उकाब के समान ऊँचे उड़ो
दर्शन

अध्याय 5 · 20 मिनट का पठन

दर्शन

यदि हमें मसीह में अपने जीवन की नियति तक पहुँचना है, तो यह अनिवार्य है कि हमारे पास ऐसा दर्शन हो जो हमारी परिस्थितियों के पार देख सके। हमारा दृष्टिकोण हमारे जीने के ढंग पर असर डालेगा, चाहे वह अपने बारे में हमारा दृष्टिकोण हो (भीतर की ओर दृष्टि), संसार के बारे में हमारा दृष्टिकोण हो (बाहर की ओर दृष्टि), या प्रभु के बारे में हमारा दृष्टिकोण हो (ऊपर की ओर दृष्टि)।

भीतर की ओर दृष्टि

कहा गया है कि ‘तुम अपने आपको जो समझते हो, वही तुम हो।’ निस्सन्देह, यह बात उन लोगों पर सच नहीं बैठती जो बीमारी के कारण भ्रम में जी रहे हैं।

शायद आपने पागलखाने के उन दो मरीज़ों की कहानी सुनी हो।

“नमस्ते,” एक ने कहा, “तुम कौन हो?”

“मैं नेपोलियन हूँ,” उसके साथी ने उत्तर दिया।

“नहीं, तुम नहीं हो।”

“हाँ, मैं हूँ।”

“नहीं, तुम नहीं हो!”

“हाँ, मैं हूँ!”

“तुमसे यह किसने कहा?”

“परमेश्वर ने!”

“नहीं, मैंने नहीं कहा!!!”

दुःख की बात है कि मसीही कलीसिया में बहुत से लोग अपनी पहचान के विषय में उतने ही अन्धे हैं जितने वे अभागे मरीज़। परन्तु हमें केवल बड़प्पन के सपनों या घमण्ड से ही नहीं निपटना है, बल्कि उनकी उलटी भावना, अर्थात् अपने आपको तुच्छ समझने से भी। ऊपर दिया गया कथन इस नकारात्मक क्षेत्र में निश्चय ही सच है। जब हम अपने आपको नीचा गिरानेवाले विचार सोचते हैं, तो हम उन्हीं नीचे विचारों की घाटी में जीते हैं। जो मनुष्य अपने बारे में ऊँची राय रखता है, उसकी ओर हम उँगली उठाते हैं और उसे “घमण्डी” कहते हैं, ऐसा व्यक्ति जिसे परमेश्वर निश्चय ही नीचे गिराएगा।

परन्तु जब कोई हम पर यह आरोप लगाता है कि हम अपने आपको बहुत ही नीचा समझते हैं, तो हम तुरन्त अपना बचाव करने लगते हैं, और (थोड़े से घमण्ड के साथ?) यह भी जोड़ देते हैं कि हमें तो “दीन” होने के लिये बुलाया गया है। इससे केवल यही प्रगट होता है कि हम नहीं जानते कि दीनता क्या है। दीनता घमण्ड का उलटा नहीं है - घमण्ड का उलटा तो झूठी दीनता है - और वह भी उतनी ही बुरी बीमारी है जितना उसका विपरीत।

यदि हम स्वर्ग के राज्य में बड़े होना चाहते हैं, तो हमें ‘छोटे बालकों के समान दीन’ बनने के लिये बुलाया गया है। बच्चे खेल खेलते हैं, पोशाकें और मुखौटे पहनते हैं, परन्तु जब सोने का समय आता है, तो वे खेल की चीज़ें उतार देते हैं और कम्बल के नीचे दुबक जाते हैं, फिर से कमज़ोर और थके हुए, जिन्हें पिता की गोद के दुलार की और उस माँ की ज़रूरत होती है जो उन्हें ओढ़ाकर सुला दे। वे फिर से ‘बस अपने आप’ बन जाते हैं।

