स्वीकारोक्तियाँ
तीसरी पुस्तक

अध्याय 3 · 32 मिनट का पठन

तीसरी पुस्तक

अध्याय 1

कार्थेज में मैं आया, जहाँ मेरे कानों के चारों ओर अपवित्र प्रेमों की एक कड़ाही खौलती हुई गा रही थी। मैं अब तक प्रेम तो नहीं करता था, फिर भी प्रेम करना चाहता था, और भीतर की एक गहरी कमी के कारण, मैं अपने आप से घृणा करता था कि मुझमें चाह क्यों नहीं। मैं ढूँढ़ता था कि किससे प्रेम करूँ, प्रेम करने के प्रेम में पड़ा हुआ, और मुझे सुरक्षा से घृणा थी, और उस मार्ग से जिसमें कोई फंदा न हो। क्योंकि मेरे भीतर उस भीतरी भोजन का, अर्थात् तेरा ही, हे मेरे परमेश्वर, अकाल पड़ा था; तौभी उस अकाल के कारण मुझे भूख न लगती थी; परन्तु मैं अविनाशी आहार की कोई भी लालसा किए बिना था, इसलिए नहीं कि मैं उससे तृप्त था, वरन् जितना अधिक रीता, उतना ही अधिक मैं उससे घिन करता था। इसी कारण मेरा प्राण रोगी और घावों से भरा हुआ था, और वह दयनीय रीति से अपने आप को बाहर उछाल देता था, यह चाहते हुए कि इन्द्रियों के विषयों के स्पर्श से खुजलाया जाए। तौभी यदि इनमें प्राण न होता, तो ये प्रेम के विषय न होते। तब प्रेम करना, और प्रेम पाया जाना, मुझे मीठा लगता था; परन्तु और भी अधिक, जब मैं उस व्यक्ति का सुख भोगने पाता जिससे मैं प्रेम करता था। इसलिए मैंने मित्रता के सोते को कामवासना की मलिनता से अशुद्ध कर दिया, और उसकी उजियाली को कामुकता के नरक से धुँधला कर दिया; और इस प्रकार गन्दा और कुरूप होकर भी, मैं अत्यन्त घमण्ड के कारण, सुरुचिपूर्ण और शिष्ट कहलाना चाहता था। तब मैं सिर के बल उसी प्रेम में जा गिरा जिसमें फँस जाने की मैं लालसा रखता था। हे मेरे परमेश्वर, हे मेरी दया, तूने अपनी बड़ी भलाई से उस मिठास पर मेरे लिए कितना पित्त छिड़क दिया! क्योंकि मैं प्रेम भी पाता था, और छिपकर सुख भोगने के बन्धन तक पहुँच भी गया था; और आनन्द के साथ दुःखदायी बन्धनों में जकड़ा हुआ था, कि मैं डाह, और सन्देह, और भय, और क्रोध, और झगड़ों की जलती हुई लोहे की छड़ों से पीटा जाऊँ।

अध्याय 2

नाटकों ने भी मुझे बहा ले गए, जो मेरे दुखों की छवियों से, और मेरी आग के लिए ईंधन से भरे हुए थे। ऐसा क्यों है कि मनुष्य उदास किया जाना चाहता है, शोकपूर्ण और दुखान्त बातों को देखकर, जिन्हें वह स्वयं किसी भी रीति से सहना न चाहेगा? फिर भी वह एक दर्शक के रूप में उन पर शोक अनुभव करना चाहता है, और यही शोक उसका सुख होता है। यह दयनीय पागलपन के सिवाय और क्या है? क्योंकि मनुष्य इन दृश्यों से उतना ही अधिक प्रभावित होता है, जितना कम वह ऐसी भावनाओं से मुक्त होता है। जो भी हो, जब वह स्वयं अपने ऊपर दुःख भोगता है, तब वह दुर्दशा कहलाया करता है; जब वह दूसरों पर तरस खाता है, तब वह दया कहलाती है। परन्तु बनावटी और रंगमंच की भावनाओं के लिए यह कैसी दया है? क्योंकि सुननेवाले को सहायता देने के लिए नहीं, केवल शोक करने के लिए बुलाया जाता है; और वह इन कल्पनाओं के अभिनेता की उतनी ही अधिक प्रशंसा करता है, जितना अधिक वह शोक करता है। और यदि उन व्यक्तियों की विपत्तियाँ (चाहे प्राचीन समय की हों, या केवल गढ़ी हुई) इस प्रकार अभिनीत हों कि दर्शक आँसुओं तक न पिघले, तो वह घिन करता और आलोचना करता हुआ चला जाता है; परन्तु यदि वह भावना तक पिघल जाए, तो वह ध्यान लगाए बैठा रहता है, और आनन्द के मारे रोता है।

तो क्या शोक भी प्रिय होते हैं? निश्चय ही सब आनन्द की चाह रखते हैं। अथवा जब कोई मनुष्य दुखी होना पसन्द नहीं करता, तौभी क्या वह दयालु होने में प्रसन्न होता है? और यह चूँकि भावना के बिना नहीं हो सकता, इसी एक कारण से क्या भावनाएँ प्रिय होती हैं? यह भी उसी मित्रता की नस से फूटता है। परन्तु वह नस किधर जाती है? किधर बहती है? किसलिए वह उस राल की धारा में जा मिलती है जो अपवित्र कामुकता की उन विकराल लहरों को उबालती हुई फेंकती है, जिसमें वह अपनी ही इच्छा से बदल और रूपान्तरित हो जाती है, अपनी ही इच्छा से अपनी स्वर्गीय उजियाली से नीचे गिराई और भ्रष्ट की जाकर? तो क्या दया को दूर कर दिया जाए? कदापि नहीं। तो कभी-कभी शोक प्रिय हों। परन्तु हे मेरे प्राण, अशुद्धता से सावधान रह, मेरे परमेश्वर की रखवाली के अधीन, हमारे पूर्वजों के परमेश्वर की, जो सदा सर्वदा के लिए सबसे ऊपर स्तुति और महिमा के योग्य है, अशुद्धता से सावधान रह। क्योंकि मैंने अब तरस खाना नहीं छोड़ा है; परन्तु उस समय रंगशालाओं में मैं प्रेमियों के साथ आनन्दित होता था जब वे दुष्टता से एक-दूसरे का सुख भोगते थे, यद्यपि यह नाटक में केवल काल्पनिक ही था। और जब वे एक-दूसरे को खो देते थे, तब मानो बड़ा दयालु होकर मैं उनके साथ शोक करता था, फिर भी दोनों में मुझे आनन्द मिलता था। परन्तु अब मैं उस पर कहीं अधिक तरस खाता हूँ जो अपनी दुष्टता में आनन्दित होता है, बजाय उसके जिसके विषय में समझा जाता है कि वह किसी हानिकारक सुख के छूट जाने और किसी दयनीय सौभाग्य के खो जाने से कष्ट भोगता है। यह निश्चय ही अधिक सच्ची दया है, परन्तु इसमें शोक आनन्द नहीं पाता। क्योंकि यद्यपि जो दुखियारे के लिए शोक करता है वह अपने प्रेम-कार्य के लिए सराहा जाता है; तौभी जो सचमुच दयालु है, वह यही चाहता कि उसके शोक करने के लिए कुछ भी न होता। क्योंकि यदि भलाई की बुरी इच्छा की जा सकती (जो कभी नहीं हो सकता), तो जो सच्चाई और निष्कपटता से तरस खाता है, वह चाहता कि कोई दुखिया हो, ताकि वह उस पर तरस खा सके। तब कुछ शोक की अनुमति दी जा सकती है, पर किसी से प्रेम न किया जाए। क्योंकि हे प्रभु परमेश्वर, तू ऐसा ही करता है, जो प्राणों से हमसे कहीं अधिक निर्मलता से प्रेम करता है, और उन पर कहीं अधिक अविनाशी रीति से तरस खाता है, तौभी किसी शोक से घायल नहीं होता। और इन बातों के लिए कौन योग्य है?

