मसीह में पवित्र
पवित्रता और स्वतंत्रता

अध्याय 21 · 13 मिनट का पठन

पवित्रता और स्वतंत्रता

‘पाप से छुड़ाए जाकर धार्मिकता के दास हो गए: अब अपने अंगों को पवित्रता के लिये धार्मिकता के दास करके सौंप दो। परन्तु अब पाप से स्वतंत्र होकर और परमेश्वर के दास बनकर तुम को फल मिला जिससे पवित्रता प्राप्त होती है, और उसका अन्त अनन्त जीवन है।’—रोमियों 6:18, 19, 22

‘वह स्वतंत्रता जो मसीह यीशु में हमें मिली है।’—गलातियों 2:4

‘मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; इसलिए इसमें स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो।’—गलातियों 5:1

स्वतंत्रता से बढ़कर बहुमूल्य या अनमोल कोई सम्पत्ति नहीं है। उससे बढ़कर प्रेरणा देनेवाली और ऊपर उठानेवाली कोई वस्तु नहीं; और दूसरी ओर, दासत्व से बढ़कर मन को तोड़नेवाली और नीचे गिरानेवाली कोई वस्तु नहीं। वह मनुष्य से वह छीन लेता है जिससे उसका मनुष्यत्व बनता है—अपने आप निर्णय लेने की, अपने आप कार्य करने की, और जो वह बनना और करना चाहे, वही बनने और करने की सामर्थ्य।

पाप दासत्व है; एक पराई शक्ति का बन्धन, जिसने हम पर प्रभुता पा ली है, और जो प्रायः हमसे अत्यन्त अनिच्छा से की गई सेवा करवाती है। मसीह का छुटकारा हमारी स्वतंत्रता लौटा देता है और हमें पाप की शक्ति से स्वतंत्र कर देता है। यदि हमें सचमुच छुड़ाए हुए लोगों के समान जीना है, तो हमें केवल उस काम की ओर ही नहीं देखना है जो मसीह ने हमारा छुटकारा पूरा करने के लिये किया, वरन् यह भी पूरी रीति से ग्रहण करना और अनुभव करना है कि वह स्वतंत्रता, जिसके लिये उसने हमें स्वतंत्र किया है, कितनी पूर्ण, कितनी निश्चित, कितनी सम्पूर्ण है। केवल जब हम ‘उस स्वतंत्रता में जो मसीह यीशु में हमें मिली है, स्थिर रहें,’ तभी हमें वह फल मिल सकता है जिससे पवित्रता प्राप्त होती है।

यह ध्यान देने योग्य है कि रोमियों की पत्री के महान तर्क में पवित्र शब्द कितना कम आता है, और अध्याय 6 में जहाँ वह दो बार ‘पवित्रता के लिये,’ इस वाक्यांश में आता है, वहाँ उसे स्पष्ट रूप से उस लक्ष्य और फल के रूप में रखा गया है जो धार्मिकता के जीवन के द्वारा प्राप्त होना है। दो बार दोहराए गए ‘पवित्रता के लिये,’ से पहले, जो प्राप्त होनेवाले परिणाम की ओर संकेत करता है, दो बार यह दोहराया गया है: ‘पाप से छुड़ाए जाकर धार्मिकता के दास हो गए।’ यह हमें सिखाता है कि पाप की शक्ति से स्वतंत्रता और धार्मिकता की सेवा के प्रति समर्पण अपने आप में अभी पवित्रता नहीं हैं, परन्तु वह निश्चित और एकमात्र मार्ग हैं जिससे पवित्रता तक पहुँचा जा सकता है। मसीह में पाप से हमारी स्वतंत्रता की सच्ची समझ और उसमें पूरा प्रवेश पवित्रता के जीवन के लिये अनिवार्य है। जब इस्राएल फ़िरौन से छुड़ाया गया, तभी परमेश्वर ने अपने आप को उस पवित्र के रूप में प्रकट करना आरम्भ किया: जब हम अपने आप को ‘पाप से छुड़ाए गए,’ अपने सब शत्रुओं के हाथ से छूटे हुए जानते हैं, तभी हम पवित्रता और धार्मिकता से जीवन भर परमेश्वर की सेवा करते रहेंगे।

