मसीह में पवित्र
पवित्रता और मनन

अध्याय 10 · 12 मिनट का पठन

पवित्रता और मनन

‘फिर शुद्ध सोने का एक टीका बनवाना, और जैसे छापे में वैसे ही उसमें ये अक्षर खोदे जाएँ, अर्थात् यहोवा के लिये पवित्र। और वह हारून के माथे पर रहे, इसलिए कि इस्राएली जो कुछ पवित्र ठहराएँ, अर्थात् जितनी पवित्र वस्तुएँ भेंट में चढ़ावे उन पवित्र वस्तुओं का दोष हारून उठाए रहे, और वह नित्य उसके माथे पर रहे, जिससे यहोवा उनसे प्रसन्न रहे।’—निर्गमन 28:36, 38।

परमेश्वर का भवन उसकी पवित्रता का निवास-स्थान होना था, वह स्थान जहाँ वह अपने आपको प्रकट करनेवाला था; उस पवित्र के रूप में, जिसके पास भय और थरथराहट के बिना नहीं जाया जा सकता; और पवित्र करनेवाले के रूप में, जो उन सब को अपनी ओर खींचता है जो उसकी पवित्रता के सहभागी बनाए जाना चाहें। उसकी पवित्र और पवित्र करनेवाली उपस्थिति के इस प्रकाशन का केन्द्र महायाजक के व्यक्तित्व में पाया जाता है, जिसकी दोहरी भूमिका थी: मनुष्य के सामने परमेश्वर का प्रतिनिधि होना, और परमेश्वर के सामने मनुष्य का प्रतिनिधि होना। जहाँ तक प्रतीक और छाया की व्यवस्था उसे प्रस्तुत और व्यक्त कर सकती थी, वह मानव रूप में ईश्वरीय पवित्रता का, और ईश्वरीय दान के रूप में मानवीय पवित्रता का साकार रूप था। उसमें होकर परमेश्वर लोगों को पवित्र करने और आशीष देने के लिये निकट आया। उसमें होकर लोग परमेश्वर के सबसे निकट पहुँचे। तौभी प्रायश्चित का वह दिन ही, जिसमें वह परमपवित्र स्थान में प्रवेश कर सकता था, केवल इस बात का प्रमाण था कि मनुष्य कितना अपवित्र है, और परमेश्वर की उपस्थिति में बने रहने के लिये कितना अयोग्य। अपने आप में इस्राएल की अपवित्रता का प्रमाण होते हुए भी, वह आनेवाले उद्धारकर्ता, हमारे धन्य प्रभु यीशु का प्रतिरूप और चित्र था, उस मार्ग का एक अद्भुत प्रदर्शन, जिसके द्वारा आगे चलकर परमेश्वर की पवित्रता उसके लोगों का भाग बननेवाली थी।

महायाजक जिन अनेक बातों में हमारी पवित्रता के रूप में मसीह का प्रतिरूप था, उनमें शायद कोई भी बात उस पवित्र मुकुट से अधिक अर्थपूर्ण या सुन्दर नहीं है, जिसे वह अपने माथे पर पहनता था। उससे जुड़ी हर बात पवित्र होनी थी। उसके वस्त्र पवित्र वस्त्र थे। पर एक बात ऐसी होनी थी जिसमें यह पवित्रता अपनी पूर्णतम अभिव्यक्ति तक पहुँचे। उसे अपने माथे पर सदा सोने का एक टीका पहनना था, जिस पर ये शब्द खुदे थे, यहोवा के लिये पवित्र। हर कोई वहाँ पढ़ सकता था कि उसके अस्तित्व का सारा उद्देश्य, वह एक बात जिसके लिये वह जीता था, यही थी कि वह ईश्वरीय पवित्रता का साकार रूप और वाहक हो, अर्थात् वह चुना हुआ जन, जिसके द्वारा परमेश्वर की पवित्रता लोगों पर आशीष बनकर उमड़ सके।

