अध्याय 33 · 42 मिनट का पठन
टिप्पणियाँ
टिप्पणी A।
स्वामित्व के रूप में पवित्रता।
एक छोटी पुस्तक में—बाइबल के लेखकों की समझ के अनुसार पवित्रता; एक बाइबल अध्ययन, लेखक जोसेफ़ एगर बीट—इस विचार को बड़ी सावधानी से विकसित किया गया है कि पवित्रता से अभिप्राय परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध, और हम पर उसका दावा है। पवित्र भूमि इसलिए पवित्र थी क्योंकि ‘वह स्वयं उसके साथ विशेष सम्बन्ध में थी।’ पहिलौठों को ‘परमेश्वर की सम्पत्ति के रूप में उसके साथ विशेष सम्बन्ध में खड़ा होना था।’ सारी जाति के विषय में भी ऐसा ही है; जब परमेश्वर घोषणा करता है कि वे पवित्र होंगे, तो उसका अभिप्राय यह होता है ‘कि वे उसे वह समर्पण अर्पित करेंगे जिसकी वह माँग करता है।’ ‘सब पवित्र वस्तुएँ परमेश्वर की सम्पत्ति के रूप में उसके साथ विशेष सम्बन्ध में रहती हैं।’ याजकों के विषय में कहा गया है कि वे अपने आपको पवित्र करते थे; यह वे ‘विधिपूर्वक अपने आपको परमेश्वर के हाथ में सौंपकर, या जो कुछ परमेश्वर की सेवा से मेल न खाता था उससे अपने आपको अलग करके’ करते थे। ‘जब परमेश्वर घोषणा करता है कि वह पवित्र है, तो उस शब्द का वही अर्थ होना चाहिए जो उन सैकड़ों स्थलों में है जिनमें वह मनुष्यों और वस्तुओं के विषय में कहा गया है।’ ‘पवित्रता मनुष्यों और वस्तुओं पर परमेश्वर के स्वामित्व का दावा है; और जिन वस्तुओं पर दावा किया गया वे पवित्र कहलाईं। अब, परमेश्वर का दावा उसके स्वभाव का एक नया और अद्भुत प्रकाशन था। हारून के लिये परमेश्वर अब वह महान सत्ता था जिसने उससे जीवन भर की और अनन्य सेवा का दावा किया था। यह दावा एक नये युग का आरम्भ था, न केवल उसके प्रतिदिन के जीवन में, वरन् परमेश्वर के विषय में उसकी धारणा में भी। अतः पवित्र शब्द, जो परमेश्वर के साथ हारून का सम्बन्ध प्रकट करता था, हारून के साथ परमेश्वर का सम्बन्ध प्रकट करने के लिये भी उचित रीति से काम में लाया गया। दूसरे शब्दों में, हारून और इस्राएल के लिये परमेश्वर इस अर्थ में पवित्र था कि उसने सारी जाति पर अनन्य स्वामित्व का दावा किया। जब मनुष्यों ने परमेश्वर को वह समर्पण दिया जिसका वह दावा करता था, तो कहा गया कि उन्होंने परमेश्वर को पवित्र ठहराया।’ ‘यहोवा और इस्राएल एक दूसरे के साथ विशेष सम्बन्ध में थे; इसलिए यहोवा इस्राएल का पवित्र था, और इस्राएल यहोवा के लिये पवित्र था। यह पारस्परिक सम्बन्ध परमेश्वर के इस दावे पर टिका था कि इस्राएल विशेष रूप से उसका हो; और इस दावे में यह निहित था कि वह भी विशेष रीति से इस्राएल का होगा। यह दावा परमेश्वर के स्वभाव का प्रकटीकरण था।’ ‘यह विशेष सम्बन्ध परमेश्वर के अपने दावे से उत्पन्न होता है, जिसके फलस्वरूप वे उसके साथ एक नये और गम्भीर सम्बन्ध में आ जाते हैं। इसे वस्तुगत पवित्रता कहा जा सकता है। इस शब्द का सबसे सामान्य अर्थ यही है। इस अर्थ में परमेश्वर ने इन वस्तुओं को अपने लिये पवित्र किया। परन्तु क्योंकि इनमें से कुछ वस्तुएँ बुद्धिमान प्राणी थीं, और शेष ऐसे ही प्राणियों के अधिकार में थीं, इसलिए पवित्र करना शब्द इन प्राणियों के द्वारा अपने आपको और अपनी सम्पत्ति को विधिपूर्वक परमेश्वर को सौंप देने का बोध कराता है। इसे आत्मगत पवित्रता कहा जा सकता है। परमेश्वर के विषय में कहे गए पवित्र शब्द से हम सीखते हैं कि परमेश्वर का दावा कभी-कभार का नहीं था, वरन् उसके मूल तत्त्व से निकलनेवाला प्रवाह था। उस एकमात्र सत्ता के रूप में जो असीम और पूर्ण स्वामित्व और सर्वोच्च समर्पण का दावा करता है, परमेश्वर ही वह पवित्र है।’
नये नियम में परमेश्वर का आत्मा पवित्र विशेषण का अधिकारी इसलिए है ‘क्योंकि वह बहुत विशेष रीति से उस प्रेरणा का स्रोत और स्वयं वह प्रेरणा है जिसका एक ही और एकमात्र लक्ष्य परमेश्वर है।’ यहाँ ‘परमेश्वर की पवित्रता के विषय में हमारी धारणा उसी अनुपात में बढ़ती है जिसमें हम पर उसके दावे की महानता का, और इस बात का हमारा बोध बढ़ता है कि यह दावा परमेश्वर के मूल तत्त्व ही से निकलता है। परमेश्वर के देहधारी पुत्र में हम पवित्रता के बाइबल-आधारित विचार का पूर्ण विकास और साकार रूप देखते हैं। हम उसे परमेश्वर के साथ विशेष सम्बन्ध में खड़ा, और ऐसा जीवन जीते हुए पाते हैं जिसका एक ही और एकमात्र लक्ष्य परमेश्वर के उद्देश्यों को आगे बढ़ाना है।’ हम उसमें ‘अपनी सर्वोच्च मात्रा में पवित्रता, अर्थात् परमेश्वर के प्रति और उसके राज्य की उन्नति के प्रति सबसे ऊँचा कल्पनीय समर्पण’ देखते हैं। ‘पिता के उद्देश्य को समझ-बूझकर, सच्चे मन से और निरन्तर अपना लेने के कारण, और उद्धारकर्ता के जीवन की सब बातों में उसके पूरे होने के कारण, वह परमेश्वर का पवित्र जन कहलाया।’
‘पवित्र लोग, यह नाम मसीह के अनुयायियों के लिये बहुत उपयुक्त है; क्योंकि यह बताता है कि परमेश्वर उनसे क्या होने की माँग करता है। अपने लोगों को पवित्र लोग कहकर परमेश्वर अपनी यह इच्छा प्रकट करता है कि हम ऐसा जीवन जिएँ जिसका एक ही और एकमात्र लक्ष्य वह है। यह मसीह की कलीसिया की वस्तुगत पवित्रता है। कुछ स्थलों में पवित्रता परमेश्वर के लोगों के सामने प्राप्त करने के लिये एक मानदण्ड के रूप में रखी गई है। इन स्थलों में पवित्र का अर्थ है मनुष्य में परमेश्वर के इस उद्देश्य का पूरा होना कि वह ऐसा जीवन जिए जिसका एक ही और एकमात्र लक्ष्य परमेश्वर है। यह परमेश्वर के लोगों की आत्मगत पवित्रता है।
‘पवित्रता परमेश्वर का यह दावा है कि उसके प्राणी अपनी सारी शक्तियों और अवसरों को उसके उद्देश्य पूरे करने में लगाएँ। इस प्रकार समझी जाए तो पवित्रता परमेश्वर का एक गुण है। क्योंकि उसका दावा उसके स्वभाव से, वरन् उस प्रेम से निकलता है जो परमेश्वर का मूल तत्त्व ही है। हमारे प्रति उसका प्रेम उसे हमारे समर्पण का दावा करने को प्रेरित करता है; क्योंकि केवल उसके प्रति पूर्ण समर्पण के द्वारा ही हम अपना सबसे ऊँचा सुख पा सकते हैं।’
‘यद्यपि शुद्धता के बिना हम आत्मगत रूप से पवित्र नहीं हो सकते, तौभी पवित्रता शुद्धता से कहीं बढ़कर है। शुद्धता केवल एक नकारात्मक गुण है; पवित्रता में हमारे मन और देह की वह सबसे तीव्र सक्रियता सम्मिलित है जिसके हम योग्य हैं। क्योंकि वह परमेश्वर के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में हमारी सारी शक्तियों और अवसरों का लगाया जाना है।’
इस प्रश्न का, कि ‘हम पवित्र कैसे बनते हैं,’ उत्तर यों दिया गया है: ‘परमेश्वर के प्रति हमारा समर्पण उसके साथ भीतरी आत्मिक सम्पर्क का परिणाम है जिसने एक बार पृथ्वी पर मानव जीवन बिताया, और अब सिंहासन पर महिमा पाया हुआ मानव जीवन जीता है, केवल और केवल पिता के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये। हम परमेश्वर के लिये इसलिए जीते हैं क्योंकि मसीह ऐसा करता है, और क्योंकि मसीह हम में जीवित है, और हम उसमें: मसीह का आत्मा मसीह के साथ उस आत्मिक सम्पर्क का माध्यम है जो हमें उसका जीवन देता है, और हम में उसके जीवन को फिर से उत्पन्न करता है। वह मसीह की सामर्थ्य का भी वाहक है और उसकी पवित्रता का भी।’
