मसीह में पवित्र
पवित्रता के लिए परमेश्वर का प्रबन्ध

अध्याय 3 · 13 मिनट का पठन

पवित्रता के लिए परमेश्वर का प्रबन्ध

‘उनके नाम जो मसीह यीशु में पवित्र किए गए, और पवित्र होने के लिये बुलाए गए हैं।’—1 कुरिन्थियों 1:2।

‘सब पवित्र लोगों के नाम, जो मसीह यीशु में होकर फिलिप्पी में रहते हैं। हर एक पवित्र जन को जो यीशु मसीह में हैं नमस्कार कहो।’—फिलिप्पियों 1:1, 4:21।

पवित्र! मसीह में! इन दो अभिव्यक्तियों में कदाचित् हमें सारी बाइबल के सबसे अद्भुत शब्द मिलते हैं।

पवित्र! अथाह अर्थवाला वह शब्द, जिसे साराप अपने मुँह ढाँपे हुए पुकारते हैं। पवित्र! वह शब्द जिसमें परमेश्वर की सारी सिद्धताएँ केन्द्रित हैं, और उसकी महिमा जिसका केवल उमड़कर बहना है। पवित्र! वह शब्द जो उस अभिप्राय को प्रकट करता है जिसके साथ परमेश्वर ने अनन्तकाल से मनुष्य के विषय में सोचा, और बताता है कि आनेवाले अनन्तकाल में मनुष्य की सबसे ऊँची महिमा क्या होगी: उसकी पवित्रता का भागी होना!

मसीह में! वह शब्द जिसमें परमेश्वर की सारी बुद्धि और सारा प्रेम प्रकट हुआ है! पिता अपने पुत्र को दे देता है कि वह हमारे साथ एक हो! पुत्र क्रूस पर मरता है कि हमें अपने साथ एक करे! पिता का पवित्र आत्मा हम में वास करता है कि उस एकता को स्थिर करे और बनाए रखे! मसीह में! छुटकारे ने जो कुछ किया है, और वह अकल्पनीय धन्य जीवन जिसमें परमेश्वर की सन्तान को वास करने दिया गया है, उसका कैसा सार है! मसीह में! वह एक पाठ जिसे हमें पृथ्वी पर सीखना है। हमारी सब आवश्यकताओं और प्रार्थनाओं का परमेश्वर का एक ही उत्तर। मसीह में! अनन्त महिमा की जमानत और उसका पहला स्वाद।

इन दोनों शब्दों को मिला देने पर कैसा अर्थ-धन और कैसी आशीष मिलती है: मसीह में पवित्र! यही हमारी पवित्रता के लिये परमेश्वर का प्रबन्ध है, हमारे इस प्रश्न का परमेश्वर का उत्तर कि पवित्र कैसे हों? जब-जब हम यह बुलाहट सुनते हैं, तुम पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ, तो ऐसा लगता है मानो परमेश्वर की पवित्रता और मनुष्य के बीच एक बड़ी खाई है और सदा रहेगी। मसीह में! यही वह पुल है जो उस खाई के पार जाता है; नहीं, बल्कि उसकी भरपूरी ने उस खाई को भर दिया है। मसीह में! परमेश्वर और मनुष्य मिलते हैं; मसीह में! परमेश्वर की पवित्रता ने हमें ढूँढ़ लिया है और हमें अपना बना लिया है; वह मानवीय बन गई है, और सचमुच पूरी रीति से हमारी अपनी बन सकती है। उन हज़ारों प्यासे प्राणों की व्याकुल पुकारों और हृदय की लालसाओं के लिये, जिन्होंने यीशु पर विश्वास तो किया है पर नहीं जानते कि पवित्र कैसे हों, परमेश्वर का उत्तर यह है: तुम मसीह यीशु में पवित्र हो। काश वे कान लगाएँ और विश्वास करें; काश वे इन ईश्वरीय शब्दों को थाम लें और आवश्यकता हो तो हज़ार बार इन्हें दोहराएँ, तो परमेश्वर की ज्योति कैसी चमकेगी, और जब वे इन्हें लौटाकर कहेंगे, तो वह उनके हृदयों को आनन्द और प्रेम से कैसा भर देगी: हाँ, अब मैं इसे देखता हूँ। मसीह में पवित्र! मसीह यीशु में पवित्र किया गया!

