अध्याय 27 · 13 मिनट का पठन
पवित्रता और परमेश्वर की इच्छा
‘परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो।’—1 थिस्सलुनीकियों 4:3।
‘देख, मैं आ गया हूँ, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूँ। उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’—इब्रानियों 10:9, 10।
परमेश्वर की इच्छा में हम उसकी बुद्धि और उसकी सामर्थ्य का मेल पाते हैं। बुद्धि निश्चित करती और घोषित करती है कि क्या होना है: सामर्थ्य उसके पूरा होने को निश्चित करती है। घोषणा करनेवाली इच्छा केवल एक पहलू है; उसका पूरक, कार्य करनेवाली इच्छा, वह जीवित शक्ति है जिसमें हर भली वस्तु का उद्गम और अस्तित्व है। जब तक हम परमेश्वर की इच्छा को केवल पहले रूप में, अर्थात् व्यवस्था के रूप में देखते हैं, तब तक हमें वह बोझ लगती है, क्योंकि हम में उसे पूरा करने की सामर्थ्य नहीं—वह हमारे लिए बहुत ऊँची है। जब विश्वास उस सामर्थ्य की ओर देखता है जो परमेश्वर की इच्छा में कार्य करती है और उसे पूरा करती है, तब उसे उस इच्छा को ग्रहण करने और पूरा करने का साहस मिलता है, क्योंकि वह जानता है कि परमेश्वर स्वयं उसे पूरा कर रहा है। इस प्रकार बुद्धि के रूप में ईश्वरीय इच्छा के प्रति विश्वास में किया गया समर्पण, सामर्थ्य के रूप में उसका अनुभव पाने का मार्ग बन जाता है। तब ‘वह अपनी इच्छा के अनुसार काम करता है,’ यह वाक्य केवल विवशता से किए गए समर्पण की नहीं, वरन् आनन्द भरी आशा की भाषा बन जाता है।
‘परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो।’ इन शब्दों के साधारण अर्थ में, इनका केवल यह अभिप्राय है कि परमेश्वर ने जिन बहुत सी बातों की इच्छा की है, उनमें से एक पवित्रता भी है; यह उसकी इच्छा के अनुकूल बात है। इस विचार में बड़े मूल्य की शिक्षा है। परमेश्वर ने बहुत स्पष्ट और निश्चित रूप से तुम्हारी पवित्रता की इच्छा की है: तुम्हारी पवित्रता का उद्गम और उसकी निश्चितता इसी में है कि वह परमेश्वर की इच्छा है। हम वे हैं जो ‘पवित्र आत्मा के पवित्र करने के द्वारा चुने गए,’ जिन्हें उसने ‘चुन लिया कि हम पवित्र हों;’ अनन्तकाल से परमेश्वर की इच्छा का अभिप्राय, और अब भी उसकी इच्छा, हमारी पवित्रता है। हमने परमेश्वर की इच्छा के विषय में जो कहा था—कि वह एक ईश्वरीय सामर्थ्य है जो उसे पूरा करती है जिसे उसकी बुद्धि ने चुना है—हमें केवल उसी पर विचार करना है, और हम देख लेंगे कि यह सत्य हमारे इस विश्वास को कितना बल देगा कि हम पवित्र होंगे: परमेश्वर इसकी इच्छा रखता है, और वह इसे उन सब के लिए और उन सब में पूरा करेगा जो उसका विरोध नहीं करते, वरन् अपने आपको उसकी सामर्थ्य को सौंप देते हैं। अपनी पवित्रता को परमेश्वर की इच्छा में केवल इस घोषणा के रूप में न खोजो कि वह तुम्हें क्या बनाना चाहता है, वरन् इस प्रकाशन के रूप में भी खोजो कि वह स्वयं तुम में क्या पूरा करेगा।
