मसीह में पवित्र
पवित्रता और अलग किया जाना

अध्याय 11 · 15 मिनट का पठन

पवित्रता और अलग किया जाना

‘मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ जिसने तुम को अन्य देशों के लोगों से अलग किया है। तुम मेरे लिये पवित्र बने रहना; क्योंकि मैं यहोवा स्वयं पवित्र हूँ, और मैंने तुम को और देशों के लोगों से इसलिए अलग किया है कि तुम निरन्तर मेरे ही बने रहो।’—लैव्यव्यवस्था 20:24, 26।

‘जब तक वे दिन पूरे न हों जिनमें वह यहोवा के लिये अलग रहे तब तक वह पवित्र ठहरेगा…। अपने अलग रहने के सारे दिनों में वह यहोवा के लिये पवित्र ठहरा रहे।’—गिनती 6:5, 8।

‘इसी कारण, यीशु ने भी लोगों को अपने ही लहू के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया। इसलिए, आओ उसकी निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’—इब्रानियों 13:12, 13।

अलग किया जाना पवित्रता नहीं है, पर उस तक पहुँचने का मार्ग है। यद्यपि अलग किए जाने के बिना कोई पवित्रता नहीं हो सकती, तौभी ऐसा अलग किया जाना हो सकता है जो पवित्रता तक नहीं ले जाता। दोनों का भेद और दोनों का सम्बन्ध समझना बहुत आवश्यक है, ताकि हम दाहिनी ओर की इस भूल से, कि केवल अलग किए जाने को ही पवित्रता मान लें, और बाईं ओर की इस भूल से भी, कि अलग किए जाने के बिना पवित्रता खोजें, बचे रहें।

पवित्रता के लिये इब्रानी शब्द सम्भवतः एक ऐसी धातु से निकला है जिसका अर्थ है अलग करना। पर जहाँ हमारे अनुवाद में ‘अलग करना’ या ‘भिन्न करना’ या ‘पृथक करना,’ आता है, वहाँ बिलकुल भिन्न शब्द हैं। पवित्र के लिये जो शब्द है, वह केवल उसी विशेष विचार को व्यक्त करने के लिये प्रयोग होता है। और यद्यपि पवित्र के विचार में अलग किए जाने का विचार सदा सम्मिलित रहता है, तौभी वह स्वयं उससे असीम रूप से ऊँचा है। इसे भली-भाँति समझना बहुत आवश्यक है, क्योंकि परमेश्वर के लिये अलग किए जाने की, उसके दावे के आगे समर्पण की, उसकी सेवा के लिये अपने को अर्पित करने की चर्चा प्रायः ऐसे की जाती है मानो इसी से पवित्रता बनती हो। हम इस विचार पर जितना भी ज़ोर दें कम है कि यह केवल आरम्भ है, पहली शर्त है: पवित्रता स्वयं इससे असीम रूप से अधिक है; जो मैं हूँ, या करता हूँ, या देता हूँ, वह पवित्रता नहीं, पर जो परमेश्वर है, और देता है, और मुझ में करता है, वही पवित्रता है। परमेश्वर का मुझ पर अधिकार कर लेना ही मुझे पवित्र बनाता है; परमेश्वर की उपस्थिति और महिमा ही वास्तव में पवित्र करती है। इस्राएल से कहे गए परमेश्वर के वचनों का ध्यानपूर्वक अध्ययन यह बात हम पर स्पष्ट कर देगा। लैव्यव्यवस्था में आठ बार हम यह वाक्य पाते हैं, ‘तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।’ पवित्रता परमेश्वर का सर्वोच्च गुण है, जो न केवल इस्राएल के साथ उसके सम्बन्ध को, बल्कि उसके अस्तित्व और स्वभाव को, उसकी असीम नैतिक सिद्धता को व्यक्त करता है। और यद्यपि वह मनुष्य के शारीरिक और अन्धकारमय मन को बहुत धीमे और क्रमिक कदमों से ही सिखा सकता है कि इसका अर्थ क्या है, तौभी बिलकुल आरम्भ से वह अपने लोगों को बताता है कि उसका उद्देश्य यह है कि वे उसी के समान हों—पवित्र, क्योंकि वह पवित्र है, और जैसा वह पवित्र है। मुझ से यह कहना कि परमेश्वर मनुष्यों को अपने लिये अलग करता है कि वे उसके हों, जैसे वह अपने आपको देता है कि वह उनका हो, मुझे एक विद्यमान सम्बन्ध के विषय में तो बताता है, पर इस पवित्र सत्ता के वास्तविक स्वभाव के विषय में, या उस पवित्रता के मूल मूल्य के विषय में, जो वह मुझे देगा, कुछ भी नहीं बताता। अलग किया जाना तो केवल उस पात्र को अलग रखना और अपने अधिकार में लेना है जिसे शुद्ध करके काम में लाना है; उसमें वह बहुमूल्य वस्तु भरना, जो हम उसे सौंपते हैं, ही उसे उसका वास्तविक मूल्य देता है। पवित्रता वह ईश्वरीय भराव है जिसके बिना अलग किया जाना हमें खाली छोड़ देता है। अलग किया जाना पवित्रता नहीं है।

