अध्याय 6 · 14 मिनट का पठन
पवित्रता और छुटकारा
‘सब पहलौठों को मेरे लिये पवित्र मानना।’—निर्गमन 13:2।
‘सब पहलौठे मेरे हैं; क्योंकि जिस दिन मैंने मिस्र देश के सब पहिलौठों को मारा, उसी दिन मैंने इस्राएलियों के सब पहिलौठों को अपने लिये पवित्र ठहराया; इसलिए वे मेरे ही ठहरेंगे; मैं यहोवा हूँ।’—गिनती 3:13, 8:17।
‘क्योंकि मैं वह यहोवा हूँ जो तुम्हें मिस्र देश से इसलिए निकाल ले आया हूँ कि तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँ; इसलिए तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।’—लैव्यव्यवस्था 11:45।
‘मैंने तुझे छुड़ा लिया है; तू मेरा ही है।’—यशायाह 43:1।
होरेब में हमने देखा था कि पतित मनुष्य के इतिहास में पवित्र शब्द का पहला उल्लेख किस प्रकार परमेश्वर के प्रकाशन के एक नए युग, अर्थात् छुटकारे के युग, के आरम्भ से जुड़ा हुआ था। फसह में हमें पहली बार यह प्रकट होता है कि छुटकारा क्या है; और यहीं से पवित्र शब्द का अधिक बार प्रयोग आरम्भ होता है। अख़मीरी रोटी के पर्व में हमें पुराने को उतार फेंकने और नए को पहन लेने का वह प्रतीक मिलता है, जिसकी ओर लहू के द्वारा होनेवाला छुटकारा ले जाने को है। उन सात दिनों के विषय में हम पढ़ते हैं: ‘पहले दिन एक पवित्र सभा, और सातवें दिन भी एक पवित्र सभा करना;’ अपने छुटकारे का स्मरण करने के लिये छुड़ाए हुए लोगों का इकट्ठा होना एक पवित्र सभा है; वे अपने छुड़ानेवाले, उस पवित्र, की छाया तले इकट्ठे होते हैं। ज्यों ही लोग मिस्र से छुड़ाए गए, परमेश्वर का उनसे सबसे पहला वचन यह था, ‘सब पहलौठों को मेरे लिये पवित्र मानना—अर्थात् पवित्र ठहराना; वह तो मेरा ही है।’ (देखें निर्गमन 13:2।) यह वचन प्रकट करता है कि स्वामित्व का विचार छुटकारे और पवित्रता दोनों के केन्द्रीय विचारों में से एक है—वह कड़ी जो उन्हें आपस में जोड़ती है। और यद्यपि यहाँ यह शब्द केवल पहलौठों के लिये प्रयोग हुआ है, तौभी वे सारी प्रजा के प्रतीक माने गए हैं। हम जानते हैं कि सारी बढ़ती और सारा संगठन एक केन्द्र से आरम्भ होता है, जिसके चारों ओर निरन्तर चौड़े होते घेरों में उस जीव का जीवन फैलता जाता है। यदि मानवजाति में पवित्रता सच्ची और वास्तविक होनी है, और परमेश्वर की पवित्रता के समान स्वतंत्र होनी है, तो उसे ऐसे विकास का परिणाम होना होगा जिसमें मनुष्य उसे स्वयं अपनाता है। इसलिए पहले पहलौठे पवित्र किए जाते हैं, और बाद में उनके स्थान पर याजक, उस बात के प्रतीक के रूप में जो सारी प्रजा को बनना है—जातियों के बीच परमेश्वर का पहलौठा, उसका निज धन, ‘पवित्र जाति।’ छुटकारे और पवित्रता के सम्बन्ध में स्वामित्व का यह विचार विशेष स्पष्टता से तब सामने आता है जब परमेश्वर पहलौठों के बदले याजकों को लेने की बात करता है (गिनती 3:12, 13, 8:16, 17): ‘लेवीय मुझे पूरी रीति से अर्पण किए हुए हैं; पहलौठों के बदले मैंने उनको अपना कर लिया है; क्योंकि सब पहलौठे मेरे हैं; जिस दिन मैंने मिस्र देश के सब पहिलौठों को मारा, उसी दिन मैंने उन्हें अपने लिये पवित्र ठहराया।’
