अध्याय 14 · 12 मिनट का पठन
परमेश्वर का प्रबन्ध और देखभाल
आनेवाला कल
यदि आनेवाले दिनों पर डींग नहीं मारनी है, तो क्या वे किसी काम के नहीं? नहीं, परमेश्वर धन्य हो! आनेवाले दिनों के साथ हम बहुत कुछ कर सकते हैं। यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो मैं तुम्हें बताता हूँ कि हम उनके साथ क्या कर सकते हैं। हम सदा धीरज और भरोसे के साथ उनकी बाट जोह सकते हैं, कि वे सब मिलकर हमारी भलाई ही को उत्पन्न करेंगे। हम आनेवाले दिनों के विषय में कह सकते हैं, "मैं उन पर डींग नहीं मारता, परन्तु उनसे डरता भी नहीं; मैं उन पर घमण्ड नहीं करूँगा, परन्तु उनके कारण काँपूँगा भी नहीं।" हाँ, हम कल के विषय में बहुत निश्चिन्त और बहुत सुखी रह सकते हैं; हम स्मरण रख सकते हैं कि हमारे सब दिन उसके हाथ में हैं, कि सब घटनाएँ उसकी आज्ञा के अधीन हैं; और यद्यपि हम परमेश्वर के प्रबन्ध के मार्ग के सब मोड़ नहीं जानते, तो भी वह उन सबको जानता है; वे सब उसकी पुस्तक में ठहराए जा चुके हैं, और हमारे सब दिन उसकी बुद्धि से क्रमबद्ध किए जाते हैं। और इसलिए हम आनेवाले दिनों को ऐसे देख सकते हैं मानो वे समय की अनगढ़ सोने-चाँदी की सिल्लियाँ हों, जो प्रतिदिन के खर्च के लिये सिक्कों में ढाली जानेवाली हैं, और हम उन सबके विषय में कह सकते हैं, "वे सब सोना ही होंगे; उन सब पर राजा की छाप लगी होगी, इसलिए उन्हें आने दो; वे मुझे बिगाड़ेंगे नहीं—वे सब मिलकर मेरी भलाई ही को उत्पन्न करेंगे।"
हाँ, इससे भी बढ़कर, मसीही अपने आनेवाले दिनों की बाट केवल अधीनता से ही नहीं, वरन् आनन्द से भी उचित रीति से जोह सकता है। मसीही के लिये कल एक सुखद बात है; वह महिमा की ओर एक पड़ाव और निकट है। विश्वासी के लिये वह स्वर्ग की ओर एक कदम और निकट है; वह जीवन के संकटमय समुद्र पर पार किया हुआ एक और समुद्री मील है, और वह अपने अनन्त बन्दरगाह के उतना ही और निकट आ जाता है।
कल! मसीही उस पर आनन्द कर सकता है; वह आज के दिन से कह सकता है, "हे दिन, तू अन्धकारमय हो सकता है, परन्तु मैं तुझसे विदा लूँगा, क्योंकि देख, मैं कल को आते देखता हूँ, और मैं उसके पंखों पर चढ़ूँगा, और उड़ जाऊँगा, और तुझे और तेरे दुःखों को अपने पीछे बहुत दूर छोड़ दूँगा।"
सब बातें भलाई के लिये
मसीह सब घटनाओं का निर्णायक है; हर बात में उसका शासन सर्वोच्च है; और वह अपनी सामर्थ्य को अपनी कलीसिया की भलाई के लिये काम में लाता है। वह घटनाओं का धागा कातता है, और नियति की तकली से काम करता है, और उन धागों को अपनी प्रेममयी बुद्धि के नमूने के सिवा किसी और रीति से बुने जाने नहीं देता। वह उस रहस्यमय पहिए को किसी ऐसी रीति से घूमने नहीं देता जिससे उसके चुने हुओं का भला न हो। वह उनकी सबसे बुरी बातों को उनके लिये आशीष बना देता है, और उनकी सबसे अच्छी बातों को पवित्र करता है। बहुतायत के समय में वह उनकी बढ़ती पर आशीष देता है; अकाल के समय में वह उनकी हर एक घटी को पूरी करता है। जैसे सब बातें उसकी महिमा के लिये काम कर रही हैं, वैसे ही सब बातें उनकी भलाई के लिये काम कर रही हैं।
