अध्याय 5 · 39 मिनट का पठन
पाँचवीं पुस्तक
अध्याय 1
मेरी जीभ की सेवकाई से मेरे अंगीकारों का बलिदान ग्रहण कर, जिसे तू ने ही रचा और तेरे नाम का अंगीकार करने को उभारा है। तू मेरी सब हड्डियों को चंगा कर, और वे कहें, हे प्रभु, तेरे समान कौन है? क्योंकि जो तेरे सामने अंगीकार करता है, वह तुझे यह नहीं सिखाता कि उसके भीतर क्या हो रहा है; क्योंकि बन्द हृदय भी तेरी दृष्टि से नहीं छिपता, और न मनुष्य की कठोरता तेरे हाथ को पीछे धकेल सकती है: क्योंकि तू अपनी इच्छा से, दया में या दण्ड में, उसे पिघला देता है, और तेरी तपन से कुछ भी छिप नहीं सकता। परन्तु मेरा प्राण तेरी स्तुति करे, कि वह तुझ से प्रेम रखे; और वह तेरी ही दयाओं का अंगीकार तेरे सामने करे, कि वह तेरी स्तुति करे। तेरी सारी सृष्टि तेरी स्तुति करना नहीं छोड़ती, और न चुप रहती है; न वह मनुष्य की आत्मा जो अपना स्वर तेरी ओर लगाती है, और न वह सृष्टि, चाहे सजीव हो या निर्जीव, उन लोगों के स्वर द्वारा जो उस पर मनन करते हैं: कि इस प्रकार हमारे प्राण अपनी थकान से उठकर तेरी ओर बढ़ें, उन वस्तुओं का सहारा लेते हुए जिन्हें तू ने रचा है, और तुझ तक पहुँचते हुए, जिस ने उन्हें अद्भुत रीति से बनाया; और वहीं विश्राम और सच्चा बल है।
अध्याय 2
बेचैन और भक्तिहीन लोग तुझ से दूर हटें और भाग जाएँ; फिर भी तू उन्हें देखता है, और अंधकार को विभाजित करता है। और देख, उनके रहते हुए भी यह विश्व सुन्दर है, यद्यपि वे स्वयं मलिन हैं। और उन्होंने तेरा क्या बिगाड़ा है? अथवा उन्होंने तेरे उस शासन को कैसे कलंकित किया, जो स्वर्ग से लेकर इस निम्नतम पृथ्वी तक न्यायपूर्ण और सिद्ध है? क्योंकि जब वे तेरी उपस्थिति से भागे, तो कहाँ भागे? अथवा कहाँ है जहाँ तू उन्हें न पाए? परन्तु वे इसलिए भागे कि तुझे उन्हें देखते हुए न देखें, और अंधे होकर तुझ से टकराएँ (क्योंकि तू अपनी बनाई हुई किसी वस्तु को नहीं त्यागता); अर्थात् मैं कहता हूँ, कि अन्यायी तुझ से टकराएँ, और न्यायसंगत रीति से चोट खाएँ; अपने आप को तेरी कोमलता से खींच लेते हुए, और तेरी सिधाई से ठोकर खाते हुए, और अपनी ही कठोरता पर गिरते हुए। वे सचमुच नहीं जानते कि तू सर्वत्र है, जिसे कोई स्थान समा नहीं सकता! और केवल तू ही निकट है, उनके लिए भी जो तुझ से दूर चले जाते हैं। इसलिए वे फिरें, और तुझे ढूँढ़ें; क्योंकि जैसे उन्होंने अपने सृजनहार को त्यागा, वैसे तू ने अपनी सृष्टि को नहीं त्यागा है। वे फिरें और तुझे ढूँढ़ें; और देख, तू वहीं उनके हृदय में है, उनके हृदय में जो तेरे सामने अंगीकार करते हैं, और अपने आप को तुझ पर डाल देते हैं, और अपनी सारी कठोर चालों के बाद तेरी गोद में रोते हैं। तब तू कोमलता से उनके आँसू पोंछता है, और वे और भी रोते हैं, और रोने में आनन्दित होते हैं; इसलिए कि तू, हे प्रभु,—न कोई हाड़-माँस का मनुष्य, वरन्—तू, हे प्रभु, जिस ने उन्हें बनाया, फिर से बनाता और शान्ति देता है। परन्तु जब मैं तुझे ढूँढ़ रहा था, तब मैं कहाँ था? और तू मेरे सामने था, परन्तु मैं तुझ से दूर चला गया था; और मैंने तो अपने आप को भी न पाया, फिर तुझे कहाँ से पाता!
अध्याय 3
मैं अपने परमेश्वर के सामने अपनी आयु का वह उनतीसवाँ वर्ष खोलकर रखना चाहता हूँ। उस समय कार्थेज में मानी-पंथियों का एक बिशप आया था, जिसका नाम फौस्तुस था, जो शैतान का एक बड़ा फंदा था, और बहुत लोग उसकी चिकनी-चुपड़ी भाषा के आकर्षण से उसमें फँस गए थे: यद्यपि मैं उसकी वाक्पटुता की प्रशंसा करता था, तौभी उसे मैं उन बातों की सच्चाई से अलग कर सकता था जिन्हें सीखने का मुझे बड़ा चाव था: और मैं वाक्-कला की सेवा को उतना महत्व नहीं देता था जितना उस विद्या को, जिसे यह फौस्तुस, जिसकी उनके बीच इतनी प्रशंसा थी, मेरे सामने भोजन के रूप में रखता था। ख्याति ने पहले ही उसके विषय में यह कहा था कि वह सब मूल्यवान विद्या में अत्यन्त निपुण है, और उदार शास्त्रों में उत्तम रीति से कुशल है। और चूँकि मैंने दार्शनिकों की बहुत सी बातें पढ़ी और भली भाँति स्मरण रखी थीं, इसलिए मैंने उनकी कुछ बातों की तुलना मानी-पंथियों की उन लम्बी दन्तकथाओं से की, और पहली को अधिक विश्वसनीय पाया; यद्यपि वे केवल इस निचले संसार का ही निर्णय कर सकने तक प्रबल थे, परन्तु इसके प्रभु को वे किसी भी रीति से न ढूँढ़ सके। क्योंकि हे प्रभु, तू महान् है, और दीनों की ओर दृष्टि करता है, परन्तु घमण्डियों को तू दूर ही से देखता है। और तू निकट नहीं आता, केवल उन्हीं के जिनका हृदय टूटा हुआ है, और न घमण्डियों से पाया जाता है, नहीं, चाहे वे अनोखे कौशल से तारों और बालू को गिन सकें, और तारों भरे आकाश को माप सकें, और ग्रहों की चालों का पता लगा सकें।
