मसीह में पवित्र
पवित्रता और स्वर्ग

अध्याय 32 · 14 मिनट का पठन

पवित्रता और स्वर्ग

‘तो जबकि ये सब वस्तुएँ, इस रीति से पिघलनेवाली हैं, तो तुम्हें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए?’—2 पतरस 3:11।

‘उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।’—इब्रानियों 12:14।

‘जो पवित्र है, वह पवित्र बना रहे…. प्रभु यीशु का अनुग्रह पवित्र लोगों के साथ रहे। आमीन।’—प्रकाशितवाक्य 22:11, 21।

हे मेरे भाई, हम परमेश्वर को देखने के मार्ग पर हैं। हमें उस पवित्र से आमने-सामने मिलने का निमंत्रण मिला है। पवित्रता का वह अनन्त भेद, अदृश्य परमेश्वर की वह महिमा, जिसके सामने साराप अपने मुँह ढाँपते हैं, हमारे सामने से परदा हटाकर खोली जानी है, हम पर प्रगट की जानी है। और वह भी किसी ऐसी वस्तु के रूप में नहीं जिसे हम केवल निहारें और जिसका अध्ययन करें। वरन् हम उस तीन बार पवित्र को, स्वयं जीवते परमेश्वर को, देखेंगे। परमेश्वर, वह पवित्र, हम पर अपने आप को प्रगट करेगा: हम परमेश्वर को देखेंगे। अहा, कैसा असीम अनुग्रह, कैसी अकल्पनीय धन्यता! हम परमेश्वर को देखेंगे।


हम परमेश्वर को, उस पवित्र को, देखेंगे। और यहाँ पवित्र जीवन की पाठशाला में हमारी सारी शिक्षा केवल उसी भेंट और उसी दर्शन की तैयारी है। ‘धन्य हैं वे, जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।’ ‘उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।’ जब से परमेश्वर ने इस्राएल से कहा, ‘पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ,’ तब से पवित्रता ही परमेश्वर और उसके लोगों के बीच मिलने का एकमात्र स्थान प्रगट हुई। पवित्र होना ही वह साझी भूमि थी जिस पर उन्हें उसके साथ खड़े होना था; वह एक गुण जिसमें उन्हें परमेश्वर के समान होना था; वह एक बात जो उन्हें उस महिमामय समय के लिये तैयार करनेवाली थी, जब उसे उन्हें दूर रखने की फिर आवश्यकता न रहती, वरन् वह उन्हें अपनी महिमा की पूरी संगति में ग्रहण कर लेता, कि उनमें यह वचन पूरा हो: ‘जो पवित्र है, वह और भी पवित्र किया जाए।’

अपनी दूसरी पत्री में पतरस विश्वासियों को स्मरण दिलाता है कि प्रभु के दिन के आने से पहले और उसके साथ-साथ सबसे भयानक प्रलय होगा—आकाश और पृथ्वी का पिघल जाना। इसी बात को लेकर वह उनसे आग्रह करता है कि वे यत्न करें कि उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरें। और वह उनसे कहता है कि परमेश्वर के उस दिन का आना कैसा होगा और अपने साथ क्या कुछ लाएगा, इसके गहरे बोध के अधीन वे सोचें और कहें कि जो ऐसी बातों की आस देखते हैं, उनका जीवन कैसा होना चाहिए: ‘तुम्हें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए?’ पवित्रता ही उस जीवन का एकमात्र, उसका सर्वव्यापी लक्षण होना चाहिए। पवित्रता के लिए परमेश्वर की बुलाहट पर अपने मनन के अन्त में, हम पतरस का यह प्रश्न ले सकते हैं, और परमेश्वर ने अपनी पवित्रता के विषय में जो कुछ प्रगट किया है, और जो कुछ अभी प्रगट होना बाकी है, उस सब के प्रकाश में अपने आप से पूछ सकते हैं, ‘हमें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए?’

