अध्याय 31 · 13 मिनट का पठन
उस पवित्र से अभिषेक
‘और तुम्हारा तो उस पवित्र से अभिषेक हुआ है, और तुम सब सत्य जानते हो। और तुम्हारा वह अभिषेक, जो उसकी ओर से किया गया, तुम में बना रहता है; और तुम्हें इसका प्रयोजन नहीं, कि कोई तुम्हें सिखाए, वरन् जैसे वह अभिषेक जो उसकी ओर से किया गया तुम्हें सब बातें सिखाता है, और यह सच्चा है, और झूठा नहीं और जैसा उसने तुम्हें सिखाया है वैसे ही तुम उसमें बने रहते हो।’—1 यूहन्ना 2:20, 27।
मूसा के द्वारा परमेश्वर की पवित्रता और उसके पवित्र करने की रीति के प्रकाशन में, याजक, और विशेष करके महायाजक, मनुष्य में परमेश्वर की पवित्रता की मुख्य अभिव्यक्ति थे। स्वयं याजकों में, अभिषेक का पवित्र तेल उस अनुग्रह का एक महान प्रतीक था जो पवित्र करता है। मूसा को अभिषेक का पवित्र तेल बनाना था: ‘अभिषेक के तेल में से कुछ कुछ लेकर हारून पर, और उसके पुत्रों पर भी छिड़क देना; तब वह और उसके पुत्र भी पवित्र हो जाएँगे।’ ‘यह मेरे लिये पवित्र अभिषेक का तेल होगा। यह किसी मनुष्य की देह पर न डाला जाए, और मिलावट में उसके समान और कुछ न बनाना; यह पवित्र है, यह तुम्हारे लिये भी पवित्र होगा’ (निर्गमन 29:21, 30:25-32)। इसी से याजकों का, और विशेष करके महायाजकों का, अभिषेक और संस्कार होना था: ‘जो अपने भाइयों में महायाजक हो, जिसके सिर पर अभिषेक का तेल डाला गया हो, वह पवित्रस्थान से बाहर भी न निकले, और न अपने परमेश्वर के पवित्रस्थान को अपवित्र ठहराए; क्योंकि वह अपने परमेश्वर के अभिषेक का तेलरूपी मुकुट धारण किए हुए है’ (लैव्यव्यवस्था 21:10, 12)। और इसी प्रकार दाऊद के विषय में, जो मसीहा का प्रतिरूप था, कहा गया है, ‘हमारा राजा इस्राएल के पवित्र की ओर से है। मैंने अपने दास दाऊद को लेकर, अपने पवित्र तेल से उसका अभिषेक किया है।’
हम जानते हैं कि इब्रानी नाम मसीहा और यूनानी नाम ख्रीष्ट, दोनों का सम्बन्ध इसी से है। इसलिए अभी उद्धृत किए गए स्थल में इब्रानी में यह है, ‘अपने पवित्र तेल से मैंने उसको मसीहा-अभिषिक्त किया है।’ और इसी प्रकार प्रेरितों के काम 10:38 जैसे स्थल में: ‘यीशु नासरी के विषय में, जिसे परमेश्वर ने पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से ख्रीष्ट-अभिषिक्त किया।’ या भजन संहिता 45: ‘परमेश्वर ने तुझको तेरे साथियों से अधिक हर्ष के तेल से मसीहा-अभिषिक्त किया है;’ इब्रानियों 1:9 में, ‘तेरे परमेश्वर ने हर्षरूपी तेल से तेरा ख्रीष्ट-अभिषेक किया।’ और इसलिए (जैसा हमारी एक सुधारवादी प्रश्नोत्तरी, हाइडलबर्ग प्रश्नोत्तरी, इस प्रश्न के उत्तर में कहती है कि तू मसीही क्यों कहलाता है?) हम मसीही कहलाते हैं, क्योंकि हम उसके साथ उसके ख्रीष्ट-अभिषेक के, उसके अभिषेक के, सहभागी हैं। यही वह अभिषेक है जिसके विषय में यूहन्ना बोलता है, उस पवित्र का chrisma अर्थात् ख्रीष्ट-अभिषेक। पवित्र आत्मा ही वह पवित्र अभिषेक है जो हर एक विश्वासी को मिलता है: जो परमेश्वर ने अपने पुत्र के साथ उसे मसीह बनाने के लिये किया, वही वह मेरे साथ मुझे मसीही बनाने के लिये करता है। ‘तुम्हारा तो उस पवित्र से अभिषेक हुआ है।’