जब हम इन अद्भुत शब्दों का अध्ययन करने बैठते हैं, तो आओ, यह स्मरण रखें कि केवल स्वयं परमेश्वर ही हम पर प्रकट कर सकता है कि पवित्रता सचमुच क्या है। आओ, हम अपने ही विचारों से डरें, और अपनी ही बुद्धि को क्रूस पर चढ़ाएँ। आओ, हम अपने आप को सौंप दें कि स्वयं परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य में, जो पवित्र आत्मा के द्वारा हम में काम करती है, उस बात को ग्रहण करें जो मानवीय विचार से अधिक गहरी और अधिक सच्ची है, अर्थात् स्वयं मसीह को अपनी पवित्रता के रूप में। पवित्रता के आत्मा की शिक्षा पर इसी निर्भरता में, आओ, हम बस उसे ग्रहण करने का यत्न करें जो पवित्रशास्त्र हमारे सामने रखता है; जैसे प्राचीनकाल में उस पवित्र का प्रकाशन बहुत धीमा और क्रमिक था, वैसे ही हम भी धीरज के साथ वचन में से होकर जानेवाले उस भोर-प्रकाश के मार्ग पर कदम-कदम चलने में सन्तुष्ट रहें; उसकी चमक दोपहर तक बढ़ती जाएगी।

पहले हमें पुराने नियम में पवित्र शब्द का अध्ययन करना होगा। इस्राएल में, जो पवित्र प्रजा था और हमारा प्रतिरूप था जो अब मसीह में पवित्र हैं, हम देखेंगे कि परमेश्वर ने कैसे भरपूर प्रतीकों के द्वारा प्रजा की बनावट ही में यह कुछ समझ बिठाने का यत्न किया कि वह उन्हें कैसा बनाना चाहता है। व्यवस्था में हम देखेंगे कि पवित्र उस छुटकारे का महान मूल-शब्द है जिसकी सेवा और तैयारी के लिये व्यवस्था दी गई थी। भविष्यद्वक्ताओं में हम सुनेंगे कि परमेश्वर की पवित्रता कैसे उस स्रोत के रूप में प्रकट होती है जिससे आनेवाला छुटकारा फूट निकलनेवाला था: वे पवित्रता की उतनी नहीं जितनी उस पवित्र की बात करते हैं, जो छुड़ानेवाले प्रेम और उद्धार करनेवाली धार्मिकता में अपने आप को अपनी प्रजा के परमेश्वर के रूप में प्रकट करनेवाला था।

और जब उस शब्द का अर्थ कुछ खुल जाएगा, और पुराने नियम में उस आशीष की गहरी आवश्यकता प्रकट हो जाएगी, तब हम नये नियम में आएँगे, यह जानने के लिये कि वह आवश्यकता कैसे पूरी हुई। परमेश्वर के पवित्र जन मसीह में ईश्वरीय पवित्रता मानवीय जीवन और मानवीय स्वभाव में पाई जाएगी; एक सच्ची मानवीय इच्छा, जो सिद्ध की जा रही है और आज्ञाकारिता के द्वारा बढ़ते-बढ़ते परमेश्वर की सारी पवित्र इच्छा के साथ पूर्ण एकता में पहुँचती है। क्रूस पर अपने आप को बलिदान करने में उस पवित्र स्वभाव ने अपने आप को मृत्यु के लिये सौंप दिया, ताकि गेहूँ के दाने के समान वह मृत्यु के द्वारा फिर जी उठे और हम में अपने आप को फिर उत्पन्न करे। सिंहासन से परमेश्वर की पवित्रता के आत्मा के दिए जाने में, जो उस अनदेखे मसीह का प्रतिनिधित्व करता, उसे प्रकट करता और उसे हम तक पहुँचाता है, मसीह का पवित्र जीवन उतरता है और अपनी प्रजा को अपने अधिकार में ले लेता है, और वे उसके साथ एक हो जाते हैं। जैसे पुराने नियम के पास पवित्र शब्द से ऊँचा कोई शब्द नहीं था, वैसे ही नये नियम के पास इस शब्द, मसीह में, से गहरा कोई शब्द नहीं। उसमें होना, उसमें बने रहना, उसमें जड़ पकड़ना, उसमें और सब बातों में उसकी ओर बढ़ते जाना—ये वे ईश्वरीय अभिव्यक्तियाँ हैं जिनमें हमारे और हमारे उद्धारकर्ता के बीच की अद्भुत और पूर्ण एकता को उतना निकट लाया गया है जितना मानवीय भाषा ला सकती है।