आओ, हम छुटकारे और पवित्रता के बीच के सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न करें। अदन की वाटिका में हमने देखा था कि परमेश्वर का सातवें दिन को पवित्र ठहराना क्या था: उसने उस पर अधिकार कर लिया, उसे आशीष दी, उसमें विश्राम किया और अपने आप को तरोताज़ा किया। जहाँ परमेश्वर प्रवेश करके विश्राम करता है, वहाँ पवित्रता है: जितनी पूर्णता से कोई वस्तु उसके प्रवेश करने और वास करने के योग्य बनाई जाती है, उतनी ही पूर्ण उसकी पवित्रता होती है। सातवाँ दिन मनुष्य को पवित्र करने के समय के रूप में पवित्र ठहराया गया था। परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी पवित्रता तक ले चलने के लिये जो सबसे पहला कदम उठाया—अर्थात् उस वृक्ष का फल न खाने की आज्ञा—उसी पर मनुष्य गिर पड़ा। परमेश्वर ने अपनी योजना नहीं छोड़ी, परन्तु अब उसे एक भिन्न और धीमा मार्ग अपनाना पड़ा। पच्चीस शताब्दियों की धीमी परन्तु आवश्यक तैयारी के बाद, अब वह अपने आप को छुड़ानेवाले के रूप में प्रकट करता है। एक प्रजा को, जिसे उसने अपने लिये चुना और रचा था, वह अत्याचार और दासत्व के हाथ में सौंप देता है, ताकि उनके मन किसी छुड़ानेवाले की लालसा करने और उसका स्वागत करने के लिये तैयार हो जाएँ। सामर्थी आश्चर्यकर्मों की एक श्रृंखला में वह अपने आप को उनके शत्रुओं पर विजयी सिद्ध करता है, और फिर उनके द्वारों पर लगे फसह के मेम्ने के लहू में उन्हें सिखाता है कि छुटकारा क्या है—न केवल पृथ्वी पर के किसी अन्यायी अत्याचारी से, वरन् उस धर्मी न्याय से भी जिसके योग्य उनके पाप थे। फसह उनके लिये दृश्य और अस्थायी से अदृश्य और आत्मिक की ओर बढ़ने का मार्ग ठहरनेवाला है, जो परमेश्वर को न केवल सामर्थी के रूप में, वरन् पवित्र के रूप में भी प्रकट करता है, और उन्हें न केवल दासत्व के घर से, वरन् नाश करनेवाले दूत से भी छुड़ाता है।
और इस प्रकार उन्हें छुड़ाकर वह उनसे कहता है कि अब वे उसके अपने हैं। सीनै पर और जंगल में उनके ठहरने के सारे समय यह विचार निरन्तर उनके मन पर बैठाया जाता है कि अब वे यहोवा की प्रजा हैं, जिन्हें उसने अपनी भुजा के बल से अपना बना लिया है, ताकि वह उन्हें अपने लिये पवित्र बनाए, जैसा वह स्वयं पवित्र है। छुटकारे का उद्देश्य स्वामित्व है, और स्वामित्व का उद्देश्य उसकी समानता है जो छुड़ानेवाला और स्वामी है—अर्थात् पवित्रता।
इस पवित्रता के विषय में, और उस मार्ग के विषय में जिससे वह छुटकारे के फल के रूप में प्राप्त की जाती है, पहलौठों का पवित्र किया जाना हमें एक से अधिक पाठ सिखाएगा।
सबसे पहले, हमें यह समझना है कि छुटकारा और पवित्रता कितने अभिन्न हैं। दोनों में से कोई भी दूसरे के बिना नहीं रह सकता। केवल छुटकारा ही पवित्रता की ओर ले जाता है। यदि मैं पवित्रता की खोज में हूँ, तो मुझे इस बात के स्पष्ट और पूर्ण अनुभव में बने रहना है कि मैं छुड़ाया हुआ हूँ, और इस नाते परमेश्वर का हूँ और उसके अधिकार में हूँ। छुटकारे को बहुत बार केवल उसके नकारात्मक पक्ष से देखा जाता है, अर्थात् किसी वस्तु से छुटकारा: परन्तु उसकी वास्तविक महिमा उसका सकारात्मक पक्ष है—स्वयं परमेश्वर के लिये छुड़ाया जाना। किसी घर पर पूरा अधिकार होने का अर्थ है उसमें रहना: यदि मैं किसी घर का स्वामी हूँ पर उसमें नहीं रहता, तो वह हर प्रकार की गन्दगी और बुराई का बसेरा बन सकता है। परमेश्वर ने मुझे इसी अभिप्राय से छुड़ाया और अपना बनाया है कि वह मुझ पर पूरा अधिकार पाए। मेरे प्राण के विषय में वह कहता है, ‘वह तो मेरा ही है,’ और चाहता है कि उसके