केवल बड़े लोग ही पोशाकें और मुखौटे पहने रहते हैं, क्योंकि हम नहीं चाहते कि दूसरे हमें वैसा देखें जैसा हम अपने आपको जानते हैं। बाइबल इसे कपट कहती है (यूनानी = किसी दूसरे पात्र का अभिनय करना )।

इस पर विचार कीजिए: बाइबल का सबसे दीन कथन स्वयं परमेश्वर के मुँह से निकला! जब मूसा ने उससे पूछा, “जब मैं इस्राएलियों से बात करूँ, तब उनको क्या बताऊँ कि किसने मुझे भेजा है?” तो उस सनातन परमेश्वर ने उत्तर दिया, “मैं जो हूँ सो हूँ! उनसे कहना कि जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने तुझे भेजा है!”

दीनता का अर्थ है यह जानना - और वही होना - जो आप वास्तव में हैं। न उससे अधिक, न उससे कम।

तो फिर, आप कौन हैं?

यह मानते हुए कि आप एक मसीही विश्वासी हैं, जिसने परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पाया है, बाइबल आपके विषय में बहुत सी अद्भुत बातें कहती है। नया नियम पढ़िए और उन अनगिनत महिमामय बातों को खोजिए जिन्हें सब विश्वासियों का साझा धन बताया गया है। इनमें से बहुत सा धन हमारी ओर से किसी कार्य पर निर्भर है, परन्तु अधिकांश का हमारी योग्यता या परिपक्वता से बहुत कम सम्बन्ध है; उसका सारा सम्बन्ध इस बात से है कि यीशु ने क्रूस पर हमारे लिये क्या जीता है, जिसे पिता हमें आनन्द से प्रदान करता है, केवल इसलिए कि वह पुत्र से प्रेम करता है।

मेरा विश्वास है कि हर नए विश्वासी को उसके नए जीवन के आरम्भ में ही इफिसियों की पुस्तक का पहला अध्याय सिखाया जाना चाहिए, ताकि वह “मसीह में” अपनी स्थिति को जान सके।

हम मसीह में चुने गए हैं, हमें परमेश्वर के परिवार में लेपालक बनाया गया है, और हम ग्रहणयोग्य ठहरे हैं क्योंकि पिता मसीह से प्रेम करता है। हम मसीह में ‘स्वर्गीय स्थानों में बैठाए गए हैं’, सब प्रकार की प्रधानता और अधिकार (बुराई की) से कहीं ऊपर। अपने बारे में शैतान के झूठों पर विश्वास करना छोड़ दीजिए, और परमेश्वर आपके बारे में जो कहता है उस पर विश्वास करना आरम्भ कीजिए!

मैं पापी था, परन्तु बाइबल मुझसे कहती है कि अब मैं पवित्र जन हूँ!

मैं पाप का दास था, परन्तु अब मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ!

मेरे पाप क्षमा हो गए हैं, और मैं उसे “पिता!” कहकर पुकार सकता हूँ! कभी मैं अन्धकार में चलता था, परन्तु अब मैं ज्योति में चलता हूँ!

मैं मरा हुआ था, परन्तु अब मैं जीवित हूँ!

मैं खो गया था, परन्तु अब मिल गया हूँ - अब मैं किसी का अपना हूँ!

मैं नई सृष्टि (आत्मा) हूँ, पुरानी बातें बीत गई हैं, और वे सब नई हो गईं।

-- मुझमें किसी बात के कारण नहीं, परन्तु इसलिए कि मैं उसमें हूँ ।

इसे छतों पर से पुकारकर कहिए! अपने सिर उठाइए और गाइए! हम राजा की सन्तान हैं, हल्लिलूय्याह! यह जीवन तो बस थोड़े समय का एक प्रशिक्षण-शिविर है, जो हमें अपने राजा के साथ राज्य करने के लिये तैयार कर रहा है, और हम जय पा सकते हैं क्योंकि वह हम में रहता है, हम में मसीह, हमारी महिमा का निश्चय।

शैतान आप पर दोष लगाएगा, और अपराध-बोध तथा दोषी ठहराए जाने की भावनाएँ लाएगा, परन्तु सत्य यह घोषणा करता है कि “कोई भी बात आपको परमेश्वर के प्रेम से, जो मसीह यीशु में है, अलग नहीं कर सकेगी”। आप किसकी बात पर विश्वास करेंगे - शैतान की, जो झूठ का पिता है, या पवित्र आत्मा की, जो परमेश्वर के वचन का रचयिता है?

