मसीह में पवित्र
पवित्रता और आज्ञाकारिता

अध्याय 8 · 15 मिनट का पठन

पवित्रता और आज्ञाकारिता

‘तुम ने देखा है कि मैंने मिस्रियों से क्या-क्या किया; तुम को मानो उकाब पक्षी के पंखों पर चढ़ाकर अपने पास ले आया हूँ। इसलिए अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; और तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’—निर्गमन 19:4-6।

इस्राएल होरेब तक पहुँच गया है। व्यवस्था दी जानेवाली है और वाचा बाँधी जानेवाली है। यहाँ लोगों से कहे गए परमेश्वर के पहले वचन हैं; वह छुटकारे और उसकी आशीष की, अर्थात् अपने साथ संगति की बात करता है: ‘तुम ने देखा है कि मैं तुम को अपने पास ले आया हूँ।’ वह पवित्रता की बात छुटकारे में अपने उद्देश्य के रूप में करता है: ‘तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ और इन दोनों के बीच की कड़ी के रूप में वह आज्ञाकारिता को रखता है: ‘यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, तो तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ परमेश्वर की इच्छा उसकी पवित्रता की अभिव्यक्ति है; जब हम उसकी इच्छा पूरी करते हैं, तब हम उसकी पवित्रता के सम्पर्क में आते हैं। छुटकारे और पवित्रता के बीच की कड़ी आज्ञाकारिता है।

यह हमें उस बात की ओर लौटा ले जाता है जो हमने अदन की वाटिका में देखी थी। परमेश्वर ने सातवें दिन को मनुष्य को पवित्र करने के समय के रूप में पवित्र ठहराया। और इसी उद्देश्य से उसने पहला काम क्या किया? उसने उसे एक आज्ञा दी। उस आज्ञा का पालन उसके लिये द्वार खोल देता, वही परमेश्वर की पवित्रता में प्रवेश का मार्ग ठहरता। पवित्रता एक नैतिक गुण है; और नैतिक वह है जिसे एक स्वतंत्र इच्छा अपने लिये चुनती और निश्चित करती है। जो कुछ परमेश्वर सृजता और देता है, वह केवल स्वभाव से भला होता है; परन्तु जो कुछ मनुष्य परमेश्वर से और उसकी इच्छा से पाना चाहता है, और सचमुच अपना बना लेता है, उसी का नैतिक मूल्य होता है, और वही पवित्रता की ओर ले जाता है। सृष्टि में परमेश्वर ने अपनी बुद्धिमान और भली इच्छा प्रगट की। अपनी पवित्र इच्छा वह अपनी आज्ञाओं में प्रगट करता है। जब वह पवित्र इच्छा मनुष्य की इच्छा में प्रवेश करती है, जब मनुष्य की इच्छा परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करके उसके साथ एक हो जाती है, तब वह पवित्र बन जाता है। सृष्टि के बाद, सातवें दिन, परमेश्वर ने मनुष्य को पवित्र बनाने के लिये उसे अपने पवित्र करने के काम में सम्मिलित कर लिया। आज्ञाकारिता पवित्रता का मार्ग है, क्योंकि वह परमेश्वर की पवित्र इच्छा के साथ एक होने का मार्ग है; पाप में न गिरे हुए मनुष्य के लिये भी और गिरे हुए मनुष्य के लिये भी, यहाँ छुटकारे में और ऊपर महिमा में, सब पवित्र स्वर्गदूतों में, और स्वयं परमेश्वर के पवित्र जन मसीह में, आज्ञाकारिता ही पवित्रता का मार्ग है। वह स्वयं पवित्रता नहीं है; परन्तु जब इच्छा परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करने और उसे पूरा करने के लिये अपने आपको खोल देती है, तब परमेश्वर अपने आपको और अपनी पवित्रता को उसे प्रदान करता है। उसकी वाणी मानने का अर्थ है उसके पीछे उस मार्ग पर चलना जिस पर वह हमें ले चलता है, ताकि वह अपने आपको और उस पवित्र जन के रूप में अपने धन्य स्वभाव को पूरी रीति से प्रगट करे और हमें प्रदान करे।

