मसीह में पवित्र
पवित्रता और देह

अध्याय 24 · 14 मिनट का पठन

पवित्रता और देह

‘परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो। देह प्रभु के लिये है, और प्रभु देह के लिये है। क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है; इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो।’—1 कुरिन्थियों 3:16, 6:13, 19।

‘अविवाहिता प्रभु की चिन्ता में रहती है, कि वह देह और आत्मा दोनों में पवित्र हो।’—1 कुरिन्थियों 7:34।

‘अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ।’—रोमियों 12:1।

जगत में आते समय हमारे धन्य प्रभु ने कहा: ‘तूने मेरे लिये एक देह तैयार की; देख, मैं आ गया हूँ, ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूँ।’ फिर इस जगत से विदा होते समय, वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया। इस प्रकार उसने प्राण और आत्मा से कम नहीं, देह में भी परमेश्वर की इच्छा पूरी की। और इसी कारण कहा गया है, ‘उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’

थिस्सलुनीकियों और उनकी पवित्रता के लिये प्रार्थना करते हुए पौलुस कहता है, ‘शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; तुम्हारी आत्मा, प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।’ अपने विषय में उसने कहा था, ‘हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिये फिरते हैं; कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो। क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो।’ उसकी हार्दिक लालसा और आशा यही थी, ‘कि मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा हो, चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।’ देह और आत्मा का सम्बन्ध इतना घनिष्ठ है, आत्मा में पाप की शक्ति इतनी अधिक देह ही के द्वारा आती है, और देह इतने स्पष्ट रूप से मसीह के छुटकारे और पवित्र आत्मा के द्वारा नया किए जाने, दोनों का विषय है, कि यदि हम देह में पवित्रता के विषय में पवित्रशास्त्र की शिक्षा को सम्मिलित न करें, तो पवित्रता का हमारा अध्ययन गम्भीर रूप से अधूरा रह जाएगा।

यह ठीक ही कहा गया है कि देह, अपने भीतर निवास करनेवाले और कार्य करनेवाले प्राण और आत्मा के लिये, नगर की शहरपनाह के समान है। उसी में से होकर शत्रु भीतर घुसता है। युद्ध के समय सब कुछ शहरपनाह की रक्षा के आगे गौण हो जाता है। प्रायः इसी कारण कि विश्वासी शहरपनाह की रक्षा करते रहने का, अर्थात् देह को पवित्र बनाए रखने का, महत्त्व नहीं जानता, वह अपने प्राण और आत्मा को निर्दोष सुरक्षित रखने में असफल हो जाता है। अथवा पवित्रता में उसकी उन्नति इसलिए इतनी दुर्बल रहती है कि वह नहीं समझता कि देह की, उसके सब अंगों समेत, रखवाली और उसका पवित्र किया जाना भी ठीक उतना ही स्पष्ट रूप से विश्वास का काम होना चाहिए, और ठीक उतना ही सीधे यीशु की महान सामर्थ्य और आत्मा के भीतर वास के द्वारा होना चाहिए, जितना भीतरी जीवन का नया किया जाना। नगर का शासन तो हम यीशु को सौंप देते हैं, परन्तु शहरपनाह की रक्षा अपने ही हाथों में रखते हैं; तब राजा हमें वैसे सुरक्षित नहीं रखता जैसी हमने आशा की थी, और हम अपनी असफलता का भेद नहीं खोज पाते। वह शान्ति का परमेश्वर आप ही है, जो पूरी रीति से पवित्र करता है, और उसी को आत्मा, प्राण और देह को पूरे और निर्दोष सुरक्षित रखना है। अपनी लकड़ी समेत मिलापवाला तम्बू, और अपने पत्थरों समेत मन्दिर, उतने ही पवित्र थे जितना उनकी दीवारों के भीतर का सब कुछ: परमेश्वर के पवित्र लोगों के लिये भी आवश्यक है कि उनकी देह पवित्र हो।

