मसीह में पवित्र
इस्राएल का पवित्र

अध्याय 12 · 13 मिनट का पठन

इस्राएल का पवित्र

‘मैं वह यहोवा हूँ जो तुम्हें मिस्र देश से इसलिए निकाल ले आया हूँ कि तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँ; इसलिए तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ। मैं यहोवा, जो तुम को पवित्र करता हूँ, पवित्र हूँ।’—लैव्यव्यवस्था 11:45, 21:8।

‘मैं यहोवा तेरा परमेश्वर हूँ, इस्राएल का पवित्र मैं तेरा उद्धारकर्ता हूँ। तुम्हारा छुड़ानेवाला और इस्राएल का पवित्र यहोवा यह कहता है: मैं यहोवा तुम्हारा पवित्र, इस्राएल का सृजनहार, तुम्हारा राजा हूँ।’—यशायाह 43:3, 14, 15।

निर्गमन की पुस्तक में हमने देखा कि परमेश्वर अपनी प्रजा की पवित्रता के लिए प्रबन्ध कर रहा था। पवित्र समयों और पवित्र स्थानों, पवित्र व्यक्तियों, पवित्र वस्तुओं और पवित्र सेवाओं के द्वारा उसने अपनी प्रजा को सिखाया था कि जो कुछ उसके चारों ओर है, और जो कोई उसके निकट आना चाहे, सबका पवित्र होना अवश्य है। वह केवल पवित्रता के बीच ही वास करेगा; उसकी प्रजा को पवित्र प्रजा होना था। परन्तु वहाँ स्वयं परमेश्वर के पवित्र होने का कोई सीधा उल्लेख नहीं है। लैव्यव्यवस्था की पुस्तक में हम एक कदम और आगे ले जाए जाते हैं। यहाँ पहली बार परमेश्वर अपनी ही पवित्रता के विषय में बोलता है, और उसे अपनी प्रजा की पवित्रता का आधार ठहराता है, और साथ ही उसकी ज़मानत और उसका सामर्थ्य भी। इसके बिना पवित्रता का प्रकाशन अधूरा रह जाता, और पवित्रता की बुलाहट निर्बल। सच्ची पवित्रता हमें तब प्राप्त होगी जब हम यह सीखेंगे कि केवल स्वयं परमेश्वर ही पवित्र है। वही अकेला पवित्र करता है; जब हम स्वयं उसी के पास आते हैं, और आज्ञाकारिता और प्रेम में उसी से जुड़ जाते हैं, तभी उसकी पवित्रता हम पर ठहर सकती है।

मूसा की पुस्तकों के बाद से हम पाएँगे कि ईश्वर-प्रेरित लेखों में परमेश्वर को पवित्र कहनेवाला नाम बहुत कम मिलता है, जब तक कि हम यशायाह तक, उस सुसमाचार सुनानेवाले भविष्यद्वक्ता तक, नहीं पहुँचते। वहाँ यह छब्बीस बार आता है, और उसका सच्चा अर्थ इस रीति से खोला गया है कि वह उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाले के नाम से जोड़ा गया है। आनन्द और भरोसे और स्तुति की वे सारी भावनाएँ, जिनके साथ छुड़ाई हुई प्रजा अपने छुड़ानेवाले को निहारती, उस पवित्र के नाम के सम्बन्ध में ही बताई गई हैं। ‘हे सिय्योन में बसनेवाली तू जयजयकार कर और ऊँचे स्वर से गा, क्योंकि इस्राएल का पवित्र तुझ में महान है।’ ‘दरिद्र मनुष्य इस्राएल के पवित्र के कारण मगन होंगे।’ ‘तू यहोवा के कारण मगन होगा, और इस्राएल के पवित्र के कारण बड़ाई मारेगा।’ अदन की वाटिका में हमने देखा था कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर ही पवित्र करनेवाला परमेश्वर था, जो अपने हाथों के काम को सिद्ध करता है। इस्राएल में हमने देखा कि छुड़ानेवाला परमेश्वर सदा पवित्र करनेवाला परमेश्वर भी था, जो उस प्रजा को पवित्र करता था जिसे उसने अपने लिए चुन लिया था। यहाँ यशायाह में हम देखते हैं कि पवित्र करनेवाला परमेश्वर, वह पवित्र, ही नई वाचा के उस महान छुटकारे को पूरा करनेवाला है: पवित्र होने के नाते ही वह छुड़ानेवाला है। परमेश्वर इसलिए छुड़ाता है कि वह पवित्र है, और पवित्र करने से प्रसन्न होता है: पवित्रता सिद्ध किया हुआ छुटकारा होगी। छुटकारा और पवित्रता दोनों एक साथ परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध में ही पाए जाते हैं। पवित्रता के भेद की कुंजी हर एक विश्वासी को उस वचन में दी गई है: ‘तुम्हारा छुड़ानेवाला और इस्राएल का पवित्र यहोवा यह कहता है: मैं यहोवा तुम्हारा पवित्र हूँ।’ उस पवित्र के निकट आना, उसे जानना, उसे पा लेना, और उसके द्वारा अपना लिया जाना, यही पवित्रता है।

