मसीह में पवित्र
पवित्रता और प्रकाशन

अध्याय 5 · 17 मिनट का पठन

पवित्रता और प्रकाशन

‘जब यहोवा ने देखा कि मूसा देखने को मुड़ा चला आता है, तब परमेश्वर ने झाड़ी के बीच से उसको पुकारा, हे मूसा, हे मूसा! मूसा ने कहा, क्या आज्ञा। उसने कहा, इधर पास मत आ, और अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे, क्योंकि जिस स्थान पर तू खड़ा है वह पवित्र भूमि है। तब मूसा ने जो परमेश्वर की ओर निहारने से डरता था अपना मुँह ढाँप लिया।’—निर्गमन 3:4-6।

और वह भूमि पवित्र क्यों थी? क्योंकि परमेश्वर वहाँ आया था और उसने उस पर अधिकार कर लिया था। जहाँ परमेश्वर है, वहाँ पवित्रता है; परमेश्वर की उपस्थिति ही पवित्र करती है। यह वही सत्य है जो हमें अदन की वाटिका में मिला था, जब मनुष्य अभी-अभी रचा गया था; यहाँ, जहाँ पवित्रशास्त्र दूसरी बार पवित्र शब्द का प्रयोग करता है, वह दोहराया जाता है और उस पर बल दिया जाता है। जलती हुई झाड़ी के प्रकाश में इस शब्द का ध्यान से अध्ययन करने पर उसका गहरा अर्थ और भी खुलेगा। आओ, हम देखें कि पवित्र इतिहास, परमेश्वर का प्रकाशन, और मूसा हमें इस पवित्र भूमि के विषय में क्या सिखाते हैं।

1. ध्यान दो कि पवित्र इतिहास में उस पहले प्रत्यक्ष प्रकाशन का क्या स्थान है, जिसमें परमेश्वर ने मनुष्य पर अपने आप को उस पवित्र के रूप में प्रगट किया। अदन की वाटिका में हमने पवित्र शब्द को सातवें दिन के लिये प्रयुक्त होते पाया था। उस समय से अब तक पच्चीस शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। विश्राम के दिन को परमेश्वर के पवित्र ठहराने में हमने एक नये युग की प्रतिज्ञा पाई थी—सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता के प्रकाशन के बाद उस पवित्र का प्रकाशन होना था जो पवित्र करता है। फिर भी उत्पत्ति की पूरी पुस्तक में यह शब्द फिर कभी नहीं आता; मानो परमेश्वर की पवित्रता रोककर रखी गई हो; केवल निर्गमन में, मूसा की बुलाहट के साथ, वह फिर प्रगट होता है। यह गहरे अर्थ की बात है। जैसे माता-पिता या शिक्षक बचपन के आरम्भिक दिनों में एक समय में एक ही पाठ मन पर बैठाने का यत्न करते हैं, वैसे ही परमेश्वर मानव जाति की शिक्षा में व्यवहार करता है। जलप्रलय में पाप के विरुद्ध अपना धर्मी न्याय दिखाने के बाद, वह अब्राहम को एक चुनी हुई प्रजा का पिता होने के लिये बुलाता है। और उस प्रजा के साथ अपने सारे व्यवहार की नींव के रूप में, वह उसे और उसके वंश को सबसे पहले बालक के समान भरोसे का पाठ सिखाता है—सर्वशक्तिमान के रूप में उस पर भरोसा, जिसके लिये कोई काम कठिन नहीं, और विश्वासयोग्य के रूप में उस पर भरोसा, जिसकी शपथ टूट नहीं सकती थी। इस्राएल के एक प्रजा के रूप में बढ़ने के साथ हम प्रकाशन को एक नये चरण में आगे बढ़ते देखते हैं। बचपन की सरलता जवानी के हठीलेपन को स्थान देती है, और अब परमेश्वर को व्यवस्था के अनुशासन और अंकुश के साथ हस्तक्षेप करना पड़ता है। उनके पूर्वजों के परमेश्वर के रूप में उनके भरोसे में स्थान पाने का अधिकार प्राप्त करके, वह उन्हें एक और प्रकाशन के लिये तैयार करता है। अब्राहम के परमेश्वर का मुख्य गुण यह था कि वह सर्वशक्तिमान है; इस्राएल के परमेश्वर, यहोवा, का मुख्य गुण यह है कि वही पवित्र है।