इसका पूरा अर्थ समझने के लिये, आओ हम स्मरण करें कि पाप ने देह ही के द्वारा प्रवेश किया था। ‘स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा है,’ यह शरीर में परीक्षा थी; इसके द्वारा प्राण तक पहुँच हुई, ‘देखने में मनभाऊ;’ फिर प्राण के द्वारा वह आत्मा में जा पहुँची, ‘और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है।’ संसार में जो कुछ है उसके यूहन्ना के वर्णन में (1 यूहन्ना 2:15), हम वही तीन भाग पाते हैं, ‘शरीर की अभिलाषा, और आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड।’ और शैतान द्वारा यीशु की तीनों परीक्षाएँ ठीक इसी से मेल खाती हैं: पहले उसने देह के द्वारा उस तक पहुँचना चाहा, जब उसने सुझाया कि वह रोटी बनाकर अपनी भूख मिटाए; दूसरी परीक्षा (देखो लूका का चौथा अध्याय) प्राण से की गई, जब उसे इस जगत के राज्य और उनका वैभव दिखाया गया; तीसरी आत्मा से, जब उसे यह चुनौती दी गई कि अपने आपको नीचे गिराकर अपने ईश्वरीय पुत्रत्व का दावा करे और उसे प्रमाणित करे। परमेश्वर के पुत्र के पास भी पहली परीक्षा, आदम और संसार के सब लोगों के समान, शरीर की अभिलाषा के रूप में आई, अर्थात् भूख की स्वाभाविक और उचित इच्छा को तृप्त करने की लालसा के रूप में। हम इस बात पर जितना भी ध्यान दें, कम है कि मनुष्य का पहला पाप उस वस्तु को खाने के प्रश्न पर हुआ जो खाने में अच्छी दिखाई देती थी, और भूख मिटाने के लिये खाने का वही प्रश्न वह रणभूमि बना जिस पर छुड़ानेवाले की शैतान से पहली मुठभेड़ हुई। जो अच्छा और उचित है, उसी को खाने-पीने के प्रश्न पर इतने मसीही शैतान से मात खाते हैं जितनों को इसका पता तक नहीं। देह की हर एक भूख और इच्छा को पवित्र आत्मा के शासन और नियंत्रण में रखना कुछ लोगों को अनावश्यक लगता है, और दूसरों को बहुत कठिन। फिर भी यदि देह को परमेश्वर के मन्दिर के रूप में पवित्र होना है, और हमें अपनी देह और अपनी आत्मा के द्वारा उसकी महिमा करनी है, तो ऐसा होना ही चाहिए। पाप के पहले आक्रमण देह के द्वारा होते हैं: देह ही में पूरी विजय प्राप्त होगी।

देह और आत्मा के बीच सम्बन्ध की घनिष्ठता के विषय में जो कुछ पवित्रशास्त्र सिखाता है, शरीर-विज्ञान उसकी पुष्टि करता है। जो अपराध पहले-पहल केवल शारीरिक दिखाई देते हैं, वे प्राण पर दाग छोड़ जाते हैं और उसे गिरानेवाला प्रभाव डालते हैं, और उसके द्वारा आत्मा को भी नीचे घसीट ले जाते हैं। और दूसरी ओर, आत्मिक पाप, अर्थात् विचार, कल्पना और स्वभाव के पाप, प्राण से होकर देह में उतर आते हैं, स्नायु-तंत्र में जड़ पकड़ लेते हैं, और चेहरे पर तथा देह की आदतों या प्रवृत्तियों में भी प्रगट होते हैं। पाप का सामना केवल आत्मा ही के क्षेत्र में नहीं करना है: यदि हमें पवित्रता को सिद्ध करना है, तो हमें अपने आपको शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करना होगा। ‘यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे।’ यदि हमें सचमुच पाप से शुद्ध होकर परमेश्वर के लिये पवित्र बनना है, तो देह को, जो बाहरी मोर्चा है, बहुत विशेष रूप से शैतान और पाप की शक्ति से सुरक्षित करना होगा।