‘यह कि परमेश्वर अपने लोगों से अपने प्रति बिना किसी रोक-टोक के समर्पण का दावा करता है, और यह कि जिसका वह दावा करता है उसे वह उन सब में जो इस पर विश्वास करते हैं, अपनी ही सामर्थ्य से पूरा करता है, जो पवित्र आत्मा की भीतरी उपस्थिति के द्वारा कार्य करती और हमें मसीह के साथ आत्मिक सम्पर्क में रखती है, यही विश्वास के द्वारा पवित्र किए जाने का महान सिद्धान्त है।’
यही दृष्टिकोण, कि पवित्रता एक सम्बन्ध है, इससे पहले डीस्टल ने बहुत विस्तार से प्रस्तुत किया था। पवित्रता के सम्बन्ध में छुटकारे और स्वामित्व के विषय में जो कुछ कहा गया है (देखो ‘छठा दिन’), उसमें हम देख चुके हैं कि इस विचार में कितना सत्य है। परन्तु पवित्रता इससे कुछ अधिक है। जो पवित्र है वह केवल परमेश्वर को समर्पित ही नहीं, वरन् परमेश्वर द्वारा ग्रहण किया हुआ, परमेश्वर द्वारा अपनाया हुआ, परमेश्वर के अधिकार में लिया हुआ भी है। परमेश्वर हृदय पर केवल अधिकार ही नहीं रखता, वरन् उसमें पूरी रीति से बसकर उसे अपने जीवन से भर देता है। यही उसे पवित्र बनाता है।
ऊपर की व्याख्या में चाहे जितना सत्य हो, वह हमारी उस लालसा को मुश्किल से ही पूरा करती है कि हम परमेश्वर की सत्ता के सबसे ऊँचे गुणों में से एक की भीतरी समझ पाएँ। जब साराप उस पवित्र के रूप में उसकी आराधना करते हैं, और अपने तीन बार पवित्र में ईश्वरत्व के सबसे गहरे भेद का कुछ प्रतिबिम्ब दिखाते हैं, तो निश्चय इसका अर्थ सब के सर्वोच्च स्वामी के रूप में परमेश्वर के दावे की अभिव्यक्ति मात्र से कहीं अधिक है।
यह भूल इस बात से उत्पन्न होती जान पड़ती है कि पहले पवित्र शब्द का अर्थ पार्थिव वस्तुओं से लिया जाता है, और फिर उसी से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि परमेश्वर में पवित्रता का अर्थ उससे अधिक नहीं हो सकता जितना मनुष्यों के लिये प्रयोग किए जाने पर होता है। पवित्रशास्त्र इसके उलटे मार्ग की ओर संकेत करता है। जब पुराना और नया नियम कहते हैं, ‘पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ, मैं पवित्र करनेवाला हूँ,’ तो वे परमेश्वर की पवित्रता को पहली बात ठहराते हैं, जो हमारी पवित्रता का कारण भी है और स्रोत भी। हमें पहले यह खोजना चाहिए कि परमेश्वर में पवित्रता क्या है। जब हम सृष्टि के समय परमेश्वर के सब्त के दिन को पवित्र ठहराने के विषय में पढ़ते हैं, तो हमारा सम्बन्ध इस बात से नहीं कि परमेश्वर ने जो किया उसके विषय में मूसा का कोई विचार या शब्द क्या था, वरन् परमेश्वर में एक ऐसी सामर्थ्य के ईश्वरीय प्रकाशन से है जो सृष्टि से भी बड़ी और अधिक अद्भुत है, वही सामर्थ्य जो आगे चलकर ईश्वरीय सत्ता के सबसे गहरे भेद के रूप में प्रकट होती है।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर में यह पवित्रता केवल एक सम्बन्ध नहीं हो सकती। किसी सम्बन्ध को बताना मुझे सम्बन्धित पक्षों के व्यक्तिगत चरित्र या मूल्य के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं बताता। यह कहना कि जब परमेश्वर मनुष्यों को पवित्र करता है तो वह उन्हें अपना ठहराकर उन पर दावा करता है, यह नहीं बताता कि जो कार्य वह उनके लिये और उनमें करता है उसका स्वरूप क्या है, या वह किस सामर्थ्य से उसे करता है। फिर भी उस शब्द को मुझ पर यह प्रकट करना चाहिए कि परमेश्वर क्या प्रदान करता है। यह कहना कि उस दावे की जड़ उसके स्वभाव ही में, और उसके प्रेम में है, और इसलिए पवित्रता एक गुण है, उसे ऐसा गुण बना देता है जो प्रेम या बुद्धि के समान प्राणियों के होने से पहले ही ईश्वरीय सत्ता में निहित नहीं, वरन् केवल प्रेम का एक परिणाम है, जो परमेश्वर को अपने प्राणियों पर अपनी विशेष सम्पत्ति के रूप में दावा करने को प्रेरित करता है। तब हमारे पास कोई ऐसा गुण न रहता जो परमेश्वर की नैतिक सिद्धता को प्रकट करे। न ही पुत्र और आत्मा के विषय में पवित्र शब्द फिर परमेश्वर के स्वभाव और जीवन ही के उस गहरे और रहस्यमय संचार की ओर संकेत करता जिसमें पवित्र किए जाने की महिमा है। ईश्वरीय पवित्रता में हमें ईश्वरीय सत्ता के मूल तत्त्व का सबसे ऊँचा और अकल्पनीय रूप से महिमामय प्रकाशन मिलता है; पवित्र लोगों की पवित्रता में उस परिवर्तन का सबसे गहरा प्रकाशन मिलता है जिसके द्वारा उनका भीतरी स्वभाव नया होकर परमेश्वर की समानता में ढल जाता है।
टिप्पणी B।
पवित्रता के लिये प्रयुक्त शब्द के विषय में।
पवित्र के लिये इब्रानी शब्द, kadosh, का ठीक अर्थ अनिश्चित है। वह किसी ऐसे मूल से आया हो सकता है जिसका अर्थ है चमकना। (ऐसा ही गेसेनियस, ओएलर, फ़ुर्स्ट, और पहले डेलिच भी, इब्रानियों 2:11 पर, मानते हैं।) या किसी दूसरे मूल से जिसका अर्थ है नया और उज्ज्वल (डीस्टल), या अरबी के किसी ऐसे रूप से जिसका अर्थ है काटना, अलग करना। (ऐसा ही अब डेलिच, भजन संहिता 22:4 पर, मानते हैं।) मूल चाहे जो भी हो, मुख्य विचार केवल अलग या अलग किया हुआ होना ही नहीं जान पड़ता, जिसके लिये इब्रानी में बिलकुल भिन्न शब्द हैं, वरन् वह बात है जिसके द्वारा कोई वस्तु, जो अपने मूल्य के कारण दूसरों से अलग की गई है, उनसे ऊपर विशिष्ट ठहरती है। यह केवल एक कार्य या तथ्य के रूप में अलगाव को ही नहीं दर्शाता, वरन् उस श्रेष्ठता या उत्तमता को भी जिसके कारण, चाहे वह पहले से प्राप्त हो या उसकी खोज की जा रही हो, वह अलगाव होता है।
क्रेमर ने नये नियम की यूनानी के अपने शब्दकोश में यूनानी hagios पर एक सम्पूर्ण लेख लिखा है, जिसमें वह दिखाते हैं कि पवित्रता पूर्ण रूप से बाइबल का विचार है, और ‘कैसे परमेश्वर की पवित्रता के विषय में पवित्रशास्त्र की धारणाएँ, मूल सम्बन्ध के होते हुए भी, सब यूनानी धारणाओं के बिलकुल विपरीत हैं; और कैसे, जहाँ पवित्रता के ये विचार देवताओं से प्रेम की हर सम्भावना को बाहर कर देते हैं, वहाँ पवित्रता की पवित्रशास्त्रीय धारणा केवल ईश्वरीय प्रेम के साथ घनिष्ठतम सम्बन्ध में ही खुलती है।’ यह बहुत ही विचारोत्तेजक बात है कि यह शब्द और यह विचार, दोनों के लिये हम स्पष्ट रूप से प्रकाशन के ऋणी हैं। परमेश्वर के हर दूसरे गुण के अनुरूप मनुष्य के मन में कोई न कोई धारणा पाई जाती है: पवित्रता का विचार स्पष्ट रूप से ईश्वरीय है। क्या यही कारण नहीं कि यद्यपि परमेश्वर ने नये नियम में इतनी स्पष्टता से अपने लोगों को पवित्र लोग कहा है, तौभी पवित्र शब्द मसीही कलीसिया की दैनिक भाषा और जीवन में इतना कम प्रवेश कर पाया है?
