प्रार्थना के द्वारा सामर्थ्य
प्रार्थना करता मंच प्रार्थना करती मंडली को जन्म देता है

अध्याय 20 · 5 मिनट का पठन

प्रार्थना करता मंच प्रार्थना करती मंडली को जन्म देता है

मैं समझता हूँ कि मेरी प्रार्थना स्वयं शैतान से भी बढ़कर है; यदि ऐसा न होता, तो लूथर की दशा बहुत पहले ही कुछ और होती। फिर भी लोग उन महान आश्चर्यकर्मों या चमत्कारों को न तो देखेंगे और न मानेंगे जो परमेश्वर मेरे निमित्त करता है। यदि मैं एक ही दिन प्रार्थना की उपेक्षा कर दूँ, तो मैं विश्वास की आग का बहुत बड़ा भाग खो बैठूँगा।—मार्टिन लूथर

पिन्तेकुस्त से पहले प्रेरित प्रार्थना के महान महत्व की केवल झलकियाँ ही पा सके। परन्तु पिन्तेकुस्त के दिन आत्मा के आने और भर जाने ने प्रार्थना को मसीह के सुसमाचार में उसके अत्यावश्यक और सर्वप्रधान स्थान तक ऊँचा उठा दिया। अब हर सन्त के लिए प्रार्थना की पुकार आत्मा की सबसे ऊँची और सबसे अनिवार्य पुकार है। सन्तत्व की भक्ति प्रार्थना ही से बनती, निखरती और सिद्ध होती है। जब सन्त सवेरे और देर तक और लम्बे समय तक अपनी प्रार्थनाओं में नहीं लगे रहते, तब सुसमाचार धीमी और डरपोक चाल से आगे बढ़ता है।

वे मसीह जैसे अगुवे कहाँ हैं जो आज के सन्तों को प्रार्थना करना सिखा सकें और उन्हें उसमें लगा सकें? क्या हम जानते हैं कि हम एक प्रार्थनाहीन सन्त-समुदाय खड़ा कर रहे हैं? वे प्रेरितीय अगुवे कहाँ हैं जो परमेश्वर के लोगों को प्रार्थना में लगा सकें? वे आगे आएँ और यह काम करें, और यह वह सबसे बड़ा काम होगा जो किया जा सकता है। शिक्षा के साधनों की वृद्धि और धन-बल की महान वृद्धि धर्म के लिए सबसे घोर श्राप सिद्ध होगी, यदि वे उस से अधिक और उत्तम प्रार्थना से पवित्र न की जाएँ जितनी हम कर रहे हैं। अधिक प्रार्थना अपने आप नहीं आ जाएगी। बीसवीं या तीसवीं शताब्दी के कोष के लिए चलाया गया अभियान हमारी प्रार्थना में सहायता नहीं करेगा, वरन् यदि हम सावधान न रहें तो बाधा ही डालेगा। प्रार्थना करते अगुवों के एक विशेष प्रयास के सिवा और कुछ काम न आएगा। प्रमुख जनों को उस प्रेरितीय प्रयास में अगुवाई करनी होगी जिससे प्रार्थना का अत्यावश्यक महत्व और वास्तविकता कलीसिया के हृदय और जीवन में जड़ जमा ले। प्रार्थना करते अगुवों के सिवा किसी के प्रार्थना करते अनुयायी नहीं हो सकते। प्रार्थना करते प्रेरित प्रार्थना करते सन्तों को जन्म देंगे। प्रार्थना करता मंच प्रार्थना करती मंडलियों को जन्म देगा। हमें सचमुच किसी ऐसे की बड़ी आवश्यकता है जो सन्तों को प्रार्थना के इस काम में लगा सके। हम प्रार्थना करते सन्तों की पीढ़ी नहीं हैं। प्रार्थना न करते सन्त सन्तों का एक कंगाल झुंड हैं, जिनमें न सन्तों का उत्साह है, न सुन्दरता, न सामर्थ्य। इस दरार की मरम्मत कौन करेगा? वही सुधारकों और प्रेरितों में सबसे महान होगा, जो कलीसिया को प्रार्थना में लगा सके।