आज्ञाकारिता। परमेश्वर की इच्छा का ज्ञान नहीं, उससे सहमत होना भी नहीं, उसे पूरा करने की इच्छा रखना भी नहीं, परन्तु उसे पूरा करना। ज्ञान, और सहमति, और इच्छा को कर्म तक पहुँचना ही चाहिए; परमेश्वर की इच्छा पूरी की जानी चाहिए। ‘यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, तो तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ जब परमेश्वर पवित्रता की बात करता है, तब यहाँ वह अपनी प्रजा से पहले-पहल विश्वास, या आराधना, या अंगीकार नहीं माँगता; वह आज्ञाकारिता माँगता है। परमेश्वर की इच्छा जैसे स्वर्ग में, वैसे ही पृथ्वी पर भी पूरी की जानी चाहिए। ‘तुम यहोवा की सब आज्ञाओं को स्मरण करके उनका पालन करो, और अपने परमेश्वर के लिये पवित्र बनो’ (गिनती 15:40)। ‘इसलिए तुम अपने आपको पवित्र करो; और पवित्र बने रहो; और तुम मेरी विधियों को मानना, और उनका पालन भी करना; क्योंकि मैं तुम्हारा पवित्र करनेवाला यहोवा हूँ’ (लैव्यव्यवस्था 20:7, 8)। ‘इसलिए तुम मेरी आज्ञाओं को मानना और उनका पालन करना; मैं यहोवा हूँ; मैं इस्राएलियों के बीच अवश्य ही पवित्र माना जाऊँगा; मैं तुम्हारा पवित्र करनेवाला यहोवा हूँ, जो तुम को मिस्र देश से निकाल लाया है’ (22:31-33)।

क्षण भर का विचार इसका कारण हम पर स्पष्ट कर देगा। मनुष्य अपने काम ही में प्रगट करता है कि वह क्या है। हो सकता है कि मैं जानूँ कि भला क्या है, और फिर भी उससे सहमत न होऊँ। हो सकता है कि मैं उससे सहमत होऊँ, और फिर भी उसे करना न चाहूँ। हो सकता है कि मैं किसी अर्थ में उसे चाहूँ भी, और फिर भी मुझमें वह उत्साह, या वह आत्म-त्याग, या वह सामर्थ्य न हो जो उठकर उस काम को कर डाले। सोचना चाहने से सहज है, और चाहना करने से सहज है। केवल कर्म ही यह प्रमाणित करता है कि जिस बात में मेरी रुचि है, उसने मुझ पर पूरा अधिकार पा लिया है या नहीं। परमेश्वर चाहता है कि उसकी इच्छा पूरी की जाए। केवल यही आज्ञाकारिता है। केवल इसी में यह दिखाई देता है कि सारे हृदय ने अपनी सारी शक्ति और इच्छा के साथ अपने आपको परमेश्वर की इच्छा को सौंप दिया है या नहीं; कि हम उसे जीते हैं या नहीं, और किसी भी त्याग के मूल्य पर उसे पूरा करके अपना बनाने को तैयार हैं या नहीं। हमें पवित्र बनाने के लिये परमेश्वर के पास और कोई मार्ग नहीं है। ‘तुम मेरी विधियों को मानना, और उनका पालन भी करना; क्योंकि मैं तुम्हारा पवित्र करनेवाला यहोवा हूँ।’