टिप्पणी C।
परमेश्वर की पवित्रता।
कोई भी शब्द अपने प्रकाशन और अपने अर्थ में इतना पूर्ण रूप से पवित्रशास्त्रीय, इतना स्पष्ट रूप से ईश्वरीय नहीं, जितना पवित्र शब्द। अपने इस ईश्वरीय उद्गम के फलस्वरूप यह अथाह अर्थवाला शब्द है। परमेश्वर के गुणों में ऐसा कोई नहीं जिसकी परिभाषा देना धर्मविज्ञानियों को इतना कठिन लगा हो, या जिसके विषय में उनमें इतना मतभेद हो। जो विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए गए हैं उनका एक संक्षिप्त सर्वेक्षण हमें सिखा सकता है कि ईश्वरीय पवित्रता का विचार मानवीय परिभाषा के द्वारा कितना कम समझा या पूरी रीति से समेटा जा सकता है, और कैसे केवल संगति और आराधना के जीवन में ही वह पवित्रता, जो सारी समझ से परे है, एक सत्य और एक वास्तविकता के रूप में ग्रहण की जा सकती है।
1. सबसे बाहरी दृष्टिकोण, जिसमें नैतिक पक्ष बहुत हद तक आँखों से ओझल हो गया, वह है जिसमें पवित्रता को सृष्टि से परमेश्वर के अलग होने, और उससे ऊपर उसके ऊँचे होने के समान माना गया है। पवित्रता की परिभाषा परमेश्वर की अतुलनीय महिमा, उसकी अनन्य आराध्यता, उसके असीम प्रताप के रूप में दी गई। इस तथ्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया कि यद्यपि ये सब विचार परमेश्वर की पवित्रता से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं, तौभी वे पवित्रता के परिणामों और उसके परिवेश की केवल एक औपचारिक परिभाषा हैं, पर हमें उस बात की समझ तक नहीं ले जाते जिसमें उसका वास्तविक मूल तत्त्व है।
2. एक और दृष्टिकोण, जो बाहरी बात से ही आरम्भ करता और उसी को अपनी व्याख्या का आधार बनाता है, पवित्रता को केवल एक सम्बन्ध की अभिव्यक्ति मानता है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर की सेवा के लिये अलग किया गया था वह पवित्र कहलाता था, इसलिए अलगाव, समर्पण और स्वामित्व के विचार को आरम्भ-बिन्दु मान लिया जाता है। और इस प्रकार, क्योंकि हमें परमेश्वर के होने के कारण पवित्र कहा गया है, इसलिए परमेश्वर भी हम पर दावा करने और हमारा भी होने के कारण पवित्र है। पवित्रता को ईश्वरीय स्वभाव में एक सकारात्मक वास्तविकता मानने के बदले, जिससे हमारी पवित्रता निकलनी है, हमारी पवित्रता को ही परमेश्वर की पवित्रता की व्याख्या का आरम्भ-बिन्दु बना दिया जाता है। ‘परमेश्वर इसलिए पवित्र है कि वह वाचा के भीतर अपने लोगों का केवल स्वामी ही नहीं, वरन् उनकी सम्पत्ति भी है, उनकी सबसे ऊँची भलाई और उनका एकमात्र नियम’ (डीस्टल)। इस दृष्टिकोण का उल्लेख ‘छठे दिन’ की टिप्पणी में, स्वामित्व के रूप में पवित्रता के अन्तर्गत, पहले ही किया जा चुका है।
3. अब उन लोगों के दृष्टिकोणों पर आएँ जो पवित्रता को एक नैतिक गुण मानते हैं, तो उनमें सबसे सामान्य दृष्टिकोण शुद्धता, अर्थात् पाप से मुक्ति का है। ‘पवित्रता परमेश्वर की नैतिक उत्तमता के लिये एक सामान्य शब्द है। यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं: कोई दूसरी सत्ता ऐसी नहीं जो पूर्ण रूप से शुद्ध हो और अपनी नैतिक सिद्धता में सब सीमाओं से मुक्त हो। पवित्रता एक ओर तो नैतिक बुराई से पूरी मुक्ति का, और दूसरी ओर पूर्ण नैतिक सिद्धता का बोध कराती है।’ (हॉज, क्रमबद्ध धर्मविज्ञान।) पवित्रता का यह विचार, कि वह ऐसी असीम शुद्धता है जो सब पाप से मुक्त है, जो उससे घृणा करती और उसे दण्ड देती है, लोकप्रिय धारणा में सबसे प्रमुख विचार है। इसमें सकारात्मक की अपेक्षा नकारात्मक पक्ष अधिक आगे है। इस दृष्टिकोण का सत्य और मूल्य इस तथ्य से है कि हमारी पापमय दशा में परमेश्वर की पवित्रता की पहली छाप अवश्य ही भय और त्रास की होती है, क्योंकि हमें अपनी पापमयता और अपवित्रता का बोध होता है। परन्तु यह हमें नहीं बताता कि परमेश्वर की यह नैतिक उत्तमता या सिद्धता वास्तव में किस बात में है।
4. इस दृष्टिकोण से आगे का कदम तब उठाया जाता है जब यह परिभाषित करने का प्रयत्न किया जाता है कि परमेश्वर की यह सिद्धता क्या है। कोई वस्तु तब सिद्ध होती है जब वह हर बात में वैसी ही हो जैसी उसे होना चाहिए। इस प्रकार सिद्धता की परिभाषा देना सहज है, परन्तु किसी विशेष वस्तु की सिद्धता क्या है, इसकी परिभाषा देना इतना सहज नहीं: इसके लिये यह जानना आवश्यक है कि उसका स्वभाव क्या है। और हमें बहुत सामान्य शब्दों से ही सन्तोष करना पड़ता है, जो परमेश्वर की पवित्रता को मूलभूत और पूर्ण भलाई के रूप में परिभाषित करते हैं। ‘पवित्रता स्वयं अपना, जो भलाई है, अथवा भलाई का, जो वह स्वयं है, स्वतंत्र, सुविचारित, शान्त और अटल समर्थन है’ (गोडे, यूहन्ना 17:11 पर)। ‘पवित्रता वह गुण है जिसके कारण यहोवा अपने आपको, अपनी सत्ता और अपने प्रकाशन का पूर्ण मानदण्ड बनाता है।’ (क्यूबल।)
5. इससे निकट सम्बन्ध रखनेवाला यह दृष्टिकोण है कि पवित्रता कोई एक गुण उतना नहीं, जितना ‘उन सब बातों का सम्पूर्ण समुच्चय है जिन्हें हम परमेश्वर के अलग-अलग गुणों में अलग-अलग देखने और प्रस्तुत करने के आदी हैं।’ इसी प्रकार बेंगल पवित्रता को ईश्वरीय स्वभाव मानते थे, जिसमें सब गुण समाए हुए हैं। इसी भाव में है जो हाउ पवित्रता के विषय में, ईश्वरीय सौन्दर्य के रूप में, जो सब गुणों के पूर्ण सामंजस्य का परिणाम है, कहते हैं: ‘पवित्रता बौद्धिक सौन्दर्य है। ईश्वरीय पवित्रता सबसे सिद्ध सौन्दर्य है, और सब दूसरे सौन्दर्य का मापदण्ड है। ईश्वरीय पवित्रता सबसे सिद्ध शोभा है, वह अकथनीय और अमर शोभा, जो न शब्दों से बताई जा सकती है, न आँखों से देखी जा सकती है। इसलिए इसे एक लोकोत्तर गुण कहा जा सकता है, जो मानो बाकी सब में होकर बहता है, और हर एक पर महिमा डालता है। यह गुणों का गुण है। ये उचित विशेषण हैं, पवित्र सामर्थ्य, पवित्र प्रेम। और इस प्रकार यह उसकी दूसरी सिद्धताओं की चमक और महिमा ही है। वह पवित्रता के कारण महाप्रतापी है।’ (व्हाइट की लघु प्रश्नोत्तरी में हाउ।) ईश्वरीय पवित्रता का यही पक्ष था जिस पर जोनाथन एडवर्ड्स को ठहरकर मनन करना प्रिय था। ‘पिता और पुत्र का पारस्परिक प्रेम तीसरे को, अर्थात् व्यक्तिगत पवित्र आत्मा को, या परमेश्वर की पवित्रता को, उत्पन्न करता है, जो उसका असीम सौन्दर्य है।’ ‘परमेश्वर की पवित्रता के संचार के द्वारा प्राणी परमेश्वर की नैतिक उत्तमता का भागी होता है, जो सिद्धता है, ईश्वरीय स्वभाव का सौन्दर्य।’ ‘पवित्रता में बुद्धिमान प्राणियों की सारी सच्ची नैतिक उत्तमता समाई हुई है। इसी प्रकार परमेश्वर की पवित्रता वही है जो ईश्वरीय स्वभाव की नैतिक उत्तमता है, जिसमें उसकी सब सिद्धताएँ, उसकी धार्मिकता, सच्चाई और भलाई समाई हुई हैं। परमेश्वर को समझने की हमारी रीति के अनुसार उसमें दो प्रकार के गुण हैं: उसके नैतिक गुण, जो उसकी पवित्रता में समाहित हैं, और उसके स्वाभाविक गुण, जैसे सामर्थ्य, ज्ञान आदि, जो उसकी महानता बनाते हैं। पवित्र लोग, पवित्र स्नेह का अभ्यास करते हुए, सबसे पहले परमेश्वर से उसकी पवित्रता के सौन्दर्य के कारण प्रेम रखते हैं।’ ‘किसी बुद्धिमान प्राणी की पवित्रता ही वह है जो उसकी सब स्वाभाविक सिद्धताओं को सौन्दर्य देती है। और परमेश्वर में भी ऐसा ही है: पवित्रता विशेष रीति से ईश्वरीय सत्ता का सौन्दर्य है। इसी कारण हम बार-बार पवित्रता की शोभा के विषय में पढ़ते हैं (भजन संहिता 29:2, 96:9, 110:3)। यही बाकी सब गुणों को महिमामय और मनोहर बनाती है।’ ‘इसलिए, यदि परमेश्वर की सिद्धताओं की सच्ची मनोहरता उसकी पवित्रता की मनोहरता से उत्पन्न होती है, तो उसकी सब सिद्धताओं के प्रति सच्चा प्रेम उसकी पवित्रता के प्रति प्रेम से उत्पन्न होगा। और जैसे ईश्वरीय स्वभाव का सौन्दर्य मुख्यतः परमेश्वर की पवित्रता में है, वैसे ही सब ईश्वरीय बातों का सौन्दर्य भी।’
6. परमेश्वर की पवित्रता को मूलभूत भलाई, उसके स्वभाव की पूर्ण उत्तमता बतानेवालों में से कुछ लोग उसके नैतिक पक्ष पर बहुत बल देते हैं। परमेश्वर में भलाई केवल स्वाभाविक प्रवृत्ति से, उसके स्वभाव की अनिवार्यता से निकलकर, उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा के बिना, नहीं होनी चाहिए। ‘जो स्वभाव से भला है वह भलाई का सच्चा साकार रूप नहीं है। जो भलाई वह है, वही होने की वास्तविक और जीवित इच्छा का भी परमेश्वर में स्थान होना चाहिए, नहीं तो परमेश्वर केवल स्वभाव से ही नैतिक होता। केवल उस इच्छा में, जो सचेत होकर अपने आपको निर्धारित करती है, नैतिकता की सम्भावना दी गई है। परमेश्वर में नैतिकता की ऐसी सामर्थ्य है कि वह पवित्र सामर्थ्य है, जो अपने आपका इन्कार न कर सकता है और न करेगा, जिसे उस भलाई की पवित्र अनिवार्यता होना ही है जो वह स्वयं है, और जो ऐसा ही समझा जाना चाहता है,—अर्थात् वह पवित्र होना। परमेश्वर का प्रेम मूल रूप से पवित्र है; वह उस नैतिक रूप से अनिवार्य या पवित्र की इच्छा करता और उसे बनाए रखता है, जो परमेश्वर स्वयं है।’ (डॉर्नर, क्रमबद्ध धर्मसिद्धान्त, पहला खण्ड।)
7. ऐसे दृष्टिकोणों में यह अनुभव किया गया कि इस सत्य को पर्याप्त रूप से स्वीकार नहीं किया गया कि परमेश्वर विशेष रूप से पवित्र के रूप में ही छुड़ानेवाला कहलाता है, और कि वह पवित्र बनाने के लिये ही प्रेम का कार्य करता है। इससे यह दृष्टिकोण निकला कि पवित्रता और प्रेम, यदि एक ही नहीं, तो कम से कम परस्पर सम्बन्धित अभिव्यक्तियाँ हैं। ‘परमेश्वर पवित्र है, अपनी अतुलनीय स्तुति-योग्यता में प्राणी की सारी स्तुति से ऊपर उठा हुआ, क्योंकि वह स्वतंत्र रूप से और प्रेम के साथ प्राणी तक झुक आता है, ताकि उसमें अपने प्रेम की महिमा प्रकट करे।’ ‘परमेश्वर इसलिए पवित्र है कि उसमें प्रेम ने धर्मी क्रोध को रोका और उस पर जय पाई है (जैसा होशे कहता है, 11:9), और न्याय तभी किया जाता है जब दया का हर मार्ग आज़माया जा चुका हो। यह पवित्रता नये नियम के उस नाम में प्रकट होती है जो जितना ऊँचा है उतना ही दीनता से झुकनेवाला भी, अर्थात् पिता।’ (श्टीयर, यूहन्ना के सत्रहवें अध्याय पर।)
8. इस दृष्टिकोण में सत्य का जो बड़ा अंश है, उसका उत्तर एक ऐसी अभिव्यक्ति में मिलता है जिसमें परमेश्वर की पवित्रता के सच्चे पक्ष एक साथ जुड़ जाते हैं। इसकी परिभाषा आत्म-रक्षा और आत्म-दान के सामंजस्य के रूप में दी जाती है। पवित्र के रूप में परमेश्वर पाप से घृणा करता है, और उसे नाश करना चाहता है। पवित्र के रूप में वह पापी को पवित्र बनाता है, और फिर उसे अपने प्रेम में ग्रहण कर लेता है। अपने प्रेम को बनाए रखते हुए वह एक क्षण के लिये भी अपनी ईश्वरीय शुद्धता और सिद्धता नहीं खोता; अपनी धार्मिकता को बनाए रखते हुए भी वह पतित प्राणी को अपने आपको दे देता है। पवित्रता ईश्वरीय महिमा है, जिसके दो पक्ष प्रेम और धार्मिकता हैं, और जिसे वे पृथ्वी पर अपने कार्य में प्रकट करते हैं।
‘पवित्रता परमेश्वर की आत्म-रक्षा है, जिसके द्वारा वह अपने आपको अपने से बाहर के संसार से मुक्त रखता है, और अपने आपसे संगत और अपनी सत्ता के प्रति विश्वासयोग्य बना रहता है, और जिसके द्वारा वह, इसी उद्देश्य से, एक ऐसा ईश्वरीय संसार रचता है जो अपनी कलीसिया के संगठन में केवल उसी के लिये जीता है।’ (लांगे।)
‘परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर की आत्म-रक्षा है, या अपने आपको अपने ही में बनाए रखना है, जिसके कारण वह उन सब सम्बन्धों में एक-सा बना रहता है जो उसके ईश्वरत्व के भीतर हैं, या जिनमें वह प्रवेश करता है, और न कभी ईश्वरीय बात का बलिदान करता है, न किसी अनीश्वरीय बात को ग्रहण करता है। परन्तु यह केवल एक पक्ष है। परमेश्वर की पवित्रता पवित्रता नहीं, वरन् अनन्यता भर होती, यदि वह परमेश्वर के अनेक प्रकार के सम्बन्धों में प्रवेश करने, और इस प्रकार अपने आपको प्रकट करने और बाँटने का प्रबन्ध न करती। इसलिए पवित्रता परमेश्वर के अपने आपको अपने में रखने और अपने आपको बाँटने का; उसकी निकटता और उसकी दूरी का; उसकी अनन्यता और उसके आत्म-प्रकाशन का; अलगाव और संगति का मेल और परस्पर व्याप्ति है।’ (श्मीडर।)
‘ईश्वरीय पवित्रता मुख्यतः प्राणी की अशुद्धता और पापमयता से अलग रहना है, या सकारात्मक रूप में कहें, तो ईश्वरीय स्वभाव की स्वच्छता और शुद्धता है, जो दुष्टों के साथ हर सम्बन्ध को बाहर रखती है। इसके अनुरूप, ईश्वरीय पवित्रता, प्रकाशन के एक गुण के रूप में, केवल एक अमूर्त सामर्थ्य नहीं, वरन् संसार को ईश्वरीय जीवन का भागी बनाने के उद्देश्य से ईश्वरीय आत्म-प्रस्तुति और आत्म-साक्षी है।’ (ओएलर, पुराने नियम का धर्मविज्ञान, खण्ड 1, पृ. 160।)
