मसीह में पवित्र
पवित्रता और भीतर वास

अध्याय 9 · 12 मिनट का पठन

पवित्रता और भीतर वास

‘और वे मेरे लिये एक पवित्रस्थान बनाएँ, कि मैं उनके बीच निवास करूँ।’—निर्गमन 25:8।

‘और वह तम्बू मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा, और मैं इस्राएलियों के मध्य निवास करूँगा, और उनका परमेश्वर ठहरूँगा।’—निर्गमन 29:43, 45।

परमेश्वर की उपस्थिति पवित्र कर देती है, तब भी जब वह थोड़ी ही देर के लिये उतरती है, जैसे होरेब पर जलती हुई झाड़ी में। तो वह उपस्थिति उस स्थान को कितना अधिक पवित्र करती होगी जहाँ वह वास करती है, जहाँ वह अपना स्थायी निवास ठहराती है! यह बात यहाँ तक सच है कि जिस स्थान में परमेश्वर वास करता था, वह वही पवित्रस्थान कहलाने लगा, ‘परमप्रधान के पवित्र निवास भवन।’ परमेश्वर जहाँ वास करता था, उसके चारों ओर सब कुछ पवित्र था: पवित्र नगर, परमेश्वर की पवित्रता का पर्वत, उसका पवित्र भवन, यहाँ तक कि हम परदे के भीतर, परमपवित्र स्थान में, अर्थात् पवित्रों में सबसे पवित्र स्थान में पहुँचते हैं। भीतर वास करनेवाले परमेश्वर के रूप में ही वह अपने भवन को पवित्र करता है, इस्राएल के बीच अपने आपको उस पवित्र के रूप में प्रगट करता है, और हमें भी पवित्र बनाता है।

परमेश्वर पवित्र है, इसलिए वह भवन भी पवित्र है जिसमें वह वास करता है। परमेश्वर का यही एक गुण है जो वह अपने भवन को प्रदान कर सकता है; परन्तु यह एक गुण वह प्रदान कर सकता है और करता भी है। मनुष्यों में घर के स्वरूप और उसमें रहनेवालों के बीच बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जब कोई बाधा न हो, तो घर अनजाने ही अपने स्वामी की छवि झलकाता है। पवित्रता किसी एक गुण को उतना नहीं, जितना अपनी अनन्त सिद्धता में परमेश्वर के अस्तित्व ही को व्यक्त करती है, और उसका भवन इसी एक सत्य की गवाही देता है कि वह पवित्र है, कि जहाँ वह वास करता है वहाँ पवित्रता अवश्य होनी चाहिए, कि उसका भीतर वास पवित्र करता है। अपनी प्रजा को अपने लिये एक पवित्रस्थान बनाने की अपनी पहली आज्ञा में परमेश्वर ने स्पष्ट कहा कि यह इसलिए है कि वह उनके बीच निवास करे: भवन में उसका वास अपनी प्रजा के बीच उसके वास की छाया ठहरनेवाला था। इस प्रकार अपनी पवित्रता सहित वह भवन हमें अपने छुड़ाए हुओं के बीच उसके वास की पवित्रता तक आगे ले जाता है।

वह पवित्रस्थान, परमेश्वर की पवित्रता का निवास, इस्राएल को पवित्र बनाने के परमेश्वर के सारे काम का केन्द्र था। उससे जुड़ी हर वस्तु पवित्र थी। वेदी, याजक, बलिदान, तेल, रोटी, पात्र, सब पवित्र थे, क्योंकि वे परमेश्वर के थे। उस भवन से दोहरी वाणी निकलती थी—पवित्र होने के लिये परमेश्वर की बुलाहट, और पवित्र करने की परमेश्वर की प्रतिज्ञा। परमेश्वर का दावा इस माँग में प्रगट होता था कि जितने उसके निकट आनेवाले हों, चाहे याजक हों चाहे उपासक, उन सब में शुद्धता, प्रायश्चित और पवित्रता हो। और परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसके भवन से उस प्रबन्ध में चमकती थी जो पवित्र करने के लिये किया गया था, अर्थात् वेदी की, लहू की और तेल की पवित्र करनेवाली सामर्थ्य में। वह भवन उन दोनों पक्षों को मूर्त रूप देता था जो पवित्रता में एक हैं: दूर हटानेवाला और खींचनेवाला, दोषी ठहरानेवाला और उद्धार करनेवाला। कभी लोगों को दूर रखकर, कभी उन्हें बुलाकर और निकट लाकर, परमेश्वर का भवन उसकी अपनी पवित्रता का महान चिन्ह था। वह उनके बीच वास करने को भी निकट आ गया था; तौभी वे निकट नहीं आ सकते थे, वे उसकी उपस्थिति के गुप्त स्थान में कभी प्रवेश नहीं कर सकते थे।