पवित्रता के सब खोजियों के लिये यह गहरे महत्त्व का पाठ है। आज्ञाकारिता पवित्रता नहीं है; पवित्रता इससे कहीं ऊँची वस्तु है, कुछ ऐसा जो परमेश्वर की ओर से हमारे पास आता है, वरन् यों कहें कि परमेश्वर का कुछ अंश जो हमारे भीतर आता है। परन्तु पवित्रता के लिये आज्ञाकारिता अनिवार्य है: उसके बिना पवित्रता हो ही नहीं सकती। इसलिए जब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचन की शिक्षा के पीछे चलना चाहता है, और विश्वास से उस पर दृष्टि करता है जो परमेश्वर कर चुका है, क्योंकि उसने तुम्हें मसीह में पवित्र ठहराया है, और उस पर भी जो परमेश्वर अभी पवित्रता के आत्मा के द्वारा करने को है, जब वह इस प्रतिज्ञा को पूरा करता है, ‘शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे,’ तब एक क्षण के लिये भी आज्ञाकारी रहना न भूलना। ‘यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, तो तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ जो कुछ करना उचित जान पड़े, उसे तुरन्त करने से आरम्भ करो। जिस किसी बात के विषय में तुम्हारा विवेक कहता है कि तुम यह कहने का साहस नहीं कर सकते कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है, उसे तुरन्त छोड़ दो। केवल ज्योति और सामर्थ्य के लिये प्रार्थना ही न करो, परन्तु काम भी करो; जो परमेश्वर कहता है, वही करो। यीशु कहता है, ‘जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई है।’ परमेश्वर का हर एक पुत्र परमेश्वर की इच्छा से उत्पन्न हुआ है: उसी में उसका जीवन है। पिता की इच्छा पूरी करना परमेश्वर के हर एक पुत्र का भोजन, उसका बल, और उसकी पहचान है।

मसीही बनने में जो बात निहित है, वह ऐसे सरल और सम्पूर्ण आज्ञाकारिता के जीवन के प्रति समर्पण से कम कुछ नहीं है। पर हाय! बहुत से मसीही ऐसे हैं जिन्होंने, या तो उचित शिक्षा के अभाव से, या परमेश्वर के वचन की शिक्षा पर उचित ध्यान न देने से, कभी यह नहीं समझा कि मसीही जीवन में आज्ञाकारिता का स्थान कितना सर्वोपरि महत्त्व का है। वे नहीं जानते कि मसीह, और छुटकारा, और विश्वास, सब उसी की ओर ले जाते हैं, क्योंकि केवल उसी के द्वारा परमेश्वर के प्रेम, और उसकी समानता, और उसकी महिमा की संगति का मार्ग है। सम्भव है कि हम सबने स्वयं इससे हानि उठाई हो: पूर्ण शान्ति और विश्वास के विश्राम के लिये, मसीही जीवन के स्थायी आनन्द और बढ़ती हुई सामर्थ्य के लिये हमारी प्रार्थनाओं और प्रयत्नों में कोई गुप्त बात रही है जो आशीष को रोकती रही, या जो कुछ हाथ लगा था उसे शीघ्र ही खो देने का कारण बनती रही। सम्भवतः इसका कारण आज्ञाकारिता की पूर्ण अनिवार्यता के विषय में एक भ्रान्त धारणा थी। इस बात पर कितना भी बल दिया जाए, कम है कि हमारे मन-फिराव से लेकर आगे तक अनुग्रह की सेंतमेंत उदारता और उसकी महान सामर्थ्य का यही उद्देश्य है: हमें फिर से उस सक्रिय आज्ञाकारिता तक, और परमेश्वर की इच्छा के साथ उस मेल तक पहुँचाना, जिससे हम अदन की वाटिका में पहले पाप के द्वारा गिर गए थे। आज्ञाकारिता परमेश्वर और उसकी पवित्रता तक ले जाती है। आज्ञाकारिता ही में इच्छा ढाली जाती है, और चरित्र गढ़ा जाता है, और एक ऐसा भीतरी मनुष्यत्व बनता है जिसे परमेश्वर पवित्रता की शोभा से पहिना और सँवार सकता है।

