मसीह में पवित्र
पवित्रता और सेवा

अध्याय 28 · 13 मिनट का पठन

पवित्रता और सेवा

‘यदि कोई अपने आपको इनसे शुद्ध करेगा, तो वह आदर का पात्र, और पवित्र ठहरेगा; और स्वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा।’—2 तीमुथियुस 2:21।

‘याजकों का पवित्र समाज बनकर, ऐसे आत्मिक बलिदान चढ़ाओ। पवित्र लोग, इसलिए कि जिसने तुम्हें अंधकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो।’—1 पतरस 2:5, 9।

सारे पवित्रशास्त्र में आदि से अन्त तक हमने देखा है कि परमेश्वर जिस किसी को पवित्र करता है, वह उसकी पवित्रता की सेवा में लगाए जाने के लिये है। उसकी पवित्रता एक असीम शक्ति है, जिसे केवल पवित्र करने में ही विश्राम मिलता है: वह अपने आप में क्या है, इसके प्रकाशन, ‘मैं यहोवा स्वयं पवित्र हूँ,’ के साथ परमेश्वर निरन्तर यह घोषणा भी जोड़ता जाता है कि वह क्या करता है, ‘मैं तुम्हारा पवित्र करनेवाला यहोवा हूँ।’ पवित्रता एक धधकती आग है जो अपने आपको फैलाती है, जो अपवित्र को भस्म करना चाहती है, और जो कोई उसे ग्रहण करे, उन सब को अपनी धन्यता बाँटना चाहती है। पवित्रता और स्वार्थ, पवित्रता और निष्क्रियता, पवित्रता और आलस्य, पवित्रता और असहायता, इनका आपस में कभी मेल हो ही नहीं सकता। जिस किसी के विषय में हम पढ़ते हैं कि वह पवित्र था, वह परमेश्वर की पवित्रता की सेवा में ले लिया गया था।

आओ, हम पवित्रशास्त्र में पवित्र वस्तुओं के प्रकाशन पर एक बार फिर दृष्टि डालें। सातवाँ दिन पवित्र ठहराया गया, ताकि उसमें परमेश्वर अपनी प्रजा को पवित्र करे। निवासस्थान पवित्र था, ताकि वह पवित्र जन का वासस्थान हो, वह केन्द्र हो जहाँ से उसकी पवित्रता लोगों पर प्रगट हो। वेदी परमपवित्र थी, ताकि जो भेंटें उस पर रखी जाएँ उन्हें वह पवित्र करे। याजक अपने वस्त्रों समेत, भवन अपने सामान और पात्रों समेत, बलिदान और लहू,—जिस किसी पर पवित्र नाम था, उसका एक उपयोग और एक प्रयोजन था। इस्राएल के विषय में, जिसे परमेश्वर ने मिस्र से इसलिए छुड़ाया कि वह एक पवित्र जाति बने, परमेश्वर ने कहा, ‘मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे जिससे वे मेरी उपासना करें।’ पवित्र स्वर्गदूत, पवित्र भविष्यद्वक्ता और प्रेरित, पवित्रशास्त्र,—इन सब ने यह उपाधि इसलिए पाई कि वे परमेश्वर की सेवा के लिये पवित्र किए गए थे। हमारा प्रभु अपने विषय में यों बोलता है कि वह ‘पुत्र है, जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है।’ और जब वह कहता है, ‘मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ,’ तो वह तुरन्त उसका प्रयोजन भी जोड़ देता है: यह पिता की और उसके छुड़ाए हुओं की सेवा के लिये है,—‘ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।’ और क्या यह सोचा भी जा सकता है कि अब, जब परमेश्वर मसीह में, जो पवित्र जन है, और पवित्र आत्मा में अपना अभिप्राय पूरा कर रहा है, और संतों की, ‘पवित्र लोगों’ की, जो ‘मसीह में पवित्र किए गए’ हैं, एक प्रजा इकट्ठी कर रहा है, तो अब पवित्रता और सेवा को एक दूसरे से अलग कर दिया जाएगा? असम्भव! यहीं पहली बार हम पूरी रीति से समझेंगे कि वे एक दूसरे के लिये कितने आवश्यक हैं। आओ, हम उनके आपसी सम्बन्ध को समझने का यत्न करें। हम केवल इसलिए पवित्र किए जाते हैं कि सेवा करें। हम केवल उतनी ही सेवा कर सकते हैं जितने हम पवित्र हैं।

