मसीह में पवित्र
पवित्र आत्मा

अध्याय 16 · 14 मिनट का पठन

पवित्र आत्मा

‘उसने यह वचन उस आत्मा के विषय में कहा, जिसे उस पर विश्वास करनेवाले पाने पर थे; क्योंकि आत्मा अब तक न उतरा था, क्योंकि यीशु अब तक अपनी महिमा को न पहुँचा था।’—यूहन्ना 7:39।

‘सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा।’—यूहन्ना 14:26।

‘परमेश्वर ने तुम्हें चुन लिया; कि आत्मा के द्वारा पवित्र बनकर, और सत्य पर विश्वास करके उद्धार पाओ।’—2 थिस्सलुनीकियों 2:13। (देखें 1 पतरस 1:2।)

कभी-कभी यह कहा गया है कि जहाँ पुराने नियम में परमेश्वर की पवित्रता अधिक प्रमुखता से उभरकर सामने आती है, वहाँ नये नियम में उसे उसके प्रेम के प्रकाशन के लिये स्थान छोड़ना पड़ता है। ऐसी बात शायद ही कही जाती, यदि पूरी रीति से यह समझ लिया जाता कि आत्मा परमेश्वर है, और जब वह पवित्र की उपाधि को अपना निज नाम बना लेता है, तो इसका उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि अब परमेश्वर की पवित्रता पहले से कहीं अधिक निकट आनेवाली है, और विशेष रूप से उस सामर्थ्य के रूप में प्रगट होनेवाली है जो हमें पवित्र बनाती है। पवित्र आत्मा में परमेश्वर, जो इस्राएल का पवित्र है, और वह भी जो परमेश्वर का पवित्र जन था, इस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिये निकट आते हैं: ‘मैं तुम्हारा पवित्र करनेवाला यहोवा हूँ।’ परमेश्वर की अदृश्य और अगम्य पवित्रता मसीह यीशु के जीवन में प्रगट होकर निकट लाई गई थी; और जो कुछ उसमें हमारे सहभागी होने में बाधा डालता था, वह सब उसकी मृत्यु के द्वारा दूर कर दिया गया था। पवित्र आत्मा का नाम हमें सिखाता है कि उस पवित्रता को हमें प्रदान करना और उसे हमारा अपना बना देना विशेष रूप से आत्मा का ही काम है।

इसके अर्थ को समझने का यत्न करो: वह उपाधि, जो सारे पुराने नियम में पवित्र परमेश्वर की रही है, अब उस आत्मा की हो गई है जो तुम्हारे भीतर है। मसीह में परमेश्वर की पवित्रता तुम में पवित्रता बन जाती है, क्योंकि यह आत्मा तुम में है। ये शब्द, पवित्र और आत्मा, और वे दिव्य वास्तविकताएँ जिन्हें ये शब्द प्रगट करते हैं, अब अटूट और अनन्त रूप से एक हो गए हैं। तुम आत्मा को उतना ही पा सकते हो जितनी पवित्रता पाने को तुम तैयार हो। और तुम में पवित्रता उतनी ही हो सकती है जितना भीतर वास करनेवाला आत्मा तुम में है।

कुछ लोग ऐसे हैं जो आत्मा के लिये प्रार्थना करते हैं, क्योंकि वे उसके प्रकाश, आनन्द और सामर्थ्य को पाने की लालसा रखते हैं। फिर भी उनकी प्रार्थनाओं से आशीष या सामर्थ्य में थोड़ी ही बढ़ती होती है। इसका कारण यह है कि वे उसे पवित्र आत्मा के रूप में ठीक से न तो जानते हैं और न चाहते हैं। उसकी धधकती हुई शुद्धता, उसका जाँचनेवाला और दोषी ठहरानेवाला प्रकाश, देह के कामों को, और अपनी इच्छा और सामर्थ्य समेत स्वयं को मार डालने का उसका काम, और यीशु की उस संगति में उसका ले चलना जिसमें यीशु ने अपनी इच्छा और अपना जीवन पिता को सौंप दिया,—इन सब बातों पर उन्होंने कभी विचार ही नहीं किया। आत्मा उनमें सामर्थ्य के साथ काम नहीं कर सकता, क्योंकि वे उसे पवित्र आत्मा के रूप में, अर्थात् आत्मा के द्वारा पवित्र बनने के लिये, ग्रहण नहीं करते। कभी-कभी, जागृति के समयों में, जैसा कुरिन्थियों और गलातियों के बीच हुआ, वह सचमुच अपने वरदानों और सामर्थ्य के कामों के साथ आ सकता है, जबकि उसकी पवित्र करनेवाली सामर्थ्य बहुत थोड़ी ही प्रगट होती है। (1 कुरिन्थियों 14:4, 13:8, 3:1-3; गलातियों 3:3, 5:15-26।) परन्तु जब तक उस पवित्र करनेवाली सामर्थ्य को माना और ग्रहण न किया जाए, उसके वरदान खो जाएँगे। उसके वरदान जो हम पर आते हैं, केवल इसलिए दिए जाते हैं कि हमारे भीतर उसकी पवित्र करनेवाली सामर्थ्य के लिये मार्ग तैयार करें। हमें यह पाठ मन में बैठा लेना चाहिए: हम आत्मा को उतना ही पा सकते हैं जितना हम उसकी पवित्रता को पाने के लिये तैयार हैं। आत्मा से परिपूर्ण होओ—इसका अर्थ हमारे लिये यह होना चाहिए: पूरी रीति से पवित्र बनो।