जब कोई मसीही यह जान लेता है कि यही वह खोई हुई कड़ी थी, यही उसकी असफलता और अन्धकार का कारण था, तब उसके लिये इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं कि वह समर्पण के एक महान कार्य में, जान-बूझकर आज्ञाकारिता को, हर बात में और पूरे मन से की जानेवाली आज्ञाकारिता को, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में अपने जीवन का नियम चुन ले। परमेश्वर के जिस सन्देश पर हम विचार कर रहे हैं, उसके उत्तर में सीनै पर्वत पर इस्राएल ने जो वचन कहे थे, उन्हें अपना बनाने से वह न डरे: ‘जो कुछ यहोवा ने कहा है वह सब हम नित करेंगे;’ ‘जो कुछ यहोवा ने कहा है उस सब को हम करेंगे, और उसकी आज्ञा मानेंगे।’ जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उसको परमेश्वर ने अपने पुत्र और अपने आत्मा के दान के द्वारा किया है। सीनै पर पत्थर की पटियों पर दी गई व्यवस्था के बाद अब आत्मा के द्वारा हृदय की पटिया पर व्यवस्था दी गई है: पवित्र आत्मा आज्ञाकारिता की सामर्थ्य है, और इसी कारण वह पवित्रता का आत्मा है, जो आज्ञाकारिता में हमारे हृदयों को उस पवित्र जन का निवास-स्थान बनने के लिये तैयार करता है। आओ, हम इसी विश्वास में अपने आपको आज्ञाकारिता के जीवन के लिये सौंप दें: यही उस प्रतिज्ञा के पूरे होने का नये नियम का मार्ग है: ‘यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, तो तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’

हम देख चुके हैं कि पवित्रता अपने स्वभाव ही से परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध को, अर्थात् उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति को, मानकर चलती है। ‘मैं तुम को अपने पास ले आया हूँ; यदि तुम मेरी मानोगे, तो तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ जब हम इस व्यक्तिगत तत्त्व को समझते और दृढ़ता से थामे रहते हैं, तभी आज्ञाकारिता सम्भव होगी, और पवित्रता तक ले जाएगी। परमेश्वर के वचनों पर भली भाँति ध्यान दो: ‘यदि तुम निश्चय मेरी वाणी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे।’ वाणी किसी व्यवस्था या पुस्तक से बढ़कर है; उसका अर्थ सदा एक जीवित व्यक्ति और उसके साथ बातचीत होता है। सुसमाचार की आज्ञाकारिता का भेद यही है: यीशु को एक व्यक्तिगत मित्र, एक जीवित उद्धारकर्ता जानकर उसकी वाणी सुनना और उसकी अगुवाई में चलना। परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलना, और उसे अपने भीतर पिता की उपस्थिति, और इच्छा, और प्रेम को प्रगट करने देना, यही हम में वह व्यक्तिगत सम्बन्ध उत्पन्न करेगा जिसकी चर्चा नया नियम तब करता है जब वह सब कुछ प्रभु के लिये करने की, और परमेश्वर को प्रसन्न करने की बात करता है।

ऐसी आज्ञाकारिता ही पवित्रता का मार्ग है। उसका हर एक कार्य जीवित परमेश्वर से जोड़नेवाली एक कड़ी है, परमेश्वर की इच्छा के लिये अपने अस्तित्व का समर्पण है, ताकि परमेश्वर स्वयं उस पर अधिकार कर ले। आत्मसात् होने की उस धीमी परन्तु निश्चित प्रक्रिया में, जिसके द्वारा परमेश्वर की इच्छा हमारे प्राणों का भोजन बनकर हमारे अन्तरतम में ग्रहण की जाती है, हमारा आत्मिक स्वभाव बलवन्त होता है, और अधिक आत्मिक होता जाता है, और बढ़कर एक पवित्र मन्दिर बनता जाता है, जिसमें परमेश्वर अपने आपको प्रगट कर सके और अपना निवास बना सके।