1. तुम्हारा तो उस पवित्र से अभिषेक हुआ है। पिता उस पवित्र के रूप में ही अभिषेक देता है: जिससे वह अभिषेक करता है, वह पवित्रता का तेल, अर्थात् पवित्र आत्मा, कहलाता है। पवित्रता सचमुच एक ईश्वरीय सुगन्धित तेल है। जैसे उस सुगन्ध से अधिक सूक्ष्म और भीतर तक पैठनेवाली कोई वस्तु नहीं जिससे सुगन्धित तेल घर को भर देता है, वैसे ही पवित्रता स्वर्गीयता का एक अवर्णनीय, सब में व्याप्त श्वास है, जो उस मनुष्य में समा जाता है जिस पर अभिषेक ठहरा है। पवित्रता कुछ विशेष कामों में नहीं है: वह तो धार्मिकता है। पवित्रता उस पवित्र की अदृश्य और फिर भी प्रगट उपस्थिति है, जो उसके अभिषिक्त पर ठहरी रहती है। अभिषेक केवल सीधे उस पवित्र ही से मिलता है, या यों कहें कि केवल मसीह में, जो परमेश्वर का पवित्र जन है, उसके साथ बनी रहनेवाली सहभागिता में ही मिलता है।
और उसे पाता कौन है? केवल वही जिसने अपने आपको पूरी रीति से इसलिए सौंप दिया है कि जैसा परमेश्वर पवित्र है वैसा ही वह भी पवित्र हो। अभिषेक याजक को मिलता था, जो प्रभु के लिये पवित्र होने को अलग किया गया था: दूसरे मनुष्यों की देह पर वह डाला नहीं जाना था। कितने लोग उस बहुमूल्य सुगन्धित तेल को केवल इसलिए पाना चाहेंगे कि उसकी सुगन्ध उन्हें अपने लिये मिले! नहीं, केवल वही उसे पा सकता है जो पूरी रीति से उस पवित्र की सेवा के लिये, पवित्रस्थान के काम के लिये, अर्पित है। यदि किसी ने कहा होता: मैं अभिषेक तो पाना चाहता हूँ, पर याजक नहीं बनना चाहता; मैं इसके लिये तैयार नहीं कि जाऊँ और अपने परमेश्वर को ढूँढ़नेवाले पापियों की पुकार पर सदा उपस्थित रहूँ—तो उसका उसमें कोई भाग न हो सकता था। पवित्रता वह शक्ति है जो केवल पवित्र करने के लिये, और ऐसा करके आशीष देने के लिये जीती है: उस पवित्र का अभिषेक याजक के लिये है, परमप्रधान परमेश्वर के सेवक के लिये। केवल उस प्राण की तीव्रता में, जो सचमुच जाग उठा है और परमेश्वर की महिमा, परमेश्वर के राज्य, परमेश्वर के काम के लिये सौंप दिया गया है, पवित्रता एक वास्तविकता बनती है। पवित्र वस्त्र केवल याजकों और उनकी सेवा के लिये ही तैयार किए गए थे। पवित्रता की अपनी सारी खोज में हम इसे स्मरण रखें। जैसे हम इस भूल से सावधान रहते हैं कि मसीह के लिये किया गया काम हमें पवित्र कर देगा, वैसे ही हम दूसरी भूल से भी चौकस रहें—बिना काम के पवित्रता के पीछे खिंचे रहना। वह याजक, जो पवित्रस्थान और उस पवित्र की सेवा के लिये अलग किया गया है—वह विश्वासी, जो इसके लिये जीने और मरने को तैयार है कि उसके आस-पास के मनुष्यों में परमेश्वर की पवित्रता विजयी हो—वही अभिषेक पाएगा।
2. ‘वह अभिषेक तुम्हें सिखाता है।’ नया मनुष्यत्व धार्मिकता और पवित्रता के साथ-साथ ज्ञान में भी सृजा गया है। मसीह धार्मिकता और पवित्रता के साथ-साथ हमारे लिये ज्ञान भी ठहरा है। परमेश्वर की सेवा और हमारी पवित्रता, सबसे बढ़कर, उसकी धन्य इच्छा की एक स्वतंत्र और पूर्ण, समझदार और अत्यन्त तत्पर स्वीकृति होनी चाहिए। और इसलिए अभिषेक, हमें पवित्रस्थान की सेवा के योग्य बनाने के लिये, हमें सब बातें जानना सिखाता है। जैसे सुगन्धित तेल की सुगन्ध सबसे सूक्ष्म सार है, एक ऐसी वस्तु जो सूँघे जाने के सिवा और किसी रीति से कभी पाई या अनुभव नहीं की गई, वैसे ही वह आत्मिक शक्ति जो अभिषेक देता है, जितनी सूक्ष्म हो सकती है उतनी सूक्ष्म है। वह ऐसा कर देता है कि ‘यहोवा का भय सुगन्ध—सा भाए:’ वह हमें एक ईश्वरीय सहज-बोध से सिखाता है, जिसके द्वारा अभिषिक्त जन पहचान लेता है कि किसमें स्वर्गीय सुगन्ध है, और क्या पृथ्वी का है। अभिषेक ही वचन को, और वचन में यीशु के नाम को, सचमुच उण्डेले हुए इत्र के तुल्य बना देता है।