और जो नया युग अब आरम्भ होनेवाला है, और जिसका परिचय पवित्र शब्द से कराया जाता है, उसका विशेष चिन्ह क्या होगा? परमेश्वर मूसा से कहता है कि वह अब अपने आप को एक नये स्वरूप में प्रगट करनेवाला है। अब्राहम उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रतिज्ञा के परमेश्वर, के रूप में जानता था (निर्गमन 6:3)। अब वह अपने आप को यहोवा के रूप में, पूर्ति के परमेश्वर के रूप में, प्रगट करेगा, विशेष करके अपनी प्रजा को उस अन्धेर से छुड़ाने और उद्धार देने में, जिसकी भविष्यद्वाणी उसने अब्राहम से की थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर सृष्टि का परमेश्वर है: अब्राहम ने उस परमेश्वर पर विश्वास किया, ‘जो मरे हुओं को जिलाता है, और जो बातें हैं ही नहीं, उनका नाम ऐसा लेता है, कि मानो वे हैं।’ यहोवा छुटकारे और पवित्रता का परमेश्वर है। अब्राहम के साथ पाप या दोष की कोई बात नहीं हुई थी, और इसलिए छुटकारे या पवित्रता की भी नहीं। इस्राएल को व्यवस्था दी जानेवाली है, कि पाप का बोध कराए और पवित्रता का मार्ग तैयार करे; अब जो प्रगट होता है वह यहोवा है, इस्राएल का पवित्र, छुड़ानेवाला। और इसी पवित्र की उपस्थिति उस भूमि को पवित्र बनाती है।

2. और यह उपस्थिति अपने आप को कैसे प्रगट करती है? जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर अपने आप को आग के बीच वास करनेवाले के रूप में प्रगट करता है। पवित्रशास्त्र में अन्य स्थानों पर आग और परमेश्वर की पवित्रता का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है: ‘इस्राएल की ज्योति तो आग ठहरेगी, और इस्राएल का पवित्र ज्वाला ठहरेगा।’ आग का स्वभाव या तो भलाई करनेवाला हो सकता है या नाश करनेवाला। सूर्य, वह बड़ी केन्द्रीय आग, जीवन और फलवन्तता दे सकता है, या झुलसाकर मार भी सकता है। सब कुछ इस पर निर्भर है कि हम सही स्थान पर हों, और उसके साथ हमारा सम्बन्ध कैसा है। और इसी प्रकार जहाँ कहीं पवित्र परमेश्वर अपने आप को प्रगट करता है, वहाँ हम दोनों पक्ष साथ-साथ पाएँगे: परमेश्वर की पवित्रता पाप के विरुद्ध न्याय के रूप में, जो उसमें बने रहनेवाले पापी को नाश करती है, और दया के रूप में, जो उसके लोगों को उससे छुड़ाती है। न्याय और दया सदा साथ-साथ चलते हैं। प्रकृति के तत्वों में आग के समान आत्मिक और प्रबल शक्ति वाला कोई नहीं: जिसे वह भस्म करती है उसे वह लेकर अपने ही आत्मिक स्वभाव में बदल देती है, और जो उसमें मिलाया नहीं जा सकता उसे धुएँ और राख के रूप में त्याग देती है। और इसी प्रकार परमेश्वर की पवित्रता वह असीम सिद्धता है जिसके द्वारा वह अपने आप को हर उस बात से अलग रखता है जो दिव्य नहीं है, और फिर भी सृष्टि के साथ संगति रखता है, और उसे अपने साथ एकता में ले लेता है, और जो कुछ अपने आप को उसके अधीन नहीं करता उसे नाश करता और बाहर निकाल देता है।

