मसीह में पवित्र
पवित्रता और ताड़ना

अध्याय 30 · 15 मिनट का पठन

पवित्रता और ताड़ना

‘वह तो हमारे लाभ के लिये ताड़ना करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएँ। उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।’—इब्रानियों 12:10, 14।

परमेश्वर के वचन का शायद कोई भी भाग दुःख पर ऐसा ईश्वरीय प्रकाश नहीं डालता जैसा इब्रानियों की पत्री डालती है। वह ऐसा इसलिए करती है क्योंकि वह हमें सिखाती है कि परमेश्वर के पुत्र के लिये दुःख क्या था। दुःख ने उसकी मनुष्यता को सिद्ध किया। उसी ने उसे दयालु महायाजक के रूप में उसके काम के लिये इतना योग्य बनाया। उसी ने यह प्रमाणित किया कि वह, जिसने दुःख सहती हुई आज्ञाकारिता में परमेश्वर की इच्छा पूरी की थी, सचमुच इस योग्य है कि महिमा में उसी इच्छा को पूरा करानेवाला हो, और ऊँचे स्थानों पर महामहिमन् के दाहिने जा बैठे। ‘परमेश्वर को यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।’ ‘पुत्र होने पर भी, उसने दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी, और सिद्ध बनकर, अपने सब आज्ञा माननेवालों के लिये सदाकाल के उद्धार का कारण हो गया।’ जैसे उसने अपने दुःख के विषय में स्वयं कहा, ‘मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ,’ वैसे ही हम यहाँ देखते हैं कि उसके दुःख सचमुच उसके लिये सिद्धता और पवित्रता का मार्ग थे।

मसीह जो कुछ था और उसने जो कुछ प्राप्त किया, वह सब हमारे लिये था। वह सामर्थ्य जो दुःख में उसके भीतर सिद्धता उत्पन्न करने के लिये प्रमाणित हुई, वह सामर्थ्य जो उसने दुःख के द्वारा अपने आपको पवित्र करते हुए उसमें डाल दी, वही उस नये जीवन की सामर्थ्य है जो उससे हम तक आता है। उसके उदाहरण के प्रकाश में हम देख सकते हैं, और उसकी सामर्थ्य पर विश्वास करके हम भी अनुभव से प्रमाणित कर सकते हैं, कि परमेश्वर की सन्तान के लिये दुःख पिता के प्रेम का चिन्ह और उसकी सबसे समृद्ध आशीष का माध्यम है। ऐसे विश्वास के लिये दुःख का प्रत्यक्ष भेद एक ईश्वरीय आवश्यकता के सिवा और कुछ नहीं दिखता—वह हलका सा क्लेश जो उत्पन्न करता जाता है—हाँ, उत्पन्न करता जाता है और सचमुच महिमा का अत्यन्त भारी बोझ प्रगट कर देता है। हम केवल उस बात से सहमत ही नहीं होते जो लिखी है, ‘उसे यही अच्छा लगा कि उद्धार के कर्ता को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे,’ वरन् कुछ-कुछ समझ भी लेते हैं कि यह कितना ईश्वरीय रूप से उचित और योग्य है कि हम भी दुःख के द्वारा पवित्र किए जाएँ।

‘वह तो हमारे लाभ के लिये ताड़ना करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएँ।’ शोकितों के लिये पवित्रशास्त्र में जितने बहुमूल्य वचन हैं, उनमें शायद ही कोई ऐसा हो जो हमें इससे अधिक सीधे और इससे अधिक गहराई से उस आशीष की परिपूर्णता में ले जाता हो जो दुःख के द्वारा मिलनी है। यह उसकी पवित्रता है, परमेश्वर की अपनी पवित्रता, जिसके हमें भागी बनाया जाना है। इस पत्री ने हमारी पवित्रता के विषय में उसके ईश्वरीय पक्ष से बहुत स्पष्ट रूप से बात की थी—कि वह स्वयं यीशु के द्वारा हमारे लिये पूरी की गई है, और हम में पूरी की जानी है। ‘पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही मूल से हैं।’ ‘हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’ हमारे पाठ में हम दूसरा पक्ष देखते हैं, वह बढ़ता हुआ काम जिसके द्वारा हमें व्यक्तिगत रूप से इस ईश्वरीय पवित्रता को ग्रहण करना और स्वेच्छा से अपना बनाना है। उस सब को देखते हुए जो हम में परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है, और जिसे खोजकर तोड़ा जाना अवश्य है, इससे पहले कि हम समझें कि अपनी इच्छा को छोड़ देना और परमेश्वर की इच्छा में आनन्दित होना क्या है; दुःख की उस व्यक्तिगत सहभागिता को देखते हुए, जो अकेली ही हमें इस बात की पूरी कदर तक पहुँचा सकती है कि यीशु ने हमारे लिये क्या सहा और क्या किया; और इसे भी देखते हुए कि हमें अपने पर्याप्त भाग के रूप में परमेश्वर के प्रेम में पूरी तरह व्यक्तिगत प्रवेश करना और उसी से सन्तुष्ट होना है—ताड़ना और दुःख परमेश्वर के पवित्र करने के काम के अनिवार्य अंग हैं। इन तीन पहलुओं में हम देखेंगे कि जिसकी आवश्यकता पुत्र को थी, वही हमें भी चाहिए; और जो पुत्र के लिये इतना अकथनीय मूल्य रखता था, वह हमारे लिये भी आशीष में कम समृद्ध न होगा।

