अध्याय 29 · 16 मिनट का पठन
परमपवित्र स्थान में जाने का मार्ग
‘इसलिए हे भाइयों, जबकि हमें यीशु के लहू के द्वारा उस नये और जीविते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का साहस हो गया है, जो उसने परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर, हमारे लिये अभिषेक किया है, और इसलिए कि हमारा ऐसा महान याजक है, जो परमेश्वर के घर का अधिकारी है। तो आओ; हम सच्चे मन, और पूरे विश्वास के साथ परमेश्वर के समीप जाएँ।’—इब्रानियों 10:19-22।
जब महायाजक वर्ष में एक बार परदे के भीतर दूसरे तम्बू में प्रवेश करता था, तो, जैसा इब्रानियों की पत्री में हमें बताया गया है, ‘इससे पवित्र आत्मा यही दिखाता है, कि पवित्रस्थान का मार्ग प्रगट नहीं हुआ।’ जब मसीह मरा, तो परदा फट गया; जितने पवित्र स्थान में सेवा कर रहे थे, उन सब को तुरन्त परमपवित्र स्थान में खुला प्रवेश मिल गया; परमपवित्र स्थान का मार्ग खोल दिया गया। जब यह पत्री अपनी शिक्षा को व्यवहार में लागू करने की ओर मुड़ती है (10:19), तो उसकी सारी शिक्षा इन शब्दों में समेट दी जाती है: ‘इसलिए हे भाइयों, जबकि हमें पवित्रस्थान में प्रवेश करने का साहस हो गया है, तो आओ; हम परमेश्वर के समीप जाएँ।’ मसीह के छुटकारे ने परमपवित्र स्थान का मार्ग खोल दिया है: उसे ग्रहण करने का परिणाम इससे कम कुछ नहीं हो सकता कि हम समीप जाएँ और भीतर प्रवेश करें। हमारे मूल पद के शब्द हमें प्रवेश के विषय में चार अति बहुमूल्य विचार सुझाते हैं: प्रवेश का स्थान, प्रवेश का अधिकार, प्रवेश का मार्ग, और प्रवेश की सामर्थ्य।
प्रवेश का स्थान। हमें कहाँ समीप आने का निमन्त्रण दिया गया है? ‘हमें पवित्रस्थान में प्रवेश करने का साहस हो गया है।’ इस्राएल के याजक पवित्र स्थान में प्रवेश कर सकते थे, परन्तु परमपवित्र स्थान से, जो परमेश्वर की प्रत्यक्ष उपस्थिति थी, उन्हें सदा बाहर रखा जाता था। फटे हुए परदे ने उस उपस्थिति में प्रवेश की स्वतंत्रता का प्रचार किया। वहीं अब विश्वासियों को, राज-पदधारी याजकों के समाज के रूप में, रहना और चलना है। परदे के भीतर, ठीक परमपवित्र स्थान में, उसी स्थान में जहाँ परमेश्वर वास करता है, अर्थात् स्वर्गीय स्थानों में, परमेश्वर की ठीक उपस्थिति में, हमारा निवास होना है—हमारा घर। कुछ लोग ऐसे बोलते हैं मानो ‘तो आओ; हम परमेश्वर के समीप जाएँ,’ का अर्थ प्रार्थना हो, और मानो आराधना के कार्यों में परमेश्वर के पास अपने विशेष आने में हम परमपवित्र स्थान में प्रवेश करते हों। नहीं; यह विशेषाधिकार चाहे कितना ही बड़ा हो, परमेश्वर ने हमारे लिये इससे असीम रूप से बड़ी बात ठहराई है। हमें समीप जाना है, और सदा वहीं वास करना है, भीतरी पवित्रस्थान के घेरे में, उसके वातावरण में, अपना जीवन जीना और अपना काम करना है। परमेश्वर की उपस्थिति ही भूमि को पवित्र बनाती है; मसीह में परमेश्वर की प्रत्यक्ष उपस्थिति किसी भी स्थान को परमपवित्र स्थान बना देती है: और यही वह स्थान है जिसके समीप हमें जाना है, और जिसमें हमें बने रहना है। दिन का एक भी क्षण ऐसा नहीं, कोई भी परिस्थिति या वातावरण ऐसा नहीं, जिसमें विश्वासी परमप्रधान के छाए हुए स्थान में वास करता हुआ बनाए न रखा जा सके। जब वह विश्वास के द्वारा परमेश्वर के साथ अपने मेल की सम्पूर्णता में, और मसीह के साथ अपनी एकता की वास्तविकता में प्रवेश करता है, जब वह इस प्रकार मसीह में बना रहकर अपने आपको पवित्र आत्मा को सौंप देता है कि वह भीतर पवित्र जन की उपस्थिति को प्रगट करे, तब परमपवित्र स्थान उसके चारों ओर होता है, वह सचमुच उसमें होता है। बिना रुकावट के प्रवेश के साथ वह समीप जाता है।