इस प्रकार इस नये छुटकारे के युग के आरम्भ में परमेश्वर अपने आप को उसके रूप में प्रगट करता है जो आग में वास करता है, जो स्वयं आग है। अब्राहम और कुलपतियों के साथ, जैसा हम कह चुके हैं, पाप या छुटकारे के विषय में बहुत कम शिक्षा हुई थी; परमेश्वर की निकटता और मित्रता प्रगट की गई थी। अब व्यवस्था दी जाएगी, पाप प्रगट किया जाएगा, परमेश्वर से दूरी का अनुभव होगा, ताकि मनुष्य अपने आप को और अपनी पापमयता को जानना सीखते हुए परमेश्वर को जानना सीखे, और लालसा करे कि वह उसे पवित्र करे। परमेश्वर के अपने आप को प्रगट करने में हम सर्वत्र इन दो तत्वों का मेल पाएँगे, एक दूर हटानेवाला, दूसरा अपनी ओर खींचनेवाला। अपने भवन में वह इस्राएल के बीच वास करेगा, फिर भी वह परदे के भीतर परमपवित्र स्थान के भयानक, अगम्य एकान्त और अन्धकार में होगा। वह उनके निकट आएगा, फिर भी उन्हें दूरी पर रखेगा। जब हम परमेश्वर की पवित्रता का अध्ययन करेंगे, तो बढ़ती हुई स्पष्टता से देखेंगे कि वह आग के समान कैसे दूर हटाती और खींचती है, कैसे वह उसकी असीम दूरी और उसकी असीम निकटता को एक में मिला देती है।

3. परन्तु दूरी ही वह बात होगी जो सबसे पहले और सबसे प्रबलता से सामने आती है। यह हम मूसा में देखते हैं: उसने अपना मुँह ढाँप लिया, क्योंकि वह परमेश्वर की ओर निहारने से डरता था। परमेश्वर की पवित्रता जो पहला प्रभाव उत्पन्न करती है, वह भय और श्रद्धा का है। जब तक मनुष्य, सृजा हुआ प्राणी और पापी दोनों होने के नाते, यह नहीं सीखता कि परमेश्वर उससे कितना ऊँचा है, और वह परमेश्वर से कितना भिन्न और कितना दूर है, तब तक परमेश्वर की पवित्रता का उसके लिये बहुत कम वास्तविक मूल्य या आकर्षण होगा। मूसा का अपना मुँह ढाँपना हमें दिखाता है कि उस पवित्र के निकट आने का क्या प्रभाव होता है, और उसके आगे के प्रकाशन का मार्ग क्या है।

परमेश्वर के अपने शब्दों में यह कितनी स्पष्टता से प्रगट होता है: ‘इधर पास मत आ, और अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे।’ हाँ, परमेश्वर निकट आया था, परन्तु मूसा निकट नहीं आ सकता। परमेश्वर निकट आता है: मनुष्य को पीछे खड़ा रहना है। एक ही साँस में परमेश्वर कहता है, पास आ, और, पास मत आ। जहाँ हमने पहले उसका यह वचन, पास मत आ, नहीं सुना, वहाँ न परमेश्वर का कोई ज्ञान हो सकता है, न उसकी कोई निकटता। पाप का बोध, परमेश्वर की उपस्थिति के लिये अपनी अयोग्यता का बोध, उस पवित्र के रूप में उसके सच्चे ज्ञान या उसकी सच्ची आराधना की नींव है। ‘अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे।’ जूतियाँ संसार के साथ व्यवहार का साधन हैं, वे सहारे जिनके द्वारा शरीर या स्वभाव अपनी इच्छा पूरी करता, इधर-उधर चलता और अपना काम करता है। पवित्र भूमि पर खड़े होते समय यह सब कुछ उतार देना होगा। नंगे पाँव, नंगा और हर आवरण से रहित होकर ही मनुष्य को पवित्र परमेश्वर के सामने झुकना है। उस पवित्र के निकट आने या उसके साथ कोई भी व्यवहार रखने के लिये हमारी पूरी अयोग्यता ही वह सबसे पहला पाठ है जो हमें सीखना है, यदि हमें कभी उसकी पवित्रता का भागी होना है। अवश्य है कि वह उतार दे! हमारे सारे अस्तित्व में अपनी दोषी ठहरानेवाली सामर्थ्य से तब तक काम करता रहे, जब तक हम उस महान वचन का पूरा अर्थ न समझ लें, ‘पुराने मनुष्यत्व को उतार डालो; प्रभु यीशु को पहन लो,’ और यह न समझ लें कि ‘मसीह का खतना हुआ, जिससे पापमय शारीरिक देह उतार दी जाती है,’ इसका क्या अर्थ है। हाँ, जो कुछ स्वभाव और शरीर का है, जो कुछ हमारे अपने करने या चाहने या काम करने का है—हमारा जीवन ही—उसे उतार देना और मृत्यु को सौंप देना होगा, यदि परमेश्वर को पवित्र के रूप में अपने आप को हम पर प्रगट करना है।