परन्तु मैं, अभागा, उस समय शोक करना प्रिय जानता था, और शोक करने के लिए विषय ढूँढ़ता था, जब किसी दूसरे की, और वह भी बनावटी और अभिनीत दुर्दशा में, वही अभिनय मुझे सबसे अच्छा लगता और मुझे सबसे प्रबलता से खींचता, जो मुझ में से आँसू निकाल लेता। इसमें क्या अचम्भा कि एक अभागी भेड़, तेरे झुण्ड से भटकी हुई, और तेरी रखवाली से अधीर होकर, मैं एक गन्दे रोग से ग्रस्त हो गया? और इसी से शोकों का प्रेम उपजा; ऐसा शोक नहीं जो मुझमें गहराई तक धँस जाए; क्योंकि मैं वह भोगना प्रिय न जानता था, जिसे देखना प्रिय जानता था; परन्तु ऐसा जो उनकी कल्पनाओं को सुनकर केवल ऊपरी सतह को हल्के से खुरच जाए; जिस पर, मानो विषैले नाखूनों पर, जलती हुई सूजन, फोड़े, और सड़ा हुआ घाव पीछे-पीछे आते। मेरा जीवन ऐसा होकर, क्या वह जीवन था, हे मेरे परमेश्वर?

अध्याय 3

और तेरी विश्वासयोग्य दया दूर से मेरे ऊपर मँडराती रही। कैसे-कैसे घोर अधर्मों में मैंने अपने आप को नष्ट किया, एक अपवित्र जिज्ञासा के पीछे पड़ा हुआ, कि तुझे छोड़कर वह मुझे उस विश्वासघाती गहरे गड्ढे तक, और दुष्टात्माओं की छलनेवाली सेवा तक पहुँचा दे, जिन्हें मैंने अपने बुरे कामों की बलि चढ़ाई, और इन सब बातों में तूने मुझे ताड़ना दी! मैंने तो यहाँ तक साहस किया कि जब तेरी कलीसिया की दीवारों के भीतर तेरे पर्व मनाए जा रहे थे, तब मैं ऐसे काम की लालसा करूँ और उसकी योजना बनाऊँ जिसका फल मृत्यु के योग्य था, जिसके कारण तूने मुझे कठोर दण्डों से ताड़ना दी, यद्यपि वह मेरे दोष के सामने कुछ भी न था, हे तू मेरी अपार दया, हे मेरे परमेश्वर, उन भयंकर नाश करनेवालों से मेरी शरण, जिनके बीच मैं हठीली गर्दन किए हुए भटकता रहा, तुझ से और दूर हटता हुआ, अपने ही मार्गों से प्रेम करता हुआ, न कि तेरे; एक आवारा स्वच्छन्दता से प्रेम करता हुआ।

वे विद्याएँ भी, जो सराहनीय समझी जाती थीं, उनका लक्ष्य वाद-विवाद के न्यायालयों में श्रेष्ठ ठहरना था; जितनी अधिक प्रशंसा, उतना ही अधिक धूर्त। मनुष्यों का अन्धापन ऐसा ही है, कि वे अपने अन्धेपन में भी घमण्ड करते हैं। और अब मैं भाषण-कला की पाठशाला में मुखिया था, जिस पर मैं घमण्ड से आनन्दित होता था, और अहंकार से फूल जाता था, यद्यपि (हे प्रभु, तू जानता है) मैं उन “उलट-फेर करनेवालों” के उलट-फेरों से कहीं अधिक शान्त और सर्वथा दूर था (क्योंकि यह अशुभ और शैतानी नाम ही वीरता का चिन्ह था) जिनके बीच मैं रहता था, इस निर्लज्ज लज्जा के साथ कि मैं उन जैसा भी न था। उनके साथ मैं रहता था, और कभी-कभी उनकी मित्रता से प्रसन्न होता था, जिनके कामों से मैं सदा घृणा करता था — अर्थात् उनके “उलट-फेरों” से, जिनसे वे उच्छृंखलता से अजनबियों की मर्यादा को सताते थे, जिसे वे बिना किसी कारण के उपहास से बिगाड़ते, और उसी पर अपने कुटिल आनन्द को पालते थे। दुष्टात्माओं के कामों से अधिक इनके समान और कुछ नहीं हो सकता। तब इन्हें “उलट-फेर करनेवालों” से अधिक सच्चाई से और क्या कहा जा सकता था? वे स्वयं पहले ही उलटे हुए और सर्वथा भ्रष्ट किए हुए थे, जब कि छलनेवाली आत्माएँ छिपकर उनका उपहास करती और उन्हें बहकाती थीं, जिसमें वे स्वयं दूसरों का उपहास करने और उन्हें छलने में आनन्द पाते थे।

