स्वीकारोक्तियाँ
ग्यारहवीं पुस्तक

अध्याय 11 · 54 मिनट का पठन

ग्यारहवीं पुस्तक

अध्याय 1

हे प्रभु, अनन्तता तो तेरी ही है; फिर क्या तू उससे अनजान है जो मैं तुझ से कहता हूँ? या क्या तू समय के भीतर देखता है कि समय में क्या बीतता है? तो फिर मैं तेरे सम्मुख इतनी सारी बातें क्रम से क्यों रखता हूँ? सचमुच इसलिए नहीं कि तू उन्हें मेरे द्वारा जान ले, वरन इसलिए कि मैं अपनी और अपने पाठकों की भक्ति को तेरी ओर जगाऊँ, कि हम सब कहें, महान है यहोवा, और अति स्तुति के योग्य है। मैं पहले ही कह चुका हूँ; और फिर कहूँगा, कि तेरे प्रेम के प्रेम के कारण मैं यह करता हूँ। क्योंकि हम प्रार्थना भी करते हैं, तौभी सत्य ने कहा है, तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन-किन वस्तुओं की आवश्यकता है। तब यह हमारी अभिलाषाएँ ही हैं जिन्हें हम तेरे सामने खोल देते हैं, अपनी ही दुर्दशा और हम पर की गई तेरी दया को स्वीकार करते हुए, कि तू हमें पूरी तरह छुड़ा ले, क्योंकि तूने आरम्भ किया है, कि हम अपने आप में दीन न रहें, वरन तुझ में धन्य हों; क्योंकि तूने ही हमें बुलाया है, कि हम आत्मा में दीन, और नम्र, और शोक करनेवाले, और धार्मिकता के भूखे-प्यासे, और दयावन्त, और मन के शुद्ध, और मेल कराने वाले बनें। देख, मैंने तुझ से बहुत सी बातें कही हैं, जैसा मैं कर सका और जैसा मैं चाहता था, क्योंकि तू ही ने पहले चाहा कि मैं तेरे सामने अंगीकार करूँ, हे मेरे प्रभु परमेश्वर। क्योंकि तू भला है, क्योंकि तेरी करुणा सदा की है।

अध्याय 2

परन्तु मैं अपनी लेखनी की जीभ से तेरी सारी उपदेश-वाणियों, और तेरे सारे भयों, और सान्त्वनाओं, और अगुवाइयों को कैसे कह पाऊँ, जिनके द्वारा तू मुझे इस योग्य ले आया कि मैं तेरा वचन प्रचार करूँ, और तेरी प्रजा को तेरा संस्कार बाँटूँ? और यदि मैं उन्हें क्रम से कह भी सकूँ, तो भी समय की बूँदें मेरे लिए बहुमूल्य हैं; और बहुत समय से मैं तेरी व्यवस्था पर ध्यान करने को जलता रहा हूँ, और उसी में तेरे सम्मुख अपनी निपुणता और अनिपुणता को, तेरे प्रकाश के पौ फटने को, और अपने अंधकार के अवशेषों को अंगीकार करने को, जब तक कि निर्बलता सामर्थ्य से निगल न ली जाए। और मैं नहीं चाहता कि इसके सिवा और कुछ उन घड़ियों को चुरा ले जाए जो मुझे अपनी देह को ताज़ा करने की और अपने मन की शक्तियों की आवश्यकताओं से, और उस सेवा से जो हम मनुष्यों के प्रति ऋणी हैं, अथवा जिसके यद्यपि हम ऋणी नहीं तौभी चुकाते हैं, मुक्त मिलती हैं।