प्रभावशाली सेवा के लिये पवित्रता अनिवार्य है। पुराने नियम में हम पवित्रता की श्रेणियाँ देखते हैं, केवल पवित्र स्थानों में ही नहीं, वरन् उतनी ही पवित्र व्यक्तियों में भी। जाति में, लेवियों में, याजकों में, और फिर महायाजक में, एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी तक उन्नति होती है: जैसे-जैसे हर अगली श्रेणी में घेरा छोटा होता जाता है, और सेवा अधिक प्रत्यक्ष और सम्पूर्ण होती जाती है, वैसे-वैसे माँगी गई पवित्रता भी अधिक ऊँची और अधिक स्पष्ट होती जाती है। इस अधिक आत्मिक युग में भी ठीक ऐसा ही है: जितनी अधिक पवित्रता, सेवा के लिये उतनी ही अधिक योग्यता; जितनी अधिक सच्ची पवित्रता होती है, उतना ही अधिक परमेश्वर होता है, और उतना ही अधिक सच्चा और गहरा वह प्रवेश होता है जो उसने प्राण में पाया है। प्राण को अपनी सेवा में लगाने के लिये उस पर उसकी पकड़ उतनी ही अधिक पूरी होती है।

मसीह की कलीसिया में बहुत बड़ी मात्रा में ऐसा काम होता है जिससे बहुत ही थोड़ा फल मिलता है। बहुत से लोग काम में कूद पड़ते हैं जिनमें सच्ची पवित्रता बहुत थोड़ी है, पवित्र आत्मा बहुत थोड़ा है। वे बहुधा बड़े परिश्रम से काम करते हैं, और जहाँ तक मनुष्य के प्रभाव की बात है, बड़ी सफलता से भी। तौभी प्रभु में एक पवित्र मन्दिर के निर्माण में सच्चे आत्मिक परिणाम बहुत थोड़े ही होते हैं। प्रभु उनमें काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके भीतरी जीवन पर उसका अधिकार नहीं है। उसका व्यक्तिगत भीतर वास और संगति, उसकी पवित्र उपस्थिति का विश्राम, हृदय और जीवन में उसकी पवित्रता का राज्य और शासन,—इन सब से वे लगभग अनजान हैं। यह ठीक ही कहा गया है कि काम आत्मिक दरिद्रता और रोग की औषधि है; कुछ विश्वासियों के लिये, जो सेवा से अलग रहकर पवित्रता खोज रहे थे, काम की बुलाहट एक अकथनीय आशीष सिद्ध हुई है। परन्तु बहुतों के लिये वह केवल एक और परदा बनकर रह गई है, जो हृदय की पवित्रता की और जीवते परमेश्वर के साथ हृदय की संगति की भयानक कमी को ढाँप देता है। वे पहले से भी अधिक उत्साह से काम में लग गए हैं, तौभी उनके हृदय में वह विश्राम देनेवाली और ताज़गी देनेवाली गवाही नहीं है कि उनका काम ग्रहणयोग्य है और ग्रहण कर लिया गया है।

मेरे भाई! इस सन्देश को सुनो। ‘यदि कोई अपने आपको शुद्ध करेगा, तो वह आदर का पात्र, और पवित्र ठहरेगा; और स्वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा।’ सेवा का नियम इससे अधिक स्पष्ट या सुन्दर रीति से नहीं रखा जा सकता। आदर का पात्र, अर्थात् ऐसा जन जिसकी प्रतिष्ठा करने से राजा प्रसन्न होगा, ऐसा पात्र होना चाहिए जो शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध किया गया हो। तभी वह एक पवित्र पात्र हो सकता है, जिस पर परमेश्वर के पवित्र आत्मा का अधिकार हो और जिसमें वह वास करता हो। इस प्रकार वह स्वामी के काम आने योग्य हो जाता है। वह उसका उपयोग कर सकता है, उसमें काम कर सकता है, और उसे अपने हाथ में लेकर चला सकता है। और इस प्रकार, शुद्ध और पवित्र होकर, और स्वामी के हाथों में सौंपे जाकर, हम ईश्वरीय रीति से हर भले काम के लिये तैयार किए जाते हैं। सेवा के लिये पवित्रता अनिवार्य है। यदि सेवा को परमेश्वर को ग्रहणयोग्य होना है, और प्राणों पर अपने काम में प्रभावशाली होना है, और हमारे लिये आनन्द और बल होना है, तो हमें पवित्र होना ही है। परमेश्वर की इच्छा को पहले हम में जीवित रहना होगा, यदि उसे हमारे द्वारा पूरा होना है।