यदि परमेश्वर की पवित्रता ही इस प्रकार हमारी पवित्रता की एकमात्र आशा है, तो उचित है कि हम यह जानने का यत्न करें कि वह पवित्रता क्या है। और यद्यपि हम उसे सचमुच ऐसी वस्तु पाएँ जो ज्ञान से परे है, तौभी वचन में उसके विषय में जो कुछ प्रगट किया गया है उसे बटोरना व्यर्थ न होगा। आओ, हम पवित्र भय और आराधना की आत्मा में ऐसा करें, और भरोसा रखें कि पवित्र आत्मा हमारा शिक्षक होगा।

और पहले हम यह ध्यान दें कि परमेश्वर की यह पवित्रता, यद्यपि उसका उल्लेख प्रायः ईश्वरीय गुणों में से एक के रूप में होता है, तौभी कठिनाई से ही दूसरे गुणों के बराबर एक गुण गिनी जा सकती है। दूसरे सब गुण ईश्वरीय स्वभाव के किसी विशेष पहलू या लक्षण की ओर संकेत करते हैं; पवित्रता मानो स्वयं ईश्वरीय अस्तित्व के मूल तत्व या सिद्धता को ही व्यक्त करती है। कोई भी गुण उन सब बातों के विषय में नहीं कहा जा सकता जो परमेश्वर की हैं; परन्तु पवित्रशास्त्र उसके पवित्र नाम, उसके पवित्र दिन, उसके पवित्र निवासस्थान, उसके पवित्र वचन की चर्चा करता है। पवित्र शब्द में हमारे पास सारी ईश्वरीय सिद्धताओं के सार के सबसे निकट पहुँचनेवाली बात है, इस बात का वर्णन कि ईश्वरत्व क्या है। दूसरे गुणों को हम ईश्वरीय सिद्धताएँ कहते हैं, परन्तु इस में हमें स्वयं ईश्वरीय सिद्धता के लिए एकमात्र मानवीय अभिव्यक्ति मिलती है। इसी कारण धर्मविज्ञानियों को ऐसी परिभाषा गढ़ने में बड़ी कठिनाई हुई है जो इस शब्द का पूरा अर्थ व्यक्त कर सके।

मूल इब्रानी शब्द, चाहे वह अलग करने का अर्थ रखनेवाली किसी धातु से निकला हो, चाहे चमकने का भाव रखनेवाली किसी दूसरी धातु से, किसी ऐसी वस्तु का भाव व्यक्त करता था जो दूसरों से भिन्न हो, और अपनी श्रेष्ठ उत्तमता के कारण उनसे अलग हो। परमेश्वर उन सब से जो सृजे गए हैं अलग और भिन्न है, और जो कुछ परमेश्वर नहीं है उस सब से अपने आपको अलग रखता है; वह पवित्र होने के नाते अपनी ईश्वरीय महिमा और सिद्धता को हर उस बात के विरुद्ध बनाए रखता है जो उसमें बाधा डाल सकती है: ‘यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं;’ ‘तुम मुझे किसके समान बताओगे कि मैं उसके तुल्य ठहरूँ? उस पवित्र का यही वचन है।’ पवित्र होने के नाते परमेश्वर सचमुच वह अनुपम है; पवित्रता केवल उसी की है; स्वर्ग या पृथ्वी पर उसके समान कुछ नहीं, सिवाय उसके जिसे वह स्वयं दे। और इसलिए हमारी पवित्रता किसी ऐसे मानवीय अलगाव में नहीं होगी जिसमें हम परमेश्वर के अलगाव की नकल करने का यत्न करें,—नहीं, वरन् उसके अलगाव में प्रवेश करने में होगी; पूरी तरह उसी का हो जाने में; उसके द्वारा और उसी के लिए अलग किए जाने में।