क्योंकि उस समझ और बुद्धि से, जो तू ने उन्हें दी है, वे इन बातों को खोज निकालते हैं; और उन्होंने बहुत कुछ खोज लिया है; और उन्होंने बहुत वर्ष पहले उन ज्योतियों, अर्थात् सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहणों की भविष्यवाणी की,—कि किस दिन और किस घड़ी, और कितने अंश,—और उनकी गणना विफल न हुई; और जैसा उन्होंने कहा था वैसा ही हुआ; और जो नियम उन्होंने खोजे थे उन्हें उन्होंने लिख रखा, और वे आज तक पढ़े जाते हैं, और उनके आधार पर दूसरे यह बता देते हैं कि किस वर्ष और वर्ष के किस महीने, और महीने के किस दिन, और दिन की किस घड़ी में, और उसके प्रकाश का कितना भाग, चन्द्रमा या सूर्य ग्रस्त होगा, और जैसा पहले से बताया जाता है वैसा ही होता है। इन बातों को देखकर वे मनुष्य, जो इस विद्या को नहीं जानते, चकित होकर विस्मित होते हैं, और जो इसे जानते हैं वे फूलकर घमण्ड करते हैं; और एक अभक्त घमण्ड के कारण तुझ से दूर हटकर, और तेरी ज्योति से चूककर, वे सूर्य के प्रकाश के लोप की भविष्यवाणी तो इतने पहले कर लेते हैं, जो होकर रहेगा, परन्तु अपने ही उस लोप को नहीं देखते, जो अभी है। क्योंकि वे भक्ति से यह नहीं खोजते कि जिस बुद्धि से वे इसे खोजते हैं, वह उन्हें कहाँ से मिली। और यह पाकर कि तू ने उन्हें बनाया, वे न तो अपने आप को तुझे सौंप देते हैं कि तू जो कुछ बनाए उसे तू ही बनाए रखे, और न जो कुछ उन्होंने आप बनाया है उसका तेरे लिए बलिदान करते हैं; और न अपनी ऊँची उड़ान भरनेवाली कल्पनाओं को आकाश के पक्षियों के समान मारते हैं, और न अपनी गहरे में गोता लगानेवाली उत्सुकताओं को (जिनके द्वारा वे समुद्र की मछलियों के समान गहिराई के अनजाने मार्गों पर भटकते हैं), और न अपने भोग-विलास को मैदान के पशुओं के समान, कि तू, हे प्रभु, जो भस्म करनेवाली आग है, उनकी उन मरी हुई चिन्ताओं को जला दे, और उन्हें अमर रीति से फिर रचे।
परन्तु वे उस मार्ग को, अर्थात् तेरे वचन को नहीं जानते थे, जिसके द्वारा तू ने उन वस्तुओं को बनाया जिन्हें वे गिनते हैं, और उन्हें भी जो गिनते हैं, और उस इन्द्रिय को जिसके द्वारा वे जो गिनते हैं उसे बूझते हैं, और उस समझ को, जिसमें से वे गिनते हैं; अथवा यह कि तेरी बुद्धि की कोई गिनती नहीं। परन्तु वह एकलौता स्वयं हमारे लिए ज्ञान, और धार्मिकता, और पवित्रीकरण ठहरा, और हमारे बीच गिना गया, और उसने कैसर को कर दिया। वे इस मार्ग को नहीं जानते थे जिसके द्वारा वे अपने आप से उतरकर उसके पास आएँ, और उसके द्वारा उस तक चढ़ें। वे इस मार्ग को नहीं जानते थे, और अपने आप को तारों के बीच ऊँचा उठा हुआ और चमकता हुआ समझते थे; और देख, वे पृथ्वी पर गिर पड़े, और उनका मूर्ख हृदय अंधकारमय हो गया। वे सृजी हुई वस्तु के विषय में बहुत सी बातें सच्चाई से कहते हैं; परन्तु सत्य को, जो सृष्टि का रचयिता है, वे भक्ति से नहीं ढूँढ़ते, और इसलिए उसे नहीं पाते; अथवा यदि वे उसे पा भी लें, तो उसे परमेश्वर जानकर भी उसकी परमेश्वर के समान महिमा नहीं करते, और न धन्यवाद देते हैं, वरन् अपनी कल्पनाओं में व्यर्थ बन जाते हैं, और अपने आप को बुद्धिमान बताते हैं, और जो तेरा है उसका श्रेय अपने आप को देते हैं; और इस प्रकार अत्यन्त उलटी अंधता के साथ, वे जो अपना है उसे तेरे मत्थे मढ़ने की चेष्टा करते हैं, तेरे विषय में, जो सत्य है, झूठ गढ़ते हुए, और अविनाशी परमेश्वर की महिमा को नाशवान मनुष्य, और पक्षियों, और चौपायों, और रेंगनेवाले जन्तुओं की प्रतिमा में बदलते हुए, तेरे सत्य को झूठ से बदलते हुए, और सृष्टि की उपासना और सेवा सृजनहार से बढ़कर करते हुए।
तौभी सृजी हुई वस्तु के विषय में बहुत सी सच्चाइयाँ मैंने इन मनुष्यों से ग्रहण कीं, और गणनाओं, समयों के क्रम, और तारों की दृश्य गवाहियों से उनका कारण भी देखा; और मैंने उनकी तुलना मानीकियस की उस उक्ति से की, जिसे उसने अपने उन्माद में इन विषयों पर बहुत विस्तार से लिखा था; परन्तु मुझे न तो अयनांतों, न विषुवों, न बड़ी ज्योतियों के ग्रहणों का, और न इस प्रकार की जो कुछ बातें मैंने लौकिक दर्शन की पुस्तकों में सीखी थीं, उनका कोई विवरण मिला। परन्तु मुझे विश्वास करने की आज्ञा दी गई थी; और तौभी वह उससे मेल न खाता था जो गणनाओं और मेरी अपनी आँखों से स्थापित हो चुका था, वरन् बिलकुल विपरीत था।
अध्याय 4
तो हे सत्य के प्रभु परमेश्वर, क्या जो इन बातों को जानता है, वह इसी कारण तुझे भाता है? निश्चय ही अभागा है वह जो इन सब को जानता है, और तुझे नहीं जानता: परन्तु धन्य है वह जो तुझे जानता है, चाहे इन बातों को न जाने। और जो तुझे और इन दोनों को जानता है, वह इनके कारण अधिक धन्य नहीं, वरन् केवल तेरे ही कारण, यदि तुझे जानकर वह तेरी परमेश्वर के समान महिमा करे, और धन्यवाद दे, और अपनी कल्पनाओं में व्यर्थ न बने। क्योंकि जैसे वह मनुष्य अधिक भला है जो किसी वृक्ष का स्वामी होना जानता है, और उसके उपयोग के लिए तुझे धन्यवाद देता है, यद्यपि वह न जानता हो कि वह कितने हाथ ऊँचा है, या कितना चौड़ा फैला है, उस मनुष्य से जो उसे माप सकता है, और उसकी सब डालियाँ गिन सकता है, परन्तु न तो उसका स्वामी है, और न उसके सृजनहार को जानता या उससे प्रेम रखता है: वैसे ही वह विश्वासी, जिसका यह सारा धन-संसार है, और जो कुछ न रखते हुए भी सब कुछ रखता है, तुझ से लिपटे रहने के द्वारा, जिसकी सब वस्तुएँ सेवा करती हैं, चाहे वह सप्तर्षि तारामंडल के चक्रों तक को न जानता हो, तौभी इसमें सन्देह करना मूर्खता है कि वह उस मनुष्य से उत्तम दशा में है जो आकाशों को माप सकता है, और तारों को गिन सकता है, और तत्वों को तौल सकता है, फिर भी तेरी उपेक्षा करता है, जिस ने सब वस्तुओं को गिनती, तौल, और माप से बनाया है।
अध्याय 5