ताड़ना परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करने की ओर ले जाती है। हम देख चुके हैं कि परमेश्वर की इच्छा हमारी पवित्रता है; कि परमेश्वर की इच्छा ही में मसीह ने हमें पवित्र किया है; वरन् इससे भी बढ़कर, कि उसने अपनी इच्छा को पूरी रीति से परमेश्वर को सौंपकर अपने आपको पवित्र करने में ही हमें पवित्र करने की सामर्थ्य पाई। उसके ‘मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूँ’ का मूल्य उसके निरन्तर ‘मेरी नहीं’ से ही आया। और जहाँ कहीं परमेश्वर ताड़ना या दुःख लेकर आता है, वहाँ उसका सबसे पहला उद्देश्य यही होता है कि वह हम से अपनी धन्य इच्छा के साथ एकता माँगे और उसे हम में उत्पन्न करे, ताकि उसके द्वारा हम उसके साथ और उसके प्रेम के साथ एक हो जाएँ। वह किसी एक ऐसी बात में आता है जिसमें उसकी इच्छा हमारे सबसे प्रिय स्नेह या अभिलाषा को काटती है, और माँगता है कि जो हम चाहते हैं उसे हम उसके हाथ सौंप दें जो वह चाहता है। जब यह स्वेच्छा से और प्रेम से किया जाता है, तब वह प्राण को आगे ले चलकर दिखाता है कि उस एक बात में बलिदान की माँग वास्तव में एक सिद्धान्त की घोषणा है—कि हर बात में उसकी इच्छा ही हमारी एकमात्र अभिलाषा हो। धन्य है वह प्राण जिसके लिये क्लेश उसकी इच्छा के अलग-अलग कामों के आगे संघर्ष और अधीनता के अलग-अलग कामों की शृंखला भर नहीं, वरन् उस पाठशाला में प्रवेश है जहाँ हम परमेश्वर की सारी भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा को परखते और अनुभव से मालूम करते हैं।

कभी-कभी परमेश्वर की सन्तानों को भी ऐसा लगा है मानो क्लेश आशीष न हो: वह बुरे स्वभाव को इतना भड़का देता है, और परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध मन का सारा विरोध इस प्रकार उभार देता है, कि उस शान्ति और भक्ति की हानि हो गई है जो कभी राज्य करती हुई दिखाई देती थी। ऐसी दशाओं में भी वह परमेश्वर का अभिप्राय पूरा कर रहा होता है। ‘कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या-क्या है,’ जंगल में ले चलने में उसका यही उद्देश्य अब भी है। जितना हम जानते भी नहीं, उससे कहीं अधिक हमारा धर्म प्रायः स्वार्थी और ऊपरी होता है: जब हम ताड़ना की शिक्षा को स्वीकार करते हैं, और उस हठीली इच्छा और संसार के प्रेम को पहचान लेते हैं जो अब भी हम पर प्रबल है, तब हम उसका एक सबसे पहला और सबसे आवश्यक पाठ सीख चुके होते हैं।