अध्याय 4

ऐसों ही के बीच, अपनी उस अस्थिर आयु में, मैंने वाक्पटुता की पुस्तकें सीखीं, जिनमें मैं श्रेष्ठ होना चाहता था, एक निन्दनीय और मिथ्या-अभिमानी उद्देश्य से, अर्थात् मानवीय व्यर्थता में आनन्द से। पढ़ाई के साधारण क्रम में, मेरे हाथ सिसरो की एक पुस्तक लगी, जिसकी वाणी की तो प्रायः सभी प्रशंसा करते हैं, पर उसके हृदय की उतनी नहीं। उसकी यह पुस्तक तत्त्वज्ञान के लिए एक उपदेश समेटे हुए है, और “होर्टेन्सियस” कहलाती है। परन्तु इस पुस्तक ने मेरी भावनाओं को बदल दिया, और मेरी प्रार्थनाओं को तेरी ही ओर मोड़ दिया, हे प्रभु; और मुझे और ही प्रयोजन तथा अभिलाषाएँ दे दीं। हर व्यर्थ आशा एकाएक मेरे लिए तुच्छ हो गई; और मैं एक अविश्वसनीय रीति से जलती हुई लालसा के साथ बुद्धि की अमरता के लिए तरसने लगा, और अब उठने लगा, कि तेरी ओर लौट आऊँ। क्योंकि अपनी जीभ को तेज़ करने के लिए (जिस वस्तु को, ऐसा जान पड़ता था, मैं अपनी माता के दिए भत्ते से मोल ले रहा था, अपने उस उन्नीसवें वर्ष में, जब मेरे पिता को मरे हुए दो वर्ष हो चुके थे) — अपनी जीभ को तेज़ करने के लिए मैंने वह पुस्तक काम में न लाई; न ही उसने मुझमें अपनी शैली भरी, वरन् अपना विषय।

तब मैं कैसे जल उठा, हे मेरे परमेश्वर, कैसे जल उठा कि सांसारिक वस्तुओं से फिर तेरी ओर चढ़ आऊँ, और मैं न जानता था कि तू मेरे साथ क्या करेगा? क्योंकि बुद्धि तेरे ही पास है। परन्तु बुद्धि के प्रेम को यूनानी में “तत्त्वज्ञान” कहते हैं, जिससे उस पुस्तक ने मुझे भड़का दिया। कुछ ऐसे हैं जो तत्त्वज्ञान के द्वारा बहकाते हैं, एक बड़े, और चिकने, और आदरणीय नाम के नीचे अपनी ही भूलों पर रंग चढ़ाते और उन्हें छिपाते हैं: और प्रायः वे सब जो उस युग में और उससे पहले के युगों में ऐसे थे, उस पुस्तक में निन्दित और उघाड़े गए हैं: वहाँ तेरे आत्मा की वह हितकर चेतावनी भी स्पष्ट की गई है, तेरे भले और भक्त सेवक के द्वारा: चौकस रहो कि कोई तुम्हें उस तत्त्वज्ञान और व्यर्थ धोखे के द्वारा अहेर न कर ले, जो मनुष्यों की परम्परा और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार है, और मसीह के अनुसार नहीं। क्योंकि उसी में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है। और चूँकि उस समय (हे मेरे हृदय की ज्योति, तू जानता है) प्रेरितों का पवित्रशास्त्र मुझे ज्ञात न था, मैं उस उपदेश से केवल यहीं तक प्रसन्न हुआ, कि उससे मैं प्रबलता से जगाया, और सुलगाया, और भड़काया गया कि प्रेम करूँ, और ढूँढ़ूँ, और पाऊँ, और थामे रहूँ, और गले लगाऊँ — इस या उस पन्थ को नहीं, वरन् बुद्धि को ही, वह जो भी हो; और केवल इसी बात ने मुझे यों बिना सुलगे रोक रखा, कि उसमें मसीह का नाम न था। क्योंकि यह नाम, तेरी दया के अनुसार, हे प्रभु, मेरे उद्धारकर्ता, तेरे पुत्र का यह नाम, मेरे कोमल हृदय ने अपनी माता के दूध के साथ ही भक्ति से पी लिया था और गहराई से सँजो रखा था; और जो कुछ भी उस नाम के बिना था, चाहे कितना ही विद्वत्तापूर्ण, परिष्कृत, या सच्चा क्यों न हो, वह मुझे पूरी तरह अपने वश में न कर सका।

अध्याय 5

तब मैंने ठान लिया कि अपने मन को पवित्रशास्त्र की ओर झुकाऊँ, कि देखूँ वे क्या हैं। परन्तु देख, मैं एक ऐसी वस्तु देखता हूँ जो घमण्डियों की समझ में नहीं आती, न बालकों के सामने खुली है, पहुँच में सरल, अपनी गहराइयों में उच्च, और भेदों से ढँकी हुई; और मैं ऐसा न था कि उसमें प्रवेश कर सकूँ, या उसके पदचिह्नों पर चलने को अपनी गर्दन झुका सकूँ। क्योंकि जैसा मैं अब कहता हूँ, वैसा मैंने तब अनुभव न किया जब मैं उस पवित्रशास्त्र की ओर फिरा; परन्तु वे मुझे टुल्ली की भव्यता के सामने तुलना के अयोग्य जान पड़े: क्योंकि मेरा फूला हुआ घमण्ड उनकी दीनता से सिकुड़ जाता था, न ही मेरी तीक्ष्ण बुद्धि उनके भीतरी भाग को भेद सकती थी। तौभी वे ऐसे थे जो एक छोटे में बढ़ते जाते। परन्तु मैंने छोटा बनना तुच्छ जाना; और घमण्ड से फूला हुआ, अपने आप को कोई बड़ा समझता रहा।

