अध्याय 7 · 13 मिनट का पठन
पवित्रता और महिमा
‘हे यहोवा, देवताओं में तेरे तुल्य कौन है?
तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी,
और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य, और आश्चर्यकर्मों का कर्ता है।
अपनी करुणा से तूने अपनी छुड़ाई हुई प्रजा की अगुआई की है,
अपने बल से तू उसे अपने पवित्र निवास-स्थान को ले चला है …
वही पवित्रस्थान है जिसे, हे प्रभु, तूने आप ही स्थिर किया है।’
—निर्गमन 15:11-17।
इन वचनों में हम पवित्रता के प्रकाशन में एक और कदम आगे बढ़ते हैं। यहाँ पहली बार पवित्रता स्वयं परमेश्वर के विषय में कही गई है। वह पवित्रता के कारण महाप्रतापी है: और वह अपनी प्रजा को अपने पवित्र निवास-स्थान ही की ओर ले चल रहा है।
पहले हम यहाँ प्रयुक्त अभिव्यक्ति पर ध्यान दें: पवित्रता के कारण महाप्रतापी—अर्थात् पवित्रता में महिमामय। सारे पवित्रशास्त्र में हम परमेश्वर की महिमा और उसकी पवित्रता का एक साथ उल्लेख पाते हैं। निर्गमन 29:43 में हम पढ़ते हैं, ‘और वह तम्बू मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा,’ अर्थात् यहोवा का वही तेज, जिसके विषय में हम बाद में पढ़ते हैं कि वह निवास-स्थान में भर गया। किसी वस्तु की, चाहे वह कोई चीज़ हो या व्यक्ति, महिमा उसका भीतरी मूल्य या उत्कृष्टता है: महिमा देने का अर्थ है हर उस बात को हटा देना जो उस उत्कृष्टता के पूर्ण प्रकाशन में बाधा डाल सकती है। परमेश्वर की पवित्रता में उसकी महिमा छिपी है; परमेश्वर की महिमा में उसकी पवित्रता प्रकट होती है: उसकी महिमा, अर्थात् पवित्र के रूप में उसका अपने आप को प्रकट करना, उस घर को पवित्र करती। इसी प्रकार लैव्यव्यवस्था 10:3 में भी दोनों जुड़े हुए हैं, ‘जो मेरे समीप आए अवश्य है कि वह मुझे पवित्र जाने, और सारी जनता के सामने मेरी महिमा करे।’ याजकों में उसकी पवित्रता का माना जाना लोगों के सामने उसकी महिमा का प्रकट होना ठहरता। इसी प्रकार साराप के गीत में भी (यशायाह 6:3), ‘सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है; सारी पृथ्वी उसके तेज से भरपूर है।’ परमेश्वर वह है जो अगम्य ज्योति में रहता है, जिसे न किसी मनुष्य ने देखा और न कभी देख सकता है: वह हमारे हृदयों में परमेश्वर की महिमा की पहचान की ज्योति देता है। महिमा उस अदृश्य और अगम्य ज्योति का वह अंश है जिसे देखा और जाना जा सकता है: वह ज्योति स्वयं, और वह महिमामय आग जिसकी चमक वह ज्योति है—वही ज्योति परमेश्वर की पवित्रता है। पवित्रता परमेश्वर का कोई एक गुण उतना नहीं, जितना उसकी सारी सिद्धताओं का व्यापक सार है।
लाल समुद्र के तट पर इस्राएल इस प्रकार परमेश्वर की स्तुति करता है: ‘हे यहोवा, तेरे तुल्य कौन है? तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी है।’ वह अतुलनीय है, उसके समान कोई नहीं। और उसने किस बात में यह सिद्ध किया, और अपनी पवित्रता की महिमा प्रकट की? होरेब में मूसा के साथ हमने आग में परमेश्वर की महिमा को उसके दोहरे रूप में देखा था—उद्धार और विनाश: जो शुद्ध न किया जा सके उसे भस्म करना, और जो भस्म न हुआ उसे शुद्ध करना। यहाँ मूसा के गीत में भी हम यही देखते हैं: इस्राएल न्याय और करुणा दोनों का गीत गाता है। आग और बादल का खम्भा मिस्रियों की छावनी और इस्राएल की छावनी के बीच में आ गया: उनके लिये तो वह बादल और अंधकार था, परन्तु इनको उससे रात को प्रकाश मिलता रहा। ये दोनों विचार सारे गीत में चलते हैं। परन्तु पवित्रता के गुणगान के ठीक बाद आनेवाले दो पदों में हमें पूरे गीत का सार मिलता है। ‘तूने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया, और पृथ्वी ने उनको निगल लिया है।’ ‘यहोवा ने बादल और आग के खम्भे में से मिस्रियों की सेना पर दृष्टि करके उन्हें घबरा दिया।’ यह न्याय के रूप में और शत्रु के विनाश के रूप में पवित्रता की महिमा है। ‘अपनी करुणा से तूने अपनी छुड़ाई हुई प्रजा की अगुआई की है, अपने बल से तू उसे अपने पवित्र निवास-स्थान को ले चला है।’ यह करुणा और छुटकारे के रूप में पवित्रता की महिमा है—ऐसी पवित्रता जो केवल छुड़ाती ही नहीं, वरन् पवित्रता के निवास-स्थान तक ले भी चलती है, जहाँ वह पवित्र अपनी प्रजा के साथ और उसके भीतर वास करेगा। विजय की उस घड़ी की प्रेरणा में इतने पहले ही यह प्रकट कर दिया गया कि उस पवित्र के द्वारा पूरे किए गए छुटकारे का महान उद्देश्य और फल उसका भीतर वास होना है: इससे कम किसी बात से न तो वह पवित्र सन्तुष्ट होकर विश्राम कर सकता है, और न उसकी पवित्रता की पूरी महिमा प्रकट हो सकती है।
और अब आगे यह भी देखो कि जैसे परमेश्वर की पवित्रता उसकी प्रजा के छुटकारे में प्रकट होती है, वैसे ही परमेश्वर का पवित्र कहकर व्यक्तिगत गुणगान भी छुटकारे के गीत में ही मिलता है। हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र में, छुड़ानेवाले के रूप में परमेश्वर के किसी विशेष और अद्भुत हस्तक्षेप के बाद, आत्मा का विशेष प्रभाव किसी स्तुति-गीत में प्रकट होता है। यह उल्लेखनीय है कि पवित्र उत्साह के इन्हीं उमड़ते उद्गारों में परमेश्वर की स्तुति उस पवित्र के रूप में की जाती है। हन्ना के गीत में इसे देखो (1 शमूएल 2:2), ‘यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं।’ साराप की भाषा (यशायाह का छठा अध्याय) आराधना के गीत की भाषा है। इस्राएल के छुटकारे के महान दिन में यह गीत होगा, ‘प्रभु यहोवा मेरा बल और मेरे भजन का विषय है। यहोवा का भजन गाओ, क्योंकि उसने प्रतापमय काम किए हैं। हे सिय्योन में बसनेवाली तू जयजयकार कर और ऊँचे स्वर से गा, क्योंकि इस्राएल का पवित्र तुझ में महान है।’ मरियम गाती है, ‘क्योंकि उस शक्तिमान ने मेरे लिये बड़े- बड़े काम किए हैं, और उसका नाम पवित्र है।’ प्रकाशितवाक्य की पुस्तक दिखाती है कि प्राणी उसकी जो सिंहासन पर बैठा है, महिमा और आदर और धन्यवाद करते हैं; ‘और वे रात-दिन बिना विश्राम लिए यह कहते रहते हैं, पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान, जो था, और जो है, और जो आनेवाला है।’ और जब काँच के समुद्र के निकट मूसा और मेम्ने का गीत गाया जाएगा, तब भी वह यही होगा, ‘हे प्रभु, कौन तुझ से न डरेगा? और तेरे नाम की महिमा न करेगा? क्योंकि केवल तू ही पवित्र है।’ परमेश्वर की छुड़ानेवाली सामर्थ्य के सबसे पूर्ण प्रकाशन के अधीन, सबसे ऊँची प्रेरणा के क्षणों में ही उसके दास उसकी पवित्रता की बात करते हैं। सत्तानबेवें भजन में हम पढ़ते हैं, ‘हे धर्मियों, यहोवा के कारण आनन्दित हो; और जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका धन्यवाद करो।’ और निन्यानबेवें भजन में, जिसे उसमें तीन बार दोहराए गए पवित्र शब्द के कारण स्वर्ग के तीन बार पवित्र की पृथ्वी पर गूँज कहा गया है, हम गाते हैं—
वे तेरे महान और भययोग्य नाम का धन्यवाद करें! वह तो पवित्र है।हमारे परमेश्वर यहोवा को सराहो; और उसके चरणों की चौकी के सामने दण्डवत् करो! वह पवित्र है!