प्रवेश का अधिकार। यह विचार उठता है, और यह प्रश्न पूछा जाता है: क्या यह केवल एक आदर्श नहीं? क्या यह उन लोगों के लिये, जो जानते हैं कि उनका स्वभाव कितना पापमय है, दैनिक जीवन की वास्तविकता, एक अनुभव हो सकता है? परमेश्वर धन्य हो! इसे ऐसा ही होना ठहराया गया है। यह सम्भव है, क्योंकि प्रवेश का हमारा अधिकार इस पर नहीं टिका कि हम क्या हैं, वरन् यीशु के लहू पर। ‘जबकि हमें यीशु के लहू के द्वारा पवित्रस्थान में प्रवेश करने का साहस हो गया है, तो आओ; हम परमेश्वर के समीप जाएँ।’ फसह में हमने देखा कि छुटकारा, और वह पवित्रता भी जो उसका लक्ष्य थी, किस प्रकार लहू पर निर्भर थे। पवित्रस्थान में, जो परमेश्वर का निवास था, हम जानते हैं कि उसके हर एक भाग में, आँगन में, पवित्र स्थान में, परमपवित्र स्थान में, केवल लहू का छिड़काव ही परमेश्वर के पास प्रवेश को सुनिश्चित करता था। और अब, जबकि यीशु का लहू बहाया जा चुका है—आह! कैसी ईश्वरीय सामर्थ्य में, कैसी गहरी वास्तविकता में, कैसे अनन्त प्रभाव के साथ, अब हमें परमपवित्र स्थान में, परमेश्वर के हृदय और उसके प्रेम के परमपवित्र स्थान में, प्रवेश मिला है! हम सचमुच लहू के द्वारा निकट लाए गए हैं। लहू के द्वारा हमें प्रवेश करने का साहस है। ‘सेवा करनेवाले एक ही बार शुद्ध हो जाते हैं, तो फिर उनका विवेक उन्हें पापी नहीं ठहराता।’ ज्योति में चलते हुए, यीशु का लहू अविनाशी जीवन की सामर्थ्य में शुद्ध करता है, ऐसी शुद्धता से जो कभी नहीं रुकती। अयोग्यता का या बचे हुए पापमय स्वभाव का कोई भी बोध प्रवेश के साहस में बाधा डालने की आवश्यकता नहीं रखता: समीप जाने की स्वतंत्रता उस बहुमूल्य लहू के कभी न चूकनेवाले, सदा काम करनेवाले, सदा जीवित प्रभाव पर टिकी है। विश्वासी के लिये परमपवित्र स्थान में वास करना सम्भव है।
प्रवेश का मार्ग। बहुधा यह समझा जाता है कि यीशु के द्वारा हमारे लिये अभिषेक किए गए नये और जीविते मार्ग के विषय में जो कहा गया है, उसका अर्थ उसके लहू के द्वारा मिले साहस से कुछ भिन्न नहीं। ऐसा नहीं है। इन शब्दों का अर्थ इससे कहीं अधिक है। ‘जबकि हमें यीशु के लहू के द्वारा साहस हो गया है, तो आओ; हम उस मार्ग से, जो उसने हमारे लिये अभिषेक किया है, परमेश्वर के समीप जाएँ।’ अर्थात्, उसने हमारे लिये चलने को एक मार्ग खोल दिया, जैसे वह स्वयं उसमें चला, ‘नया और जीविता मार्ग, परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर।’ जिस मार्ग में मसीह चला जब उसने अपना लहू दिया, ठीक उसी मार्ग में हमें भी चलना है। वह मार्ग क्रूस का मार्ग है। मसीह के बलिदान पर केवल विश्वास ही नहीं, वरन् उसमें उसके साथ सहभागिता भी होनी चाहिए। वह मार्ग शरीर के परदे के फटने तक ले गया, और इस प्रकार शरीर के फटे हुए परदे में से होकर, भीतर परमेश्वर तक। और क्या मसीह के पवित्र शरीर का परदा इसलिए फाड़ा गया कि हमारे पापमय शरीर का परदा बचा रहे? कदापि नहीं। उसकी इच्छा यह थी कि हम ठीक उसी मार्ग में चलें जिसमें वह चला, उसके ठीक पीछे-पीछे चलते हुए। उसने हमारे लिये परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर एक नया और जीविता मार्ग अभिषेक किया। जब हम उसके शरीर के फटे हुए परदे में से होकर भीतर जाते हैं, तो उसी में हम तुरन्त यह आवश्यकता भी पाते हैं और यह सामर्थ्य भी कि हमारा शरीर भी फाड़ा जाए: यीशु के पीछे चलने का अर्थ सदा यीशु के समान बनना है। वह फटे हुए शरीरवाला यीशु ही है, जिसमें हम हैं, जिसमें हम चलते हैं। शरीर के फटने के बिना परमेश्वर तक कोई मार्ग नहीं। मसीह के जीवन और मृत्यु को विश्वास से उस सामर्थ्य के रूप में ग्रहण करके जो हम में काम करती है, उस आत्मा की सामर्थ्य में जो हमें सचमुच मसीह के साथ एक कर देता है, हम सब मसीह के पीछे चलते हैं जब वह फटे हुए परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर आगे बढ़ता है, और उसके साथ उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने और उसकी मृत्यु के भागी बन जाते हैं। क्रूस का मार्ग, ‘जिसके द्वारा मैं क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ,’ वही फटे हुए परदे में से होकर जानेवाला मार्ग है। मनुष्य की नियति, अर्थात् पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में परमेश्वर के साथ संगति, केवल शरीर के बलिदान के द्वारा ही प्राप्त होती है।
और यहाँ अब हमें एक बड़े भेद का हल मिलता है—कि क्यों इतने सारे मसीही दूर ही खड़े रह जाते हैं, और इस परमपवित्र स्थान में कभी प्रवेश नहीं करते; क्यों परमेश्वर की उपस्थिति की पवित्रता उन पर इतनी कम दिखाई देती है। उन्होंने सोचा कि शरीर का फाड़ा जाना केवल मसीह में आवश्यक था, स्वयं उनमें नहीं। उन्होंने सोचा कि लहू में जो स्वतंत्रता उन्हें मिली थी, वही नया और जीविता मार्ग था। वे नहीं जानते थे कि सच्ची और पूरी पवित्रता का मार्ग, परमपवित्र स्थान का मार्ग, और महान महायाजक की पवित्रता की संगति में पूरा प्रवेश, केवल शरीर के फटे हुए परदे में से होकर, यीशु की मृत्यु की समानता में होकर ही प्राप्त हो सकता था। सचमुच यही वह मार्ग है जो उसने हमारे लिये अभिषेक किया। वह स्वयं मार्ग है; अपने आत्म-त्याग में, अपने आत्म-बलिदान में, अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने में, वह उन सब को उठा ले जाता है जो उसकी पवित्रता से पवित्र होने के लिये लालायित हैं, ऐसे पवित्र जैसा वह पवित्र है।
प्रवेश की सामर्थ्य। क्या कोई शरीर के इस फाड़े जाने के भय से ठीक परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने से पीछे हटता है, क्योंकि उसे सन्देह है कि वह इसे सह सकेगा या नहीं, कि वह सचमुच ऐसे पथ पर चल सकेगा या नहीं? तो वह एक बार फिर सुने। सुनो, आगे क्या आता है: ‘और इसलिए कि हमारा ऐसा महान याजक है, जो परमेश्वर के घर का अधिकारी है, तो आओ; हम परमेश्वर के समीप जाएँ।’ हमें केवल परमपवित्र स्थान ही निमन्त्रण नहीं देता, और केवल लहू ही साहस नहीं देता, और केवल फटे हुए परदे में से होकर जानेवाला मार्ग ही हमारे लिये अभिषेक नहीं किया गया, वरन् परमेश्वर के घर का अधिकारी महान याजक, वह धन्य जीवित उद्धारकर्ता भी है, जो हमें खींचता, हमारी सहायता करता, और हमारा स्वागत करता है। वह हमारा हारून है। उसके हृदय पर हम अपना नाम देखते हैं, क्योंकि वह केवल इसी लिये जीवित है कि हमारा ध्यान रखे और हमारे लिये विनती करे। उसके माथे पर हम परमेश्वर का नाम देखते हैं, ‘यहोवा के लिये पवित्र,’ क्योंकि उसकी पवित्रता में हमारी पवित्र वस्तुओं के पाप ढाँप दिए जाते हैं। उसमें हम ग्रहण किए गए और पवित्र किए गए हैं; परमेश्वर हमें पवित्र लोगों के रूप में ग्रहण करता है। उसके प्रेम और उसके आत्मा की सामर्थ्य में, उस पवित्र जन की सामर्थ्य में, उसके और निकट जाने और उसके द्वारा खींचे जाने के आनन्द में, हम उस मार्ग को आनन्द से स्वीकार करते हैं जो उसने अभिषेक किया है, और आत्म-त्याग और आत्म-बलिदान के उसके पवित्र पदचिह्नों पर चलते हैं। हम देखते हैं कि शरीर ही वह मोटा परदा है जो उस पवित्र जन से, जो आत्मा है, अलग करता है, और तब यह एक निरन्तर और अति उत्कट प्रार्थना बन जाती है कि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में शरीर का क्रूस पर चढ़ाया जाना हम में एक धन्य वास्तविकता बने। जब खुले हुए परदे में से परमपवित्र स्थान की महिमा हम पर चमक रही हो, और बहुमूल्य लहू प्रवेश के साहस के विषय में इतने ऊँचे स्वर से बोल रहा हो, और महान याजक अपनी प्रेमपूर्ण उपस्थिति से हमें समीप आने और आशीष पाने के लिये बुला रहा हो,—इन सब के रहते हम अब और डरने का साहस नहीं करते, वरन् फटे हुए परदे के मार्ग को उस पथ के रूप में चुनते हैं जिस पर चलना हमें प्रिय है, और अपने आपको सौंप देते हैं कि भीतर प्रवेश करें और परदे के भीतर, ठीक परमपवित्र स्थान में, वास करें।
और इस प्रकार यहाँ हमारा जीवन आनेवाली महिमा का बयाना होगा, जैसा लिखा है—ध्यान दो कि हमारे मूल पद के चारों बड़े विचार फिर से कैसे हमारे सामने आते हैं—‘ये वे हैं, जो उस महाक्लेश में से निकलकर आए हैं,’ अर्थात् फटे हुए शरीर के मार्ग से; ‘इन्होंने अपने-अपने वस्त्र मेम्ने के लहू में धोकर श्वेत किए हैं,’ लहू के द्वारा उनका साहस; ‘इसी कारण वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने हैं,’ परमपवित्र स्थान में उनका वास; ‘मेम्ना जो सिंहासन के बीच में है, उनकी रखवाली करेगा,’ महान याजक अब भी उनका चरवाहा है, स्वयं यीशु ही उनका सब कुछ और सब में है।
भाई! क्या तुम देखते हो कि पवित्रता क्या है, और वह कैसे पाई जाती है? वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हारे भीतर गढ़ी जाती है। वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो बाहर से तुम पर पहना दी जाती है। पवित्रता तुम पर ठहरी हुई परमेश्वर की उपस्थिति है। पवित्रता तब आती है जब तुम जान-बूझकर उस उपस्थिति में बने रहते हो, अपना सारा काम करते हुए, और अपना सारा जीवन उसके लिये ऐसे बलिदान के रूप में जीते हुए जो यीशु मसीह के द्वारा ग्रहणयोग्य है, और पवित्र आत्मा से