परिस्थितियाँ आपको दबा सकती हैं, परन्तु आप “मसीह के द्वारा, जो आपको सामर्थ्य देता है, विजेता से भी बढ़कर” हो सकते हैं। क्या आप इस पर विश्वास करते हैं, या आप अपने शत्रु, शैतान, पर विश्वास करना अधिक पसन्द करते हैं?

मसीही कलीसिया की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक यह है कि बहुत से विश्वासी नहीं जानते कि वे (मसीह में) कौन हैं, और अपना बहुत सा समय परमेश्वर और दूसरों के सामने अपने आपको सही ठहराने में बिताते हैं। यह सबसे दुःखद तब होता है जब ऐसा उन अगुवों में दिखाई देता है जो अपने पद पर असुरक्षित हैं (अकसर इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें वहाँ होने के लिये बुलाया ही नहीं), और जिन्हें अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिये कलीसिया की राजनीति खेलनी पड़ती है। ऐसे लोगों के लिये वह सेवक बनना बहुत कठिन होता है जो बनने के लिये स्वामी ने हम सब को बुलाया है। इसके बजाय, वे अपनी ‘शक्ति’ से चिपके रहते हैं, और इस प्रक्रिया में अकसर दूसरे विश्वासियों को चोट पहुँचाते हैं। बाइबल का एक पद है जो मुझे सदा बहुत महत्त्वपूर्ण लगा है, फिर भी जब मैंने उसे सुनाकर अपने श्रोताओं से पूछा कि यह पवित्रशास्त्र में कहाँ पाया जाता है, तो कोई भी मुझे उत्तर नहीं दे सका। वह इस प्रकार है।

“यीशु ने, यह जानकर कि पिता ने सब कुछ उसके हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्वर के पास से आया हूँ, और परमेश्वर के पास जाता हूँ ....”

(दूसरे शब्दों में, “यीशु, यह जानते हुए कि वह कौन है, कहाँ से आया है, क्या कर रहा है और कहाँ जा रहा है ....”)

क्या आप जानते हैं कि इसके बाद क्या आता है? (क्या आपको बुरा नहीं लगता जब कोई आपको इस तरह अचानक घेर लेता है??) यूहन्ना के सुसमाचार के अध्याय 13 में इसे स्वयं ढूँढ़कर देखिए! यीशु अपने आप में और अपनी बुलाहट में सुरक्षित था।

यदि हम वह सब बनना चाहते हैं जो प्रभु हमें बनाना चाहता है - उकाब के समान उड़ते हुए - तो हमें भी इसी प्रकार सुरक्षित होना है। जब आप स्वयं जानते हैं कि आप कौन हैं और कहाँ हैं, तो दूसरों की सेवा करना आसान होता है।

बाहर की ओर दृष्टि

जब आप मानव समाज को देखते हैं तो आपको क्या दिखाई देता है - संसार के विषय में आपका दृष्टिकोण क्या है? जब आपके चारों ओर सब कुछ अस्त-व्यस्त दिखाई देता है, तो आपको आश्चर्य क्यों होता है? आपको पहचानना चाहिए कि संसार का ढंग यही है। यह एक थकी-हारी पुरानी सृष्टि है, जो अन्धे अगुवों की अगुवाई में कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है, और उस दिन की प्रतीक्षा कर रही है जब उसका सृष्टिकर्ता परमेश्वर के पुत्रों को अपने साथ लेकर लौटेगा।