हमारे परमेश्वर यहोवा को सराहो, और उसके पवित्र पर्वत पर दण्डवत् करो; क्योंकि हमारा परमेश्वर यहोवा पवित्र है!
केवल ऊँचे आत्मिक उत्कर्ष और आनन्द के प्रभाव में ही परमेश्वर की पवित्रता को पूरी रीति से समझा, या ठीक रीति से उसकी आराधना की जा सकती है। उस पवित्र की आराधना करते समय जो भाव हमें शोभा देता है, और जो हमें उसे ठीक रीति से जानने और उसकी आराधना करने के योग्य बनाता है, वह स्तुति का वह आत्मा है जो उसके पूर्ण उद्धार के अनुभव में गाता और आनन्द से जयजयकार करता है।
परन्तु क्या यह उस पाठ के विपरीत नहीं जो हमने होरेब में सीखा था, जब परमेश्वर ने कहा, ‘इधर पास मत आ, और अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे,’ और जहाँ मूसा डर गया और उसने अपना मुँह ढाँप लिया? और क्या सचमुच यही वह मुद्रा नहीं जो प्राणी और पापी होने के नाते हमें शोभा देती है? निश्चय ही है: और फिर भी ये दोनों भाव परस्पर विरोधी नहीं; वरन् वे एक दूसरे के लिये अनिवार्य हैं; भय ही स्तुति और महिमा की तैयारी है। क्या यह वही मूसा नहीं था जिसने अपना मुँह ढाँप लिया और परमेश्वर की ओर निहारने से डरा, और जिसने बाद में उसकी महिमा को यहाँ तक देखा कि उसका अपना चेहरा ऐसी चमक से चमक उठा जिसकी ओर मनुष्य देख न सके? और क्या वह गीत, जो यहाँ परमेश्वर को पवित्रता के कारण महाप्रतापी कहकर गाता है, उसी मूसा का गीत नहीं जो डर गया था और जिसने अपना मुँह ढाँप लिया था? क्या हमने आग में, और परमेश्वर में, और विशेषकर उसकी पवित्रता में, यह दोहरा रूप नहीं देखा: भस्म करना और शुद्ध करना, दूर हटाना और अपनी ओर खींचना, न्याय करना और उद्धार करना—और हर एक में दूसरी बात पहली की केवल संगी ही नहीं, वरन् उसका परिणाम भी है? और इस प्रकार हम पाएँगे कि परमेश्वर की पवित्र उपस्थिति में जितनी गहरी दीनता और भय होगा, और जो कुछ स्वयं का और स्वभाव का है उसका उतारा जाना जितना सच्चा और पूरा होगा—यहाँ तक कि पुराने मनुष्य और उसकी इच्छा का उतारा जाना, उसकी पूरी मृत्यु—और जो कुछ पापमय है उसे भस्म होने के लिये जितने सच्चे मन से सौंप दिया जाएगा, उतनी ही गहरी और पूरी वह स्तुति और आनन्द होगा जिसके साथ हम प्रतिदिन अपने छुटकारे का गीत गाते हैं: ‘हे यहोवा, तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य, और आश्चर्यकर्मों का कर्ता है।’
‘पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य:’ यह गीत स्वयं ही इन ऊपर से विरोधी दिखनेवाले तत्वों में मेल कराता है। हाँ, मैं न्याय और करुणा दोनों के विषय गाऊँगा। उस पवित्र की स्तुति करते हुए मैं काँपते हुए मगन होऊँगा। जब मैं उसकी पवित्रता के उन दो पक्षों को देखता हूँ जो मिस्रियों पर और इस्राएलियों पर प्रकट हुए, तो मुझे स्मरण आता है कि जो वहाँ अलग-अलग