पवित्र मुकुट की आशीष जिस रीति से काम करती थी, वह अत्यन्त अद्भुत थी। अपने माथे पर यहोवा के लिये पवित्र धारण करने का उद्देश्य, जैसा हम पढ़ते हैं, यह था कि ‘इस्राएली जो कुछ पवित्र ठहराएँ उन पवित्र वस्तुओं का दोष हारून उठाए रहे, जिससे यहोवा उनसे प्रसन्न रहे।’ हर पाप के लिये कोई न कोई बलिदान या प्रायश्चित का उपाय ठहराया गया था। पर उस पाप का क्या, जो स्वयं बलिदान और धार्मिक सेवा से ही लिपटा रहता है? ‘तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है।’ आराधक इस बोध से कितनी पीड़ा के साथ दब सकता था कि उसका पश्चाताप, उसका विश्वास, उसका प्रेम, उसकी आज्ञाकारिता, उसका अर्पण, सब अधूरे और दूषित हैं! आराधक की इस आवश्यकता के लिये भी परमेश्वर ने प्रबन्ध कर रखा था। महायाजक की पवित्रता उसकी पवित्र वस्तुओं के पाप और अपवित्रता को ढाँप देती थी। पवित्र मुकुट परमेश्वर की ओर से इस बात की प्रतिज्ञा था कि महायाजक की पवित्रता आराधक को ग्रहणयोग्य ठहराती है। यदि वह स्वयं अपवित्र था, तो उसके भाइयों में एक ऐसा था जो पवित्र था, जिसके पास ऐसी पवित्रता थी जो उसके लिये भी काम आ सकती थी, एक ऐसी पवित्रता जिस पर वह भरोसा रख सकता था। वह महायाजक की ओर न केवल इसलिए देख सकता था कि वह अपने लहू छिड़कने के द्वारा प्रायश्चित करे, बल्कि इसलिए भी कि वह अपने व्यक्तित्व में एक ऐसी पवित्रता भी उपलब्ध कराए जो उसे और उसकी भेंटों को पूर्ण रूप से ग्रहणयोग्य बना दे। अपनी निजी अपवित्रता के बोध में वह एक मध्यस्थ में आनन्दित हो सकता था, अपने से भिन्न किसी दूसरे की पवित्रता में, उस याजक में जिसे परमेश्वर ने ठहराया था।

क्या यहाँ हमारे लिये एक अति बहुमूल्य पाठ नहीं है, जो पवित्रता के मार्ग में हमें एक कदम और आगे ले जाता है? हमारे इस प्रश्न का कि परमेश्वर पवित्र कैसे करता है, हमें ईश्वरीय उत्तर मिलता है: एक ऐसे मनुष्य के द्वारा, जिसे ईश्वरीय पवित्रता ने अपने ठहरने के लिये चुन लिया है, और जिसकी पवित्रता हमारी है, क्योंकि हम उसके भाई हैं, उसी की देह के अंग हैं। एक ऐसी पवित्रता के द्वारा, जो इतनी प्रभावशाली है कि हमारी पवित्र वस्तुओं के पाप तक मिट जाते हैं, और हम इस निश्चय के साथ उस पवित्र उपस्थिति में प्रवेश कर सकते हैं कि हम पूरी रीति से उसे भाते हैं।