अध्याय 6

इसलिए मैं घमण्ड से मतवाले, अत्यन्त शारीरिक और बकवादी मनुष्यों के बीच जा पड़ा, जिनके मुँह में शैतान के फंदे थे, तेरे नाम के, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के, और पवित्र आत्मा के, अर्थात् सहायक, हमारे शान्तिदाता के अक्षरों के मिश्रण से लीसे हुए। ये नाम उनके मुँह से नहीं हटते थे, परन्तु केवल इतनी ही दूर तक कि जीभ की ध्वनि और शोर मात्र थे, क्योंकि हृदय सत्य से रीता था। तौभी वे “सत्य, सत्य” चिल्लाते, और मुझ से उसकी बहुत चर्चा करते, फिर भी वह उनमें न था: परन्तु वे झूठ बोलते थे, न केवल तेरे विषय में (जो सचमुच सत्य है), वरन् इस संसार के उन तत्त्वों के विषय में भी, जो तेरी ही सृष्टि हैं। और मुझे तो चाहिए था कि उन तत्त्वज्ञानियों को भी छोड़ देता जो उनके विषय में सत्य बोलते थे, तेरे प्रेम के कारण, हे मेरे पिता, परम भले, समस्त सुन्दर वस्तुओं की सुन्दरता। हे सत्य, सत्य, तब भी मेरे प्राण की मज्जा कैसी भीतर से तेरे लिए हाँफती थी, जब वे बारम्बार और भाँति-भाँति से, और अनेक तथा विशाल पुस्तकों में, तेरी प्रतिध्वनि मुझ तक पहुँचाते थे, यद्यपि वह प्रतिध्वनि मात्र थी? और ये ही वे थालियाँ थीं जिनमें, तेरे लिए भूखे मुझ को, वे तेरे बदले सूर्य और चन्द्रमा परोसते थे, जो तेरे सुन्दर काम तो हैं, तौभी तेरे काम हैं, तू स्वयं नहीं, और न तेरे पहले काम। क्योंकि तेरे आत्मिक काम इन शारीरिक कामों से पहले हैं, चाहे वे स्वर्गीय और चमकीले क्यों न हों। परन्तु मैं तो तेरे उन पहले कामों के लिए भी भूखा-प्यासा न था, वरन् तेरे ही लिए, अर्थात् सत्य के लिए, जिसमें न कोई परिवर्तन है, न फिरने की छाया: तौभी वे मेरे सामने उन थालियों में झिलमिलाती कल्पनाएँ रखते रहे, जिनसे तो इसी सूर्य से प्रेम करना (जो कम से कम हमारी दृष्टि के लिए तो वास्तविक है) उन कल्पनाओं से अच्छा था जो हमारी आँखों के द्वारा हमारे मन को छलती हैं। तौभी, चूँकि मैं उन्हें तू समझता था, मैं उन्हीं को खाता रहा; उत्सुकता से नहीं, क्योंकि तू उनमें मुझे वैसा स्वादिष्ट न लगा जैसा तू है; क्योंकि तू ये रीतीपन न था, न मैं उनसे पुष्ट हुआ, वरन् और भी क्षीण हो गया। नींद में खाया भोजन बहुत कुछ हमारे जागते के भोजन जैसा दिखता है; तौभी सोए हुए उससे पुष्ट नहीं होते, क्योंकि वे सोए हुए हैं। परन्तु वे तो किसी भी रीति से तेरे समान भी न थे, जैसा तूने अब मुझ से कहा है; क्योंकि वे शारीरिक कल्पनाएँ थीं, झूठे शरीर, जिनसे ये सच्चे शरीर, चाहे स्वर्गीय हों या पार्थिव, जिन्हें हम अपनी शारीरिक दृष्टि से देखते हैं, कहीं अधिक निश्चित हैं: इन वस्तुओं को पशु और पक्षी भी हमारे ही समान पहचानते हैं, और वे तब से अधिक निश्चित हैं जब हम उनकी कल्पना करते हैं। और फिर, हम उनकी कल्पना उससे अधिक निश्चय से करते हैं, जब हम उनके द्वारा और भी विशाल तथा अनन्त शरीरों का अनुमान लगाते हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं। ऐसे रीते छिलकों पर मैं तब पाला जाता था; और पाला न जाता था। परन्तु तू, हे मेरे प्राण के प्रेम, जिसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं थक जाता हूँ, कि मैं बलवन्त हो जाऊँ, न तो वे शरीर है जिन्हें हम देखते हैं, चाहे स्वर्ग में हों; न वे जिन्हें हम वहाँ नहीं देखते; क्योंकि तूने उन्हें रचा है, और तू उन्हें अपने सर्वश्रेष्ठ कामों में नहीं गिनता। तब तू मेरी उन कल्पनाओं से कितनी दूर है, उन शरीरों की कल्पनाओं से जो हैं ही नहीं, जिनसे उन शरीरों की छवियाँ, जो हैं, कहीं अधिक निश्चित हैं, और उनसे भी अधिक निश्चित स्वयं वे शरीर, जो तौभी तू नहीं; नहीं, न वह प्राण, जो शरीरों का जीवन है। तब शरीरों का जीवन शरीरों से उत्तम और अधिक निश्चित है। परन्तु तू प्राणों का जीवन है, जीवनों का जीवन, अपने आप में जीवन रखनेवाला; और तू बदलता नहीं, हे मेरे प्राण के जीवन।

तब तू मेरे लिए कहाँ था, और मुझ से कितनी दूर? सचमुच मैं तुझ से दूर भटक रहा था, उन सूअरों की फलियों से भी वंचित, जिन्हें मैं फलियों से खिलाता था। क्योंकि कवियों और व्याकरणियों की कहानियाँ इन फंदों से कितनी अच्छी हैं? क्योंकि छन्द, और कविताएँ, और “उड़ती हुई मीडिया”, इन मनुष्यों के पाँच तत्त्वों से सचमुच अधिक लाभकारी हैं, जो भाँति-भाँति से भेस बदले हुए, अन्धकार की पाँच गुफाओं के अनुरूप हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं, तौभी वे विश्वासी को घात करते हैं। क्योंकि छन्दों और कविताओं को तो मैं सच्चे भोजन में बदल सकता हूँ, और “उड़ती हुई मीडिया” को, यद्यपि मैंने गाया, तौभी मैंने उसे सच न माना; यद्यपि मैंने उसे गाया हुआ सुना, तौभी विश्वास न किया: परन्तु उन बातों पर मैंने विश्वास किया। हाय, हाय, किन-किन सीढ़ियों से मैं अधोलोक की गहराइयों तक उतारा गया! सत्य के अभाव में परिश्रम और छटपटाहट करता हुआ, क्योंकि मैं तुझे, हे मेरे परमेश्वर, ढूँढ़ता था (तेरे ही सामने मैं इसे मान लेता हूँ, जिसने मुझ पर दया की जब मैं अब तक स्वीकार न करता था), न कि मन की समझ के अनुसार, जिसमें तूने चाहा था कि मैं पशुओं से श्रेष्ठ ठहरूँ, वरन् शरीर की इन्द्रिय के अनुसार। परन्तु तू मेरे सबसे भीतरी भाग से भी अधिक भीतर था; और मेरे सबसे ऊँचे से भी ऊँचा। मैं उस ढीठ स्त्री पर जा पड़ा, जो भोली है और कुछ नहीं जानती, सुलैमान में जिसकी झलक दी गई है, द्वार पर बैठी हुई, और कहती हुई, गुप्त रीति से मिली रोटी मन से खाओ, और चुराया हुआ पानी पीओ जो मीठा है: उसने मुझे बहका लिया, क्योंकि उसने मेरे प्राण को बाहर मेरे शरीर की आँख में बसा हुआ पाया, और उस भोजन को जुगाली करता हुआ जिसे उसके द्वारा मैं निगल चुका था।