इसी से निकट से जुड़ा हुआ महानता का भाव है: ‘जो महान और उत्तम और सदैव स्थिर रहता, और जिसका नाम पवित्र है, वह यह कहता है।’ वह पवित्र ही था जो बहुत ही ऊँचे सिंहासन पर विराजमान दिखाई दिया, साराप जिसकी आराधना करते थे। निन्यानबेवें भजन में परमेश्वर की पवित्रता का उल्लेख विशेष रूप से उसकी महानता के सम्बन्ध में किया गया है। इसी कारण भी उसकी पवित्रता प्रायः उसकी महिमा और प्रताप से जोड़ी जाती है (देखें ‘छठा दिन’)। और यहाँ हमारी पवित्रता उस दरिद्रता और दीनता के सिवा और कुछ न दिखाई देगी जो तब आती है जब ‘मनुष्य का गर्व मिटाया जाता है, और केवल यहोवा ही ऊँचे पर विराजमान रहता है।’

यदि हम और बारीकी से पूछें कि इस अलगाव और महानता की असीम उत्तमता किस बात में है, तो हमारा ध्यान ईश्वरीय शुद्धता की ओर जाता है, और वह भी केवल उसके नकारात्मक पहलू में नहीं—पाप से घृणा के रूप में—वरन् सिद्ध सुन्दरता के अधिक सकारात्मक तत्व के साथ भी। क्योंकि हम पापी हैं, और परमेश्वर की पवित्रता का प्रकाशन पाप से भरे संसार में हुआ है, इसलिए यह स्वाभाविक है, यह ठीक और उचित है, कि परमेश्वर की पवित्रता की पहली और स्थायी छाप एक ऐसी असीम शुद्धता की हो जो पाप को देख ही नहीं सकती, और जिसकी उपस्थिति में पापी को अपना मुँह छिपाना और काँपना ही उचित है। परमेश्वर की धार्मिकता, जो पाप को वर्जित करती, दोषी ठहराती और दण्ड देती है, उसकी जड़ उसकी पवित्रता में है; वह उसके दो तत्वों में से एक है—भस्म करनेवाली आग की निगल जानेवाली और नाश करनेवाली शक्ति। ‘पवित्र परमेश्वर धर्मी होने के कारण पवित्र ठहरता है’ (यशायाह 5:16); धार्मिकता में उस पवित्र की पवित्रता बनी रहती और प्रगट होती है। परन्तु ज्योति न केवल अशुद्ध बातों को प्रगट करती है कि वे शुद्ध की जाएँ, वरन् वह स्वयं असीम सुन्दरता की वस्तु है। और इसी कारण हमारे कुछ अत्यन्त पवित्र जनों ने परमेश्वर की पवित्रता को ईश्वरीय अस्तित्व का असीम सौन्दर्य या मनोहरता कहने में संकोच नहीं किया है, उस ज्योति की सिद्ध शुद्धता और सुन्दरता, जिसमें परमेश्वर वास करता है। और यदि परमेश्वर की पवित्रता हमारी बननी है, हम पर ठहरनी और हमारे भीतर प्रवेश करनी है, तो निरन्तर वह पवित्र भय होना चाहिए जो इस विचार से काँपता है कि कहीं हम अपने पापों से इस पवित्र की असीम कोमलता को शोकित न करें; और साथ ही साथ, उसके साथ पूरे मेल में, यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाने की गहरी लालसा, उसकी ईश्वरीय महिमा के प्रति सराहना, और केवल उसी का हो जाने के लिए आनन्दपूर्ण समर्पण भी होना चाहिए।