हे मेरे प्रभु परमेश्वर, मेरी प्रार्थना पर कान लगा, और तेरी दया मेरी अभिलाषा को सुन ले: क्योंकि वह केवल मेरे ही लिए चिन्तित नहीं, वरन भाईचारे के प्रेम की सेवा करना चाहती है; और तू मेरे हृदय को देखता है, कि वह ऐसा ही है। मैं अपने विचार और जीभ की सेवा तुझे बलिदान करना चाहता हूँ; तू ही मुझे वह दे, जो मैं तुझे अर्पण करूँ। क्योंकि मैं दीन और दरिद्र हूँ, और तू उन सब के लिए धनी है जो तुझे पुकारते हैं; तू, जिस तक चिन्ता की पहुँच नहीं, तौभी हमारी चिन्ता करता है। मेरे भीतरी और बाहरी दोनों होंठों का सब उतावलेपन और सब झूठ से खतना कर: तेरे पवित्रशास्त्र मेरे शुद्ध आनन्द हों: न मैं उनमें धोखा खाऊँ, न उनके द्वारा किसी को धोखा दूँ। हे प्रभु, सुन और तरस खा, हे मेरे प्रभु परमेश्वर, अन्धों के प्रकाश, और निर्बलों के सामर्थ्य; हाँ, देखनेवालों के भी प्रकाश, और बलवानों के सामर्थ्य; मेरे प्राण की सुन ले, और उसे गहराइयों में से पुकारते हुए सुन। क्योंकि यदि तेरे कान गहराइयों में भी हमारे संग न हों, तो हम कहाँ जाएँ? कहाँ पुकारें? दिन तेरा है, और रात भी तेरी है; तेरे संकेत पर पल भाग जाते हैं। उसमें से तेरी व्यवस्था की गुप्त बातों पर हमारे ध्यान के लिए कुछ अवकाश दे, और हम खटखटानेवालों के विरुद्ध उसे बन्द न कर। क्योंकि तूने व्यर्थ में इतने पृष्ठों के अन्धकारमय भेद नहीं लिखवाए; और वे वन उन हरिणों से रहित नहीं जो उनमें जा छिपते हैं और घूमते-फिरते हैं; चरते, बैठते, और जुगाली करते हैं। हे प्रभु, मुझे सिद्ध कर, और उन्हें मुझ पर प्रगट कर। देख, तेरा शब्द मेरा आनन्द है; तेरा शब्द सुखों की बहुतायत से भी बढ़कर है। जो मैं प्रेम करता हूँ वह दे: क्योंकि मैं सचमुच प्रेम करता हूँ; और यह भी तू ही ने दिया: अपने ही दानों को न त्याग, और अपनी उस हरी घास को तुच्छ न जान जो प्यासी है। जो कुछ मैं तेरी पुस्तकों में पाऊँ, उसे मैं तेरे सामने अंगीकार करूँ, और स्तुति का शब्द सुनूँ, और तुझ में पीऊँ, और तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातों पर ध्यान करूँ; उस आरम्भ से लेकर, जहाँ तूने आकाश और पृथ्वी को बनाया, तेरे संग तेरे पवित्र नगर के अनन्त राज्य तक।

हे प्रभु, मुझ पर दया कर, और मेरी अभिलाषा सुन। क्योंकि मेरी समझ में वह पृथ्वी की नहीं, न सोने-चाँदी और मणियों की, न शानदार वस्त्रों की, न आदर-मान और पदों की, न शरीर के सुखों की, और न इस हमारी यात्रा-सी ज़िन्दगी के लिए और देह के लिए आवश्यक वस्तुओं की है: ये सब तो उन्हें दे दी जाएँगी जो तेरे राज्य और तेरी धार्मिकता को ढूँढ़ते हैं। देख, हे मेरे प्रभु परमेश्वर, मेरी अभिलाषा किसमें है। दुष्टों ने मुझे भोग-विलासों की बातें बताई हैं, परन्तु वैसी नहीं जैसी तेरी व्यवस्था, हे प्रभु। देख, मेरी अभिलाषा किसमें है। देख, हे पिता, देख, और देख कर स्वीकार कर; और तेरी दया की दृष्टि में यह भाए, कि मुझ पर तेरा अनुग्रह हो, कि मुझ खटखटानेवाले पर तेरे वचनों के भीतरी भाग खुल जाएँ। मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह, तेरे पुत्र की दोहाई देकर विनती करता हूँ, जो तेरे दाहिने हाथ का पुरुष है, मनुष्य का पुत्र, जिसे तूने अपने लिए स्थिर किया है, तेरे और हमारे मध्यस्थ के रूप में, जिसके द्वारा तूने हमें ढूँढ़ा, न कि हम तुझे ढूँढ़ते थे, वरन तूने ही हमें ढूँढ़ा, कि हम तुझे ढूँढ़ें,—तेरा वचन, जिसके द्वारा तूने सब वस्तुएँ बनाईं, और उनके बीच मुझे भी;—तेरा एकलौता, जिसके द्वारा तूने विश्वास करनेवाले लोगों को लेपालकपन के लिए बुलाया, और उनमें मुझे भी;—मैं तुझ से उसी की दोहाई देकर विनती करता हूँ, जो तेरे दाहिने हाथ बैठा है, और हमारे लिए तुझ से मध्यस्थता करता है, जिसमें ज्ञान और बुद्धि के सारे भण्डार छिपे हुए हैं। इन्हीं को मैं तेरी पुस्तकों में ढूँढ़ता हूँ। उसी के विषय में मूसा ने लिखा; यह वह स्वयं कहता है; यह सत्य कहता है।

