अध्याय 7 · 10 मिनट का पठन
मसीह का प्रेम
मसीह के प्रेम की पहचान
परमेश्वर के लोगों का विशेष चिह्न यही है कि वे मसीह के प्रेम को जानते हैं। जितने भी मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं, वे चाहे और कुछ न जानते हों, पर यह बात उन सबने बिना किसी अपवाद के सीख ली है। और जितने उद्धार नहीं पाए हैं, वे चाहे और कितना ही कुछ जानते हों, इस विषय में बिना किसी अपवाद के कुछ भी नहीं जानते। क्योंकि मसीह के प्रेम को जानना, उसकी मिठास को चखना, उसे व्यक्तिगत रूप से, अनुभव से और जीवन्त रीति से ऐसा पहचानना कि वह पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे मन में डाला गया है, यह केवल परमेश्वर की सन्तान का ही विशेषाधिकार है। यही वह सुरक्षित घेरा है जिसमें परदेशी प्रवेश नहीं कर सकता। यही प्रभु की वाटिका है, जो दीवारों और बाड़ों से ऐसी भली-भाँति सुरक्षित है कि वन का कोई जंगली सूअर उसमें घुस नहीं सकता। यहाँ केवल प्रभु के छुड़ाए हुए ही चलेंगे। वे, और केवल वे ही, इसके फल तोड़ सकते हैं और इसके आनन्दों से तृप्त हो सकते हैं।
तो फिर यह प्रश्न कितना महत्त्वपूर्ण हो उठता है, कि क्या मैं मसीह के प्रेम को जानता हूँ? क्या मैंने उसे अनुभव किया है? क्या मैं उसे समझता हूँ? क्या वह मेरे मन में डाला गया है? क्या मैं जानता हूँ कि यीशु मुझसे प्रेम करता है? क्या मेरा हृदय उस महान सत्य के द्वारा, जिसे वह पहचानता है और जिसमें वह आनन्दित होता है, कि मसीह ने सचमुच मुझसे प्रेम किया है, और मुझे चुन लिया है, और अपना मन मुझ पर लगाया है, जिलाया गया, उमंग से भरा, गरमाया गया और उसकी ओर खिंच गया है?
परन्तु यद्यपि यह सच है कि परमेश्वर की हर सन्तान मसीह के प्रेम को जानती है, तो भी यह उतना ही सच है कि परमेश्वर की सब सन्तानें इस प्रेम को एक ही मात्रा में नहीं जानतीं।
मसीह के परिवार में बालक भी हैं, जवान भी, बलवन्त पुरुष भी और पिता भी। और जैसे वे अन्य सब बातों में बढ़ते और उन्नति करते हैं, वैसे ही वे निश्चय इस बात में भी आगे बढ़ते हैं। वास्तव में प्रेम की बढ़ती, अर्थात् मसीह के प्रेम की अधिक सिद्ध समझ, उन सबसे अच्छी और सबसे अचूक कसौटियों में से एक है जिनसे हम अपने आप को परख सकते हैं कि हम अनुग्रह में बढ़े हैं या नहीं। यदि हम अनुग्रह में बढ़े हैं, तो यह बिलकुल निश्चित है कि हम मसीह के प्रेम को जानने में और उसके बदले प्रेम करने में भी आगे बढ़े होंगे। बहुतों ने यीशु पर विश्वास किया है और उसके प्रेम को थोड़ा-बहुत जानते हैं; परन्तु, आह! उन कुछ और लोगों की तुलना में, जो भीतरी कोठरी में लाए गए हैं और जिन्हें मसीह के अनारों के रस का मसाला मिला हुआ दाखमधु पिलाया गया है, वे सचमुच बहुत ही थोड़ा जानते हैं। कुछ लोगों ने पहाड़ पर चढ़ना आरम्भ किया है, और जो दृश्य उनके पाँवों तले फैला है वह मनोहर और अति सुन्दर है; परन्तु वह दृश्य वैसा नहीं जैसा उनकी आँखों के सामने आता, यदि वे वहाँ खड़े हो पाते जहाँ उन्नत पवित्र जन खड़े हैं, और पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की ओर दृष्टि करके मसीह के उस प्रेम की सारी लम्बाई, और चौड़ाई, और गहराई, और ऊँचाई देख पाते, जो ज्ञान से परे है।
