अध्याय 22 · 15 मिनट का पठन
पवित्रता और आनन्द
‘परमेश्वर का राज्य वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है।’—रोमियों 14:17।
‘चेले आनन्द से और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होते रहे।’—प्रेरितों के काम 13:52।
‘फिर नहेम्याह ने कहा, आज का दिन हमारे प्रभु के लिये पवित्र है; और उदास मत रहो, क्योंकि यहोवा का आनन्द तुम्हारा दृढ़ गढ़ है। अतः लेवियों ने सब लोगों को यह कहकर चुप करा दिया, चुप रहो क्योंकि आज का दिन पवित्र है; और उदास मत रहो। तब सब लोग बड़ा आनन्द मनाने को चले गए, क्योंकि जो वचन उनको समझाए गए थे, उन्हें वे समझ गए थे।’—नहेम्याह 8:10-12।
मसीही जीवन में आनन्द का गहरा महत्त्व बहुत कम समझा जाता है। प्रायः उसे कोई गौण बात मान लिया जाता है; जबकि उसका होना अनिवार्य है, क्योंकि वही इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर सचमुच हमें तृप्त करता है, और उसकी सेवा हमारा सुख है। अपने घरेलू जीवन में, यदि आचरण की सब मर्यादाओं का पालन हो और हर एक दूसरे के प्रति अपना कर्तव्य निभाए, तो भी हमें सन्तोष नहीं होता; सच्चा प्रेम हमें एक दूसरे में सुखी करता है; जैसे-जैसे प्रेम अपने स्नेह की गर्माहट बिखेरता है, वैसे-वैसे आनन्द वह धूप बन जाता है जो घर को अपनी उजियाली से भर देती है। दुःख या दरिद्रता में भी, प्रेम करनेवाले परिवार के सदस्य एक दूसरे के लिये आनन्द का कारण होते हैं। विशेष करके, इस आनन्द के बिना बच्चों की ओर से सच्ची आज्ञाकारिता हो ही नहीं सकती। माता-पिता केवल किसी आज्ञा के पूरे किए जाने या किसी सेवा के कर दिए जाने की ओर नहीं देखते; जिस इच्छापूर्ण, आनन्दभरी तत्परता से वह किया जाता है, वही उसे मनभावना बनाती है।
परमेश्वर की सन्तानों के अपने पिता के साथ सम्बन्ध में भी ठीक ऐसा ही है। समर्पण और सुसमाचार की आज्ञाकारिता के जीवन के लिये यत्न करते हुए भी, हम पर निरन्तर यह खतरा बना रहता है कि हम फिर से व्यवस्था के अधीन आ जाएँ, जो अपना यही हुक्म सुनाती है, तू करना। इसका परिणाम सदा विफलता होता है। व्यवस्था तो केवल क्रोध उपजाती है; वह न जीवन देती है, न बल। जब तक हम अपने प्रभु के आनन्द में, पाप से अपने छुटकारे के आनन्द में, उसके प्रेम के आनन्द में और वह हमारे लिये जो कुछ है उसके आनन्द में, उसकी उपस्थिति के आनन्द में स्थिर खड़े रहते हैं, केवल तभी तक हम में सेवा करने और आज्ञा मानने की सामर्थ्य रहती है। केवल जब हम हर एक स्वामी से, अर्थात् पाप से, स्वयं से और व्यवस्था से स्वतंत्र किए जाते हैं, और केवल जब हम इस स्वतंत्रता में आनन्दित होते हैं, तभी हम में ऐसी सेवा करने की सामर्थ्य होती है जो परमेश्वर को भी और हमें भी सन्तुष्ट करे। ‘मैं तुम से फिर मिलूँगा,’ यीशु ने कहा, ‘और तुम्हारे मन में आनन्द होगा; और तुम्हारा आनन्द कोई तुम से छीन न लेगा।’ आनन्द यीशु की स्थायी, व्यक्तिगत उपस्थिति का प्रमाण भी है और उसकी शर्त भी।
यदि पवित्रता विश्वास के जीवन की शोभा और महिमा है, तो यह स्पष्ट है कि विशेष रूप से यहाँ आनन्द का तत्त्व अनुपस्थित नहीं हो सकता। हम देख चुके हैं कि परमेश्वर का पवित्र के रूप में पहला उल्लेख लाल समुद्र के तट पर गाए गए स्तुति-गीत में हुआ; कि हन्ना और मरियम ने अपने प्रेरणा के क्षणों में परमेश्वर की स्तुति पवित्र के रूप में की; कि स्वर्ग में तीन बार पवित्र का नाम सारापों के गीत में हम तक पहुँचता है; और कि सिंहासन के सामने जीवित प्राणी भी और मेम्ने का गीत गानेवाली वह जयवन्त भीड़ भी परमेश्वर को पवित्र जानकर उसकी आराधना करती है। हमें ‘पवित्रता से शोभायमान होकर उसको दण्डवत् करना है,’ ‘जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका भजन गाना है;’ केवल आराधना, स्तुति और आनन्द की आत्मा में ही हम परमेश्वर को पूर्ण रूप से पवित्र जान सकते हैं। इससे भी बढ़कर, केवल आराधना करनेवाले प्रेम और आनन्द की प्रेरणा में ही हम स्वयं पवित्र बनाए जा सकते हैं। जब हम सब भय और चिन्ता से, सब खिंचाव और परिश्रम से छूट जाते हैं, और जो कुछ यीशु अपने पूरे किए हुए काम में हमारी पवित्रता के रूप में है, उसमें गाते हुए विश्राम करते हैं, जब हम उसमें विश्राम करते और आनन्दित होते हैं, तभी हम उसकी पवित्रता के भागी बनाए जाएँगे। विश्राम का दिन ही वह दिन है जिसे परमेश्वर ने आशीष दी, आशीष और आनन्द का दिन; और जिस दिन को उसने आशीष दी, वही उसका पवित्र दिन है। पवित्रता और धन्यता अलग नहीं की जा सकतीं।
परन्तु क्या यह पवित्रशास्त्र की शिक्षा और पवित्र जनों के अनुभव के विरुद्ध नहीं है? क्या दुःख और शोक परमेश्वर द्वारा चुने हुए पवित्र करने के साधनों में से नहीं हैं? क्या प्रतिज्ञाएँ टूटे मनवालों, मन के दीनों और शोक करनेवालों के लिये नहीं हैं? क्या अपना इन्कार करना और अपना सब कुछ छोड़ देना, मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया जाना और प्रतिदिन मरना, पवित्रता का मार्ग नहीं है? और क्या यह सब आनन्द और हर्ष से अधिक शोक और पीड़ा की बात नहीं है?
