अध्याय 3 · 13 मिनट का पठन
परमेश्वर के मार्ग से करना
वह दिन अच्छा नहीं रहा था! उस सुबह जब इस्राएल की सेनाएँ पलिश्तियों के विरुद्ध कूच कर रही थीं, तो वे आत्मविश्वास से भरी हुई थीं; उन्हें पूरा विश्वास था कि यहोवा उनके साथ है और वे यह लड़ाई किसी भी हाल में हार नहीं सकतीं। सारे शकुन अच्छे थे, क्योंकि देश में एक नया भविष्यद्वक्ता उठ खड़ा हुआ था, परमेश्वर अपने स्थान पर था, और पृथ्वी पर सब कुछ ठीक था। स्थान भी शुभ था, क्योंकि यद्यपि शत्रु के पास एक मज़बूत गढ़ था (इब्रानी शब्द अपेक का अर्थ), परन्तु इस्राएल की सेनाओं ने एबेनेजेर पर डेरा डाला था (इब्रानी — चट्टान, हमारी सहायता)।
परन्तु कुछ बहुत बुरी तरह बिगड़ गया था। जब लहू-सा लाल सूरज पहाड़ियों के पार डूब गया और लड़ाई से थकी हुई दोनों सेनाएँ अपने घायलों और मरते हुओं को उठाए अपनी-अपनी छावनियों में लौट गईं, तब इस्राएलियों की पाँतों में एक बेचैन कानाफूसी फैल गई। अनुमान था कि उनके लगभग चार हजार साथी उस लहूलुहान मैदान में पड़े थे, जो अब कभी अपने घरों और अपने प्रियजनों के पास लौटनेवाले नहीं थे। अधिकारियों ने आपस में सलाह की, और जैसा मनुष्य प्रायः करते हैं जब बातें उनके मन के अनुसार नहीं होतीं, वे प्रश्न करने लगे कि प्रभु ने उन्हें निराश क्यों किया।
“भविष्यद्वक्ता को तो इन विपत्तियों को पहले से देख लेना चाहिए था! यहोवा के याजक तो निश्चय ही विजय की गारंटी दे सकते थे! इस बात पर हमारा विश्वास कि यहोवा हमारे साथ है, निश्चय ही मनचाहा परिणाम लाना चाहिए था!”
“मेरे पास एक सुझाव है।” प्राचीनों में से एक ने कहा। “क्यों न हम कुछ लोगों को शीलो वापस भेजें कि वे याजकों से कहें कि प्रभु को यहाँ युद्ध के मैदान में ले आएँ? हो सकता है कि वहाँ तम्बू में निवास करते हुए उसे पता ही न हो कि हम किस दौर से गुज़र रहे हैं।”
एप्रैम के एक नगर शीलो में तम्बू खड़ा किए हुए तीन सौ वर्ष बीत चुके थे, और याजकों की कई पीढ़ियों ने वहाँ सेवा की थी। आराधना इतनी बिगड़ चुकी थी कि उसके आँगनों में हर प्रकार की भ्रष्टता होने दी जाती थी। फिर भी लोग जानते थे कि वर्ष में एक बार महायाजक उसके सबसे पवित्र भाग में प्रवेश करता है, ताकि सब लोगों की ओर से प्रभु से मिले। इस मिलन का महत्व या उसकी रीति वे पूरी तरह भूल चुके थे, और दूसरे याजकों को उस वर्जित स्थान में प्रवेश करने का कोई भय नहीं रह गया था।
साधारण लोग, जिन्हें स्वयं तम्बू के भीतर जाने का कोई अधिकार नहीं था, तरह-तरह के अन्धविश्वासों में पड़ गए थे, जिन्हें याजकों द्वारा बड़े चाव से सुनाई जानेवाली कहानियाँ और बढ़ावा देती थीं। “सबसे पवित्र स्थान में सोने का एक सन्दूक रखा है, जिसे वाचा का सन्दूक कहते हैं, और प्रभु उस सन्दूक पर सोने के दो स्वर्गदूतों के बीच विराजमान रहता है।” ठीक वैसे ही जैसे बाद में कुएँ पर यीशु से मिलनेवाली सामरी स्त्री के लिये था, परमेश्वर केवल एक विशेष स्थान पर ही पाया जा सकता था, और इस समय वह शीलो में तम्बू के छायादार घेरे के भीतर करूबों के बीच विराजमान था।
“परमेश्वर ने हमें इस मुसीबत में डाला है। आओ, उसे यहाँ ले आएँ ताकि वही हमें इससे निकाले! सन्दूक को मँगवाओ!” एबेनेजेर के युद्ध के मैदान में इस सुझाव का बड़े उत्साह से स्वागत हुआ।
दूतों को बूढ़े महायाजक एली के पुत्रों, होप्नी और पीनहास को इस बात के लिये मना लेना आसान लगा कि वे सन्दूक को युद्ध के मैदान में ले आएँ। वे स्वयं भी सन्दूक के साथ आए, ताकि उनके अधिकार के विषय में किसी को कोई सन्देह न रहे। जब सन्दूक को युद्ध के मैदान में लाया जाता हुआ दिखाई दिया, तो सारे इस्राएली इतने ज़ोर से ललकार उठे कि उनके शत्रुओं के मन में भय समा गया। “हाय हम पर!” वे चिल्लाए, “क्योंकि जिन महाप्रतापी देवताओं ने मिस्रियों को मार डाला और इस्राएलियों को दासत्व से छुड़ाया, वे हमारे बीच आ गए हैं!” परमेश्वर के प्रति उनके मन में उसकी अपनी प्रजा, यहूदियों से भी अधिक आदर और भय था!