यह पाठ विशेष रूप से कठिन तब होता है जब परीक्षा सीधे परमेश्वर की ओर से नहीं, वरन् मनुष्यों या परिस्थितियों के द्वारा आती है। बीच के कारणों को देखते रहने में, और उन्हें हटाने का यत्न करने में, क्रोध या शोक की भावना में, हम प्रायः यह देखना बिलकुल भूल जाते हैं कि जो कुछ उसका प्रबन्ध होने देता है, उस सब में परमेश्वर की इच्छा है। जब तक हम ऐसा करते रहते हैं, ताड़ना निष्फल रहती है; और शायद हमें और भी कठोर बना देती है। यदि पवित्रता के मार्ग के इस अध्ययन में हमारे भीतर यह अभिलाषा जागी है कि हम परमेश्वर की सारी इच्छा को स्वीकार करें, उसकी आराधना करें, और उसमें सिद्ध होकर खड़े रहें, तो आओ, सबसे पहले हम उस इच्छा को हर उस बात में पहचानने का यत्न करें जो हम पर आती है। जो हमें सताता है उसका पाप परमेश्वर की इच्छा नहीं है। परन्तु यह परमेश्वर की इच्छा अवश्य है कि हम कठिनाई की उस स्थिति में हों, ताकि परखे और जाँचे जाएँ। हमारा पहला विचार यह हो: कठिनाई की यह स्थिति मेरे लिये मेरे पिता की इच्छा है: मैं उस इच्छा को अभी के लिये अपना स्थान मानकर स्वीकार करता हूँ, जहाँ वह मुझे परखना उचित समझता है। परीक्षा को इस प्रकार स्वीकार करना ही उसे आशीष में बदलने का मार्ग है। यह हमें दिन भर परमेश्वर की सारी इच्छा में और भी स्पष्ट रूप से बने रहने की ओर ले चलेगा।

ताड़ना परमेश्वर के पुत्र की सहभागिता की ओर ले जाती है। मसीह से बाहर परमेश्वर की इच्छा एक व्यवस्था है जिसे हम पूरा नहीं कर सकते। मसीह में परमेश्वर की इच्छा एक जीवन है जो हमें भर देता है। वह हमारी पतित मनुष्यता के नाम से आया, और परमेश्वर की सारी इच्छा को, जैसी वह हम पर टिकी थी, स्वीकार किया—व्यवस्था की माँगों में भी, और उन परिणामों में भी जो पाप मनुष्य पर ले आया था। उसने अपने आपको पूरी रीति से परमेश्वर की इच्छा को सौंप दिया, चाहे उसे इसका कुछ भी मूल्य चुकाना पड़े। और इस प्रकार उसने हमारे लिये दुःख में से होकर एक मार्ग बनाया—केवल इस अर्थ में नहीं कि हम उससे आगे निकल जाएँ और उससे छूट जाएँ, वरन् उसी के द्वारा और उसी के बल से—पिता के प्रेम और महिमा में। और मसीह जो सामर्थ्य अपने साथ सहभागिता में देता है, उसी में हम भी क्रूस के मार्ग से प्रेम कर सकते हैं, मानो वही मुकुट तक पहुँचने का सबसे उत्तम और सबसे धन्य मार्ग हो। पवित्रशास्त्र कहता है कि परमेश्वर की इच्छा हमारी पवित्रता है, और यह भी कि मसीह हमारी पवित्रता है। केवल मसीह में ही हमारे पास परमेश्वर की इच्छा से प्रेम करने और उसमें आनन्दित होने की सामर्थ्य है। उसी में हमारे पास वह सामर्थ्य है। वह उस इच्छा को पूरी करने से प्रसन्न होकर एक ही बार सदा के लिये हमारी पवित्रता बन गया; वह हमें उसे पूरी करने से प्रसन्न होना सिखाकर हमारे व्यक्तिगत अनुभव में हमारी पवित्रता बनता है। उसने उसे पूरा करना सीखा; दुःख के सिवा किसी और रीति से वह उसे पूरा करने में सिद्ध नहीं बन सकता था। दुःख में वह निकट आता है; वह हमारे दुःख को अपने दुःखों की सहभागिता बना देता है; और उसी में अपने आपको, जो दुःख के द्वारा सिद्ध किया गया, हमारी पवित्रता बना देता है।

हे दुःख उठानेवालो! तुम सब जिनकी पिता ताड़ना कर रहा है! आओ और यीशु को दुःख उठाते, अपनी इच्छा छोड़ते, सिद्ध किए जाते, अपने आपको पवित्र करते हुए देखो। उसका दुःख ही उसकी पवित्रता का, उसकी महिमा का, उसके जीवन का भेद है। क्या तुम परमेश्वर का धन्यवाद न करोगे उस हर बात के लिये जो तुम्हें अपने धन्य प्रभु की और निकट सहभागिता में पहुँचा सकती है? क्या हम हर परीक्षा को, चाहे बड़ी हो या छोटी, उसके प्रेम की यह बुलाहट मानकर स्वीकार न करें कि हम केवल परमेश्वर की इच्छा के लिये जीने में उसके साथ एक हो जाएँ। यही पवित्रता है: यीशु के साथ एक होना जब वह परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है, उस यीशु में बने रहना जो दुःख के द्वारा सिद्ध किया गया।