‘पाप से छुड़ाए जाकर:’ इस वचन को ठीक-ठीक समझने के लिये हमें एक दोहरी भूल से सावधान रहना होगा। हमें न तो इसे उससे कम करके सीमित करना है, और न इसमें उससे अधिक भरना है, जितना पवित्र आत्मा का यहाँ इससे अर्थ है। पौलुस न तो किसी आरोपण की बात कर रहा है, न किसी अनुभव की। हमें इसे पाप के शाप या दण्ड से छुड़ाए जाने तक ही सीमित नहीं करना चाहिए। सन्दर्भ दिखाता है कि वह हमारी न्यायिक स्थिति की नहीं, वरन् एक आत्मिक वास्तविकता की बात कर रहा है—अर्थात् यह कि हम मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में उसके साथ जीवित एकता में हैं, और इस प्रकार पाप की प्रभुता या शक्ति के नीचे से पूरी रीति से निकाल लिये गए हैं। ‘तुम पर पाप की प्रभुता न होगी।’ न ही वह अभी किसी अनुभव की बात कर रहा है, कि हम यह अनुभव करते हैं कि हम सब पाप से स्वतंत्र हैं। वह उस महान वस्तुगत तथ्य की बात करता है कि मसीह ने हमें उस शक्ति से, जिसके बल पर पाप हमसे अपनी इच्छा और अपने काम करवा सकता था, सदा के लिये छुड़ा दिया है; और वह हमसे आग्रह करता है कि इस महिमामय तथ्य के विश्वास में हम साहस के साथ पाप की आज्ञा या परीक्षा को सुनने से इन्कार करें। मसीह में जो स्वतंत्रता हमें मिली है, अर्थात् पाप की प्रभुता और शक्ति से हमारी स्वतंत्रता, उसे जानना ही उसे अनुभव में पाने का मार्ग है।

पुराने समय में, जब तुर्क या मूर लोग प्रायः मसीहियों को दास बना लेते थे, तो बन्धन में पड़े लोगों के छुटकारे के लिये बहुधा बड़ी-बड़ी रकमें चुकाई जाती थीं। परन्तु एक से अधिक बार ऐसा हुआ कि दासों के देश के भीतरी भाग में, दूर कहीं, छुड़ाए गए लोगों तक यह समाचार कभी पहुँचा ही नहीं; स्वामी तो बड़े प्रसन्न थे कि यह बात उनसे छिपाए रखें। कुछ और लोगों को समाचार मिल तो गया, परन्तु वे अपने बन्धन के इतने आदी हो चुके थे कि समुद्र-तट तक पहुँचने का परिश्रम करने के लिये अपने आप को उभार न सके। आलस्य या निराशा ने उन्हें दासत्व में रखा; वे विश्वास न कर सके कि वे कभी कुशल से स्वतंत्रता के देश तक पहुँच पाएँगे। छुड़ौती चुका दी गई थी; सचमुच वे स्वतंत्र थे; फिर भी अपने अनुभव में, अज्ञानता या साहस की कमी के कारण, वे अब भी बन्धन में थे। मसीह के छुटकारे ने पाप का, और उस वैधानिक शक्ति का जो उसे हम पर थी, ऐसा पूरा अन्त कर दिया है,—क्योंकि ‘पाप का बल व्यवस्था है,’—कि सचमुच, गहरी से गहरी वास्तविकता में, पाप में हमसे आज्ञा मनवाने की कोई शक्ति नहीं है। केवल जब हम उसे फिर से राज्य करने देते हैं, जब हम फिर से अपने आप को उसके दास करके सौंप देते हैं, तभी वह प्रभुता चला सकता है। शैतान अपनी पूरी शक्ति लगाता है कि विश्वासी उसके दासत्व से अपनी इस स्वतंत्रता की पूर्णता से अनजान रहें। और क्योंकि विश्वासी छुटकारे के अर्थ के विषय में अपने ही विचारों से इतने सन्तुष्ट हैं, और उसे उसके छुटकारे और आशीष की परिपूर्णता में देखने और पाने के लिये इतनी कम लालसा और विनती करते हैं, इसलिए इस बात का अनुभव कि पाप से स्वतंत्रता कहाँ तक पाई जा सकती है, इतना दुर्बल है। ‘जहाँ कहीं प्रभु का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।’ पवित्र आत्मा के द्वारा ही—भीतर उसके प्रकाश और उसकी अगुवाई के द्वारा, जिसकी दीनता से बाट जोही जाए और जिसके आगे झुका जाए—यह स्वतंत्रता हमारी सम्पत्ति बनती है।