कितने ही विश्वासयोग्य कार्यकर्ता हैं जो सामर्थ्य की कमी पर विलाप करते हैं; उसके लिये लालायित रहते और प्रार्थना करते हैं, और तौभी उसे नहीं पाते! उन्होंने अपना बल संगति और विश्वास के भीतरी जीवन से अधिक काम और सेवा के बाहरी आँगन में लगाया है। उन्होंने सचमुच कभी यह नहीं समझा कि केवल जब स्वामी उन्हें अपने अधिकार में ले लेता है, जब पवित्र आत्मा उन्हें अपने वश में पाता है, तभी वह उनका उपयोग कर सकता है, तभी उनमें सच्ची सामर्थ्य हो सकती है। वे बहुधा उस वस्तु के लिये लालायित होते और पुकारते हैं जिसे वे सामर्थ्य का बपतिस्मा कहते हैं। वे भूल जाते हैं कि परमेश्वर की सामर्थ्य हम में होने का मार्ग यह है कि हम स्वयं उसकी सामर्थ्य के अधीन हो जाएँ। अपने आपको परमेश्वर की सामर्थ्य के अधीन कर दो; उसकी पवित्र इच्छा को अपने में जीवित रहने दो; उसी में और उसकी आज्ञाकारिता में ऐसे जीओ, जैसे कोई ऐसा जन जिसे अपने आप पर कोई अधिकार नहीं; पवित्र आत्मा को अपने भीतर, मानो अपने पवित्र मन्दिर में, वास करने दो, कि वह सिंहासन पर विराजमान उस पवित्र जन को प्रगट करे जो सब पर शासन करता है; तब वह बिना चूके तुम्हें आदर के पात्र के रूप में काम में लाएगा, जो पवित्र और स्वामी के काम आने योग्य है। प्रभावशाली सेवा के लिये पवित्रता अनिवार्य है।

और सच्ची पवित्रता के लिये सेवा भी कम अनिवार्य नहीं है। हम इसे इतनी बार दोहरा चुके हैं: पवित्रता एक शक्ति है, अभिलाषा और आत्म-बलिदान की एक प्रचण्ड शक्ति, जो दूसरों को अपनी शुद्धता और सिद्धता का भागी बनाना चाहती है। मसीह ने अपने आपको बलिदान किया—वह बलिदान किस बात में था, और उसका लक्ष्य क्या था? उसने अपने आपको पवित्र किया ताकि हम भी पवित्र किए जाएँ। स्वार्थी पवित्रता एक धोखा है। सच्ची पवित्रता, हम में परमेश्वर की पवित्रता, प्रेम में अपने आपको प्रगट करती है, अपवित्र लोगों को ढूँढ़ने और उनसे प्रेम करने में, ताकि वे भी पवित्र हो जाएँ। आत्म-बलिदानी प्रेम पवित्रता का सार ही है। इस्राएल का पवित्र ही उसका छुड़ानेवाला है। परमेश्वर का पवित्र जन मरनेवाला उद्धारकर्ता है। परमेश्वर का पवित्र आत्मा पवित्र करता है। परमेश्वर में ऐसी कोई पवित्रता नहीं जो प्रेम करने, उद्धार करने और आशीष देने में पूरी सक्रियता से न लगी हो। हम में भी ऐसा ही होना चाहिए। पवित्रता के विषय में हर एक विचार, विश्वास या प्रार्थना का हर एक कार्य, उसकी खोज में किया गया हर एक प्रयत्न, इस अभिलाषा से और परमेश्वर की पवित्रता के प्रति इस समर्पण से प्रेरित हो कि वह अपने उद्देश्य की पूर्ति में हमारा उपयोग करे। तुम्हारा सारा जीवन ऐसा हो जो स्पष्ट और निश्चित रूप से परमेश्वर को उसके उपयोग और सेवा के लिये सौंप दिया गया हो। हो सकता है तुम्हारी परिस्थितियाँ प्रतिकूल दिखाई दें। हो सकता है ऐसा दिखाई दे कि परमेश्वर उस रीति से, जैसे तुम चाहते हो, अपने लिये काम करने का द्वार तुम्हारे लिये बन्द रखता है; हो सकता है अपनी अयोग्यता का बोध तुम्हें पीड़ा दे। तौभी परमेश्वर और प्राण के बीच यह बात तय हो जाए कि पवित्रता के लिये तुम्हारी लालसा इसलिए है कि तुम उसके उपयोग के लिये अधिक योग्य बनो, और कि मसीह और आत्मा में उसने अपनी पवित्रता में से जो कुछ तुम्हें दिया है, वह सब उसके अधीन है, और काम में लाए जाने की बाट जोह रहा है। उसके उपयोग के लिये तैयार रहो; दूसरों की दीन, आत्म-त्यागी, प्रेमपूर्ण सेवा के दैनिक जीवन में उस अनुग्रह को जीकर दिखाओ जो तुमने पाया है। तुम पाओगे कि आराधना और काम के मेल और आदान-प्रदान में परमेश्वर की पवित्रता तुम पर ठहरी रहेगी।