पवित्र किया गया है। आह, अब और मत डरो, मानो यह जीवन तुम्हारे लिये न हो! यीशु की ओर ताको; हमारा ऐसा महान याजक है, जो परमेश्वर के घर का अधिकारी है, तो आओ, हम समीप जाएँ। यीशु में लगे रहो। हमारे भाई के हाथ में मन्दिर का भार है; उसे अधिकार है कि हमें सब कुछ दिखाए, हमें पिता की उपस्थिति के भेद में ले जाए। मन्दिर का सारा प्रबन्ध ठीक इसी उद्देश्य से उसके हाथों में सौंपा गया है, कि सब निर्बल और सन्देह करनेवाले भरोसे के साथ आ सकें। बस अपने आपको यीशु को सौंप दो, उसकी अगुवाई और रखवाली को। बस यीशु पर भरोसा रखो, जो परमेश्वर का पवित्र जन है, तुम्हारा पवित्र जन है; उसे इसी में आनन्द है कि जो कुछ उसने अपने लहू से मोल लिया है, वह तुम पर प्रगट करे। उस पर भरोसा रखो कि वह तुम्हें पवित्रस्थान की विधियाँ सिखाएगा। ‘तू जान ले कि परमेश्वर के घराने में कैसा बर्ताव करना चाहिए,’ इसी लिये वह दिया गया है। हमारा ऐसा महान याजक है, इसलिए आओ, हम भीतर प्रवेश करें, आओ, हम परमपवित्र स्थान में वास करें। लहू की सामर्थ्य में, नये और जीविते मार्ग की सामर्थ्य में, जीवित यीशु की सामर्थ्य में, परमपवित्र स्थान, अर्थात् परमेश्वर की उपस्थिति, हमारे प्राण का घर हो। तुम ‘मसीह में पवित्र’ हो; मसीह में तुम परमेश्वर की पवित्र उपस्थिति और प्रेम में हो; बस वहीं ठहरे रहो।
पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।
अति पवित्र परमेश्वर! मैं परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने और वहाँ वास करने की स्वतंत्रता के लिये तेरी स्तुति कैसे करूँ? और उस बहुमूल्य लहू के लिये, जो हमें निकट ले आता है? और उस नये और जीविते मार्ग के लिये, जो उस शरीर के फटे हुए परदे में से होकर जाता है जिसने हमें तुझ से अलग कर रखा था, और जिसमें अब मेरा शरीर भी क्रूस पर चढ़ाया गया है? और परमेश्वर के घर के अधिकारी उस महान याजक के लिये, अर्थात् हमारे जीवित प्रभु यीशु के लिये, जिसके साथ और जिसमें होकर हम तेरे सामने उपस्थित होते हैं? इस अद्भुत और अति सम्पूर्ण छुटकारे के लिये तेरे पवित्र नाम की महिमा हो।
हे मेरे परमेश्वर, मैं तुझ से विनती करता हूँ! मुझे, और अपनी सब सन्तानों को, इस बात का कुछ ठीक बोध दे कि हम कितनी सच्चाई और निश्चय के साथ हर दिन परदे के भीतर, तेरी अपनी प्रत्यक्ष उपस्थिति में, जी सकते हैं, और अपना सारा जीवन बिता सकते हैं। मैं तुझ से प्रार्थना करता हूँ, हमें प्रकाशन की आत्मा दे, कि हम देखें कि किस प्रकार फटे हुए परदे में से होकर तेरी उपस्थिति की महिमा परमपवित्र स्थान से पवित्र स्थान में उमड़ती हुई बहती है; किस प्रकार पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने में स्वर्ग का राज्य पृथ्वी पर आ गया, और जितने अपने आपको उस आत्मा को सौंप देते हैं, वे सब जान सकते हैं कि मसीह में वे सचमुच तेरे इतने निकट, इतने अधिक निकट हैं। हे धन्य पिता! तेरा आत्मा हमें सिखाए कि सचमुच यही पवित्र जीवन है: पवित्र जन मसीह में जीवन, जो सदा तेरे पवित्र प्रताप की ज्योति और उपस्थिति में बीतता है।
