अध्याय 4 · 5 मिनट का पठन
अपनी नियति तक पहुँचना
आप उकाब के समान उड़ सकते हैं! यही वह नियति है जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिये बनाई है, परन्तु उसका आनन्द आप तभी जान पाएँगे जब आप उसकी योजनाओं पर चलेंगे और काम को उसके मार्ग से करेंगे, जैसा पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से बताया गया है।
हम मसीह में अपनी नियति तक पहुँचने के छह कदमों पर विचार करेंगे, और मार्गदर्शन के लिये 2 राजाओं 4:1-7 में बताई गई कहानी को आधार बनाएँगे।
भविष्यद्वक्ताओं में से एक की पत्नी एलीशा के पास आई और उससे कहा, “तेरा दास मेरा पति मर गया है। वह प्रभु का भय माननेवाला था, परन्तु हम पर इतना भारी कर्ज छोड़ गया है जिसे मैं चुका नहीं सकती, और अब लेनदार मेरे दोनों बच्चों को दास बनाने के लिये ले जाने आए हैं।” एलीशा ने उससे कहा, “मैं तेरे लिये क्या करूँ? मुझे बता कि तेरे घर में क्या है?” “कुछ नहीं,” उसने उत्तर दिया, “बस तेल की एक छोटी-सी कुप्पी है।” तब उसने कहा, “बाहर जाकर अपने सब पड़ोसियों से जितने बर्तन माँग सके, माँग ले आ। किसी भी आकार या नाप के हों, पर खाली बर्तन हों, और जितने अधिक हो सकें। फिर अपने घर में जाकर द्वार बन्द कर, और अपनी छोटी कुप्पी का तेल अपने पड़ोसियों के एक-एक बर्तन में उण्डेल। जब एक भर जाए, तो उसे अलग रख देना।”
वह गई और जैसा उसने कहा था वैसा ही किया; वह हर बर्तन में तेल उण्डेलती गई, जब तक वह भर न गया। अन्त में भरने के लिये और कोई बर्तन न रहा, और तेल रुक गया। उसने आकर भविष्यद्वक्ता एलीशा को सब कुछ बता दिया जो हुआ था। “जा, तेल बेच,” उसने कहा, “अपना कर्ज चुका दे, और फिर तू और तेरे बच्चे जीवन भर उसकी कमाई से निर्वाह करना।”
इस विधवा के लिये आगे का दृश्य बहुत ही अन्धकारमय था। उसे अपनी इस दुविधा से निकलने का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था, क्योंकि परिस्थितियों ने उसे पूरी तरह दबा लिया था। उसे चारों ओर केवल निराशा का अन्धकार ही दिखाई देता था। ऐसा लगता था कि उसकी इस घाटी से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। उसे एक नए दर्शन की आवश्यकता थी दो कैदी जेल की कोठरी में, सलाखों के पार ताक रहे थे एक को केवल अन्धेरा दिखा, दूसरे को दिखे तारे!
दोनों आदमियों के सामने एक ही दृश्य था, परन्तु उनका दर्शन अलग-अलग था! उनकी परिस्थितियाँ एक जैसी थीं, परन्तु उनके दृष्टिकोण अलग-अलग थे।
विधवा का मन भारी था, क्योंकि उसके दोनों बेटे लेनदारों के हाथ जाने ही वाले थे। वह एक ऐसा बोझ उठाए हुए थी जो उसे दबाए जा रहा था। उसे एक अलग बोझ की आवश्यकता थी एक लड़का एक अपंग लड़के को अपनी पीठ पर उठाए पहाड़ी पर चढ़ता हुआ दिखाई दिया।
एक राहगीर ने कहा, “अरे, तुमने तो बड़ा भारी बोझ उठा रखा है!” लड़के ने उत्तर दिया, “यह बोझ नहीं है! यह मेरा भाई है!”