इस प्रकार अभिषेक का बड़ा चिन्ह है—सीखने की तत्परता। मसीह का, जो परमेश्वर का पवित्र जन और अभिषिक्त है, बड़ा चिन्ह यही है कि वह सुनता है: ‘मैं अपनी ओर से नहीं कहता; जैसा सुनता हूँ, वैसा ही कहता हूँ।’ और पवित्र आत्मा के विषय में भी ऐसा ही है: ‘वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा।’ इसके सिवा और हो भी नहीं सकता: जिसका इस मसीह के अभिषेक से, इस पवित्र आत्मा से, अभिषेक हुआ है, वह सीखने को तत्पर होगा, सिखाए जाने के लिये सुनेगा। ‘वह अभिषेक सिखाता है।’ ‘और तुम्हें इसका प्रयोजन नहीं, कि कोई तुम्हें सिखाए, वरन् वह अभिषेक तुम्हें सब बातें सिखाता है।’ ‘वे सब परमेश्वर की ओर से सिखाए हुए होंगे,’ इसमें हर एक विश्वासी सम्मिलित है। सच्ची पवित्रता का भेद उस पवित्र के साथ एक बहुत ही सीधा और व्यक्तिगत सम्बन्ध है: वचन के या मनुष्यों के द्वारा मिलनेवाली सारी शिक्षा पूरी रीति से पवित्र आत्मा की व्यक्तिगत शिक्षा पर निर्भर और उसके अधीन कर दी जाए। शिक्षा अभिषेक के द्वारा आती है। पहले-पहल विचारों या भावनाओं में नहीं, वरन् उस सब में व्याप्त सुगन्ध में जो इस बात से आती है कि ताजा तेल सारे भीतरी मनुष्यत्व में समा गया है।
3. ‘और तुम्हारा वह अभिषेक तुम में बना रहता है।’ ‘तुम में।’ आत्मिक जीवन में यह बहुत गहरे महत्त्व की बात है कि हम वस्तुगत और आत्मगत के बीच का सामंजस्य सदा बनाए रखें: मसीह में परमेश्वर मेरे ऊपर, आत्मा में परमेश्वर मेरे भीतर। हम में—किसी स्थान के समान नहीं, वरन् हम में, हमारे साथ एक होकर, हमारे अस्तित्व के सबसे गुप्त भाग में प्रवेश करके, और सब में व्याप्त होकर, हमारी देह तक में वास करके—अभिषेक हम में बना रहता है, और हमारे अपने अस्तित्व का अंग बन जाता है। और यह ठीक उसी अनुपात में होता है जिसमें हम उसे जानते हैं और अपने आपको उसे सौंप देते हैं, जिसमें हम बाट जोहते और शान्त रहते हैं कि वह गुप्त सुगन्ध हमारे सारे अस्तित्व में समा जाए। और यह भी रुक-रुककर नहीं, वरन् एक निरन्तर और न बदलनेवाले अनुभव के रूप में। परिस्थितियों और भावनाओं से ऊपर, ‘अभिषेक बना रहता है।’ सचमुच किसी स्थिर दशा के रूप में नहीं, न किसी ऐसी वस्तु के रूप में जो हमारे अपने अधिकार में हो; वरन् नये जीवन की व्यवस्था के अनुसार, उस पवित्र पर विश्वास की निर्भरता में, और यीशु की सहभागिता में। ‘तूने ताजे तेल से मेरा अभिषेक किया है,’—यह वस्तुगत पक्ष है; हर नये भोर को विश्वासी पिता से उस ईश्वरीय दान के नये किए जाने की बाट जोहता है। ‘वह अभिषेक तुम में बना रहता है,’—यह आत्मगत पक्ष है; पवित्र जीवन, विश्वास और सहभागिता का जीवन, अर्थात् अभिषेक, सदा, पल-पल, एक आत्मिक वास्तविकता है। अभिषेक का पवित्र तेल, जो सदा ताजा है, वह अभिषेक जो सदा बना रहता है—यही पवित्रता का भेद है।