और यह कैसे हो? परमेश्वर ने इसके लिये बहुत विशेष प्रबन्ध किया है। पवित्रशास्त्र पवित्र आत्मा के विषय में, उस आत्मा के विषय में जो पवित्रता प्रदान करता है, देह के सम्बन्ध में बहुत स्पष्ट रूप से बात करता है। पहली दृष्टि में ऐसा लगता है मानो तुम्हारी देह शब्द केवल तुम्हारे व्यक्तित्व, अर्थात् तुम स्वयं, के अर्थ में प्रयोग हुआ हो। परन्तु जब देह में पाप की शक्ति की, और विशेषकर वहीं छुटकारे की आवश्यकता की, गहरी समझ हमारी दृष्टि को तीव्र करती है, तब हम देखते हैं कि देह के पवित्र आत्मा का मन्दिर होने का क्या अर्थ है। हम ध्यान देते हैं कि पौलुस विशेष रूप से देह के पापों ही को परमेश्वर के पवित्र मन्दिर को अशुद्ध करनेवाला बताता है; और वह चाहता है कि हम देह में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य ही के द्वारा परमेश्वर की महिमा करें। ‘क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है: इसलिए पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो।’ पवित्र आत्मा को देह की भूख-प्यास और उनकी तृप्ति पर केवल रोकने और नियमित करनेवाला प्रभाव ही नहीं डालना है, कि वे संयम और मर्यादा में रहें,—यह तो केवल नकारात्मक पक्ष है,—वरन् एक निश्चित आत्मिक तत्व भी होना चाहिए, जो स्वाभाविक क्रियाओं के प्रयोग को परमेश्वर की महिमा के लिये पवित्र आनन्द और स्वतंत्रता की सेवा बना दे; तब वे आज्ञाकारिता और संगति के जीवन के लिये सम्भावित बाधा न रहें, वरन् अनुग्रह का साधन, आत्मिक जीवन के लिये सच्ची सहायता बन जाएँ। ऐसा केवल उसी देह में होगा जो पवित्र जीवन से भरी हो, और जिस पर परमेश्वर के आत्मा का पूरा-पूरा अधिकार हो।


और यह कैसे प्राप्त हो सकता है? सच्चे मसीही जीवन में आत्म-त्याग आनन्द पाने का मार्ग है, छोड़ देना पा लेने का, और मृत्यु जीवन का। जब तक कोई भी ऐसी वस्तु है जिसके विषय में हम सोचते हैं कि यदि हम उसे संयम से ही बरतें तो हमें उसे ठीक रीति से प्रयोग करने या उसका आनन्द लेने की स्वतंत्रता और सामर्थ्य है, तब तक हमने न तो अपनी अपवित्रता को देखा या माना है, और न पवित्र आत्मा के द्वारा पूरी रीति से नया किए जाने की आवश्यकता को। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं, ‘परमेश्वर की सृजी हुई हर एक वस्तु अच्छी है, यदि वह धन्यवाद के साथ खाई जाए;’ हमें उसके साथ जुड़ी बात भी स्मरण रखनी चाहिए, ‘क्योंकि परमेश्वर के वचन और प्रार्थना के द्वारा शुद्ध हो जाती है।’ हर एक सृजी हुई वस्तु और उसके प्रयोग का यह शुद्ध और पवित्र किया जाना उतनी ही वास्तविक और गम्भीर बात है जितना स्वयं हमारा पवित्र किया जाना। और यह केवल वहीं होगा जहाँ, आवश्यकता पड़ने पर, हम उस दान को और उसे प्रयोग करने की स्वतंत्रता को बलिदान कर दें, जब तक कि परमेश्वर हमें उसे सचमुच केवल अपनी महिमा के लिये प्रयोग करने की सामर्थ्य न दे। परमेश्वर की ठहराई हुई सबसे पवित्र व्यवस्थाओं में से एक, अर्थात् विवाह, के विषय में पौलुस, जो विवाह करने से रोकनेवालों की इतनी कड़ी निन्दा करता है, स्पष्ट कहता है कि कुछ ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं जिनमें स्वेच्छा से अविवाहित रहना ‘देह और आत्मा दोनों में पवित्र’ होने का सबसे निश्चित और ग्रहणयोग्य मार्ग हो। जब परमेश्वर के समान पवित्र होना सचमुच जीवन की बड़ी अभिलाषा और लक्ष्य बन जाता है, तब हर वस्तु इसी आधार पर संजोई या छोड़ी जाएगी कि वह उस मुख्य उद्देश्य को आगे बढ़ाती है या नहीं। देह के जीवन में पवित्र आत्मा की वास्तविक और सक्रिय उपस्थिति ही वह आग होगी जो वेदी पर लगातार जलती रहती है।