‘पाप का विरोध परमेश्वर की पवित्रता की वह पहली छाप है जो मनुष्य पर पड़ती है। बहिष्कार, चुनाव, शुद्ध करना, छुटकारा—ये वे चार रूप हैं जिनमें परमेश्वर की पवित्रता मानवता के क्षेत्र में प्रकट होती है; और हम कह सकते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता का अर्थ है पाप के प्रति उसका विरोध, जो प्रायश्चित और छुटकारे में, या न्याय में प्रकट होता है। या क्योंकि पवित्रता, जहाँ तक वह व्यवस्था में साकार होती है, सबसे ऊँची नैतिक सिद्धता ही होनी चाहिए, इसलिए हम कह सकते हैं, “पवित्रता परमेश्वर की वह शुद्धता है जो प्रायश्चित और छुटकारे में, और उसी के अनुरूप न्याय में प्रकट होती है।” इस दृष्टिकोण से ऊपर के सब तत्त्वों के साथ न्याय होता है; पवित्रता न्याय करनेवाली धार्मिकता में, और चुननेवाले, शुद्ध करनेवाले और छुड़ानेवाले प्रेम में अपने आपको प्रकट करती है, और इस प्रकार वह छुटकारे के प्रकाशन के प्रेरक और रचनात्मक सिद्धान्त के रूप में दिखाई देती है, जिसके ज्ञान के बिना उस प्रकाशन को समझना असम्भव है, और जिसके बोध से वह अपने पूरे, स्पष्ट प्रकाश में दिखाई देता है। परमेश्वर ज्योति है: यह परमेश्वर की पवित्रता के लिये नये नियम का एक पूरा और सम्पूर्ण वाक्यांश है’ (1 यूहन्ना 1:5)। (क्रेमर।)
यह दृष्टिकोण जे. टी. बेक के लेखों में विशेष स्पष्टता से सामने लाया गया है। ‘यह परमेश्वर की पवित्रता ही है जो सृष्टि में दी गई भलाई को लेकर, उस भलाई के प्रति और परमेश्वर की उस भली और सिद्ध इच्छा के प्रति पूरी विश्वासयोग्यता में, प्रेम के अनन्त जीवन-उद्देश्य के रूप में, धार्मिकता और दया में, उसे स्वयं परमेश्वर में सिद्धता के जीवन तक पूरा करती है। परमेश्वर यह एकमात्र पवित्र के रूप में करता है। पाप के संसार में ईश्वरीय प्रेम केवल एक ऐसी मध्यस्थता के द्वारा ही छुटकारा ला सकता है जिसमें वह ईश्वरीय क्रोध के साथ उनके साझे केन्द्र, परमेश्वर की पवित्रता के भीतर इस प्रकार मेल कर लेता है कि जहाँ क्रोध अपनी नाश करनेवाली वास्तविकता प्रकट करता है, वहाँ प्रेम उस जीवन में, जो वह देता है, अपनी पुनःस्थापित करनेवाली सामर्थ्य सिद्ध करेगा।’ (बेक, शिक्षा-विज्ञान, 168, 547।)
‘पवित्रता ईश्वरीय जीवन का सार और तत्त्व है, इस रूप में कि वह सब सृजी हुई वस्तुओं की तुलना में एक सिद्ध जीवन के रूप में विद्यमान है, पर साथ ही इस रूप में भी कि वह प्राणी के लिये अपने आपको खोलता है, ताकि उसे परमेश्वर-तुल्य सिद्धता में ले ले, अर्थात् जैसा परमेश्वर पवित्र है वैसा ही पवित्र होने में। इस प्रकार पवित्रता ईश्वरीय प्रेम के विरोध में होने से इतनी दूर है कि वह उसकी मूल विशेषता या मानदण्ड, और प्रेम की वास्तविक विषय-वस्तु है। पवित्रता में जीवन की सिद्धता के रूप में ईश्वरीय आत्म-अस्तित्व, और संसार में परमेश्वर-तुल्य सिद्ध जीवन को साकार करने में ईश्वरीय आत्म-प्रयास, दोनों जुड़े हुए हैं। ईश्वरीय सत्ता के गुण के रूप में पवित्रता उसका शुद्ध और अभंग रूप से आत्म-निहित व्यक्तित्व है, अपनी पूर्ण सिद्धता में। इसी कारण पवित्रता में, जो ईश्वरीय सत्ता और कार्य की पूर्ण एकता और शुद्धता है, ईश्वरीय प्रकाशन के सब गुण केन्द्रित होते हैं। और इस प्रकार पवित्रता, परमेश्वर की सत्ता की अभिव्यक्ति होने के कारण, प्रेम को मूल रूप से ईश्वरीय ठहराती है।
‘प्रेम ईश्वरीय इच्छा का मूल रूप है, पर इस रूप में वह अपनी ईश्वरीय भरपूरी और अपना स्वरूप ईश्वरीय पवित्रता से, अर्थात् ईश्वरीय आत्म-अस्तित्व और आत्म-प्रयास से, पाता है। इस रूप में ईश्वरीय इच्छा दो प्रकार से प्रकट होती है—अपने शुद्ध प्रेम में भलाई के रूप में, और अपने पवित्र सामंजस्य में धार्मिकता के रूप में। ये दोनों अलग-अलग विद्यमान नहीं, वरन् परस्पर अन्तर्निहित होकर एक दूसरे में व्याप्त रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर अपनी पवित्रता में प्रेम है, और अपने प्रेम में पवित्रता। भलाई में ईश्वरीय प्रेम कल्याण में आनन्द के रूप में प्रकट होता है। परन्तु इस भलाई में परमेश्वर की धार्मिकता भी, भले आचरण को सुनिश्चित करने के लिये, कार्य करती है।’ (जे. टी. बेक, विश्वास-सिद्धान्त।)
‘परमेश्वर पवित्र है, सब अंधकार और पाप से अलग, पर ऐसे एकाकी प्रताप में नहीं जो अपूर्ण और पापी को अपनी उपस्थिति से दूर भगा दे: क्योंकि परमेश्वर ज्योति है, परमेश्वर प्रेम है। ज्योति का स्वभाव ही अपने आपको बाँटना है। शुद्ध और उज्ज्वल, बिना घटे और बिना मैली हुए रहते हुए, वह अंधकार पर जय पाती है और ज्योति जलाती है। पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की पवित्रता का उल्लेख भी अधिकतर प्रेम के साथ ही होता है, जो अपने आपको बाँटता और अपनी ओर खींचता है। “मैं पवित्र हूँ”—पर परमेश्वर अकेला, अलग नहीं रहता—“तुम भी पवित्र बनो।”’ (सैफ़िर, इब्रानियों के बारहवें अध्याय पर।)
‘जब हम परमेश्वर को ज्योति और प्रेम के रूप में सोचते हैं, तब हम पवित्रता के विचार को सबसे पूरी रीति से समझते हैं, जिसमें अलगाव और शुद्धता के साथ संगति जुड़ी हुई है।’ (सैफ़िर, प्रभु की प्रार्थना, पृ. 128।)
‘विशेष रूप से अपनी कलीसिया के आत्मा के रूप में, और मनुष्य के हृदय में वास करनेवाले के रूप में ही परमेश्वर वह पवित्र है।’ (नित्श।)
यह कि परमेश्वर की पवित्रता में प्रेम और धार्मिकता का मेल है, शायद किसी ने इसे गोडे से अधिक स्पष्टता से नहीं रखा। रोमियों 3:25, 26 पर अपनी टीका में वह लिखते हैं:—
‘प्रायश्चित के बलिदान की आवश्यकता उसके सम्पूर्ण ईश्वरीय चरित्र से उत्पन्न होती है; दूसरे शब्दों में, उसकी पवित्रता से, जो उसके प्रेम और उसकी धार्मिकता, दोनों का मूल सिद्धान्त है, न कि केवल उसकी धार्मिकता का।’
‘इस प्रश्न में हमारा सम्बन्ध परमेश्वर से उसके मूल तत्त्व में नहीं, वरन् स्वतंत्र मनुष्य के साथ उसके सम्बन्ध में है। अब मनुष्य आरम्भ से पवित्र नहीं है; अपनी स्वतंत्रता का जो उपयोग वह करता है वह अभी प्रेम के द्वारा नियमित नहीं हुआ है। इसलिए धार्मिकता का गुण, और ईश्वरीय पवित्रता को बनाए रखने का दृढ़ निश्चय, एक आवश्यक सुरक्षा के रूप में उसी क्षण प्रकट होना चाहिए जब स्वतंत्रता मंच पर आती है, और उसके साथ अव्यवस्था की सम्भावना भी; और यह गुण तब तक कार्य में बना रहना चाहिए जब तक प्राणी की शिक्षा का काल चलता है—अर्थात् जब तक वह प्रेम में सिद्धता तक न पहुँच जाए। तब ये सब तत्त्व—अधिकार, व्यवस्था, न्याय—अपनी सुप्त दशा में लौट जाएँगे….