स्वामित्व का अधिकार माना जाए और पूरी रीति से प्रकट हो। यही सिद्ध पवित्रता होगी, जहाँ परमेश्वर ने भीतर प्रवेश करके पूरा और सम्पूर्ण अधिकार कर लिया है। छुटकारा ही परमेश्वर को मुझ पर अधिकार और सामर्थ्य देता है; छुटकारा ही मुझे स्वतंत्र करता है कि अब परमेश्वर मुझे अपने अधिकार में ले और आशीष दे: और छुटकारा ही, जब वह अनुभव में आकर मेरे प्राण को भर देता है, मुझे उस सब का निश्चय और अनुभव देगा जो उसकी सामर्थ्य मुझ में करेगी। परमेश्वर में छुटकारा और पवित्रता एक ही हैं: छुटकारा एक ईश्वरीय वास्तविकता के रूप में जितना अधिक मुझ पर अधिकार करता है, उतना ही अधिक मैं छुड़ानेवाले परमेश्वर से, उस पवित्र से, जुड़ जाता हूँ।
और ठीक इसी प्रकार, केवल पवित्रता ही छुटकारे का निश्चय और आनन्द देती है। यदि मैं किसी निचली भूमि पर खड़ा होकर छुटकारे को थामे रहना चाहूँ, तो मैं धोखा खा सकता हूँ। यदि मैं असावधान या लापरवाह हो गया हूँ, तो मुझे उस छुटकारे पर भरोसा करने के विचार मात्र से काँप उठना चाहिए जो पवित्रता को अपना लक्ष्य न माने। परमेश्वर ने इस्राएल से कहा, ‘मैं तुम्हें मिस्र देश से निकाल ले आया हूँ: इसलिए तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।’ वही छुड़ानेवाला परमेश्वर, जिसने हमें अपना बनाया, हमें भी पवित्र होने के लिये बुलाता है: पवित्रता हमारे लिये छुटकारे का सबसे आवश्यक, सबसे बहुमूल्य भाग हो—अर्थात् अपने आप को उसके हाथ सौंप देना जिसने हमें अपना करके ले लिया है, और जिसने हमें पूरी रीति से अपना बनाने का बीड़ा उठाया है।
यहाँ सुझाया गया दूसरा पाठ पवित्रता में परमेश्वर के और मनुष्य के कार्य का आपसी सम्बन्ध है। मूसा से यहोवा कहता है, ‘सब पहलौठों को मेरे लिये पवित्र मानना।’ बाद में वह कहता है, ‘मैंने सब पहलौठों को अपने लिये पवित्र ठहराया।’ जो कुछ परमेश्वर करता है, वह इसलिए करता है कि वह हमारे द्वारा पूरा किया और अपनाया जाए। जब वह हमसे कहता है कि हम मसीह यीशु में पवित्र किए गए हैं, कि हम उसके पवित्र लोग हैं, तो वह केवल अपने अभिप्राय की नहीं, वरन् उसकी भी बात करता है जो उसने सचमुच कर दिया है; हम मसीह के एक ही बलिदान के द्वारा, और उसमें नई सृष्टि बनाए जाने के द्वारा, पवित्र किए गए हैं। परन्तु इस कार्य का एक मानवीय पक्ष भी है। हमारे पास यह बुलाहट आती है कि पवित्र बनो, पवित्रता के खोजी हो, पवित्रता को सिद्ध करो। परमेश्वर ने हमें अपना बनाया है, और हमें यह कहने देता है कि हम उसके हैं: परन्तु अब वह इस बाट में है कि हम अपने भीतरी अस्तित्व के गुप्त स्थानों में उसके लिये और अधिक प्रवेश का मार्ग खोल दें, ताकि वह उन सब को अपनी भरपूरी से भर दे। पवित्रता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम परमेश्वर के पास लाते हैं या उसके लिये करते हैं। हम में जो कुछ परमेश्वर का है, वही पवित्रता है। परमेश्वर ने छुटकारे में हमें अपना बनाया, ताकि पवित्रता में वह अपने आप को हमारा बना दे। और पवित्र बनने में हमारा कार्य यह है कि हम अपने सारे जीवन को, और उसके हर भाग को, इस पवित्र परमेश्वर के शासन के अधीन कर दें, और अपने हर अंग और हर शक्ति को उसकी वेदी पर रख दें।