और यह कैसे प्राप्त किया जाए? आत्मा के समान देह का भी रखवाला और पवित्र करनेवाला परमेश्वर ही है, अर्थात् मसीह में परमेश्वर। नगर की शहरपनाह की रखवाली उसी को सौंपी जानी चाहिए जो भीतर राज्य करता है। ‘मुझे निश्चय है, कि वह मेरी धरोहर की रखवाली कर सकता है,’ अर्थात् जो कुछ मैंने उसे सौंपा है उसे सुरक्षित रख सकता है, यह बात देह के विषय में, और उसकी हर एक ऐसी क्रिया के विषय में जिसके बारे में हम जानते हैं कि वह सन्देह या ठोकर का कारण बनती है, उतनी ही निश्चित रूप से सच होनी चाहिए जितनी वह उस प्राण के विषय में रही है जिसे हमने उद्धार के लिये उसे सौंपा था। बैंक में सावधि जमा वह धन है जो वहाँ सुरक्षित रखे जाने के लिये मेरे हाथों से दे दिया गया है: देह, या उसका कोई भी भाग जिसे पवित्र किए जाने की आवश्यकता है, यीशु के पास धरोहर होनी चाहिए। विश्वास को भरोसा रखना चाहिए कि वह उसे ग्रहण करता है और उसकी रखवाली करता है; प्रार्थना और स्तुति को प्रतिदिन नए सिरे से इस निश्चय को ताज़ा करना चाहिए, धरोहर के सौंपे जाने की पुष्टि करनी चाहिए, और यीशु के साथ संगति बनाए रखनी चाहिए। इस प्रकार उसमें और उसकी पवित्रता में बने रहकर, हम भरोसे और आनन्द के जीवन में यह सामर्थ्य पाएँगे कि देह में भी यह प्रमाणित कर सकें कि हम कितनी पूर्णता से और पूरी रीति से उसमें हैं जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये पवित्रता ठहरा, और परमेश्वर की पवित्रता उसके लोगों में कितनी वास्तविक और सच्ची है।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

धन्य प्रभु! तू जो मेरी पवित्रता है, मैं अब एक बहुत विशेष विनती लेकर तेरे पास आता हूँ। हे तू, जो आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया, और जिसके विषय में लिखा है, ‘हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं,’ कृपा करके मुझ पर प्रगट कर कि मेरी देह तेरे अद्भुत छुटकारे की सामर्थ्य का पूरा अनुभव कैसे कर सकती है। मैं सचमुच चाहता हूँ कि प्राण और देह दोनों में प्रभु के लिये पवित्र रहूँ।

प्रभु! मैंने बहुत कम समझा है कि मेरी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, कि उसमें कोई भी बात ऐसी नहीं जिसके प्रति उदासीन रहा जा सके, कि उसकी हर एक दशा और हर एक क्रिया प्रभु के लिये पवित्र ठहरे। और जहाँ मैंने देखा भी कि ऐसा होना चाहिए, वहाँ भी मैंने स्वयं ही नगर की इस शहरपनाह को शत्रु के आक्रमणों से बचाने का प्रयत्न किया। मैं भूल गया कि मेरे अस्तित्व का यह भाग भी केवल विश्वास ही के द्वारा सुरक्षित और पवित्र रखा जा सकता है, इस प्रकार कि जो कुछ विश्वास ने तुझे सौंपा, उसका भार तू अपने हाथ में लेकर उसकी रखवाली करे।

प्रभु यीशु! अब मैं इस देह को उसकी सब आवश्यकताओं समेत तेरे हाथों में सौंपने आता हूँ। थकान और घबराहट में, उत्तेजना और आनन्द में, भूख और घटी में, स्वास्थ्य और बहुतायत में, हे मेरे पवित्र उद्धारकर्ता, मेरी देह हर क्षण तेरी रखवाली में रहे। तू हमें बुलाता है कि हम, ‘पाप से छुड़ाए जाकर, अपने अंगों को पवित्रता के लिये धार्मिकता के दास करके सौंप दें।’ हे उद्धारकर्ता! पाप से उस स्वतंत्रता के विश्वास में जो मुझे तुझ में मिली है, मैं अपनी देह का हर एक अंग तुझे सौंपता हूँ: मैं विश्वास करता हूँ कि तुझ में जो जीवन का आत्मा है, वह मुझे मेरे अंगों में की पाप की व्यवस्था से स्वतंत्र करता है। चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ, मेरी देह के द्वारा तेरी बड़ाई हो। आमीन।