परन्तु फिर किस ने उस मानीकियस को इन बातों पर भी लिखने को कहा, जिनमें कुशलता भक्ति का कोई अंग न थी? क्योंकि तू ने मनुष्य से कहा है, देख, भक्ति और बुद्धि यही है; जिनसे वह अनजान रह सकता था, चाहे इन बातों का उसे पूरा ज्ञान होता; परन्तु ये बातें, चूँकि इन्हें न जानते हुए भी उसने बड़ी ढिठाई से सिखाने का साहस किया, इसलिए स्पष्ट है कि उसे भक्ति का कोई ज्ञान नहीं हो सकता था। क्योंकि इन सांसारिक बातों की जानकारी होने पर भी उनका बखान करना व्यर्थता है; परन्तु तेरे सामने अंगीकार करना भक्ति है। इसी कारण यह भटका हुआ मनुष्य इन बातों की बहुत चर्चा करता था, कि जो लोग इन्हें सचमुच सीख चुके थे उनके द्वारा दोषी ठहराए जाने पर, यह प्रकट हो जाए कि उन दूसरी और भी गूढ़ बातों में उसकी कैसी समझ थी। क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके विषय में तुच्छ विचार किया जाए, वरन् वह मनुष्यों को यह समझाने में लगा रहता था, “कि पवित्र आत्मा, जो तेरे विश्वासयोग्य लोगों का शान्तिदाता और समृद्ध करनेवाला है, पूर्ण अधिकार के साथ स्वयं उसके भीतर वास करता है।” तब जब वह स्वर्ग और तारों के विषय में, और सूर्य और चन्द्रमा की गतियों के विषय में झूठी शिक्षा देते हुए पकड़ा गया (यद्यपि ये बातें धर्म के सिद्धान्त से सम्बन्ध नहीं रखतीं), तौभी उसका यह अपवित्र दुस्साहस भली भाँति प्रकट हो जाता, क्योंकि उसने ऐसी बातें कहीं जिन्हें न केवल वह जानता ही न था, वरन् जो झूठी भी थीं, और वह भी घमण्ड की ऐसी उन्मत्त व्यर्थता के साथ, कि उसने उन्हें अपने ही ऊपर, मानो किसी दिव्य पुरुष के ऊपर, थोपने का यत्न किया।
क्योंकि जब मैं किसी मसीही भाई को इन बातों से अनजान और इनके विषय में भूल में पड़ा हुआ सुनता हूँ, तो मैं ऐसे मनुष्य को उसका मत थामे हुए धीरज से देख सकता हूँ; और मैं यह नहीं समझता कि शारीरिक सृष्टि की स्थिति या स्वभाव के विषय में कोई अज्ञानता उसे कोई हानि पहुँचा सकती है, जब तक कि वह तेरे विषय में, हे प्रभु, सब के सृजनहार, कोई अयोग्य बात न मानता हो। परन्तु यह उसे हानि अवश्य पहुँचाती है, यदि वह इसे भक्ति के सिद्धान्त के स्वरूप का अंग समझ बैठे, और फिर भी जिस बात से वह अनजान है उसी को बड़ी हठ के साथ दृढ़ करता रहे। और तौभी विश्वास के आरम्भिक बचपन में ऐसी दुर्बलता को भी हमारी माता प्रेम सहती है, जब तक कि वह नवजात बढ़कर सिद्ध मनुष्य न हो जाए, कि वह उपदेश की हर बयार से इधर-उधर न बहाया जाए। परन्तु जो इस रीति से इतनों का शिक्षक, स्रोत, अगुआ और प्रधान होने का दावा करता था, जिन्हें वह यह समझाने में सफल हो सकता था कि जो उसके पीछे चले वह किसी मात्र मनुष्य के नहीं, वरन् तेरे पवित्र आत्मा के पीछे चलता है; ऐसे में कौन यह न ठहराएगा कि इतना बड़ा उन्माद, एक बार झूठी बात सिखाते हुए पकड़े जाने पर, घृणा के योग्य है और सर्वथा त्याग देने योग्य? परन्तु मैंने अब तक स्पष्ट रीति से यह निश्चित न किया था कि क्या बड़े और छोटे होते हुए दिनों और रातों के, और दिन-रात के ही उलट-फेर, और बड़ी ज्योतियों के ग्रहणों, और इस प्रकार की और जो कुछ मैंने दूसरी पुस्तकों में पढ़ा था, उसकी व्याख्या उसके कथनों के अनुरूप की जा सकती है या नहीं; कि यदि किसी रीति से की जा सके, तो भी मेरे लिए यह प्रश्न बना ही रहे कि वह ऐसा है या नहीं; परन्तु मैं उसकी प्रसिद्ध पवित्रता के कारण अपने विश्वास को उसके अधिकार पर टिका सकूँ।
अध्याय 6
और उन लगभग सारे नौ वर्षों में, जिनमें मैं डाँवाडोल मन से उनका चेला रहा था, मैं इस फौस्तुस के आने की बहुत ही तीव्रता से लालसा करता रहा था। क्योंकि उस पंथ के बाकी लोग, जिन पर मैं संयोग से जा पड़ा था, जब इन बातों के विषय में मेरी आपत्तियों को हल न कर पाते, तब भी वे मेरे सामने इस फौस्तुस के आने की आशा बँधाते रहते, जिससे भेंट करने पर ये और इनसे बड़ी कठिनाइयाँ भी, यदि मेरे पास हों, अत्यन्त सहजता और भरपूरी से दूर कर दी जातीं। तब जब वह आया, तो मैंने उसे मनभावने वचनों का मनुष्य पाया, जो धाराप्रवाह और उत्तम शब्दों में बोल सकता था, फिर भी वही बातें जो वे कहा करते थे। परन्तु किसी अधिक बहुमूल्य घूँट के लिए मेरी प्यास के लिए पिलानेवाले की अत्यधिक सुघरता से क्या लाभ? मेरे कान तो ऐसी ही बातों से पहले ही ऊब चुके थे, और वे मुझे इसलिए उत्तम न जान पड़ीं कि उत्तम रीति से कही गईं; और न इसलिए सच्ची कि वाक्पटुता से कही गईं; और न इसलिए आत्मा बुद्धिमान कि मुख सुन्दर था, और भाषा मनोहर। परन्तु जो लोग उसे मेरे सामने बढ़ा-चढ़ाकर रखते थे, वे बातों के अच्छे परखनेवाले न थे; और इसीलिए उन्हें वह समझदार और बुद्धिमान जान पड़ता था, क्योंकि उसके शब्द मनभावने थे। तौभी मुझे यह जान पड़ा कि एक और प्रकार के लोग सत्य पर भी सन्देह करते हैं, और यदि वह चिकनी और भरपूर वाणी में प्रस्तुत किया जाए तो उसे मानने से इनकार कर देते हैं। परन्तु तू, हे मेरे परमेश्वर, ने मुझे पहले ही अद्भुत और गुप्त रीतियों से सिखा दिया था, और इसलिए मैं विश्वास करता हूँ कि तू ने ही मुझे सिखाया, क्योंकि वह सत्य है, और तेरे सिवा सत्य का और कोई शिक्षक नहीं, चाहे वह कहीं से या किसी भी ओर से हम पर चमके। इसलिए तुझ से ही अब मैंने यह सीखा था, कि न तो किसी बात को इसलिए सच्ची कही गई समझना चाहिए, क्योंकि वह वाक्पटुता से कही गई; और न इसलिए झूठी, क्योंकि होंठों का उच्चारण बेसुरा है; और न फिर इसलिए सच्ची, क्योंकि वह भद्दी रीति से कही गई; और न इसलिए झूठी, क्योंकि भाषा समृद्ध है; वरन् यह कि बुद्धि और मूर्खता हितकारी और अहितकारी भोजन के समान हैं; और सजे या बिना सजे वचन दरबारी या देहाती बरतनों के समान हैं: दोनों प्रकार के भोजन दोनों प्रकार के बरतनों में परोसे जा सकते हैं।