अध्याय 3

मैं सुनना और समझना चाहता हूँ, कि कैसे “आदि में तूने आकाश और पृथ्वी को बनाया।” मूसा ने यह लिखा, लिखा और चला गया, यहाँ से तुझ से तेरे पास चला गया; और अब वह मेरे सामने नहीं है। क्योंकि यदि होता, तो मैं उसे थामकर उससे पूछता, और तेरी दोहाई देकर उससे विनती करता कि ये बातें मुझ पर खोल दे, और अपनी देह के कानों को उन शब्दों पर लगाता जो उसके मुख से फूट पड़ते। और यदि वह इब्रानी में बोलता, तो व्यर्थ ही वह मेरी इन्द्रियों पर पड़ता, और उसका कुछ भी मेरे मन को न छूता; परन्तु यदि लातीनी में, तो मैं जान लेता कि उसने क्या कहा। परन्तु मैं कहाँ से जानता, कि उसने सच कहा या नहीं? हाँ, और यदि मैं यह भी जान लेता, तो क्या मैं उससे जानता? सचमुच मेरे भीतर, भीतर, मेरे विचारों की कोठरी में, सत्य, जो न इब्रानी, न यूनानी, न लातीनी, न किसी असभ्य भाषा का है, बिना स्वर या जीभ के अंगों के, या अक्षरों की ध्वनि के, कहता, “यह सत्य है,” और मैं तुरन्त तेरे उस जन से दृढ़ता से कहता, “तू सच कहता है।” अतः जब मैं उससे पूछ नहीं सकता, तो तुझ से, हाँ तुझ ही से, हे सत्य, जिससे भरकर उसने सच कहा, तुझ से, हे मेरे परमेश्वर, मैं विनती करता हूँ, मेरे पापों को क्षमा कर; और तू, जिसने उसे अपने दास को ये बातें कहने को दिया, मुझे भी दे कि मैं उन्हें समझूँ।

अध्याय 4

देख, आकाश और पृथ्वी विद्यमान हैं; वे यह प्रचार करते हैं कि वे सृजे गए; क्योंकि वे बदलते और भिन्न होते रहते हैं। जबकि जो कुछ बनाया नहीं गया, तौभी है, उसमें कुछ भी ऐसा नहीं जो पहले उसमें न रहा हो; और बदलना और भिन्न होना यही तो है। वे यह भी प्रचार करते हैं, कि उन्होंने अपने आप को नहीं बनाया; “इसलिए हम हैं, क्योंकि हम बनाए गए; अतः हम, इससे पहले कि हम होते, ऐसे न थे कि अपने आप को बनाते।” अब बात का प्रमाण, कहनेवालों का शब्द है। इसलिए हे प्रभु, तूने ही उन्हें बनाया; तू जो सुन्दर है, क्योंकि वे सुन्दर हैं; तू जो भला है, क्योंकि वे भले हैं; तू जो है, क्योंकि वे हैं; तौभी वे न वैसे सुन्दर हैं, न भले, और न वैसे हैं, जैसा तू उनका सृजनहार है; जिसकी तुलना में, वे न सुन्दर हैं, न भले, और न हैं। यह हम जानते हैं, तेरा धन्यवाद हो। और हमारा ज्ञान, तेरे ज्ञान की तुलना में, अज्ञान है।