छठे अध्याय में पौलुस पाप से स्वतंत्रता की बात करता है, अध्याय 7 (पद 3, 4, 6) में व्यवस्था से स्वतंत्रता की, और यह कि दोनों मसीह में और उसके साथ एकता में हमारी हैं। अध्याय 8 (पद 2) में वह इस स्वतंत्रता की बात ऐसे करता है जो अनुभव में हमारी हो गई है। वह कहता है, ‘जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।’ जो स्वतंत्रता मसीह में हमारी है, उसे पवित्र आत्मा के द्वारा व्यक्तिगत रूप से अपनाकर और उसका आनन्द लेकर हमारी बनना है। दूसरी बात पहली पर निर्भर है: विश्वास जितना परिपूर्ण, समझ जितनी स्पष्ट, और मसीह यीशु पर और उस स्वतंत्रता पर, जिसके लिये उसने हमें स्वतंत्र किया है, घमण्ड जितना विजयी होगा, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता में प्रवेश उतना ही शीघ्र और उतना ही परिपूर्ण होगा। जैसे स्वतंत्रता केवल मसीह में है, वैसे ही केवल मसीह का आत्मा उसे व्यावहारिक रूप से हमारे अधिकार में देता है, और हमें उसमें बसाए रखता है: ‘जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।’ ‘जहाँ कहीं प्रभु का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।’ जब आत्मा यीशु को हम पर प्रभु और स्वामी के रूप में प्रकट करता है—उस नये स्वामी के रूप में, जिसे ही हम पर कुछ कहने का अधिकार है—और हमें अपने आप को सौंपने, अपने अंगों को सौंपने, अपना सारा जीवन मसीह में परमेश्वर की सेवा के लिये समर्पित करने की ओर ले चलता है, तब पाप से स्वतंत्रता में हमारा विश्वास एक सचेत बोध और एक अनुभव की हुई वास्तविकता बन जाता है। छुटकारे की पूर्णता पर विश्वास करते हुए बन्दी ‘प्रभु का स्वतंत्र किया हुआ’ होकर निकल पड़ता है। अब वह जानता है कि पाप में एक क्षण के लिये भी आज्ञा मनवाने की शक्ति नहीं रही। वह अपना पुराना अधिकार जताने का यत्न कर सकता है; वह अधिकार के स्वर में बोल सकता है; वह हमें डराकर भय और अधीनता में डाल सकता है; परन्तु हम पर उसकी कोई शक्ति नहीं, सिवाय इसके कि हम अपनी स्वतंत्रता को भूलकर उसकी परीक्षा के आगे झुक जाएँ, और स्वयं उसे शक्ति दे दें।

हम प्रभु के स्वतंत्र किए हुए हैं। ‘मसीह यीशु में हमें स्वतंत्रता मिली है।’ रोमियों के सातवें अध्याय में पौलुस उस प्राण के भयानक संघर्षों का वर्णन करता है जो अब भी व्यवस्था को पूरा करने का यत्न करता है, परन्तु अपने आप को पूरी रीति से असहाय पाता है; पाप के हाथ बिका हुआ, बन्दी और दास, उस काम को करने की स्वतंत्रता से रहित जिसकी सारा हृदय लालसा करता है। परन्तु जब आत्मा व्यवस्था का स्थान ले लेता है, तब यह विलाप, ‘मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!’ विजय के गीत में बदल जाता है: ‘यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो, जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मुझे स्वतंत्र कर दिया।’

परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिये बल की कमी की, विफल प्रयत्नों और टूटी आशाओं की, निरन्तर असफलता की कितनी अनगिनत शिकायतें हज़ारों भिन्न-भिन्न रूपों में उस बन्दी की शिकायत को दोहराती हैं, ‘मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!’ परमेश्वर का धन्यवाद हो! छुटकारा है। ‘मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है! इसलिए इसमें स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो।’ शैतान सदा यही यत्न करता है कि हम पर फिर से पाप का या व्यवस्था का जूआ रख दे, और दासत्व की आत्मा को फिर से उत्पन्न करे, मानो पाप या व्यवस्था की अपनी माँगों के साथ किसी न किसी रीति से हम पर शक्ति हो। ऐसा नहीं है: फिर से न जुतो; उस स्वतंत्रता में स्थिर रहो जिसके लिये मसीह ने तुम्हें स्वतंत्र किया है। आओ, हम इस सन्देश को सुनें: ‘पाप से छुड़ाए जाकर धार्मिकता के दास हो गए; अब अपने अंगों को पवित्रता के लिये धार्मिकता के दास करके सौंप दो।’ ‘पाप से स्वतंत्र होकर और परमेश्वर के दास बनकर तुम को फल मिला जिससे पवित्रता प्राप्त होती है।’ पवित्र होने के लिये तुम्हें स्वतंत्र होना होगा, पूरी रीति से स्वतंत्र; इसलिए स्वतंत्र कि यीशु तुम पर राज्य करे, तुम्हारी अगुवाई करे; इसलिए स्वतंत्र कि पवित्र आत्मा तुम्हें जैसे चाहे वैसे काम में लाए, तुम में श्वास फूँके, अपना गुप्त, कोमल, परन्तु सामर्थी काम करे, ताकि तुम उस सारी स्वतंत्रता तक बढ़ते जाओ जो यीशु ने तुम्हारे लिये जीत ली है। मन्दिर परमेश्वर के भीतर वास के द्वारा पवित्र नहीं किया जा सकता था, जब तक वह हर दूसरे स्वामी और हर दूसरे उपयोग से मुक्त न हो, कि केवल उसी का और उसी की सेवा के लिये रहे। हमारे हृदय का भीतरी मन्दिर भी सचमुच और पूरी रीति से पवित्र नहीं किया जा सकता, जब तक हम हर दूसरे स्वामी और शक्ति से, दासत्व, भय या सन्देह के हर जूए से स्वतंत्र न हों, कि उसका आत्मा हमें उस सिद्ध स्वतंत्रता में ले चले जिसका फल सच्ची पवित्रता है।

पाप से छुड़ाए जाकर, धार्मिकता के दास बनकर, तुम को फल मिला जिससे पवित्रता प्राप्त होती है, और उसका अन्त अनन्त जीवन है। स्वतंत्रता, धार्मिकता, पवित्रता—ये आनेवाली महिमा के मार्ग की सीढ़ियाँ हैं। जितनी गहराई से हम विश्वास के द्वारा अपनी उस स्वतंत्रता में प्रवेश करते हैं जो मसीह में हमें मिली है, उतने ही अधिक आनन्द और भरोसे के साथ हम अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपते हैं। परमेश्वर वह पिता है जिसकी इच्छा पूरी करने में हम आनन्दित होते हैं, जिसकी सेवा पूर्ण स्वतंत्रता है। छुड़ानेवाला वह स्वामी है जिससे प्रेम हमें स्वेच्छा की आज्ञाकारिता में बाँधे रखता है। यह स्वतंत्रता स्वेच्छाचार नहीं है: ‘हम अपने शत्रुओं के हाथ से छूटकर, उसके सामने पवित्रता और धार्मिकता से जीवन भर निडर रहकर उसकी सेवा करते रहें।’

स्वतंत्रता धार्मिकता की शर्त है; और धार्मिकता पवित्रता की। परमेश्वर की इच्छा पूरी करना हमें उस संगति में, स्वयं परमेश्वर के साथ मन की उस सहानुभूति में ले जाता है, जिसमें से ईश्वरीय उपस्थिति का वह प्रतिबिम्ब निकलता है जो पवित्रता है। पाप से छुड़ाए जाकर, धार्मिकता के और परमेश्वर के दास बनाए जाकर, हमें वह फल मिलता है जिससे पवित्रता प्राप्त होती है, और उसका अन्त—पवित्रता का फल पक जाने पर जिसका बीज बन जाता है, वह—अनन्त जीवन है।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।


हे परम महिमामय परमेश्वर! मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरी आँखें इस अद्भुत स्वतंत्रता के लिये खोल दे जिसके लिये मसीह ने मुझे स्वतंत्र किया है। मैं तेरे इस वचन में पूरी रीति से प्रवेश करूँ, कि मुझ पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि मैं व्यवस्था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हूँ। मैं उस स्वतंत्रता को जानूँ जो मसीह यीशु में मुझे मिली है, और उसमें स्थिर रहूँ।