ये सब बातें हमारे लिये लिखी गई हैं। भीतर वास करनेवाले के रूप में ही परमेश्वर आज भी अपनी प्रजा को पवित्र करनेवाला है: केवल भीतर वास करनेवाली उपस्थिति ही हमें पवित्र बनाती है। यह बात विशेष स्पष्टता से तब सामने आती है जब हम ध्यान देते हैं कि उपस्थिति जितनी निकट थी, पवित्रता की मात्रा उतनी ही अधिक थी। परमेश्वर उनके बीच वास करता था, इसलिए छावनी पवित्र थी: सारी अशुद्धता उसमें से दूर की जानी थी। परन्तु तम्बू के आँगन की पवित्रता इससे अधिक थी: जो अशुद्धता किसी को छावनी से बाहर नहीं करती थी, वह भी वहाँ सही नहीं जाती थी। फिर पवित्रस्थान और भी पवित्र था, क्योंकि वह परमेश्वर के और भी निकट था। और भीतरी पवित्रस्थान, जहाँ वह उपस्थिति प्रायश्चित के ढकने पर वास करती थी, परमपवित्र स्थान था, अति पवित्र था। यह सिद्धान्त आज भी लागू होता है: पवित्रता परमेश्वर की निकटता से नापी जाती है; उसकी उपस्थिति जितनी अधिक, सच्ची पवित्रता उतनी ही अधिक; पूर्ण भीतर वास पूर्ण पवित्रता होगा। यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं; उसको छोड़ कहीं पवित्रता नहीं। वह अपनी पवित्रता का कुछ अंश अपने आपसे अलग करके हमें नहीं दे सकता; हमारे पास उतनी ही पवित्रता है जितना हमारे पास स्वयं परमेश्वर है। और उसे सचमुच और पूरी रीति से पाने के लिये, हमें उसे भीतर वास करनेवाले के रूप में पाना होगा। और किसी भवन या स्थान में, जिसमें न जीवन है न आत्मा, उसका वास तो जीवित जन के रूप में उसके सच्चे भीतर वास की केवल एक धुंधली छाया है, जब वह हमारे अस्तित्व ही में प्रवेश करके उसमें व्याप्त हो जाता है, और हमें, हाँ, हमारे अपने आप को, अपने ही जीवन से भर देता है।

भीतर वास करनेवाले जीवन के समान इतना घनिष्ठ, इतना वास्तविक, इतना पूर्ण कोई मेल नहीं है। उस जीवन के विषय में सोचो जो एक बड़े और फलदार वृक्ष में संचारित होता है। वह कैसे उसके हर भाग में व्याप्त होकर उसे भर देता है; जब तक वृक्ष को सचमुच जीवित रहना है, तब तक वह कैसे पूरे वृक्ष को अटूट रूप से एक बनाए रखता है!—लकड़ी और पत्ते में, फूल और फल में, हर कहीं वह भीतर वास करनेवाला जीवन बहता और भरता है। यह जीवन प्रकृति का जीवन है, परमेश्वर के उस आत्मा का जीवन जो प्रकृति में वास करता है। यही जीवन हमारी देहों में भी प्राण फूँकता है, प्रकृति का वह आत्मा जो संवेदना और क्रिया की सामर्थ्य लेकर उनके हर भाग में व्याप्त रहता है।