इस बीच, संसार धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद के धर्म के पीछे चलेगा, जिसमें मनुष्य अपने ही ब्रह्माण्ड का केन्द्र है और परमेश्वर को उसकी परिधि पर धकेल दिया गया है। वास्तव में, जिस मसीहोत्तर समाज में हम अब रहते हैं, उसमें बहुत से लोग बीसवीं शताब्दी के आरम्भ के उदारवादी धर्मविज्ञानियों के सुर में सुर मिलाकर यह दावा करेंगे कि परमेश्वर मर चुका है! अपने से बाहर किसी के प्रति जवाबदेही के निरपेक्ष मानकों के बिना, मनुष्य स्वयं नैतिकता का निर्णायक बन जाता है -कि क्या सही है और क्या ग़लत - और समाज एक संकट से दूसरे संकट की ओर डगमगाता रहता है।

मैं स्कॉटलैंड में चर्च ऑफ़ स्कॉटलैंड के दो पासबानों, इयन और पीटर, के साथ मिलकर एक प्रार्थना-सभा का संचालन कर रहा था। उस पूरी शाम इयन का मन बहुत उदास था, इसलिए मैंने उनसे इसका कारण पूछा। उसी दिन राष्ट्रीय कलीसिया की धर्मसभा ने समलैंगिक पुरुषों को पासबानी के लिये अभिषिक्त करने के पक्ष में मत दिया था, और इयन और पीटर दोनों इस बात को पवित्रशास्त्र के विरुद्ध मानते थे। उन्हें और बहुत से अन्य लोगों को आधिकारिक अभिलेखों में अपनी असहमति दर्ज कराने की अनुमति तो मिली, परन्तु प्रस्ताव पारित हो गया था।

फिर मैंने पीटर से पूछा कि उनका मन भी उसी तरह उदास क्यों नहीं है। उनका उत्तर आँखें खोल देनेवाला था। यह पानी के आधे भरे - या आधे खाली - गिलास का दृष्टान्त था। “बीस वर्ष पहले जब मैं इस नगर में आया था,” उन्होंने कहा, “तब आपको हमारी शायद दो या तीन ही कलीसियाएँ मिलतीं जहाँ सुसमाचार विश्वासयोग्यता से प्रचार किया जाता था। आज बाईस हैं!” “ध्रुवीकरण हो रहा है। जहाँ अन्धकार अधिक है, वहाँ ज्योति भी अधिक है।” उन्होंने संसार के विषय में अपने दर्शन को प्रभु के विषय में अपना दर्शन छीनने नहीं दिया।

इस समय आप और मैं इस संसार में हैं, परन्तु हम इस संसार के नहीं हैं। यह अपेक्षा मत कीजिए कि संसार आपको अपना लेगा। जैसे उसने प्रभु यीशु को ग्रहण नहीं किया, वैसे ही वह आपको भी स्वीकार नहीं कर सकता। फिर भी प्रभु ने हमें इस संसार से उठा लेना नहीं चाहा, क्योंकि वह चाहता है कि हम संसार में उसके गवाह हों। वह जानता है कि यह कठिन होगा, क्योंकि हमारा एक सक्रिय शत्रु है, परन्तु उसने हमारे लिये प्रार्थना की है, और अब भी करता है। “हे पिता, मैं यह विनती नहीं करता, कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख। जैसे मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं” निस्सन्देह, विश्वासियों को संसार के बहुत से क्षेत्रों में भाग लेना चाहिए - नमक के रूप में, ताकि उसके बेस्वादपन को स्वादिष्ट बनाएँ और उसकी बुराई का विरोध करें; ज्योति के रूप में, ताकि उसकी बीमारी को प्रगट करें और जीवन का मार्ग दिखाएँ। कुछ लोग ऐसे होंगे जो संसार की संस्थाओं और संगठनों के भीतर परमेश्वर की दी हुई सेवकाई में उकाब के समान उड़ेंगे।

परन्तु हमारी मुख्य चिन्ता यह संसार नहीं, बल्कि इस संसार के लोगों के बीच उसका राज्य है।

हमें संसार में खड़े होकर मसीह की गवाही देने के लिये नहीं बुलाया गया है; हमें मसीह में खड़े होकर संसार को गवाही देने के लिये बुलाया गया है!