4. ‘और जैसा उसने तुम्हें सिखाया है वैसे ही तुम उसमें बने रहते हो।’ यहाँ हम फिर पवित्र त्रिएकता को पाते हैं: वह पवित्र, जिससे पवित्र अभिषेक आता है; पवित्र आत्मा, जो स्वयं वह अभिषेक है; और मसीह, परमेश्वर का पवित्र जन, जिसमें बने रहना अभिषेक हमें सिखाता है। मसीह में परमेश्वर की अदृश्य पवित्रता हमारे सामने रखी गई, और निकट लाई गई: वह मानवीय बनी, एक मानवीय स्वभाव में धारण की गई, ताकि वह हमें दी जा सके। हमारे भीतर पवित्र आत्मा वास करता और काम करता है, हमें परमेश्वर के मसीह की ओर खींचता है, मन और इच्छा में हमें उसके साथ जोड़ता है, उसे प्रगट करता है, उसे हमारे भीतर गढ़ता है, ताकि उसकी समानता और उसका मन हम में देहधारी हो जाए। इसी प्रकार हम मसीह में बने रहते हैं: उस पवित्र का पवित्र अभिषेक हमें यही सिखाता है। सच्चे अभिषेक की परख यही है: मसीह में बने रहना, जैसा उसने चाहा था, हम में सत्य बन जाता है। यहाँ पवित्रता का वह जीवन है जैसा तीन बार पवित्र परमेश्वर उसे देता है: पिता, पहला, वह पवित्र, जो पवित्र करता है; पुत्र, दूसरा, उसका पवित्र जन, जिसमें हम हैं; आत्मा, तीसरा, जो हम में वास करता है, और जिसके द्वारा हम मसीह में बने रहते हैं, और मसीह हम में। इसी प्रकार तीन बार पवित्र परमेश्वर हमें पवित्र करता है।
आओ, हम उस ईश्वरीय अभिषेक का अध्ययन करें। वह उस पवित्र से आता है। उसके समान और कोई नहीं। यह हमें पवित्र करने की—हमें अपने पवित्र याजक बनाने की—परमेश्वर की रीति है। यह हमें मसीह में पवित्रता के भागी बनाने की परमेश्वर की रीति है। वह अभिषेक, जो दिन-प्रतिदिन उससे पाया जाता है, जो हम में बना रहता है, जो हमें सब बातें सिखाता है, विशेष करके मसीह में बने रहना सिखाता है, हर दिन हम पर होना चाहिए। उसकी सूक्ष्म, सब में व्याप्त सामर्थ्य हमारे सारे जीवन में से होकर जानी चाहिए: सुगन्धित तेल की सुगन्ध से घर भर जाना चाहिए। परमेश्वर धन्य हो, वह ऐसा कर सकता है! वह अभिषेक जो बना रहता है, मसीह में बने रहने को एक वास्तविकता और एक निश्चितता बना देता है; और स्वयं परमेश्वर, वह पवित्र, उस बने रहनेवाले अभिषेक को भी एक वास्तविकता और एक निश्चितता बना देता है। उसके पवित्र नाम की स्तुति हो!
पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।
हे तू, जो वह पवित्र है, मैं अब नये अभिषेक के लिये तेरे पास आता हूँ। हे पिता! यही वह एक दान है जिस पर तेरी सन्तान सबसे निश्चित रूप से भरोसा रख सकती है—तेरे पवित्र आत्मा का दान। मुझे अभी यह गाने का अनुग्रह दे, ‘तूने मेरे सिर पर तेल मला है;’ ‘तूने ताजे तेल से मेरा अभिषेक किया है।’
मैं गहरी लज्जा के साथ मान लेना चाहता हूँ कि तेरा आत्मा बहुत शोकित और अपमानित हुआ है। कितनी बार शारीरिक मन ने तेरी आराधना में उसका स्थान छीन लिया है! शारीरिक इच्छा ने कितना अधिक उसका काम करने का यत्न किया है! हे मेरे पिता! अपनी ज्योति को मुझ में से होकर चमकने दे, ताकि वह मुझे इसके विषय में बहुत गहराई से कायल करे। मनुष्य के सारे चाहने और दौड़ने पर तेरा न्याय आए।
हे धन्य पिता! मुझे अभी, अपनी महिमा के धन के अनुसार, यह दे कि मैं तेरे आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त होता जाऊँ। मेरे विश्वास को दृढ़ कर कि मैं उसके अभिषेक में पूरा भाग पाने के लिये मसीह पर विश्वास करूँ। आह, मुझे दिन-प्रतिदिन ताजे तेल से अभिषेक की बाट जोहना और उसे ग्रहण करना सिखा!