पहले इस प्रश्न का अर्थ देखो। मूल यूनानी में चाल चलन और भक्ति, ये दोनों शब्द बहुवचन में हैं। एलफ़र्ड कहता है, ‘पवित्र चाल-चलनों और भक्तियों में; ये बहुवचन पवित्र चाल-चलन और भक्ति को उसके सब रूपों और उदाहरणों में सूचित करते हैं।’ पतरस ऐसे पवित्र जीवन के लिये आग्रह करता है जो सारे मनुष्य में व्याप्त हो: मनुष्यों के प्रति हमारे चाल-चलन, और परमेश्वर के प्रति हमारी भक्ति। सच्ची पवित्रता इससे कम किसी बात में नहीं मिल सकती। पवित्रता ही हमारे मसीही जीवन का एकमात्र, सर्वव्यापी लक्षण होना चाहिए। परमेश्वर में हमने देखा है कि पवित्रता उसका केन्द्रीय गुण है, ईश्वरीय सिद्धता की सर्वसमावेशी अभिव्यक्ति, सब गुणों का गुण, वह सर्वव्यापी विशेषण जिसके द्वारा स्वयं वह, छुड़ानेवाले और पिता के रूप में, और उसका पुत्र और उसका आत्मा, उसका दिन, उसका भवन, उसकी व्यवस्था, उसके सेवक, उसकी प्रजा, उसका नाम, चिन्हित किए और पहचाने जाते हैं। सदा और हर बात में, न्याय में भी और दया में भी, अपने महिमान्वित होने में और अपने दीन होकर झुकने में, अपने छिपे रहने में और अपने प्रगट होने में, सदा और हर बात में, परमेश्वर वह पवित्र है। और वचन हमें सिखाना चाहता है कि पवित्रता का राज्य, यदि उसे सच्चा और परमेश्वर को भानेवाला होना है, तो सर्वोच्च होना चाहिए, सारे पवित्र चाल चलन और भक्ति में होना चाहिए। दिन का कोई क्षण ऐसा न हो, जीवन का कोई सम्बन्ध ऐसा न हो; बाहरी आचरण में कुछ भी ऐसा न हो, न मन की सबसे भीतरी गहराइयों में; हमारी कोई भी वस्तु ऐसी न हो, चाहे आराधना में हो या कारोबार में, जो पवित्र न हो। यीशु की पवित्रता, वह पवित्रता जो आत्मा के अभिषेक से आती है, सब कुछ पर छा जाए और सब में व्याप्त हो। यदि हमें पवित्र होना है, तो कुछ भी, कुछ भी बाहर न छोड़ा जाए; वह वैसा ही हो जैसा पतरस ने परमेश्वर की बुलाहट के विषय में बोलते हुए कहा था—अपने सारे चाल-चलन में पवित्र; वह वैसा ही हो जैसा वह यहाँ कहता है—सारे ‘पवित्र चाल चलन और भक्ति में।’ पवित्र आत्मा की अर्थपूर्ण भाषा में कहें तो: हर एक काम ‘जैसा कि पवित्र लोगों को चाहिए,’ ‘जैसा पवित्र लोगों के योग्य है’ वैसा ही किया जाए (रोमियों 16:2; इफिसियों 5:3)।

इस प्रश्न का बल भी देखो। पतरस कहता है, ‘इसलिए, हे प्रियों, जबकि तुम इन बातों की आस देखते हो।’ हाँ, आओ हम सोचें कि इसका अर्थ क्या है। हम प्रकाशन के पूरे क्रम में, आरम्भ से अब तक, उस अद्भुत अनुग्रह और धीरज का अध्ययन करते आए हैं जिसके साथ परमेश्वर ने अपनी पवित्रता को प्रगट किया है और मनुष्यों को उसका सहभागी बनाया है, और यह सब उस बात की तैयारी में जो आनेवाली है। हमने परमेश्वर को, उस पवित्र को, हमें बुलाते, हमसे विनती करते, हमें आज्ञा देते सुना है कि हम पवित्र बनें, जैसा वह पवित्र है। और हम आशा रखते हैं कि उससे मिलेंगे, और अनन्त काल तक उसकी ज्योति में वास करेंगे, वैसे ही पवित्र जैसा वह पवित्र है। यह कोई स्वप्न नहीं; यह एक जीवित सच्चाई है; हम उसकी बाट जोह रहे हैं, उस एकमात्र बात के रूप में जो जीवन को जीने योग्य बनाती है। हम उस प्रेम की बाट जोह रहे हैं जो हमारा स्वागत करेगा, जब हम बालकों के से प्रेम के भरोसे के साथ उसके पवित्र जन होकर आएँगे और पुकारेंगे, हे पवित्र पिता!