यीशु ने पाँच प्रकार के लोगों की चर्चा की जिन्हें वह अपने राज्य में बड़ा मानता है। वे हैं सेवक , बालकों के समान , अन्तिम या सबसे छोटा होने को तैयार , और छोटे के समान । क्या आपने कभी सोचा है कि ‘छोटे के समान’ होने का क्या अर्थ है? यीशु के दिनों में पिता की सारी सम्पत्ति सबसे बड़े पुत्र को मिलती थी। खेत और सारे पशु उसी के होते थे। छोटा पुत्र अपनी सारी मीरास अपने कंधे पर उठाकर ले जा सकता था, जैसा उड़ाऊ पुत्र ने घर छोड़ते समय किया। जब उसने मन फिराया और अपने पिता के घर लौटा, तो उसने अपने आपको अपने पिता का पुत्र होने के योग्य नहीं समझा, परन्तु बूढ़े पिता ने प्रेम से गले लगाकर उसका स्वागत किया, और उसे नए जूते, एक वस्त्र और एक भोज दिया।

इस पर बड़ा पुत्र क्रोधित हुआ। “तूने इस उड़ाऊ के लिये पला हुआ बछड़ा क्यों कटवाया?” उसने तीखे स्वर में पूछा। उत्तर में पिता ने ध्यान दिलाया कि सारे पले हुए बछड़े तो बड़े पुत्र के ही थे। वास्तव में सारा खेत उसी का था। सब कुछ उसी का था! परन्तु सच तो यह था कि खेत उसका मालिक था! उसे मन फिराव और क्षमा में कोई रुचि नहीं थी; उसकी रुचि केवल उसी में थी जिसका वह मालिक था। यह मेरा खेत है! इसे हाथ मत लगाओ!

(क्या आपको इसकी गूँज सुनाई देती है? यह मेरी सेवकाई/ मेरी कलीसिया/ मेरा कार्यक्रम/ मेरा गायक-दल है! ये मेरी भेड़ें हैं! बनी-बनाई व्यवस्था को मत छेड़ो!) आख़िर यह कलीसिया है किसकी?

‘छोटे के समान’ होने का अर्थ है कि हम इस संसार को अपना मालिक नहीं बनने देते, न उसके पदों को, न उसकी सम्पत्ति को, न उसकी लोकप्रियता को, न उसकी प्रसिद्धि को और न उसके लक्ष्यों को। हम ‘इस संसार के नहीं हैं,’ हम ‘बँधे हुए’ नहीं हैं, क्योंकि हम एक दूसरे, ऊँचे संसार के राजदूत हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें सम्पत्ति नहीं रखनी चाहिए या हमें दिए गए सम्मान स्वीकार नहीं करने चाहिए। वास्तव में मसीही को भीड़ से ऊपर अलग दिखाई देना चाहिए, ऐसे व्यक्ति के रूप में जो अपना काम अच्छी तरह करता है और संसार के मापदण्डों से भी सम्मान के योग्य है।

परन्तु चाहे हम संसार के मालिक हों, संसार हमारा मालिक नहीं होना चाहिए, और हम उसे बहुत ढीले हाथों से थामे रहते हैं, ताकि जब स्वामी हमें बुलाए, तो हमारा लगाव हमें रोक न सके। जब वह हमें उकाब के समान उड़ने के लिये बुलाता है, तब हम लगावों, प्रतिबद्धताओं और संसार तथा उसके ढंगों के साथ बरसों के मेल-जोल से बुनी हुई ‘रस्सियों’ के कारण ‘ज़मीन से बँधे’ नहीं रहते।