हम इसे अपना अत्यन्त गम्भीर निर्णय मानकर कहते हैं कि इस युग में और सब युगों में कलीसिया की महान आवश्यकता ऐसे पुरुष हैं जिनका विश्वास इतना प्रभावशाली, जिनकी पवित्रता इतनी निष्कलंक, जिनकी आत्मिक शक्ति और भस्म कर देने वाली धुन इतनी स्पष्ट हो, कि उनकी प्रार्थनाएँ, विश्वास, जीवन और सेवकाई ऐसे मौलिक और प्रचण्ड रूप की हों जो ऐसी आत्मिक क्रान्तियाँ कर दिखाएँ जो व्यक्तिगत और कलीसियाई जीवन में नए युग रच दें।

हमारा अभिप्राय उन पुरुषों से नहीं जो नए-नए उपायों से सनसनीखेज हलचल मचाते हैं, न उनसे जो मनभावने मनोरंजन से आकर्षित करते हैं; परन्तु उन पुरुषों से जो परमेश्वर के वचन के प्रचार और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से चीज़ों को हिला सकें, और ऐसी क्रान्तियाँ कर सकें जो चीज़ों की समूची धारा को ही बदल दें।

स्वाभाविक योग्यता और शैक्षिक सुविधाएँ इस विषय में कारक के रूप में नहीं गिनी जातीं; परन्तु विश्वास की क्षमता, प्रार्थना करने की योग्यता, पूर्ण समर्पण की सामर्थ्य, आत्म-लघुता की योग्यता, परमेश्वर की महिमा में अपने आप को पूरी तरह खो देना, और परमेश्वर की सारी परिपूर्णता के लिए एक सदा उपस्थित और अतृप्त लालसा और खोज—ऐसे पुरुष जो कलीसिया को परमेश्वर के लिए धधका सकें; किसी कोलाहलपूर्ण, दिखावटी रीति से नहीं, वरन् एक प्रबल और शान्त ताप से जो हर वस्तु को परमेश्वर के लिए पिघला देता और हिला देता है।

परमेश्वर आश्चर्यकर्म कर सकता है यदि उसे एक उपयुक्त मनुष्य मिल जाए। मनुष्य आश्चर्यकर्म कर सकते हैं यदि वे परमेश्वर को अपनी अगुवाई करने दें। उस आत्मा का पूर्ण वरदान जिसने जगत को उलट-पुलट कर दिया, इन अन्तिम दिनों में अत्यन्त उपयोगी होगा। ऐसे पुरुष जो परमेश्वर के लिए चीज़ों को सामर्थ्य से हिला सकें, जिनकी आत्मिक क्रान्तियाँ चीज़ों के समूचे रूप को बदल दें, कलीसिया की सार्वभौमिक आवश्यकता हैं।

कलीसिया कभी इन पुरुषों से रहित नहीं रही; वे उसके इतिहास को सुशोभित करते हैं; वे कलीसिया की ईश्वरीयता के अटल चमत्कार हैं; उनका उदाहरण और इतिहास एक कभी न चूकने वाली प्रेरणा और आशीष है। उनकी संख्या और सामर्थ्य में वृद्धि हमारी प्रार्थना होनी चाहिए।

जो आत्मिक विषयों में किया जा चुका है, वह फिर किया जा सकता है, और उससे भी उत्तम रीति से किया जा सकता है। यह मसीह का मत था। उसने कहा, “मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूँ वह भी करेगा, वरन् इनसे भी बड़े काम करेगा, क्योंकि मैं पिता के पास जाता हूँ।” बीते समय ने न तो परमेश्वर के लिए बड़े काम करने की सम्भावनाओं को समाप्त किया है, न उनकी माँग को। जो कलीसिया अपनी सामर्थ्य और अनुग्रह के चमत्कारों के लिए अपने बीते इतिहास पर निर्भर रहती है, वह एक पतित कलीसिया है।

परमेश्वर चुने हुए पुरुष चाहता है—ऐसे पुरुष जिनमें से आत्म और संसार एक कठोर क्रूस-मरण के द्वारा, एक ऐसे दिवालियेपन के द्वारा निकल चुके हैं जिसने आत्म और संसार को इतनी पूरी तरह उजाड़ दिया है कि न उबरने की कोई आशा बची है, न इच्छा; ऐसे पुरुष जिन्होंने इस दिवालियेपन और क्रूस-मरण के द्वारा परमेश्वर की ओर सिद्ध हृदय फेर दिए हैं।

आओ हम उत्कटता से प्रार्थना करें कि प्रार्थना के विषय में परमेश्वर की प्रतिज्ञा पूरी होने से भी बढ़कर पूरी हो।

अध्याय 20 पूरा हुआ

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