जो कभी नहीं बदलता
एक स्थान ऐसा है जहाँ परिवर्तन अपनी उँगली नहीं रख सकता; एक नाम ऐसा है जिस पर अस्थिरता कभी लिखी नहीं जा सकती; एक हृदय ऐसा है जो कभी बदल नहीं सकता—वह स्थान परमपवित्र स्थान है—वह हृदय परमेश्वर का है—वह नाम प्रेम है।
परमेश्वर का प्रबन्ध
परमेश्वर के प्रबन्ध के असीम भण्डार विश्वासी के पालन-पोषण के लिये लगा दिए गए हैं। मसीह हमारा यूसुफ है, जिसके खत्ते गेहूँ से भरे हैं; परन्तु वह हमसे वैसा व्यवहार नहीं करता जैसा यूसुफ ने मिस्रियों से किया था, क्योंकि वह अपने भण्डार का द्वार खोल देता है, और हमसे कहता है कि उसकी सारी अच्छी वस्तुओं को अपनी ही कहो। उसने अपने प्रबन्ध की जागीर पर हमारे लिये प्रतिदिन के भाग का एक स्थायी भार बाँध दिया है; और उसने प्रतिज्ञा की है कि एक दिन हम स्पष्ट देखेंगे कि वह जागीर हमारी ओर से भली-भाँति जोती-बोई गई है, और सदा से हमारी ही रही है। परमेश्वर के प्रबन्ध के रथ के पहियों की धुरी अनन्त प्रेम है, और अनुग्रहपूर्ण बुद्धि उसकी सदा की सारथी है।
परमेश्वर की कोमल देखभाल
परमेश्वर अपने लोगों की कितनी चिन्ता करता है; वह उनके विषय में कितना व्याकुल रहता है, केवल उनके जीवन के लिये ही नहीं, वरन् उनकी शान्ति के लिये भी। क्या वह कहता है, "मेरी प्रजा को दृढ़ करो, दृढ़ करो?" क्या वह स्वर्गदूत से कहता है, "मेरी प्रजा की रक्षा कर?" क्या वह आकाश से नहीं कहता, "मेरी प्रजा को खिलाने के लिये मन्ना बरसाओ?" यह सब, और इससे भी अधिक, उसकी कोमल चिन्ता उनके लिये निश्चित कर देती है। परन्तु हमें यह दिखाने के लिये कि वह केवल हमारे हितों की ही नहीं, वरन् आवश्यकता से बढ़कर मिलनेवाली वस्तुओं की भी सुधि लेता है, वह कहता है, "मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो।" वह चाहता है कि हम केवल उसके जीवित लोग, और उसके सुरक्षित रखे हुए लोग ही न हों, वरन् उसके आनन्दित लोग भी हों। उसे अच्छा लगता है कि उसके लोग तृप्त हों; परन्तु इससे भी बढ़कर, उसे अच्छा लगता है कि उनके मन आनन्दित करने के लिये उन्हें "बहुत ही निथरा हुआ दाखमधु" दे। वह उन्हें केवल "रोटी" ही नहीं देगा, वरन् "मधु" भी देगा; वह उन्हें केवल "दूध" ही नहीं देगा, वरन् "दाखमधु और दूध" देगा। "मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो": यह पिता का तरसता हुआ हृदय है, जो अपने लोगों की छोटी-छोटी बातों की भी चिन्ता करता है। आँसू भरी आँखोंवाले उस जन को "शान्ति दो"; दुखते हृदयवाली मेरी उस सन्तान को "शान्ति दो"; उस बेचारे विलाप करनेवाले को "शान्ति दो"; "तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो!"