पर पवित्रता के लिये अलग किया जाना अनिवार्य है। ‘मैंने तुम को अन्य देशों के लोगों से अलग किया है, और तुम पवित्र बने रहना।’ जब तक मैं किसी पात्र को उसके आसपास के पात्रों में से चुनकर अलग न कर लूँ, और आवश्यकता हो तो उसे शुद्ध न कर लूँ, तब तक मैं उसे न भर सकता हूँ, न काम में ला सकता हूँ। वह मेरे हाथ में होना चाहिए, उस समय के लिये उस पर मेरा पूरा और एकमात्र अधिकार होना चाहिए, नहीं तो मैं उसमें बहुमूल्य दूध या दाखरस नहीं उण्डेलूँगा। और ठीक इसी प्रकार परमेश्वर ने अपने लोगों को अलग किया, जब वह उन्हें मिस्र से निकाल लाया; जब उसने उन्हें अपनी वाचा और अपनी व्यवस्था दी, तब उन्हें अपने लिये अलग किया, ताकि वे उसके नियन्त्रण और सामर्थ्य के अधीन रहें, और वह उन्हें पवित्र करने का अपना उद्देश्य पूरा करे। यह वह तब तक नहीं कर सकता था जब तक उसने उन्हें अलग न कर लिया हो, और उनमें यह बोध न जगा दिया हो कि वे उसकी निज प्रजा हैं, पूरी रीति से और केवल उसी के, जब तक उसने उन्हें यह भी न सिखा दिया हो कि वे अपने आपको उसके लिये अलग करें। पवित्रता के लिये अलग किया जाना अनिवार्य है।

नाज़ीर की विधि इसकी पुष्टि करेगी, और यह भी बहुत स्पष्ट कर देगी कि अलग किए जाने का अर्थ क्या है। इस्राएल को एक पवित्र जाति होना था। उसकी पवित्रता का विशेष प्रतिरूप उसके याजकों में था। व्यक्तिगत इस्राएली के विषय में हम मूसा की पुस्तकों में कहीं नहीं पढ़ते कि वह पवित्र है। पर ऐसी विधियाँ थीं जिनके द्वारा वह इस्राएली, जो पूरी रीति से पवित्र होने की अपनी लालसा को प्रमाणित करना चाहता था, ऐसा कर सकता था। वह अपने आसपास की जाति के साधारण जीवन से अपने आपको अलग कर सकता था, और एक नाज़ीर का, अर्थात् एक अलग किए हुए जन का, जीवन बिता सकता था। छाया और प्रतिरूप के उन दिनों में यह अलग होना पवित्रता के रूप में स्वीकार किया जाता था। ‘अपने अलग रहने के सारे दिनों में वह यहोवा के लिये पवित्र ठहरा रहे।’