अध्याय 5

परन्तु तूने आकाश और पृथ्वी को कैसे बनाया? और तेरी इतनी विशाल रचना का यन्त्र क्या था? क्योंकि यह किसी मनुष्य-कारीगर की भाँति न था, जो अपने मन के विवेक के अनुसार एक वस्तु से दूसरी वस्तु गढ़ता है, और किसी रीति से उसे वैसा रूप दे सकता है, जैसा वह अपनी भीतरी आँख से अपने भीतर देखता है। और वह यह कर ही कैसे पाता, यदि तूने वह मन न बनाया होता? और वह उसी को रूप देता है जो पहले से विद्यमान है, और जिसका अस्तित्व है, जैसे मिट्टी, या पत्थर, या लकड़ी, या सोना, या इसी प्रकार की वस्तु। और वे होते ही कहाँ से, यदि तूने उन्हें न ठहराया होता? तूने कारीगर को उसकी देह दी, तूने अंगों को आज्ञा देनेवाला मन दिया, तूने वह पदार्थ दिया जिससे वह कुछ बनाता है; तूने वह समझ दी जिससे वह अपनी कला को ग्रहण करे, और भीतर देखे कि वह बाहर क्या करता है; तूने उसकी देह की इन्द्रिय दी, जिसके द्वारा, मानो किसी दुभाषिये के द्वारा, वह मन से पदार्थ तक वह पहुँचाए जो वह करता है, और अपने मन को बताए कि क्या हुआ; कि वह भीतर उस सत्य से परामर्श ले, जो स्वयं उस पर अधिकार रखता है, कि यह भला हुआ या नहीं। ये सब तेरी स्तुति करते हैं, जो सब का सृजनहार है। परन्तु तू उन्हें कैसे बनाता है? हे परमेश्वर, तूने आकाश और पृथ्वी को कैसे बनाया? सचमुच, न आकाश में, न पृथ्वी में तूने आकाश और पृथ्वी को बनाया; न वायु में, न जल में, क्योंकि ये भी आकाश और पृथ्वी के हैं; न सारे संसार में तूने सारा संसार बनाया; क्योंकि उसे बनाने से पहले कोई स्थान न था जहाँ उसे बनाया जाता, कि वह हो। और न तूने अपने हाथ में कोई ऐसी वस्तु थामी, जिससे आकाश और पृथ्वी बनाई जाती। क्योंकि वह तुझे कहाँ से मिलती, जिसे तूने न बनाया हो, कि उससे कुछ बनाया जाता? क्योंकि जो कुछ है, वह इसी कारण तो है कि तू है? इसलिए तू बोला, और वे बन गए, और अपने वचन में तूने उन्हें बनाया।

अध्याय 6

परन्तु तू बोला कैसे? क्या उस रीति से जैसे वह शब्द बादल में से निकला, यह कहते हुए, यह मेरा प्रिय पुत्र है? क्योंकि वह शब्द बीत गया और जाता रहा, आरम्भ हुआ और समाप्त हुआ; अक्षर गूँजे और जाते रहे, पहले के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, और इसी क्रम से आगे, जब तक सब के बाद अन्तिम, और अन्तिम के बाद सन्नाटा। इससे भरपूर रीति से स्पष्ट और साफ़ है कि किसी सृष्टि की गति ने उसे व्यक्त किया, जो स्वयं समय-बद्ध थी, और तेरी अनन्त इच्छा की सेवा कर रही थी। और तेरे ये शब्द, जो समय के लिए रचे गए, बाहरी कान ने उस बुद्धिमान प्राण को बताए, जिसका भीतरी कान तेरे अनन्त वचन को सुनता पड़ा था। परन्तु उसने समय में गूँजते इन शब्दों की तुलना तेरे उस अनन्त वचन से की जो मौन में है, और कहा, “यह भिन्न है, बहुत ही भिन्न। ये शब्द मुझसे बहुत नीचे हैं, और ये हैं ही नहीं, क्योंकि ये भाग जाते और बीत जाते हैं; परन्तु मेरे प्रभु का वचन मुझ से ऊपर सदा बना रहता है।” यदि तब गूँजते और बीतते शब्दों में तूने कहा कि आकाश और पृथ्वी बनाए जाएँ, और यों आकाश और पृथ्वी बनाई, तो आकाश और पृथ्वी से पहले कोई देहधारी सृष्टि थी, जिसकी समय में गतियों के द्वारा वह शब्द समय में अपना मार्ग तय करता। परन्तु आकाश और पृथ्वी से पहले कुछ भी देहधारी न था; और यदि था, तो निश्चय तूने, ऐसे किसी बीतनेवाले शब्द के बिना, उसे रचा, जिससे यह बीतनेवाला शब्द बनाया जाता, जिसके द्वारा कहा जाता, आकाश और पृथ्वी बनें। क्योंकि वह जो कुछ भी होता, जिससे ऐसा शब्द बनाया जाता, यदि तेरे ही द्वारा न बनाया गया होता, तो वह हो ही न सकता। तब तू किस वचन से बोला, कि कोई देह बनाई जाए, जिसके द्वारा ये शब्द फिर बनाए जाएँ?