हे पिता! तेरी सेवा पूर्ण स्वतंत्रता है: यह भी मुझ पर प्रकट कर। तू असीम रूप से स्वतंत्र है, और तेरी इच्छा उन सीमाओं के सिवाय कोई सीमा नहीं जानती जो उसकी अपनी सिद्धता ने ठहराई हैं। और तू हमें अपनी इच्छा में बुलाता है, ताकि हम भी वैसे ही स्वतंत्र हों जैसा तू है। हे मेरे परमेश्वर! मुझे अपनी इच्छा की शोभा दिखा, जब वह मुझे स्वयं से और पाप से स्वतंत्र करती है, और वही मेरी एकमात्र धन्यता हो। धार्मिकता की सेवा इस प्रकार मेरे लिये आनन्द और बल हो, कि उसका फल पवित्रीकरण हो, और वह मुझे तेरी पवित्रता में ले चले।

हे धन्य प्रभु यीशु! मेरे छुड़ानेवाले और मेरी स्वतंत्रता, मैं तेरा हूँ। मैं अपने आप को तेरी इच्छा के लिये सौंपता हूँ, कि तेरी इच्छा को छोड़ और कोई इच्छा न जानूँ। हे स्वामी! मैं केवल तेरी, और केवल तेरी ही सेवा करूँगा। मेरी स्वतंत्रता तुझ में है! तू मेरा रक्षक हो। तुझसे अलग मैं एक क्षण भी स्थिर नहीं रह सकता। तुझ में मैं स्थिर रह सकता हूँ: तुझ पर मैं भरोसा रखता हूँ।

हे परमपवित्र परमेश्वर! तेरी स्वतंत्र, आज्ञाकारी, प्रेम करनेवाली सन्तान के रूप में तू मुझे पवित्र करेगा। आमीन।

1. स्वतंत्रता वह सामर्थ्य है जिससे हम बिना रुकावट अपने स्वभाव की प्रेरणा को पूरा कर सकें। मसीह में परमेश्वर की सन्तान हर उस शक्ति से स्वतंत्र है जो उसे अपने नये स्वभाव की व्यवस्था के अनुसार चलने से रोक सकती थी।

2. यह स्वतंत्रता विश्वास से है (गलातियों 5:5, 6)। मसीह पर विश्वास के द्वारा मैं उसमें प्रवेश करता हूँ, और उसमें स्थिर रहता हूँ।

3. यह स्वतंत्रता पवित्र आत्मा से है। ‘जहाँ कहीं प्रभु का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।’ ‘यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो तो व्यवस्था के अधीन न रहे।’ आत्मा से भरा हुआ हृदय सचमुच स्वतंत्र किया जाता है। परन्तु हम इसलिए स्वतंत्र नहीं किए गए कि अपनी ही इच्छा पूरी करें। नहीं, वरन् पवित्र आत्मा की अगुवाई के पीछे चलने के लिये स्वतंत्र किए गए हैं। ‘जहाँ कहीं आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।’

4. यह स्वतंत्रता प्रेम में है। ‘तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो; परन्तु ऐसा न हो, कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन् प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।’ जिस स्वतंत्रता से पुत्र स्वतंत्र करता है, वह उसके समान बनने की, प्रेम करने और सेवा करने की स्वतंत्रता है। ‘सबसे स्वतंत्र होने पर भी मैंने अपने आपको सब का दास बना दिया है; कि अधिक लोगों को खींच लाऊँ।’ यही प्रेम की स्वतंत्रता है।

5. ‘पाप से छुड़ाए जाकर पवित्रता के लिये धार्मिकता के दास हो गए।’ ‘मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे जिससे वे मेरी उपासना करें।’ केवल वही मनुष्य जो धार्मिकता का काम करता है, पवित्र बन सकता है।

6. यह स्वतंत्रता आनन्द और गीत गाने की वस्तु है।

7. यह स्वतंत्रता पवित्रता की नींव है। स्वतंत्र करनेवाला छुड़ानेवाला स्वयं परमेश्वर, वह पवित्र है। पवित्र आत्मा के रूप में वह इसके पूरे अधिकार में ले चलता है। हर वस्तु से ऐसा स्वतंत्र होना कि परमेश्वर हम पर पूरा अधिकार कर सके—यही पवित्र होना है।


इक्कीसवाँ दिन।

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