परन्तु यहाँ एक और अति बहुमूल्य विचार सामने आता है। यदि हमारी पवित्रता परमेश्वर की इच्छा है—उसका केन्द्रीय विचार और उसका सार—तो उस इच्छा का हर एक भाग उस पर प्रभाव डालता होगा, और पवित्रता में प्रवेश का निश्चित मार्ग यही होगा कि सब बातों में परमेश्वर की इच्छा को पूरे मन से ग्रहण किया जाए। परमेश्वर की इच्छा के साथ एक होना ही पवित्र होना है। जो पवित्र होना चाहता है, वह यहीं—परमेश्वर की सारी इच्छा में—अपना स्थान ले और ‘परमेश्वर की इच्छा पर स्थिर रहे।’ वहाँ वह स्वयं परमेश्वर से मिलेगा, और उसकी पवित्रता में सहभागी बनाया जाएगा, क्योंकि उसकी इच्छा हर एक उस व्यक्ति में जो अपने आपको उसे सौंप देता है, सामर्थ्य के साथ अपना अभिप्राय पूरा करती है। पवित्रता के जीवन में सब कुछ इस पर निर्भर है कि परमेश्वर की इच्छा के साथ हमारा सम्बन्ध ठीक हो।
बहुत से मसीही ऐसे हैं जिन्हें यह सोचना भी असम्भव लगता है कि वे परमेश्वर की सारी इच्छा को ग्रहण करें, या उसके साथ एक हो जाएँ। वे परमेश्वर की इच्छा को उसकी हज़ारों आज्ञाओं और उसके अनगिनत विधानों में देखते हैं। कभी-कभी उन्हें एक ही आज्ञा को मानना, या किसी छोटी सी निराशा को मन से स्वीकार कर लेना भी बहुत कठिन लगा है। वे समझते हैं कि यह कहने का साहस करने से पहले कि वे परमेश्वर की सारी इच्छा को—चाहे करने की हो या सहने की—सचमुच ग्रहण करते हैं, उन्हें हज़ार गुना अधिक पवित्र और अनुग्रह में हज़ार गुना अधिक दृढ़ होना पड़ेगा। वे यह नहीं समझ पाते कि सारी कठिनाई इसी से आती है कि वे सही स्थान पर खड़े नहीं हैं। वे परमेश्वर की इच्छा को अपनी स्वाभाविक इच्छा के विरोध में देखते हैं, और उन्हें लगता है कि वह स्वाभाविक इच्छा परमेश्वर की सारी इच्छा से कभी प्रसन्न न होगी। वे भूल जाते हैं कि नये मनुष्य की इच्छा भी नई की गई है। यह नई इच्छा परमेश्वर की इच्छा से प्रसन्न होती है, क्योंकि वह उसी से उत्पन्न हुई है। यह नई इच्छा परमेश्वर की इच्छा की सुन्दरता और महिमा को देखती है, और उसके साथ मेल में है। यदि वे सचमुच परमेश्वर की सन्तान हैं, तो सन्तान की आत्मा की सबसे पहली प्रेरणा निश्चय ही यही होगी कि स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले। और उन्हें केवल इतना करना है कि अपने आपको पूरे मन से और पूरी रीति से लेपालकपन की इस आत्मा को सौंप दें, तब उन्हें परमेश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा के रूप में ग्रहण करने से डरने की आवश्यकता न होगी।
उनकी यह भूल बहुत गम्भीर है। विश्वास से जीने के बदले वे भावना से परखते हैं, जिसमें पुराना स्वभाव बोलता और राज्य करता है। वह उनसे कहता है कि परमेश्वर की इच्छा प्रायः ऐसा बोझ है जो उठाया नहीं जा सकता, और कि उन्हें उसे पूरा करने का बल कभी मिल ही नहीं सकता। विश्वास दूसरी बात कहता है। वह हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर प्रेम है, और उसकी इच्छा और कुछ नहीं, केवल प्रकट किया हुआ प्रेम है। वह हमसे पूछता है कि क्या हम नहीं जानते कि स्वर्ग या पृथ्वी पर परमेश्वर की इच्छा से अधिक सिद्ध या सुन्दर कुछ भी नहीं। वह हमें दिखाता है कि अपने मन-फिराव में हम पहले ही परमेश्वर को पिता और प्रभु के रूप में ग्रहण करने का अंगीकार कर चुके हैं। और सबसे बढ़कर, वह हमें निश्चय दिलाता है कि यदि हम केवल निश्चित रूप से और भरोसे के साथ अपने आपको उस इच्छा को सौंप दें जो प्रेम है, तो वह प्रेम के रूप में हमारे मनों को भर देगी और हमें उसमें आनन्दित करेगी, और इस प्रकार वह सामर्थ्य बन जाएगी जो हमें आनन्द के साथ करने और सहने के योग्य बनाती है। विश्वास हम पर प्रकट करता है कि परमेश्वर की इच्छा उसके प्रेम की सामर्थ्य है, जो हर एक उस व्यक्ति में, जो अपने आपको पूरी रीति से उसे सौंप देता है, ईश्वरीय सुन्दरता में अपनी योजना पूरी करती है।