तब वह लालच, जिससे मैं इतने लम्बे समय से उस मनुष्य की बाट जोहता रहा था, वाद-विवाद करते समय उसकी भाव-भंगिमा और उमंग से, और अपने विचारों को शब्दों का वस्त्र पहनाने की उसकी शब्द-चयन और तत्परता से, सचमुच प्रसन्न हुआ। तब मैं प्रसन्न था, और बहुतों के साथ, वरन् उनसे भी बढ़कर, मैंने उसकी प्रशंसा और बड़ाई की। तौभी मुझे यह खलता था कि उसके श्रोताओं की सभा में मुझे यह अनुमति न थी कि जो प्रश्न मुझे व्याकुल करते थे उन्हें उससे घनिष्ठ बातचीत में रखूँ और कहूँ। और जब मुझे यह अवसर मिला, और मैंने अपने मित्रों के साथ ऐसे समयों में उसके कान लगाना आरम्भ किया जब उसके लिए मुझ से चर्चा करना अशोभनीय न था, और ऐसी बातें सामने रखीं जो मुझे उद्वेलित करती थीं; तब मैंने उसे पहले तो व्याकरण को छोड़ उदार शास्त्रों से सर्वथा अनजान पाया, और वह भी केवल साधारण रीति से। परन्तु इसलिए कि उसने टुल्ली के कुछ भाषण, सेनेका की बहुत थोड़ी पुस्तकें, कवियों की कुछ बातें, और अपने ही पंथ की वे थोड़ी सी पुस्तकें पढ़ी थीं जो लैटिन में और सुघर रीति से लिखी थीं, और वह प्रतिदिन बोलने का अभ्यास करता था, इसलिए उसने एक प्रकार की वाक्पटुता पा ली थी, जो इसलिए और भी मनभावनी और लुभानेवाली सिद्ध हुई कि वह एक अच्छी बुद्धि की अगुवाई में थी, और एक प्रकार की स्वाभाविक मनोहरता से युक्त। हे मेरे प्रभु परमेश्वर, मेरे विवेक के न्यायी, जैसा मुझे स्मरण है, क्या यह ऐसा ही नहीं है? तेरे सामने मेरा हृदय और मेरी स्मृति है, तू ने ही उस समय अपने प्रबन्ध के गुप्त भेद से मेरी अगुवाई की, और मेरी उन लज्जाजनक भूलों को मेरे मुख के सामने रखा, कि मैं उन्हें देखूँ और उनसे घृणा करूँ।
अध्याय 7
क्योंकि जब यह स्पष्ट हो गया कि जिन कलाओं में मैं उसे निपुण समझता था उनसे वह अनजान है, तब मैं यह आशा छोड़ने लगा कि वह मेरी उलझानेवाली कठिनाइयों को खोलेगा और सुलझाएगा (जिनसे चाहे वह कितना ही अनजान होता, तौभी वह भक्ति की सच्चाइयों को थामे रह सकता था, यदि वह मानी-पंथी न होता)। क्योंकि उनकी पुस्तकें स्वर्ग, और तारों, सूर्य, और चन्द्रमा की लम्बी-लम्बी दन्तकथाओं से भरी हैं, और अब मैं उसे इस योग्य नहीं समझता था कि जो मैं बहुत चाहता था उसका सन्तोषजनक निर्णय कर सके, अर्थात् क्या इन बातों की, अन्यत्र पढ़ी हुई गणनाओं से तुलना करने पर, मानीकियस की पुस्तकों में दिया हुआ विवरण अधिक अच्छा है, या कम से कम उतना ही अच्छा। और जब मैंने इस पर विचार और चर्चा करने का प्रस्ताव रखा, तो उसने, यहाँ तक विनम्रता से, इस बोझ से हाथ खींच लिया। क्योंकि वह जानता था कि वह इन बातों को नहीं जानता, और उसे इसे स्वीकार करने में लज्जा न आई। क्योंकि वह उन बकवादी लोगों में से न था, जिनमें से बहुतों को मैंने सहा था, जो मुझे ये बातें सिखाने का बीड़ा उठाते थे, पर कुछ भी न कहते थे। परन्तु इस मनुष्य के पास हृदय था, यद्यपि तेरी ओर सीधा न था, तौभी अपने प्रति सर्वथा विश्वासघाती भी न था। क्योंकि वह अपनी अज्ञानता से सर्वथा अनजान न था, और न वह हड़बड़ी में किसी ऐसे वाद-विवाद में उलझता, जहाँ से वह न तो पीछे हट सकता और न भली भाँति अपने आप को छुड़ा सकता। इसी कारण मुझे वह और भी भला लगा। क्योंकि एक निष्कपट मन की विनम्रता उन बातों के ज्ञान से अधिक सुन्दर है जिन्हें मैं चाहता था; और ऐसा ही मैंने उसे उन सब कठिन और सूक्ष्म प्रश्नों में पाया।
इस प्रकार मानीकियस के लेखों के प्रति मेरा उत्साह कुण्ठित हो गया, और उनके दूसरे शिक्षकों से मैं और भी अधिक निराश हो गया, यह देखकर कि जिन अनेक बातों ने मुझे उलझाया था, उनमें वह, जो उनके बीच इतना प्रसिद्ध था, ऐसा निकला; तब मैंने उसके साथ उस साहित्य के अध्ययन में जुटना आरम्भ किया, जिस पर वह भी बहुत लगा हुआ था (और जिसे अलंकार-शास्त्र के व्याख्याता के रूप में मैं उस समय कार्थेज में युवा विद्यार्थियों को पढ़ा रहा था), और उसके साथ या तो वही पढ़ना जो वह सुनना चाहता था, या ऐसा जिसे मैं उसकी प्रतिभा के योग्य समझता था। परन्तु मेरे वे सारे प्रयत्न, जिनके द्वारा मैंने उस पंथ में आगे बढ़ने का निश्चय किया था, उस मनुष्य को जान लेने पर सर्वथा समाप्त हो गए; ऐसा नहीं कि मैंने अपने आप को उनसे बिलकुल अलग कर लिया, वरन् कुछ भी उससे उत्तम न पाकर, मैंने ठान लिया कि जब तक संयोग से कोई अधिक योग्य बात मुझ पर न उदय हो, तब तक जो कुछ मुझे किसी भी रीति से मिल गया है उसी में सन्तुष्ट रहूँ। इस प्रकार वह फौस्तुस, जो इतनों के लिए मृत्यु का फंदा था, अब न चाहते और न जानते हुए, उस बन्धन को ढीला करने लगा जिसमें मैं फँसा था। क्योंकि तेरे हाथों ने, हे मेरे परमेश्वर, तेरे प्रबन्ध के गुप्त प्रयोजन में, मेरे प्राण को न त्यागा; और मेरी माता के हृदय के लहू में से, उसके दिन-रात बहाए हुए आँसुओं के द्वारा, मेरे लिए तेरे सामने एक बलिदान चढ़ाया गया; और तू ने मेरे साथ अद्भुत रीतियों से व्यवहार किया। तू ने ही यह किया, हे मेरे परमेश्वर: क्योंकि मनुष्य के पग प्रभु की ओर से स्थिर किए जाते हैं, और वही उसका मार्ग ठीक करेगा। अथवा हमें उद्धार कहाँ से मिलेगा, केवल तेरे हाथ से, जो अपने बनाए हुए को फिर बनाता है?