और क्या ठीक यही वह पाठ नहीं जिसकी पवित्रता के बहुत से सच्चे खोजियों को आवश्यकता है? वचन धन्य प्रायश्चित के विषय में, और उसके द्वारा मिली पूरी क्षमा के विषय में जो कुछ सिखाता है, वह सब वे जानते हैं। वे पिता के अद्भुत प्रेम पर, और जो कुछ वह उनके लिये करने को तैयार है उस पर विश्वास करते हैं। तौभी जब वे उस बालक-सी सरलता, विश्वास के उस निश्चय, उस प्रेम-भरी आज्ञाकारिता और उस धन्य समर्पण के विषय में सुनते हैं, जिसके साथ पिता उनसे आकर आशीष पाने की आशा रखता है, तो उनका हृदय भय के मारे बैठ जाता है। ऐसा लगता है मानो आशीष उनकी पहुँच से बिलकुल बाहर हो। इससे क्या लाभ कि कहा जाता है, वह पवित्र इतना निकट आता है? उनकी अपवित्रता उन्हें उस उपस्थिति पर दावा करने या उसे थामने के अयोग्य बना देती है, जो स्वयं को उन्हें दे रही है। तनिक देखो कि यहाँ वह पवित्र किस प्रकार पवित्र करने की अपनी रीति प्रकट करता है, और अपनी पवित्रता की संगति के लिये तैयार करता है। मध्यस्थ के रूप में उसके चुने हुए जन में पवित्रता तैयार करके इतनी संचित कर दी गई है कि वह उन सब के लिये पर्याप्त है जो उसके द्वारा आते हैं। जब मैं प्रार्थना या आराधना के लिये झुकता हूँ, और अनुभव करता हूँ कि उस दीनता, उस उत्साह और उस विश्वास में, जिसकी माँग करने का परमेश्वर को अधिकार है, अभी कितनी कमी है, तब मैं उस महायाजक की पवित्रता की ओर, उसके माथे के पवित्र मुकुट की ओर आँख उठाकर देख सकता हूँ, और विश्वास कर सकता हूँ कि मेरी पवित्र वस्तुओं का दोष उठा लिया गया और दूर कर दिया गया है। अपनी सारी कमी और अयोग्यता के रहते हुए भी मैं पूरे निश्चय के साथ जान सकता हूँ कि मेरी प्रार्थना ग्रहणयोग्य है, एक सुखदायक सुगन्ध है। मैं उस पवित्र की ओर आँख उठाकर देख सकता हूँ कि वह अपने अभिषिक्त के कारण मुझ पर मुस्कुरा रहा है। ‘पवित्र मुकुट नित्य उसके माथे पर रहे, जिससे यहोवा उनसे प्रसन्न रहे।’ यह स्थानापन्नता का धन्य सत्य है—एक सब के लिये—मध्यस्थ-पद का सत्य; हमें पवित्र करने की परमेश्वर की रीति। आराधना करनेवाले इस्राएली का बलिदान किसी दूसरे की पवित्रता के बल पर पवित्र और ग्रहणयोग्य है।

पुराने नियम की छाया नये नियम की उस वास्तविकता को, जो अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है, कभी पूरी रीति से प्रस्तुत नहीं कर सकती। जैसे-जैसे हम अपने अध्ययन में आगे बढ़ेंगे, हम पाएँगे कि यीशु की पवित्रता, जो हमारी पवित्रता ठहरा है, हमारे नाम केवल गिनी ही नहीं जाती, बल्कि हमें दी भी जाती है, क्योंकि हम उसमें हैं; जो नया मनुष्यत्व हमने पहन लिया है, वह सच्ची पवित्रता में सृजा गया है। हम केवल पवित्र गिने ही नहीं जाते; हम पवित्र हैं, हमने मसीह यीशु में एक नया पवित्र स्वभाव पाया है। ‘पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही मूल से हैं, इसी कारण वह उन्हें भाई कहने से नहीं लजाता।’ यीशु, परमेश्वर के पवित्र जन, के साथ हमारा जीवित मेल ही है जिसने हमें नया और पवित्र स्वभाव दिया है, और उसके साथ यीशु में जो भी पवित्रता है उस सब पर अधिकार और उसमें भाग भी। इसलिए जब-जब हमें बोध होता है कि हम कितने अपवित्र हैं, तो हमें केवल यीशु की पवित्रता की ओट में आना है, ताकि हम इस पूरे निश्चय का आनन्द लें कि हम और हमारी भेंटें पूर्ण रूप से ग्रहणयोग्य हैं। हमारे विश्वास की निर्बलता कितनी ही बड़ी क्यों न हो, परमेश्वर की महिमा के लिये हमारी लालसा में कितनी ही कमी क्यों न हो, हमारे प्रेम या उत्साह में कितनी ही घटी क्यों न हो, जब हम यीशु को अपने माथे पर यहोवा के लिये पवित्र धारण किए हुए देखते हैं, तो हम पूर्ण स्वीकृति और सिद्ध ग्रहणयोग्यता की ईश्वरीय मुस्कान पाने के लिये अपना मुख ऊपर उठाते हैं।