हमें समझना है कि यह जीवन - इस संसार में - केवल वह प्रशिक्षण-शिविर है जिसे परमेश्वर ने हमें अनन्तकाल के असली संसार के लिये सिद्ध करने को बनाया है। वह ऐसे लोगों को ढूँढ़ रहा है जो इस जीवन में जय पाएँ, ताकि अगले जीवन में उसके साथ राज्य करें। जब लोग मरीन सैनिक बनने के प्रशिक्षण में भारी तनाव और व्यक्तिगत अपमान सहते हैं, तो हमें यह अजीब नहीं लगता, परन्तु जब हमारा स्वामी हमारे प्रशिक्षण में कठिनाइयों और एक गर्जनेवाले सिंह को हम पर आक्रमण करने देता है, तो हम अकसर शिकायत करने लगते हैं। हम संसार से मित्रता खोजकर अपनी तैयारी से समझौता करने को बहुत जल्दी तैयार हो जाते हैं।

परन्तु जब हम वह बन जाएँगे जो बनने के लिये प्रभु ने हमें बुलाया है, तब हम इस संसार में भी जयवन्त होंगे, और उसका राज्य जैसे स्वर्ग में, वैसे पृथ्वी पर भी स्थापित होगा । वह अपनी कलीसिया बनाएगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।

वैसे, ‘म्याऊँ-म्याऊँ’ करनेवाली बिल्ली कभी अपना शिकार नहीं पकड़ पाती; गर्जनेवाला सिंह भी उतना ही अक्षम है, सिवाय तब के जब हम उसकी गर्जना को अपनी भावनाओं पर असर डालने और अपने कामों को पंगु करने देकर उसे शक्ति दे देते हैं।

वह भय, लज्जा, डाह, ईर्ष्या, क्रोध और ऐसी ही नकारात्मक भावनाओं का उपयोग करके हमसे हमारी विजय छीन लेता है। हमें उसकी चालों को पहचानना सीखना है और ठान लेना है कि हम इन भावनाओं को अपने मार्ग में बाधा नहीं बनने देंगे। मैंने नेपाल में एक बहुत आनन्दमय महीना बिताया, जहाँ मैंने मिशनरियों के लिये कई संगोष्ठियाँ कीं और देश के बड़े भाग में यात्रा की।

धरान नगर में मेरा परिचय एक बुज़ुर्ग व्यक्ति से कराया गया जो वहाँ कई वर्षों तक पासबान रहे थे, उस समय जब कलीसियाओं पर भारी सताव था। उन्हें पच्चीस से अधिक बार गिरफ़्तार किया गया था और सात बार कैद में डाला गया था, जिसमें सबसे लम्बी सज़ा आठ वर्ष की थी। कैद से छूटते ही वह तुरन्त अपने गाँव लौट जाते और फिर से सुसमाचार का प्रचार करने लगते। मैंने उनसे पूछा, “क्या आपको फिर से गिरफ़्तार होने का डर नहीं लगता था?” उनका उत्तर था, “मैं क्यों डरूँ? सिंह जितना ज़ोर से गरज सकता था, गरज चुका है!” उनके पास सही दर्शन था - आत्मिक बातों में 20/20 दृष्टि!

जिम इलियट, जो 1959 में इक्वाडोर के जंगलों में शहीद हुए पाँच जवानों में से एक थे, उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले लिखा था, “वह मूर्ख नहीं जो वह दे देता है जिसे वह रख नहीं सकता, ताकि वह पा ले जिसे वह खो नहीं सकता!”