जब इस्राएलियों ने बिना अपनी ढिठाई कम किए फिर से लड़ाई छेड़ी, तो पलिश्ती ऐसे लड़े मानो मरने ही के लिये ठाने हुए हों — और इस्राएल का “ऐसा अत्यन्त संहार हुआ, कि तीस हजार इस्राएली पैदल खेत आए।” परमेश्वर का सन्दूक छीन लिया गया; और एली के दोनों पुत्र, होप्नी और पीनहास, भी मारे गए।
जब पीनहास की पत्नी ने अपने पति की मृत्यु का समाचार सुना, तो उसने अपने गर्भ के बच्चे को जन्म दिया और इसी में उसकी मृत्यु हो गई, परन्तु मरने से पहले उसने उस बालक का नाम ईकाबोद रखा, जिसका अर्थ है, महिमा उठ गई।
सन्दूक — जो परमेश्वर की उपस्थिति और उसकी वाचा की प्रतिज्ञाओं का प्रतीक था — को इस्राएल में अपने उचित स्थान पर लौटने में सौ लम्बे और कठिन वर्ष लगनेवाले थे।
वह पलिश्तियों के बीच केवल कुछ ही महीने रहा था कि वे उसे लौटाना चाहने लगे, क्योंकि जहाँ-जहाँ सन्दूक ले जाया गया, वहाँ-वहाँ उनमें बहुत-सी मौतें हुई थीं।
जैसे-जैसे मौतें बढ़ती गईं, यह मात्र एक चोर-सन्देह न रहकर पक्की आशंका बन गई कि इन मौतों और सन्दूक की उपस्थिति के बीच कोई सम्बन्ध है; इसलिए एक योजना बनाई गई, जिससे उस सन्देह की जाँच भी हो जाए और उस समस्या से छुटकारा भी मिल जाए। दो ऐसी गायें लाई गईं जिन्होंने अभी-अभी बछड़े जने थे। उन्हें एक साथ जोतकर लकड़ी की एक नई गाड़ी खिंचवानी थी, ऐसी चीज़ जिससे वे बिल्कुल अनजान थीं।
उस सन्देहास्पद सन्दूक को सोने के गहनों की एक ‘शान्ति’ भेंट के साथ उस नई गाड़ी पर रखा गया, और गायों का मुँह इस्राएल की सीमा की ओर कर दिया गया। उनकी स्वाभाविक ममता उन्हें अपने बछड़ों की ओर ले जाती, और इससे यह प्रकट होता कि इस्राएल के देवता को अपना सन्दूक वापस पाने में कोई विशेष रुचि नहीं है, और पलिश्तियों के देश में हुई मौतें न्याय नहीं, बल्कि केवल संयोग थीं। परन्तु यदि गायें अपने बच्चों की अनदेखी करके सीधे इस्राएल की ओर चल पड़तीं, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण होता कि पलिश्ती सन्दूक को — और परमेश्वर को — उसके उचित स्थान पर लौटाकर बुद्धिमानी कर रहे हैं!
