अध्याय 4 · 13 मिनट का पठन
पवित्रता और सृष्टि
‘और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।’—उत्पत्ति 2:3।
उत्पत्ति में हमें आरम्भों की पुस्तक मिलती है। उसके पहले तीन अध्यायों के हम विशेष रूप से ऋणी हैं, क्योंकि उनसे उन अनेक प्रश्नों पर दिव्य ज्योति चमकती है जिनका उत्तर मानवीय बुद्धि कभी नहीं ढूँढ़ सकी। पवित्रता की अपनी खोज में भी हम वहीं पहुँचाए जाते हैं। उत्पत्ति की पूरी पुस्तक में पवित्र शब्द केवल एक बार आता है। परन्तु वह एक बार ऐसे प्रसंग में आता है कि उससे हमारे लिये वह गुप्त सोता खुल जाता है जिससे वह सब कुछ बहता है जो बाइबल इस स्वर्गीय आशीष के विषय में हमें सिखाती या देती है। जिस अनमोल शब्द का अर्थ हम पूरी तरह समझना चाहते हैं, और जिस अमूल्य आशीष को हम अपने अधिकार में लेना चाहते हैं, ‘मसीह में पवित्र किए गए,’ उसका पूरा अर्थ परमेश्वर के उस अद्भुत कार्य से आरम्भ होता है जिसका वर्णन यहाँ लिखा है, जिसके द्वारा उसने अपनी सृष्टि का काम समाप्त किया, और यह प्रगट किया कि वह काम कितनी अद्भुत रीति से आगे बढ़ाया और सिद्ध किया जाएगा। जब परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और उसे पवित्र ठहराया, तो उसने उसे बाकी दिनों से ऊपर उठाया, और उसे एक ऐसे काम और अपने ऐसे प्रकाशन के लिये अलग किया जो महिमा में उन सब से बढ़कर था जो उससे पहले हो चुके थे। इस सरल कथन में पवित्रशास्त्र हम पर परमेश्वर का चरित्र उस पवित्र के रूप में प्रगट करता है जो पवित्र करता है; वह रीति भी, जिससे वह पवित्र करता है, अर्थात् भीतर प्रवेश करके और विश्राम करके; और आशीष की वह सामर्थ्य भी, जो परमेश्वर के पवित्र करने के साथ सदा रहती है। इन तीन शिक्षाओं को भली-भाँति सीखना हमारे लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा, क्योंकि इनमें उन सब बातों के मूल सिद्धान्त हैं जो पवित्रता की हमारी खोज में पवित्रशास्त्र हमें सिखाएगा।
1. परमेश्वर ने सब्त के दिन को पवित्र ठहराया। पिछले छः दिनों का मूल शब्द, आकाश और पृथ्वी को पहली बार अस्तित्व में बुलाने से लेकर मनुष्य के बनाए जाने तक, यही था: परमेश्वर ने सृष्टि की। अचानक परमेश्वर का एक नया शब्द और एक नया काम सामने आता है: परमेश्वर ने पवित्र ठहराया। अब सृष्टि से भी ऊँची कोई बात, वह जिसके लिये सृष्टि का अस्तित्व है, प्रगट होनेवाली है; अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर को परमपवित्र परमेश्वर के रूप में जाना जाना है। और जैसे सृष्टि का काम उसकी सामर्थ्य को दिखाता है, चाहे उस सामर्थ्य का नाम भी न लिया जाए, वैसे ही सातवें दिन को उसका पवित्र ठहराना उस पवित्र के रूप में उसके चरित्र को प्रगट करता है। जैसे सर्वशक्तिमत्ता उसके स्वाभाविक गुणों में प्रमुख है, वैसे ही पवित्रता उसके नैतिक गुणों में पहली है। और जैसे केवल वही सृष्टिकर्ता है, वैसे ही केवल वही पवित्र करनेवाला है; पवित्र करना उतना ही सचमुच और केवल उसी का काम है जितना सृष्टि करना। धन्य है परमेश्वर की वह सन्तान जो सचमुच और पूरी रीति से इस बात पर विश्वास करती है!