अध्याय 7

तब तू हमें उस वचन को समझने के लिए बुलाता है, जो परमेश्वर है, तेरे संग परमेश्वर, जो अनन्त रूप से बोला जाता है, और जिसके द्वारा सब वस्तुएँ अनन्त रूप से बोली जाती हैं। क्योंकि जो बोला गया, वह क्रम-क्रम से न बोला गया, कि एक बात समाप्त हो तब अगली बोली जाए, वरन सब वस्तुएँ एक साथ और अनन्त रूप से। नहीं तो हमारे पास समय और परिवर्तन होता; और न सच्ची अनन्तता, न सच्ची अमरता। यह मैं जानता हूँ, हे मेरे परमेश्वर, और धन्यवाद देता हूँ। मैं जानता हूँ, मैं तेरे सामने अंगीकार करता हूँ, हे प्रभु, और मेरे संग वह भी जानता और तुझे धन्य कहता है, जो सत्य को दृढ़ करने में कृतघ्न नहीं। हम जानते हैं, हे प्रभु, हम जानते हैं; क्योंकि जिस मात्रा में कोई वस्तु वह नहीं जो थी, और वह है जो न थी, उसी मात्रा में वह मरती और उठती है। तब तेरे वचन का कुछ भी न स्थान छोड़ता है, न किसी का स्थान लेता है, क्योंकि वह सचमुच अमर और अनन्त है। और इसलिए तेरे साथ समान रूप से अनन्त उस वचन से तू एक ही बार और अनन्त रूप से वह सब कह देता है जो तू कहता है; और जो कुछ तू कहता है कि बनाया जाए, वह बन जाता है; और तू कहने के सिवा और किसी रीति से नहीं बनाता; तौभी जो कुछ तू कहकर बनाता है, वह सब एक साथ, या अनन्त, नहीं बनता।

अध्याय 8

क्यों, मैं तुझ से विनती करता हूँ, हे मेरे प्रभु परमेश्वर? मैं इसे एक रीति से देखता हूँ; परन्तु इसे कैसे व्यक्त करूँ, यह मैं नहीं जानता, केवल इतना कि जो कुछ होने लगता है, और होना छोड़ देता है, वह तभी आरम्भ होता, और तभी छोड़ता है, जब तेरे अनन्त विवेक में यह जाना जाता है, कि उसे आरम्भ होना या छोड़ना चाहिए; जिस विवेक में न कुछ आरम्भ होता, न छूटता है। यही तेरा वचन है, जो “आदि भी है, क्योंकि वह हम से बातें भी करता है।” यों सुसमाचार में वह शरीर के द्वारा बोलता है; और यह मनुष्यों के कानों में बाहर से गूँजा; कि इस पर विश्वास किया जाए और इसे भीतर ढूँढ़ा जाए, और अनन्त सत्य में पाया जाए; जहाँ वह भला और एकमात्र गुरु अपने सब चेलों को सिखाता है। वहाँ, हे प्रभु, मैं तेरा शब्द अपने से बातें करते सुनता हूँ; क्योंकि जो हमें सिखाता है, वही हम से बोलता है; परन्तु जो हमें नहीं सिखाता, वह चाहे बोले भी, हम से नहीं बोलता। अब हमें कौन सिखाता है, यदि वह अटल सत्य नहीं? क्योंकि जब हमें किसी परिवर्तनशील सृष्टि के द्वारा भी समझाया जाता है; तब भी हम उसी अटल सत्य की ओर ले चले जाते हैं; जहाँ हम सचमुच सीखते हैं, जब हम खड़े होकर उसे सुनते हैं, और दुल्हे के शब्द के कारण अति आनन्दित होते हैं, जो हमें उसी की ओर लौटा देता है, जिससे हम हैं। और इसीलिए वह आदि है, क्योंकि यदि वह बना न रहता, तो जब हम भटक जाते, तो लौटने को कोई ठौर न होता। परन्तु जब हम भूल से लौटते हैं, तो जानने के द्वारा लौटते हैं; और कि हम जानें, इसलिए वह हमें सिखाता है, क्योंकि वह आदि है, और हम से बातें करता है।