और यही हमें इस प्रश्न का उत्तर सिखाता है कि पवित्रता में अचानक और क्रमिक का आपस में क्या सम्बन्ध है: अर्थात् वह एक ही बार में पूरी हो चुकी बात भी है, और फिर भी अधूरी है और उसे सिद्ध किए जाने की आवश्यकता है। जिसे परमेश्वर पवित्र करता है, वह उसके वरदान के रूप में ईश्वरीय और सिद्ध पवित्रता से पवित्र होता है: मनुष्य को उसे इस रीति से पवित्र करना है कि जिसे परमेश्वर ने पवित्र ठहराया है, उसके सम्बन्ध में वह उस पवित्रता को माने, बनाए रखे और व्यवहार में लाए। परमेश्वर ने सब्त के दिन को पवित्र ठहराया: मनुष्य को उसे पवित्र करना है, अर्थात् उसे पवित्र मानना है। परमेश्वर ने पहलौठों को अपने लिये पवित्र ठहराया: इस्राएल को उन्हें पवित्र करना था, अर्थात् उन्हें पवित्र मानकर उनसे व्यवहार करना और उन्हें परमेश्वर को सौंप देना था। परमेश्वर पवित्र है: हमें उसकी उस पवित्रता को मानकर, उसकी आराधना और आदर करके उसे पवित्र मानना है। परमेश्वर ने अपने महान नाम को पवित्र ठहराया है, उसका नाम पवित्र है: जब हम उस नाम का भय मानते, उस पर भरोसा रखते और उसे उसकी पवित्रता के प्रकाशन के रूप में काम में लाते हैं, तब हम उस नाम को पवित्र करते, अर्थात् पवित्र मानते हैं। परमेश्वर ने मसीह को पवित्र ठहराया: मसीह ने अपने आप को पवित्र किया, और अपनी व्यक्तिगत इच्छा और कार्य में उस पवित्रता के साथ सिद्ध अनुरूपता प्रकट की जिससे परमेश्वर ने उसे पवित्र ठहराया था। परमेश्वर ने हमें मसीह यीशु में पवित्र किया है: हमें उस पवित्रता की सामर्थ्य के आगे अपने आप को सौंपकर, उसे व्यवहार में लाकर, और अपने सारे जीवन और चाल-चलन में उसे प्रकट करके पवित्र बनना है। वह बाहरी ईश्वरीय वरदान, जो एक ही बार में और पूर्ण रूप से दिया गया है, भीतरी व्यक्तिगत सम्पत्ति के रूप में अपनाया जाना चाहिए; हमें पवित्रता को सिद्ध करते हुए अपने आप को शुद्ध करना है। पवित्रता के लिये छुड़ाए गए: जैसे ये दोनों विचार परमेश्वर के मन और कार्य में जुड़े हुए हैं, वैसे ही वे हमारे हृदय और जीवन में भी जुड़े रहें।
जब यशायाह ने दूसरे, अर्थात् सच्चे छुटकारे की घोषणा की, तब उसे मूसा से भी अधिक स्पष्टता और पूर्णता से परमेश्वर का यह नाम प्रकट करने का वरदान मिला: ‘छुड़ानेवाला और इस्राएल का पवित्र।’ जितना अधिक हम इस नाम पर मनन करेंगे, इसे पवित्र मानेंगे, और इसके द्वारा परमेश्वर की आराधना करेंगे, उतने ही अभिन्न रूप से ये शब्द आपस में जुड़ते जाएँगे, और हम देखेंगे कि जैसे छुड़ानेवाला पवित्र है, वैसे ही छुड़ाए हुए भी पवित्र जन हैं। यशायाह ‘पवित्र मार्ग,’ के विषय में कहता है कि ‘छुड़ाए हुए उसमें नित चलेंगे।’ जो छुटकारा परमेश्वर की पवित्रता में से निकलता है, उसे ऊपर उसी पवित्रता तक ले भी जाना है। हम समझेंगे कि मसीह में छुड़ाया जाना मसीह में पवित्र होना है, और हमारे छुड़ानेवाले परमेश्वर की बुलाहट को एक नया अर्थ मिलेगा: ‘मैं पवित्र हूँ: पवित्र बनो।’
पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।
हे प्रभु परमेश्वर! इस्राएल के पवित्र और उसके छुड़ानेवाले! मैं गहरी दीनता से तेरे सम्मुख आराधना करता हूँ। मैं लज्जा के साथ मान लेता हूँ कि इतने लम्बे समय तक मैंने तुझे पवित्र के रूप में कम, और छुड़ानेवाले के रूप में अधिक खोजा। मैं नहीं जानता था कि तूने पवित्र होने के नाते ही छुड़ाया है, कि छुटकारा तेरी पवित्रता का परिणाम और फल था; कि तेरी पवित्रता में सहभागी होना ही उसका एकमात्र उद्देश्य और उसकी सर्वोच्च शोभा थी। मैंने केवल दासत्व और मृत्यु से छुड़ाए जाने की ही बात सोची: इस्राएल के समान, मैं यह नहीं समझा कि तेरे साथ संगति और तेरी अनुरूपता के बिना छुटकारा अपना मूल्य खो बैठेगा।