इसका उलटा भी उतना ही सच है। हम उतनी ही पवित्रता पा सकते हैं जितना आत्मा हम में है। कुछ लोग सचमुच बड़ी लगन से पवित्र बनने का यत्न करते हैं, परन्तु बहुत कुछ अपनी ही शक्ति में। वे बड़ी लगन से पुस्तकें पढ़ते और उपदेश सुनते हैं; वे हर विचार को पकड़ने और हर सलाह पर चलने का पूरा प्रयत्न करते हैं। फिर भी उन्हें मानना पड़ता है कि मसीह में बने रहने, और उसमें पवित्र होने के सच्चे, गहरे विश्राम, आनन्द और सामर्थ्य से वे अब भी बहुत कुछ अनजान हैं। उन्होंने आत्मा से बढ़कर पवित्रता को खोजा। उन्हें यह सीखना होगा कि वह सारी पवित्रता भी, जो मसीह में इतनी निकट और स्पष्ट है, हमारी पहुँच से बाहर है, जब तक कि पवित्र आत्मा भीतर वास करके उसे हमें प्रदान न करे। उन्हें सीखना होगा कि उसके लिये, और उसके द्वारा सामर्थ्य पाकर बलवन्त होने के लिये प्रार्थना करें (इफिसियों 3:16), उसके लिये विश्वास करें (यूहन्ना 4:14, 7:37), और विश्वास से अपने आप को उसे भीतर वास करनेवाले के रूप में सौंप दें (1 कुरिन्थियों 3:16, 6:19)। उन्हें सीखना होगा कि सोचने और विश्वास करने में, चाहने और दौड़ने में अपने ही प्रयत्न को छोड़ दें; परमेश्वर पर आशा रखें, और धीरज से उसकी बाट जोहें। वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें पवित्र बनाएगा। पवित्र बनो—इसका अर्थ है: आत्मा से परिपूर्ण हो जाओ।

यदि हम और गहराई से पूछें कि यह पवित्र आत्मा किस रीति से पवित्र बनाता है, तो उत्तर यह है,—वह मसीह की पवित्रता को प्रगट करता और प्रदान करता है। पवित्रशास्त्र हमें बताता है: मसीह हमारे लिये पवित्रता ठहरा। उसने हमारे लिये अपने आपको पवित्र किया, ताकि हम भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ। हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। हम मसीह यीशु में पवित्र किए गए हैं। सम्पूर्ण जीवित मसीह मनुष्य के लिये पवित्रता का एक भण्डार ही है। पृथ्वी पर अपने जीवन में उसने अपनी उस दिव्य पवित्रता को, जो उसके पास थी, उस प्रचलित सिक्के में बदल दिया जिसकी इस मानवीय, पार्थिव जीवन के लिये आवश्यकता है—अर्थात् पिता की आज्ञाकारिता, और दीनता, और प्रेम, और उत्साह। परमेश्वर होने के नाते उसके पास यह पवित्रता हर विश्वासी के जीवन के हर पल के लिये पर्याप्त है।