यह अलग होना विशेष रूप से तीन बातों में था—संयम में, अर्थात् दाखलता की उपज से परहेज़ में; दीनता में, अर्थात् अपने बाल न कटवाने या न मुँड़वाने में (‘यदि पुरुष लम्बे बाल रखे, तो उसके लिये अपमान है’); आत्म-बलिदान में, अर्थात् पिता या माता तक की मृत्यु पर उनके कारण अपने आपको अशुद्ध न करने में। जिस बात पर हमें विशेष ध्यान देना है वह यह है कि यह अलग होना अनुचित बातों से नहीं, बल्कि उचित बातों से था। अब्राहम के अपने पिता के घर में रहने में, या इस्राएल के मिस्र में बसे रहने में, अपने आप में कुछ भी पापपूर्ण नहीं था। अलग होने की आत्मा तब प्रकट होती है जब हम न केवल उसे त्याग देते हैं जो पाप सिद्ध किया जा सकता है, बल्कि वह सब भी जो हमें पवित्र करने के लिये परमेश्वर के हाथों में हमारे पूर्ण समर्पण की तीव्रता में बाधा डाल सकता है।

आओ, हम वे पाठ सीखें जो यह सत्य सुझाता है। हमें अलग किए जाने की आवश्यकता जाननी चाहिए। यह परमेश्वर की कोई मनमानी माँग नहीं, बल्कि इसका आधार वस्तुओं के स्वभाव में ही है। किसी वस्तु को अलग करना उसे किसी एक विशेष उपयोग या उद्देश्य के लिये स्वतंत्र करना है, ताकि वह अपनी अविभाजित शक्ति से उसकी इच्छा पूरी कर सके जिसने उसे चुना है, और इस प्रकार अपनी नियति को पा ले। यही वह सिद्धान्त है जो श्रम के हर विभाजन की जड़ में है; अध्ययन या श्रम की किसी एक शाखा के लिये पूरी रीति से अलग हो जाना सफलता और सिद्धता का मार्ग है। मेरे सामने बांज वृक्षों का एक वन है, जिसके वृक्ष एक-दूसरे के बहुत पास-पास सीधे ऊपर उठे हुए हैं। वन के किनारे पर एक वृक्ष अपने साथियों से अलग खड़ा है; उसका भारी तना और दूर-दूर तक फैली हुई डालियाँ प्रमाणित करती हैं कि उसका अलग होना, और भूमि के एक बड़े टुकड़े का उसके अपने उपयोग के लिये अलग होना, जिस पर उसकी जड़ें और डालियाँ फैल सकें, ही उसकी बढ़ती और विशालता का रहस्य है। हमारी मानवीय शक्तियाँ सीमित हैं; यदि परमेश्वर को हम पर पूरा अधिकार करना है, यदि हमें उसका पूरा आनन्द लेना है, तो उसके लिये अलग किया जाना एक सरल, स्वाभाविक और अनिवार्य शर्त के सिवाय और कुछ नहीं। परमेश्वर हमें पूरी रीति से अपने लिये चाहता है, ताकि वह अपने आपको पूरी रीति से हमें दे सके।

हमें अलग किए जाने का उद्देश्य जानना चाहिए। वह परमेश्वर के इस कथन में मिलता है, ‘तुम मेरे लिये पवित्र बने रहना; क्योंकि मैं यहोवा स्वयं पवित्र हूँ, और मैंने तुम को और देशों के लोगों से इसलिए अलग किया है कि तुम निरन्तर मेरे ही बने रहो।’ परमेश्वर ने हमें शब्द के गहनतम अर्थ में अपने लिये अलग किया है; ताकि वह हम में प्रवेश करे, और हम में अपने आपको प्रकट करे। उसकी पवित्रता उसकी सारी सिद्धताओं का सार और केन्द्र है; वह हमें अपने समान पवित्र बनाए, इसी लिये उसने हमें अलग किया है। अलग किए जाने का अपने आप में कभी कोई मूल्य नहीं; वह अत्यन्त अनुचित या हानिकारक भी बन सकता है; सब कुछ उस उद्देश्य पर निर्भर है जो सामने रखा गया है। जैसे-जैसे परमेश्वर हम पर पूरा अधिकार पाता और करता है, जैसे-जैसे मसीह में अनन्त जीवन हमारे सारे अस्तित्व पर प्रभुता करता है, जैसे-जैसे पवित्र आत्मा पूरी रीति से और बेरोक हम में होकर बहता है, यहाँ तक कि हम परमेश्वर में बने रहते हैं और परमेश्वर हम में, वैसे-वैसे अलग किया जाना विधियों और रीतियों की बात नहीं, बल्कि एक आत्मिक वास्तविकता बन जाएगा। और जैसे-जैसे परमेश्वर का यह उद्देश्य देखा, स्वीकार किया और खोजा जाता है, वैसे-वैसे इन कठिन प्रश्नों का सहज उत्तर मिल जाएगा कि हमें किन बातों से अलग होना है, और अलग किया जाना कितने बलिदान की माँग करता है। परमेश्वर हमें उन सब बातों से अलग करता है जो हमें उसकी पवित्रता और संगति में नहीं ले जातीं।

