अध्याय 23 · 14 मिनट का पठन
मसीह में हमारी पवित्रता
‘उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा अर्थात् धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा। ताकि जैसा लिखा है, वैसा ही हो, जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे।’—1 कुरिन्थियों 1:30, 31।
ये शब्द अब हमें पवित्रता के मार्ग के विषय में परमेश्वर के प्रकाशन के ठीक केन्द्र तक ले आते हैं। हम उस मार्ग के पड़ावों को जानते हैं जो हमें यहाँ तक लाया है। वह पवित्र है, और पवित्रता उसी की है। वह निकट आकर पवित्र करता है। उसकी उपस्थिति ही पवित्रता है। मसीह के जीवन में, वह पवित्रता, जो अब तक केवल प्रतीक में और आनेवाली अच्छी वस्तुओं की प्रतिज्ञा के रूप में प्रगट हुई थी, सचमुच एक मानवीय इच्छा पर अधिकार कर चुकी थी, और सच्चे मानवीय स्वभाव के साथ एक कर दी गई थी। उसकी मृत्यु में हर वह बाधा दूर कर दी गई थी जो उस पवित्र स्वभाव के हम तक पहुँचाए जाने को रोक सकती थी: मसीह सचमुच हमारी पवित्रता बन गया था। पवित्र आत्मा में उस पवित्रता का वास्तविक दान हुआ। और अब हम यह समझना चाहते हैं कि पवित्र आत्मा कौन सा काम करता है, और वह यह पवित्र स्वभाव हमें कैसे देता है: हमारी पवित्रता के रूप में मसीह के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है, और हमें उसके प्रति कौन सा स्थान ग्रहण करना है, ताकि वह पवित्रता अपनी भरपूरी और अपनी सामर्थ्य में हमारे लिये अपना काम करे।
इस प्रश्न का ईश्वरीय उत्तर यह है, ‘परमेश्वर की ओर से तुम मसीह में हो।’ जिस एक बात को हमें पकड़ना है, वह यह है कि मसीह में हमारा यह स्थान और जीवन क्या है, और हमारी ओर से वह स्थान और जीवन कैसे ग्रहण किया और बनाए रखा जा सकता है। इस बात का हम निश्चय कर सकते हैं कि यह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो ऊँची और हमारी पहुँच से बाहर हो। थका देनेवाले प्रयत्न या निराश आहों की कोई आवश्यकता नहीं, ‘स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा, अर्थात् मसीह को उतार लाने के लिये?’ यह वह जीवन है जो पापियों और थके हुओं के लिये, अयोग्यों और असमर्थों के लिये ठहराया गया है। यह वह जीवन है जो पिता के प्रेम का दान है, और जिसे वह आप हर उस जन में प्रगट करेगा जो बालक के से भरोसे के साथ उसके पास आता है। यह वह जीवन है जो हमारे प्रतिदिन के जीवन के लिये ठहराया गया है, जो हर बदलती हुई परिस्थिति और दशा में हमें पवित्र बनाएगा और पवित्र बनाए रखेगा।
‘परमेश्वर की ओर से तुम मसीह में हो।’ हमारे धन्य प्रभु ने संसार छोड़ने से पहले कहा था: देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ। और उसके विषय में लिखा है: ‘जो उतर गया यह वही है जो सारे आकाश के ऊपर चढ़ भी गया कि सब कुछ परिपूर्ण करे।’ ‘कलीसिया उसकी देह है, और उसी की परिपूर्णता है, जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है।’ पवित्र आत्मा में प्रभु यीशु यहाँ पृथ्वी पर अपने लोगों के साथ है। यद्यपि वह दिखाई नहीं देता, और शरीर में नहीं है, तो भी उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति पृथ्वी पर उतनी ही वास्तविक है जितनी तब थी जब वह अपने चेलों के साथ चलता-फिरता था। नये जन्म में विश्वासी अपने पुराने स्थान, अर्थात् ‘शारीरिक दशा में’ से निकाल लिया जाता है; वह अब शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में है (रोमियों 8:9); वह सचमुच और वास्तव में मसीह में है। जीवित मसीह अपनी पवित्र उपस्थिति के द्वारा उसके चारों ओर है। वह चाहे जहाँ हो और चाहे जैसा हो, अपने स्थान के विषय में चाहे कितना ही अनजान हो या उसके प्रति कितना ही अविश्वासयोग्य हो, वहाँ वह मसीह में है। ईश्वरीय और सर्वशक्तिमान अनुग्रह के एक कार्य के द्वारा वह मसीह में रोपा गया है, और हर ओर से उसकी सामर्थ्य और उसके प्रेम से घिरा हुआ है जो सब कुछ परिपूर्ण करता है, और जिसकी परिपूर्णता विशेष करके यहाँ नीचे उसकी देह, अर्थात् कलीसिया में वास करती है।
और जो जन मसीह को अपनी पवित्रता के रूप में पूरी रीति से जानने की लालसा रखता है, वह इस बात को कैसे जीवन में उतारे जो परमेश्वर इसमें चाहता है और जिसका उसने इसमें प्रबन्ध किया है—‘मसीह में’? पहली बात जो स्मरण रखनी चाहिए वह यह है कि यह विश्वास की बात है, भावना की नहीं। उस पवित्र के भीतर वास करने और जिलाने की प्रतिज्ञा दीनों और खेदित मनवालों के लिये है। ठीक जब मैं सबसे गहराई से यह अनुभव करता हूँ कि मैं पवित्र नहीं हूँ, और अपने आप को पवित्र बनाने के लिये कुछ नहीं कर सकता, जब मैं अपने आप पर लज्जित होता हूँ, ठीक तभी स्वयं से मुड़ने और बड़ी शान्ति से यह कहने का समय है: मैं मसीह में हूँ। वह यहीं मेरे चारों ओर है। उस वायु के समान जो मुझे घेरे रहती है, उस ज्योति के समान जो मुझ पर चमकती है, मेरा प्रभु यीशु यहाँ अपनी छिपी हुई, परन्तु ईश्वरीय और अत्यन्त वास्तविक उपस्थिति में मेरे साथ है। मेरा विश्वास शान्त विश्राम और भरोसे के साथ उस पिता के सामने झुके, जिसकी ओर से और जिसके सामर्थी अनुग्रह के द्वारा मैं मसीह में हूँ: वह इसे मुझ पर नित बढ़ती हुई स्पष्टता और सामर्थ्य के साथ प्रगट करेगा। वह ऐसा तब करता है जब मैं विश्वास करता हूँ, और विश्वास करते हुए अपना सारा प्राण खोल देता हूँ कि जो कुछ इसमें सम्मिलित है उसे ग्रहण करूँ: अपनी पापमयता और अपवित्रता का बोध ही मेरे भरोसे और निर्भरता का बल बन जाना चाहिए। ऐसे विश्वास में मैं मसीह में बना रहता हूँ।
परन्तु क्योंकि यह विश्वास से है, इसलिए यह पवित्र आत्मा से है। परमेश्वर की ओर से तुम मसीह में हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने हमें मसीह में रखकर और रोपकर अब इस एकता को बनाए रखने का काम हम पर छोड़ दिया हो। नहीं, परमेश्वर अनन्त है, अनन्त जीवन का परमेश्वर, जो हर क्षण ऐसी सामर्थ्य से काम करता है जो एक क्षण के लिये भी नहीं थमती। जो कुछ परमेश्वर देता है, उसे वह कभी न रुकनेवाले दान के साथ देता ही रहता है। वही है जो पवित्र आत्मा के द्वारा मसीह में इस जीवन को हमारी चेतना में एक धन्य वास्तविकता बना देता है। ‘हमने परमेश्वर का आत्मा पाया है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।’ विश्वास केवल उस दान के लिये ही परमेश्वर पर निर्भर नहीं है जिसे उसे ग्रहण करना है, वरन् ग्रहण करने की सामर्थ्य के लिये भी। विश्वास को केवल पुत्र की ही आवश्यकता नहीं कि वह उसकी भरपूरी और उसका भोजन हो; उसे आत्मा की भी आवश्यकता है कि वह ग्रहण करने और थामे रखने की उसकी सामर्थ्य हो। और इस प्रकार, मसीह में, जो हमारी पवित्रता है, होने का जो कुछ अर्थ है, उस सब का धन्य अधिकार हमें तब मिलता है जब हम आत्मा के सामर्थी कार्यों के लिये विश्वासभरी प्रार्थना में, और इस गहरे, बालक के से भरोसे में परमेश्वर के सामने झुकना सीखते हैं कि वह हम में इस मसीह को, जो हमारी पवित्रता है और जिसमें हम हैं, प्रगट करेगा और महिमा देगा।