यीशु चाहता है कि हम एक बोझ उठाएँ - उसका बोझ, जो हलका है। जो बोझ आप उठाते हैं, वह तभी भारी होगा जब वह वह बोझ न हो जिसकी योजना उसने आपके लिये बनाई है (और जिसके लिये उसने आपको रचा है!)
जब भविष्यद्वक्ता ने उससे पूछा कि उसके पास क्या है, तो ऐसा लगा मानो उसने उसकी परिस्थितियों को अनदेखा कर दिया हो। “बस तेल की एक छोटी-सी कुप्पी!” उसे यह एहसास नहीं था कि उस छोटी-सी कुप्पी में वह सब कुछ था जो उसकी बड़ी आवश्यकता को पूरा करने के लिये ज़रूरी था। आपके हाथ में क्या है - आपका वरदान क्या है?
“मूसा, तेरे हाथ में वह क्या है?” परमेश्वर ने पूछा। “बस एक चरवाहे की लाठी,” उसके दास ने उत्तर दिया। “इतना काफ़ी है,” परमेश्वर ने कहा, “क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तू मेरी भेड़ों के एक झुण्ड को मिस्र के दासत्व से बाहर निकाल ले चले” परमेश्वर सदा हमारे हाथ में वे योग्यताएँ और वरदान रख देता है जिनकी हमें उसका बोझ उठाने के लिये आवश्यकता होती है।
फिर भविष्यद्वक्ता ने विधवा को एक काम सौंपा - उसके सब पड़ोसियों के प्रति एक सेवकाई। ऐसा करना मूर्खता-सी लगती थी। इतने सारे पतीले और कड़ाहियाँ, बाल्टियाँ और तसले क्यों इकट्ठे किए जाएँ? उसके पास तो बस तेल की एक छोटी-सी कुप्पी थी, - पर उसने वही किया जो उससे करने को कहा गया था। हम में से हर एक को एक सेवकाई की आवश्यकता है।
“यीशु ने, यह जानकर कि पिता ने सब कुछ उसके हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्वर के पास से आया हूँ, और परमेश्वर के पास जाता हूँ। भोजन पर से उठकर, .... चेलों के पाँव धोने लगा।”
यीशु ने कहा कि वह सेवा करवाने नहीं, बल्कि सेवा करने आया है - और वह अपने चेलों से भी यही अपेक्षा रखता है। जब विधवा तेल उण्डेलने लगी, तो एक अद्भुत बात हुई! क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब उस छोटे-से तेल के पात्र से वे पतीले और कड़ाहियाँ लबालब भरते जा रहे थे, तब उनके चेहरों पर कैसा भाव रहा होगा? परमेश्वर ने उसकी आज्ञाकारिता को अपने अभिषेक से आशीषित किया था!
“प्रभु, हमारे पास तो बस पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं!” “इन्हें भीड़ में बाँट दो,” स्वामी ने कहा। सब खाकर तृप्त हो गए - और उन्होंने बचे हुए टुकड़ों से भरी हुई बारह टोकरियाँ उठाई!
विधवा और उसके दोनों बेटों ने सारा तेल अपने पड़ोसियों को बेच दिया। इतना पैसा मिला कि सारे कर्ज चुक गए, और जो बचा उससे वे जीवन भर आराम से गुज़ारा कर सके। वे आशीषित हुए, उनके पड़ोसी आशीषित हुए, और परमेश्वर की महिमा हुई।
उन्होंने अपनी सच्ची नियति में जीना सीख लिया था - परमेश्वर की स्वतन्त्रता और आशीषों में - उकाब के समान उड़ते हुए। प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पी के विश्वासियों को लिखा: “मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।”
इसलिए हम छह कदमों की रूपरेखा देते हैं: दर्शन बोझ वरदान सेवकाई अभिषेक उड़ान!
आने वाले अध्यायों में हम इन पर और गहराई से विचार करेंगे।
अध्याय 4 पूरा हुआ
अपनी नियति तक पहुँचना