फिर भी, यह सब हमारी पहुँच से बाहर है, जब तक कि पवित्र आत्मा इसे हमारे पास न लाए और भीतर से हमें न सौंपे। परन्तु यही तो वह काम है जिसके कारण वह यह दिव्य नाम धारण करता है, पवित्र आत्मा—कि वह हमारे भीतर यीशु की, जो परमेश्वर का पवित्र जन है, महिमा करे, और इस प्रकार हमें उसकी पवित्रता का भागी बनाए। वह यह मसीह को प्रगट करके करता है, ताकि हम देखने लगें कि उसमें क्या कुछ है। वह यह हमारे स्वभाव की गहरी अपवित्रता को खोलकर दिखाने के द्वारा करता है (रोमियों 7:14-23)। वह यह हमें सामर्थ्य के साथ बलवन्त करके करता है, कि हम विश्वास करें, और स्वयं यीशु को अपने जीवन के रूप में ग्रहण करें। वह यह हमें अपने आप से पूरी रीति से निराश करके, यीशु को प्रभु मानकर उसकी आज्ञाकारिता के पूर्ण समर्पण तक, और भीतर वास करनेवाले मसीह की सामर्थ्य पर विश्वास के दृढ़ भरोसे तक ले चलकर करता है। वह यह हृदय और जीवन की गुप्त, शान्त गहराइयों में मसीह के स्वभाव और गुणों को प्रदान करके करता है, ताकि हमारे जीवन के भीतरी केन्द्र से, जो मसीह में नया किया गया और पवित्र किया गया है, पवित्रता बाहर बहे और सब कुछ में उसकी अन्तिम परिधि तक व्याप्त हो जाए। जहाँ एक बार लालसा जाग उठी हो, और भीतरी मनुष्यत्व से परमेश्वर की व्यवस्था में प्रसन्नता उत्पन्न हो चुकी हो, वहाँ वह मसीह यीशु में इस जीवन की आत्मा होकर अंगों में की पाप और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र करता है, और परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता में ले चलता है। हमारे भीतर परमेश्वर होकर, वह हमें वही देता है जो परमेश्वर ने मसीह में तैयार किया है।

और यदि हम एक बार फिर पूछें कि इस पवित्र आत्मा का काम, जो इस प्रकार पवित्र बनाता है, किस रीति से प्राप्त किया जाए, तो उत्तर बहुत सरल और स्पष्ट है। वह पवित्र पिता का, और परमेश्वर के पवित्र जन मसीह का आत्मा है: उन्हीं से उसे पाना होगा। ‘उसने मुझे जीवन के जल की एक नदी दिखाई, जो परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन से निकलकर बहती थी।’ यीशु उसके विषय में कहता है: ‘पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा।’ उसने हमें पिता से माँगना सिखाया। पौलुस इफिसियों के लिये प्रार्थना करता है: ‘मैं उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ, कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त होते जाओ।’ जब हम परमेश्वर की ओर उसकी पवित्रता में, और सृष्टि से लेकर आगे तक उसके सारे प्रकाशन में दृष्टि करते हैं, और देखते हैं कि आत्मा अब किस प्रकार उसकी पवित्रता के सिंहासन से जीवन के जल के रूप में बह निकलता है, तभी हमारे भीतर यह आशा जागेगी कि परमेश्वर उसे हम में सामर्थ्य से काम करने के लिये देगा। और जब हम फिर यीशु को देखते हैं कि वह मानव स्वभाव में उस पवित्रता को प्रगट करता है, और अपनी प्रायश्चित करनेवाली मृत्यु में परदे को फाड़ देता है, ताकि आत्मा परमपवित्र स्थान से निकल आए और पवित्र आत्मा होकर उसका प्रतिनिधि बने, और उसे हमारे भीतर उपस्थित करे, तब हमें यह भरोसा हो जाएगा कि यीशु पर विश्वास आत्मा की परिपूर्णता ले आएगा। जैसे उसने हमें पिता से माँगने को कहा, वैसे ही उसने हमें अपने आप पर विश्वास करने को कहा। ‘जो मुझ पर विश्वास करेगा, उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।’ आओ, हम उसके पुत्र मसीह के नाम में पिता के सामने घुटने टेकें; आओ, हम बड़ी सरलता से पुत्र पर विश्वास करें, जिसमें होकर पिता हम से प्रसन्न है, और जिसके द्वारा पिता का प्रेम और आशीष हम तक पहुँचते हैं; तब हम निश्चित हो सकते हैं कि आत्मा, जो पहले से हमारे भीतर है, पवित्र आत्मा होकर निरन्तर बढ़ती हुई सामर्थ्य के साथ अपना काम करेगा। पवित्रता का भेद त्रिएकता का भेद है: जब हम पुत्र पर विश्वास करते हुए पिता के सामने झुकते हैं, तब पवित्र आत्मा काम करेगा। और तब हम उस बात का सच्चा अर्थ देखेंगे जो परमेश्वर ने इस्राएल में कही थी: ‘मैं पवित्र हूँ,’ यह पिता कहता है; ‘पवित्र बनो,’ मेरे पुत्र के समान और मेरे पुत्र में; ‘मैं पवित्र करता हूँ,’ मेरे पुत्र के आत्मा के द्वारा जो तुम में वास करता है। आओ, हमारे प्राण आराधना करें और पुकार उठें: ‘सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है।’