हर एक विश्वासी इसे समझने का यत्न करे। जब परमेश्वर ने सातवें दिन को पवित्र करने के अपने समय के रूप में पवित्र ठहराया, तब उसने हमें सिखाया कि वह यह काम एकाएक नहीं कर सकता था। पवित्रता का प्रकाशन और दान धीरे-धीरे ही होना चाहिए, जैसे-जैसे मनुष्य उसे ग्रहण करने के लिये तैयार किया जाता है। हम में से हर एक के साथ, जैसे सारी मानव-जाति के साथ, परमेश्वर के पवित्र करने के काम को समय चाहिए। जिस समय की उसे आवश्यकता है और जिसे वह खोजता है, वह प्रतिदिन, प्रति घड़ी की आज्ञाकारिता का जीवन है। जो कुछ अपनी ही इच्छा पर चलने में बिताया जाता है, और प्रभु के साथ जीवित सम्बन्ध में नहीं, वह सब खो जाता है। परन्तु जब हृदय दिन-प्रतिदिन उस वाणी पर कान लगाने और उसे मानने का यत्न करता है, तब वह पवित्र जन आप ही अपने वचनों को पूरा करने के लिये जागृत रहता है: ‘तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ ऐसी रीति से, जिसकी प्राण पहले से बहुत कम कल्पना कर सकता है, परमेश्वर आज्ञाकारी हृदय पर छाया करेगा और उसमें अपना निवास बनाएगा। सदा उस वाणी को सुनने की बाट जोहने और उसे मानने की आदत केवल मन्दिर का निर्माण होगी: स्वयं जीवित परमेश्वर, वह पवित्र जन, उसमें अपना निवास बनाने आएगा। यहोवा का तेज भवन में भर जाएगा, और यह प्रतिज्ञा सच ठहरेगी, ‘वह मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा।’

‘मैं तुम को अपने पास ले आया हूँ; यदि तुम निश्चय मेरी वाणी मानोगे, तो तुम मेरी दृष्टि में पवित्र जाति ठहरोगे।’ हे पवित्रता के खोजियो! परमेश्वर तुम्हें अपने पास ले आया है। और अब उसकी वाणी अपने हृदय के सब विचार तुम से कहती है, ताकि जब तुम उन्हें ग्रहण करो, और अपना बना लो, और उसकी इच्छा को जीकर और पूरी करके अपनी इच्छा बना लो, तब तुम उसके साथ सबसे पूर्ण एकता में, अर्थात् जीवन की ही नहीं, इच्छा की भी एकता में प्रवेश करो, और इस प्रकार उसके लिये एक पवित्र प्रजा बन जाओ। आज्ञाकारिता, अर्थात् परमेश्वर की इच्छा को सुनना और पूरा करना, तुम्हारे जीवन का आनन्द और महिमा हो; वह तुम्हें परमेश्वर की पवित्रता तक पहुँच देगी।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

हे मेरे परमेश्वर! तूने मुझे अपने लिये छुड़ाया है, ताकि तू मुझे पूरी रीति से अपना बना ले, मेरे अन्तरतम पर अधिकार करके उसे अपनी ही समानता से, अपनी सिद्ध इच्छा से, और अपनी पवित्रता की महिमा से भर दे। और तू मुझे यह सिखाना चाहता है कि मैं एक स्वतंत्र और प्रेम भरी इच्छा की सामर्थ्य में तेरी इच्छा को लेकर उसे अपनी बना लूँ, ताकि मेरे अस्तित्व के ठीक केन्द्र में तेरी ही सिद्धता मुझमें वास करे। और तू अपने वचनों में अपनी इच्छा प्रगट करता है, ताकि जब मैं उन्हें ग्रहण करूँ और उनका पालन करूँ, तब उनके ईश्वरीय सार को पूरी रीति से अपना बना लूँ, और वही सब चाहूँ जो तू चाहता है।