इसका उत्तर विश्वास के जीवन की ठीक-ठीक समझ में मिलेगा। विश्वास हमें उससे ऊपर उठा देता है जो हम अनुभव करते या भोगते हैं, और उसका अधिकारी बना देता है जो उसके ठीक विपरीत है। मसीही जीवन में सदा एक विरोधाभास रहता है: जो बातें आपस में कभी मेल न खानेवाली विपरीत बातें दिखाई देती हैं, वे एक ही क्षण में साथ-साथ पाई जाती हैं। पौलुस इसे इन शब्दों में व्यक्त करता है, ‘मरते हुओं के समान हैं और देखो जीवित हैं; शोक करनेवालों के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं, कंगालों के समान हैं, परन्तु बहुतों को धनवान बना देते हैं; ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं फिर भी सब कुछ रखते हैं।’ और दूसरे स्थान पर इस प्रकार, ‘जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवन्त होता हूँ।’ इस प्रत्यक्ष विरोध का मेल केवल इसी में नहीं कि हर एक विश्वासी के व्यक्तित्व में दो जीवन, अर्थात् मानवीय और ईश्वरीय, एक हो गए हैं, वरन् विशेष करके इसमें है कि हम एक ही समय में मसीह की मृत्यु के भी और उसके पुनरुत्थान के भी भागी हैं। मसीह की मृत्यु पीड़ा और दुःख की मृत्यु थी, एक वास्तविक और भयानक मृत्यु, उन बन्धनों का चीरकर अलग किया जाना जो प्राण और देह को, आत्मा और शरीर को एक किए हुए थे। उस मृत्यु की सामर्थ्य हम में काम करती है: यदि हमें पवित्र जीवन जीना है तो हमें उसे बड़ी सामर्थ्य से काम करने देना होगा; क्योंकि उसी मृत्यु में उसने अपने आपको पवित्र किया, ताकि हम भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ। हमारी पवित्रता, उसकी पवित्रता के समान, अपनी इच्छा और अपने सारे निजी जीवन के प्रति मर जाने में है। परन्तु—इस बात को हमें पकड़ने का यत्न करना चाहिए—हम मृत्यु के पास उस ओर से नहीं जाते जिस ओर से मसीह ने उसका सामना किया, अर्थात् ऐसे शत्रु के रूप में जिस पर जय पानी है, ऐसे दुःख के रूप में जिसे सहना है, इससे पहले कि नये जीवन में प्रवेश हो सके। नहीं, जो विश्वासी जानता है कि मसीह जी उठे हुए के रूप में क्या है, वह मृत्यु के पास, अर्थात् स्वयं के, शरीर के और संसार के क्रूस पर चढ़ाए जाने के पास, पुनरुत्थान की ओर से, जय के स्थान से, जीवित मसीह की सामर्थ्य में होकर जाता है। जब हमने मसीह का बपतिस्मा लिया, तो हमने उसकी मृत्यु और उसके पुनरुत्थान का बपतिस्मा इस प्रकार लिया कि वे हमारे हो गए; और मसीह आप, जी उठा हुआ जीवित प्रभु, हमें विजय के साथ उसकी मृत्यु की सामर्थ्य के अनुभव में ले चलता है। और इसलिए, जो विश्वासी सचमुच विश्वास से जीता है, और अपने ही संघर्षों से शरीर को क्रूस पर चढ़ाने और मारने का यत्न नहीं करता, परन्तु जीवित प्रभु को जानता है, उसे पुनरुत्थान का गहरा आनन्द एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ता, वरन् वही उसका बल बना रहता है उस बात के लिये जो दूसरों को केवल पीड़ादायक बलिदान और क्रूस उठाना ही दिखाई दे। वह पौलुस के साथ कहता है, ‘मैं उस क्रूस का घमण्ड करता हूँ जिसके द्वारा मैं क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ।’ वह, जैसा बहुत से लोग करते हैं, पौलुस का यह प्रश्न, ‘मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?’ कभी इसके बिना नहीं पूछता कि वह एक वर्तमान अनुभव के रूप में उसका आनन्दभरा और विजयी उत्तर भी सुनाए, ‘हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।’ ‘परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो मसीह में सदा हमको जय के उत्सव में लिये फिरता है।’ एक वर्तमान उद्धारकर्ता का आनन्द, एक सिद्ध उद्धार के अनुभव का आनन्द, पुनरुत्थान के जीवन का आनन्द ही अकेला वह सामर्थ्य देता है जिससे हम उस मृत्यु में, जो मसीह मरा, गहराई से और पूरी रीति से प्रवेश करें, और अपनी इच्छा और अपना जीवन सौंप दें कि वह पूरी रीति से परमेश्वर के लिये पवित्र किया जाए। उस जीवन के आनन्द में, जिससे उस मृत्यु की सामर्थ्य कभी अलग नहीं होती, हर क्षण प्रेरित के साथ यह कहना सम्भव है, ‘मरते हुओं के समान हैं और देखो जीवित हैं; शोक करनेवालों के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं।’
आओ, हम ये दो पाठ सीखने का यत्न करें: सच्चे सुख के लिये पवित्रता अनिवार्य है; सच्ची पवित्रता के लिये सुख अनिवार्य है। सच्चे सुख के लिये पवित्रता अनिवार्य है। यदि तुम आनन्द पाना चाहते हो, आनन्द की भरपूरी, ऐसा स्थायी आनन्द जिसे कोई वस्तु छीन न सके, तो वैसे ही पवित्र बनो जैसे परमेश्वर पवित्र है। पवित्रता ही धन्यता है। पाप को छोड़ और कोई वस्तु हमारे आनन्द को धुँधला या भंग नहीं कर सकती। हमारी परीक्षा या प्रलोभन चाहे जो भी हो, यीशु का वह आनन्द, जिसके विषय में पतरस कहता है, ‘जिस पर तुम अब ऐसे आनन्दित और मगन होते हो, जो वर्णन से बाहर है,’ उसकी भरपाई ही नहीं करता, वरन् उससे कहीं अधिक भारी पड़ता है। यदि हम अपना आनन्द खो देते हैं, तो अवश्य उसका कारण पाप है। वह कोई प्रत्यक्ष अपराध हो सकता है, या अनजाने में स्वयं के या संसार के पीछे चलना; वह किसी संदिग्ध बात के कारण विवेक पर लगा दाग हो सकता है, या वह अविश्वास हो सकता है जो रूप को देखकर जीना चाहता है, और केवल प्रभु से अधिक अपने आप और अपने आनन्द के विषय में सोचता है: वह चाहे जो भी हो, पाप को छोड़ और कोई वस्तु हमारा आनन्द नहीं छीन सकती। यदि हम आनन्द का जीवन जीना चाहते हैं, जिससे परमेश्वर को, मनुष्यों को और अपने आप को यह निश्चय दिलाएँ कि हमारा प्रभु ही सब कुछ है, हमारे लिये सब से बढ़कर है, तो आह, आओ हम पवित्र बनें! आओ, हम उसमें घमण्ड करें जो हमारी पवित्रता है: उसके निकट आनन्द की भरपूरी है। आओ, हम उस राज्य में जीएँ जो वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है; पवित्रता का आत्मा ही आनन्द का आत्मा है, क्योंकि वह परमेश्वर का आत्मा है। पवित्र लोग, परमेश्वर के पवित्र जन ही हैं, जो ऊँचे स्वर से जयजयकार करेंगे।