हमने यीशु को, परमेश्वर के पवित्र जन को, जो हमारी पवित्रता है, जानना सीख लिया है। हम दिन प्रतिदिन उसमें जी रहे हैं, उन लोगों के समान जो मसीह यीशु में पवित्र हैं। हम निरन्तर उसकी पवित्रता में से लेते रहते हैं। हम परमेश्वर की उस इच्छा पर चल रहे हैं जिसे उसने पूरा किया, और जिसे पूरा करने की सामर्थ्य वह हमें देता है। और हम बड़े आनन्द के साथ उससे मिलने की बाट जोह रहे हैं, ‘जब वह अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने, और सब विश्वास करनेवालों में आश्चर्य का कारण होने को आएगा।’ हमारे भीतर पवित्र आत्मा है, मसीह में परमेश्वर की पवित्रता, जो हमारे भीतर घर करने को उतर आई है, हमारी विरासत के बयाने के रूप में। वह, पवित्रता का आत्मा, गुप्त रूप से भीतर ही भीतर हमारा रूप बदल रहा है, हमारी आत्मा, प्राण और देह को पवित्र कर रहा है, कि वे उसके आने पर निर्दोष ठहरें, और हमें ज्योति में पवित्र लोगों की विरासत के योग्य बना रहा है। हम उस समय की बाट जोह रहे हैं जब वह अपना काम पूरा कर चुकेगा, जब मसीह की देह सिद्ध की जाएगी, और दुल्हिन, जो अपने भीतर के आत्मा के जीवन और महिमा से भरी और उमड़ती हुई होगी, उसके साथ उसके सिंहासन पर बैठाई जाएगी, जैसे वह भी अपने पिता के साथ उसके सिंहासन पर बैठ गया। हम आशा रखते हैं कि अनन्त काल तक उस तीन बार पवित्र के भेद की आराधना और वन्दना करेंगे। यहाँ भी यह बात हमारे प्राणों को थरथराते आनन्द और विस्मय से भर देती है: जब पवित्र करने का परमेश्वर का काम पूरा हो जाएगा, तब हम कैसे उस गीत में सम्मिलित होंगे, ‘पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान, जो था, और जो है, और जो आनेवाला है!’

इस सब की तैयारी में सबसे अद्भुत घटनाएँ घटनेवाली हैं। स्वयं प्रभु यीशु प्रगट होगा, पाप और संसार की शक्ति नष्ट की जाएगी; वस्तुओं की यह दृश्य व्यवस्था तोड़ दी जाएगी; आत्मा की सामर्थ्य सारी सृष्टि में जयवन्त होगी; एक नया आकाश और नई पृथ्वी होगी, जिनमें धार्मिकता वास करेगी। और तब उस तीन बार पवित्र की संगति में पवित्रता सदा बढ़ती हुई धन्यता और महिमा में खुलती जाएगी: ‘जो पवित्र है, वह और भी पवित्र होता जाए।’ निश्चय केवल इतना ही आवश्यक है कि यह प्रश्न सामने रखा जाए, और हर एक विश्वासी उसके बल को अनुभव करेगा और स्वीकार करेगा: ‘इसलिए, हे प्रियों, जबकि तुम इन बातों की आस देखते हो, तो तुम्हें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए?’

और अब इस प्रश्न की आवश्यकता और उसका लक्ष्य देखो। ‘तुम्हें कैसे मनुष्य होना चाहिए?’ परन्तु क्या ऐसे प्रश्न की आवश्यकता है? क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर के पवित्र जन, जो मसीह यीशु में पवित्र किए गए हैं, जिनके साथ पवित्रता का आत्मा स्वयं वास करता है, जो उस पवित्र से उसकी महिमा और प्रेम में मिलने के मार्ग पर हैं—क्या यह हो सकता है कि उन्हें इस प्रश्न की आवश्यकता हो? हाय! हाय! पतरस के समय में ऐसा ही था; और हमारे दिनों में भी बहुत अधिक ऐसा ही है। हाय! कितने ही मसीही हैं जिनके लिये पवित्र शब्द ही, यद्यपि यह वह नाम है जिससे पिता अपने नये नियम में अपनी सन्तानों को किसी भी और नाम से बढ़कर पुकारना पसन्द करता है, अनोखा और समझ से परे है। और फिर, हाय! कितने ही मसीही ऐसे हैं जिनके लिये, जब यह शब्द सुनाई देता है, उसमें बहुत थोड़ा आकर्षण होता है, क्योंकि उन्हें यह अब तक कभी ऐसे जीवन के रूप में दिखाया ही नहीं गया जो सचमुच सम्भव है, और अकथनीय रूप से धन्य है। और फिर, हाय! कितने ऐसे नहीं हैं, स्वामी की सेवा में लगे कार्यकर्ता भी, जिनके लिये सब बातों में ‘पवित्र चाल चलन और भक्ति’ अब तक एक भेद और एक बोझ है, क्योंकि वे अब तक सब कुछ—अपनी इच्छा और अपना काम दोनों—त्याग देने को राज़ी नहीं हुए हैं, कि वह पवित्र उसे ले ले और अपने पवित्र आत्मा से भर दे। और एक बार फिर, हाय! जब उन लोगों से भी यह पुकार उठती है जो सचमुच पवित्र जीवन की सामर्थ्य को जानते हैं, और वे अपनी अविश्वासयोग्यता और अविश्वास पर विलाप करते हैं, क्योंकि वे देखते हैं कि पवित्र जीवन में उनका प्रवेश कितना अधिक समृद्ध हो सकता था, और वह आशीष कितनी अधिक भरपूर हो सकती थी जिसे दूसरों तक पहुँचाने में वे अब भी अपने आप को इतना निर्बल पाते हैं। अहा, इस प्रश्न की आवश्यकता है! क्या हम में से हर एक इसे न लेगा, और इसे थामे न रखेगा, और उसी पवित्र आत्मा के द्वारा जिसके द्वारा यह आया इसका उत्तर न देगा, और फिर इसे अपने भाइयों तक न पहुँचाएगा, कि हम और वे विश्वास में एक दूसरे की सहायता करें, और आनन्द और आशा में जीएँ, कि वह उत्तर दें जो हमारा परमेश्वर चाहता है?