तो अब हम क्या चुनेंगे? और हम अपना स्थान कहाँ लेंगे? क्या हम मसीह को उसकी इच्छा ग्रहण किए बिना उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करने का प्रयत्न करेंगे? क्या हम पिता की सन्तान होने का दावा करेंगे, और फिर भी अपना जीवन इसी वाद-विवाद में बिता देंगे कि उसकी इच्छा में से कितना पूरा करें? क्या हम इस दुखदायी बोध के साथ दिन पर दिन चलते रहने से सन्तुष्ट रहेंगे कि हमारी इच्छा परमेश्वर की इच्छा के साथ मेल में नहीं है? या क्या हम अभी और सदा के लिए अपनी इच्छा को, पापमय जानकर, उसकी इच्छा को सौंप न देंगे—उस इच्छा को, जिसे उसने पहले ही हमारे हृदय पर लिख दिया है? यह एक सम्भव बात है। यह किया जा सकता है। परमेश्वर के साथ एक सरल और निश्चित लेन-देन में हम कह सकते हैं कि हम उसकी पवित्र इच्छा को अपनी इच्छा के रूप में सचमुच ग्रहण करते हैं। विश्वास जानता है कि परमेश्वर ऐसे समर्पण को अनदेखा न करेगा, वरन् उसे ग्रहण करेगा। इस भरोसे में कि वह अब हमें अपनी इच्छा में उठा लेता है, और उसे हम में फूँकने का, और उसके साथ उसे पूरा करने का प्रेम और सामर्थ्य देने का भार अपने ऊपर लेता है—इसी विश्वास में आओ, हम परमेश्वर की इच्छा में प्रवेश करें और एक नया जीवन आरम्भ करें; इस परम पवित्र इच्छा के ठीक केन्द्र में खड़े रहें, और उसी में बने रहें।
परमेश्वर की इच्छा को इस प्रकार ग्रहण करना विश्वासी को पवित्र आत्मा के द्वारा इस योग्य बनाता है कि वह इच्छा चाहे जिस रूप में आए, वह उसे पहचाने और जाने। शारीरिक और आत्मिक मसीही के बीच बड़ा अन्तर यही है कि आत्मिक मसीही परमेश्वर को मान लेता है, चाहे वह कैसे ही तुच्छ और दीन और मानवीय रूप में अपने आपको प्रकट करे। जब परमेश्वर ऐसी परीक्षाओं में आता है जिनका कारण उसके हाथ के सिवाय और कहीं नहीं खोजा जा सकता, तब वह कहता है, ‘तेरी इच्छा पूरी हो।’ जब परीक्षाएँ मनुष्यों की निर्बलता या उसकी अपनी मूर्खता के द्वारा आती हैं, जब परिस्थितियाँ उसकी आत्मिक उन्नति के प्रतिकूल दिखाई देती हैं, और प्रलोभन उसकी शक्ति से बाहर होकर उस पर प्रबल होने की धमकी देते हैं, तब वह सबसे पहले हर बात में परमेश्वर को देखना सीखता है, और फिर भी कहता है, ‘तेरी इच्छा पूरी हो।’ वह जानता है कि परमेश्वर की सन्तान अपने स्वर्गीय पिता की इच्छा के बिना किसी भी दशा में हो ही नहीं सकती, तब भी नहीं जब वह इच्छा यह रही हो कि उसे कुछ समय के लिए उसकी अपनी हठ पर छोड़ दे, या उसे अपने या दूसरों के पाप का फल भोगने दे। वह यह देखता है, और अपनी परिस्थितियों को परमेश्वर की ऐसी इच्छा मानकर ग्रहण करने से जो उसे परखने और जाँचने के लिए है, वह उस सही स्थिति में आ जाता है जिसमें वह अब जान सके और कर सके कि उचित क्या है। इस प्रकार हर बात में परमेश्वर की इच्छा को देखकर और उसका आदर करके, वह सदा उस इच्छा में बने रहना सीखता है।