‘परमेश्वर के चरित्र की मूल विशेषता प्रेम को मानना आम बात है; इस रीति से धार्मिकता के गुण तक पहुँचना बहुत कठिन है। अधिकांश विचारक तो उस तक पहुँचते ही नहीं। केवल यही तथ्य उस भूल को दिखाने के लिये पर्याप्त होना चाहिए जिसमें वे उलझे हुए हैं। परमेश्वर के सबसे निकट रहनेवाले प्राणी पवित्र, पवित्र, पवित्र कहते हैं, न कि भला, भला, भला। पवित्रता, यही परमेश्वर का मूल तत्त्व है; और पवित्रता भलाई से पूर्ण प्रेम, और बुराई से पूर्ण घृणा है। इससे प्रेम और धार्मिकता, दोनों को निकालना कठिन नहीं। प्रेम परमेश्वर की वह सद्भावना है जो उन सब स्वतंत्र प्राणियों की ओर है जिनके लिये भलाई को साकार करना ठहराया गया है। प्रेम व्यक्तियों की ओर जाता है, जैसे पवित्रता स्वयं उस भलाई की ओर जाती है जिसे उन्हें उत्पन्न करना चाहिए। दूसरी ओर, धार्मिकता परमेश्वर का यह दृढ़ उद्देश्य है कि वह अपनी आशीषों और अपने दण्डों के द्वारा इन सब प्राणियों के बीच उचित सम्बन्धों को बनाए रखे। यह स्पष्ट है कि धार्मिकता भी, प्रेम से किसी रीति कम नहीं, परमेश्वर के चरित्र की मूल विशेषता, अर्थात् पवित्रता, में सम्मिलित है। इसलिए परमेश्वर का अपने न्याय और अपने अधिकारों की बात करना कोई अपराध नहीं। इसके विपरीत, यह परमेश्वर की महिमा है, जो जानता है कि अपने स्थान को सुरक्षित रखकर वह दूसरों की भलाई सुरक्षित कर रहा है। क्योंकि परमेश्वर अपनी सर्वोच्च प्रतिष्ठा को बनाए रखकर अपने प्राणियों के लिये उनका सबसे अनमोल धन सुरक्षित रखता है, अर्थात् एक ऐसा परमेश्वर जो उनके आदर और प्रेम के योग्य है।’
और अपनी पुस्तक मसीही विश्वास का बचाव में गोडे ‘यीशु मसीह की सिद्ध पवित्रता’ के विषय में इस प्रकार लिखते हैं:—
‘अलौकिक का सबसे ऊँचा रूप चमत्कार नहीं, पवित्रता है। चमत्कार में हम सर्वशक्ति को नैतिक व्यवस्था के हित में भौतिक संसार पर कार्य करने के लिये फूट निकलते देखते हैं। परन्तु पवित्रता अपने सबसे उदात्त प्रकटीकरण में स्वयं नैतिकता है। भलाई क्या है? हाल ही में ऐसी सटीकता के साथ, जिसमें कुछ भी कमी नहीं, कहा गया है कि भलाई कोई सत्ता—कोई वस्तु—नहीं है। वह एक नियम है जो वस्तुओं के बीच के सम्बन्धों को निर्धारित करता है, ऐसे सम्बन्ध जिन्हें स्वतंत्र इच्छाओं के द्वारा साकार किया जाना है। इसलिए सिद्ध भलाई सब प्राणियों के एक दूसरे के साथ उचित सम्बन्धों का एक ही साथ सामान्य और स्वतंत्र रूप से साकार होना है; जिसमें हर प्राणी, इसी सम्बन्ध के कारण, उस महान सम्पूर्णता में वह स्थान लेता है, और उसमें वह भूमिका निभाता है, जो उसके योग्य है।
‘अब, जैसे एक मानवीय परिवार में एक केन्द्रीय सम्बन्ध होता है जिस पर बाकी सब निर्भर करते हैं,—अर्थात् इस छोटी सी सम्पूर्ण इकाई के सब सदस्यों के साथ पिता का सम्बन्ध,—वैसे ही विश्व में एक सर्वोच्च स्थान है, जो बाकी सब का आधार है, और जिसे सब प्राणियों के हित में, बाकी सब से बढ़कर अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए—अर्थात् परमेश्वर का स्थान। और ठीक यहीं, भलाई के सामान्य क्षेत्र में, पवित्रता का विशेष क्षेत्र है। स्वयं परमेश्वर में पवित्रता उसका यह दृढ़ निश्चय है कि वह उस व्यवस्था को अक्षुण्ण रखे जो सब विद्यमान प्राणियों के बीच राज्य करनी चाहिए, और उन्हें एक दूसरे के साथ उस सम्बन्ध को साकार करने तक पहुँचाए जो उन्हें एक महान एकता में बाँधे रखे, और परिणामस्वरूप सबसे बढ़कर, स्वतंत्र प्राणियों के सम्बन्ध में अपने ही स्थान को अक्षुण्ण और उसकी उचित प्रतिष्ठा में बनाए रखे। इस प्रकार समझी गई परमेश्वर की पवित्रता में दो बातें सम्मिलित हैं—अपने ईश्वरीय जीवन का सारा धन हर उस स्वतंत्र प्राणी को देना जो उसकी प्रभुता को स्वीकार करने को तैयार है, और सच्चे मन से उसके अधीन हो जाता है; और उस सिद्ध जीवन को हर उस प्राणी से रोक लेना या वापस ले लेना जो उस प्रभुता पर आक्रमण करता या उसका इन्कार करता है, और निर्भरता के उस बन्धन को तोड़ फेंकना चाहता है जिससे उसे परमेश्वर से बँधे रहना चाहिए। प्राणी में पवित्रता परमेश्वर की सर्वोच्चता के प्रति उसकी अपनी स्वेच्छा से दी गई सहमति है। वह मनुष्य जो अपने स्वभाव की सारी शक्तियों के साथ परमेश्वर को सर्वोच्च, पूर्ण सत्ता, एकमात्र वह जो सचमुच है, मानकर उसका आदर करता है; वह मनुष्य जो उसकी उपस्थिति में अपनी शून्यता के बोध में स्वेच्छा से अपने आपको दण्डवत् करके गिरा देता है, और अपने सब संगी प्राणियों को भी इसी स्वेच्छापूर्ण आत्म-विलोपन में खींच लाना चाहता है, ऐसा करके पवित्रता का चरित्र धारण करता है। यह पवित्रता उसमें, जैसे परमेश्वर में, प्रेम और धार्मिकता, दोनों को समेटे हुए है; प्रेम, जिसके द्वारा वह परमेश्वर को, और परमेश्वर के चारों ओर के सब प्राणियों को, यह पहचानकर आनन्दित होता है कि वे उसी के द्वारा वहाँ रखे गए हैं जहाँ वे हैं। वह उनसे प्रेम करता है और उनके अस्तित्व की इच्छा करता है, क्योंकि वह परमेश्वर से प्रेम करता और उसके अस्तित्व की इच्छा करता है, और साथ ही उस सब की भी जिसकी परमेश्वर इच्छा करता और जिससे वह प्रेम करता है; और धार्मिकता, जिसके द्वारा वह परमेश्वर का, और परमेश्वर के द्वारा हर प्राणी को दिए गए क्षेत्र का आदर करता है, और जहाँ तक उसके वश में है, दूसरों से भी उसका आदर करवाता है। पवित्रता ऐसी ही है, जैसी वह परमेश्वर में और मनुष्य में है: परमेश्वर में वह उसकी अपनी अटल आत्म-पुष्टि है; मनुष्य में वह उसके द्वारा परमेश्वर की अटल पुष्टि है।
‘यीशु में ही मानव स्वभाव यह देखता है कि मनुष्य परमेश्वर की, और जिस सब की परमेश्वर पुष्टि करता है उसकी, केवल दीनता से ही नहीं, वरन् आनन्द से और पुत्र-भाव से, अपने अस्तित्व की सारी शक्तियों के साथ, यहाँ तक कि अपने आप के पूर्ण बलिदान तक, कैसे पुष्टि कर सकता है।’