अध्याय 7

क्योंकि इसके सिवा, जो सचमुच है उसे मैं न जानता था; और मानो बुद्धि की तीक्ष्णता के कारण, मैं मूर्ख छलियों की बातें मान लेने को उकसाया जाता था, जब वे मुझ से पूछते, “बुराई कहाँ से आती है?” “क्या परमेश्वर किसी शारीरिक आकार में बँधा है, और उसके बाल और नाखून हैं?” “क्या वे धर्मी माने जाएँ जिनकी एक ही समय बहुत-सी पत्नियाँ थीं, और जिन्होंने मनुष्यों को घात किया, और जीवित प्राणियों की बलि चढ़ाई?” इन पर मैं, अपनी अज्ञानता में, बहुत घबरा जाता, और सत्य से हटकर, अपने आप को उसी की ओर बढ़ता हुआ समझता; क्योंकि अब तक मैं न जानता था कि बुराई भलाई के अभाव के सिवा और कुछ नहीं, यहाँ तक कि अन्त में कोई वस्तु सर्वथा मिट ही जाती है; और यह मैं कैसे देखता, जिसकी आँखों की दृष्टि केवल शरीरों तक पहुँचती थी, और जिसके मन की एक छायाभास तक? और मैं परमेश्वर को आत्मा नहीं जानता था, ऐसा नहीं जिसके अंग लम्बाई और चौड़ाई में फैले हों, या जिसका अस्तित्व घनत्व हो; क्योंकि हर घन अंश में उतना कम होता है जितना पूरे में: और यदि वह अनन्त हो, तो उसे ऐसे अंश में, जो किसी नियत स्थान से घिरा हो, अपने अनन्तपन से कम होना पड़ेगा; और इस प्रकार वह हर जगह पूरा-पूरा नहीं, जैसा आत्मा, जैसा परमेश्वर। और वह हम में क्या होना चाहिए, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के समान थे, और ठीक ही कहा जा सकता था कि हम परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार हैं, इसका मुझे सर्वथा कुछ ज्ञान न था।

न मैं उस सच्ची भीतरी धार्मिकता को जानता था जो रीति-रिवाज के अनुसार नहीं, वरन् सर्वशक्तिमान परमेश्वर की परम न्यायपूर्ण व्यवस्था में से न्याय करती है, जिसके द्वारा स्थानों और समयों के मार्ग उन समयों और स्थानों के अनुसार ठहराए गए थे; जबकि वह स्वयं सदा और हर जगह एक ही रहती है, एक स्थान में एक वस्तु और दूसरे में दूसरी नहीं; जिसके अनुसार इब्राहीम, और इसहाक, और याकूब, और मूसा, और दाऊद धर्मी थे, और वे सब भी जो परमेश्वर के मुँह से सराहे गए; परन्तु मूर्ख मनुष्यों के द्वारा अधर्मी ठहराए गए, जो मनुष्य के न्याय में से न्याय करते, और सारी मानवजाति के आचरण को अपने ही तुच्छ स्वभावों से नापते थे। मानो शस्त्रागार में, कोई जो नहीं जानता कि हर अंग के लिए क्या उपयुक्त है, अपना सिर टाँगों के कवच से ढाँके, या टोप से पाँव में जूती पहनना चाहे, और शिकायत करे कि वे ठीक नहीं बैठे: या मानो जिस दिन दोपहर बाद सार्वजनिक रूप से कामकाज बन्द हो, कोई इस बात पर क्रोधित हो कि उसे दुकान खुली रखने की अनुमति नहीं, क्योंकि वह दोपहर से पहले तो खुली रख चुका था; या जब एक ही घर में वह किसी दास को कोई वस्तु हाथ में लेते देखे, जिसे छूने की अनुमति भण्डारी को नहीं; या कोई बात जो बाहर तो अनुमत है, पर भोजनकक्ष में वर्जित; और क्रोधित हो कि एक ही घर, और एक ही परिवार में, वही वस्तु हर जगह, और सब को, एक-सी नहीं बाँटी जाती। ऐसे ही वे लोग हैं जो यह सुनकर झुँझलाते हैं कि पहले धर्मी मनुष्यों के लिए कोई बात व्यवस्थासम्मत थी, जो अब नहीं; या यह कि परमेश्वर ने, कुछ सामयिक कारणों से, उन्हें एक बात की आज्ञा दी, और इन्हें दूसरी की, जब कि दोनों उसी एक धार्मिकता की आज्ञा मानते थे: जब कि वे एक ही मनुष्य में, और एक ही दिन में, और एक ही घर में देखते हैं कि भिन्न-भिन्न अंगों के लिए भिन्न-भिन्न वस्तुएँ उपयुक्त हैं, और जो वस्तु पहले व्यवस्थासम्मत थी, वह कुछ समय बाद नहीं; एक कोने में अनुमत या आज्ञात, पर दूसरे में ठीक ही वर्जित और दण्डनीय। तो क्या न्याय भिन्न-भिन्न या परिवर्तनशील है? नहीं, वरन् वे समय, जिन पर वह प्रधानता करता है, समान रूप से नहीं बहते, क्योंकि वे समय हैं। परन्तु मनुष्य, जिनके दिन पृथ्वी पर थोड़े हैं, इसलिए कि वे अपनी इन्द्रियों से पिछले युगों और अन्य जातियों की बातों के कारणों को, जिनका उन्हें अनुभव न था, इनके साथ नहीं मिला सकते जिनका उन्हें अनुभव है, जब कि एक ही शरीर, दिन, या परिवार में वे सहज ही देख लेते हैं कि हर अंग, और ऋतु, भाग, और व्यक्ति के लिए क्या उपयुक्त है; एक पर वे आपत्ति करते हैं, दूसरे को मान लेते हैं।