हम पहले देख चुके हैं कि पवित्रता भलाई या पाप से रहित होने से बढ़कर है: जिस स्वभाव का पतन नहीं हुआ, वह भी पवित्र नहीं है। पवित्रता वह भयानक महिमा है जिसके द्वारा ईश्वरत्व सब सृजी हुई वस्तुओं से अलग है। इसलिए साराप भी जब तीन बार पवित्र का गीत गाते हैं, तो अपने पंखों से अपने मुँह को ढाँपे रहते हैं। परन्तु आह! जब दूरी और भिन्नता केवल सृजे हुए प्राणी की ही नहीं, वरन् पापी की भी हो, तो कौन उस दीनता, उस भय, उस लज्जा को व्यक्त कर सकता है, कौन उसका अनुभव कर सकता है, जिसके साथ हमें उस पवित्र की वाणी के सामने झुकना चाहिए? हाय! पाप के सबसे भयानक प्रभावों में से एक यह है कि वह हमें अन्धा कर देता है। हम नहीं जानते कि परमेश्वर की दृष्टि में पाप और पापमय स्वभाव कितने अपवित्र, कितने घृणित हैं। हमने परमेश्वर की पवित्रता को पहचानने की शक्ति खो दी है: अन्यजातियों के दर्शनशास्त्र में इस शब्द को अपने देवताओं के नैतिक चरित्र को व्यक्त करने के लिये प्रयोग करने का विचार तक नहीं था। परमेश्वर की महिमा की ज्योति को खोकर हमने यह जानने की शक्ति भी खो दी है कि पाप क्या है। और अब हमारे निकट आने में परमेश्वर का पहला काम यह है कि वह हमें यह अनुभव कराए कि जैसे हम हैं वैसे ही हम निकट नहीं आ सकते; कि जो कुछ सबसे अधिक उचित और सबसे अधिक आवश्यक दिखाई देता है, उस सब को सचमुच और बड़ी गम्भीरता से उतार देना, वरन् मृत्यु को सौंप देना होगा। केवल हमारी जूतियाँ ही इस अपवित्र पृथ्वी के सम्पर्क से मैली नहीं हुईं; हमारा मुँह भी ढाँपा जाना और हमारी आँखें बन्द की जानी चाहिए, इस बात के चिन्ह में कि हमारे हृदय की आँखें, हमारी सारी मानवीय बुद्धि और समझ, उस पवित्र को देखने में असमर्थ हैं। व्यक्तिगत पवित्रता की पाठशाला का पहला पाठ यह है कि परमेश्वर की पवित्रता के सामने हम डरें और अपना मुँह छिपाएँ। ‘जो महान और उत्तम है, और जिसका नाम पवित्र है, वह यह कहता है, मैं ऊँचे पर और पवित्रस्थान में निवास करता हूँ, और उसके संग भी रहता हूँ, जो खेदित और नम्र हैं।’ खेदित मन, टूटी हुई आत्मा, भय और काँपना—यही परमेश्वर की पहली माँग है उन लोगों से जो उसकी पवित्रता को देखना चाहते हैं।

मूसा को परमेश्वर की पवित्रता का पहला प्रचारक होना था। मूसा पर परमेश्वर का यह पहला प्रकाशन उस बात का प्रतिरूप और बयाना था कि मसीह में परमेश्वर की पवित्रता हमें पूरी रीति से दी जाएगी। मूसा के होंठों से इस्राएल के लोगों को, और उसकी लेखनी से मसीह की कलीसिया को यह सन्देश मिलना था, ‘पवित्र बनो: मैं पवित्र हूँ: मैं पवित्र करता हूँ।’ उस पवित्र का सन्देशवाहक होने के लिये उसकी तैयारी यहीं हुई, जहाँ उसने अपना मुँह ढाँप लिया, क्योंकि वह परमेश्वर की ओर निहारने से डरता था। मुँह को धूल में रखकर, और न केवल जूतियों को, वरन् उस सब को उतारकर जो संसार और अपने आप और पाप के सम्पर्क में रहा है, प्राण उस आग के निकट आता है जिसमें परमेश्वर वास करता है, और जो जलती तो है, पर भस्म नहीं करती। आह, भला होता कि हर विश्वासी, जो उस पवित्र के रूप में परमेश्वर की गवाही देना चाहता है, इस प्रकार सीखे कि जलती हुई झाड़ी के प्रतिरूप की पूर्ति क्रूस पर चढ़ाया हुआ मसीह है, और यह कि जब हम उसके साथ मरते हैं, तो हम आग का वह बपतिस्मा पाते हैं जो हम में से हर एक में प्रगट करता है कि इसका क्या अर्थ है: वह पवित्र, जलती हुई झाड़ी में वास करता हुआ। केवल इसी रीति से हम सीख सकते हैं कि पवित्र होना क्या है, जैसा वह पवित्र है।

पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।

हे परमपवित्र परमेश्वर! मैंने तुझे देखा है, जो आग में वास करता है। मैंने तेरी वाणी सुनी है, इधर पास मत आ, और अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे। और मेरा प्राण परमेश्वर की ओर, उस पवित्र की ओर, निहारने से डरता रहा है।

फिर भी, हे मेरे परमेश्वर! मुझे तुझे देखना ही है। तूने मुझे अपनी समानता के लिये रचा। तूने सिखाया है कि यह समानता तेरी पवित्रता है: ‘पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।’ हे मेरे परमेश्वर! यदि मैं तुझे, उस पवित्र को, न देख सकूँ, तो मैं कैसे जानूँ कि पवित्र कैसे बनूँ? पवित्र होने के लिये मुझे परमेश्वर की ओर निहारना ही होगा।

मैं तुझे धन्य कहता हूँ कि तूने कँटीली झाड़ी की लपटों में, और शापित वृक्ष की आग में अपने आप को प्रगट किया। मैं उस बड़े दृश्य को देखकर विस्मय और गहरी दीनता में झुकता हूँ: तेरा पुत्र अपने मानव स्वभाव की निर्बलता में, आग में, जलता हुआ पर भस्म न होता हुआ। हे मेरे परमेश्वर! मैंने भय और काँपते हुए एक पापी के रूप में अपने आप को उसके समान मरने के लिये सौंप दिया है। आह, वह आग मुझ में की हर अपवित्र बात को भस्म कर दे! मुझे भी तुझे उस परमेश्वर के रूप में जानने दे जो आग में वास करता है, कि जो तुझ से नहीं है उसे पिघलाए, शुद्ध करके निकाल दे और नाश करे, और जो तेरा अपना है उसे बचाए और अपनी ही पवित्रता में ले ले।

हे पवित्र प्रभु परमेश्वर! मैं इस बड़े भेद के सामने धूल में झुकता हूँ। अपनी पवित्रता मुझ पर प्रगट कर, कि मैं भी पृथ्वी पर उसका गवाह और उसका सन्देशवाहक बनूँ। आमीन।

1. परमेश्वर की आग के रूप में पवित्रता। परमेश्वर की स्तुति हो कि एक ऐसी सामर्थ्य है जो नीच वस्तु और मैल को भस्म कर सकती है, एक ऐसी सामर्थ्य जो उसे बिना छेड़े नहीं छोड़ेगी। ‘झाड़ी जल रही है, पर भस्म नहीं होती’ यह केवल सताव के समय में कलीसिया का आदर्श-वाक्य ही नहीं है; यह परमेश्वर के पवित्र करने के काम में हर प्राण का मूलमंत्र है।

2. एक नया धर्मविज्ञान है, जो केवल परमेश्वर के उस प्रेम की बात करता है जो क्रूस में दिखाई देता है। वह उसकी धार्मिकता की महिमा, और उसके धर्मी न्याय को नहीं देखता। यह पवित्रशास्त्र का परमेश्वर नहीं है। ‘हमारा परमेश्वर भस्म करनेवाली आग है,’ यह नये नियम का धर्मविज्ञान है। ‘भक्ति, और भय सहित, परमेश्वर की आराधना करना,’ नये नियम का धर्म है। पवित्रता में न्याय और दया मिलते हैं।

3. परमेश्वर के भय के रूप में पवित्रता। भय के कारण परमेश्वर के सामने मुँह ढाँपना, देखने या बोलने का साहस न करना,—यह परमेश्वर में विश्राम का आरम्भ है। यह अभी सच्चा विश्राम नहीं है, परन्तु उसके मार्ग पर है। परमेश्वर हमें हर उस बात का गहरा भय दे जो उसे दुःखी या क्रोधित कर सकती है। हम अपने आप से, और उस सब से जो पुराने, दोषी ठहराए हुए स्वभाव का है, गहरा भय रखें, कहीं ऐसा न हो कि वह फिर उठ खड़ा हो। ‘यहोवा के भय की आत्मा’ पवित्रता की आत्मा का पहला प्रगटीकरण है, और पवित्रता के आनन्द के लिये मार्ग तैयार करती है। ‘प्रभु के भय और पवित्र आत्मा की शान्ति में चलना;’ ये मसीही जीवन के दो पक्ष हैं।