पवित्र आत्मा। पिता को उसकी आराध्य पवित्रता में, और पुत्र को उसकी पवित्रता में जानने का सारा सच्चा ज्ञान, जो हमारा होने के लिये ठहराया गया है, और उसमें सारी सहभागिता—यह सब आत्मा में हमारे जीवन पर निर्भर है, इस बात पर कि हम उसे जानें और मानें कि वह हमारा जीवन होकर हम में बना रहता है। आह, ऐसे तीन बार पवित्र परमेश्वर के होते हुए भी, इसका क्या कारण हो सकता है कि उसकी पवित्रता उसकी कलीसिया और उसकी सन्तानों को और अधिक नहीं ढाँप लेती? पवित्र आत्मा हमारे बीच है, हम में है: अवश्य है कि हम ही उसे शोकित करते और उसका विरोध करते हैं। यदि तुम ऐसा नहीं करना चाहते, तो तुरन्त पिता के सामने घुटने टेको, कि वह तुम्हें भीतरी मनुष्यत्व में आत्मा के सामर्थी काम प्रदान करे। विश्वास करो कि पवित्र आत्मा, जो परमेश्वर और यीशु की सारी पवित्रता को तुम तक पहुँचानेवाला है, सचमुच तुम में है। उसे स्वयं का, उसके विचारों और प्रयत्नों समेत, स्थान लेने दो। अपने प्राण को पवित्र मौन में परमेश्वर के सामने शान्त रखो, कि वह तुम्हें बुद्धि दे; रिक्तता और मन की दीनता में इस विश्वास के साथ विश्राम करो कि वह अपनी ही रीति से काम करेगा। जितनी दिव्य वह पवित्रता है जो यीशु लाता है, उतनी ही दिव्य वह सामर्थ्य है जिसमें पवित्र आत्मा उसे प्रदान करता है। दिन प्रतिदिन बढ़ती हुई निर्भरता और आज्ञाकारिता में अपने आप को सौंपते जाओ, कि उसकी बाट जोहो और उसके चलाए चलो। उस पवित्र का भय तुम पर बना रहे: प्रभु परमेश्वर को अपने मन में पवित्र जानो: उसी का डर मानो, और उसी का भय रखो। केवल पाप से ही न डरो: सबसे बढ़कर स्वयं से डरो, जब वह अपनी सेवा लेकर परमेश्वर के सामने घुस आता है। स्वयं को मरने दो, उसके काम को अस्वीकार और इन्कार करके: पवित्र आत्मा को, शान्ति और निर्भरता में, आज्ञाकारिता और भरोसे के समर्पण में, शासन करने दो, और हर शक्ति पर पूरा अधिकार रखने दो। उसकी बाट जोहो—वह कर सकता है, वह सामर्थ्य के साथ पिता और पुत्र की पवित्रता को प्रगट करेगा और प्रदान करेगा।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

सेनाओं के यहोवा परमेश्वर, तू पवित्र, पवित्र, पवित्र है! सारी पृथ्वी तेरे तेज से भरपूर है! वही तेज तेरे बालक के हृदय को भर दे, जब वह तेरे सामने झुकता है। मैं अब जीवन के जल की उस नदी में से पीने आता हूँ, जो परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन के नीचे से बहती है। परमेश्वर की और मेम्ने की महिमा हो उस दान के लिये जो मनुष्य के चित्त में कल्पना तक नहीं चढ़ा—भीतर वास करनेवाले पवित्र आत्मा का दान।