ताड़ना परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लेने की ओर ले जाती है। बहुत से पिता तब चकित हुए हैं जब उन्होंने पहली बार यह अनुभव किया कि उनका बालक प्रेम से दण्ड पाने के बाद पहले से भी अधिक कोमलता से उनसे लिपटने लगा। इसी प्रकार, जो लोग अपने पिता से दूर रहते हैं, उन्हें इस संसार का दुःख ही वह एक बात दिखाई देता है जो परमेश्वर के प्रेम पर उनके विश्वास को डगमगा देती है; परन्तु उसकी सन्तान दुःख ही के द्वारा उस प्रेम की सच्चाई को जानना सीखती है। ताड़ना देना इतनी स्पष्टता से पिता का ही अधिकार है; वह इतने सीधे उसकी आवश्यकता और उसमें छिपे प्रेम को मान लेने की ओर ले जाती है; वह क्षमा और शान्ति और छुटकारे की लालसा को इतनी प्रबलता से जगाती है, कि—यह बात चाहे कितनी ही विचित्र क्यों न लगे—वह सचमुच ईश्वरीय प्रेम के गहरे अनुभव में ले जानेवाले सबसे निश्चित मार्गदर्शकों में से एक बन जाती है। ताड़ना वह पाठशाला है जिसमें यह धन्य पाठ सीखा जाता है कि परमेश्वर की इच्छा पूरी तरह प्रेम है, और पवित्रता प्रेम की आग है, जो भस्म करती है ताकि शुद्ध करे, जो केवल मैल को नष्ट करती है ताकि उस सब को जो इस अद्भुत परिवर्तन के लिये अपने आपको सौंप देता है, अपनी सिद्ध शुद्धता में मिला ले।

‘जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उसको हम जान गए, और हमें उस पर विश्वास है। परमेश्वर प्रेम है; जो प्रेम में बना रहता है वह परमेश्वर में बना रहता है; और परमेश्वर उसमें बना रहता है।’ मनुष्य की नियति परमेश्वर के साथ सहभागिता है—वह सहभागिता, प्रेम का वह परस्पर भीतर वास। केवल विश्वास ही के द्वारा परमेश्वर का यह प्रेम जाना जा सकता है। और विश्वास केवल अभ्यास से बढ़ सकता है, केवल परीक्षा में फल-फूल सकता है: जब दिखाई देनेवाली वस्तुएँ विफल हो जाती हैं, तब उसकी शक्ति जाग उठती है कि वह अपने आपको अदृश्य के, ईश्वरीय के, अधिकार में सौंप दे। ताड़ना विश्वास की धाय है; उसके चुने हुए सेवकों में से एक, जो उसे परमेश्वर के प्रेम में और गहरे ले जाता है। यही वह नये और जीविते मार्ग है, फटे हुए शरीर का मार्ग, जो यीशु के साथ सहभागिता में परमपवित्र स्थान तक ले जाता है। वहाँ यह दिखाई देता है कि वह न्याय जो सन्तान को नहीं छोड़ता, और वह प्रेम जो उसे सम्भालता और पवित्र करता है, दोनों परमेश्वर की पवित्रता में एक ही हैं।

हे ताड़ना पाए हुए पवित्र लोगो! तुम जो विशेष रूप से उस मार्ग पर ले चले जा रहे हो जो शरीर के फटे हुए परदे में से होकर जाता है, तुम्हें भीतर प्रवेश करने का साहस है। निकट आओ; आओ और परमपवित्र स्थान में निवास करो। परमपवित्र स्थान में अपना घर बनाओ: वहाँ तुम उसकी पवित्रता के भागी बनाए जाते हो। ताड़ना तुम्हारे मन को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के पुत्र, परमेश्वर के प्रेम के साथ एक कर रही है। परमेश्वर की इच्छा में बने रहो। परमेश्वर के पुत्र में बने रहो। परमेश्वर के प्रेम में बने रहो। परदे के भीतर, परमपवित्र स्थान में निवास करो।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