पृथ्वी की ऋतुएँ
जो वस्तुएँ देखी जाती हैं वे उन वस्तुओं के प्रतिरूप हैं जो देखी नहीं जातीं। सृष्टि के काम परमेश्वर की सन्तान के लिये अनुग्रह के गुप्त भेदों के चित्र हैं। परमेश्वर की सच्चाइयाँ सोने के सेब हैं, और दिखाई देनेवाली सृष्ट वस्तुएँ चाँदी की टोकरियाँ हैं। वर्ष की ऋतुएँ भी मनुष्य के भीतर के छोटे-से संसार में अपना जोड़ पाती हैं। हमारा भी जाड़ा आता है—उदास, गरजता हुआ जाड़ा—जब व्यवस्था की उत्तरी वायु हम पर झपटती है; जब हर एक आशा ठिठुरकर मुरझा जाती है; जब आनन्द के सब बीज निराशा के अन्धेरे ढेलों के नीचे दबे पड़े रहते हैं; जब हमारा प्राण बर्फ से जकड़ी हुई नदी के समान कसकर बँधा रहता है, जिसमें न आनन्द की लहरें उठती हैं, न धन्यवाद की धाराएँ बहती हैं। परमेश्वर का धन्यवाद हो, कोमल दक्षिण वायु हमारे प्राण पर बहती है, और तुरन्त लालसा के जल बन्धन से छूट जाते हैं, प्रेम का वसन्त आ जाता है, आशा के फूल हमारे हृदयों में दिखाई देते हैं, विश्वास के वृक्षों में नई कोंपलें फूटती हैं, हमारे हृदयों में चिड़ियों के गाने का समय आ पहुँचता है, और प्रभु यीशु मसीह के द्वारा विश्वास करने में हमें आनन्द और शान्ति मिलती है। उस सुखद वसन्त के बाद विश्वासी के जीवन में भरपूर ग्रीष्म आता है, जब उसके अनुग्रह के गुण सुगन्धित फूलों के समान पूरे खिल उठते हैं, और वायु को सुगन्ध से भर देते हैं; और आत्मा के फल, बिजौरों और अनारों के समान, धार्मिकता के सूर्य की सुहावनी गरमाहट में अपने पूरे आकार तक फूल उठते हैं। तब विश्वासी की पतझड़ आती है, जब उसके फल पक जाते हैं, और उसके खेत कटनी के लिये तैयार हो जाते हैं; वह समय आ पहुँचा है जब उसका प्रभु उसके "उत्तम-उत्तम फल" बटोरकर स्वर्ग में रख लेगा; बटोरन का पर्व निकट है—वह समय जब वर्ष फिर से आरम्भ होगा, एक न बदलनेवाला वर्ष, परमप्रधान के दाहिने हाथ के वर्षों के समान।
परमेश्वर का शासन
अब भी ऐसे लोग मिल जाते हैं जो इतने मूर्ख हैं कि मानते हैं कि घटनाएँ संयोग से, बिना ईश्वरीय पूर्वनियुक्ति के, घटती हैं, और भाँति-भाँति की विपत्तियाँ परमेश्वर के प्रभुता करनेवाले हाथ या उसके प्रत्यक्ष कार्य के बिना ही आ पड़ती हैं। हाय हम पर, यदि हमारे जीवन की घटनाओं से संयोग का कुछ भी लेना-देना होता! तब हम उन बेचारे मल्लाहों के समान होते जिन्हें एक असुरक्षित जहाज में, बिना नक्शे और बिना पतवार के, समुद्र में छोड़ दिया गया हो; हम उस बन्दरगाह के विषय में कुछ भी न जानते जहाँ हम अन्त में पहुँचें; हम केवल इतना अनुभव करते कि अभी हम हवाओं के खिलौने और आँधी के बन्दी हैं, और शीघ्र ही सब कुछ निगल जानेवाले गहरे समुद्र के शिकार हो सकते हैं। हाय! यदि भोजन और वस्त्र के लिये, वर्तमान सुख और भविष्य की आशाओं के लिये, हम संयोग के सिवा और किसी के ऋणी न होते, तो हम सब बेचारे अनाथ होते। हमारी रखवाली करने को किसी