मसीह परम सुन्दर है
प्रभु यीशु को "परम सुन्दर" कहकर कलीसिया यह घोषणा करती है कि वह उसमें ऐसा कुछ नहीं देखती जिसकी वह प्रशंसा न करे। संसार उसके क्रूस की निन्दा कर सकता है और उसे लज्जाजनक कह सकता है; पर कलीसिया के लिये वह महिमा का ठीक केन्द्र और प्राण है। एक घमण्डी और तिरस्कार करनेवाली जाति अपने राजा को उसकी चरनी के पालने और किसान के-से वस्त्रों के कारण ठुकरा सकती थी, परन्तु कलीसिया की आँखों में वह राजकुमार इन दीन वस्त्रों में भी प्रतापी है। उसके लिये वह कभी सुन्दरता से रहित नहीं होता; उसका रूप कभी बिगड़ा हुआ नहीं दिखता, न उसकी महिमा पर कभी दाग लगता है। वह उसके छिदे हुए पाँवों को अपनी छाती से लगाती है, और उनके घावों को रत्न समझकर निहारती है। मूर्ख उसके क्रूस के पास खड़े होकर ठट्ठे और तिरस्कार के लिये बहुत-सी बातें पाते हैं: उसे वहाँ श्रद्धा-भरी आराधना और असीम प्रेम के गम्भीर कारण के सिवा और कुछ नहीं मिलता। उसे हर पद, हर स्थिति और हर सम्बन्ध में देखकर भी वह कोई दोष नहीं खोज पाती; वरन् अपूर्णता का विचार ही बहुत दूर भगा दिया जाता है। वह उसके सिद्ध परमेश्वरत्व और उसकी निष्कलंक मनुष्यता को इतनी भली-भाँति जानती है कि उसके निर्मल व्यक्तित्व में किसी कलंक के विचार को एक क्षण भी शरण नहीं दे सकती; वह हर उस शिक्षा से घृणा करती है जो उसे नीचा दिखाती है; वह उस सबसे भव्य आवरण को भी ठुकरा देती है जो उसके सुन्दर मुख को ढाँप दे; हाँ, वह उसके आदर के लिये इतनी जलन रखती है कि वह किसी ऐसी आत्मा की नहीं सुनेगी जो उसकी स्तुति की गवाही नहीं देती। उसके निष्कलंक गर्भ-धारण या उसकी बेदाग पवित्रता के विरुद्ध एक संकेत भी उसके प्राण को पवित्र क्रोध से भर देगा, और वह तुरन्त उसे धिक्कारेगी, और उस कुशिक्षा को बिना दया के मिटा डालेगी। कलीसिया को उसके सिर के विरुद्ध कहे गए एक शब्द ने जितना भड़काया है, उतना और किसी बात ने कभी नहीं भड़काया। सब सच्चे विश्वासियों के लिये यह राजद्रोह है, और ऐसा अपराध है जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। यीशु में एक भी धब्बा या कलंक नहीं, वह "परम सुन्दर" है।
फिर भी यह नकारात्मक प्रशंसा, दोष का यह साहसी इनकार, कलीसिया की प्रेम-भरी प्रशंसा की परिपूर्णता को प्रकट करने से बहुत दूर है। उसकी दृष्टि में यीशु सचमुच सुन्दर है। वह केवल रूपवान या मात्र सुहावना ही नहीं; उसकी सुन्दरताएँ अपनी ओर खींच लेनेवाली सुन्दरताएँ हैं, और उसकी महिमाएँ ऐसी हैं जो हृदय को मोह लेती हैं। प्रेम उन आँखों से झाँकता है जो "उन कबूतरों के समान हैं जो दूध में नहाकर नदी के किनारे अपने झुण्ड में एक कतार से बैठे हुए हों;" वह उन होंठों से बहता है जो "सोसन फूल हैं जिनसे पिघला हुआ गन्धरस टपकता है," और वह उन हाथों पर चमकता है जो "फीरोजा जड़े हुए सोने की छड़ें हैं।"
