अध्याय 15 · 12 मिनट का पठन
परमेश्वर का पवित्र जन
‘इसलिए वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।’—लूका 1:35।
‘हमने विश्वास किया, और जान गए हैं, कि परमेश्वर का पवित्र जन तू ही है।’—यूहन्ना 6:69।
‘यहोवा के पवित्र जन’—पुराने नियम में यह शब्द केवल एक बार (भजन संहिता 106:16) मिलता है। यह हारून के विषय में कहा गया है, जिसमें पवित्रता, जहाँ तक वह उस समय प्रगट की जा सकती थी, अपने सबसे पूर्ण साकार रूप तक पहुँची थी। यह उपाधि उसमें अपनी पूर्ति की बाट जोहती रही जो अकेला, अपने ही व्यक्तित्व में, पृथ्वी पर परमेश्वर की पवित्रता को सिद्ध रीति से प्रगट कर सकता था—यीशु, पिता का पुत्र। उसमें हम पवित्रता को ईश्वरीय रूप में, मानवीय रूप में, और अपनी निज पवित्रता के रूप में देखते हैं।
1. उसमें हम देखते हैं कि ईश्वरीय स्वभाव की वह अतुलनीय उत्तमता किस बात में है। ‘तूने धार्मिकता से प्रेम और अधर्म से बैर रखा; इस कारण परमेश्वर, तेरे परमेश्वर, ने तेरे साथियों से बढ़कर हर्षरूपी तेल से तेरा अभिषेक किया।’ पाप से परमेश्वर की असीम घृणा, और जो उचित है उसे उसका बनाए रखना, उसके स्वभाव की अनिवार्यता होने के कारण, नैतिक रूप से कम मूल्य के प्रतीत हो सकते हैं। पुत्र में हम ईश्वरीय पवित्रता को परखी जाती हुई देखते हैं। वह परखा जाता और परीक्षा में डाला जाता है। वह परीक्षा की दशा में दुःख उठाता है। वह प्रमाणित करता है कि पवित्रता का सचमुच नैतिक मूल्य है: वह पाप के लिये सहमत होने के बजाय कोई भी बलिदान करने को, हाँ, प्राण देने और मिट जाने को भी तैयार है। पाप की परीक्षा के आगे झुकने के बजाय अपने आपको मरने के लिये देकर; अपने आपको मरने के लिये देकर, ताकि पिता के धर्मी न्याय का आदर हो; यीशु ने प्रमाणित किया कि धार्मिकता ईश्वरीय पवित्रता का एक तत्व कैसे है, और वह पवित्र धार्मिकता में कैसे पवित्र ठहरता है।
परन्तु यह पवित्रता का केवल एक पहलू है। जो आग भस्म करती है वही शुद्ध भी करती है: जो कुछ उसमें घुल-मिल जाने के योग्य है, उसे वह अपने सुन्दर ज्योतिर्मय स्वभाव का सहभागी बना देती है। इसी प्रकार ईश्वरीय पवित्रता न केवल अपनी शुद्धता को बनाए रखती है; वह उसे बाँटती भी है। इसी में यीशु सचमुच परमेश्वर का पवित्र जन दिखाई दिया, कि उसने कभी नहीं कहा, ‘हट जा, क्योंकि मैं तुझ से पवित्र हूँ।’ उसकी पवित्रता ने अपने आपको ठीक उसी का देहधारण प्रमाणित किया जिसने कहा था, ‘जो महान और उत्तम, और जिसका नाम पवित्र है, वह यह कहता है, मैं ऊँचे पर और पवित्रस्थान में निवास करता हूँ, और उसके संग भी रहता हूँ, जो खेदित हैं।’ उसमें वह आकर्षण दिखाई दिया जो पवित्रता में उन सब के लिये है जो खोए हुए, असहाय और पापी हैं। उसने प्रमाणित किया कि पवित्रता केवल वह शक्ति नहीं जो पवित्र क्रोध में अपने आपको सब अशुद्ध वस्तुओं से अलग करती है, वरन् वह भी है जो पवित्र प्रेम में उसे भी, जो सबसे अधिक पापी है, अपने लिये अलग कर लेती है, कि उसे बचाए और आशीष दे। उसमें हम देखते हैं कि ईश्वरीय पवित्रता असीम धार्मिकता और असीम प्रेम का मेल कैसे है।