सावधानी से मनन करने पर हम देखेंगे कि ऊपर के हर दृष्टिकोण में सत्य का कुछ अंश है। इससे हमें यह निश्चय हो जाएगा कि ईश्वरीय पवित्रता की धारणा को मानवीय विचार के लिये शब्दों में ढालने की यह कठिनाई ही कैसे यह सिद्ध करती है कि वह ईश्वरीय सत्ता की उस अकथनीय और अकल्पनीय महिमा की सबसे ऊँची अभिव्यक्ति है, जो उसे असीम और महिमामय परमेश्वर बनाती है। परमेश्वर के हर गुण—बुद्धि और सामर्थ्य, धार्मिकता और प्रेम—का प्रतिबिम्ब मानव स्वभाव में है, और अन्यजातियों के धर्म या दर्शन में वह परमेश्वर के विचार के साथ जुड़ा हुआ था। अपने आप से, जब हम अपूर्णता के विचार को हटा देते हैं, तो हम कुछ धारणा बना सकते हैं कि परमेश्वर क्या है। परन्तु पवित्रता वह है जो विशेष रूप से ईश्वरीय है, ईश्वरीय प्रकाशन की विशेष विषय-वस्तु। आओ, हम यह स्वीकार करना सीखें कि हम चाहे कितना ही, कभी एक ओर से, तो कभी दूसरी ओर से, इस विचार को पकड़ने का प्रयत्न करें, परमेश्वर की पवित्रता कुछ ऐसी है जो सब विचारों से परे है, एक ऐसी महिमा जो सोचने से उतनी नहीं, जितनी आराधना और संगति में जानी जाती है। पवित्रशास्त्र पवित्रता की उतनी बात नहीं करता, जितनी उस पवित्र की। जब हम आराधना करते और भय मानते, आज्ञा मानते और प्रेम करते हैं; जब हम परमेश्वर के साथ जीवन बिताते हैं, तभी उसकी महिमा का कुछ भेद खुलेगा। जब ईश्वरीय ज्योति हम में और हमारे द्वारा चमकेगी, तब वह पवित्र प्रकट होगा।
टिप्पणी D।
‘हमारी पवित्रता इसमें नहीं कि हम स्वयं बदलें और बेहतर बनें: वरन् वह वह है, स्वयं वही, जो हम में जन्म लेता और बढ़ता है, इस रीति से कि हमारे हृदयों को भर दे, और हमारे स्वाभाविक स्व को, “हमारे पुराने मनुष्यत्व” को, बाहर निकाल दे, जो स्वयं सुधर नहीं सकता, और जिसकी नियति केवल नाश होना है।
‘और यह एक प्रकार का देहधारण, जिसके द्वारा मसीह स्वयं हमारा नया स्व बन जाता है, कैसे सम्पन्न होता है? एक स्वतंत्र और नैतिक प्रक्रिया के द्वारा, जिसका वर्णन यीशु ने ऐसे शब्दों में किया है जो आश्चर्य में डालते हैं, क्योंकि वे उसकी पवित्रता को लगभग हमारी पवित्रता के ही धरातल पर रखते हैं: “जैसा जीविते पिता ने मुझे भेजा और मैं पिता के कारण जीवित हूँ वैसा ही वह भी जो मुझे खाएगा मेरे कारण जीवित रहेगा।”
‘यीशु ने अपने जीवन का पोषण उस पिता से पाया जिसने उसे भेजा था: वह पिता के कारण जीवित था। निस्सन्देह इसका अर्थ यह है कि हर बार जब उसे कुछ करना या कहना होता था, तो वह पहले अपने आपको मिटा देता था; फिर पिता पर छोड़ देता था कि वही उसमें सोचे, इच्छा करे, कार्य करे, सब कुछ हो। इसी प्रकार, जब हमें कोई कार्य करने, या कोई वचन कहने के लिये बुलाया जाता है, तो हमें पहले यीशु की उपस्थिति में अपने आपको मिटा देना चाहिए; और इच्छा के एक कार्य के द्वारा अपने भीतर हर इच्छा, हर विचार, अपने स्व के हर कार्य को दबा देने के बाद, हमें यीशु पर छोड़ देना है कि वह हम में अपनी इच्छा, अपनी बुद्धि, अपनी सामर्थ्य प्रकट करे। तब हम उसके कारण जीवित रहते हैं, जैसे वह पिता के कारण जीवित है। यह प्रक्रिया यीशु में और हम में एक-सी है। केवल यीशु में यह सीधे परमेश्वर के साथ चलती थी, क्योंकि वह उसके साथ प्रत्यक्ष संगति में था; जबकि हमारे विषय में यह व्यवहार यीशु के साथ होता है, क्योंकि विश्वासी उसी के साथ सीधा सम्पर्क रखता है, और उसी के द्वारा हम जीविते पिता को पा सकते और उसे अपना बना सकते हैं। इसी में मसीही पवित्रता का, जो सामान्यतः इतना कम समझा जाता है, भेद है।’ (गोडे, बाइबल अध्ययन, नया नियम, पृ. 190।)
टिप्पणी E।
मैं एक बार फिर पवित्रता के सब विद्यार्थियों का ध्यान मार्शल की पुस्तक पवित्रीकरण की ओर, और विशेष करके उसके तीसरे और चौथे अध्यायों की ओर दिलाता हूँ। यदि वे उसकी तुलना हमारी आधुनिक पुस्तकों से करें—उदाहरण के लिये, डॉ. एच. बोनार जैसे प्रतिष्ठित लेखक की पुस्तक पवित्रता का परमेश्वर का मार्ग—तो वे इस बात से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते कि मार्शल इस एक विचार को कितना प्रमुख स्थान देता है, कि हमारी पवित्रता, एक पवित्र स्वभाव, यीशु में हमारे लिये तैयार रखी गई है, और कि जैसे-जैसे विश्वास व्यक्तिगत संगति में यीशु के साथ हमारी एकता को ग्रहण करता और बनाए रखता है, पवित्रीकरण विश्वास के द्वारा होता है। जबकि दूसरी पुस्तकों में यीशु के साथ एकता, और उस पर विश्वास का केवल प्रसंगवश उल्लेख होता है, और मुख्य बल कर्तव्यों पर, और उन प्रेरणाओं पर दिया जाता है जो उन्हें पूरा करने को उकसाती हैं, वहाँ मार्शल दिखाता है कि प्रेरणाएँ हमें वह बल कभी नहीं दे सकतीं जिसकी हमें आवश्यकता है: यह हम में मसीह के जीवन की सामर्थ्य है, यह स्वयं मसीह है, जैसे-जैसे हम विश्वास के द्वारा उसमें जड़ पकड़ते हैं, जो हमारे सब काम हम में करता है।
इस पुस्तक का एक संक्षिप्त संस्करण, सर्वसाधारण के उपयोग के लिये, निस्बेट & कम्पनी द्वारा प्रकाशित है।
टिप्पणी F।
रोमियों 1:4 पर बेंगल की टिप्पणी।
‘पवित्रता की आत्मा के भाव से। hagios, पवित्र, शब्द जब परमेश्वर के विषय में कहा जाता है, तो केवल कार्य में निर्दोष खराई का ही नहीं, वरन् स्वयं ईश्वरत्व का, या अधिक ठीक कहें तो ईश्वरीयता का, अर्थात् ईश्वरीय स्वभाव की उत्तमता का बोध कराता है। इसलिए hagiosune (जो शब्द यहाँ प्रयोग हुआ है) का अर्थ hagiotes, पवित्रता, और hagiasmos, पवित्रीकरण, के बीच का एक प्रकार का मध्य अर्थ है। तुलना करो इब्रानियों 12:10 (hagiotes अर्थात् पवित्रता), पद 14 (hagiasmos अर्थात् पवित्रीकरण)। अतः मानो तीन श्रेणियाँ हैं: पवित्रीकरण, जीवन की पावनता, पवित्रता। पवित्रता पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को दी जाती है। और क्योंकि यहाँ पवित्र आत्मा का उल्लेख नहीं, वरन् पवित्रता की आत्मा का (ठीक-ठीक कहें तो पावनता, hagiosune), इसलिए हमें आगे यह पूछना चाहिए कि इस उल्लेखनीय अभिव्यक्ति का अर्थ क्या है। आत्मा नाम स्पष्ट रूप से और बहुत बार पवित्र आत्मा को दिया गया है; परन्तु परमेश्वर को भी आत्मा कहा गया है; और प्रभु यीशु मसीह को भी आत्मा कहा गया है, पर इस पिछले से भिन्नता में। (2 कुरिन्थियों 3:17।) इसके साथ हमें इस तथ्य की तुलना करनी चाहिए कि जैसे इस स्थल में, वैसे ही अक्सर जहाँ मसीह की बात होती है, वहाँ शरीर और आत्मा का विरोध पाया जाता है। (1 तीमुथियुस 3:16; 1 पतरस 3:18।) इन स्थलों में आत्मा शब्द उस सब पर लागू होता है जो मसीह का है (शरीर से अलग, यद्यपि वह शुद्ध और पवित्र था, और शरीर से ऊपर), पिता से उसके उत्पन्न होने के द्वारा, जिसने उसे पवित्र ठहराया: संक्षेप में, स्वयं उसका ईश्वरत्व। क्योंकि यहाँ शरीर और आत्मा, और अध्याय 9:5 में शरीर और ईश्वरत्व, एक दूसरे के विरोध में खड़े हैं। यहाँ इस आत्मा को पवित्रता की वह आत्मा नहीं कहा गया जो पवित्र आत्मा का सामान्य नाम है; परन्तु इस स्थल में इसे पावनता की आत्मा कहा गया है, ताकि एक ओर उस पवित्रता या ईश्वरत्व की प्रभावशीलता का बोध हो, जिसके कारण उद्धारकर्ता का पुनरुत्थान अनिवार्य रूप से हुआ, और जिसके द्वारा वह सबसे प्रबल रूप से प्रकट हुई, और दूसरी ओर यीशु की उस आत्मिक और पवित्र, या ईश्वरीय सामर्थ्य का, जिसकी महिमा हुई है और जिसने फिर भी एक आत्मिक देह बनाए रखी है। पुनरुत्थान से पहले आत्मा शरीर के नीचे छिपी थी; पुनरुत्थान के बाद पावनता की आत्मा ने शरीर को ढाँप लिया। पहली दशा के सम्बन्ध में वह अपने आपको मनुष्य का पुत्र कहा करता था; दूसरी के सम्बन्ध में वह परमेश्वर का पुत्र जाना जाता है।’