यही पवित्र करने की परमेश्वर की रीति है। जैसा हम देख चुके हैं, न केवल पवित्र स्थान के विषय में, बल्कि पवित्र व्यक्तियों के विषय में भी वह एक केन्द्र से आरम्भ करता है, और वहाँ से निरन्तर फैलते हुए घेरे में पवित्र करता जाता है। और हम निश्चित हो सकते हैं कि यह ईश्वरीय रीति सफलता का मुकुट पाएगी। वचन में हमें इस बात का एक अत्यन्त अद्भुत उदाहरण मिलता है कि यह कहाँ तक पूरी होगी। पवित्र मुकुट के शब्द हमें पुराने नियम के अन्त में एक बार फिर मिलते हैं। यहोवा के दिन में, ‘घोड़ों की घंटियों पर भी यह लिखा रहेगा, यहोवा के लिये पवित्र।’ तब महायाजक का आदर्श-वाक्य दैनिक जीवन का मूल-मन्त्र बन चुका होगा; सुन्दरता या सेवा की हर वस्तु भी पवित्र होगी; सिर से चलकर यह वस्त्रों की छोर तक फैल चुकी होगी। आओ, हम यीशु की पवित्रता को, हमारी पवित्र वस्तुओं के दोष को ढाँपने की उसकी सामर्थ्य में, पहचानने से आरम्भ करें; आओ, हम उसे परखकर देखें, और अपनी अयोग्यता को अब और हमें पीछे रोकने या सन्देह में डालने न दें; आओ, हम विश्वास करें कि हम और हमारी पवित्र वस्तुएँ ग्रहणयोग्य हैं, क्योंकि मसीह में वे यहोवा के लिये पवित्र हैं; आओ, हम ग्रहणयोग्य होने के इसी बोध में जीएँ, और उस पवित्र की संगति में प्रवेश करें। जैसे-जैसे हम यीशु की पवित्रता में प्रवेश करते और उसमें बने रहते हैं, वह हम में प्रवेश करेगी और हम में बनी रहेगी। वह हम पर अधिकार कर लेगी और अपनी विजयी सामर्थ्य को हमारे सारे जीवन में फैला देगी, यहाँ तक कि हमारे साथ भी, जो कुछ हमारा है उस सब पर यह वचन चमकेगा, यहोवा के लिये पवित्र। और हम फिर पाएँगे कि परमेश्वर का पवित्रता का मार्ग सदा एक केन्द्र से, यहाँ हमारे नये किए गए स्वभाव के केन्द्र से, हमारे अस्तित्व की पूरी परिधि तक जाता है, ताकि उसकी पवित्रता अपनी सामर्थ्य प्रमाणित करे। बस हम यीशु की पवित्रता की ओट में वास करते रहें; जब वह हमारी पवित्र वस्तुओं के दोष को दूर करता है, तो वह हमें और हमारे जीवन को यहोवा के लिये पवित्र बना देगा।

पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।

हे मेरे परमेश्वर और पिता! मेरा प्राण तेरी रीति और तेरे अनुग्रह के इस अद्भुत प्रकाशन के लिये तुझे धन्य कहता है, जो तू उनके प्रति रखता है जिन्हें तूने यह कहकर बुलाया है, ‘मसीह में पवित्र।’ हे प्रभु, तू जानता है कि हमारे हृदयों ने कितनी निरन्तरता से तेरे सामने अपनी ग्रहणयोग्यता को अपनी उपलब्धियों से नापकर सीमित कर दिया है, और अपनी कमी के बोध ने हम में दोषी ठहराए जाने की भावना उत्पन्न की है। हम बहुत कम जानते थे कि उसकी पवित्रता में, जो हमें पवित्र करता है, हमारे अधर्म को ढाँपने और हमें पूर्ण ग्रहणयोग्यता का निश्चय देने की कैसी ईश्वरीय, असीम सामर्थ्य है। हे धन्य पिता! हमारी आँखें खोल कि हम देखें, और हमारे हृदय खोल कि हम समझें, हमारे धन्य यीशु के इस पवित्र मुकुट को, और उस पर लिखे उस अद्भुत और परम धन्य वचन को, यहोवा के लिये पवित्र।