अध्याय 9

इसी आदि में, हे परमेश्वर, तूने आकाश और पृथ्वी को बनाया, अपने वचन में, अपने पुत्र में, अपनी सामर्थ्य में, अपनी बुद्धि में, अपने सत्य में; अद्भुत रीति से बोलते, और अद्भुत रीति से बनाते हुए। कौन समझ सके? कौन इसे बता सके? वह क्या है जो मेरे भीतर से चमकता है, और मेरे हृदय को बिना चोट पहुँचाए छू लेता है; और मैं काँप उठता और सुलग उठता हूँ? मैं काँपता हूँ, जिस मात्रा में मैं उसके समान नहीं; मैं सुलगता हूँ, जिस मात्रा में मैं उसके समान हूँ। वह बुद्धि है, स्वयं बुद्धि जो मेरे भीतर से चमकती है; मेरी धुँधलाहट को चीरती हुई जो फिर मुझ पर छा जाती है, उससे मूर्छित होकर, उस अंधकार के कारण जो मेरे दण्ड के लिए मुझ पर घिर आता है। क्योंकि मेरा बल आवश्यकता में घटा दिया गया है, यहाँ तक कि मैं अपने आशीषों को नहीं सम्भाल सकता, जब तक कि तू, हे प्रभु, जो मेरे सारे अधर्मों पर अनुग्रहकारी रहा है, मेरे सारे रोगों को चंगा न कर दे। क्योंकि तू ही मेरे प्राण को विनाश से छुड़ाएगा, और करुणा और कोमल दया का मुकुट मुझे पहनाएगा, और अच्छी वस्तुओं से मेरी अभिलाषा को तृप्त करेगा, क्योंकि मेरी जवानी उकाब के समान नई हो जाएगी। क्योंकि हम आशा में उद्धार पाए हैं, इसी कारण हम धीरज से तेरी प्रतिज्ञाओं की बाट जोहते हैं। जो सुन सके, वह तुझे अपने भीतर तेरी वाणी में से उपदेश देते सुने: मैं निडर होकर पुकार उठूँगा, हे प्रभु, तेरे काम कैसे अद्भुत हैं, तूने बुद्धि से उन सब को बनाया; और यही बुद्धि आदि है, और उसी आदि में तूने आकाश और पृथ्वी को बनाया।

अध्याय 10

देख, क्या वे अपने पुराने खमीर से भरे हुए नहीं, जो हम से कहते हैं, “आकाश और पृथ्वी को बनाने से पहले परमेश्वर क्या करता था? क्योंकि (वे कहते हैं) यदि वह निठल्ला था और कुछ न करता था, तो फिर वह अब से आगे और सदा भी वैसा ही क्यों नहीं करता, जैसा उसने पहले किया? क्योंकि यदि परमेश्वर में कोई नई गति उठी, और कोई सृष्टि बनाने की नई इच्छा, जो उसने पहले कभी न बनाई थी, तो वह सच्ची अनन्तता कैसे होती, जहाँ कोई ऐसी इच्छा उठती है, जो पहले न थी? क्योंकि परमेश्वर की इच्छा कोई सृष्टि नहीं, वरन सृष्टि से पहले है; क्योंकि कुछ भी सृजा न जा सकता, यदि सृजनहार की इच्छा पहले न होती। तब परमेश्वर की इच्छा उसके स्वरूप ही की है। और यदि परमेश्वर के स्वरूप में कुछ ऐसा उठा हो, जो पहले न था, तो वह स्वरूप सचमुच अनन्त नहीं कहा जा सकता। परन्तु यदि परमेश्वर की इच्छा अनन्तकाल से यही रही है कि सृष्टि हो, तो सृष्टि भी अनन्तकाल से क्यों न हुई?”