और सच्ची पवित्रता के लिये सुख अनिवार्य है। यदि तुम एक पवित्र मसीही बनना चाहते हो, तो तुम्हें एक आनन्दित मसीही बनना होगा। परमेश्वर ने यीशु का ‘हर्षरूपी तेल’ से अभिषेक किया, कि वह हमें ‘हर्ष का तेल’ दे। पवित्रता के लिये हमारे सब प्रयत्नों में, यदि हर्ष का तेल न हो, तो पहिये भारी होकर चलेंगे; केवल यही सारे खिंचाव और घर्षण को दूर करता है, और आगे बढ़ने को सहज और सुखद बना देता है। आनन्द के ईश्वरीय मूल्य को समझने का यत्न करो। यह इस बात का प्रमाण है कि तुम पिता की उपस्थिति में हो, और उसके प्रेम में वास करते हो। यह इस बात का सबूत है कि तुम जानते-बूझते व्यवस्था से और दासत्व की आत्मा के खिंचाव से स्वतंत्र हो। यह चिन्ता और भार से तुम्हारी स्वतंत्रता का चिन्ह है, क्योंकि तुम मसीह यीशु में, जो तुम्हारी पवित्रता, तुम्हारा रखवाला और तुम्हारा बल है, आनन्दित हो रहे हो। यह आत्मिक स्वास्थ्य और बल का भेद है, जो तुम्हारी सारी सेवा को बालक का सा यह आनन्दभरा निश्चय देता है कि पिता ऐसी कोई बात नहीं माँगता जिसके लिये वह बल न दे, और कि जो कुछ इस आत्मा में किया जाता है, चाहे कितनी ही निर्बलता से क्यों न हो, वह उस सब को ग्रहण करता है। सच्चा सुख सदा अपने आप को भूल जाता है: वह अपने आनन्द के विषय में खो जाता है। जैसे-जैसे पवित्र आत्मा का आनन्द हमें भरता है, और हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर में, जो पवित्र है, आनन्दित होते हैं, जैसे-जैसे हम तीन बार पवित्र की आराधना और उपासना में अपने आप को खो देते हैं, वैसे-वैसे हम पवित्र बन जाते हैं। यहाँ जंगल में भी यही है, ‘पवित्र मार्ग: यहोवा के छुड़ाए हुए लोग जयजयकार करते हुए आएँगे; छुड़ाए हुए उसमें नित चलेंगे; उनके सिर पर सदा का आनन्द होगा; वे हर्ष और आनन्द पाएँगे।’
क्या परमेश्वर की सब सन्तान इसे समझती हैं? कि पवित्रता सुख का ही दूसरा नाम है, वह सच्चा नाम जो परमेश्वर उसे देता है; कि यह जानना सचमुच अकथनीय धन्यता है कि परमेश्वर सचमुच हमें पवित्र बनाता है, कि हमारी पवित्रता मसीह में है, कि मसीह का पवित्र आत्मा हमारे भीतर है। आनन्द के समान आकर्षक और कुछ नहीं: क्या विश्वासियों ने इसे समझा है कि प्रभु का आनन्द यही है—पवित्र होना? या क्या खिंचाव, बलिदान और आहें भरने का, कठिनाई और दूरी का विचार इतना प्रधान नहीं रहा कि पवित्र होने के विचार ने शायद ही कभी मन को आनन्दित किया हो? यदि ऐसा रहा है, तो अब आगे ऐसा न रहे। ‘तू इस्राएल के पवित्र के कारण बड़ाई मारेगा।’ आओ, हम इस प्रतिज्ञा पर अपना अधिकार जताएँ। यह विश्वासभरा निश्चय कि हमारे प्रेमी पिता ने, और हमारे प्रिय प्रभु यीशु ने, और उस पवित्र आत्मा ने जो कबूतर की सी कोमलता से हमारे भीतर ठहरा हुआ है, इस काम को करने का बीड़ा उठाया है, और वे उसे कर रहे हैं, हमें आनन्द से भर दे। आओ, हम अपना आनन्द उस पवित्रता में न ढूँढ़ें जो हम अपने भीतर देखते हैं: आओ, हम मसीह में परमेश्वर की पवित्रता में, जो हमारी है, आनन्दित हों; आओ, हम इस्राएल के पवित्र के कारण आनन्दित हों। तब हमारा आनन्द अकथनीय और अनवरत होगा; तब हम उसी को महिमा देंगे।
पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।
परम धन्य परमेश्वर! मैं तुझ से विनती करता हूँ कि तू मुझ पर और अपनी सब सन्तानों पर यह भेद प्रगट कर कि तुझ में, जो इस्राएल का पवित्र है, कैसे आनन्दित हुआ जाता है।