सबसे बढ़कर हमें अलग किए जाने की सामर्थ्य जाननी चाहिए, वह सामर्थ्य जो हमें लालसा और आनन्द की, स्वतंत्रता और प्रेम की आत्मा में उसकी ओर ले जाती है। मानव भाषा में अलग करनेवाला सबसे बड़ा शब्द है मेरा। इसी में हमें प्रयत्न और सुख का बड़ा स्रोत मिलता है: खिलौनों के साथ बच्चे में, अपने लाभ और प्रतिफल के साथ श्रम में, अपने देश के लिये मरनेवाले देशभक्त में, यही मेरा है जो उस वस्तु पर हाथ रखता है जिसे वह बाकी सब से अलग करता है। यह वह बड़ा शब्द है जिसे प्रेम काम में लाता है। चाहे वह बच्चा हो जो अपनी माँ से कहता है, मेरी अपनी माँ, और उत्तर में सुनता है, मेरा अपना बच्चा; चाहे वह दूल्हा हो जो एक पुत्री को उसके प्रिय घर और माता-पिता से खींच लाता है कि वह उसकी हो जाए; या चाहे वह पवित्र परमेश्वर हो जो कहता है: ‘मैंने तुम को और देशों के लोगों से इसलिए अलग किया है कि तुम निरन्तर मेरे ही बने रहो;’ प्रेम सदा उसी मेरा के द्वारा अपनी प्रबल सामर्थ्य दिखाता है, और बाकी सब से खींचकर अपनी ओर ले आता है। स्वयं परमेश्वर इससे बढ़कर कोई तर्क नहीं जानता, इससे अधिक शक्तिशाली कोई आकर्षण प्रस्तुत नहीं कर सकता, ‘कि तुम निरन्तर मेरे ही बने रहो।’ और अलग किए जाने की सामर्थ्य हमारे पास आएगी और हम में काम करेगी, ठीक उतना ही जितना हम उस पवित्र उद्देश्य का अध्ययन करने और उसे अनुभव करने के लिये, उस अद्भुत मेरा को सुनने और अपनाने के लिये, और उस सर्वशक्तिमान प्रेम के द्वारा पकड़े जाने और अपना लिये जाने के लिये अपने आपको सौंपते हैं।