और जब हमारे हृदय हमें दोषी ठहराते हैं, क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ इतनी कम सचेत रूप से परमेश्वर की इच्छा या महिमा के अनुसार, या सचमुच यीशु के नाम में होती हैं, तब हे परम पवित्र पिता, अपने आत्मा के द्वारा हमें दिखाने की कृपा कर कि तेरे पास हमारे लिये अब भी कैसी उज्ज्वल मुस्कान और कैसा हार्दिक स्वागत है। हमें सिखा कि हम अपने महायाजक की पवित्रता में होकर आएँ, और तेरी पवित्रता में प्रवेश करें, जब तक कि वह हम पर अधिकार न कर ले, और हमारे सारे अस्तित्व में व्याप्त न हो जाए, और जो कुछ हम में है वह सब यहोवा के लिये पवित्र न हो जाए। आमीन।

1. पवित्रता कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे मैं अपने आप में देख या सराह सकूँ: वह तो यीशु की पवित्रता में अपने आपको ढाँप लेना, अपने आपको खो देना है। हारून और पवित्र मुकुट में इसका कैसा अद्भुत प्रतिरूप है। और मैं यीशु की पवित्रता को जितना अधिक देखूँगा और समझूँगा, उतना ही कम मैं अपने आप में पवित्रता देखूँगा या खोजूँगा।

2. वह मुझे पवित्र करेगा: मेरी मनोवृत्तियाँ और प्रवृत्तियाँ नई की जाएँगी; मेरा हृदय और मन शुद्ध और पवित्र किए जाएँगे; पवित्रता एक नया स्वभाव बन जाएगी; और तौभी सारे समय यह बोध बना रहेगा, जो दीन भी करता है और आनन्द से भी भर देता है: यह मैं नहीं; मसीह मुझ में जीवित है।

3. आओ, हम परमेश्वर के सामने बहुत दीन और कोमल होकर पड़े रहें, कि पवित्र आत्मा हम पर प्रकट करे कि किसी दूसरे की पवित्रता में, यीशु की पवित्रता में, अर्थात् परमेश्वर की पवित्रता में, पवित्र होने का अर्थ क्या है।

4. इसे बुद्धि से पकड़ने के लिये बहुत अधिक परेशान या थकित मत होओ। बस इस पर विश्वास करो, और सरलता और भरोसे के साथ यीशु की ओर देखो कि वह तुम्हारे लिये सब कुछ ठीक कर दे।

5. मसीह में पवित्र। बालक-से विश्वास में मैं मसीह की पवित्रता को परमेश्वर के सामने अपनी ओट के रूप में फिर से ग्रहण करता हूँ। प्रेम-भरी आज्ञाकारिता में मैं उसे अपनी इच्छा और अपने जीवन में ग्रहण करता हूँ। मैं यीशु पर भरोसा रखता हूँ और उसके पीछे चलता हूँ: यही पवित्रता का मार्ग है।

6. यदि हम उन पाठों को एकत्र करें जो हमने अदन की वाटिका से आगे वचन में पाए हैं, तो हम देखते हैं कि हम में पवित्रता के तत्त्व ये हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर की पवित्रता के किसी विशेष पहलू के अनुरूप है: गहरा विश्राम (अध्याय 3), दीन श्रद्धा (अध्याय 4), पूर्ण समर्पण (अध्याय 5), आनन्द-भरी आराधना (अध्याय 6), सरल आज्ञाकारिता (अध्याय 7)। ये सब ईश्वरीय भीतर वास (अध्याय 8) के लिये तैयार करते हैं, और यह फिर हमें यीशु में बने रहने के द्वारा मिलता है, जिसके सिर पर पवित्रता का मुकुट है।


दसवाँ दिन।

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