वे बुद्धिमान ही थे! गायें सीधे इस्राएल की सीमा की ओर चली गईं, और न दाहिने मुड़ीं और न बायें, जब तक कि वे बेतशेमेश के खेतों में न पहुँच गईं। वहाँ के लोग सन्दूक को देखकर आनन्दित हुए, और उन्होंने गाड़ी की लकड़ी से आग जलाकर उन दोनों गायों को यहोवा के लिये धन्यवाद की भेंट के रूप में उस पर बलि चढ़ाया। स्थानीय लेवीय याजकों ने सन्दूक को उठाकर एक बड़े पत्थर पर रख दिया, जहाँ वह सब लोगों के लिये एक तमाशा बन गया, यहाँ तक कि कुछ लोगों ने, जो बाकियों से अधिक जिज्ञासु थे, भीतर झाँकने के लिये उसका ढक्कन उठा दिया। मुझे निश्चय है कि वे अपने इस काम को उचित ठहरा सकते थे। “हम तो बस यह देख रहे थे कि हारून की छड़ी, आज्ञाओं की पटियाएँ और मन्ना का पात्र अब भी उसमें हैं या नहीं!” वे शायद ऐसा कहते।
परन्तु उनकी आवाज़ें मौन हो गईं, क्योंकि तुरन्त ही वे और उस क्षेत्र के पचास हजार से अधिक और पुरुष परमेश्वर के न्याय के कारण मर गए। जब भ्रष्ट याजक-वर्ग उसके तम्बू को अशुद्ध कर रहा था, तब वह बहुत वर्षों तक चुप रहा था; जब पलिश्ती उसे अपने सारे देश में घुमाते फिरे, तब उसने स्वयं को सामर्थी दिखाया; जब पलिश्तियों ने अशुद्ध गायों से खींची जानेवाली गाड़ी पर सन्दूक को बेढंगे ढंग से लादा, तब उसने स्वयं को अनुग्रह और दया से भरपूर दिखाया; परन्तु जब उसकी अपनी वाचा की प्रजा ने अनादर की सीमा लाँघी, तब उसने स्वयं को पवित्रता में भययोग्य दिखाया।
बचे हुए लोग रो पड़े। “इस पवित्र परमेश्वर यहोवा के सामने कौन खड़ा रह सकता है? और वह हमारे पास से किसके पास चला जाए?” किर्यत्यारीम के लोग आए और सन्दूक को ले जाकर अबीनादाब नाम के एक व्यक्ति के घर पहुँचाया, और उसके पुत्र को सन्दूक की देखभाल के लिये याजक के रूप में पवित्र किया। वह बहुत वर्षों तक वहीं रहा; सारा इस्राएल उसकी इस दशा पर विलाप करता रहा, परन्तु उसके विषय में कुछ करने से डरता रहा।
उसी समय में लोगों ने शमूएल भविष्यद्वक्ता से माँग की कि वह उनके लिये एक राजा ठहराए, ताकि वे भी आसपास की जातियों के समान हो जाएँ। “यदि परमेश्वर हमारे बीच उपस्थित नहीं है, और याजक-वर्ग का अन्त हो चुका है, तो चाहे उसका भविष्यद्वक्ता हमारे पास हो, फिर भी हम पर शासन करने के लिये हमें एक राजा चाहिए” उन्होंने कहा। परमेश्वर की अनुमति से शमूएल शाऊल का इस्राएल के पहले राजा के रूप में अभिषेक करता है — ऐसा पुरुष जो दूसरे लोगों से कंधे भर ऊँचा था। मनुष्यों की दृष्टि में वह महान था, परन्तु परमेश्वर के सामने दुर्बल सिद्ध हुआ। सचमुच, उसके राज्य के समय लोग ईश्वरीय बुद्धि से नहीं, बल्कि मानवीय विचारों से चलाए गए। अभिषेक बहुत कम था, क्योंकि परमेश्वर अपनी प्रजा के बीच (सक्रिय) नहीं था — और सन्दूक किर्यत्यारीम में ही पड़ा रहा।
शाऊल ने चालीस वर्ष तक राज्य किया, फिर उसकी जगह परमेश्वर का चुना हुआ दाऊद आया — दैत्य को मारनेवाला दाऊद, भजन रचनेवाला दाऊद। जब वह सिंहासन पर बैठता है, तब तक सन्दूक को छिपे हुए अस्सी वर्ष से अधिक हो चुके हैं, और अभी चौदह वर्ष और बीतने हैं, तब कहीं जाकर वह उसे यरूशलेम — नए शीलो — में लौटा लाने का प्रयास करेगा। लगभग सौ वर्ष से इस्राएल के विश्वासयोग्य लोग उसकी अनुपस्थिति पर विलाप करते आ रहे थे।