‘जबकि ये सब वस्तुएँ, इस रीति से पिघलनेवाली हैं, तो हमें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए?’ हे भाइयो! समय थोड़ा है। संसार मिटता जा रहा है। अन्यजाति नाश हो रहे हैं। मसीही सो रहे हैं। शैतान सक्रिय और बलवन्त है। परमेश्वर के पवित्र जन ही कलीसिया और संसार की आशा हैं। उन्हीं को उनका प्रभु काम में ला सकता है। ‘हम पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होंगे!’ क्या हम ऐसे बनने का यत्न न करेंगे जैसा पिता आज्ञा देता है, ‘पवित्र, जैसा वह पवित्र है’? क्या हम अपने आप को फिर से और पूरे मन से उसे सौंप न देंगे जो हमारी पवित्रता है, और उसके धन्य आत्मा को, कि वह हमें सब चाल-चलनों और भक्तियों में पवित्र बनाए? अहा! क्या हम अपने प्रभु यीशु के प्रेम का विचार करके, आनेवाली महिमा का विचार करके, आनेवाले अन्त को, और कलीसिया और संसार की आवश्यकता को देखते हुए, अपने आप को इसलिये न सौंप देंगे कि जैसा वह पवित्र है वैसे ही हम भी पवित्र हों, कि हमें यह सामर्थ्य मिले कि जिस किसी विश्वासी से हम मिलें उसे इस सन्देश से आशीष दें कि परमेश्वर क्या करेगा, और कि उनके साथ मिलकर हम इस नाश होते संसार के लिये ज्योति और आशीष बनें?

मैं परमेश्वर की धन्य पुस्तक के अन्तिम शब्दों के साथ समाप्त करता हूँ, ‘जो इन बातों की गवाही देता है, वह यह कहता है, हाँ, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ। आमीन। हे प्रभु यीशु आ! प्रभु यीशु का अनुग्रह पवित्र लोगों के साथ रहे। आमीन।’

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

हे परमपवित्र परमेश्वर! तूने हमें पवित्र होने के लिये बुलाया है; हमने तेरा शब्द सुना है जो पूछता है, पवित्र चाल चलन और भक्ति में हमें कैसे मनुष्य होना चाहिए? हम अपने सारे प्राण से गहरे पश्चाताप और दीनता के साथ उत्तर देते हैं: हे पवित्र पिता! जैसे हम अब तक रहे हैं, हमें उससे कितना भिन्न होना चाहिए। विश्वास और प्रेम में, उत्साह और भक्ति में, मसीह के समान दीनता और पवित्रता में, हे पिता! हम तेरे सामने और संसार के सामने वैसे नहीं रहे जैसे हमें होना चाहिए था, जैसे हम हो सकते थे। हे पवित्र पिता! अब हम उन सब के लिये प्रार्थना करते हैं जो इस प्रार्थना में हमारे साथ सम्मिलित हैं, और तुझसे विनती करते हैं कि हम में और तेरी सारी कलीसिया में सच्ची पवित्रता का एक बड़ा जागरण दे। हम तुझसे विनती करते हैं, अपने वचन के सब सेवकों की सुधि ले, उनकी सुधि ले, कि वे तेरे आगमन को ध्यान में रखकर इस प्रश्न को उठाएँ और चारों ओर सुनाएँ, तुम्हें कैसे मनुष्य होना चाहिए? उन पर, और तेरे सब लोगों पर, चारों ओर फैली अपवित्रता और सांसारिकता के कारण ऐसा बोझ डाल कि वे तेरी दोहाई देना न छोड़ें। उन्हें पवित्रता के राजमार्ग का, मसीह में उस नये और जीविते मार्ग का, ऐसा दर्शन दे कि वे पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और आनन्द में मसीह का, हमारी पवित्रता का, प्रचार करें, उन गवाहों के भरोसे भरे और जयवन्त स्वर के साथ जो उन बातों में आनन्दित हैं जो तू उनके लिये करता है। हे परमेश्वर! अपने लोगों की यह नामधराई दूर कर, कि उनका अंगीकार उन्हें दूसरों से अधिक दीन या अधिक पवित्र, अधिक प्रेमी, और अधिक स्वर्गीय नहीं बनाता।