वह उस इच्छा पर चलकर भी ऐसा करता है। जैसे-जैसे उसकी आत्मिक परख यहाँ तक बढ़ती है कि जो कुछ भी हो, उसके विषय में वह कहे, ‘सब बातें परमेश्वर की ओर से हैं,’ वैसे-वैसे वह बुद्धि और आत्मिक समझ में भी बढ़ता जाता है, कि परमेश्वर की इच्छा को उस रूप में जाने जिसमें वह पूरी की जानी है। विवेक और परमेश्वर के विधान के संकेतों में, वचन और आत्मा की शिक्षा में, वह यह देखना सीखता है कि परमेश्वर की इच्छा जीवन के हर भाग और हर कर्तव्य से किस प्रकार सम्बन्ध रखती है, और उसका आनन्द यह हो जाता है कि वह सब बातों में इस रीति से जीए: ‘मन से परमेश्वर की इच्छा पर चलते हुए, उस सेवा को मनुष्यों की नहीं, परन्तु प्रभु की जानकर।’ ‘प्रार्थनाओं में प्रयत्न करते हुए, कि वह सिद्ध होकर पूर्ण विश्वास के साथ परमेश्वर की इच्छा पर स्थिर रहे,’ वह पाता है कि पिता ने उसके समर्पण को कैसी आशीष के साथ ग्रहण किया है, और यह भी कि पिता वह सारा प्रकाश और बल देता है जिसकी आवश्यकता है, कि उसकी इच्छा उसके द्वारा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी पूरी हो।
मैं हर एक पाठक से कहता हूँ कि वह एक पवित्र परमेश्वर से कहे कि क्या उसने सचमुच अपने आपको उसे सौंप दिया है कि वह पवित्र बनाया जाए? क्या उसने परमेश्वर की भली और सिद्ध इच्छा को ग्रहण किया है, क्या उसमें प्रवेश किया है, और क्या वह उसमें जी रहा है? प्रश्न यह नहीं है कि जब क्लेश आता है, तब वह अनिवार्य को स्वीकार करता है और उस इच्छा के अधीन हो जाता है जिसका वह विरोध नहीं कर सकता। वरन् यह है कि क्या उसने परमेश्वर की इच्छा को अपनी सबसे बड़ी भलाई के रूप में चुना है, और मसीह के जीवन-सिद्धान्त को अपना बना लिया है: ‘हे मेरे परमेश्वर, मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूँ।’ यही मसीह की पवित्रता थी, जिसमें उसने अपने आपको और हमें पवित्र किया—परमेश्वर की इच्छा पूरी करना। ‘उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं।’ परमेश्वर की यही इच्छा हमारी पवित्रता है।
हे भाई! क्या तुम पवित्र होने के लिए सचमुच गम्भीर हो? क्या तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें पूरी रीति से अपने अधिकार में ले ले? मार्ग यह है। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि न डरो और न पीछे हटो। तुमने परमेश्वर को अपना परमेश्वर करके ग्रहण किया है; क्या तुमने सचमुच उसकी इच्छा को अपनी इच्छा करके ग्रहण किया है? आह, परमेश्वर के साथ एक ही इच्छा रखने के सौभाग्य और आनन्द के विषय में सोचो! और अपने आपको बिना किसी रोक-टोक के उसे सौंप देने से मत डरो। परमेश्वर की इच्छा, अपने हर एक भाग में और अपनी सारी ईश्वरीय सामर्थ्य में, तुम्हारी पवित्रता है।
पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।
हे धन्य पिता! मैं यह कहने आया हूँ कि मैं देखता हूँ कि तेरी इच्छा ही मेरी पवित्रता है, और मैं उसे केवल वहीं खोजना चाहता हूँ। अनुग्रह करके ऐसा कर कि तेरे पवित्र आत्मा के द्वारा, जो मुझ में बसा हुआ है, उस इच्छा की महिमा, और उसमें बने रहने का आनन्द, मुझ पर पूरी रीति से प्रकट हो।