ये बातें मैं तब न जानता, न ध्यान देता था; वे हर ओर से मेरी दृष्टि पर पड़ती थीं, और मैं उन्हें न देखता था। मैं छन्द रचता था, जिनमें मैं हर चरण हर जगह नहीं रख सकता था, वरन् भिन्न-भिन्न छन्दों में भिन्न-भिन्न रीति से; और किसी एक ही छन्द में भी वही चरण हर जगह नहीं। तौभी वह कला ही, जिसके द्वारा मैं रचता था, इन भिन्न-भिन्न स्थितियों के लिए भिन्न-भिन्न सिद्धान्त नहीं रखती थी, वरन् सब को एक में समेटे हुए थी। तौभी मैं यह न देख सका कि वह धार्मिकता, जिसकी भले और पवित्र मनुष्य आज्ञा मानते थे, कहीं अधिक श्रेष्ठ और उदात्त रीति से उन सब बातों को, जिनकी परमेश्वर ने आज्ञा दी, एक ही में समेटे हुए थी, और किसी भी भाग में भिन्न न होती थी; यद्यपि भिन्न-भिन्न समयों में उसने सब कुछ एक साथ नहीं ठहराया, वरन् जो हर एक के लिए उपयुक्त था, वही बाँटा और आज्ञात किया। और मैंने अपने अन्धेपन में, पवित्र पूर्वजों की निन्दा की, न केवल जहाँ उन्होंने वर्तमान वस्तुओं को वैसे ही काम में लाया जैसे परमेश्वर ने आज्ञा दी और उन्हें उभारा, वरन् वहाँ भी जहाँ वे आनेवाली बातों की भविष्यवाणी कर रहे थे, जैसे परमेश्वर उनमें प्रकट कर रहा था।

अध्याय 8

क्या किसी भी समय या स्थान में यह अन्याय हो सकता है कि कोई परमेश्वर से अपने सारे मन, और अपने सारे प्राण, और अपनी सारी बुद्धि से प्रेम करे; और अपने पड़ोसी से अपने समान? इसलिए वे गन्दे अपराध जो प्रकृति के विरुद्ध हैं, हर जगह और हर समय घृणित और दण्ड के योग्य हैं; जैसे सदोम के मनुष्यों के थे: जिन्हें यदि सारी जातियाँ करें, तो वे सब परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार उसी एक अपराध की दोषी ठहरेंगी, जिसने मनुष्यों को ऐसा नहीं बनाया कि वे एक-दूसरे का ऐसा दुरुपयोग करें। क्योंकि वह संगति भी, जो परमेश्वर और हमारे बीच होनी चाहिए, तब भंग होती है जब वही स्वभाव, जिसका वह रचयिता है, वासना की विकृति से अशुद्ध किया जाता है। परन्तु वे काम जो मनुष्यों के रीति-रिवाजों के विरुद्ध अपराध हैं, उनसे उन रीति-रिवाजों के अनुसार बचना चाहिए जो अलग-अलग प्रचलित हैं; कि जो बात किसी नगर या जाति के रीति या व्यवस्था से ठहराई और पक्की की गई हो, वह किसी के भी अराजक सुख के लिए भंग न की जाए, चाहे वह देशी हो या परदेशी। क्योंकि जो भी अंश अपने पूरे के साथ मेल नहीं खाता, वह खटकनेवाला है। परन्तु जब परमेश्वर किसी काम को करने की आज्ञा देता है, जो किसी जाति के रीति-रिवाजों या वाचा के विरुद्ध हो, यद्यपि उन्होंने पहले कभी वह न किया हो, तौभी उसे करना है; और यदि छोड़ दिया गया हो, तो फिर से चलाना है; और यदि कभी ठहराया ही न गया हो, तो अब ठहराना है। क्योंकि यदि किसी राजा के लिए, अपने राज्य में, यह उचित हो कि वह ऐसी आज्ञा दे जो न उससे पहले किसी ने, न स्वयं उसने पहले कभी दी थी, और उसकी आज्ञा मानना राज्य के सामान्य हित के विरुद्ध नहीं हो सकता (नहीं, वरन् यह उसके विरुद्ध होता यदि उसकी आज्ञा न मानी जाती, क्योंकि राजाओं की आज्ञा मानना मानव-समाज की एक सामान्य वाचा है); तो हमें कितना अधिक बिना हिचकिचाए परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए, उन सब बातों में जिनकी वह आज्ञा देता है, जो अपनी सारी सृष्टि का शासक है! क्योंकि जैसे मनुष्य के समाज की शक्तियों में, छोटे की अपेक्षा बड़े अधिकार की आज्ञा मानी जाती है, वैसे ही सबसे बढ़कर परमेश्वर की माननी चाहिए।

वैसे ही हिंसा के कामों में, जहाँ हानि पहुँचाने की इच्छा होती है, चाहे निन्दा से हो या चोट से; और ये या तो बदला लेने के लिए, जैसे एक बैरी दूसरे के विरुद्ध; या किसी दूसरे के किसी लाभ के लिए, जैसे बटोही के विरुद्ध डाकू; या किसी बुराई से बचने के लिए, जैसे उसके विरुद्ध जिससे भय हो; या डाह के कारण, जैसे कोई कम भाग्यवान किसी अधिक भाग्यवान के विरुद्ध, या किसी वस्तु में फूला-फला हुआ उसके विरुद्ध जिसका अपने बराबर होना उसे डराता, या दुखी करता है; या केवल दूसरे के दुःख के सुख के लिए, जैसे मल्लयुद्ध के दर्शक, या दूसरों का उपहास और ठट्ठा करनेवाले। ये ही अधर्म के शीर्ष हैं, जो शरीर की, आँख की, या प्रभुता की लालसा से उपजते हैं, चाहे अकेले, या दो मिलकर, या सब एक साथ; और यों मनुष्य उन तीनों, और सातों के विरुद्ध बुरी रीति से जीते हैं, अर्थात् उस दस तारवाली सारंगी के विरुद्ध, तेरी दस आज्ञाओं के विरुद्ध, हे परमेश्वर, परमप्रधान, और परममधुर। परन्तु तेरे विरुद्ध कैसे गन्दे अपराध हो सकते हैं, जो अशुद्ध किया ही नहीं जा सकता? या तेरे विरुद्ध हिंसा के कैसे काम, जिसे हानि पहुँचाई ही नहीं जा सकती? परन्तु तू उसका पलटा लेता है जो मनुष्य अपने ही विरुद्ध करते हैं, यह देखते हुए कि जब वे तेरे विरुद्ध पाप करते हैं, तब वे अपने ही प्राणों के विरुद्ध दुष्टता करते हैं, और अधर्म अपने आप को झुठलाता है, अपने स्वभाव को, जिसे तूने रचा और ठहराया है, बिगाड़ते और उलटते हुए, या अनुमत वस्तुओं के अमर्यादित उपयोग से, या अनुमत वस्तुओं में उस उपयोग की ओर जलते हुए जो प्रकृति के विरुद्ध है; या वे दोषी पाए जाते हैं, हृदय और जीभ से तेरे विरुद्ध क्रोध करते हुए, पैनों पर लात मारते हुए; या जब, मानव-समाज की सीमा को तोड़कर, वे ढिठाई से अपनी ही इच्छा के गुटबन्दियों या फूटों में आनन्दित होते हैं, जैसा उन्हें कुछ पाने का लक्ष्य या ठेस का विषय मिले। और ये बातें तब होती हैं जब तू छोड़ दिया जाता है, हे जीवन के सोते, जो सारी सृष्टि का एकमात्र और सच्चा रचयिता और शासक है, और अपनी ही इच्छा के घमण्ड से, उसमें से कोई एक झूठी वस्तु चुनकर उससे प्रेम किया जाता है। तब एक दीन भक्ति के द्वारा हम तेरी ओर लौटते हैं; और तू हमें हमारी बुरी आदतों से शुद्ध करता है, और उनके पापों पर दयालु होता है जो स्वीकार करते हैं, और बन्दी की कराहट सुनता है, और हमें उन जंज़ीरों से खोलता है जो हमने अपने ही लिए बनाई थीं, यदि हम तेरे विरुद्ध किसी झूठी स्वच्छन्दता के सींग न उठाएँ, और अधिक के लोभ के कारण सब कुछ की हानि न सहें, अपने ही निज हित से, तुझ से बढ़कर, जो सब का हित है, प्रेम करते हुए।