नये जीवन के आत्मा का भीतर वास, जिसके द्वारा परमेश्वर विश्वासी के हृदय में वास करता है, इससे कम घनिष्ठ नहीं, वरन् कहीं अधिक अद्भुत और वास्तविक है। और जब यह भीतर वास सचेत लालसा और विश्वास का विषय बन जाता है, तभी प्राण इस आज्ञा को मानता है, ‘वे मेरे लिये एक पवित्रस्थान बनाएँ, कि मैं उनके बीच निवास करूँ,’ और इस प्रतिज्ञा की सच्चाई का अनुभव करता है, ‘वह तम्बू मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा, और मैं इस्राएलियों के मध्य निवास करूँगा।’

भीतर वास करनेवाले के रूप में ही परमेश्वर ने अपने आपको उस पुत्र में प्रगट किया, जिसे उसने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा। हमारे प्रभु ने एक से अधिक बार इस पर बल दिया, ‘मेरा ही विश्वास करो, कि मैं पिता में हूँ; और पिता मुझ में है; पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।’ नये नियम में विश्वासियों को विशेष रूप से परमेश्वर का मन्दिर होने के नाते ही एक से अधिक बार पवित्र कहा गया है: ‘परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो।’ ‘तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है।’ ‘सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है।’ यह—और इसे हम आगे चलकर और भली भाँति समझना सीखेंगे—ठीक इसी कारण है कि आत्मा ही के द्वारा हृदय भीतर वास के लिये तैयार किया जाता है, और भीतर वास पूरा किया और बनाए रखा जाता है, कि आत्मा इतनी विशेष रीति से पवित्र का विशेषण धारण करता है। भीतर वास करनेवाला आत्मा ही पवित्र आत्मा है। उसके भीतर वास का, या यों कहें कि भीतर वास करनेवाले मसीह को उसके प्रगट करने का परिमाण ही पवित्रता का परिमाण है।

हम देख चुके हैं कि इस्राएल में परमेश्वर की उपस्थिति के निकट होने की कौन-कौन सी श्रेणियाँ थीं। वे आज भी पाई जाती हैं। कुछ मसीही ऐसे हैं जो छावनी में रहते हैं, परन्तु उस पवित्र जन के निकट आने के विषय में बहुत कम जानते हैं। फिर बाहरी आँगन के मसीही हैं: वे क्षमा और शान्ति के लिये लालायित रहते हैं, वे बार-बार प्रायश्चित की वेदी के पास आते हैं; परन्तु वे सच्ची निकटता या पवित्रता के विषय में, अर्थात् याजक होने के नाते पवित्रस्थान में प्रवेश करने के अपने विशेषाधिकार के विषय में बहुत कम जानते हैं। और कुछ ऐसे हैं जिन्होंने सीख लिया है कि यही उनकी बुलाहट है, और वे निकट आने की लालसा रखते हैं, फिर भी वे उस साहस को कठिनाई से ही समझते हैं जो उन्हें परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने और वहाँ वास करने के लिये मिला है। धन्य हैं वे जिन पर यह, अर्थात् यहोवा के भेद, प्रगट किया गया है। वे जानते हैं कि फटे हुए परदे का क्या अर्थ है, और उस प्रत्यक्ष उपस्थिति में प्रवेश का क्या अर्थ है। उनके हृदय पर से वह परदा उठ गया है: उन्होंने उस पवित्र जन के भीतर वास में, अर्थात् उस परमेश्वर में जो पवित्र है और पवित्र करता है, सच्ची पवित्रता का भेद पा लिया है।