आओ, हम उस अद्भुत मार्ग का कदम-कदम अध्ययन करें जिसमें ईश्वरीय प्रेम अपना अलग करने का काम करता है। छुटकारे में वह मार्ग तैयार करता है। इस्राएल मेम्ने के लहू और मार्ग दिखानेवाले आग के खम्भे के द्वारा मिस्र से अलग किया जाता है। अपनी आज्ञा में, ‘निकलो और अलग रहो,’ वह मनुष्य को कार्य करने के लिये जगाता है; अपनी प्रतिज्ञाओं में, ‘मैं तुम्हारा परमेश्वर होऊँगा,’ वह लालसा को उभारता और विश्वास को दृढ़ करता है। परमेश्वर के सब पवित्र जनों और सेवकों में, और अन्त में उसमें जो पवित्र, और निष्कपट और निर्मल, और पापियों से अलग था, वह मार्ग दिखाता है। पवित्र आत्मा की, अर्थात् पवित्रता की आत्मा की, सामर्थ्य में वह भीतर वास करनेवाले परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा इस अलग किए जाने पर मुहर लगाता है। अलग किए जाने की सामर्थ्य सचमुच यही है। परमेश्वर की उपस्थिति की अलग करनेवाली सामर्थ्य; यही वह बात है जिसे हमें जानना है। ‘यह कैसे जाना जाए कि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर और अपनी प्रजा पर है?’ मूसा ने कहा: ‘क्या इससे नहीं कि तू हमारे संग-संग चले, जिससे मैं और तेरी प्रजा के लोग पृथ्वी भर के सब लोगों से अलग ठहरें?’ परमेश्वर की भीतर वास करनेवाली उपस्थिति का बोध, जो हमें उसका अपना बनाता और बनाए रखता है, वही संसार और उसकी आत्मा से, हमारे अपने आप से और हमारी अपनी इच्छा से सच्चा अलगाव उत्पन्न करता है। और जैसे-जैसे हम इस अलग किए जाने को स्वीकार करते, मूल्यवान समझते और उसमें स्थिर रहते हैं, वैसे-वैसे परमेश्वर की पवित्रता भीतर आकर अधिकार कर लेगी। और हम अनुभव करेंगे कि प्रभु की सम्पत्ति होना, उसकी निज प्रजा होना, केवल उसका गिने जाने या माने जाने से असीम रूप से बढ़कर है; कि इसका अर्थ इससे कम कुछ नहीं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और भीतर वास के द्वारा हमारे अस्तित्व, हमारे स्नेह और हमारी इच्छा को अपने ही जीवन और पवित्रता से भर देता है। वह हमें अपने लिये अलग करता है, और हमें अपना निवास-स्थान होने के लिये पवित्र करता है। वह हृदय में मसीह के भीतर वास के द्वारा व्यक्तिगत रूप से अधिकार करने के लिये स्वयं आता है। और तब हम सचमुच अलग होते हैं, और अपने भीतर परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा अलग रखे जाते हैं।

पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।

हे मेरे परमेश्वर! तूने मुझे अपने लिये अलग किया है; मैं तुझ से विनती करता हूँ कि अपनी प्रबल सामर्थ्य से इस ईश्वरीय अलग किए जाने को मेरे लिये कार्य और सत्य बना दे। भीतर, मेरी अपनी आत्मा की गहराइयों में, और बाहर, मेरे सारे व्यवहार में, मेरे परमेश्वर के लिये अलग किए जाने का मुकुट मुझ पर बना रहे।

हे मेरे परमेश्वर, मैं तुझ से विशेष करके यह विनती करता हूँ कि अहं से मेरे अलग किए जाने को सामर्थ्य के साथ सिद्ध कर! मेरे प्रभु यीशु के भीतर वास में तेरी उपस्थिति ही वह सामर्थ्य हो जो अहं को सिंहासन से निकाल दे। मैं घृणा के साथ उससे मुड़ चुका हूँ; हे मेरे पिता, अपने पुत्र को मुझ में पूरी रीति से प्रकट कर! मेरे हृदय में उसका सिंहासन पर विराजमान होना ही मुझे तेरा अपना बनाए रख सकता है, जब वह स्वयं मेरे अहं का स्थान ले लेता है।

और हे प्रभु, मुझे यह अनुग्रह दे कि अपने बाहरी जीवन में मैं ईश्वरीय बुद्धि की बाट जोहूँ, ताकि मैं जान सकूँ कि तेरी महिमा के लिये और तेरे लोगों की आवश्यकता के अनुसार उस धन्यता की गवाही कैसे दूँ, जो परमेश्वर के लिये सब कुछ पूरी रीति से त्याग देने में है, ऐसा अलग किया जाना जो कुछ भी रोक नहीं रखता, कि केवल उसी का, और पूरी रीति से उसी का होकर रहूँ।