अध्याय 9

गन्दगी और हिंसा के इन अपराधों, और इतने सारे अधर्मों के बीच, उन मनुष्यों के पाप हैं जो कुल मिलाकर उन्नति कर रहे हैं; जिन्हें ठीक न्याय करनेवाले, सिद्धता के नियम के अनुसार, निन्दनीय ठहराते हैं, तौभी उन व्यक्तियों को, भविष्य के फल की आशा में, सराहते हैं, जैसे बढ़ते हुए अन्न की हरी बाली में। और कुछ ऐसे हैं, जो गन्दगी या हिंसा के अपराधों के समान दिखते हैं, तौभी पाप नहीं हैं; क्योंकि वे न तो तेरे, हे हमारे प्रभु परमेश्वर, न मानव-समाज के विरुद्ध अपराध करते हैं; अर्थात् जब किसी नियत समय के लिए उपयुक्त वस्तुएँ जीवन की सेवा के लिए प्राप्त की जाती हैं, और हम नहीं जानते कि रखने की किसी लालसा से या नहीं; या जब वस्तुएँ, सुधार के निमित्त, ठहराए हुए अधिकार के द्वारा दण्डित की जाती हैं, और हम नहीं जानते कि हानि पहुँचाने की किसी लालसा से या नहीं। तब बहुत-से काम जो मनुष्यों की दृष्टि में अस्वीकृत हैं, तेरी गवाही से स्वीकृत हैं; और बहुत-से, मनुष्यों से सराहे हुए, (तेरे साक्षी रहते) दोषी ठहराए जाते हैं: क्योंकि काम का रूप, और करनेवाले का मन, और उस समय की अनजानी आवश्यकता, अलग-अलग बदलती रहती है। परन्तु जब तू एकाएक किसी अनोखी और अनसोची वस्तु की आज्ञा देता है, हाँ, यद्यपि तूने उसे कभी वर्जित किया हो, और अब भी कुछ समय के लिए अपनी आज्ञा का कारण छिपाए रखे, और वह मनुष्यों के किसी समाज की विधि के विरुद्ध हो, तौभी किसे सन्देह कि उसे करना ही है, यह देखते हुए कि मनुष्यों का वही समाज न्यायी है जो तेरी सेवा करता है? परन्तु धन्य हैं वे जो तेरी आज्ञाओं को जानते हैं! क्योंकि सब कुछ तेरे सेवकों के द्वारा किया गया; या तो वर्तमान के लिए किसी आवश्यक बात को प्रकट करने के लिए, या आनेवाली बातों को पहले से दिखाने के लिए।

अध्याय 10

इन बातों से अनजान होकर, मैं तेरे उन पवित्र सेवकों और भविष्यद्वक्ताओं का ठट्ठा करता था। और उनका ठट्ठा करके मैंने क्या पाया, केवल यही कि तेरे द्वारा मेरा ठट्ठा किया जाऊँ, अनजाने ही धीरे-धीरे और पग-पग उन मूर्खताओं की ओर खींचा जाता हुआ, यहाँ तक कि यह विश्वास करूँ कि जब अंजीर का पेड़ तोड़ा जाता है तब वह रोता है, और उसका पेड़, अर्थात् उसकी माता, दूधिया आँसू बहाती है? तौभी वह अंजीर (जो किसी और के, न कि उसके अपने दोष से तोड़ा गया) यदि किसी मानी सन्त ने खाया होता, और अपनी अँतड़ियों में मिला लिया होता, तो वह उसमें से स्वर्गदूत साँस के साथ बाहर निकालता, हाँ, अपनी प्रार्थना की हर कराह या आह पर उसमें से ईश्वरत्व के कण फूट निकलते, जो परमप्रधान और सच्चे परमेश्वर के कण उस अंजीर में बँधे रह जाते, यदि किसी “चुने हुए” सन्त के दाँतों या पेट से मुक्त न किए जाते! और मैंने, अभागे ने, यह विश्वास किया कि पृथ्वी के फलों पर उन मनुष्यों से अधिक दया दिखाई जानी चाहिए, जिनके लिए वे रचे गए थे। क्योंकि यदि कोई भूखा, जो मानी न हो, कुछ माँगे, तो वह टुकड़ा जो उसे दिया जाए, मानो प्राणदण्ड का दोषी ठहरा हुआ जान पड़ता।