हे विश्वासी! जो परमेश्वर तुम्हें पवित्रता के लिये बुलाता है, वह भीतर वास करनेवाले जीवन का परमेश्वर है। तम्बू उसका चित्र प्रस्तुत करता है, पुत्र उसे प्रगट करता है, आत्मा उसे प्रदान करता है, अनन्त महिमा उसे पूरी रीति से प्रगट करेगी। और तुम उसका अनुभव कर सकते हो। विश्वासी होने के नाते तुम्हारी बुलाहट यही है कि तुम परमेश्वर का पवित्र मन्दिर बनो। ओह, बस अपने आपको उसके पूर्ण भीतर वास के लिये सौंप दो! पवित्रता को पहले-पहल इसमें न खोजो कि तुम क्या हो या क्या करते हो; उसे परमेश्वर में खोजो। उसे परमेश्वर की ओर से मिलनेवाले दान के रूप में भी न खोजो, उसे स्वयं परमेश्वर में, उसकी भीतर वास करनेवाली उपस्थिति में खोजो। पवित्रता से शोभायमान होकर उसको दण्डवत् करो, क्योंकि वह ऊँचे और पवित्र स्थान में वास करता है। और आराधना करते हुए उसकी वाणी सुनो: ‘जो महान और उत्तम और सदैव स्थिर रहता, और जिसका नाम पवित्र है, वह यह कहता है, मैं ऊँचे पर और पवित्रस्थान में निवास करता हूँ, और उसके संग भी रहता हूँ, जो खेदित और नम्र हैं।’ जब आत्मा हमें भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य देकर बलवन्त करता है, यहाँ तक कि विश्वास के द्वारा मसीह हमारे हृदय में बसता है, और पिता आकर उसके साथ हम में अपना वास बनाता है, तभी हम सचमुच पवित्र होते हैं। ओह, आओ, हम बस सच्चे और खरे मन के समर्पण में अपने आपको सौंप दें, कि हम उतनी ही स्पष्ट रीति से, जितना वह तम्बू या मन्दिर था, पूरी तरह परमप्रधान का निवास, उसकी पवित्रता का वासस्थान होने के लिये अर्पित हो जाएँ। परमेश्वर के तेज से भरा हुआ भवन, परमेश्वर की सारी भरपूरी से भरा हुआ हृदय, यही परमेश्वर की प्रतिज्ञा है, यही हमारा भाग है। आओ, हम विश्वास से इस आशीष का दावा करें, इसे ग्रहण करें और दृढ़ता से थामे रहें: मसीह, परमेश्वर का पवित्र जन, अपने पिता के नाम में प्रवेश करेगा और अधिकार कर लेगा। तब विश्वास हमारी सब कठिनाइयों का समाधान, हमारी सब असफलताओं पर विजय, और हमारी सब लालसाओं की पूर्ति ले आएगा: ‘वह तम्बू, अर्थात् हृदय, मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा; और मैं उनके बीच निवास करूँगा।’ सच्ची पवित्रता का खुला भेद, उस आनन्द का भेद जो वर्णन से बाहर है, यही है: विश्वास के द्वारा मसीह का हृदय में बसना।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

हम अपने प्रभु यीशु के पिता के सामने घुटने टेकते हैं, कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार हमें वह दान दे जिसे माँगना उसने स्वयं हमें सिखाया है। हम इससे कम कुछ नहीं माँगते कि विश्वास के द्वारा मसीह हमारे हृदयों में बसे। हम अपने हृदय में प्रभु यीशु के उस परम धन्य, स्थायी और सचेत भीतर वास के लिये लालायित हैं, जिसकी प्रतिज्ञा उसने इतनी स्पष्टता से पवित्र आत्मा के आने के फल के रूप में की थी। हे पिता! हम वही माँगते हैं जो उसका अभिप्राय था जब उसने प्रेम रखनेवाले और आज्ञा माननेवाले चेले के विषय में कहा: ‘मैं आकर अपने आपको उस पर प्रगट करूँगा। हम उसके पास आएँगे, और उसके साथ वास करेंगे।’ ओह, विश्वास के द्वारा हृदय में मसीह का यह भीतर वास हमें दे!