परमेश्वर ने सब्त के दिन को पवित्र ठहराया। यह शब्द हमें सिखा सकता है कि जब परमेश्वर पवित्र करता है तो वह किस प्रकार का काम करता है। अदन की वाटिका में होनेवाली पवित्रता छुटकारे में मिलनेवाली पवित्रता से मूल रूप से भिन्न नहीं हो सकती। परमेश्वर ने अपने सब कामों को, और उनमें प्रधान मनुष्य को, बहुत ही अच्छा कहा था। फिर भी वे पवित्र नहीं थे। छः दिनों के काम में न कोई अशुद्धता थी, न पाप, फिर भी वह पवित्र नहीं था। मनुष्य को, जो पहले से ही बहुत अच्छा था, पवित्र बनाने के महान काम के लिये सातवें दिन को विशेष रूप से पवित्र ठहराया जाना आवश्यक था। निर्गमन में परमेश्वर स्पष्ट कहता है कि उसने मनुष्य के पवित्र किए जाने को ध्यान में रखकर सब्त के दिन को पवित्र ठहराया। ‘जिससे तुम यह बात जान रखो कि यहोवा हमारा पवित्र करनेवाला है।’ भलाई, निरपराधता, शुद्धता, पाप से रहित होना, यह पवित्रता नहीं है। भलाई सर्वशक्तिमत्ता का काम है, स्वभाव का एक गुण, जैसा परमेश्वर उसे रचता है: पवित्रता उससे असीम रूप से ऊँची बात है। हम परमेश्वर की पवित्रता को उसकी असीम नैतिक सिद्धता कहते हैं; मनुष्य की नैतिक सिद्धता केवल उसकी इच्छा के प्रयोग से ही आ सकती थी, जब वह स्वतंत्रता से परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करे और उसमें बना रहे। केवल इसी रीति से वह पवित्र बन सकता था। परमेश्वर ने सातवें दिन को इस बात की प्रतिज्ञा के रूप में पवित्र ठहराया कि वह मनुष्य को पवित्र करेगा। सातवें दिन से पहले के युगों में, अर्थात् सृष्टि के काल में, परमेश्वर की सामर्थ्य, बुद्धि और भलाई प्रगट हो चुकी थी। आनेवाला युग, अर्थात् सातवें दिन का काल, पवित्रता का युग होना है: परमेश्वर ने सातवें दिन को पवित्र ठहराया।
2. परमेश्वर ने सब्त के दिन को पवित्र ठहराया, क्योंकि उसमें उसने अपने सारे काम से विश्राम लिया। यह विश्राम वास्तविक था। सृष्टि में परमेश्वर मानो अपने आप से बाहर निकल गया था, कि कुछ नया उत्पन्न करे: विश्राम करते हुए वह अब अपने सृष्टि के काम से लौटकर अपने आप में आता है, कि जिस मनुष्य को उसने रचा है उस पर अपने प्रेम में आनन्द करे, और अपने आप को उसे दे। इससे हम पर वह रीति खुलती है जिससे परमेश्वर पवित्र करता है। विश्राम करने और पवित्र करने के बीच का सम्बन्ध कोई मनमाना सम्बन्ध नहीं था; पवित्र करना कोई बाद में सूझी हुई बात नहीं थी; बातों के स्वभाव ही के कारण वह अन्यथा हो ही नहीं सकता था: उसने पवित्र ठहराया क्योंकि उसने उसमें विश्राम लिया; उसने विश्राम करके पवित्र ठहराया। वह अपने पूरे किए हुए काम को, विशेषकर मनुष्य को, देखता है और उसमें आनन्द करता है, और जैसा निर्गमन में लिखा है, उसने ‘अपना जी ठंडा किया,’ और उसके दिव्य विश्राम का यही समय वह समय है जिसमें वह अपने आरम्भ किए हुए काम को सिद्धता तक पहुँचाएगा, और मनुष्य को, जो उसके स्वरूप में रचा गया, सचमुच अपनी सर्वोच्च महिमा, अर्थात् अपनी पवित्रता, का भागी बनाएगा।