हमें एक कदम और आगे जाना है। जब परमेश्वर कहता है, ‘मैं पवित्र हूँ: मैं पवित्र करता हूँ,’ तो हम देखते हैं कि उसकी पवित्रता के मुख्य तत्वों में से एक यह है कि वह अपने आपको बाँटना चाहती है, दूसरों को अपनी सिद्धता और आनन्द का भागी बनाना चाहती है। यह प्रेम के सिवा और कुछ नहीं। यशायाह में इस अद्भुत प्रकाशन में कि वह पवित्र अपनी प्रजा के लिए क्या है, हमें सावधान रहना है कि परमेश्वर के बहुमूल्य वचन का गलत अर्थ न लगाएँ। यह नहीं कहा गया कि यद्यपि परमेश्वर पवित्र है, और पाप से घृणा करता है, और उसे दण्ड देना और नाश करना चाहिए, तौभी इसके बावजूद वह उद्धार करेगा। कदापि नहीं। वरन् हमें यह सिखाया गया है कि पवित्र होने के नाते, ठीक इसी कारण कि वह पवित्र है जो पवित्र करने से प्रसन्न होता है, वह अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला होगा। (देखें होशे 11:9।) पवित्रता ही, सब बातों से बढ़कर, वह है जिसकी ओर देखने, जिस पर भरोसा करने, और जिसमें आनन्द करने के लिए हमें बुलाया गया है। वह पवित्र ही पवित्र करनेवाला है: वह इसलिए छुड़ाता और उद्धार करता है कि हमारा भरोसा अपने लिए जीत ले, कि हमें पवित्र होने के नाते अपनी ओर खींच ले, कि उससे व्यक्तिगत लगाव में हम आज्ञा मानना, उसके साथ एक मन होना, और जैसा वह पवित्र है वैसे ही पवित्र होना सीखें।

इस प्रकार ईश्वरीय पवित्रता ईश्वरत्व की वह असीम सिद्धता है जिसमें धार्मिकता और प्रेम पूरे मेल में हैं, जिससे वे दोनों निकलते हैं, और जिसे वे दोनों मिलकर प्रगट करते हैं। यह ईश्वरीय जीवन की वह शक्ति है जिसके सामर्थ्य से परमेश्वर न केवल अपने आपको सृष्टि की हर दुर्बलता या पाप से मुक्त रखता है, वरन् निरन्तर यह चाहता है कि सृष्टि को उठाकर अपने साथ एकता में, और अपनी शुद्धता और सिद्धता की पूरी सहभागिता में ले आए। परमेश्वर होने के नाते, सृष्टि और छुटकारे के परमेश्वर होने के नाते, परमेश्वर की महिमा उसकी पवित्रता ही है। परमेश्वर का वह अलगाव और वह महानता, जो मनुष्य के हर विचार से भी ऊपर है, वास्तव में इसी में है। ‘परमेश्वर ज्योति है;’ अपनी असीम शुद्धता में वह सारे अंधकार को प्रगट कर देता है, तौभी उससे उसकी कोई सहभागिता नहीं। वह उसका न्याय करता और उसे दोषी ठहराता है; वह उसमें से उद्धार करता है, और अपनी शुद्धता और आनन्द की सहभागिता में ऊपर उठा लेता है। यही इस्राएल का पवित्र है।

यही परमेश्वर है जो हम से कहता है, ‘मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ: मैं पवित्र हूँ: मैं पवित्र करता हूँ।’ उसकी पवित्रता के आराधनापूर्ण ध्यान में, उसके प्रति भरोसे से भरे समर्पण में, स्वयं उस पवित्र के साथ प्रेम की सहभागिता में ही हम पवित्र किए जा सकते हैं। मेरे भाई! क्या तुम पवित्र होना चाहते हो? फिर से सुनो, और भरोसे की गहरी चुप्पी में परमेश्वर के ये शब्द अपने हृदय में उतरने दो—‘तुम्हारा पवित्र।’ स्वयं उसके पास आओ और उसे अपना परमेश्वर करके माँग लो, और वह सब कुछ माँग लो जो वह, पवित्र करनेवाला पवित्र होने के नाते, तुम्हारे लिए कर सकता है। बस यह स्मरण रखो कि पवित्रता स्वयं वही है। उसके पास आओ; उसकी आराधना करो; उसी को महिमा दो। उससे भी अपने आप में पवित्रता मत खोजो; स्वयं को नीचा होने दो, और इसी में सन्तुष्ट रहो कि पवित्रता उसकी है। जैसे-जैसे उसकी उपस्थिति तुम्हारे हृदय को भरती है, जैसे-जैसे उसकी पवित्रता और महिमा तुम्हारी एकमात्र लालसा बनती है, जैसे-जैसे उसकी पवित्र इच्छा और प्रेम तुम्हारा आनन्द बनते हैं,—जैसे-जैसे वह पवित्र तुम्हारे लिए सब में सब कुछ बन जाता है,—वैसे-वैसे तुम उस पवित्रता से पवित्र होगे जिसे देखकर वह प्रसन्न होता है। और यदि अन्त तक तुम्हें अपने आप में सराहने योग्य कुछ न दिखे, और केवल उसी में सुन्दरता दिखे, तो तुम जान लोगे कि उसने अपनी महिमा में से कुछ तुम पर रखा है; और तुम्हारी पवित्रता उस गीत में पाई जाएगी, यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं।

पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।

हे परमेश्वर! हमने फिर से तेरे अपने विषय में वह अद्भुत प्रकाशन सुना है, ‘मैं पवित्र हूँ।’ और जब हमने अनुभव किया कि तेरी पवित्रता हमारी सारी कल्पनाओं से कितनी असीम ऊँची है, तब हमने तेरी बुलाहट सुनी, जो और भी अद्भुत है, ‘पवित्र बनो, जैसा मैं पवित्र हूँ।’ और जब हमारा हर विचार कि हम कैसे पवित्र हों, जैसा तू पवित्र है, हार गया, तब हमने एक बार फिर तेरा शब्द सुना, इस सबसे अद्भुत वचन में, ‘मैं तुम को पवित्र करता हूँ।’ मैं ‘तुम्हारा पवित्र’ हूँ।

हे परमपवित्र परमेश्वर! हम तुझ से विनती करते हैं, हमें कुछ उचित मात्रा में यह अनुभव करा कि हम कितने अपवित्र हैं, कि हम तेरी उपस्थिति में वह स्थान लें जो हमें शोभा देता है। भला हो कि हमारे स्वभाव की पापमयता, और जो कुछ स्वयं का है, वह हम पर ऐसा प्रगट हो जाए कि उसमें जीते रहना अब सम्भव ही न रहे! जो ज्योति यह प्रगट करती है, वही यह भी प्रगट करे कि तेरी पवित्रता ही हमारी एकमात्र आशा, हमारा निश्चित शरणस्थान, हमारा पूरा छुटकारा है। हे प्रभु! अपने आत्मा के द्वारा हमारे प्राणों में यह वचन, ‘वह पवित्र, तुम्हारा छुड़ानेवाला,’ ‘तुम्हारा पवित्र,’ ऐसे सामर्थ्य के साथ बोल, कि हमारा विश्वास बढ़कर इस दृढ़ भरोसे तक पहुँच जाए कि हम पवित्र हो सकते हैं जैसा तू पवित्र है।

हे पवित्र प्रभु परमेश्वर! हम तेरी बाट जोहते हैं। सामर्थ्य के साथ अपने आपको हमारे भीतर प्रगट कर, और हमें अपनी पवित्रता के सन्देशवाहक होने के योग्य बना, कि हम तेरे लोगों को बताएँ कि तू कितना पवित्र है, और हमें कितना पवित्र होना चाहिए, और तू हमें कितना पवित्र करता है। आमीन।

1. यह पवित्र सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। इस्राएल पर अपने आपको पवित्र के रूप में प्रगट करने से पहले, उसने अब्राहम पर अपने आपको सर्वशक्तिमान के रूप में प्रगट किया था, ‘जो मरे हुओं को जिलाता है।’ पवित्रता के लिए परमेश्वर से अपने सारे व्यवहार में स्मरण रखो कि वह सर्वशक्तिमान है, जो तुम में आश्चर्यकर्म कर सकता है। बार-बार कहो, ‘उसकी महिमा हो जो ऐसा सामर्थी है, कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है।’

2. यह पवित्र धर्मी परमेश्वर है, भस्म करनेवाली आग। अपने आपको उसमें डाल दो, कि जो कुछ पापमय है वह नाश हो जाए। जब तुम अपने आपको वेदी पर रखते हो, तो आग की आशा रखो। ‘और अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपो।’

3. यह पवित्र प्रेम का परमेश्वर है। वह तुम्हारा पिता है; अपने आपको सौंप दो कि पवित्र आत्मा तुम में हे अब्बा, हे पिता पुकारे! अर्थात् उसे अवसर दो कि वह परमेश्वर का पितृ-प्रेम तुम्हारे हृदय में डाले और उसे उससे भर दे। परमेश्वर की पवित्रता उसका पितृत्व है; हमारी पवित्रता बालक-सा स्वभाव है। सरल, प्रेमी और भरोसा रखनेवाले बनो।

4. यह पवित्र परमेश्वर है। उसे अपने लिए परमेश्वर होने दो; सब पर शासन करनेवाला, सब को भरनेवाला, सब में काम करनेवाला। उसकी आराधना करो, उसके निकट आओ, उसके साथ और उसमें और उसके लिए जीयो: वही तुम्हारी पवित्रता होगा।


बारहवाँ दिन।

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