और जब पुराना और नया नियम दोनों अपना-अपना सन्देश दे चुकते हैं—एक यह सिखाकर कि पवित्र का क्या अर्थ है, और दूसरा यह कि मसीह में का क्या अर्थ है—तब परमेश्वर के उस वचन में, जो इन दोनों को जोड़ता है, हमें उस महान छुटकारे का सबसे पूर्ण सार मिलता है जिसका प्रबन्ध परमेश्वर के प्रेम ने किया है। उस पवित्रता की अनन्त निश्चितता, उसकी अद्भुत पर्याप्तता, उसकी असीम प्रभावशीलता, जो परमेश्वर ने अपने पुत्र में हमारे लिये तैयार की है, सब इस धन्य वचन में प्रकट हैं: मसीह में पवित्र।

‘मसीह यीशु में पवित्र लोग!’ हे प्रिय संगी विश्वासियो, पवित्रशास्त्र में, पवित्र आत्मा की भाषा में, हमारा यही नाम है। यह कि हम मसीह में पवित्र हैं, केवल सिद्धान्त का कोई कथन नहीं; यह कोई गहरी धर्मवैज्ञानिक चर्चा नहीं जिसके लिये हमें बुलाया जा रहा है; परन्तु परमेश्वर के प्रेमी हृदय की गहराइयों में से एक वाणी आती है जो इस रीति से उसकी प्रिय सन्तानों को सम्बोधित करती है। यह वह नाम है जिससे पिता अपनी सन्तानों को पुकारता है। वह नाम हमें बताता है कि हमारे पवित्र होने के लिये परमेश्वर ने क्या प्रबन्ध किया है। यह उसका प्रकाशन है जो परमेश्वर ने हमें दिया है, और जो हम पहले ही हैं; उसका भी जो परमेश्वर हम में करने की प्रतीक्षा में है, और जो व्यक्तिगत, व्यावहारिक अधिकार के रूप में हमारा हो सकता है। वह नाम, जब धन्यवाद के साथ ग्रहण किया जाए, आनन्द के साथ माना जाए, और भरोसे के साथ उसकी दुहाई दी जाए, तो उस पवित्रता तक पहुँचने की, जिसके लिये हम बुलाए गए हैं, जमानत और सामर्थ्य होगा।

और इस प्रकार हम पाएँगे कि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, हमारा सारा अध्ययन और परमेश्वर की सारी शिक्षा तीन बड़े पाठों में समा जाएगी। पहला एक प्रकाशन है, ‘मैं पवित्र हूँ;’ दूसरा एक आज्ञा, ‘पवित्र बनो;’ तीसरा एक वरदान, जो उन दोनों के बीच की कड़ी है, ‘तुम मसीह में पवित्र हो।’

पहले प्रकाशन आता है, ‘मैं पवित्र हूँ।’ हमारा अध्ययन घुटने टेककर, आराधना और गहरी दीनता की आत्मा में होना चाहिए। यदि हमें जानना है कि पवित्र क्या है, तो परमेश्वर को अपने आप को हम पर प्रकट करना होगा। हमारे स्वभाव की, और जो कुछ स्वभाव से है उस सब की, गहरी अपवित्रता हमें दिखाई जानी चाहिए; जब उस पवित्र ने मूसा और यशायाह पर अपने आप को प्रकट किया, तब उनके समान हमें भी डरना और काँपना होगा, और मानना होगा कि आग से शुद्ध किए बिना हम उस प्रकाशन या उस संगति के लिये कितने पूरी रीति से अयोग्य हैं। परमेश्वर को जानने में अपनी बुद्धि या समझ की पूरी असमर्थता के बोध में, हमारे प्राणों को पश्चाताप के साथ, अपने आप से और अपनी सामर्थ्य या प्रयासों से टूटकर, अपने आप को परमेश्वर के आत्मा, पवित्रता के आत्मा, को सौंप देना होगा, कि वह परमेश्वर को उस पवित्र के रूप में प्रकट करे। और जैसे-जैसे हम उसे उसकी असीम धार्मिकता में, पाप की हर बात के विरुद्ध उसकी धधकती हुई जलन में, और पापी को उसके पाप से छुड़ाने और उसे अपनी सिद्धता तक पहुँचाने वाले उसके असीम, आत्म-बलिदानी प्रेम में जानने लगेंगे, वैसे-वैसे हम इस महिमामय परमेश्वर पर अचम्भा करना और उसकी आराधना करना सीखेंगे, उससे अपनी भयानक असमानता को अनुभव करना और उस पर विलाप करना सीखेंगे, और इस पवित्रता की ईश्वरीय सुन्दरता और धन्यता में कुछ भाग पाने के लिये लालसा करना और दुहाई देना सीखेंगे।