हे अति पवित्र परमेश्वर! मैं उस धीरज के लिये तेरी स्तुति करता हूँ जिससे तू अपने छुड़ाए हुओं की स्वार्थपरता और सुस्ती को सहता है। मैं तेरी पवित्रता के आत्मा की उस शिक्षा के लिये तेरी स्तुति करता हूँ, जो तेरे पवित्र लोगों को, और मुझे भी, यह देखने की ओर ले चलती है कि तेरी पवित्रता, और उसमें सहभागी होने की बुलाहट ही छुटकारे को उसका मूल्य देती है; कि हम तेरे ही लिये, जो पवित्र है, इसलिए छुड़ाए गए हैं कि तेरे अपने हों, तेरे अधिकार में हों और तुझ से पवित्र किए जाएँ।
हे मेरे परमेश्वर! ऐसे प्रेम, आनन्द और धन्यवाद के साथ जिसका वर्णन नहीं हो सकता, मैं मसीह के लिये तेरी स्तुति करता हूँ, जो तेरी ओर से हमारे लिये पवित्रता और छुटकारा ठहरा। उसमें तू मेरा छुड़ानेवाला, मेरा पवित्र है। उसमें मैं तेरा छुड़ाया हुआ, तेरा पवित्र जन हूँ। हे परमेश्वर! अवर्णनीय आराधना में मैं गिरकर उस प्रेम को दण्डवत् करता हूँ जो ज्ञान से परे है, जिसने हमारे लिये यह किया है; और यह विश्वास करता हूँ कि उसमें, जो अब मसीह में पवित्र होकर तेरे सम्मुख है, तू अपनी सामर्थ्य की महानता के अनुसार अपने सब महिमामय अभिप्रायों को पूरा करेगा। आमीन।
1. ‘उसके लहू के द्वारा छुटकारा।’ पवित्रता के मार्ग की दहलीज़ पर ही हमें लहू मिलता है। क्योंकि यह उस बलिदान का लहू है जिसे परमेश्वर की आग ने भस्म किया, और फिर भी भस्म न कर सकी। उस लहू में पवित्रता की ऐसी सामर्थ्य है कि हम पढ़ते हैं, ‘अपने ही लहू के द्वारा पवित्र करने के लिये।’ पवित्रता के विषय में सदा ऐसे व्यक्ति के रूप में सोचो, या उसके लिये प्रार्थना करो, जो लहू के द्वारा छुड़ाया गया है। लहू की छाया तले, उसकी प्रतिदिन शुद्ध करनेवाली सामर्थ्य में जीवन बिताओ।
2. केवल जब हम परमेश्वर की पवित्रता को आग के रूप में जानते हैं और उसके धर्मी न्याय के आगे झुकते हैं, तभी हम लहू की बहुमूल्यता या छुटकारे की वास्तविकता का मोल समझ सकते हैं। जब तक हम परमेश्वर के प्रेम को केवल भलाई के रूप में सोचते हैं, तब तक हम भले बनने का लक्ष्य रख सकते हैं; परन्तु छुड़ानेवाले परमेश्वर पर विश्वास हम में मसीह में पवित्र होने की आवश्यकता और आनन्द जगाएगा।
3. जिसे परमेश्वर ने छुड़ाया है, उस पर उसके स्वामित्व के अधिकार को क्या तुमने समझा है? क्या तुमने किसी आवाज़ को यह कहते सुना है, मेरा। तू मेरा ही है। परमेश्वर से बड़ी दीनता से माँगो कि वह यह तुम से कहे। बड़ी कोमलता से उसे सुनने की बाट जोहो।
4. प्राणी की पवित्रता का मूल ईश्वरीय इच्छा में, अर्थात् ईश्वरीय चुनाव, छुटकारे और स्वामित्व में है। अपने आप को परमेश्वर की इस इच्छा के हाथ सौंप दो और उसमें आनन्द करो।
5. जैसे परमेश्वर ने सृष्टि की, वैसे ही उसने छुड़ाया भी—पवित्र करने के लिये। इसके लिये उस पर बड़ा विश्वास रखो।
6. परमेश्वर को तुम पर पूरा अधिकार और तुम्हें जैसा चाहे वैसा रखने का पूरा हक़ दो। पवित्रता उसी की है; हमारी पवित्रता यह है कि हम उसे, उस पवित्र को, सब कुछ होने दें।
छठा दिन।
अध्याय 6 पूरा हुआ
पवित्रता और छुटकारा