हे मेरे पिता! मुझे और अपनी सब सन्तानों को खींच, ताकि हम देखें कि मसीह में बने रहने के लिये हमें बने रहनेवाले अभिषेक की आवश्यकता है। हे पिता! हम विश्वास की निर्भरता में, भीतरी और सदा बने रहनेवाले अभिषेक पर भरोसा रखते हुए, दीनता से चलना चाहते हैं। इस प्रकार हम सब के लिये मसीह की सुगन्ध बनें। आमीन।
1. मुझे लगता है कि अब मैं वह कारण जानता हूँ कि क्यों हम कभी-कभी बने रहने में चूक जाते हैं। हम सोचते और पढ़ते हैं, हम सुनते और प्रार्थना करते हैं, हम विश्वास करने का यत्न करते और केवल यीशु की ओर देखने का प्रयास करते हैं, फिर भी हम चूक जाते हैं। जिस बात की घटी थी वह यह थी: ‘वह अभिषेक तुम्हें सिखाता है; जैसा उसने तुम्हें सिखाया है वैसे ही तुम उसमें बने रहते हो;’ बस इतनी ही दूर, इससे आगे नहीं।
2. धोया जाना सदा अभिषेक से पहले होता है: यदि हम शुद्ध किए जाने में चूक जाएँ तो हम अभिषेक नहीं पा सकते। जब हम शुद्ध किए और अभिषिक्त किए जाते हैं, तब हम काम में लाए जाने के योग्य होते हैं।
3. क्या तुम बने रहनेवाला अभिषेक पाना चाहते हो? अपने आपको पूरी रीति से सौंप दो कि तुम पवित्र किए जाओ और स्वामी के काम के योग्य बनाए जाओ: परमपवित्र स्थान में, परमेश्वर की उपस्थिति में वास करो: हर ताड़ना को फटे हुए शरीर के मार्ग की सहभागिता मानकर स्वीकार करो: निश्चय जानो कि यीशु के साथ एकता में अभिषेक बहता रहेगा। ‘यह तो उस उत्तम तेल के समान है, जो हारून के सिर पर डाला गया था, और उसके वस्त्र की छोर तक पहुँच गया।’
4. अभिषेक वह ईश्वरीय सुरमा है जो यीशु को जानने के लिये मन की आँखें खोलता है। इसी प्रकार वह उसमें बने रहना सिखाता है। मुझे निश्चय है कि अधिकांश मसीहियों को विचारों के धर्म के खतरे और छल की कोई कल्पना तक नहीं—ऐसा धर्म जिसमें पुस्तकों और प्रचार के द्वारा मधुर और बहुमूल्य विचार तो हमारे पास आते हैं, पर सामर्थ्य बहुत थोड़ी होती है। पवित्र आत्मा की शिक्षा पहले मन के भीतर होती है; मनुष्य की शिक्षा बुद्धि में। हमारा सारा सोचना हमें सदा इस ओर ले चले कि हम सोचना छोड़ दें, और अपने हृदय और इच्छा को आत्मा के लिये खोल दें, कि वह वहाँ अपनी ईश्वरीय रीति से, विचार और भावना से भी गहराई में, सिखाए। अदृश्य रूप से, परदे के भीतर, पवित्र आत्मा बना रहता है। चुप और शान्त रहो, विश्वास करो और आशा रखो, और यीशु से लिपटे रहो।
5. भला होता कि परमेश्वर अपनी कलीसिया की सुधि ले, और अपनी सन्तानों को सिखाए कि पूरे अभिषेक की—उस अभिषेक की जो बना रहता है और बने रहना सिखाता है—बाट जोहना, उसे ग्रहण करना, और उसमें चलना क्या है! भला होता कि हर एक विश्वासी में पवित्र आत्मा की व्यक्तिगत अगुवाई का सत्य कलीसिया में फिर से स्थापित हो जाता! वह यह कर रहा है; वह यह करेगा।
इकतीसवाँ दिन।
अध्याय 31 पूरा हुआ
उस पवित्र से अभिषेक