अति पवित्र परमेश्वर! मैं समीप आता हूँ। पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में मैं भीतर प्रवेश करता हूँ। अब मैं परमपवित्र स्थान में हूँ। और यहाँ मैं यीशु में, अपने महान याजक में, बना रहना चाहता हूँ—यहीं, परमपवित्र स्थान में। आमीन।
1. मसीह में बने रहना परमपवित्र स्थान में वास करना है। मसीह केवल बलिदान, और मार्ग, और महान याजक ही नहीं, वरन् स्वयं मन्दिर भी है। ‘मेम्ना मन्दिर है।’ जैसे-जैसे पवित्र आत्मा मसीह के साथ मेरी एकता को और स्पष्टता से प्रगट करता है, और हृदय और इच्छा अपने आपको उसमें खो देते हैं, वैसे-वैसे मैं उस पवित्र उपस्थिति में वास करता हूँ, जो परमपवित्र स्थान है। तुम ‘मसीह में पवित्र’ हो—समीप जाओ, साहस के साथ भीतर प्रवेश करो, और अधिकार कर लो—परमपवित्र स्थान को छोड़ और कहीं तुम्हारा घर न हो।
2. ‘मसीह ने कलीसिया से प्रेम करके अपने आपको उसके लिये दे दिया, कि उसको पवित्र बनाए।’ उसने अपने आपको दे दिया! क्या तुमने उस वचन का बल पकड़ा है? क्योंकि वह नहीं चाहता था कि कोई और यह करे, क्योंकि कोई और यह कर ही नहीं सकता था; अपनी कलीसिया को पवित्र करने के लिये उसने अपने आपको दे दिया कि यह करे। और इसलिए उस कलीसिया को, जिससे उसने प्रेम किया, पवित्र करना उसका अपना विशेष प्रिय काम है। बस उसी को स्वीकार कर लो कि वह यह करे। वह तुम्हें पवित्र कर सकता है और करेगा भी, ताकि तुम्हें तेजस्वी, बिना कलंक या झुर्री के, स्वयं अपने पास खड़ा करे। वह शब्द, स्वयं, तुम में जीवित रहे। परमेश्वर के घर में सारा जीवन और चाल-चलन उसी के भार में है। महान याजक हमारा है, इसलिए आओ, हम समीप जाएँ।
3. परमपवित्र स्थान में यह प्रवेश—एक सदा नया और सदा गहरा होता प्रवेश—साथ ही पिता की उपस्थिति में एक सदा धन्य विश्राम भी है। लहू पर विश्वास, फटे हुए शरीर के मार्ग में पीछे चलना, और जीवित यीशु के साथ संगति, ये तीन मुख्य सीढ़ियाँ हैं।
4. परमपवित्र स्थान में प्रवेश करो, और वहाँ वास करो। वह तुम में प्रवेश करेगा, और तुम्हें बदल देगा, और तुम में वास करेगा। और तुम्हारा हृदय परमपवित्र स्थान होगा, जिसमें वह वास करता है।
5. क्या कभी-कभी ऐसा नहीं हुआ कि विचार और इच्छा के किसी प्रयत्न से, या पवित्र लोगों की संगति में, हम ऊपर उठाए जाकर ऐसे स्थान में पहुँचे जो परमपवित्र स्थान जान पड़ता था, और शीघ्र ही हमने अनुभव किया कि शरीर भी वहाँ घुस आया है? इसका कारण यह था कि हमने जीवन के नये मार्ग से प्रवेश नहीं किया था—मृत्यु में से होकर जीवन तक जानेवाले मार्ग से—शरीर के फटे हुए परदे के मार्ग से। हे हमारे क्रूस पर चढ़ाए गए प्रभु! हमें सिखा कि इसका अर्थ क्या है; यह हमें दे; तू स्वयं हमारे लिये यह बन जा।
6. मैं स्मरण रखूँ कि परमपवित्र स्थान में मेरा प्रवेश एक याजक के रूप में है। मैं दिन भर प्रभु के सामने एक मध्यस्थ के रूप में ठहरा रहूँ, और निरन्तर ऐसी विनतियाँ चढ़ाता रहूँ जो मसीह में ग्रहणयोग्य हैं। परमेश्वर की कलीसिया उस स्त्री के समान हो जिसके विषय में लिखा है कि वह ‘मन्दिर को नहीं छोड़ती थी पर उपवास और प्रार्थना कर करके रात-दिन उपासना किया करती थी।’ इसी के लिये हमें परमपवित्र स्थान में प्रवेश मिला है।
उनतीसवाँ दिन।
अध्याय 29 पूरा हुआ
परमपवित्र स्थान में जाने का मार्ग