और आत्मा इस मसीह को, जिसमें हम हैं, कैसे प्रगट करेगा? विशेष रूप से जीवित जन के रूप में, व्यक्तिगत मित्र और स्वामी के रूप में। मसीह केवल हमारा आदर्श और हमारा नमूना ही नहीं है। उसका जीवन केवल एक वातावरण और एक प्रेरणा ही नहीं है, जैसे हम किसी ऐसे मनुष्य के विषय में कहते हैं जो अपनी पुस्तकों के द्वारा हम पर बड़ा प्रभाव डालता है। मसीह केवल अनुग्रह और सामर्थ्य का एक भण्डार और एक भरपूरी ही नहीं है, जिसमें आत्मा को हमें ले जाना है। परन्तु मसीह जीवित उद्धारकर्ता है, जिसका हृदय ऐसे प्रेम से धड़कता है जो अत्यन्त कोमलता से मानवीय है, और फिर भी ईश्वरीय है। इसी प्रेम में वह निकट आता है, और इसी प्रेम में वह हमें ग्रहण करता है, जब पिता हमें उसमें रोपता है। एक व्यक्तिगत प्रेम की सामर्थ्य में वह हम पर प्रभाव डालना और हमें अपने से जोड़ना चाहता है। उसके उस प्रेम में हमें इस बात की जमानत मिलती है कि उसकी पवित्रता हम में प्रवेश करेगी; उसी प्रेम में वह बड़ी सामर्थ्य है जिसके द्वारा वह प्रवेश करती है। जब आत्मा हम पर प्रगट करता है कि हम कहाँ वास कर रहे हैं, अर्थात् मसीह और उसके प्रेम में, और कि यह मसीह एक जीवित प्रभु और उद्धारकर्ता है, तब हमारे भीतर व्यक्तिगत लगाव का उत्साह और प्रेमभरी स्वामिभक्ति का समर्पण जाग उठता है, जो हमें पूरी रीति से उसी का बना देते हैं। और हमारे लिये यह विश्वास करना सम्भव हो जाता है कि हम पवित्र हो सकते हैं: हमें निश्चय हो जाता है कि पवित्रता के मार्ग में हम बल पर बल पाते जा सकते हैं।
मसीह में होने के रूप में उसके साथ अपने सम्बन्ध की ऐसी विश्वासभरी समझ, और उसके प्रति ऐसा व्यक्तिगत लगाव जिसने हमें अपने प्रेम में ग्रहण किया है और हमें वहाँ बने रहने में स्थिर रखता है, एक नई आज्ञाकारिता का सोता बन जाता है। परमेश्वर की इच्छा मसीह के जीवन और उसके प्रेम के प्रकाश में हमारे पास आती है—हर एक आज्ञा पहले उसके द्वारा पूरी की गई, और फिर पिता और उसकी पवित्रता के साथ और अधिक सिद्ध संगति के लिये एक निश्चित और परम धन्य सहायता के रूप में हमें सौंपी गई। मसीह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में प्राण में प्रभु और राजा बन जाता है, जो इच्छा को परमेश्वर की सारी सिद्ध इच्छा में ले चलता है, और यह प्रमाणित करता है कि वही उसकी पवित्रता है, क्योंकि वह उसकी आज्ञाकारिता को परमेश्वर की उपस्थिति और पवित्रता के नित बढ़ते हुए प्रवाह से मुकुट पहनाता है।
यदि परमेश्वर की कोई प्रिय सन्तान यह सोचकर कुछ भी हियाव छोड़ने लगी हो कि उसे सारे पवित्र चाल चलन में कैसा मनुष्य होना चाहिए, तो मैं उसे साहस रखने के लिये पुकारता हूँ। क्या परमेश्वर ऐसे पापी, असमर्थ प्राणियों के लिये इससे अधिक अद्भुत या सुन्दर कोई उपाय सोच सकता था? जरा सोचो, मसीह, परमेश्वर का अपना पुत्र, तुम्हारे लिये पवित्रता ठहराया गया। सामर्थी, प्रेमी, पवित्र मसीह, जो दुःख उठाने के द्वारा पवित्र किया गया कि तुम्हारे साथ सहानुभूति रख सके, इसलिए दिया गया कि तुम्हें पवित्र बनाए। तुम इससे अधिक और क्या चाह सकते हो? हाँ, इससे भी अधिक है: ‘परमेश्वर की ओर से तुम उसमें हो।’ चाहे तुम इसे समझो या न समझो, चाहे तुम इसे कितनी ही निर्बलता से अनुभव करो, वह बात वहाँ है, एक ऐसी बात जो पूरी रीति से ईश्वरीय रूप से सच्ची और वास्तविक है। तुम परमेश्वर की अपनी सामर्थी शक्ति के एक कार्य के द्वारा मसीह में हो। और वहाँ, मसीह में, परमेश्वर आप तुम्हें अन्त तक स्थिर और दृढ़ करने की लालसा रखता है। और, सब से बड़ा आश्चर्य यह है कि तुम्हारे भीतर पवित्र आत्मा है, कि जो कुछ मसीह में तुम्हारे लिये है उस सब को जानना, उस पर विश्वास करना और उसे ग्रहण करना तुम्हें सिखाए। और यदि तुम केवल यह मान लो कि तुम में पवित्रता के लिये न कोई ज्ञान है न कोई सामर्थ्य, कुछ भी नहीं, और मसीह को, जो ‘परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर की सामर्थ्य’ है, अपने भीतर के पवित्र आत्मा के द्वारा अपने को आगे ले चलने दो, और यह प्रमाणित करने दो कि वह कितनी पूरी रीति से, कितनी सच्चाई से, कितनी सामर्थ्य से तुम्हारी पवित्रता हो सकता है, तो वह इसे अत्यन्त महिमामय रीति से पूरा करेगा।
हे मेरे भाई! आओ, और पवित्रता के परमेश्वर के मार्ग के लिये और पूरी रीति से सहमत हो जाओ। मसीह को अपनी पवित्रता होने दो। कोई दूर का मसीह नहीं जिसकी ओर तुम ताकते हो, परन्तु एक ऐसा मसीह जो बहुत निकट है, तुम्हारे चारों ओर है, जिसमें तुम हो। शरीर के अनुसार जाना हुआ मसीह नहीं, बीते समय का मसीह नहीं, परन्तु पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में एक वर्तमान मसीह। ऐसा मसीह नहीं जिसे तुम अपनी बुद्धि से जान सको, परन्तु परमेश्वर का मसीह, जो आत्मा है, और जिसे तुम्हारे भीतर का आत्मा, जैसे-जैसे तुम शरीर और स्वयं के प्रति मरते हो, सामर्थ्य के साथ प्रगट करेगा। ऐसा मसीह नहीं जिसकी कल्पना तुम्हारे छोटे-छोटे विचार गढ़ सकें, परन्तु परमेश्वर के हृदय और प्रेम की महानता के अनुसार एक मसीह। आह, आओ, इस मसीह को ग्रहण करो, और उसमें आनन्दित हो! अब इस बात से सन्तुष्ट रहो कि अपनी सारी निर्बलता, और मूर्खता, और अविश्वास को उसी पर छोड़ दो, इस शान्त भरोसे के साथ कि जितना तुम सोच सकते हो उससे कहीं अधिक वह तुम्हारे लिये करेगा। और इस प्रकार अब से वैसा ही हो, जैसा लिखा है, जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे।
पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।
परम धन्य पिता! मैं तेरे ईश्वरीय प्रेम के पवित्र भेद के सामने अवाक् आराधना में झुकता हूँ…।
आह, मुझे क्षमा कर, कि मैंने उसे इतना कम जाना और उस पर इतना कम विश्वास किया है, जबकि वह इससे कहीं अधिक जाने और विश्वास किए जाने के योग्य है।
उसकी ईश्वरीय धन्यता में से जो कुछ मैंने देखा और चखा है, उसके लिये मेरी स्तुति ग्रहण कर। हे प्रभु परमेश्वर! एक आनन्दित और प्रेम करनेवाले हृदय की वह स्तुति ग्रहण कर, जो केवल इतना जानता है कि वह कभी तेरी ठीक-ठीक स्तुति नहीं कर सकता।
और हे मेरे पिता! मेरी प्रार्थना सुन, कि तेरे पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में, जो मुझ में वास करता है, जो कुछ तूने मुझे मसीह में, जो मेरी पवित्रता है, दिया है, उसे मैं प्रतिदिन ग्रहण करूँ और पूरी रीति से जीवन में उतारूँ। उसमें जो अगम्य धन है, वह मेरी हर एक आवश्यकता के लिये प्रतिदिन की आपूर्ति हो। उसकी पवित्रता, तेरी इच्छा में उसका आनन्द, सचमुच मेरा बन जाए। सब से बढ़कर मुझे यह सिखा कि यह सबसे निश्चित रूप से कैसे हो सकता है, क्योंकि मैं तेरी सर्वशक्तिमान जिलानेवाली सामर्थ्य के कार्य के द्वारा उसमें हूँ, और तू आप मुझे वहाँ स्थिर रखता है। हे मेरे पिता! मेरा विश्वास पुकार उठता है: मैं पवित्र हो सकता हूँ, मेरा प्रभु यीशु धन्य हो!