हे पवित्र परमेश्वर! अपने इस प्रश्न का उत्तर तू आप ही दे, और हमें और संसार को सिखा कि तेरे पराक्रम के दिन, पवित्रता से शोभायमान होकर, तेरे लोग कैसे मनुष्य हो सकते हैं। हे पिता, हम तेरे सामने घुटने टेकते हैं, कि तू अपनी महिमा के धन के अनुसार हमें यह दान दे कि हम पवित्रता के आत्मा से भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बहुत बलवन्त हों। आमीन।

1. सारे पवित्र चाल चलन में तुम्हें कैसे मनुष्य होना चाहिए? यह एक प्रश्न है जिसे परमेश्वर ने हमारे लिये लिख रखा है। क्या यह हमारी सहायता न करेगा यदि हम इसका उत्तर लिख डालें, और बताएँ कि हमारी समझ में हमें कितना पवित्र होना चाहिए? परमेश्वर क्या चाहता है, उसने क्या सम्भव कर दिया है, वास्तव में क्या होना चाहिए, इसके विषय में हमारे विचार जितने अधिक स्पष्ट और निश्चित होंगे, हमारे अंगीकार, समर्पण, और विश्वास के काम उतने ही अधिक निश्चित हो सकेंगे।

2. हर एक विश्वासी, जो पवित्र होने की लालसा रखता है, इस प्रतिदिन की प्रार्थना में सम्मिलित हो कि परमेश्वर पवित्रता के आत्मा के एक बड़े उण्डेले जाने के द्वारा अपने लोगों की सुधि ले। निरन्तर प्रार्थना करते रहो कि हर एक विश्वासी एक पवित्र जन के रूप में जीवन बिताए।

3. ‘जबकि तुम इन बातों की आस देखते हो।’ हमारा जीवन, एक से अधिक अर्थ में, इस पर निर्भर है कि हम किस पर दृष्टि करते हैं। ‘हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं देखते।’ केवल जब हम अदृश्य और आत्मिक पर दृष्टि करते हैं, और उसकी सामर्थ्य के अधीन आते हैं, तभी हम सारे पवित्र चाल चलन और भक्ति में वैसे होंगे जैसा हमें होना चाहिए।

4. मसीह में पवित्र। यही हमारा विदाई का वचन हो। डाली चाहे कितनी ही बलवन्त हो जाए, चाहे वह घर के चारों ओर कितनी ही दूर तक फैल जाए, यहाँ तक कि दाखलता की आँखों से ओझल हो जाए, तौभी उसकी सारी शोभा और उसका सारा फलवन्तपन सदा उसी एक सम्पर्क-बिन्दु पर निर्भर रहता है जहाँ वह दाखलता में से निकलती है। वैसा ही हमारे साथ भी हो। मेरे जीवन की सारी बाहरी परिधि का केन्द्र मेरा अहं है—वह जीवित, सचेत मैं स्वयं, जिसमें मेरा अस्तित्व जड़ पकड़े है। और यह मैं मसीह में जड़ पकड़े हुए है। मेरे भीतरी जीवन की गहराइयों में मसीह है, जो मुझे थामे रहता है, सम्भाले रहता है, मार्ग दिखाता है, और मुझे जिलाकर पवित्रता और फलवन्तपन में ले जाता है। उसी में मैं हूँ, उसी में मैं बना रहूँगा। उसकी इच्छा और आज्ञाओं को मैं मानूँगा; उसके प्रेम और सामर्थ्य पर मैं भरोसा रखूँगा। और मैं प्रतिदिन यत्न करूँगा कि परमेश्वर की स्तुति करूँ कि मैं मसीह में पवित्र हूँ।

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