पिता की चिन्ता नहीं, वरन् हम नाशवान वस्तुओं की चंचलता और भूल-चूक के भरोसे छोड़ दिए गए होते! जो कुछ हम अपने चारों ओर देखते हैं, वह सब क्या होता, केवल मरुभूमि के बीच उठी एक बड़ी रेतीली आँधी, जो हमारी आँखों को अन्धा कर देती, और हमें आरम्भ के अन्धकार में से कभी अन्त को देखने की आशा तक न करने देती? हम एक बिना मार्ग के उजाड़ में ऐसे यात्री होते जहाँ हमें राह दिखाने को कोई सड़क न होती—ऐसे बटोही जो किसी भी क्षण उलट दिए और दबा दिए जा सकते, और हमारी धूप में सूखकर सफेद पड़ी हड्डियाँ आँधी की शिकार बनकर पड़ी रह जातीं, अनजानी, या सबके द्वारा भुलाई हुई। परमेश्वर का धन्यवाद हो, हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम विश्वास करते हैं कि जो कुछ हम पर बीतता है, वह सब उसकी बुद्धिमान और कोमल इच्छा से ठहराया जाता है जो हमारा पिता और हमारा मित्र है; हम गड़बड़ी के बीच में व्यवस्था देखते हैं; जहाँ दूसरों को केवल शून्य और खालीपन दिखाई देता है, वहाँ हम उद्देश्यों को पूरा होते देखते हैं। हम विश्वास करते हैं कि "वह बवंडर और आँधी में होकर चलता है, और बादल उसके पाँवों की धूल हैं।"
घर से आए दया के दान
जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारे प्रतिदिन के सब दया के दान स्वर्ग में रहनेवाले हमारे पिता के उपहार बनकर हमारे पास आते हैं, तो वे हमारे लिये दुगुने बहुमूल्य हो जाते हैं। पाठशाला के लड़के को कोई वस्तु उतनी मीठी नहीं लगती जितनी वह जो घर से आती है। मसीही के साथ भी ऐसा ही है। उसके सब दया के दान इसलिए और भी मीठे हैं क्योंकि वे घर से आए दया के दान हैं—वे "ऊपर ही से" आते हैं; जिस देश में वह रहता है वह मिस्र देश के समान नहीं है, जो किसी नदी से सींचा जाता है; परन्तु वह "आकाश की वर्षा के जल से सींचता है।" धन्य है उस मनुष्य का भाग जो इस प्रकार हर वस्तु को परमेश्वर की ओर से आई हुई जानकर ग्रहण करता है, और उस सबके लिये अपने पिता का धन्यवाद करता है! जब वह जानता है कि कोई वस्तु स्वर्ग से आई है, तो वह उसे मीठी लगती है। यह विचार हमें संसार के अत्यधिक प्रेम से बचाए रखने में भी सहायक होता है। भेदिए एशकोल को गए, और वहाँ से वहाँ उगनेवाली दाखों का एक बहुत बड़ा गुच्छा ले आए; परन्तु तुम यह नहीं पाते कि लोगों ने कहा हो, "प्रतिज्ञा के देश से जो फल हमें मिले हैं, वे हमें जंगल में ही रहने से सन्तुष्ट कर देते हैं।" नहीं; उन्होंने देखा कि दाखें कनान से आई थीं, और तब उन्होंने कहा, "हम अभी चढ़कर उस देश को अपना कर लें।" और इसी प्रकार, जब हमें भरपूर दया के दान मिलते हैं, यदि हम सोचें कि वे केवल इसी पृथ्वी की स्वाभाविक भूमि से आते हैं, तो हमारे मन में यहीं रह जाने की इच्छा उठना स्वाभाविक ही होगा। परन्तु यदि हम जानते हैं कि वे किसी परदेश से आते हैं, तो हम स्वभाव से ही वहाँ जाने को उत्सुक होते हैं