4. परमेश्वर की पवित्रता मूसा पर इसलिए प्रगट की गई कि वह उसका सन्देशवाहक बने। आज कलीसिया को किसी बात की इतनी आवश्यकता नहीं जितनी ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की, जो परमेश्वर की पवित्रता की गवाही दे सकें। क्या तुम उनमें से एक बनोगे?

टिप्पणी।

परमेश्वर के भय और पवित्रता के बीच का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ है। कुछ लोग हैं जो बड़ी लगन से पवित्रता की खोज करते हैं, फिर भी उसे कभी ऐसे प्रकाश में प्रगट नहीं करते जो संसार को, या विश्वासियों को भी, आकर्षित करे, क्योंकि उनमें यह तत्व नहीं होता। प्रभु का भय ही वह नम्रता और कोमलता, और आत्म-निर्भरता और आत्म-चेतना से वह छुटकारा उत्पन्न करता है, जो एक पवित्र चरित्र की सच्ची नींव है। परमेश्वर के वचन के वे स्थल जिनमें ये दोनों शब्द एक साथ जुड़े हैं, ध्यान से अध्ययन करने के योग्य हैं। ‘तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपनी स्तुति करनेवालों के भय के योग्य है।’ ‘मैं तेरा भय मानकर तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत् करूँगा।’ ‘हे यहोवा के पवित्र लोगों, उसका भय मानो।’ ‘पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत् करो; हे सारी पृथ्वी के लोगों उसके सामने काँपते रहो!’ ‘वे तेरे महान और भययोग्य नाम का धन्यवाद करें! वह तो पवित्र है।’ ‘यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र परमेश्वर को जानना ही समझ है।’ ‘सेनाओं के यहोवा ही को पवित्र जानना; उसी का डर मानना, और उसी का भय रखना।’ ‘परमेश्वर का भय रखते हुए पवित्रता को सिद्ध करें।’ ‘जैसा तुम्हारा बुलानेवाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी पवित्र बनो; और जबकि तुम हे पिता कहकर उससे प्रार्थना करते हो, तो अपने परदेशी होने का समय भय से बिताओ।’ और इसी प्रकार सारे पवित्रशास्त्र में, मूसा के गीत से लेकर मेम्ने के गीत तक: ‘हे प्रभु, कौन तुझ से न डरेगा? और तेरे नाम की महिमा न करेगा? क्योंकि केवल तू ही पवित्र है।’ यदि हम ऐसे स्थलों की छाप अपने ऊपर पड़ने दें, तो हम और गहराई से अनुभव करेंगे कि परमेश्वर का भय, अर्थात् किसी भी रीति से उसे ठेस पहुँचाने का कोमल भय, और विशेषकर उसकी पवित्र उपस्थिति में ऐसी किसी बात के साथ प्रवेश करने का भय जो मानवीय और शारीरिक है, या जिसमें हमारी अपनी बुद्धि और प्रयत्न का कुछ भी अंश है, उसी पवित्रता का सार है जिसके पीछे हमें लगे रहना है। परमेश्वर का यही भय हमें मूसा के समान परमेश्वर की उपस्थिति में गिरकर अपना मुँह ढाँपने, और उसके अपने पवित्र आत्मा की बाट जोहने को प्रेरित करेगा, कि वह हम में आँखें खोले, और हम में वे विचार और वह आराधना फूँके, जिनके साथ हम उसके, उस पवित्र के, निकट आते हैं। इसी पवित्र भय में प्राण की वह शान्ति उत्पन्न होती है जो उसे परमेश्वर में विश्राम करने की ओर ले जाती है, और उस बात के लिये मार्ग खोलती है जिसे हमने अदन की वाटिका में पवित्रता का भेद पाया था: परमेश्वर का अपना सब्त मनाना, और उस प्राण को पवित्र करना जिसमें वह विश्राम करता है।


पाँचवाँ दिन।


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