अध्याय 11

और तूने ऊपर से अपना हाथ बढ़ाया, और मेरे प्राण को उस गहरे अन्धकार में से खींच निकाला, जब मेरी माता, तेरी विश्वासयोग्य दासी, मेरे लिए तेरे सामने रोती थी, इससे भी अधिक जितना माताएँ अपने बच्चों की शारीरिक मृत्यु पर रोती हैं। क्योंकि उसने, उस विश्वास और आत्मा से जो उसे तुझ से मिला था, उस मृत्यु को पहचान लिया जिसमें मैं पड़ा था, और तूने उसकी सुन ली, हे प्रभु; तूने उसकी सुन ली, और उसके आँसुओं को तुच्छ न जाना, जब वे बहते हुए हर उस स्थान की भूमि को सींचते थे जहाँ वह प्रार्थना करती थी; हाँ, तूने उसकी सुन ली। क्योंकि वह स्वप्न कहाँ से आया जिससे तूने उसे शान्ति दी; कि उसने मुझे अपने साथ रहने, और घर में उसी मेज़ पर खाने की अनुमति दी, जिससे वह सिकुड़ने लगी थी, मेरी भूल की निन्दाओं से घृणा और घिन करती हुई? क्योंकि उसने अपने आप को एक लकड़ी के रूल पर खड़ी देखा, और एक चमकता हुआ जवान उसकी ओर आता हुआ, प्रसन्न और उस पर मुस्कुराता हुआ, जब कि वह स्वयं शोक कर रही थी, और शोक से दबी हुई थी। परन्तु उसने (सिखाने के लिए, जैसा कि उनकी रीति है कि वे सिखाए न जाएँ) उससे उसके शोक और प्रतिदिन के आँसुओं के कारण पूछे, और जब उसने उत्तर दिया कि वह मेरे विनाश पर विलाप कर रही है, तब उसने उसे शान्त रहने को कहा, और कहा कि देख और ध्यान दे, “कि जहाँ तू है, वहीं मैं भी हूँ।” और जब उसने देखा, तो मुझे अपने पास उसी रूल पर खड़ा पाया। यह कहाँ से आया, केवल इसी से कि तेरे कान उसके हृदय की ओर लगे थे? हे तू भला सर्वशक्तिमान, जो हम में से हर एक की ऐसी चिन्ता करता है, मानो केवल उसी की चिन्ता करता हो; और यों सब की, मानो वे एक ही हों!

यह भी कहाँ से आया, कि जब उसने मुझ से यह दर्शन कहा, और मैं उसे यह अर्थ देने पर तुला कि “वह तो बल्कि यह आशा न छोड़े कि एक दिन वही होगी जो मैं हूँ”; उसने तुरन्त, बिना किसी हिचकिचाहट के, उत्तर दिया: “नहीं; क्योंकि मुझ से यह नहीं कहा गया कि ‘जहाँ वह है, वहाँ तू भी’; परन्तु ‘जहाँ तू है, वहाँ वह भी’?” मैं तेरे सामने स्वीकार करता हूँ, हे प्रभु, कि जहाँ तक मुझे स्मरण है (और मैंने इसकी चर्चा प्रायः की है), तेरा वह उत्तर, मेरी जागती हुई माता के द्वारा — कि वह मेरी झूठी व्याख्या की प्रबलता से भ्रमित न हुई, और यों झट देख लिया जो देखना था, जिसे मैंने उसके बोलने से पहले निश्चय ही न भाँपा था — तब भी मुझे उस स्वप्न से भी अधिक हिला गया, जिसके द्वारा उस पवित्र स्त्री के लिए एक आनन्द, जो इतने समय बाद पूरा होना था, उसकी वर्तमान वेदना की सान्त्वना के निमित्त, इतने पहले से पूर्वसूचित किया गया था। क्योंकि प्रायः नौ वर्ष बीत गए, जिनमें मैं उस गहरे गड्ढे की कीचड़ में, और झूठ के अन्धकार में लोटता रहा, बारम्बार उठने का यत्न करता, पर और भी बुरी तरह पटका जाता। इतने समय भर वह पवित्र, भक्त, और संयमी विधवा (जैसी तू प्रेम करता है), अब आशा से और अधिक उत्साहित, तौभी अपने रोने और विलाप में तनिक भी ढीली न पड़ती, अपनी भक्ति की हर घड़ी में मेरी दशा के लिए तेरे सामने विलाप करने से कभी न रुकी। और उसकी प्रार्थनाएँ तेरी उपस्थिति में पहुँचीं; तौभी तूने मुझे उस अन्धकार में उलझा और फिर-फिर उलझा रहने दिया।

अध्याय 12

इसी बीच तूने उसे एक और उत्तर दिया, जो मुझे स्मरण है; क्योंकि बहुत कुछ मैं छोड़े जाता हूँ, उन बातों की ओर हड़बड़ाता हुआ जो मुझे तेरे सामने स्वीकार करने के लिए और अधिक दबाती हैं, और बहुत कुछ मुझे स्मरण नहीं। तब तूने उसे एक और उत्तर दिया, अपने एक याजक के द्वारा, तेरी कलीसिया में पले-बढ़े एक विशेष धर्माध्यक्ष के द्वारा, जो तेरी पुस्तकों में अच्छी तरह पढ़ा हुआ था। जब इस स्त्री ने उससे विनती की कि वह कृपा करके मुझ से बातचीत करे, मेरी भूलों का खण्डन करे, मुझे बुरी बातें भुलाए, और भली बातें सिखाए (क्योंकि जब वह ऐसे लोग पाता जो उसे ग्रहण करने योग्य होते, तब वह ऐसा किया करता था), तब उसने बुद्धिमानी से इनकार कर दिया, जैसा मैंने बाद में जाना। क्योंकि उसने उत्तर दिया कि मैं अभी सिखाए जाने योग्य नहीं, उस पाखण्ड की नवीनता से फूला हुआ, और मैं पहले ही कितनों ही अनाड़ियों को छलपूर्ण प्रश्नों से उलझा चुका था, जैसा उसने उसे बताया था: “पर उसे कुछ समय के लिए रहने दे” (वह कहता है), “केवल उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना कर, वह स्वयं पढ़ते-पढ़ते पा लेगा कि वह भूल क्या है, और उसकी भक्तिहीनता कितनी बड़ी है।” उसी समय उसने उसे बताया कि कैसे वह स्वयं, जब छोटा था, अपनी बहकाई हुई माता के द्वारा मानी-मतवालों के हाथ सौंप दिया गया था, और उसने उनकी प्रायः सारी पुस्तकें न केवल पढ़ी थीं, वरन् बारम्बार उतारी भी थीं, और (बिना किसी के किसी तर्क या प्रमाण के) देख लिया था कि उस पन्थ से कितना बचना चाहिए; और उसने उससे परहेज़ किया था। यह कहने पर भी जब वह सन्तुष्ट न हुई, वरन् विनतियों और बहुत आँसुओं के साथ उस पर और अधिक दबाव डालती रही कि वह मुझ से मिले और मुझ से चर्चा करे; तब वह, उसके इस हठ से कुछ अप्रसन्न होकर, कहता है, “अपने मार्ग पर चली जा, और परमेश्वर तुझे आशीष दे, क्योंकि यह सम्भव नहीं कि इन आँसुओं का पुत्र नष्ट हो।” यह उत्तर उसने (जैसा उसने मुझ से अपनी बातचीत में प्रायः बताया) ऐसे लिया मानो वह स्वर्ग से गूँजा हो।

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