जहाँ परमेश्वर प्रसन्नता और प्रेम में विश्राम करता है, वहाँ वह पवित्र करता है। परमेश्वर की उपस्थिति का अपने आप को प्रगट करना, भीतर प्रवेश करना और अधिकार कर लेना, यही सच्ची पवित्रता है। जब हम युगों में आगे बढ़ते हुए यह अध्ययन करेंगे कि पवित्रता क्या है, और उसका प्रकाशन कैसे क्रमशः खुलता गया, तो यह सत्य बार-बार हमारे सामने आएगा। स्वर्ग में परमेश्वर के निवास में, पृथ्वी पर उसके मन्दिर में, उसके प्रिय पुत्र में, और पवित्र आत्मा के द्वारा विश्वासी के व्यक्तित्व में, हर जगह हम पाएँगे कि पवित्रता कोई ऐसी वस्तु नहीं जो मनुष्य है या करता है, परन्तु वह सदा वहीं आती है जहाँ परमेश्वर आता है। इन शब्दों के गहरे से गहरे अर्थ में: जहाँ परमेश्वर विश्राम करने के लिये प्रवेश करता है, वहाँ वह पवित्र करता है। और जब हम नये नियम के उस प्रकाशन का अध्ययन करेंगे जो बताता है कि हमें किस रीति से पवित्र होना है, तो हम पाएँगे कि यह हमारी सबसे पहली और सबसे गहरी शिक्षाओं में से एक है। जब हम परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करते हैं, तभी हम उसकी पवित्रता के भागी बनते हैं। ‘हम जिन्होंने विश्वास किया है, उस विश्राम में प्रवेश करते हैं;’ ‘जिसने उसके विश्राम में प्रवेश किया है, उसने भी परमेश्वर के समान अपने कामों को पूरा करके विश्राम किया है।’ जब प्राण अपने प्रयत्नों से रुक जाता है, और उसमें विश्राम करता है जिसने हमारे लिये सब कुछ पूरा कर दिया है और हम में सब कुछ पूरा करेगा, जब प्राण सच्चे विश्वास के शान्त भरोसे में अपने आप को सौंपकर परमेश्वर में विश्राम करता है, तभी वह जान पाएगा कि सच्ची पवित्रता क्या है। जहाँ प्राण सिद्ध भरोसे की सब्त-सी शान्ति में प्रवेश करता है, वहाँ परमेश्वर अपने सब्त को पवित्र मानने के लिये आता है; और जिस प्राण में वह विश्राम करता है, उसे वह पवित्र करता है। चाहे हम उसके अपने दिन की बात करें, कि ‘उसने उसे पवित्र ठहराया,’ या उसके अपने लोगों की, जो ‘मसीह में पवित्र किए गए,’ पवित्रता का भेद सदा एक ही है: ‘उसने पवित्र ठहराया, क्योंकि उसमें उसने विश्राम लिया।’
3. और फिर हम पढ़ते हैं, ‘आशीष दी और पवित्र ठहराया।’ पहले अध्याय में और उत्पत्ति की पूरी पुस्तक में ‘परमेश्वर ने आशीष दी’ यह शब्द बड़ा अर्थपूर्ण है। ‘फूलो-फलो और बढ़ो’ ही, जैसे आदम के लिये वैसे ही बाद में नूह और अब्राहम के लिये, उसके अर्थ की दिव्य व्याख्या थी। जिस आशीष से परमेश्वर ने आदम, नूह और अब्राहम को आशीष दी, वह फलवन्त होने और बढ़ने की, अर्थात् अपने समान और उत्पन्न करने तथा बढ़ते जाने की सामर्थ्य की आशीष थी। जब परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी, तो उसने उसे अपनी पवित्रता की जीवित सामर्थ्य से ऐसा भर दिया कि उसमें वह पवित्रता बढ़ती जाए और उन लोगों में अपने आप को फिर से उत्पन्न करे जो उसके समान उसके विश्राम में प्रवेश करना और उसे पवित्र मानना चाहते हैं। सातवाँ दिन वही है जिसमें हम अब भी जी रहे हैं। सृष्टि के हर दिन के विषय में, अन्तिम दिन तक, लिखा है, ‘साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवाँ दिन हो गया।’ सातवें दिन का विवरण अभी तक नहीं लिखा गया; हम अभी उसी में जी रहे हैं, जो परमेश्वर का अपना विश्राम, पवित्रता और आशीष का दिन है। उसमें बहुत विशेष रीति से प्रवेश करके, और उसे अपने प्राणी पर आनन्द करने और उसे पवित्र करने में अपने प्रेम की भरपूरी प्रगट करने के समय के रूप में अपने अधिकार में लेकर, उसने उस युग को, जिसमें हम अब जीते हैं, दिव्य और सामर्थी आशीष का युग बना दिया है। और साथ ही उसने हमें यह भी सिखाया है कि वह आशीष क्या है। पवित्रता ही धन्यता है। परमेश्वर के साथ उसके पवित्र विश्राम में संगति ही धन्यता है। और जैसे मसीह में परमेश्वर की सब आशीषों का एक ही सोता है, अर्थात् परमेश्वर की पवित्रता, वैसे ही उन सब का एक ही लक्ष्य है, कि हमें उस पवित्रता का भागी बनाएँ। परमेश्वर ने सृष्टि की, और आशीष दी; सृष्टि की आशीष के साथ। परमेश्वर ने पवित्र ठहराया, और आशीष दी; अपने विश्राम की सब्त वाली आशीष के साथ। सृष्टि की आशीष, अर्थात् भलाई, फलवन्तता और प्रभुता की आशीष, का मुकुट सब्त की आशीष से होना है, अर्थात् परमेश्वर में विश्राम और उसके साथ संगति में पवित्रता।
परमेश्वर का सृष्टि का पूरा किया हुआ काम पाप से बिगड़ गया, और उसके पवित्र विश्राम की आशीष में उसके साथ हमारी संगति कट गई। छुटकारे के पूरे किए हुए काम ने हमारे लिये एक सच्चा विश्राम और परमेश्वर की पवित्रता में एक अधिक निश्चित प्रवेश खोल दिया। जैसे उसने अपने पवित्र दिन में विश्राम किया, वैसे ही अब वह अपने पवित्र पुत्र में विश्राम करता है। उसमें अब हम परमेश्वर के विश्राम में पूरी रीति से प्रवेश कर सकते हैं। ‘मसीह में पवित्र किए गए,’ हम उसी में विश्राम करें। हम विश्राम करें, क्योंकि हम देखते हैं कि जिस अद्भुत रीति से परमेश्वर ने अपनी बड़ी सामर्थ्य से सृष्टि का अपना काम पूरा किया, उसी रीति से वह पवित्रता का अपना काम भी पूरा और सिद्ध करेगा। आओ, हम मसीह में अपने आप को परमेश्वर को सौंप दें, कि जहाँ उसने विश्राम किया वहाँ हम विश्राम करें, उसकी अपनी पवित्रता से पवित्र किए जाएँ, और परमेश्वर की अपनी आशीष से आशीषित हों। सृष्टिकर्ता परमेश्वर के सिंहासन पर अब यह नाम लिखा है: पवित्र करनेवाला परमेश्वर। मानव जाति के इतिहास की देहरी पर असीम प्रतिज्ञा और आशा का यह वचन चमकता है: ‘परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने विश्राम लिया।’
पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।
धन्य प्रभु परमेश्वर! मैं दीनता से आराधना करते हुए तेरे सामने झुकता हूँ। मैं सृष्टिकर्ता परमेश्वर और पवित्र करनेवाले परमेश्वर के रूप में तेरी आराधना करता हूँ। तूने अपने आप को सर्वशक्तिमान परमेश्वर और परमपवित्र परमेश्वर के रूप में प्रगट किया है। मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे सिखा कि मैं तुझे ऐसा ही जानूँ और तुझ पर ऐसा ही भरोसा रखूँ।