2. मसीह के चरित्र का ईश्वरीय पहलू यही है, जब वह मानवीय रूप में दिखाता है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है। परन्तु एक और पहलू भी है, जो हमारे लिये कम रोचक और महत्त्वपूर्ण नहीं। हम केवल यही नहीं जानना चाहते कि परमेश्वर कैसे पवित्र है, वरन् यह भी कि मनुष्य को कैसे चलना चाहिए कि वह वैसा ही पवित्र हो जैसा परमेश्वर पवित्र है। यीशु हमें यह सिखाने आया कि मनुष्य होते हुए भी अपने भीतर परमेश्वर के जीवन का वास रखना सम्भव है। हम साधारणतः सोचते हैं कि परमेश्वरत्व की महिमा और असीम सिद्धता ही वह उचित पृष्ठभूमि है जिसमें पवित्रता की सुन्दरता दिखाई देनी चाहिए: यीशु ने प्रमाणित किया कि मानव स्वभाव उसे प्रगट करने के लिये पूरी तरह उपयुक्त और योग्य है जो परमेश्वरत्व की मूल महिमा है। उसने हमें दिखाया कि परमेश्वर की इच्छा को चुनने और पूरा करने में, और उसे अपनी इच्छा बना लेने में, मनुष्य सचमुच वैसा ही पवित्र हो सकता है जैसा परमेश्वर पवित्र है।
देहधारण के इस पहलू का मूल्य इस बात पर निर्भर है कि हम अपने प्रभु की सच्ची मानवता को गहराई से समझें। ईश्वरीय पवित्रता की धधकती भट्ठी में जो भयानक, अलग करनेवाली और शुद्ध करनेवाली प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है—सदा भस्म करती और सदा अपने में मिलाती हुई—उसे हम उसमें एक सचमुच मानवीय इच्छा के संघर्षों में देखने की आशा रखते हैं। पवित्रता को सचमुच मानवीय होने के लिये केवल एक दान ही नहीं, वरन् एक उपलब्धि भी होना चाहिए। परमेश्वर की ओर से आने के कारण, उसे ग्रहण किया जाना और व्यक्तिगत रूप से अपनाया जाना चाहिए, और यह उस सब के स्वेच्छा से किए गए समर्पण में होता है जो उसके अनुसार नहीं। यीशु में, जब उसने स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा को त्याग दिया, और पिता की इच्छा को पूरा किया और सहा, हमें यह प्रकाशन मिलता है कि मानवीय पवित्रता क्या है, और मनुष्य इच्छा की एकता के द्वारा कितनी सच्चाई से वैसा ही पवित्र हो सकता है जैसा परमेश्वर पवित्र है।
3. परन्तु इससे क्या लाभ कि हमने यीशु में देख लिया कि एक मनुष्य पवित्र हो सकता है? यदि वह हमें मार्ग न दिखाए, और हमें अपने समान बनने की सामर्थ्य न दे, तो उसका आदर्श सचमुच एक उपहास ही होता। हमें यह पहुँचाना ही सचमुच देहधारण का सर्वोच्च उद्देश्य था। मसीह के ईश्वरीय स्वभाव ने केवल इतना नहीं किया कि उसकी मानवता को अपनी पवित्रता का सहभागी बना दे और उसे फिर भी एक अकेला मनुष्य मात्र रहने दे। उसके ईश्वरत्व ने उस मानवीय पवित्रता को जिसे उसने पूरा किया, और उस पवित्र मानव स्वभाव को जिसे उसने सिद्ध किया, असीम मूल्य और दूसरों तक पहुँचाए जाने की सामर्थ्य दी। उसके साथ एक नया जीवन, अनन्त जीवन, मानवजाति के तने में साटा गया। उन सब के लिये जो उस पर विश्वास करते हैं, उसने अपने आपको पवित्र किया, ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ। क्योंकि उसकी मृत्यु पिता की इच्छा के प्रति उसकी आज्ञाकारिता की महान विजय थी, इसलिए उसने पाप के प्रभुत्व को सदा के लिये तोड़ दिया, हमारे दोष का प्रायश्चित किया, और पिता से अपने लिये यह सामर्थ्य प्राप्त की कि वह अपने लोगों को अपने ही जीवन और पवित्रता का सहभागी बनाए। उसके पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण में उस नये जीवन की सामर्थ्य, और सब पर प्रभुता करने का उसका अधिकार, प्रगट हुए; और अब वह पूरी सच्चाई से परमेश्वर का पवित्र जन है, जो सिर होकर अपने आप में उस पवित्रता की सामर्थ्य रखता है—जो एक साथ ईश्वरीय और मानवीय है—कि उसे अपनी देह के हर एक अंग तक पहुँचाए।
परमेश्वर का पवित्र जन! अर्थ की ऐसी भरपूरी में जो ज्ञान से परे है, आत्मा और सच्चाई से, यीशु अब यह उपाधि धारण करता है। अब वह वही एकमात्र पवित्र जन है जिसे परमेश्वर देखता है—पवित्रता के ऐसे असीम विस्तार और सामर्थ्य का, कि वह अपने हर एक भाई के लिये पवित्रता बन सकता है। और जैसे वह परमेश्वर के लिये वह पवित्र जन है जिससे वह प्रसन्न है, और जिसके कारण वह उन सब से प्रसन्न है जो उसमें हैं, वैसे ही मसीह अब हमारे लिये भी वह एकमात्र पवित्र जन हो सकता है जिसमें हम आनन्दित हों, और जिसमें परमेश्वर की पवित्रता हमारी हो गई है। ‘हमने विश्वास किया, और जान गए हैं, कि परमेश्वर का पवित्र जन तू ही है,’—धन्य हैं वे जो यह कह सकते हैं, और जानते हैं कि वे मसीह में पवित्र हैं।
पवित्र त्रिएकता के भेद की चर्चा करते समय हमने देखा था कि मसीह पिता और आत्मा के बीच में कैसे खड़ा है, मानो वह मिलन-बिन्दु जिसमें वे मिलते हैं। पुत्र में, जो ‘उसके तत्व की छाप’ (इब्रानियों 1:3) है, हमें परमेश्वरत्व का वस्तुगत प्रकाशन मिलता है—ईश्वरीय पवित्रता देहधारी होकर निकट लाई गई। पवित्र आत्मा में हमें वही प्रकाशन आत्मगत रूप में मिलता है, ईश्वरीय पवित्रता जो हमारे अन्तरतम अस्तित्व में प्रवेश करती और वहाँ अपने आपको प्रगट करती है। पवित्र आत्मा का कार्य यह है कि वह मसीह को परमेश्वर के पवित्र जन के रूप में प्रगट करे और उसकी महिमा करे, जब वह उसकी पवित्रता में से लेकर उसे हमारी बना देता है। वह हमें दिखाता है कि सब कुछ मसीह में कैसे है; मसीह हमारे लिये सब कुछ कैसे है; हम मसीह में कैसे हैं; और एक जीवित उद्धारकर्ता के रूप में मसीह अपने आत्मा के द्वारा हमें और हमारे पवित्रता के जीवन को कैसे अपने हाथ में लेता और सम्भाले रहता है। वह मसीह को सचमुच हमारे लिये परमेश्वर का पवित्र जन बना देता है।