स्पष्ट है कि यह संसार उनका मालिक नहीं था, क्योंकि उनके पास इस संसार से कहीं ऊँचा दर्शन था।

यीशु जानता था कि पृथ्वी पर मनुष्य का भविष्य क्या होगा, इसलिए वह हमसे कहता है, “जब ये बातें होने लगें, तो सीधे होकर अपने सिर ऊपर उठाना; क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट होगा।” हमारा दर्शन ऊपर की ओर होना चाहिए।

ऊपर की ओर दृष्टि

संसार अपने अन्धेपन में यह दावा कर सकता है कि ‘परमेश्वर मर चुका है’, परन्तु स्वर्गीय राज्य के नागरिक एक दूसरी ही वास्तविकता जानते हैं। परमेश्वर अब भी सिंहासन पर विराजमान है और सब बातों को उनकी चरम परिणति की ओर ले जा रहा है, कि समय की पूर्ति होने पर, जो कुछ स्वर्ग में और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे । वह अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा।

2 राजाओं 6 में हम उस संकट के विषय में पढ़ते हैं जिसका सामना एलीशा भविष्यद्वक्ता को तब करना पड़ा, जब उसने अपने राजा को इस्राएल पर चढ़ाई करने की अरामियों की योजनाओं के विषय में सूचित किया। अराम के राजा ने भविष्यद्वक्ता को दोतान नगर में पकड़ने के लिये एक बड़ी सेना भेजी। जब सूरज निकल रहा था, तब भविष्यद्वक्ता का सेवक अपने बिछौने से उठा और नए दिन का स्वागत करने के लिये उसने खिड़कियाँ खोलीं। कल्पना कीजिए उसके आश्चर्य और भय की, जब उसने देखा कि नगर अरामी सेना से घिरा हुआ है। परिस्थितियाँ बहुत आशाजनक नहीं थीं! आगे अन्धकार ही अन्धकार दिखता था। सारा संसार परमेश्वर के जन के विरुद्ध मोर्चा बाँधे खड़ा दिखाई देता था।

“हाय! मेरे स्वामी, हम क्या करें?” सेवक चिल्ला उठा।

एलीशा अपने बिछौने से उठा, धीरे-धीरे टहलता हुआ खिड़की तक गया, शत्रु को देखा, और प्रार्थना की। न संकट के शब्द, न छुटकारे के लिये गिड़गिड़ाना, न परमेश्वर से कोई प्रश्न। बस एक सरल सी प्रार्थना, “हे यहोवा, इसकी आँखें खोल दे!”

तब यहोवा ने उस जवान की आँखें खोल दीं, और उसने देखा कि नगर के चारों ओर के पहाड़ परमेश्वर की सेना के अग्निमय घोड़ों और रथों से भरे हुए हैं। अराम का राजा अपनी बड़ी सेना भेज सकता था, परन्तु वे परमेश्वर के जन के सामने टिक नहीं सकते थे। परमेश्वर के साथ हम सदा ‘विजेता से भी बढ़कर’ हैं, उन सब बातों पर जो शत्रु या संसार हमारे विरुद्ध फेंक सकता है। हमें ऊपर देखने की आवश्यकता है, ताकि हम देख सकें कि हमारी परिस्थितियों को घेरनेवाली पहाड़ियाँ प्रभु की सेनाओं से भरी हुई हैं, जो बस उसकी आज्ञा की प्रतीक्षा में हैं कि उन्हें उस स्थिति में उतार दिया जाए।

राजा दाऊद के जीवन में बहुत से ऐसे दिन आए जब सब कुछ उसके विरुद्ध दिखाई देता था। राजा शाऊल ने कई बार उसे मार डालने का प्रयत्न किया था, और यरूशलेम के महल को छोड़ने के बाद उसका पीछा किया था, जिससे बरसों तक उसने एक निर्वासित का जीवन बिताया। परन्तु उसके जीवन के सबसे दुःखद दिनों में से एक वह था जब उसे पता चला कि उसका पुत्र अबशालोम अपने पिता को इस्राएल के सिंहासन से हटाने के लिये सेना खड़ी कर रहा है। दाऊद भजन संहिता 3 में अपनी भावनाओं के बदलते क्रम को लिखता है। - पद 1 के निराशा भरे दृश्य (‘हे यहोवा मेरे सतानेवाले कितने बढ़ गए हैं!’) से लेकर पद 8 के भरोसे (‘उद्धार यहोवा ही की ओर से होता है!’) तक। मनोभाव का यह परिवर्तन कैसे हुआ, यह देखने के लिये हमें पद 3 पर ध्यान देना चाहिए “परन्तु हे यहोवा, तू तो मेरे चारों ओर मेरी ढाल है, तू मेरी महिमा और मेरे मस्तक का ऊँचा करनेवाला है।” बाद में उसने लिखा, “मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर उठाऊँगा, जहाँ से मुझे सहायता मिलती है। मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है!”