अध्याय 8
तू ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया कि मैं रोम जाने को मना लिया गया, और वहाँ वही पढ़ाने को जो मैं कार्थेज में पढ़ा रहा था। और मैं इसके लिए कैसे मनाया गया, इसका अंगीकार तेरे सामने करने में मैं चूकूँगा नहीं; क्योंकि इसमें भी तेरी बुद्धि के गहरे से गहरे कोने, और हम पर तेरी सदा उपस्थित दया, पर विचार करना और अंगीकार करना चाहिए। इसलिए मैं रोम जाना इसलिए नहीं चाहता था कि जिन मित्रों ने मुझे इसके लिए मनाया उन्होंने मुझे अधिक लाभ और अधिक प्रतिष्ठा का भरोसा दिलाया था (यद्यपि उस समय इन बातों का भी मेरे मन पर प्रभाव था), वरन् मेरा प्रमुख और लगभग एकमात्र कारण यह था कि मैंने सुना था कि वहाँ युवक अधिक शान्ति से पढ़ते हैं, और अधिक नियमित अनुशासन के अंकुश में शान्त रखे जाते हैं; कि वे अपनी मनमानी से किसी ऐसे के विद्यालय में उद्दण्डता से न घुस पड़ें जिसके वे शिष्य नहीं हैं, और न बिना उसकी अनुमति के भीतर आने पाते हैं। जबकि कार्थेज में विद्यार्थियों के बीच एक अत्यन्त लज्जाजनक और उच्छृंखल स्वच्छन्दता का राज्य है। वे ढिठाई से घुस पड़ते हैं, और लगभग उन्मत्त भाव-भंगिमाओं के साथ, हर उस व्यवस्था को बिगाड़ देते हैं जिसे किसी ने अपने विद्यार्थियों के भले के लिए स्थापित किया हो। वे अनेक अत्याचार करते हैं, अद्भुत निर्लज्जता के साथ, जो व्यवस्था के अनुसार दण्डनीय हैं, यदि प्रथा उन्हें आश्रय न देती; वही प्रथा उन्हें और भी अभागा प्रकट करती है, इसमें कि वे अब उसे व्यवस्थित समझकर करते हैं जो तेरी अनन्त व्यवस्था के अनुसार कभी व्यवस्थित न होगा; और वे समझते हैं कि वे इसे बिना दण्ड के करते हैं, जबकि वे उसी अंधता से दण्डित होते हैं जिससे वे इसे करते हैं, और जो कुछ वे करते हैं उससे अतुलनीय रीति से बुरा भोगते हैं। तब जो चालचलन मैं विद्यार्थी होते हुए अपनाना न चाहता था, उसे शिक्षक होकर मुझे दूसरों में सहना पड़ा: और इसलिए मैं वहाँ जाने से भला प्रसन्न हुआ, जहाँ, जितने इसे जानते थे, सब ने मुझे विश्वास दिलाया कि ऐसा नहीं होता। परन्तु तू, जो जीवितों के देश में मेरा शरणस्थान और मेरा भाग है; कि मैं अपने प्राण के उद्धार के लिए अपना पार्थिव निवास बदलूँ, तू ने कार्थेज में मुझे कुरेदा, कि मैं उससे उखाड़ लिया जाऊँ; और रोम में मेरे सामने ललचानेवाली वस्तुएँ रखीं, जिनके द्वारा मैं वहाँ खिंच जाऊँ, ऐसे मनुष्यों के हाथ जो एक मरते हुए जीवन से प्रेम करते थे, जिनमें से एक उन्मत्त काम कर रहे थे, और दूसरे व्यर्थ वस्तुओं का वचन दे रहे थे; और मेरे पगों को सुधारने के लिए तू ने गुप्त रीति से उनकी और मेरी अपनी टेढ़ाई को काम में लाया। क्योंकि जो मेरी शान्ति को भंग करते थे वे भी एक लज्जाजनक उन्माद से अंधे थे, और जो मुझे अन्यत्र बुलाते थे वे भी पृथ्वी की महक रखते थे। और मैं, जो यहाँ सच्ची दुर्दशा से घृणा करता था, वहाँ झूठे सुख की खोज में था।
परन्तु मैं यहाँ से क्यों गया, और वहाँ क्यों गया, यह तू जानता था, हे परमेश्वर, तौभी तू ने न मुझे यह दिखाया, न मेरी माता को, जो मेरी यात्रा पर बड़ा विलाप करती थी, और समुद्र तक मेरे पीछे-पीछे आई। परन्तु मैंने उसे धोखा दिया, जब वह मुझे बलपूर्वक पकड़े हुए थी, कि या तो वह मुझे रोक ले या मेरे साथ चले, और मैंने बहाना बनाया कि मेरा एक मित्र है जिसे मैं तब तक नहीं छोड़ सकता जब तक उसे जहाज खेने के लिए अनुकूल वायु न मिल जाए। और मैंने अपनी माता से, और ऐसी माता से, झूठ बोला, और भाग निकला: क्योंकि यह भी तू ने दया करके मुझे क्षमा कर दिया, और मुझे, जो ऐसे घिनौने मैल से भरा था, समुद्र के जल से बचाकर, अपने अनुग्रह के जल के लिए रख छोड़ा; जिससे जब मैं शुद्ध किया गया, तो मेरी माता की आँखों की वे धाराएँ सुखा दी जाएँ, जिनसे वह मेरे लिए प्रतिदिन अपने मुख के नीचे की भूमि को सींचती थी। और तौभी मेरे बिना लौटने से इनकार करते हुए, मैंने बड़ी कठिनाई से उसे उस रात हमारे जहाज के पास एक स्थान में ठहरने के लिए मनाया, जहाँ धन्य किप्रियन की स्मृति में एक प्रार्थना-गृह था। उस रात मैं चुपके से चल दिया, परन्तु वह रोने और प्रार्थना करने में पीछे न रही। और हे प्रभु, वह इतने आँसुओं के साथ तुझ से क्या माँग रही थी, केवल यही कि तू मुझे जहाज पर न जाने दे? परन्तु तू ने, अपनी युक्तियों की गहराई में, और उसकी अभिलाषा के मुख्य बिन्दु को सुनकर, उस पर ध्यान न दिया जो उसने तब माँगा, कि तू मुझे वही बना दे जो वह सदा माँगती रही। वायु चली और हमारी पालों को फुला दिया, और तट को हमारी दृष्टि से हटा दिया; और वह दूसरे दिन वहाँ, शोक से व्याकुल, अपनी शिकायतों और कराहों से तेरे कानों को भरती रही, जिन पर तू ने तब ध्यान न दिया; जबकि मेरी अभिलाषाओं के द्वारा तू मुझे सारी अभिलाषा का अन्त करने की ओर शीघ्रता से ले जा रहा था, और मुझ पर उसके स्नेह का पार्थिव भाग शोकों के ठहराए हुए कोड़े से ताड़ना पा रहा था। क्योंकि वह मेरे अपने साथ रहने से प्रेम करती थी, जैसे माताएँ करती हैं, परन्तु बहुतों से कहीं बढ़कर; और वह न जानती थी कि तू मेरी अनुपस्थिति में से उसके लिए कैसा बड़ा आनन्द उत्पन्न करने पर था। वह न जानती थी; इसलिए वह रोती और विलाप करती थी, और इस वेदना से उसमें हव्वा का वह भाग प्रकट हुआ, जो शोक में उसे ढूँढ़ती है जिसे उसने शोक में जन्म दिया था। और तौभी, मेरे विश्वासघात और कठोरहृदयता पर दोष लगाने के बाद, वह फिर से मेरे लिए तेरे सामने मध्यस्थता करने में लग गई, अपने नियत स्थान को चली गई, और मैं रोम को।
अध्याय 9