हे मेरे भाई! क्या तुम पवित्र होना चाहते हो, क्या तुम पवित्रता का परमेश्वर का मार्ग जानना चाहते हो—तो मसीह को परमेश्वर के पवित्र जन के रूप में जानना सीखो। तुम उसमें हो, ‘मसीह में पवित्र।’ ईश्वरीय सामर्थ्य के एक कार्य के द्वारा तुम मसीह में रखे गए हो, और वही सामर्थ्य तुम्हें वहाँ बनाए रखती है—जीवन और पवित्रता की उस ईश्वरीय भरपूरी में रोपे हुए और जड़ पकड़े हुए, जो उसमें है। उसकी पवित्र उपस्थिति, और उसके अनन्त जीवन की सामर्थ्य, तुम्हें घेरे हुए हैं: पवित्र आत्मा को यह तुम पर प्रगट करने दो। पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर मसीह और उसके जीवन की सामर्थ्य के रूप में है। यदि तुम उसके कार्य के लिये पिता की ओर ताकोगे, तो वह गुप्त रूप से, चुपचाप, परन्तु सामर्थ्य के साथ इस विश्वास को दृढ़ करेगा कि तुम मसीह में हो, और यह कि वह ईश्वरीय जीवन, जो इस प्रकार तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए है, भीतर प्रवेश करेगा और तुम पर अधिकार कर लेगा। अध्ययन और प्रार्थना करो कि तुम यह विश्वास करो और अनुभव करो कि तुम मसीह में हो—उस मसीह में जो परमेश्वर का पवित्र जन है, उस मसीह में जिसमें परमेश्वर की पवित्रता तुम्हारे लिये एक पवित्र स्वभाव और पवित्र चाल-चलन के रूप में तैयार की गई है—और यह कि तुम उसमें बने रह सकते हो।
और फिर यह भी स्मरण रखो कि यह मसीह तुम्हारा उद्धारकर्ता है, शिक्षकों में सबसे अधिक धीरजवन्त और करुणामय। उसके मुख के प्रकाश में, उसके चेहरे की ओर ऊपर देखते हुए, पवित्रता का अध्ययन करो। वह तुम्हें पवित्र बनाने ही के उद्देश्य से स्वर्ग से आया। उसका प्रेम और उसकी सामर्थ्य तुम्हारी मन्दता और पापमयता से बढ़कर हैं। पवित्रता को उस मीरास के रूप में सोचना अवश्य सीखो जो तुम्हारे लिये तैयार की गई है, उस नये जीवन की सामर्थ्य के रूप में जिसे बाँटने के लिये यीशु बाट जोहता और जीवित रहता है। बस यह सोचो कि वह सब उसी में है, और उसका मिलना स्वयं उसी के मिलने पर निर्भर है। और जैसे चेले—यद्यपि वे मुश्किल से समझते थे कि वे क्या अंगीकार कर रहे हैं, या यह जानते थे कि प्रभु उन्हें कहाँ ले जा रहा है—उससे अपने गहरे लगाव के कारण उसके सन्त, उसके पवित्र लोग बन गए, वैसे ही तुम पाओगे कि यीशु से उत्साह से प्रेम करना, और सरलता से उसकी आज्ञा मानना, पवित्रता और पवित्र आत्मा की भरपूरी का निश्चित मार्ग है।
पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।
हे परमपवित्र प्रभु परमेश्वर! मैं तुझे धन्य कहता हूँ कि तेरा प्रिय पुत्र, जिसे तूने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा, अब हमारे लिये परमेश्वर का पवित्र जन है। मैं तुझ से विनती करता हूँ कि मेरा भीतरी जीवन आत्मा के द्वारा ऐसा प्रकाशित हो कि मैं विश्वास में पूरी रीति से जान सकूँ कि इसका अर्थ क्या है।
मैं उसे तेरी पवित्रता के प्रकाशन के रूप में जानूँ—मानव स्वभाव में, मृत्यु तक भी, पाप के प्रति तेरी असीम और अजेय घृणा का, और पापी के प्रति तेरे अद्भुत प्रेम का भी देहधारी रूप। मेरा प्राण तेरे बड़े भय और तुझ पर बड़े भरोसे से भर जाए।
मैं उसे उस पवित्रता के प्रदर्शन के रूप में जानूँ जिसमें अब हमें तेरे सामने चलना है। वह तेरी पवित्र इच्छा में जीवित रहा। मैं उसे ऐसा जानूँ कि उसने वह पवित्रता पूरी की, कि वह एक नये मानव स्वभाव में हमें दी जाए, और हमारे लिये पवित्र जीवन जीना सम्भव हो।