आपकी परिस्थितियाँ जो भी हों, शत्रु आप पर चाहे जैसे भी दोष लगाए, संसार आपको चाहे जितनी भी ठेस पहुँचाए, अपनी आँखें ऊपर उठाइए और स्वर्गीय स्थानों की वास्तविकताओं पर ध्यान लगाइए। आपका दूल्हा प्रतीक्षा कर रहा है, भोज की मेज़ सज चुकी है, और हम शीघ्र ही वह तुरही-नाद सुनेंगे जो हमें मेम्ने के विवाह के भोज में बुलाएगा।

आपका प्रभु सब कुछ अपने नियन्त्रण में रखता है, और आप भरोसा रख सकते हैं कि ‘जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।’

यह सकारात्मक सोच नहीं, बल्कि हमारी आशा का स्पष्ट कथन है (अर्थात्; उस बात की उत्सुक प्रतीक्षा जो निश्चित है ।) तब तक, वह चाहता है कि हम उकाब के समान उड़ें!

अपने विषय में आपका दृष्टिकोण स्वस्थ हो सकता है, संसार के विषय में यथार्थवादी, और प्रभु में आपकी आशा उत्सुक हो सकती है, परन्तु कलीसिया के विषय में आपका दृष्टिकोण क्या है? क्या वह कमज़ोर और प्रभावहीन है, जिसका आपके संसार पर बहुत कम प्रभाव है? क्या वह एक जीवित देह - मसीह की जीवित देह - के बजाय एक संगठन बनकर रह गई है? क्या वह लोगों के प्रति सजग होने के बजाय कार्यक्रमों पर केन्द्रित है?

मुझे जो बड़े सौभाग्य मिले हैं, उनमें से एक यह है कि मैं बहुत से देशों में जाकर युवाओं और कलीसिया के अगुवों के बीच सेवा करता हूँ। मैं ऊँचे और स्पष्ट स्वर में पुकारकर कहना चाहता हूँ कि यीशु मसीह की कलीसिया बहुत से स्थानों में जीवित है और भली-भाँति फल-फूल रही है। मैं जहाँ भी जाता हूँ, ऐसे पुरुषों और स्त्रियों से मिलता हूँ जो परमेश्वर के लिये बड़े-बड़े काम कर रहे हैं, यद्यपि निस्सन्देह धर्मनिरपेक्ष मीडिया हमें उन विश्वासियों के विषय में अधिक नहीं बताता जो अपने संसार को बदल रहे हैं। उन सबमें जो बात एक जैसी है वह है एक बोझ, और इस बात का एक महान दर्शन कि परमेश्वर उनके द्वारा क्या कर सकता है।

जवानी में लॉरेन कनिंघम को एक दर्शन मिला। उसमें युवाओं की लहरें थीं जिन्हें भेजा जा रहा था, और जो समुद्र की लहरों के समान संसार के तटों पर पहुँच रही थीं। उनका विश्वास था कि परमेश्वर असंख्य लोगों को प्रेरित कर सकता है कि वे सुसमाचार के दोनों हाथों के साथ निकल पड़ें। उन्हें शुभ सन्देश सुनाना भी था और अपने कामों से यीशु के स्वभाव को प्रगट भी करना था।

आज यूथ विद ए मिशन सारे संसार में जाना जाता है; इसकी मिशन-सेना में लगभग आठ हज़ार कार्यकर्ता हैं जो पचास से अधिक देशों में सेवा करते हैं, और इसने संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता-प्राप्त हर देश में सेवकाई की है।

तो आपका दर्शन क्या है?

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