“आओ” राजा ने अपने चुने हुए पुरुषों की एक बड़ी सभा से कहा। “हम किर्यत्यारीम को चलें और सन्दूक को यरूशलेम में उसके उचित स्थान पर वापस ले आएँ।” “वह बहुत लम्बे समय से दूर रहा है, और हमें उसे वापस लाना ही होगा, ताकि हम फिर से प्रभु की उपस्थिति में आराधना कर सकें।” इन भावनाओं से कौन असहमत हो सकता था? सब जानते थे कि प्रभु प्रसन्न होगा और इस काम में उनका आदर करेगा। “हम उसे ले कैसे जाएँगे?” उसके अनुयायियों में से एक अधिक व्यावहारिक व्यक्ति ने पूछा। किसी को वह कहानी याद आई कि कैसे पलिश्तियों ने दो गायों से खींची जानेवाली गाड़ी पर सन्दूक को इस्राएल वापस भेजा था, और उसने सुझाव दिया कि स्पष्ट है, सन्दूक को ले जाने का वह एक आसान तरीका था।
परन्तु वे पलिश्तियों से अधिक बुद्धिमान हैं, इसलिए उनके पास दूध देनेवाली दो गायों के बजाय दो सधे हुए बैल हैं। शीघ्र ही वे सन्दूक को अबीनादाब के घर से निकाल लाए और उसे एक नई गाड़ी पर रखा, जो पलिश्तियों की पुरानी गाड़ी का कहीं अधिक सुधरा हुआ रूप थी, दोनों बैलों को जोता और यरूशलेम की ओर लौटने की यात्रा आरम्भ कर दी। ओह, उन्होंने कैसा उत्सव मनाया! दाऊद और उसके मित्र नाचते और अपने बाजे बजाते रहे, हवा में हाथ लहराते रहे, और उन्हें ‘बहुत बढ़िया!’ महसूस हुआ। प्रसन्न नहीं था तो केवल स्वयं प्रभु! वे अधिक दूर नहीं गए थे कि सधे हुए बैलों का पाँव फिसला, सन्दूक गिरते-गिरते बचा, और एक निर्दोष याजक ने उसे सँभालने के लिये अपना हाथ बढ़ाया — और पवित्र परमेश्वर के हाथ से तुरन्त मर गया!
आनन्द के साथ यरूशलेम लाए जाने के बजाय सन्दूक को एक ओर गतवासी ओबेदेदोम के घर में ले जाया गया, जहाँ उसे और तीन महीने रहना था, जबकि दाऊद घर पर उदासी के सागर में डूबा बैठा रहा। पहले तो वह प्रभु पर और उसके प्रत्यक्ष अन्याय पर बहुत क्रोधित हुआ। फिर जब वह मनन करने और प्रभु को खोजने लगा, तो उसकी अगुवाई हुई कि वह सन्दूक के विषय में मूसा के लेखों को पढ़े — उसके बनाए जाने, उसके उपयोग, और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे ले जाया जाए, इन सब के विषय में। “कहातियों के उठाने के लिये मिलापवाले तम्बू की ये ही वस्तुएँ हैं।”
तब दाऊद ने यरूशलेम में एक स्थान तैयार किया जहाँ सन्दूक विश्राम करे, और ओबेदेदोम के घर से सन्दूक को उठा लाने के लिये लोगों को तैयार किया, जैसा पवित्रशास्त्र में कहा गया था। कहात के कुल के लेवियों को सन्दूक को अपने कंधों पर उठाकर उसके ठहराए हुए विश्राम-स्थान तक सारे मार्ग ले जाने के काम के लिये अलग और पवित्र किया गया। यह बैलों और गाड़ी का काम नहीं था — जैसा सांसारिक पलिश्तियों ने किया था — बल्कि स्वयं परमेश्वर द्वारा ठहराई गई एक सेवकाई थी। अन्ततः लोग आनन्द मना सके, क्योंकि सन्दूक — प्रभु की उपस्थिति, उसके अभिषेक का प्रतीक — एक बार फिर उसकी प्रजा के बीच था।
इस कहानी से हम क्या सीख सकते हैं? निश्चय ही एक बात साफ़-साफ़ उभरकर आती है, और वह आज भी उतनी ही आवश्यक है जितनी शमूएल, शाऊल और दाऊद के दिनों में थी। जब आप परमेश्वर का काम करना चाहते हैं, तो अच्छा यही है कि आप उसे उसी के मार्ग से करें! उसने अपनी प्रजा को स्पष्ट निर्देश दिए थे, और उनकी अवहेलना करके उन्होंने अपने ही ऊपर संकट मोल लिया। पलिश्ती सन्दूक के साथ अनादर का व्यवहार करके भी उसकी दया का अनुभव कर सकते थे, परन्तु परमेश्वर की प्रजा के पास कोई बहाना नहीं था, इसलिए वे केवल उसके न्याय का ही अनुभव कर सकते थे।