तू देखता है कि तेरी अपनी प्रिय सन्तानों की सेवा का कितना बड़ा भाग अब भी दासत्व की आत्मा में होता है, और कितनों ने अब तक यह विश्वास ही नहीं किया कि पवित्र मार्ग ऐसा मार्ग है जिस पर वे जयजयकार करते हुए चल सकते हैं, और हर्ष और आनन्द पाएँगे। हे पिता! अपनी सन्तानों को सिखा कि वे तुझ में आनन्दित हों।
मैं तुझ से विशेष करके यह माँगता हूँ कि तू हमें सिखा कि मन की गहरी दीनता में, नम्रता और खेद और पूरे खालीपन में, इस बोध में कि हम में कोई पवित्रता नहीं, हम दिन भर तेरी पवित्रता का, जो हमारी है, और तेरी महिमा का, जो तू हम पर रखता है और जो फिर भी हर समय केवल तेरी ही है, गुणगान कर सकते हैं। हे पिता! अपनी सन्तानों के लिये राज्य के इस धन्य भेद को पूरी रीति से खोल दे, अर्थात् उस विश्वास को जो मसीह में सब कुछ और अपने आप में कुछ नहीं देखता; जो सचमुच उसमें सब कुछ पाता है और उस सब में आनन्दित होता है; जो अपने आप में कभी कुछ नहीं पाता और न अपने आप में किसी बात पर आनन्दित होता है।
धन्य परमेश्वर, तूने अपने वचन में कहा है, ‘नम्र लोग यहोवा के कारण फिर आनन्दित होंगे, और दरिद्र मनुष्य इस्राएल के पवित्र के कारण मगन होंगे।’ आह, अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें यह वरदान दे कि हम नम्रता और मन की दीनता में मसीह में ऐसे जीएँ कि उसकी पवित्रता हमारा नित बढ़ता हुआ आनन्द हो, और कि तुझ में, जो इस्राएल का पवित्र है, हम दिन भर आनन्दित रहें। और सब लोग हम में देखें कि परमेश्वर के पवित्र जन होकर जीना कैसी धन्यता है। आमीन।
1. परमेश्वर में आनन्द की सबसे बड़ी बाधा यह आशा है कि हमें अपने भीतर कोई ऐसी बात मिले जिस पर हम आनन्दित हों। पवित्रता की इस खोज के आरम्भ में हम सदा यह आशा करते हैं कि अपने भीतर कोई बड़ा परिवर्तन होता हुआ देखें। जैसे-जैसे हम इस बात की गहराई में ले जाए जाते हैं कि विश्वास और विश्वास का जीवन क्या है, हम समझते हैं कि यद्यपि हम वह परिवर्तन वैसा नहीं देखते जैसा हमने आशा की थी, तो भी जो कुछ यीशु है उसमें हम ऐसे आनन्द से आनन्दित हो सकते हैं जो वर्णन से बाहर है। यही पवित्रता का भेद है।
2. आनन्द को बढ़ाना पड़ता है। आनन्दित रहना एक ऐसी आज्ञा है जो जितना हम जानते हैं उससे कहीं अधिक बार दी गई है। जब हमारा मन आनन्दित होने का न हो, तब आनन्दित होना विश्वास की आज्ञाकारिता का एक भाग है। विश्वास आनन्दित होता और गाता है, क्योंकि परमेश्वर पवित्र है।
3. ‘आनन्द से और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण,’ ‘राज्य वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है।’ पवित्र आत्मा, यीशु का धन्य आत्मा, तेरे भीतर है, जीवन के जल का, आनन्द और हर्ष का एक सच्चा सोता। आह, उसे जानने का यत्न कर, जो तुझ में वास करता है कि जो कुछ यीशु के पास तेरे लिये है वह सब पूरा करे: वह तुझ में विश्वास का और आनन्द का आत्मा होगा।
4. प्रेम और आनन्द सदा साथ-साथ रहते हैं। प्रेम, जो भाइयों और खोए हुओं के लिये अपना इन्कार करता और अपने आप को भूल जाता है, और उन्हीं में जीता है, परमेश्वर का आनन्द पाता है। ‘परमेश्वर का राज्य वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है।’
बाईसवाँ दिन।
अध्याय 22 पूरा हुआ
पवित्रता और आनन्द