‘पिता ने पुत्र को पवित्र ठहराकर जगत में भेजा।’ जगत ही पवित्र किए हुए जन का स्थान है, कि वह उसकी ज्योति, उसका नमक, उसका जीवन हो। हम भी वे हैं जो ‘मसीह यीशु में पवित्र किए गए,’ और हम भी जगत में भेजे गए हैं। आह, आओ, हम अपना स्थान स्वीकार करने से न डरें—अपना दोहरा स्थान; जगत में, और मसीह में! जगत में, उसके पाप और शोक के साथ, उसकी हज़ारों आवश्यकताओं के साथ जो हर ओर से हमें छूती हैं, और उसके लाखों प्राणों के साथ जो सब हमारी बाट जोह रहे हैं। और मसीह में भी। उसी जगत के लिये हम ‘मसीह में पवित्र किए गए हैं,’ हम ‘मसीह में पवित्र’ हैं, हम में ‘पवित्रता की आत्मा’ का वास है। पापी जगत में पवित्र नमक होकर, आओ, हम अपने आपको अपनी पवित्र बुलाहट के लिये सौंप दें। आओ, हम उस परमेश्वर के, जिसने हमें बुलाया है, और भी निकट, और भी निकट आएँ। आओ, हम मसीह में, जो हमारी पवित्रता है, और जिसमें हम परमेश्वर की ओर से हैं, और भी गहरी, और भी गहरी जड़ पकड़ें। आओ, हम उसमें, जिसमें हम हैं, उस विश्वास में और भी दृढ़ता से और भी पूरी रीति से प्रवेश करें, जिसके द्वारा हमारा सारा जीवन उसके जीवन में ढँप जाएगा और समा जाएगा। आओ, हम पिता से विनती करें कि वह हमें सिखाए कि उसका पवित्र आत्मा हर क्षण सचमुच हम में वास करता है, और यदि हम विश्वास से जीते हैं, तो वह मसीह को उसकी पवित्रता समेत हमारा घर, हमारा निवास, हमारा निश्चित शरणस्थान, और हमारी असीम पूर्ति बना देता है। जैसा हमारा बुलानेवाला पवित्र है, वैसे ही आओ, हम उसके अपने पुत्र में, उसके अपने आत्मा के द्वारा पवित्र बनें, और उसके पवित्र प्रेम की आग हमारे द्वारा अपना काम करेगी, न्याय करने और दोषी ठहराने का, उद्धार करने और पवित्र करने का। पवित्र किए हुए प्राण को परमेश्वर उद्धार करने के लिये काम में लाएगा।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

धन्य स्वामी! मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मुझे तेरे छुड़ानेवाले प्रेम के प्रयोजन का फिर से स्मरण दिलाया गया है। तूने अपने आपको दे दिया, कि शुद्ध करके अपने लिये एक ऐसी निज प्रजा बना ले जो भले-भले कामों में सरगर्म हो। तू हम में से हर एक को आदर का पात्र बनाना चाहता है, शुद्ध और पवित्र, तेरे काम आने योग्य, और हर भले काम के लिये तैयार।