था, वह मुझ में एक हो गया है। स्वभाव से मैं मिस्री हूँ, विनाश के लिये ठहराया हुआ एक शत्रु; अनुग्रह से, छुटकारे के लिये चुना हुआ एक इस्राएली। मुझ में आग को भस्म और नाश करना ही है; केवल जब न्याय अपना कार्य कर लेता है, तभी करुणा पूरी रीति से उद्धार कर सकती है। केवल जब मैं उस पवित्र की जाँचनेवाली ज्योति, धधकती आग और भस्म करनेवाले ताप के आगे काँपता हूँ, और अपने मिस्री स्वभाव को न्याय, दण्ड की आज्ञा और घात के लिये सौंप देता हूँ, तभी वह इस्राएली छुड़ाया जाएगा, ताकि वह अपने परमेश्वर को उद्धार के परमेश्वर के रूप में ठीक रीति से जाने और उसमें आनन्द करे।
परमेश्वर धन्य हो! न्याय बीत चुका है। मसीह में, उस जलती हुई झाड़ी में, ईश्वरीय पवित्रता की आग ने अपना दोहरा कार्य किया: उसमें शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी गई; उसमें हम स्वतंत्र हैं। अपनी इच्छा को मृत्यु तक सौंपकर, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करके, मसीह ने अपने आप को पवित्र किया; और उसी इच्छा से हम भी पवित्र किए गए हैं। उसका क्रूस पर चढ़ाया जाना, शरीर पर उसके न्याय के साथ, और उसकी मृत्यु, स्वभाव की हर बात के पूरी रीति से उतारे जाने के साथ, केवल हमारे लिये ही नहीं, वरन् सचमुच हमारी है; एक जीवन और एक सामर्थ्य, जो उसके आत्मा के द्वारा हमारे भीतर कार्य करती है। दिन प्रतिदिन हम उसमें बने रहते हैं। काँपते हुए, परन्तु आनन्द करते हुए, हम उसमें अपना स्थान लेते हैं, ताकि न्याय के रूप में पवित्रता की सामर्थ्य हमारे भीतर पाप और शरीर की हर बात के विरुद्ध अपना प्रचण्ड पलटा ले, और इस प्रकार छुटकारे के रूप में पवित्रता की सामर्थ्य वह महिमामय कार्य पूरा करे जिसके कारण हम उसकी पवित्रता का स्मरण करके धन्यवाद करते हैं। और इस प्रकार उद्धार का जयजयकार हमारे जीवन भर और भी गहरा, और भी सच्चा, और भी ऊँचा गूँजता रहता है, ‘हे यहोवा, देवताओं में तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य, और आश्चर्यकर्मों का कर्ता है।’
पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।
‘हे यहोवा, तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य, और आश्चर्यकर्मों का कर्ता है।’ मैं अपने सारे मन से छुटकारे के इस गीत में सम्मिलित होना चाहता हूँ, और अपने उद्धार के परमेश्वर के रूप में तुझ में आनन्द करना चाहता हूँ।
हे मेरे परमेश्वर! तेरा आत्मा, जिससे पवित्र आनन्द और विजय के ये वचन निकले, मेरे भीतर उस महान छुटकारे को एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में ऐसा प्रकट करे कि मेरा सारा जीवन काँपते और आराधना करते हुए आश्चर्य का एक गीत बन जाए।