और देख, वहाँ मैं शारीरिक रोग के कोड़े से पकड़ा गया, और मैं अधोलोक की ओर उतर रहा था, अपने किए हुए उन सब पापों को लिए हुए, जो मैंने तेरे विरुद्ध, और अपने और औरों के विरुद्ध किए थे, जो बहुत और भारी थे, और उस मूल पाप के बन्धन के ऊपर, जिसके कारण हम सब आदम में मरते हैं। क्योंकि तू ने इनमें से कोई भी बात मसीह में मुझे क्षमा न की थी, और न उसने अपने क्रूस के द्वारा उस बैर को मिटाया था, जो मैंने अपने पापों के कारण तेरे साथ मोल लिया था। क्योंकि वह उसे कैसे मिटाता, एक ऐसे छायाभास के क्रूस पर चढ़ने के द्वारा, जिसे मैं उसे मानता था? इसलिए मेरे प्राण की मृत्यु उतनी ही सच्ची थी, जितनी उसके शरीर की मृत्यु मुझे झूठी जान पड़ती थी; और जितनी सच्ची उसके शरीर की मृत्यु थी, उतनी ही झूठी मेरे प्राण का वह जीवन था, जो उस पर विश्वास न करता था। और अब ज्वर के बढ़ते जाने पर, मैं सदा के लिए विदा हो रहा और चला जा रहा था। क्योंकि यदि मैं तब यहाँ से विदा हो जाता, तो कहाँ जाता, केवल आग और यातनाओं में, जैसी तेरी नियुक्ति के सत्य में मेरे कुकर्म योग्य थे? और यह वह न जानती थी, तौभी दूर रहते हुए मेरे लिए प्रार्थना करती थी। परन्तु तू ने, जो सर्वत्र उपस्थित है, उसे जहाँ वह थी वहीं सुना, और जहाँ मैं था वहाँ मुझ पर तरस खाया; कि मैं अपने शरीर का स्वास्थ्य फिर से पा लूँ, यद्यपि अपने अपवित्र हृदय में अब तक उन्मत्त था। क्योंकि उस सारे संकट में मैंने तेरे बपतिस्मे की इच्छा न की; और मैं बालक होते हुए अधिक भला था, जब मैंने अपनी माता की भक्ति से इसे माँगा था, जैसा मैं पहले कह और अंगीकार कर चुका हूँ। परन्तु मैं अपनी ही लज्जा तक बढ़ गया था, और मैंने बावलेपन से तेरी औषधि के नियमों की हँसी उड़ाई, तू ने जो मुझ को, जैसा मैं था, दोहरी मृत्यु से मरने न दिया। जिस घाव से मेरी माता का हृदय बेधा गया होता, वह कभी न भरता। क्योंकि जो स्नेह वह मुझ पर रखती थी उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता, और वह अब कितनी अधिक तीव्र वेदना के साथ आत्मा में मुझे जनने की पीड़ा में थी, उससे कहीं बढ़कर जब उसने शरीर में मुझे जन्म दिया था।
तब मैं नहीं देखता कि वह कैसे चंगी होती, यदि मेरी ऐसी मृत्यु ने उसके प्रेम की अंतड़ियों को बेध दिया होता। और उसकी वे इतनी प्रबल और निरन्तर प्रार्थनाएँ कहाँ होतीं, जो केवल तुझ से कभी न रुकतीं? परन्तु हे दयाओं के परमेश्वर, क्या तू उस पवित्र और संयमी विधवा के टूटे और दीन हृदय को तुच्छ जानता, जो दान-पुण्य में इतनी लगी रहती, तेरे सन्तों के प्रति कर्तव्य और सेवा से इतनी भरी हुई, जो एक भी दिन तेरी वेदी पर की भेंट को न छोड़ती, दिन में दो बार, भोर और सांझ, बिना किसी रुकावट के तेरी कलीसिया में आती, व्यर्थ की गपशप और बुढ़ियों की कहानियों के लिए नहीं; वरन् इसलिए कि वह तेरे प्रवचनों में तेरी सुने, और तू उसकी प्रार्थनाओं में उसकी सुने। क्या तू ऐसी स्त्री के आँसुओं को तुच्छ जानकर अपनी सहायता से ठुकरा सकता था, जिनके साथ उसने तुझ से न सोना माँगा, न चाँदी, न कोई बदलने या बीत जानेवाली भलाई, वरन् अपने पुत्र के प्राण का उद्धार? तू, जिसके वरदान से वह ऐसी थी? कभी नहीं, हे प्रभु। हाँ, तू निकट ही था, और सुन रहा और कर रहा था, उसी क्रम में जिसमें तू ने पहले से ठहरा दिया था कि यह किया जाए। यह दूर रहे कि तू अपने दर्शनों और उत्तरों में उसे धोखा दे, जिनमें से कुछ का मैंने उल्लेख किया है, और कुछ का नहीं, जिन्हें उसने अपने विश्वासयोग्य हृदय में रख छोड़ा था, और सदा प्रार्थना करते हुए, तेरे ही हस्ताक्षर के समान तुझ पर बल देती रही। क्योंकि तू, इसलिए कि तेरी करुणा सदा बनी रहती है, उन्हें, जिनके सब ऋण तू क्षमा कर देता है, यह वरदान देता है कि तू अपनी प्रतिज्ञाओं के द्वारा आप भी उनका ऋणी बन जाए।
अध्याय 10
तब तू ने मुझे उस रोग से चंगा किया, और अपनी दासी के पुत्र को, कुछ समय के लिए शरीर में, स्वस्थ किया, कि वह जीवित रहे, ताकि तू उसे एक उत्तम और अधिक स्थायी स्वास्थ्य प्रदान करे। और तब भी, रोम में, मैं उन धोखा देते और धोखा खाते हुए “पवित्र लोगों” से जा मिला; केवल उनके चेलों से ही नहीं (जिनकी गिनती में वह भी था, जिसके घर में मैं बीमार पड़ा और चंगा हुआ था); वरन् उनसे भी जिन्हें वे “चुने हुए” कहते हैं। क्योंकि मैं अब भी यह सोचता था “कि हम ही नहीं हैं जो पाप करते हैं, वरन् न जाने कौन सा दूसरा स्वभाव हममें पाप करता है”; और यह मेरे घमण्ड को भाता था कि मैं दोष से मुक्त रहूँ; और जब मैंने कोई बुराई की हो, तो यह स्वीकार न करूँ कि मैंने कोई की है, कि तू मेरे प्राण को चंगा करे, क्योंकि उसने तेरे विरुद्ध पाप किया था: परन्तु मैं इसका बहाना बनाना, और न जाने किसी दूसरी वस्तु पर दोष लगाना प्रिय जानता था, जो मेरे साथ थी, परन्तु जो मैं न था। परन्तु सचमुच वह पूरा का पूरा मैं ही था, और मेरी अभक्ति ने मुझे मेरे ही विरुद्ध बाँट दिया था: और वह पाप और भी लाइलाज था, जिसके कारण मैं अपने आप को पापी न ठहराता था; और यह घृणित अधर्म था, कि मैं तुझे, तुझ को, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अपने भीतर मेरे विनाश के लिए हार जाना अधिक चाहता था, इसके बजाय कि मैं स्वयं तुझ से उद्धार पाऊँ। तब तक तू ने न मेरे मुख के आगे पहरा बैठाया था, और न मेरे होंठों के चारों ओर सुरक्षा का द्वार, कि मेरा हृदय अधर्म करनेवाले मनुष्यों के संग बुरी बातों की ओर, पापों के बहाने बनाने को, न मुड़ जाए; और इसलिए मैं अब भी उनके चुने हुओं के साथ जुड़ा हुआ था।
परन्तु अब उस झूठे सिद्धान्त में निपुणता पाने से निराश होकर, यहाँ तक कि उन बातों को भी (जिनसे, यदि मुझे कोई उत्तम बात न मिले, तो मैंने सन्तुष्ट रहने का निश्चय किया था) मैं अब अधिक ढीले और लापरवाही से थामे था। क्योंकि मुझमें आधा-अधूरा यह विचार उठा कि वे दार्शनिक, जिन्हें वे अकादमिक कहते हैं, बाकियों से अधिक बुद्धिमान थे, क्योंकि वे मानते थे कि मनुष्य को हर बात पर सन्देह करना चाहिए, और उन्होंने ठहराया कि मनुष्य किसी भी सत्य को समझ नहीं सकता: क्योंकि इस प्रकार, तब उनके अभिप्राय को भी न समझते हुए, मुझे भी स्पष्ट रूप से विश्वास हो गया कि वे वैसा ही सोचते हैं, जैसा सामान्यतः उनके विषय में कहा जाता है। तौभी मैंने अपने उस आतिथेय को उस अति-विश्वास से खुलकर और स्पष्ट रूप से रोका, जो मैंने उसमें उन दन्तकथाओं के प्रति देखा, जिनसे मानीकियस की पुस्तकें भरी हैं। तौभी मैं उनके साथ, उनसे अधिक घनिष्ठ मित्रता में रहता था जो इस विधर्म के न थे। और न मैं इसे अपनी