1. मिलापवाले तम्बू और मन्दिर में भौतिक भाग को भीतर वास करनेवाली पवित्रता के अनुरूप, और उसका साकार रूप, होना था। इसलिए सब कुछ उस नमूने के अनुसार बनाया गया जो पहाड़ पर दिखाया गया था। निर्गमन के अन्तिम दो अध्यायों में हम अठारह बार पढ़ते हैं, ‘जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी।’ बाहरी रूप में भी सब कुछ परमेश्वर की इच्छा का साकार रूप था। ठीक उसी प्रकार हमारी देह को भी, परमेश्वर का मन्दिर होने के नाते, हर बात में परमेश्वर के वचन के अनुसार नियमित, और पवित्र आत्मा के द्वारा जिलाया और पवित्र किया जाना चाहिए।


2. देह में इस पवित्रता के एक भाग के रूप में पवित्रशास्त्र पहनावे का उल्लेख करता है। ‘दिखावटी श्रृंगार, अर्थात् बाल गूँथने, और सोने के गहने, या भाँति-भाँति के कपड़े पहनना,’ इसे ‘नम्रता और मन की दीनता की अविनाशी सजावट,’ के विपरीत बताते हुए पतरस कहता है, ‘पूर्वकाल में पवित्र स्त्रियाँ भी, जो परमेश्वर पर आशा रखती थीं, अपने आपको इसी रीति से संवारती थीं।’ उनके पहनावे में पवित्रता दिखाई देती थी; उनकी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर थी।

3. ‘यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे।’ उसकी जिलानेवाली शक्ति सम्पूर्ण पर राज्य करे। हम आत्मिक बात को आदर्श और अदृश्य से जोड़ने के इतने आदी हैं कि यह समझने में समय, विचार और विश्वास लगेगा कि भौतिक और इन्द्रियगोचर बातें हमारे आत्मिक जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं, और उन्हें परमेश्वर के आत्मा के अधिकार और प्रेरणा के अधीन होना चाहिए। पौलुस भी कहता है, ‘मैं अपनी देह को मारता कूटता, और वश में लाता हूँ; ऐसा न हो कि मैं आप ही किसी रीति से निकम्मा ठहरूँ।’

4. यदि परमेश्वर ने सचमुच भूमि की मिट्टी से रचे गए आदम की देह में अपना आत्मा फूँका, तो यह विचित्र न समझा जाए कि पवित्र आत्मा अब हमारी देहों को भी अपनी पवित्र करनेवाली शक्ति से जीवित करे।

5. ‘देहधारी होना ही परमेश्वर के मार्गों का अन्तिम लक्ष्य है।’ एक पुराने धर्मविज्ञानी का यह गहरा कथन हमें एक बहुत उपेक्षित सत्य का स्मरण दिलाता है। परमेश्वर के आत्मा का महान कार्य यह है कि वह अपने आपको भौतिक पदार्थ से जोड़े, और उसे परमेश्वर के निवास के लिये एक आत्मिक देह के रूप में गढ़े। यदि पवित्र आत्मा को हमारी देह पर पूरा अधिकार मिले, तो वह उसमें यह करेगा।

6. पवित्र आत्मा की देह में सामर्थ्य के इसी सत्य पर वह बात आधारित है जिसे विश्वास द्वारा चंगाई कहा जाता है। सब युगों में, विशेष आत्मिक जागृति के समयों में, परमेश्वर ने कुछ लोगों को यह देखने का अनुग्रह दिया है कि मसीह यहाँ भी देह को आत्मा के जीवन और सामर्थ्य का भागी कैसे बनाएगा। जो इसे देखते हैं, उनके लिये पवित्रता और चंगाई के बीच का सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ और धन्य है, क्योंकि प्रभु यीशु देह को अपने लिये अपने अधिकार में ले लेता है।


चौबीसवाँ दिन।

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