परन्तु यद्यपि कलीसिया का यह कथन स्तुति की भाषा का शिखर है, और निःसन्देह सारे वर्णन की पराकाष्ठा ठहराने के लिये कहा गया था, तो भी यह सम्भव नहीं कि यह एक वाक्य, सबसे सावधान मनन के द्वारा फैलाए जाने पर भी, उस अनुभव की गई प्रशंसा के एक कण से अधिक कुछ व्यक्त कर सके। अनाक के किसी वंशज के समान यह वाक्य और सब वाक्यों से ऊँचा खड़ा है; परन्तु इसका कद स्वर्ग से जन्मे प्रेम की आकाश छूती ऊँचाई तक नहीं पहुँचता। यह अकथनीय स्नेह का एक धुँधला-सा प्रतीक मात्र है; प्रेम के गहरे समुद्र से बहकर किनारे पर आया एक चुना हुआ मोती।
प्रभु के रत्न
सुनार बहुमूल्य धातु से उत्तम आकृतियाँ गढ़ते हैं: वे सोने से कंगन और अँगूठी बनाते हैं। परमेश्वर अपनी बहुमूल्य वस्तुएँ तुच्छ सामग्री से बनाता है; उसने अशुद्ध करनेवाले नालों के काले कंकड़ों में से पत्थर उठाए हैं, और उन्हें अपने अटल प्रेम की सोने की अँगूठी में जड़ दिया है, कि वे सदा के लिये उसकी उँगली पर चमकनेवाले रत्न बनें।
मसीह में सुन्दरता
एक वस्तु है जिसे सुन्दरता कहते हैं, जो मनुष्यों के हृदयों को जीत लेती है। बहुत-से बलवन्त पुरुष उसके आगे झुके हैं और उसका आदर किया है; परन्तु यदि तुम सच्ची सुन्दरता चाहते हो, तो यीशु के मुख की ओर देखो, क्योंकि वहाँ सारी मनोहरता एक स्थान में सिमटी हुई है। मसीह को छोड़ कहीं भी सुन्दरता नहीं है। हे सूर्य, उससे तुलना करने पर तू सुन्दर नहीं ठहरता। हे सुन्दर संसार, महिमामय परमेश्वर की भव्य सृष्टि, उसके मुख के तेज के सामने तू एक धुँधला और मैला धब्बा मात्र है। जब हम मसीह को देखेंगे, तब हमें कहना ही पड़ेगा कि हमने पहले कभी जाना ही नहीं था कि मनोहरता क्या है। जब बादल हट जाएँगे, जब वे परदे जो उसे हमारी दृष्टि से छिपाते हैं एक ओर कर दिए जाएँगे, तब हम पाएँगे कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी भव्य या मनोहर हमने देखा या सुना है, उसमें से कुछ भी एक क्षण के लिये भी उसकी तुलना में नहीं ठहरता, जो कभी ऐसी जड़ के समान देखा गया जो निर्जल भूमि में फूट निकले, परन्तु जो शीघ्र ही स्वर्ग और पृथ्वी को तेज से भर देगा, और अपनी महिमा से सब हृदयों को आनन्दित करेगा।
मसीह से प्रेम
क्या दरबार में तुम्हारा कोई मित्र है—स्वर्ग के दरबार में? क्या प्रभु यीशु तुम्हारा मित्र है? क्या तुम कह सकते हो कि तुम उससे प्रेम करते हो, और क्या उसने कभी प्रेम की रीति से अपने आप को तुम पर प्रकट किया है? आह! यह कह पाना कि "मसीह मेरा मित्र है," संसार की सबसे मधुर बातों में से एक है। मसीह का प्रेम सम्बन्धियों के प्रेम को बाहर नहीं निकालता, परन्तु वह हमारे मानवीय प्रेम को पवित्र करता और उसे कहीं अधिक मधुर बना देता है। सांसारिक प्रेम मधुर है, परन्तु उसे मिट जाना है; और जब मृत्यु आएगी, तब यदि तुम्हारे पास उस धन को छोड़ जो मिट जाता है और कोई धन न हो, और उस प्रेम को छोड़ जो मर जाता है और कोई प्रेम न हो, तो तुम क्या करोगे? आह, मसीह का प्रेम पा लेना! उसे तुम मृत्यु की नदी के पार अपने साथ ले जा सकते हो; तुम उसे स्वर्ग में अपने रत्न के समान पहन सकते हो, और नगीने के समान अपने हाथ पर लगा सकते हो; क्योंकि उसका प्रेम "मृत्यु के तुल्य सामर्थी है, और कब्र से भी बलवन्त है।"