मैं उसे ऐसा जानूँ जैसे तूने मुझे स्वर्ग में उसमें रखा है—मसीह में पवित्र—और जैसे मैं विश्वास के द्वारा उसमें बना रह सकता हूँ।
मैं उसे ऐसा जानूँ जैसे वह मुझ में वास करता है—मेरे हृदय के सिंहासन पर परमेश्वर का पवित्र जन, जो अपना पवित्र आत्मा फूँकता और अपना पवित्र शासन बनाए रखता है। तब मैं मसीह में पवित्र जीवन बिताऊँगा।
हे मेरे पिता! तुझे यह भाया कि तेरे पुत्र में सारी परिपूर्णता वास करे। उसी में बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं; उसी में अनुग्रह और पवित्रता का अगम्य धन वास करता है। मैं तुझ से विनती करता हूँ, उसे मुझ पर प्रगट कर, उसे मुझ में प्रगट कर, कि मुझे वास्तविकता के बिना केवल विचारों और अभिलाषाओं से अपने आपको सन्तुष्ट न करना पड़े, परन्तु अविनाशी जीवन की सामर्थ्य में मैं उसे जानूँ, और उससे जाना जाऊँ—परमेश्वर के पवित्र जन से। आमीन।
1. यीशु की पवित्रता में हम देखते हैं कि हमारी पवित्रता कैसी होनी चाहिए: धार्मिकता, जो पाप से बैर रखती है और उसे नष्ट करने के लिये सब कुछ दे देती है; प्रेम, जो पापी को ढूँढ़ता है और उसे बचाने के लिये सब कुछ दे देता है। ‘जो कोई धार्मिकता नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं, और न वह जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता।’
2. यह एक गम्भीर विचार है कि हम यह जानने का बड़े यत्न से अध्ययन कर रहे हों कि पवित्रता क्या है, और फिर भी वह हम में बहुत थोड़ी हो, क्योंकि यीशु हम में बहुत थोड़ा है। यह एक धन्य विचार है कि कोई मनुष्य सीधे-सीधे पवित्रता के विचार में बहुत कम लगा रहे, और फिर भी उसमें पवित्रता बहुत हो, क्योंकि वह यीशु से भरा हुआ है।
3. पवित्रता के सम्बन्ध में, उसके सब भिन्न-भिन्न पहलुओं में, परमेश्वर अपने वचन में जो कुछ सिखाता है, उस सब की हमें आवश्यकता है। उससे भी अधिक हमें आवश्यकता है कि हम उस जीवित केन्द्र की ओर सदा लौटते रहें जहाँ परमेश्वर पवित्रता प्रदान करता है। यीशु परमेश्वर का पवित्र जन है: उसे सचमुच पाना, उससे उत्साह से प्रेम करना, उस पर भरोसा रखना और उसकी आज्ञा मानना, उसमें होना—यही हमें पवित्र बनाता है।
4. इस प्रकार तुम्हारी पवित्रता इस ईश्वरीय, सर्वशक्तिमान और अति कोमल उद्धारकर्ता में संचित रखी गई है—निश्चय ही यह डरने की कोई आवश्यकता नहीं कि वह तुम्हें पवित्र बनाने के लिये तैयार या समर्थ न होगा।
5. ऐसे पवित्र करनेवाले के होते हुए, यह कैसे होता है कि पवित्रता के इतने खोजी ऐसी दुःखद रीति से असफल होते हैं, और पवित्र जीवन के आनन्द को इतना कम जानते हैं?
मुझे निश्चय है कि बहुतों के साथ यही एक बात है: वे इस मसीह को अपनी ही शक्ति से पकड़ने और थामे रखने का प्रयत्न करते हैं, और नहीं जानते कि वह उनके भीतर का पवित्र आत्मा ही है, जिसकी बाट जोहनी है कि वह इस ईश्वरीय व्यक्ति को, परमेश्वर के पवित्र जन को, उनके हृदयों में प्रगट करे।
पन्द्रहवाँ दिन।
अध्याय 15 पूरा हुआ
परमेश्वर का पवित्र जन