और तब नये अर्थ के साथ यह आज्ञा आएगी, ‘पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।’ आह, हे मेरे भाइयो! तुम जो अपने परमेश्वर की आज्ञाओं को मानने का दावा करते हो, इस सर्वश्रेष्ठ और सर्वसमावेशी आज्ञा को अपने हृदय और जीवन में वह पहला स्थान अवश्य दो जिसका वह दावा करती है। परमेश्वर की पवित्रता की समानता में अवश्य पवित्र बनो। जैसा वह पवित्र है, वैसे ही अवश्य पवित्र बनो। और यदि तुम पाओ कि जितना अधिक तुम मनन और अध्ययन करते हो, उतना ही कम तुम इस असीम पवित्रता को पकड़ पाते हो; कि जितना अधिक तुम किसी क्षण में उसे पकड़ते हो, उतना ही अधिक तुम ऐसी ईश्वरीय पवित्रता से निराश हो जाते हो; तो स्मरण रखो कि ऐसा टूट जाना और ऐसी निराशा ठीक वही है जिसे उत्पन्न करने के लिये यह आज्ञा दी गई थी। अपनी भलाई के समान अपनी बुद्धि से भी हाथ खींचना सीखो; मन की दीनता में निकट आओ, कि वह पवित्र तुम्हें दिखाए कि जिस पवित्रता की वह माँग करता है, वह मानवीय ज्ञान या मानवीय सामर्थ्य से कितनी पूरी रीति से ऊपर है; जो प्राण अपने आप से हाथ खींच लेता है और शरीर पर भरोसा नहीं रखता, उसे वह वह पवित्रता दिखाएगा और देगा जिसके लिये वह हमें बुलाता है।

ऐसे ही लोगों के लिये मसीह में पवित्रता का महान वरदान समझ में आने योग्य और ग्रहण करने योग्य बनता है। मसीह परमेश्वर की पवित्रता को मानवीय चाल-चलन और व्यवहार में दिखाकर उसे निकट ले आता है। वह उसके और हमारे बीच, परमेश्वर और हमारे बीच, की रुकावट को हटाकर उसे निकट ले आता है। वह उसे निकट ले आता है, क्योंकि वह हमें अपने साथ एक कर देता है। ‘मसीह में पवित्र:’ हमारी पवित्रता एक ईश्वरीय दान है, जो हमारे लिये सुरक्षित रखा गया है, हमें दिया जाता है, और हम में प्रबल रीति से काम करता है, क्योंकि हम उसमें हैं। ‘मसीह में!’ आह, वह अद्भुत में! हमारा जीवन ही मसीह के जीवन में जड़ पकड़े हुए है। पिता का वह पवित्र पुत्र और सेवक, पृथ्वी पर अपने प्रेम और आज्ञाकारिता के जीवन में सुन्दर, हमारे लिये अपने आप को पवित्र करता हुआ—मसीह का वही जीवन वह भूमि है जिसमें मैं रोपा गया हूँ और जड़ पकड़े हुए हूँ, वह मिट्टी जिससे मैं अपने पोषण के रूप में उसका हर एक गुण और उसका स्वभाव ही खींचता हूँ। वह शब्द प्रकाशन, ‘मैं पवित्र हूँ,’ और आज्ञा, ‘पवित्र बनो, जैसा मैं हूँ,’ दोनों पर कैसा प्रकाश डालता है, और उन्हें एक में बाँध देता है! मसीह में मैं देखता हूँ कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है, और मेरी पवित्रता क्या है। उसमें दोनों एक हैं, और दोनों मेरी हैं। उसमें मैं पवित्र हूँ; उसमें बना रहकर और बढ़ते हुए, मैं अपने सारे चाल-चलन में पवित्र हो सकता हूँ, जैसा परमेश्वर पवित्र है।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

हे परमपवित्र परमेश्वर! हम तुझ से विनती करते हैं, अपनी सन्तानों पर प्रकट कर कि इसका क्या अर्थ है कि तूने उन्हें न केवल पवित्रता के लिये बुलाया है, परन्तु उन्हें इसी नाम से पुकारा भी है, ‘मसीह यीशु में पवित्र लोग।’ काश तेरी हर एक सन्तान जाने कि वह यह नाम धारण करती है, जाने कि इसका अर्थ क्या है, और इसमें कैसी सामर्थ्य है कि वह उसे वैसा ही बना दे जैसा यह उसे पुकारता है। हे पवित्र प्रभु परमेश्वर! काश तेरे आगमन का समय शीघ्र आए, और पृथ्वी पर तेरी हर एक सन्तान एक पवित्र जन के रूप में पहचानी जाए!