हे मेरे परमेश्वर! मुझे दिन-प्रतिदिन तेरे साथ ऐसी संगति में जीने दे कि मैं सचमुच हर बात में तेरी वाणी सुनूँ, जीवित परमेश्वर की वह जीवित वाणी जो मुझसे बोलती है। पवित्र आत्मा, जो तेरी पवित्रता का आत्मा है, मेरे लिये तेरी वह वाणी हो जो सरल, बालक के समान आज्ञाकारिता के मार्ग में मेरी अगुवाई करे। मैं तुझे धन्य कहता हूँ कि मैंने यह देखा है कि मसीह, जिसमें मैं पवित्र हूँ, आज्ञाकारी था; कि उसने आज्ञाकारिता में अपने आपको पवित्र किया ताकि वह मेरी पवित्रता ठहरे; और कि उसमें, अर्थात् तेरे आज्ञाकारी, पवित्र सेवक में बने रहना, तेरी उस इच्छा में बने रहना है जो एक बार उसके द्वारा पूरी हुई, और अब मेरे द्वारा पूरी होनी है। हे मेरे परमेश्वर! मैं सचमुच तेरी इच्छा मानूँगा: तू मुझे अपनी पवित्र जाति का एक जन, और सब लोगों में से अपना निज धन बना। आमीन।

1. ‘वह यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु भी सह ली।’ ‘पुत्र होने पर भी, उसने दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी।’ ‘मैं आ गया हूँ, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूँ।’ ‘उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं।’ मसीह का उदाहरण हमें सिखाता है कि आज्ञाकारिता ही परमेश्वर की पवित्रता या महिमा तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है। तुम्हारा अर्पण यही हो: हर बात में परमेश्वर की इच्छा को खोजने और पूरी करने के लिये अपने आपको सौंप देना।

2. हम ‘मसीह में पवित्र’ हैं—उसी मसीह में जिसने परमेश्वर की इच्छा पूरी की और मृत्यु तक आज्ञाकारी रहा। हम उसी में हैं; उसी में हम पवित्र हैं। उसकी आज्ञाकारिता वह भूमि है जिसमें हम रोपे गए हैं, और जिसमें हमें जड़ पकड़नी है। ‘मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजनेवाले की इच्छा के अनुसार चलूँ;’ आज्ञाकारिता उसके जीवन का आहार थी; परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में वह ईश्वरीय पोषण पाता था; हमारे साथ भी ऐसा ही होना चाहिए।

3. जब तुम यह सीखते हो कि मसीह में होना और बने रहना क्या है, जब तुम आनन्द करते हो कि तुम उसमें हो, तब सदा स्मरण रखो कि परमेश्वर ने तुम्हें उसी मसीह में रोपा है जिसने आज्ञा मानी।

4. यदि कभी तुम पवित्रता के विषय में उलझन में पड़ो, तो बस फिर से अपने आपको परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिये सौंप दो, और जाकर उसे पूरा करो। आज्ञा मानना हमारा काम है, पवित्र करना परमेश्वर का।

5. मसीह में पवित्र। मसीह ने आज्ञाकारिता के द्वारा, अर्थात् परमेश्वर की इच्छा पूरी करके, अपने आपको पवित्र किया, और उसी इच्छा में, जैसी वह उसके द्वारा पूरी हुई, हम पवित्र किए गए हैं। उस इच्छा को, जैसी वह उसके द्वारा पूरी हुई, ग्रहण करने में, अर्थात् स्वयं उसे ग्रहण करने में, मैं पवित्र हूँ। परमेश्वर की उस इच्छा को, जैसी वह मेरे द्वारा पूरी होनी है, ग्रहण करने में, मैं पवित्र बनता हूँ। मैं उसमें हूँ; जीवित आज्ञाकारिता के हर एक कार्य में मैं उसके साथ जीवित संगति में प्रवेश करता हूँ, और उसके जीवन की सामर्थ्य को अपने जीवन में खींच लेता हूँ।

6. आज्ञाकारिता उस वाणी को सुनने पर निर्भर है। यह न समझ बैठो कि तुम परमेश्वर की इच्छा जानते हो। प्रार्थना करो, और आत्मा की भीतरी शिक्षा की बाट जोहो।


आठवाँ दिन।


अध्याय 8 पूरा हुआ

पवित्रता और आज्ञाकारिता

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