मैं दीनता से तुझ से अनुग्रह माँगता हूँ कि उन गहरे आत्मिक सत्यों को सीखूँ और दृढ़ता से थामे रहूँ जो तूने सब्त के दिन को पवित्र ठहराने में प्रगट किए हैं। मनुष्य की सृष्टि में तेरा उद्देश्य यह है कि तू अपनी पवित्रता प्रगट करे, और उसे उसका भागी बनाए। आह, मुझे सिखा कि मैं तुझ पर अपने सृष्टिकर्ता और पवित्र करनेवाले परमेश्वर के रूप में विश्वास करूँ, और अपने सम्पूर्ण मन से यह विश्वास करूँ कि वही सर्वशक्तिमान सामर्थ्य जिसने छठवें दिन की सृष्टि की आशीष दी, हमारे लिये सातवें दिन की पवित्रता की आशीष को भी निश्चित करती है। तेरी इच्छा यह है कि हम पवित्र बनें।
और हे प्रभु, मुझे सिखा कि मैं और अच्छी रीति से समझूँ कि यह आशीष कैसे आती है। जहाँ तू विश्राम करने, अपना जी ठंडा करने और अपने आप को प्रगट करने के लिये प्रवेश करता है, वहीं तू पवित्र करता है। हे मेरे परमेश्वर! मेरा हृदय तेरा विश्राम-स्थान बने। मैं विश्राम भरे विश्वास की शान्ति और भरोसे में तुझ में विश्राम करना चाहता हूँ, यह विश्वास करते हुए कि मुझ में सब कुछ तू ही करता है। तेरे साथ, तेरे प्रेम और तेरी इच्छा के साथ ऐसी संगति ही मेरे लिये पवित्र जीवन का भेद हो। यह मैं अपने प्रभु यीशु के नाम से माँगता हूँ, जिसमें तूने हमें पवित्र किया है। आमीन।
1. सृष्टिकर्ता परमेश्वर ही पवित्र करनेवाला परमेश्वर है। जिस सर्वशक्तिमत्ता ने पहला काम किया, वही दूसरा काम भी करती है। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर भरोसा रख सकता हूँ कि वह मुझे पवित्र करेगा। परमेश्वर पवित्र है: यदि परमेश्वर मेरे लिये सब कुछ है, तो उसकी उपस्थिति ही मेरी पवित्रता होगी।
2. विश्राम का अर्थ है काम से रुकना, फिर कभी काम न करने के लिये नहीं, परन्तु एक नया काम आरम्भ करने के लिये। परमेश्वर विश्राम करता है और तुरन्त उसे पवित्र करने लगता है जिसमें वह विश्राम करता है। उसने अपनी सामर्थ्य के वचन से सृष्टि की; वह अपने प्रेम में विश्राम करता है। सृष्टि मन्दिर का निर्माण थी; पवित्र करना उसमें प्रवेश करना और उसे अपने अधिकार में लेना है। आह, मानव स्वभाव में उसका वह अद्भुत प्रवेश!
3. परमेश्वर केवल उसी में विश्राम करता है जो शान्त और विश्राम में है, और पूरी रीति से उसके अधिकार में है। विश्वास के विश्राम में ही हमें पवित्र करनेवाले परमेश्वर की ओर देखना है; वह भीतर आएगा और विश्राम पाए हुए प्राण में अपना पवित्र सब्त मनाएगा। हम परमेश्वर के विश्राम में विश्राम करते हैं; परमेश्वर हमारे विश्राम में विश्राम करता है।
4. वह परमेश्वर, जो अपने बनाए हुए मनुष्य में विश्राम करता है, और विश्राम करते हुए पवित्र करता है, और पवित्र करते हुए आशीष देता है: यही हमारा परमेश्वर है; उसकी स्तुति और आराधना करो। और उस पर भरोसा रखो कि वह अपना काम करेगा।
5. विश्राम! कैसा सरल शब्द है। परमेश्वर का विश्राम! उस शब्द में जीवन और प्रेम की कैसी अकल्पनीय भरपूरी है। आओ, हम उस पर मनन करें और उसके सामने आराधना करें, जब तक वह हम पर छा न जाए और हम उसमें प्रवेश न करें—परमेश्वर के विश्राम में। विश्राम परमेश्वर का है: केवल वही उसे दे सकता है, हमें अपने विश्राम का भागी बनाकर।
चौथा दिन।
अध्याय 4 पूरा हुआ
पवित्रता और सृष्टि