इसी उद्देश्य से हम तुझ से प्रार्थना करते हैं कि अपने पवित्र लोगों पर प्रकट कर कि तेरी पवित्रता क्या है। हमें आराधना करना और तब तक बाट जोहना सिखा जब तक तू ईश्वरीय सामर्थ्य के साथ हमारे प्राणों से अपना यह वचन न कह दे, ‘मैं पवित्र हूँ।’ काश यह हमें खोज निकाले और हमारी अपवित्रता का हमें कायल करे!

और हम तुझ से विनती करते हैं, हम पर प्रकट कर कि जितना पवित्र तू है, जो भस्म करनेवाली आग है, उतनी ही पवित्र तेरी आज्ञा है, अपने इस दृढ़ और अटल अभिप्राय में कि हमें पवित्र बनाए। हे परमेश्वर! तेरी वाणी हमारे अस्तित्व की गहराई में ऐसी सामर्थ्य के साथ गूँजे जिससे बचने का कोई मार्ग न हो: पवित्र बनो, पवित्र बनो।

और इस प्रकार, एक ओर तेरी असीम पवित्रता और दूसरी ओर हमारी अपवित्रता के बीच, हम विवश किए जाएँ और खींचे भी जाएँ कि मसीह को अपनी पवित्रता के रूप में ग्रहण करें, और अपने जीवन और अपनी सामर्थ्य के रूप में उसमें बने रहें, कि वैसे बनें जैसा तू हमें बनाना चाहता है—‘मसीह यीशु में पवित्र।’

हे पिता! तेरा आत्मा इस बहुमूल्य वचन को हमारे भीतर जीवन और सत्य बना दे। आमीन।

1. तुम एक ईश्वरीय भेद के अध्ययन में नये सिरे से प्रवेश कर रहे हो। ‘अपनी समझ का सहारा न लेना;’ सत्य के आत्मा की शिक्षा की बाट जोहो।

2. मसीह में। एक टीकाकार कहता है, ‘यह वाक्यांश दो नैतिक तथ्यों को प्रकट करता है—पहला, विश्वास का वह कार्य जिसके द्वारा मनुष्य मसीह को थाम लेता है; दूसरा, उसके साथ जीवन की वह सहभागिता जो इसी विश्वास के द्वारा स्थापित होती है।’ एक और तथ्य भी है, जो सबसे बड़ा है: कि ईश्वरीय सामर्थ्य के एक कार्य के द्वारा ही मैं मसीह में हूँ और उसमें रखा जाता हूँ। मैं इसी को अनुभव करना चाहता हूँ: यीशु में मेरी स्थिति का ईश्वरीय होना।

3. सत्य के दोनों पहलुओं को थाम लो। मसीह में एक ईश्वरीय पवित्रता से तुम पवित्र हो। उसी के विश्वास में तुम्हें पवित्र बनना है, एक मानवीय पवित्रता से पवित्र होते जाना है—अर्थात् वह ईश्वरीय पवित्रता जो एक मानवीय जीवन के सारे चाल-चलन में प्रकट हो।

4. यह मसीह एक जीवित व्यक्ति है, एक प्रेमी उद्धारकर्ता: वह पूरा अधिकार पाने और तुम में सारा काम करने में कैसा आनन्दित होगा! जैसे-जैसे हम आगे बढ़ें, इस बात को निरन्तर थामे रहो: तुम्हें मसीह पर, उसके प्रेम और उसकी सामर्थ्य पर, यह अधिकार है कि वह तुम्हें पवित्र बनाए। उसके छुड़ाए हुए होने के नाते, तुम इस क्षण, चाहे जो भी हो और जहाँ भी हो, उसमें हो। उसकी पवित्र उपस्थिति और उसका प्रेम तुम्हारे चारों ओर है। तुम उसमें हो, उस कोमल प्रेम के घेरे में, जो सदा अपनी पवित्र उपस्थिति से तुम्हें घेरे रहता है। उस उपस्थिति में, जब वह ग्रहण की जाए और अनुभव की जाए, तुम्हारी पवित्रता है।


तीसरा दिन।


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