पुरानी उत्सुकता से थामे था; फिर भी उस पंथ के साथ मेरी घनिष्ठता (रोम गुप्त रीति से उनमें से बहुतों को शरण दिए हुए था) ने मुझे कोई और मार्ग ढूँढ़ने में सुस्त बना दिया: विशेषकर इसलिए कि मैं तेरी कलीसिया में उस सत्य को पाने से निराश था, जिससे उन्होंने मुझे भटका दिया था, हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, सब दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के सृजनहार: और मुझे यह मानना बहुत अनुचित जान पड़ता था कि तेरा रूप मानव शरीर के समान है, और तू हमारे अंगों की शारीरिक रेखाओं से सीमित है। और इसलिए कि जब मैं अपने परमेश्वर पर विचार करना चाहता था, तो मुझे शरीरों के एक ढेर के सिवा और कुछ सूझता ही न था कि किस पर विचार करूँ (क्योंकि जो ऐसा न था वह मुझे कुछ भी जान न पड़ता था), यही मेरी अवश्यम्भावी भूल का सबसे बड़ा, और लगभग एकमात्र कारण था।
क्योंकि इसी से मैं बुराई को भी किसी ऐसे ही प्रकार का पदार्थ मानता था, और यह कि उसका अपना घिनौना और भयंकर पिण्ड है; चाहे स्थूल, जिसे वे पृथ्वी कहते थे, या पतला और सूक्ष्म (वायु के शरीर के समान), जिसे वे कोई दुष्ट मन कल्पित करते हैं, जो उस पृथ्वी में से रेंगता है। और इसलिए कि एक भक्ति ने, जैसी भी वह थी, मुझे यह मानने को विवश किया कि भले परमेश्वर ने कभी कोई बुरा स्वभाव नहीं रचा, मैंने दो ढेर कल्पित किए, जो एक दूसरे के विपरीत थे, दोनों असीम, परन्तु बुरा संकरा, और भला अधिक विस्तृत। और इस विषैले आरम्भ से, दूसरी अपवित्र कल्पनाएँ मेरे पीछे चली आईं। क्योंकि जब मेरे मन ने कैथोलिक विश्वास की ओर लौटने का यत्न किया, तो मैं पीछे धकेल दिया गया, क्योंकि जिसे मैं कैथोलिक विश्वास समझता था वह कैथोलिक विश्वास था ही नहीं। और मुझे अपने आप में अधिक श्रद्धावान जान पड़ता, यदि मैं तेरे विषय में, हे मेरे परमेश्वर (जिसके सामने तेरी दयाएँ मेरे मुख से अंगीकार करती हैं), यह मानता कि तू असीम है, कम से कम दूसरी ओरों पर, यद्यपि उस एक ओर जहाँ बुराई का ढेर तेरे विरुद्ध खड़ा था, मैं तुझे सीमित मानने को विवश था; इसके बजाय कि मैं तुझे सब ओर से मानव शरीर के रूप से सीमित कल्पित करता। और मुझे यह मानना अधिक अच्छा जान पड़ता कि तू ने कोई बुराई नहीं रची (जो मुझ अज्ञानी को केवल कुछ नहीं, वरन् एक शारीरिक पदार्थ जान पड़ती थी, क्योंकि मैं मन की कल्पना एक सूक्ष्म शरीर के सिवा, और वह भी निश्चित स्थानों में फैला हुआ, कर ही न सकता था), इसके बजाय कि मैं यह मानता कि बुराई का स्वभाव, जैसा मैंने उसे कल्पित किया, तुझ से आ सकता है। हाँ, और हमारे उद्धारकर्ता को भी, तेरे एकलौते को, मैं मानता था कि वह हमारे उद्धार के लिए (मानो) तेरे अत्यन्त उज्ज्वल पदार्थ के ढेर में से बढ़ाया गया, यहाँ तक कि मैं उसके विषय में कुछ भी न मानता, केवल वही जो मैं अपनी व्यर्थता में कल्पित कर सकता था। तब उसका स्वभाव, ऐसा होने के कारण, मैं समझता था कि कुँवारी मरियम से जन्म नहीं ले सकता, बिना शरीर के साथ मिले: और जो कुछ मैंने अपने लिए इस प्रकार कल्पित किया था वह कैसे मिल सकता, और अशुद्ध न हो, यह मुझे न सूझता था। इसलिए मैं उसे शरीर में जन्मा मानने से डरता था, कहीं ऐसा न हो कि मुझे उसे शरीर से अशुद्ध हुआ मानना पड़े। अब तेरे आत्मिक जन मुझ पर कोमलता और प्रेम से मुस्कुराएँगे, यदि वे मेरे इन अंगीकारों को पढ़ें। तौभी मैं ऐसा ही था।
अध्याय 11
इसके अतिरिक्त, मानी-पंथियों ने तेरे पवित्रशास्त्र में जिन बातों की आलोचना की थी, मैं समझता था कि उनका बचाव नहीं किया जा सकता; तौभी कभी-कभी सचमुच मेरी यह इच्छा होती थी कि इन कई बातों पर किसी ऐसे व्यक्ति से विचार-विमर्श करूँ जो उन पुस्तकों में भली भाँति निपुण हो, और परख लूँ कि वह उन पर क्या सोचता है; क्योंकि हेल्पिदियस नामक एक व्यक्ति के वचन, जब उसने उन्हीं मानी-पंथियों के विरुद्ध आमने-सामने बोलकर वाद-विवाद किया, कार्थेज में ही मुझे हिलाने लगे थे: इसमें कि उसने पवित्रशास्त्र में से ऐसी बातें प्रस्तुत कीं जिनका सामना करना सहज न था, और जिनका मानी-पंथियों का उत्तर मुझे निर्बल जान पड़ा। और यह उत्तर वे सार्वजनिक रूप से देना पसन्द न करते थे, वरन् केवल हमें एकान्त में। वह यह था, कि नए नियम के पवित्रशास्त्र को न जाने किसने भ्रष्ट कर दिया था, जो यहूदियों की व्यवस्था को मसीही विश्वास पर आरोपित करना चाहता था: फिर भी उन्होंने आप कोई अभ्रष्ट प्रतियाँ प्रस्तुत न कीं। परन्तु मैं, केवल शारीरिक वस्तुओं की ही कल्पना करते हुए, मुख्यतः दबा हुआ था, उन “ढेरों” से घोर रीति से पीड़ित और मानो घुटा हुआ; जिनके नीचे तेरे सत्य की श्वास के लिए हाँफते हुए, मैं उसे शुद्ध और निर्मल रीति से साँस में न ले सकता था।
अध्याय 12
तब मैं उसी का परिश्रम से अभ्यास करने लगा जिसके लिए मैं रोम आया था, अर्थात् अलंकार-शास्त्र पढ़ाने का; और पहले, कुछ लोगों को अपने घर पर इकट्ठा करने का, जिनके द्वारा, और जिनके माध्यम से, मैं जाना-पहचाना जाने लगा था; तब मैंने रोम में किए जानेवाले और भी अपराध पाए, जिनका सामना मुझे अफ्रीका में न करना पड़ा था। सच है, वे “तोड़-फोड़ की हरकतें” जो दुराचारी युवकों द्वारा की जाती थीं, यहाँ नहीं की जाती थीं, जैसा मुझे बताया गया: परन्तु सहसा, उन्होंने कहा, अपने गुरु का वेतन देने से बचने के लिए, अनेक युवक मिलकर षड्यन्त्र रचते हैं, और किसी दूसरे के पास चले जाते हैं;—विश्वासघाती, जो धन के प्रेम के कारण न्याय को तुच्छ जानते हैं। इनसे भी मेरा हृदय बैर रखता था, यद्यपि सिद्ध बैर से नहीं: क्योंकि कदाचित् मैं उनसे इसलिए अधिक बैर रखता था कि मुझे उनके हाथों हानि उठानी थी, बजाय इसके कि वे सर्वथा अनुचित काम करते थे। सचमुच ऐसे लोग नीच हैं, और वे तुझ से व्यभिचारिणी की भाँति दूर भटक जाते हैं, इन क्षणभंगुर वस्तुओं के, जो अस्थायी हैं, नकली आकर्षणों से प्रेम रखते हुए, और उस मलिन धन से, जो उसे थामनेवाले हाथ को गन्दा करता है; इस क्षणभंगुर संसार को अंकवार में भरते हुए, और तुझे तुच्छ जानते हुए, जो स्थिर रहता है, और बुलाता है, और मनुष्य के उस व्यभिचारिणी प्राण को क्षमा करता है, जब वह तेरी ओर लौटता है। और अब मैं ऐसे भ्रष्ट और टेढ़े लोगों से बैर रखता हूँ, यद्यपि यदि वे सुधरने योग्य हों तो उनसे प्रेम भी रखता हूँ, कि जो विद्या वे प्राप्त करते हैं उसे धन से बढ़कर चाहूँ, और विद्या से बढ़कर, तुझे, हे परमेश्वर, जो सत्य और निश्चित भलाई की परिपूर्णता, और अत्यन्त निर्मल शान्ति है। परन्तु तब मैं अपने ही लिए उन्हें बुरा जानकर उनसे अप्रसन्न होता था, बजाय इसके कि मैं तेरे लिए उन्हें भला जानकर उनका भला चाहता।