अध्याय 11

जो ऐसा कहते हैं, वे अब तक तुझे नहीं समझते, हे परमेश्वर की बुद्धि, प्राणों के प्रकाश, अब तक नहीं समझते कि वे वस्तुएँ कैसे बनती हैं, जो तेरे द्वारा, और तुझ में बनती हैं: तौभी वे अनन्त वस्तुओं को समझने का यत्न करते हैं, जबकि उनका हृदय बीती और आनेवाली वस्तुओं की गतियों के बीच फड़फड़ाता रहता है, और अब भी अस्थिर है। कौन उसे थामकर स्थिर करे, कि वह थोड़ी देर टिका रहे, और थोड़ी देर उस सदा-अटल अनन्तता की महिमा को थाम ले, और उसकी तुलना उन समयों से करे जो कभी स्थिर नहीं होते, और देखे कि उसकी तुलना हो ही नहीं सकती; और कि लम्बा समय लम्बा हो ही नहीं सकता, केवल बीतती हुई अनेक गतियों में से बनता है, जिन्हें एक साथ लम्बा नहीं किया जा सकता; परन्तु कि अनन्त में कुछ नहीं बीतता, वरन समग्र वर्तमान रहता है; जबकि कोई समय एक ही साथ पूरा वर्तमान नहीं रहता: और कि सारा बीता हुआ समय आनेवाले समय से धकेला जाता है, और सब आनेवाला बीते हुए के पीछे-पीछे चलता है; और सब बीता और आनेवाला सृजा जाता है, और उसी में से बहता है जो सदा वर्तमान है? कौन मनुष्य के हृदय को थामे, कि वह स्थिर खड़ा रहे, और देखे कि अनन्तता जो सदा स्थिर खड़ी है, न बीती न आनेवाली, बीते और आनेवाले समयों को कैसे उच्चारती है? क्या मेरा हाथ यह कर सकता है, या मेरे मुख का हाथ वचन के द्वारा इतनी बड़ी बात कर सकता है?

अध्याय 12

देख, मैं उससे उत्तर देता हूँ जो पूछता है, “आकाश और पृथ्वी को बनाने से पहले परमेश्वर ने क्या किया?” मैं उस रीति से उत्तर नहीं देता जैसे कहा जाता है कि किसी ने हँसी-मज़ाक में दिया (प्रश्न के दबाव से बचते हुए), “वह (वह कहता है) भेदों में ताक-झाँक करनेवालों के लिए नरक तैयार कर रहा था।” पूछनेवालों के प्रश्नों का उत्तर देना एक बात है, और पूछनेवालों की खिल्ली उड़ाना दूसरी। सो मैं ऐसा उत्तर नहीं देता; क्योंकि मैं तो जो नहीं जानता उसके विषय में “मैं नहीं जानता” कहना अधिक चाहूँगा, बजाय इसके कि गहरी बातें पूछनेवाले पर हँसी उड़वाऊँ और झूठी बातें उत्तर में देनेवाले के लिए वाहवाही पाऊँ। परन्तु मैं कहता हूँ कि तू, हमारा परमेश्वर, हर एक सृष्टि का सृजनहार है: और यदि “आकाश और पृथ्वी” इस नाम से हर एक सृष्टि समझी जाए; तो मैं निडर होकर कहता हूँ, “कि आकाश और पृथ्वी को बनाने से पहले परमेश्वर ने कुछ भी नहीं बनाया।” क्योंकि यदि उसने बनाया, तो सृष्टि के सिवा और क्या बनाया? और भला होता कि जो कुछ मैं अपने लाभ के लिए जानना चाहता हूँ वह मैं वैसे ही जानता, जैसे मैं यह जानता हूँ, कि किसी सृष्टि के बनाए जाने से पहले कोई सृष्टि न बनाई गई।

अध्याय 13

परन्तु यदि कोई भटकता हुआ मस्तिष्क बीते हुए समयों की छवियों पर घूमे, और अचम्भा करे कि तू, सर्वशक्तिमान और सब का सृजनहार और सब का सम्भालनेवाला परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी का रचनेवाला, इतने बड़े काम को बनाने से पहले असंख्य युगों तक क्यों रुका रहा; तो वह जाग उठे और विचार करे, कि वह झूठी कल्पनाओं पर अचम्भा कर रहा है। क्योंकि असंख्य युग बीत ही कैसे सकते, जिन्हें तूने न बनाया हो, तू जो सब युगों का रचयिता और सृजनहार है? या ऐसे कौन-से समय होते, जो तेरे द्वारा न बनाए गए? या वे बीत ही कैसे सकते, यदि वे कभी थे ही नहीं? तब जब तू ही सब समयों का सृजनहार है, यदि आकाश और पृथ्वी को बनाने से पहले कोई समय था, तो वे क्यों कहते हैं कि तूने काम करना छोड़ रखा था? क्योंकि वही समय तूने बनाया, और समय बीत ही न सकते, जब तक तूने वे समय न बनाए। परन्तु यदि आकाश और पृथ्वी से पहले कोई समय था ही नहीं, तो यह क्यों पूछा जाता है, कि तूने तब क्या किया? क्योंकि कोई “तब” था ही नहीं, जब कोई समय ही न था।