हे पवित्र प्रभु परमेश्वर! अपने लोगों की सुधि ले। आह, उन्हें संसार से और उसके सदृश्य बनने से खींच ले। अलग कर, हे प्रभु, अपने लोगों को अपने लिये अलग कर। हे प्रभु, गेहूँ को भूसी से अलग कर; मानो आग के द्वारा, सोने को मैल से अलग कर; ताकि यह दिखाई दे कि कौन प्रभु के हैं, अर्थात् उसके पवित्र जन। आमीन।

1. प्रेम प्रभावशाली रूप से अलग करता है। कैसी जलन के साथ पति अपनी पत्नी पर, माँ अपने बच्चों पर, और कंजूस अपनी सम्पत्ति पर अपना अधिकार जताते हैं! प्रार्थना करो कि पवित्र आत्मा तुम्हें दिखाए कि परमेश्वर तुम्हें अपने पास कैसे लाया, कि तुम उसके हो जाओ। ‘वह पवित्र परमेश्वर है; वह जलन रखनेवाला परमेश्वर है।’ हृदय में डाला गया परमेश्वर का प्रेम अलग किए जाने को सहज बना देता है।

2. मृत्यु प्रभावशाली रूप से अलग करती है। यदि मैं अपने आपको सचमुच मसीह में मरा हुआ समझूँ, तो मसीह की मृत्यु की सामर्थ्य के द्वारा मैं अहं से अलग हो जाता हूँ। जीवन तो और भी प्रबलता से अलग करता है। जब मैं कहता हूँ, ‘अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है,’ तब मैं अहं के जीवन से ऊपर उठा लिया जाता हूँ।

3. अलग किया जाना प्रकट होना चाहिए; यह दूसरों के लिये और हमारे अपने लिये एक गवाही होने के लिये है; यदि भीतर से इसे वास्तविक और दृढ़ होना है, तो इसे बाहरी बातों में भी अभिव्यक्ति पानी चाहिए। किसी प्रतीकात्मक कार्य की यह विशेषता है कि वह केवल किसी भावना को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि उस भावना को, जिसके वह अनुरूप है, पोषित और दृढ़ भी करता है। जब प्राण परमेश्वर की संगति में प्रवेश करता है, तो उसे बाहरी अलगाव की आवश्यकता अनुभव होती है, कभी-कभी उन बातों से भी जो दूसरों को हानिरहित लगती हैं। यदि परमेश्वर के प्रति दीन अर्पण की आत्मा उसे प्रेरित करती हो, तो बाहरी अलगाव सच्चे अलगपन को बहुत दृढ़ कर सकता है।

4. परमेश्वर के लिये अलग किया जाना और उसके द्वारा अपना लिया जाना साथ-साथ चलते हैं। यही वह आशीष रही है जो शहीदों, विश्वास का अंगीकार करनेवालों, मिशनरियों,—उन सब को मिली है जिन्होंने सब कुछ त्याग देने को स्पष्ट अभिव्यक्ति दी है।

5. अलग किया जाना प्रेम में आरम्भ होता है, और प्रेम में ही समाप्त होता है। अलग होने की आत्मा आत्म-बलिदान की आत्मा है, परमेश्वर के प्रेम के प्रति समर्पण की आत्मा है; जो सचमुच अलग किया गया है वह सबसे अधिक प्रेमी और प्रेम जीतनेवाला होगा, जो परमेश्वर और मनुष्य की सेवा के लिये अपने आपको दे चुका है। क्या यीशु को सब से अलग करनेवाली, सब से भिन्न ठहरानेवाली बात उसका आत्म-बलिदानी प्रेम नहीं है? यही उसका अलगपन है, जिसमें हमें उसके समान बनाया जाना है।

6. परमेश्वर की पवित्रता उसका अलगपन है; आओ, हम संसार से उसके अलगपन में प्रवेश करें; वही हमारी पवित्रता होगी। अपने आपको परमेश्वर से जोड़ दो। तब तुम अलग और पवित्र हो। परमेश्वर अपने लिये अलग करता है, बाहर से किसी कार्य के द्वारा नहीं, बल्कि इस प्रकार कि उसकी इच्छा और उपस्थिति हम पर अधिकार कर लेती है।


ग्यारहवाँ दिन।

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