी, मैं कुछ समय के लिये संडे स्कूल की एक कक्षा पढ़ाने को तैयार हूँ। मैं अगले तीन महीनों के लिये वचन देता हूँ, जिसे आगे भी तीन-तीन महीनों के लिये दोहराया जा सकता है, जब तक प्रभु मुझ पर यह स्पष्ट न कर दे कि उसके पास मेरे बोझ के अधिक अनुकूल कोई दूसरी सेवकाई है।” दुःख की बात है कि बहुत-से पासबान इसे प्रतिबद्धता की कमी समझते हैं! पर किसके प्रति?

जिम एक बोझ रखनेवाला युवक था। हर सप्ताहान्त वह और उसके दो मित्र पूरी शुक्रवार की रात प्रार्थना में बिताते, और फिर अगला दिन हमारे नगर की सड़कों पर बिताते, जो भी उनसे बातचीत करने को तैयार होता, उसे गवाही देते। पासबान जिम के काम का सम्मान करते थे और उसे अपनी मासिक पासबान-सभाओं में आने की अनुमति देकर प्रसन्न थे, यद्यपि वह न तो किसी स्थानीय कलीसिया का सदस्य था और न ही किसी में जाता था। सच तो यह है कि हमारे नगर की कलीसियाओं के बारे में बात करते समय वह काफ़ी कटु हो जाता था। “वे सब खेल खेल रहे हैं! उनमें से कोई भी प्रार्थना, मध्यस्थता और सुसमाचार-प्रचार के असली काम को गम्भीरता से नहीं लेता!” वह अक्सर हर उस व्यक्ति से यही कहता था जो उसकी बात सुनने को तैयार होता।

एक रविवार को, रॉजर हमारी रविवार सुबह की आराधना-सभा में आया। उसे कलीसिया की सभाओं के ‘तौर-तरीकों’ के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं था, पर प्रभु के साथ अपने बिलकुल नए सम्बन्ध में वह गर्मजोशी से भरा हुआ था।

“कल रात जिम ने मुझे मसीह तक पहुँचाया,” उसने मुझे बताया, “और ज़ोर दिया कि मैं इस कलीसिया में आऊँ ताकि मुझे अनुशासित किया जाए!” मैंने उसे अनुशासित किए जाने और चेला बनाए जाने के बीच का अन्तर समझाया।

जब मैं अगली बार जिम से मिला, तो मैंने रॉजर का ज़िक्र किया और मुस्कुराते हुए यह भी जोड़ दिया कि ऐसा लगता है कि जिम अब नाजायज़ बच्चे पैदा करने के धन्धे में लग गया है - सड़क पर उनका पिता बनता है, पर आशा करता है कि उन्हें पालें-पोसें दूसरे! यह बात स्पष्ट रूप से जिम के मन में चुभ गई, क्योंकि अगले रविवार वह हमारी कलीसिया की आराधना-सभा में था। वह अगले पाँच सप्ताह तक आता रहा, जब तक कि एक दिन हम दोपहर के भोजन पर नहीं मिले।

“आजकल तुम्हारे मन में क्या है?” मैंने पूछा।

“वही जो हमेशा रहता है - प्रार्थना और मध्यस्थता,” उसने उत्तर दिया।

“हमारी कलीसिया के प्रार्थना-जीवन के बारे में तुम क्या सोचते हो?” “कुछ ख़ास नहीं! वहाँ किसी को भी डटकर की जानेवाली प्रबल प्रार्थना में रुचि नहीं दिखती!” “अच्छा,” मैंने कहा, “मैं हमारी कलीसिया के एक आदमी को जानता हूँ जिसके मन में प्रार्थना के लिये सच्चा बोझ है। वह लगभग दो मीटर लम्बा है, उसके बाल सुनहरे हैं, वह...” जैसे-जैसे मैं वर्णन करता गया, जिम सिर खुजलाते हुए सोचता रहा कि यह आदमी कौन हो सकता है, जब तक कि मैंने यह नहीं जोड़ा कि उसका एक व्यावसायिक चित्रकार के रूप में छोटा-सा कारोबार है। “पर वह तो मैं हूँ!” उसने कहा, और मुझे ऐसे देखने लगा मानो मेरा दिमाग़ ठिकाने न रहा हो।

“बिलकुल ठीक!” मैं बोल उठा। “सचमुच तुम ही हो! मुझे बताओ जिम, ऐसा क्यों है कि परमेश्वर ने यह बोझ तुम्हें दिया है पर तुम चाहते हो कि इसे मैं उठाऊँ? प्रभु के काम में मेरा अपना बोझ है जिसे मुझे उठाना है, और मुझे ज़रूरत है कि तुम मेरे लिये प्रार्थना का अपना बोझ उठाओ, ताकि मैं अपना बोझ और अधिक प्रभावशाली ढंग से उठा सकूँ।”

“तो फिर मुझे क्या करना चाहिए?” जिम ने पूछा।

“यह तो तुम्हें मुझे बताना चाहिए, न कि मुझे तुम्हें। बोझ तुम्हारे पास है, और यदि वह बोझ सचमुच प्रभु की ओर से है, तो वही हमें बताएगा कि तुम्हें उसे कैसे उठाना है!”

“लोगों को प्रार्थना करना सिखाए जाने की ज़रूरत है।”

“तो, तुम यह कब करने जा रहे हो?”

“क्या? मैं?”

“हाँ, तुम! बोझ तो तुम्हारे पास है! तुम लोगों को प्रार्थना करना सिखाना कब शुरू करोगे?”

“अगले सप्ताह?”

“ठीक है!”