इसी विश्वास में, हे प्रभु यीशु, मेरे राजा और स्वामी, मैं अपने आप को तुझे सौंपता हूँ, कि केवल तेरी ही इच्छा पूरी करूँ। जो कुछ मैं करूँ, चाहे बड़ा हो या छोटा, उसमें मैं ऐसे जन के समान काम करना चाहता हूँ जो यीशु में पवित्र किया गया है, और उसमें परमेश्वर की इच्छा के साथ एक किया गया है। केवल तू ही मुझे यह करना सिखा सकता है, इसे पूरा करने का बल दे सकता है। परन्तु मैं तुझ पर भरोसा रखता हूँ—क्या तू ही मसीह, मेरी पवित्रता नहीं है? धन्य प्रभु! मैं सचमुच तुझ पर भरोसा रखता हूँ। आमीन।
1. मसीह, जैसे वह पृथ्वी पर जीया और मरा, वैसे ही हमारी पवित्रता है। उसका जीवन, उसके जीवन का आत्मा, वही है जिससे हमारी पवित्रता बनती है। मसीह के साथ पूरे मेल में रहना, उसका मन रखना, यही पवित्र होना है।
2. मसीह की पवित्रता के दो पक्ष थे। परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा उसे पवित्र किया: मसीह ने आत्मा की अगुवाई के पीछे चलकर, हर बात में अपनी इच्छा परमेश्वर को सौंपकर, अपने आपको पवित्र किया। इसी प्रकार परमेश्वर ने हमें मसीह में पवित्र बनाया है; और इसी प्रकार हम परमेश्वर के आत्मा के अधीन अपने आप को सौंपकर, अपनी इच्छा त्यागकर और परमेश्वर की इच्छा में जीकर, पवित्रता के खोजी होते और उसे सिद्ध करते हैं।
3. यह अच्छा है कि परमेश्वर ने अपने वचन में पवित्रता के विषय में जो कुछ प्रगट किया है, उसके हर पहलू को हम ग्रहण करें। परन्तु हम सब कुछ पूरी रीति से पकड़ने का यत्न करके कभी अपने आप को थका न डालें। आओ, हम उस सिधाई की ओर लौट भी आएँ जो यीशु में है। उसके पाँवों पर झुकना, यह विश्वास करना कि जिस किसी वस्तु की हमें आवश्यकता है वह सब जानता है, और वह सब उसके पास है, और वह सब देना उसे प्रिय है—यही विश्राम है। और पवित्रता यीशु में, जो परमेश्वर का विश्राम है, विश्राम करना है। हमारे सारे विचार इस एक विचार में समेट लिए जाएँ: यीशु, धन्य यीशु।
4. मसीह में यह पवित्र जीवन आज के लिये है, जब तुम इसे पढ़ रहे हो। आज ही के लिये वह परमेश्वर की ओर से तुम्हारे लिये पवित्रता ठहराया गया है: आज ही वह सचमुच तुम्हारी पवित्रता होगा। इसके लिये उस पर विश्वास करो; उस पर भरोसा रखो, उसकी स्तुति करो। और स्मरण रखो: तुम उसमें हो।
तेईसवाँ दिन।
अध्याय 23 पूरा हुआ
मसीह में हमारी पवित्रता