"जहाँ हमारा प्यारा प्रभु अपनी दाख की बारी सँभालता है, और सब गुच्छे फलते हैं।"हे मसीही, तो इस विचार में आनन्द कर कि जो कुछ तेरे पास है वह ऊपर से आता है; तेरी प्रतिदिन की रोटी तेरे परिश्रम से उतनी नहीं आती जितनी तेरे स्वर्गीय पिता की देखभाल से; तू हर एक दया के दान पर स्वर्ग की अपनी मुहर लगी देखता है, और हर एक आशीष तेरे पास उस सुगन्धित तेल, और जटामांसी, और हाथी दाँत के उन मन्दिरों के गन्धरस से महकती हुई उतरती है, जहाँ से परमेश्वर अपने दान बाँटता है।
बदलती दशाएँ
अपने आत्मिक जीवन में विश्वासी का अनुभव कितना विविध है! उसके प्राण के मौसम में कैसे-कैसे परिवर्तन होते हैं! कैसे उजले धूप भरे दिन! कैसी अन्धेरी, बादलों से घिरी रातें! कैसी शान्ति, मानो उसका जीवन काँच का समुद्र हो! कैसी भयानक परीक्षाएँ, मानो उसका जीवन तूफ़ानी महासागर हो! एक समय हम उसे पुकारते पाते हैं, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" और फिर तुरन्त वह गाता है, "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!" एक घड़ी हम उसे आह भरते सुनते हैं, "मैं बड़े दलदल में धँसा जाता हूँ, और मेरे पैर कहीं नहीं रुकते," और फिर हम उसे जयजयकार करते पाते हैं, "यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूँ? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किसका भय खाऊँ?" वह कितने अद्भुत रूप से स्वर्ग तक उठता है, और कितने भयानक रूप से गहराइयों में गोता लगाता है! निश्चय हम, जिन्होंने आत्मिक और भीतरी जीवन के विषय में कुछ भी जाना है, इस पर अचम्भा नहीं करते, क्योंकि हमने ये परिवर्तन स्वयं अनुभव किए हैं। हाय! उस उलझानेवाले पाप में, जो हमें इतनी सहजता से घेर लेता है, और उस अनुग्रह में, जो हमें स्वर्गीय स्थानों में राज्य करने देता है, कितना बड़ा अन्तर है। अविश्वास की उस दीन-हीन उदासी में, जो हमें मानो प्रचण्ड पूर्वी वायु से चकनाचूर कर देती है, और पवित्र भरोसे के उस आनन्द में, जो हमें अनुकूल हवा के समान स्वर्ग की ओर बढ़ा ले जाता है, कितना भेद है! आज परमेश्वर के साथ चलने, और कल कीचड़ में गिर पड़ने में; बीते कल पाप, मृत्यु और नरक पर जयवन्त होने, और आज शरीर और मन की लालसाओं के द्वारा बन्दी बना लिए जाने में कैसे-कैसे परिवर्तन हैं! सचमुच, हम स्वयं को नहीं समझ सकते, और जो वर्णन एक समय हम पर ठीक बैठता है, वह दूसरे समय बिलकुल मेल नहीं खाता। हमारा अनुभव सचमुच परिवर्तनशील है; परन्तु अहा, यह कैसी दया है कि मसीह नहीं बदलता! हमारा अनुभव चाहे कितना ही विविध हो, उसका अनुग्रह भी उसका सामना करने के लिये उतना ही विविध है, क्योंकि उसके पास हर आवश्यकता के समय हमारी सहायता करने को अनुग्रह है, और वह अनन्त और अचूक सद्भावना से हमें उतनी शक्ति देता है जितने हमारे दिन हैं।
अध्याय 14 पूरा हुआ
परमेश्वर का प्रबन्ध और देखभाल