और इसके लिये, हम तुझ से विनती करते हैं, हमें यह दान दे कि हम तेरे आत्मा से भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त हों। हे परमसामर्थी परमेश्वर! तेरी ईश्वरीय सामर्थ्य का आत्मा हमारे भीतर सामर्थ्य के साथ काम करे, और हमारी बुद्धि, और इच्छा, और भावनाओं को नया करे, कि हृदय यीशु के लिये एक मन्दिर के रूप में, एक घर के रूप में, पूरी रीति से तैयार और सुसज्जित हो जाए। वह धन्य आत्मा हमें उस विश्वास के लिये बलवन्त करे जो धन्य उद्धारकर्ता को और उसकी भीतर वास करनेवाली उपस्थिति को ग्रहण करता है।

हे परम अनुग्रहकारी पिता! हमारी दोहाई सुन। हम तेरे सामने घुटने टेकते हैं। हम तेरी महिमा के धन की दुहाई देते हैं। हम तेरी स्तुति करते हैं, क्योंकि तू हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है। हे हमारे पिता, हम तेरी बाट जोहते हैं: ओह, हमें यह दान दे कि आत्मा के द्वारा भीतरी मनुष्यत्व में हम सामर्थ्य के साथ बलवन्त किए जाएँ, ताकि यह परम आनन्द अपनी पूरी धन्यता में हमारा हो, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु का हृदय में वास।

हम यह उसी के नाम में माँगते हैं। आमीन।

1. इस्राएल के बीच परमेश्वर का वास वह महान केन्द्रीय तथ्य था, जिसके लिये पवित्रता से सम्बन्धित सब आज्ञाएँ केवल तैयारी थीं और उसके अधीन थीं। वैसे ही पवित्र आत्मा का काम भी मसीह के व्यक्तिगत भीतर वास में अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है। (यूहन्ना 14:21, 23। इफिसियों 3:16, 17।) इसी को अपना लक्ष्य बनाओ और इसी की आशा रखो।

2. जैसे तम्बू दूसरे आत्मिक सत्यों का चित्र था, वैसे ही अपने तीन भागों के साथ वह मनुष्य के त्रिविध स्वभाव का भी चित्र था। हमारी आत्मा परमपवित्र स्थान है, जहाँ परमेश्वर का वास करना ठहराया गया है, जहाँ पवित्र आत्मा दिया जाता है। प्राण का जीवन, अपनी अनुभव करने, जानने और इच्छा करने की शक्तियों के साथ, पवित्रस्थान है। और देह का बाहरी जीवन, अर्थात् आचरण और कर्म का जीवन, बाहरी आँगन है। इस विश्वास से आरम्भ करो कि आत्मा अन्तरतम पवित्रस्थान में वास करता है, जहाँ उसके काम गुप्त और छिपे हुए हैं। उस पर भरोसा रखकर कि वह काम करेगा, और परमेश्वर के सामने मौन आराधना में अपने आपको उसके अधीन करके, उसका आदर करो। भीतर से वह विचार और इच्छा पर अधिकार कर लेगा; वह बाहरी आँगन को, अर्थात् देह को भी, परमेश्वर की पवित्रता से भर देगा। ‘शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; तुम्हारी आत्मा, प्राण और देह पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें। तुम्हारा बुलानेवाला विश्वासयोग्य है, और वह ऐसा ही करेगा।’

3. परमेश्वर का वास परदे के भीतर था, अनदेखे में, गुप्त स्थान में। विश्वास इसे जानता था, और पवित्र भय के साथ उसकी सेवा करता था। हमारा विश्वास जानता है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा हमारे भीतरी जीवन के छिपे हुए स्थान में वास करता है। अपना अन्तरतम उसके लिये खोल दो; जब तुम अपने आपको उसके काम के लिये सौंपते हो, तब दीन श्रद्धा के साथ उस पवित्र जन के सामने झुको। पवित्रता भीतर वास करनेवाले की उपस्थिति है।


नौवाँ दिन।

पृष्ठ 1 / 1 · 12 मिनट अध्याय में शेष