मुझे सिखा कि मैं उसे प्रेम की इच्छा के रूप में जानूँ, जो अपनी सन्तान के लिए सदा वही ठानती है जो सबसे उत्तम और सबसे अधिक आशीषित है। मुझे सिखा कि मैं उसे सर्वशक्तिमान की इच्छा के रूप में जानूँ, जो मुझ में अपनी हर एक युक्ति पूरी करने में समर्थ है। मुझे सिखा कि मैं उसे मसीह में जानूँ, जिसमें वह मेरी ओर से सिद्ध रीति से पूरी की गई। मुझे सिखा कि मैं उसे ऐसी इच्छा के रूप में जानूँ जिसे आत्मा हर एक उस व्यक्ति में चाहता और पूरा करता है जो अपने आपको उसे सौंप देता है।
हे मेरे पिता! मैं तेरे इस अधिकार को मानता हूँ कि केवल तेरी ही इच्छा पूरी हो, और मैं यहाँ हूँ कि वह इच्छा मेरे साथ जैसा तुझे भाए वैसा करे। अपने सारे मन से मैं उसमें प्रवेश करता हूँ, कि सदा के लिए उसके साथ एक हो जाऊँ। तेरा पवित्र आत्मा इस एकता को बिना किसी बाधा के बनाए रख सकता है। हे मेरे पिता, मैं तुझ पर भरोसा रखता हूँ कि तू उसी आत्मा के द्वारा, कदम-कदम पर, अपनी इच्छा का प्रकाश मेरे हृदय में और मेरे मार्ग पर चमकाएगा।
यही वह पवित्रता हो जिसमें मैं जीऊँ, कि तुझे प्रसन्न करने और तेरा आदर करने में मैं अपने आपको भूल जाऊँ और खो दूँ। आमीन।
1. मनन और प्रार्थना और आराधना में इसका अध्ययन करो, कि परमेश्वर की इच्छा के प्रताप, उसकी सिद्धता और उसकी महिमा की, और उसमें जीने के सौभाग्य और सम्भावना की पूरी छाप तुम पर पड़े।
2. उसका अध्ययन एक असीम प्रेम और पितृत्व की अभिव्यक्ति के रूप में भी करो; उसका हर एक प्रकटीकरण करुणा से भरा है। हर एक विधान परमेश्वर की इच्छा है; जो कुछ भी हो, दीन आराधना के साथ उसमें परमेश्वर से मिलो। हर एक आज्ञा परमेश्वर की इच्छा है; प्रेम भरी आज्ञाकारिता के साथ उसमें परमेश्वर से मिलो। हर एक प्रतिज्ञा परमेश्वर की इच्छा है; पूरे भरोसे के साथ उसमें परमेश्वर से मिलो। परमेश्वर की इच्छा में बिताया गया जीवन विश्राम और बल और आशीष है।
3. और सबसे बढ़कर, उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य पर विश्वास करना न भूलो। वह अपनी इच्छा के मत के अनुसार सब कुछ करता है। प्रकृति में, और उनमें जो उसका विरोध करते हैं, उनकी सहमति के बिना। अपनी सन्तानों में, उनके विश्वास के अनुसार, और जितना वे उसकी इच्छा करें। निश्चय विश्वास करो कि परमेश्वर की इच्छा तुम में अपनी युक्ति पूरी करेगी, जैसे-जैसे तुम उस पर भरोसा रखते हो कि वह ऐसा करेगी।
4. यह इच्छा यीशु के आत्म-बलिदान में प्रकट हुई असीम परोपकारिता और भलाई है। दूसरों के लिए जीओ: इस प्रकार तुम ईश्वरीय इच्छा के काम में आनेवाला साधन बन सकते हो (मत्ती 18:14; यूहन्ना 6:39, 40)। अपने आपको परमेश्वर की इस छुड़ानेवाली इच्छा को सौंप दो, कि वह तुम पर पूरा अधिकार पा ले, और तुम्हारे द्वारा भी अपना उद्धार करनेवाला अभिप्राय पूरा करे।
5. मसीह परमेश्वर की इच्छा का साकार रूप ही है: वह पूरी की हुई परमेश्वर की इच्छा है। परमेश्वर की इच्छा में बने रहने के द्वारा, उसे पूरे मन से और सदा पूरी करने के द्वारा, उसमें बने रहो। मसीही, मसीह के समान, वह मनुष्य है जिसने अपने आपको परमेश्वर की इच्छा को सौंप दिया है।
सत्ताईसवाँ दिन।
अध्याय 27 पूरा हुआ
पवित्रता और परमेश्वर की इच्छा