मैं तुझ से विशेष करके विनती करता हूँ, मेरा सारा हृदय तुझ ही से भर जाए, जो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य है, और जो अकेला ही आश्चर्यकर्म करता है। तेरी पवित्रता का भय मुझ में जो कुछ स्वयं और शरीर का है, उस सब के कारण मुझे कँपा दे, और मेरी आराधना में मुझे अपनी ही बुद्धि का इन्कार करने और उसे क्रूस पर चढ़ाने की ओर ले चले, ताकि तेरी पवित्रता का आत्मा मुझ में साँस ले। यहोवा का भय तेरी पवित्र उपस्थिति में मेरे सारे आने-जाने को अपना गहरा आधार-स्वर दे। इस प्रकार मुझे तेरी पवित्रता का स्मरण करके निरन्तर स्तुति करने के लिये तैयार कर। हे मेरे परमेश्वर! मैं तुझ में, अपने छुड़ानेवाले, अपने पवित्र में, ऐसे आनन्द से मगन होना चाहता हूँ जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है। मेरा छुड़ानेवाला होकर तू मुझे पवित्र बनाता है। मैं अपने सारे मन से तुझ पर भरोसा रखता हूँ कि तू यह करेगा, कि तू मुझे पूरी रीति से पवित्र करेगा। मैं तेरी प्रतिज्ञा पर विश्वास करता हूँ। मैं स्वयं तुझ पर विश्वास करता हूँ, और विश्वास करके मैं तुझे, उस पवित्र को, अपने छुड़ानेवाले को, ग्रहण करता हूँ।
हे यहोवा, तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य, और आश्चर्यकर्मों का कर्ता है।
1. महिमा के रूप में परमेश्वर की पवित्रता। परमेश्वर अपने लोगों की पवित्रता में महिमा पाता है। सच्ची पवित्रता सदा केवल परमेश्वर ही को महिमा देती है। परमेश्वर की महिमा के लिये जीओ: यही पवित्रता है। पवित्रता से जीओ: इससे परमेश्वर की महिमा होगी। अपने आप को भूल जाना, और केवल परमेश्वर की महिमा खोजना—यही पवित्रता है।
2. स्तुति के रूप में हमारी पवित्रता। स्तुति परमेश्वर को महिमा देती है, और इस प्रकार पवित्रता का एक अंग है। ‘तू तो पवित्र है, तू जो इस्राएल की स्तुति के सिंहासन पर विराजमान है।’
3. परमेश्वर की पवित्रता, उसका पवित्र छुड़ानेवाला प्रेम, निरन्तर आनन्द और स्तुति का कारण है। इसके लिये हर दिन परमेश्वर की स्तुति करो। परन्तु जब तक तुम उसमें जीते नहीं, तब तक तुम यह नहीं कर सकते। परमेश्वर की पवित्रता हमारे लिये ऐसी महिमामय हो जाए—जब हम समझें कि उसकी महिमा का जो कुछ हम देखते हैं वह उसकी पवित्रता ही की चमक है—कि हम उसमें, और उसमें जो पवित्र है, आनन्द किए बिना रह ही न सकें।
4. यहोवा के भय का आत्मा और स्तुति का आत्मा पहली दृष्टि में परस्पर विरोधी जान पड़ सकते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है। जो दीनता उस पवित्र का भय मानती है, वही उसकी स्तुति भी करेगी: ‘हे यहोवा के डरवैयों: यहोवा की स्तुति करो।’ परमेश्वर के भय में, और अपने आप के भय में, हम जितने नीचे पड़े रहेंगे, उतने ही निश्चय से वह हमें उचित समय पर अपनी स्तुति करने के लिये ऊपर उठाएगा।
सातवाँ दिन।
अध्याय 7 पूरा हुआ
पवित्रता और महिमा