हे परमपवित्र परमेश्वर! एक बार फिर मैं तेरी पवित्रता के अद्भुत प्रकाशन के लिये तुझे धन्य कहता हूँ। मैंने केवल तुझे यह कहते ही नहीं सुना, ‘मैं पवित्र हूँ,’ वरन् तूने मुझे अपने साथ सहभागिता के लिये बुलाया है: ‘पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।’ तेरा नाम धन्य हो! मैंने इससे भी अधिक सुना है: ‘मैं पवित्र करनेवाला हूँ,’ यह तेरी प्रतिज्ञा का वचन है, जो तेरे प्रेम के अभिप्राय को पूरा करने के लिये तेरी अपनी सामर्थ्य को बन्धक ठहराता है। तूने अपने पुत्र में, अपने आत्मा में, अपने वचन में पवित्रता के मार्ग के विषय में जो कुछ प्रगट किया है, उसके लिये मैं सचमुच तेरा धन्यवाद करता हूँ। परन्तु आज के इस पाठ के लिये मैं तुझे कैसे धन्य कहूँ, कि कोई भी हानि या शोक, कोई भी पीड़ा या चिन्ता, कोई भी प्रलोभन या परीक्षा ऐसी नहीं जिसे तेरा प्रेम भी अपने लोगों की पवित्रता को पूरा करने में सहायक होने के लिये न ठहराता और न बनाता हो। हर एक के द्वारा तू उन्हें अपनी ओर खींचता है, ताकि वे चखें कि तेरी प्रेममय इच्छा को स्वीकार करने में कैसी आशीष और कैसा छुटकारा है।

हे धन्य पिता! तू जानता है कि मैंने कितनी बार इस जीवन की परिस्थितियों और कठिनाइयों को बाधा समझा है। आह, हमें अपनी पवित्रता का भागी बनाने के तेरे पवित्र अभिप्राय के प्रकाश में, तेरी इच्छा और तेरे प्रेम के प्रकाश में, वे सब इसी घड़ी से सहायक बन जाएँ। और सबसे बढ़कर, तेरे धन्य पुत्र का मार्ग—जो यह प्रमाणित करता है कि दुःख पिता के प्रेम का अनुशासन है, और समर्पण पवित्रता का भेद, और बलिदान परमपवित्र स्थान का प्रवेश-द्वार—ऐसा प्रगट हो कि उसके आत्मा और उसके अनुग्रह की सामर्थ्य में वह मार्ग मेरा हो जाए। ताड़ना भी, छोटी से छोटी भी, तेरे ही हाथ से मिले, और मुझे तेरी पवित्रता का भागी बनाए। आमीन।

1. इब्रानियों की पत्री में परमेश्वर के पुत्र में दिखाई देनेवाली दुःख की पवित्रता और पवित्र करनेवाली सामर्थ्य का प्रकाशन कितना अद्भुत है! ‘उसने दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी।’ ‘परमेश्वर को यही अच्छा लगा कि हमारे उद्धार के कर्ता को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे, क्योंकि पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही मूल से हैं।’ ‘जब उसने स्वयं दुःख उठाया, तो वह सहायता कर सकता है।’ ‘हम यीशु को मृत्यु का दुःख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहने हुए देखते हैं।’ दुःख फटे हुए परदे का मार्ग है, वह नये और जीविते मार्ग जिस पर यीशु चला और जिसे उसने हमारे लिये खोल दिया। सब दुःख उठानेवाले इसका अध्ययन करें। जितने ‘मसीह में पवित्र’ हैं, वे सब यहाँ उस मसीह को जानना सीखें जिसमें वे पवित्र हैं, और उस रीति को भी जिससे उसने अपने आपको पवित्र किया और हमें पवित्र करता है।

2. यदि हम अपने दुःख में यीशु की हमारे साथ सहानुभूति को अनुभव करने से आरम्भ करें, तो वह हमें उससे भी बड़ी बात की ओर ले चलेगी: उसके दुःख में यीशु के साथ सहानुभूति, उसके साथ ऐसी सहभागिता कि जैसे उसने दुःख उठाया वैसे ही हम भी उठाएँ।

3. दुःख और पवित्रता को एक-दूसरे से अलग न होने दो—जैसे वे परमेश्वर के मन में और मसीह के व्यक्तित्व में जुड़े हैं, वैसे ही आत्मा के द्वारा तुम्हारे जीवन में भी जुड़े रहें। ‘परमेश्वर को यही अच्छा लगा कि उसे दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे; क्योंकि पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही मूल से हैं।’ हर एक परीक्षा, चाहे छोटी हो या बड़ी, परमेश्वर के हाथ का स्पर्श हो, जो तुम्हें पकड़कर पवित्रता की ओर ले चलता है। अपने आपको उस हाथ में सौंप दो।

4. ‘जैसे-जैसे मसीह के दुःखों में सहभागी होते हो, आनन्द करो; क्योंकि महिमा की आत्मा, जो परमेश्वर की आत्मा है, तुम पर छाया करती है।’


तीसवाँ दिन।

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