बेक अपनी पुस्तक शिक्षा-विज्ञान, पृ. 604, में इसे बहुत स्पष्टता से यों रखते हैं—
‘क्योंकि मसीह की निर्दोषता और शुद्धता उसके दुःखों और मृत्यु में किसी निष्क्रिय गुण के रूप में उपस्थित नहीं थीं, वरन् आत्मा की अविनाशी जीवन-सामर्थ्य में पूरी तरह क्रियाशील थीं, जब उसने हमारे लिये अपने आपको परमेश्वर के प्रति पवित्र किया (“सनातन आत्मा के द्वारा,” इब्रानियों 9:14—इसलिए रोमियों 1:4 में hagiosune, अर्थात् अपनी क्रिया में पवित्रता का स्वभाव या पावनता, न कि hagiotes, जो केवल एक भीतरी गुण है, या hagiasmos, जो अपने बनने की प्रक्रिया में पवित्रता है)—इसलिए उसके दुःख ने अनन्त छुटकारा पूरा किया।’
टिप्पणी G।
‘स्वतंत्र किए गए’ और ‘अधिकार में लिए गए’—छुटकारे का दोहरा परिणाम।
(पास्टर स्टॉकमायर के एक प्रवचन से।)‘जिसने अपने आपको हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिये एक निज प्रजा बना ले जो भले-भले कामों में सरगर्म हो।’
‘हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह के छुटकारे के कार्य में दो निश्चित भाग हैं। जब तक तुम इन दो निश्चित, अलग-अलग भागों को नहीं देख पाते, तब तक तुम मसीह में बने रहने का भेद कभी नहीं पाओगे। पहला है “यीशु मेरे लिये,” दूसरा “मैं यीशु के लिये।” धन्य हो हमारा उद्धारकर्ता कि वह पापियों के लिये आया। वह हमारे लिये। धन्य हो प्रभु कि दण्ड से छुटकारा है; परन्तु छुटकारे का पूरा अर्थ इतना ही नहीं है। तुम्हें छुटकारे के दूसरे भाग की स्पष्ट समझ होनी चाहिए, उसी पवित्र आत्मा के द्वारा जो हमें उस सब के पूरे अधिकार में ले जानेवाला मार्गदर्शक है जो मसीह ने जीते और मरते हुए हमारे लिये पूरा किया है। उसने अपने आपको दे दिया कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले—इसलिए नहीं कि हम अपनी ही शुद्धता या पवित्रता, या ऐसी बातों से प्रसन्न होने का सुख पाएँ; वरन् इसलिए कि वह हमें पूरी रीति से अपने लिये पा ले, अपने लिये शुद्ध करे, अपने ही लिये, न कि अपने और उनके लिये, वरन् अपने लिये, अपनी निज प्रजा।
‘अब छुटकारा क्या है?—स्व से, यहाँ तक कि आत्मिक स्व से भी स्वतंत्रता। हमें अपना केन्द्र आप नहीं होना है, अपने आनन्द, अपनी उन्नति का केन्द्र, अपने दुर्बल हाथों में अपने आत्मिक जीवन के धागे लिये हुए। मसीह के जीवन को छोड़ कोई सच्चा आत्मिक जीवन नहीं, और आरम्भ से अन्त तक उसकी देखभाल पूरी रीति से उसी के हाथ में होनी चाहिए। हे प्रिय भाइयो, तुम जो भूमि पर रेंग रहे थे, अपनी आँखें ऊपर उठाओ। हम परमेश्वर की महिमा के लिये बनाए गए हैं, कि यीशु के अधिकार में रहें। प्रभु परमेश्वर ने अपने पुत्र को, परमेश्वर का मेम्ना, अपने मेम्ने को देकर एक मार्ग निकाला, ताकि ऐसे स्वार्थी लोगों को, जो मसीही जीवन के मार्ग में भी स्व को खोजने और पालने के साधन ढूँढ़ लेते थे, ऐसे लोगों को अपने वास्तविक, व्यावहारिक अधिकार में ले ले, कि वे यीशु के अधिकार में रहें। यही छुटकारा है, और केवल यही; यही स्वतंत्रता है, और यही वास्तविकता है; यही वह है जो तृप्त करता है—अपने किसी अनुभव से सन्तुष्ट होना नहीं, वरन् अपने अनुभवों को छोड़ देना, और यह कहना, मैं स्वतंत्र हूँ, ऐसा स्वतंत्र जैसे इस्राएल के लोग मिस्र से निकलते समय थे, परमेश्वर की सेवा करने के लिये स्वतंत्र। “मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे जिससे वे मेरी उपासना करें।” तुम स्वतंत्र हो, मसीह के लहू के द्वारा स्वतंत्र, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा स्वतंत्र—कोई शरीर, कोई हाथ, कोई स्व तुम्हें पीछे रोक नहीं सकता। प्रभु ने उन सब शक्तियों पर अपनी भुजाएँ बढ़ाईं जिन्होंने हमें मिस्र के बन्धन में रखा था, और उसने उन पर जय पाई। तुम आकाश के पक्षी के समान यीशु में जीने के लिये स्वतंत्र हो—यही स्वतंत्रता है; तुम अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्र हो, अपने अस्तित्व की सबसे गहरी, भीतरी गहराइयों में स्वतंत्र, यीशु के लिये स्वतंत्र, उसके अधिकार में, उसकी निज प्रजा। मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे, परमेश्वर ने कहा। इसलिए, मैंने अपना लहू दे दिया है, यीशु ने कहा; और कोई शरीर, कोई पाप, कोई स्व यीशु के लहू के विरुद्ध दावा नहीं कर सकता। उसने अपने लिये, न कि हमारे लिये, अपनी निज प्रजा छुड़ा ली है….
‘तुम यीशु में बने रहने के भेद के विषय में पूछ रहे हो। क्या तुमने यूहन्ना के 15वें अध्याय में यह नहीं देखा कि बने रहना और फल लाना अलग नहीं किए जा सकते? तुम यीशु में उसके आनन्द के लिये, और अपनी भीतरी तृप्ति के लिये, बने नहीं रह सकते। बने रहने का भेद यह है कि एक छुड़ाए हुए व्यक्ति के रूप में छुटकारे के दूसरे भाग में उतनी ही दृढ़ता से खड़े रहो जितनी पहले में। अब मैं यीशु के लिये जी रहा हूँ, और मुझे केवल यह पूछना है, प्रभु, अब तू क्या करवाना चाहता है? मैं तेरे लिये हूँ। मैं यीशु के लिये हूँ। मुझे केवल पीछे चलना है, एक पवित्र किए हुए के रूप में, एक अधिकार में लिए हुए के रूप में, उसके रूप में जो अब अपने लिये नहीं जीता, जिसने अपना जीवन यीशु के हाथों में सौंप दिया है, पीछे चलना है। ओह, बने रहने के ये प्रश्न कैसे सरल हो जाते हैं! यह रहस्यवाद नहीं; यह कोई विशेष अनुभव नहीं। यह केवल एक तथ्य है। मुझे हर क्षण यीशु की आवश्यकता है, और मेरी परीक्षाएँ और मेरे कर्तव्य, दोनों मसीह के साथ संगति के इस जीवन को साकार करने के अवसर बन जाते हैं। ओह, हाँ, यही छुटकारा है! हे परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र, परमेश्वर पवित्र आत्मा की महान सामर्थ्य, जो तुम्हारे और मेरे जैसी ऐसी दुर्बल, असहाय, अविश्वासयोग्य वस्तु को जीवन के केन्द्र में बनाए रखने के लिये लगी हुई है! पवित्र आत्मा के द्वारा छाप लगी हुई, और परमेश्वर अपनी छाप कभी न तोड़ेगा।’
समाप्त।
मॉरिसन और गिब, मुद्रक, एडिनबर्ग।
अध्याय 33 पूरा हुआ
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