हे मेरे पिता! यीशु के नाम में मैं तुझ से माँगता हूँ कि मैं तेरे आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त होता जाऊँ। मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे सिखा कि मैं विश्वास करूँ कि तूने उसे दे दिया है, और उसे ग्रहण करूँ और आशा रखूँ कि वह मेरे सम्पूर्ण भीतरी अस्तित्व को भरेगा और उस पर शासन करेगा। मुझे सिखा कि मैं अपने आप को उसके हाथ सौंप दूँ; न अपनी शक्ति में चाहूँ या दौड़ूँ, न सोचूँ या काम करूँ, परन्तु शान्त भरोसे के साथ बाट जोहूँ और जानूँ कि वह मुझ में काम करता है। मुझे सिखा कि शरीर पर भरोसा न रखना, और आत्मा में तेरी सेवा करना क्या है। मुझे सिखा कि सब बातों में तेरे पवित्र आत्मा के, जो तेरी पवित्रता का आत्मा है, चलाए चलना क्या है।

और हे अनुग्रहकारी पिता, ऐसा कर कि उसके द्वारा मैं तुझे बोलते सुनूँ, और तू सामर्थ्य के साथ अपने आप को मुझ पर प्रगट करे: मैं पवित्र हूँ। वह मेरे लिये और मुझ में उस यीशु की महिमा करे, जिसमें तेरी आज्ञा ‘पवित्र बनो’ मेरे निमित्त ऐसी आशीषित रीति से पूरी हुई है। और पवित्र आत्मा मुझे वह अभिषेक और वह छाप दे जो यह पूरा निश्चय देती हैं कि उसमें तेरी यह प्रतिज्ञा महिमा के साथ पूरी हो रही है: ‘मैं तुम्हें पवित्र करता हूँ।’ आमीन।

1. यह सर्वमान्य है कि कलीसिया की शिक्षा में या विश्वासियों के विश्वास में पवित्र आत्मा को आदर और सामर्थ्य का वह स्थान नहीं मिला है, जो पिता और पुत्र के प्रगट करनेवाले के रूप में उसके योग्य है। इस बात का गहरा निश्चय पाने का यत्न करो कि पवित्र आत्मा के बिना पवित्रता की सबसे स्पष्ट शिक्षा, सबसे उत्कट लालसाएँ, यहाँ तक कि सबसे आशीषित अनुभव भी केवल अस्थायी होंगे, कोई स्थायी फल उत्पन्न नहीं करेंगे, कोई टिकनेवाला विश्राम नहीं देंगे।

2. पवित्र आत्मा भीतर वास करता है, और भीतर, तुम्हारे स्वभाव की गुप्त गहराई में, काम करता है। सब बातों से बढ़कर इस स्पष्ट और स्थायी निश्चय को खोजो कि वह तुम्हारे भीतर है और अपना काम कर रहा है।

3. इसके लिये, परमेश्वर की सेवा में स्वयं का और उसके काम का इन्कार करो। सोचने, प्रार्थना करने, विश्वास करने और यत्न करने की अपनी शक्ति—इस सब को स्पष्ट और निश्चित रूप से परमेश्वर की उपस्थिति में रख दो; भीतर वास करनेवाले आत्मा के गुप्त कामों का दावा करो, उन्हें ग्रहण करो, और उन पर विश्वास करो।

4. जैसे पुत्र सदा पिता के विषय में बोलता था, वैसे ही आत्मा सदा मसीह की ओर संकेत करता है। जो प्राण अपने आप को आत्मा को सौंप देता है, वह उससे यह जानना सीखेगा कि मसीह किस प्रकार हमारी पवित्रता है, और हम किस प्रकार सदा मसीह में, जो हमारी पवित्रता है, बने रह सकते हैं। आत्मा के बिना यह कितनी बार एक व्यर्थ प्रयत्न रहा है! ‘जैसा उस अभिषेक ने तुम्हें सिखाया है वैसे ही तुम उसमें बने रहते हो।’

5. हे प्रिय विश्वासी, तुम्हारे हृदय के मन्दिर में, परदे के भीतर, एक गुप्त स्थान है, जहाँ परमेश्वर का आत्मा वास करता है, और बहुधा किसी को इसका पता तक नहीं होता। गहरी श्रद्धा से पिता के सामने झुको, और माँगो कि वह सामर्थ्य से काम करे। आशा रखो कि आत्मा अपना काम करेगा: वह तुम्हारे भीतरी मनुष्यत्व को यीशु के लिये एक योग्य घर, और तुम्हारे हृदय को उसका सिंहासन बनाएगा, और वहाँ उसे प्रगट करेगा।


सोलहवाँ दिन।

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