धन्य प्रभु! अपने वचन की शिक्षाएँ मेरे हृदय में गहराई से लिख दे। मुझे और अपनी सारी प्रजा को सिखा कि यदि हम तेरे लिये काम करना चाहें, यदि हम चाहें कि तू हम में काम करे और हमें काम में लाए, तो हमें बहुत पवित्र होना ही है, ऐसा पवित्र जैसा परमेश्वर पवित्र है। और यह भी कि यदि हम पवित्र होना चाहें, तो हमें तेरी सेवा करते रहना होगा। यह तेरा अपना आत्मा है, जिसके द्वारा तू हमें इसलिए पवित्र करता है कि हमें काम में लाए, और काम में लाते हुए पवित्र करता है। पूरी रीति से तेरे अधिकार में होना ही पवित्रता और सेवा, दोनों का मार्ग है।

अति पवित्र उद्धारकर्ता! हम तुझ में हैं, जो हमारी पवित्रता है: हम तुझ में बने रहना चाहते हैं। उस विश्वास के विश्राम में जो सब कुछ के लिये तुझ पर भरोसा रखता है, उस समर्पण की सामर्थ्य में जो तेरी इच्छा को छोड़ और कोई इच्छा नहीं रखना चाहता, उस प्रेम में जो पूरी रीति से तेरा हो जाने के लिये अपने आपको खो देना चाहता है, हे धन्य यीशु, हम तुझ में बने रहते हैं। तुझ में हम पवित्र हैं: तुझ में हम बहुत फल लाएँगे।

आह, अपने ही काम को हम में सिद्ध करने की कृपा कर! आमीन।

1. शब्दों में यह स्पष्ट करना कठिन है कि पवित्रता में बढ़ना किस प्रकार बस एक बढ़ती हुई सरलता और आत्म-विस्मृति के रूप में प्रगट होगा, और उसके साथ यह विश्रामपूर्ण और अति धन्य निश्चय होगा कि परमेश्वर का हम पर पूरा अधिकार है और वह हमें काम में लाएगा। हम उस अवस्था से आगे निकल जाते हैं जिसमें काम एक दायित्व बनकर दबाव डालता है; वह फल लाने का आनन्द बन जाता है; विश्वास का यह निश्चय कि वह हमारे द्वारा अपनी इच्छा पूरी कर रहा है।

2. कभी-कभी कहा गया है कि लोग पवित्रता सम्मेलनों में जाने के बजाय परमेश्वर के लिये काम करने में अपना समय अधिक अच्छी रीति से लगा सकते हैं। यह निश्चय ही एक भूल है। तीन बार पवित्र के सिंहासन के सामने, और जब उसने सारापों को परमेश्वर की पवित्रता का गीत गाते सुना, तभी भविष्यद्वक्ता ने कहा, ‘मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।’ जैसे मूसा का, और यशायाह का, और उस पुत्र का, जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर भेजा, हर एक का भेजा जाना परमेश्वर की पवित्रता के प्रकाशन से आरम्भ हुआ, वैसे ही हमारे मिशन भी नई सामर्थ्य पाएँगे, जितना अधिक वे पवित्र जन के रूप में परमेश्वर की आराधना से सीधे जन्म लेंगे, और पवित्रता की आत्मा में बपतिस्मा पाएँगे।

3. हर एक कार्यकर्ता परमेश्वर की दोहरी बुलाहट सुनने के लिये समय निकाले। यदि तुम काम करना चाहते हो, तो बहुत पवित्र बनो। यदि तुम पवित्र होना चाहते हो, तो अपने आपको परमेश्वर को सौंप दो कि वह अपने काम में तुम्हें लगाए।

4. ‘पवित्र’ और ‘स्वामी के काम आएगा’ के बीच के सम्बन्ध पर ध्यान दो। सच्ची पवित्रता परमेश्वर के अधिकार में होना है; सच्ची सेवा परमेश्वर द्वारा काम में लाया जाना है। कितनी ही ऐसी सेवा है जिसमें मुख्य कर्ता हम होते हैं, और परमेश्वर से माँगते हैं कि वह हमारी सहायता करे और हमें आशीष दे। सच्ची सेवा अपने आपको स्वामी को सौंप देना है, ताकि वह काम में लाए। तब पवित्र आत्मा कर्ता होता है, और हम उसकी इच्छा के साधन होते हैं। ऐसी सेवा पवित्रता है।

5. ‘मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ ताकि वे भी’: दूसरों की ओर दृष्टि ही सारी सच्ची पवित्रता का मूल सिद्धान्त है।


अट्ठाईसवाँ दिन।

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