अध्याय 13
इसलिए जब मिलान के लोगों ने रोम में नगर के हाकिम के पास सन्देश भेजा, कि वह उनके नगर के लिए अलंकार-शास्त्र का एक व्याख्याता उन्हें दे, और उसे राजकीय व्यय पर भेजे, तब मैंने आवेदन किया (उन्हीं लोगों के द्वारा, जो मानी-पंथी व्यर्थताओं में मतवाले थे, जिनसे छूटने के लिए मुझे जाना था, यद्यपि हम दोनों में से कोई यह न जानता था) कि सिम्माकुस, जो उस समय नगर का हाकिम था, मुझे कोई विषय देकर परखे, और इस प्रकार मुझे भेज दे। मैं मिलान आया, अम्ब्रोस बिशप के पास, जो सारे संसार में उत्तम मनुष्यों में गिना जाता था, तेरा भक्त सेवक; जिसका वाक्पटु प्रवचन उस समय तेरे लोगों को तेरे गेहूँ का मैदा, तेरे तेल का हर्ष, और तेरे दाखमधु का संयमित नशा भरपूरी से बाँटता था। मैं अनजाने ही तेरे द्वारा उसके पास पहुँचाया गया, कि उसके द्वारा मैं जान-बूझकर तेरे पास पहुँचाया जाऊँ। उस परमेश्वर के जन ने मुझे एक पिता के समान ग्रहण किया, और मेरे आने पर मुझ पर एक बिशप-सुलभ कृपा दिखाई। तब से मैं उससे प्रेम करने लगा, आरम्भ में सचमुच सत्य के शिक्षक के रूप में नहीं (जिससे मैं तेरी कलीसिया में सर्वथा निराश था), वरन् एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो मेरे प्रति कृपालु था। और मैं उसे लोगों को प्रचार करते हुए ध्यान से सुनता था, उस अभिप्राय से नहीं जो मुझे रखना चाहिए था, वरन् मानो उसकी वाक्पटुता को परखते हुए, कि क्या वह अपनी ख्याति के अनुरूप है, या जैसा कहा जाता था उससे भरपूर या कम बहती है; और मैं उसके वचनों पर मनोयोग से लटका रहता था; परन्तु विषय का मैं एक लापरवाह और तिरस्कारपूर्ण दर्शक-सा था; और मैं उसके प्रवचन की मिठास से प्रसन्न होता था, जो फौस्तुस के प्रवचन से अधिक गूढ़ थी, तौभी ढंग में कम मनमोहक और कम सुरीली। परन्तु विषय की तो कोई तुलना ही न थी; क्योंकि एक मानी-पंथी भ्रमों के बीच भटक रहा था, और दूसरा उद्धार की अत्यन्त खरी शिक्षा दे रहा था। परन्तु उद्धार पापियों से दूर है, जैसा मैं तब उसके सामने खड़ा था; और तौभी मैं थोड़ा-थोड़ा करके, और अनजाने ही, निकट आता जा रहा था।
अध्याय 14
क्योंकि यद्यपि मैं यह सीखने का कोई कष्ट न उठाता था कि वह क्या कहता है, वरन् केवल यह सुनने का कि वह कैसे कहता है (क्योंकि केवल वही व्यर्थ की चिन्ता मुझमें रह गई थी, इस आशा से निराश कि मनुष्य के लिए तुझ तक कोई मार्ग खुला है), तौभी जिन शब्दों को मैं चुनना चाहता था, उनके साथ-साथ वे बातें भी मेरे मन में आ जाती थीं जिन्हें मैं अस्वीकार करना चाहता था; क्योंकि मैं उन्हें अलग न कर सकता था। और जब मैंने अपना हृदय यह मानने को खोला कि “वह कितनी वाक्पटुता से कहता है,” तब यह भी भीतर आ गया कि “वह कितनी सच्चाई से कहता है”; परन्तु यह धीरे-धीरे। क्योंकि पहले, ये बातें भी अब मुझे बचाव के योग्य जान पड़ने लगी थीं; और कैथोलिक विश्वास, जिसके विषय में मैंने सोचा था कि मानी-पंथियों की आपत्तियों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा जा सकता, उसे मैं अब निर्लज्जता के बिना थामा जा सकनेवाला समझने लगा; विशेषकर तब, जब मैंने पुराने नियम के एक-दो स्थानों का समाधान सुना, और प्रायः “लाक्षणिक रूप में,” जिन्हें जब मैं अक्षरशः समझता था, तो मैं आत्मिक रूप से मारा जाता था। तब उन पुस्तकों के बहुत से स्थानों की व्याख्या हो जाने पर, मैंने अपनी उस निराशा को दोष दिया, जिसमें मैं यह मानता था कि जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं से बैर रखते और उनकी हँसी उड़ाते हैं, उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता। तौभी मैंने इसलिए तब यह न देखा कि कैथोलिक मार्ग को थामना चाहिए, क्योंकि उसे भी विद्वान समर्थक मिल सकते थे, जो विस्तार से और कुछ तर्क का आभास देते हुए आपत्तियों का उत्तर दे सकते थे; और न यह कि जो मैं थामे था वह इसलिए दोषी ठहराने योग्य है, क्योंकि दोनों पक्ष थामे जा सकते थे। क्योंकि कैथोलिक पक्ष मुझे इस प्रकार पराजित नहीं, वरन् अब तक विजयी भी नहीं जान पड़ता था।
इस पर मैंने बड़े मन से अपना मन लगाया, कि देखूँ कि क्या मैं किसी रीति से, किसी निश्चित प्रमाण द्वारा, मानी-पंथियों को झूठ का दोषी ठहरा सकता हूँ। यदि मैं एक बार भी किसी आत्मिक पदार्थ की कल्पना कर पाता, तो उनके सारे गढ़ ढा दिए जाते, और मेरे मन से सर्वथा निकाल फेंके जाते; परन्तु मैं ऐसा न कर सका। तौभी, इस संसार की रचना, और सारी प्रकृति के विषय में, जहाँ तक शरीर की इन्द्रियाँ पहुँच सकती हैं, ज्यों-ज्यों मैं अधिकाधिक विचार और तुलना करता गया, मैंने अधिकांश दार्शनिकों के सिद्धान्तों को कहीं अधिक विश्वसनीय ठहराया। तब अकादमिकों की रीति के अनुसार (जैसा उनके विषय में समझा जाता है) हर बात पर सन्देह करते हुए, और सब के बीच डाँवाडोल रहते हुए, मैं यहाँ तक स्थिर हुआ, कि मानी-पंथियों को त्याग देना चाहिए; यह ठहराते हुए कि सन्देह करते हुए भी मैं उस पंथ में न बना रहूँ, जिससे मैं पहले ही कुछ दार्शनिकों को अधिक अच्छा समझता था; तौभी उन दार्शनिकों को, इसलिए कि वे मसीह के उद्धार करनेवाले नाम से रहित थे, मैं अपने रोगी प्राण का उपचार सौंपने से सर्वथा इनकार करता था। इसलिए मैंने ठान लिया कि जब तक मुझ पर कोई निश्चित बात उदय न हो कि मैं अपनी गति किस ओर मोड़ूँ, तब तक इतने समय कैथोलिक कलीसिया में एक दीक्षार्थी बना रहूँ, जिसके सुपुर्द मुझे मेरे माता-पिता ने किया था।
अध्याय 5 पूरा हुआ
पाँचवीं पुस्तक