अगले ही सप्ताह जिम ने एक कक्षा शुरू की, जिसमें मेरी मण्डली का एक मुख्य समूह और स्थानीय विश्वविद्यालय के कुछ विद्यार्थी थे, जिन्होंने परिसर में लगे विज्ञापनों से इन शिक्षाओं के बारे में सुना था। शिक्षा के बाद, लोग उस ‘नमूने’ के अनुसार, जो जिम ने उन्हें सिखाया था, पूरे मन से प्रार्थना और मध्यस्थता करने लगे। हम प्रभु के साथ घनिष्ठता में आ रहे थे और आत्मा की आवाज़ सुन रहे थे, जो हमें उन बातों के लिये प्रार्थना में ले चलती थी जो प्रभु के मन में थीं।

एक वर्ष के भीतर, मण्डली दुगुनी हो गई थी, प्राचीनों ने एक सहायक पासबान नियुक्त कर दिया था, लगभग तीन सौ लोगों के बैठने लायक एक बिलकुल नया भवन बनकर तैयार हो गया था और उसका लगभग पूरा भुगतान भी हो चुका था! मेरे सम्प्रदाय के अगुवे सोचते हैं कि मैंने उस कलीसिया में, जहाँ कई वर्षों से आराधना में गिने-चुने लोग ही आते थे, बहुत बढ़िया काम किया, पर मैं जानता हूँ कि असल में क्या हुआ था - और अब आप भी जानते हैं। मैंने तो बस इतना ही किया था कि एक उकाब को उड़ने के लिये मुक्त कर दिया!

प्रभु ने अपना बोझ जिम पर रखा था क्योंकि वह उसे अपने लोगों की उन्नति के लिये इस्तेमाल करना चाहता था। जब उसे सेवकाई के लिये मुक्त किया गया, तो परमेश्वर ने उस काम का अभिषेक किया।

आपका बोझ

आपके मन पर सबसे भारी क्या है? इस प्रश्न का उत्तर केवल आप ही दे सकते हैं, यद्यपि दूसरे लोग उसे स्पष्ट रूप से पहचानने में आपकी सहायता कर सकते हैं।

यदि परमेश्वर के राज्य के काम से जुड़ा कोई बोझ आपके पास नहीं है, तो कृपया प्रार्थना कीजिए कि प्रभु आपको एक बोझ दे और उसे आप पर प्रकट करे। जब मैंने जवानों के लिये अपना बोझ प्रभु से माँगा था, तब मुझमें उसके बोझ के ‘हलका’ होने के विषय में वह समझ नहीं थी जो अब है। मेरी प्रार्थना में यह बात भी थी कि मैं उस बोझ को उठाते हुए प्रसन्न रहने के लिये नहीं माँगता, पर केवल यह जानना चाहता हूँ कि जब पृथ्वी पर मेरी यात्रा पूरी हो जाएगी, तो मैं उसे यह कहते सुनूँगा, “धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास!” मुझे लगातार बनी रहनेवाली प्रसन्नता तो नहीं मिली - सच तो यह है कि बहुत-से दुःखद अनुभव भी हुए - पर उस बोझ में मुझे आनन्द और परिपूर्णता अवश्य मिली।

जब मैं यीशु की सेवकाई को देखता हूँ तो स्पष्ट है कि उसका बोझ सम्बन्धों से जुड़ा है - वह लोगों के लिये है। उसने कहा कि उसका अभिषेक इसलिए हुआ है कि वह कंगालों को सुसमाचार सुनाए, बन्दियों को छुड़ाए, अंधों को दृष्टि दे, कुचले हुओं को स्वतन्त्र करे और लोगों में मेल-मिलाप का, अर्थात् परमेश्वर की कृपा का प्रचार करे। निःसन्देह, उन दिनों के बाद से हमने कलीसिया को ऐसी स्थिति तक विकसित कर लिया है जहाँ हमारे पास सँभालने के लिये सुन्दर भवन हैं और इतने सारे सुव्यवस्थित कार्यक्रम हैं कि लोग आसानी से इन चीज़ों से कम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। दुःख की बात है कि हमारी बहुत-सी सेवकाइयाँ काम पर इतनी केन्द्रित हैं कि लोगों को अक्सर ऐसा समझा जाता है मानो उनके बिना भी काम चल जाएगा, और बहुत-से लोग अपने अनुभवों से गहरे घाव लिये फिरते हैं।

मैं यह कदापि नहीं कहना चाहता कि आपके मन में एक सुन्दर आराधनालय को सँभालने का बोझ नहीं होना चाहिए, पर स्मरण रखिए कि उसका उद्देश्य हमेशा यही होना चाहिए कि स्त्री-पुरुष प्रभु के साथ और गहरे सम्बन्ध में आएँ।

यहाँ कुछ बोझों की सूची है, जिनमें से कोई एक प्रभु आप पर रख सकता है।

मण्डली के भीतर: बाइबल की शिक्षा; बच्चे; कलीसिया का भवन; साफ़-सफ़ाई; नृत्य; डीकन-सेवा; प्राचीन-पद; सुसमाचार-प्रचार; आर्थिक प्रबन्ध; फूल; विवाहित जोड़े; मिशन; संगीत; नए विश्वासी; बाहर पहुँचने की सेवा; स्तुति और आराधना; प्रार्थना और मध्यस्थता; बुज़ुर्ग; अविवाहित; छोटे समूह; संडे स्कूल; एकता; अगवानी; जवान; … समाज में: ; गर्भपात के शिकार; स्थानीय व्यवसाय; कॉफ़ी शॉप; पर्यावरण; आपका परिवार; प्रान्तीय या संघीय सरकार; अल्पसंख्यक; वेश्यावृत्ति; स्थानीय स्कूल; खेल-कूद; सड़कों पर रहनेवाले लोग; लंगर; स्त्रियों के अधिकार; कार्यस्थल… अपनी ओर से भी जोड़िए।

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