इसी प्रकार आज हम संसार के विचारों और तरीकों के पीछे चलने में बहुत उतावले रहते हैं, क्योंकि वे काम करते हुए दिखाई देते हैं, जबकि परमेश्वर अपना अभिषेक हटा लेता है और इस बात की प्रतीक्षा करता है कि हम समझें कि उसने काम करने के अपने मार्ग पहले से ही ठहरा रखे हैं। उसने कलीसिया में पुरुषों और स्त्रियों को अलग-अलग भूमिकाओं के लिये नियुक्त किया है और उन्हें अपने करिश्माटा दिए हैं (यूनानी भाषा से, जिसका अर्थ है अनुग्रह-वरदान — सेंत-मेंत दी गई पवित्र क्षमताएँ)।
संसार अपने व्यापारिक कामकाज में अगुवाई की बहुत-सी अच्छी तकनीकें अपनाता है। परन्तु सांसारिक रूप से अगुवाई करने या शासन करने की योग्यता होने का अर्थ यह नहीं कि किसी के पास अगुवाई का वह करिश्माई वरदान भी है जो कलीसिया में शासन करने के लिये आवश्यक है। किसी को एक अच्छा (सांसारिक) शिक्षक बनने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह “सिखाने में निपुण” है — जो प्राचीन होने के लिये एक आवश्यक योग्यता है। कोई मनोवैज्ञानिक के रूप में बहुत ऊँची योग्यता रख सकता है, परन्तु इससे उसे बाइबल के अनुसार परामर्श देने की क्षमता नहीं मिल जाती। मैं मानता हूँ कि हमारी कलीसियाओं में बहुत-से ऐसे लोग हैं जिन्हें मनोचिकित्सीय परामर्श की आवश्यकता है, परन्तु ऐसा परामर्श आत्मिक बीमारियों को कभी चंगा नहीं कर सकता।
हम अपने “4 आत्मिक नियम,” “रोमियों का मार्ग,” “मित्रता द्वारा सुसमाचार प्रचार,” आदि के साथ हर प्रकार के सुसमाचार-प्रचार अभियानों की योजना बनाने में बहुत कुशल हैं, जबकि उस तरीके की उपेक्षा करते हैं जो यीशु ने अपनी मृत्यु से पहले की रात हमारे लिये ठहराया था।
“हे पिता, मैं (तुम्हारी कलीसिया, तुम्हारे नगर) के उन सब लोगों के लिये विनती करता हूँ जो मुझ पर विश्वास करेंगे। मैं विनती करता हूँ कि वे सब एक हों; जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूँ, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिए कि जगत विश्वास करे, कि तू ही ने मुझे भेजा… कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएँ, और जगत जाने कि तू ही ने मुझे भेजा, और जैसा तूने मुझसे प्रेम रखा, वैसा ही उनसे प्रेम रखा।”
जब तक हम मसीह की देह में अपनी एकता के विषय में गम्भीर नहीं होते (न कि अपनी एकरूपता के विषय में, और न ही सबसे छोटे साझा अंश पर टिकी किसी संयोगवश बनी शिक्षा के विषय में), तब तक सुसमाचार-प्रचार के हमारे सारे कार्यक्रम मानवीय रचना ही रहेंगे, और प्रभु के पास उन पर अपना अभिषेक उण्डेलने का शायद ही कोई कारण होगा।
प्रभु ने अपनी कलीसिया में वे बोझ, वरदान और सेवकाइयाँ ठहराई हैं जो ऐसी कलीसिया बनाने के लिये आवश्यक हैं कि अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे। जब हम उसके उद्देश्यों को बदलते हैं और अपनी ही योजनाएँ और कार्यक्रम थोपते हैं, तो ऐसा हम अपने ही संकट पर और इस खोए हुए संसार की भारी हानि पर करते हैं।
अध्याय 3 पूरा हुआ
परमेश्वर के मार्ग से करना