प्रेम का घेरा
मसीही की सहानुभूति सदा अत्यन्त व्यापक होनी चाहिए, क्योंकि वह असीम प्रेम के परमेश्वर की सेवा करता है। जब अनुग्रह प्रेम के बहुमूल्य पत्थर को नये किए हुए हृदय के बिल्लौरी कुण्ड में डालता है, तो वह जीवन के निर्मल जल को सहानुभूति के सदा फैलते हुए घेरों में लहरा देता है: पहले घेरे की परिधि बहुत चौड़ी नहीं होती—हम अपने घराने से प्रेम करते हैं; क्योंकि जो अपने घराने की चिन्ता नहीं करता, वह अविश्वासी से भी बुरा है। परन्तु अगले समकेन्द्रित घेरे पर ध्यान दो—हम विश्वासी भाइयों से प्रेम करते हैं: "हम जानते हैं, कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं; क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं।" एक बार और देखो, क्योंकि सदा फैलता हुआ घेरा कुण्ड के ठीक किनारे तक पहुँच गया है, और उसने सबको अपने दायरे में ले लिया है, क्योंकि "विनती, प्रार्थना, निवेदन, धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिये किए जाएँ।" यीशु के अनुयायी का अर्थ है मनुष्य का मित्र। मसीही अपने व्यवसाय से ही मानव-हितैषी है, और अनुग्रह के बल से उदार है; जितना दुःख का राज्य फैला है, उतना ही उसके प्रेम का फैलाव है, और जहाँ वह सहायता नहीं कर सकता, वहाँ भी वह तरस तो खाता ही है।
मसीह का नीचे उतर आना
जब उद्धारकर्ता मनुष्यों के बीच प्रकट हुआ, तो वह ऐसे व्यक्ति के समान नहीं आया जो अपने लिये पद पाने को साधारण लोगों की पंक्ति में से ऊपर उठाया गया हो, परन्तु ऐसे व्यक्ति के समान जो लोगों तक आशीषें पहुँचाने के लिये स्वर्ग से उतर आया। अज्ञानी और अनपढ़ लोग उसमें अपना सबसे अच्छा मित्र पाते हैं। वह कोई कठोर व्यवस्था देनेवाला नहीं, जो अपनी ही खराई में लिपटा हुआ अपराधी को न्याय की आँख से देखता हो; न ही वह केवल दण्ड और सज़ा का निडर घोषक है, और न अपराध और अधर्म का निर्दय निन्दक। वह हमारे प्राणों का कोमल प्रेमी है; वह अच्छा चरवाहा है जो भेड़िये को मारने के लिये उतना नहीं, जितना भेड़ों को बचाने के लिये निकल आया है। जैसे धाय अपने बच्चे की कोमलता से देखभाल करती है, वैसे ही वह मनुष्यों के प्राणों के लिये जागता रहता है; और जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यीशु बेचारे पापियों पर दया करता है। यह पापियों को अपनी ओर ऊपर खींचना उतना नहीं, जितना उनके पास नीचे उतर आना है; पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर उन्हें ऊपर चढ़ने को कहना नहीं, परन्तु पहाड़ से उतरकर उनके साथ मेल-जोल में घुलमिल जाना है; ऊँचे चरागाहों से उतरकर घाटियों और खड्डों में अपनी भेड़ों के पीछे जाना है, कि वह उन्हें पकड़ ले, उन्हें अपने सामर्थी कन्धों पर उठा ले, और उन्हें उस स्थान तक ले जाए जहाँ वह उन्हें पवित्रता में अपने बाड़े में रखेगा, उन्हें सारे अनुग्रह से आशीष देगा, और आनेवाली महिमा के लिये उन्हें सुरक्षित रखेगा।
अध्याय 7 पूरा हुआ
मसीह का प्रेम