और तू समय के द्वारा समय से पहले नहीं आता: नहीं तो तू सब समयों से पहले न होता। परन्तु तू सब बीती हुई वस्तुओं से पहले है, सदा-वर्तमान अनन्तता की उच्चता के द्वारा; और सब भविष्य से बढ़कर है क्योंकि वे भविष्य हैं, और जब वे आएँगे, तब बीते हुए हो जाएँगे; परन्तु तू वही का वही है, और तेरे वर्ष कभी नहीं चुकते। तेरे वर्ष न आते हैं न जाते हैं; जबकि हमारे तो आते भी और जाते भी हैं, कि वे सब आ जाएँ। तेरे वर्ष एक साथ स्थिर रहते हैं, क्योंकि वे स्थिर हैं ही; और जानेवाले वर्ष आनेवाले वर्षों से बाहर धकेले नहीं जाते, क्योंकि वे बीतते ही नहीं; परन्तु हमारे तो सब तब होंगे, जब वे फिर न रहेंगे। तेरे वर्ष एक ही दिन हैं; और तेरा दिन दैनिक नहीं, वरन आज है, क्योंकि तेरा आज कल के लिए स्थान नहीं छोड़ता, और न बीते हुए कल का स्थान लेता है। तेरा आज अनन्तता है; इसीलिए तूने उस समान-अनन्त को जन्म दिया, जिससे तूने कहा, आज मैंने तुझे जन्म दिया है। तूने सब वस्तुएँ बनाई हैं; और सब समयों से पहले तू है: और किसी भी समय में ऐसा न था कि समय न हो।

अध्याय 14

तब किसी भी समय ऐसा न था कि तूने कुछ न बनाया हो, क्योंकि समय को भी तूने ही बनाया। और कोई समय तेरे साथ समान-अनन्त नहीं, क्योंकि तू बना रहता है; परन्तु यदि वे बने रहते, तो वे समय ही न होते। क्योंकि समय है क्या? कौन इसे झट और संक्षेप में समझा सके? कौन इसे विचार में भी इतना समझ सके, कि इसके विषय में एक शब्द भी कह सके? परन्तु बातचीत में हम समय से बढ़कर किस वस्तु का इतना परिचित और जानते-बूझते उल्लेख करते हैं? और, जब हम इसकी चर्चा करते हैं, तब हम समझते हैं; और जब हम किसी और को इसकी चर्चा करते सुनते हैं, तब भी हम समझते हैं। तब समय है क्या? यदि कोई मुझसे न पूछे, तो मैं जानता हूँ: यदि मैं किसी पूछनेवाले को इसे समझाना चाहूँ, तो नहीं जानता: तौभी मैं निडर होकर कहता हूँ कि मैं यह जानता हूँ, कि यदि कुछ बीतता ही न, तो बीता हुआ समय न होता; और यदि कुछ आता ही न, तो आनेवाला समय न होता; और यदि कुछ होता ही न, तो वर्तमान समय न होता। तब वे दो समय, बीता और आनेवाला, हैं ही कैसे, जब कि बीता हुआ अब है ही नहीं, और आनेवाला अभी है ही नहीं? परन्तु वर्तमान, यदि वह सदा वर्तमान ही रहता, और कभी बीते हुए समय में न बदलता, तो सचमुच वह समय न होता, वरन अनन्तता होता। यदि वर्तमान समय (यदि उसे समय होना है) इसी कारण अस्तित्व में आता है, कि वह बीते हुए समय में बदल जाता है, तो हम यह कैसे कहें कि यह भी है, जिसके होने का कारण ही यह है, कि वह न रहेगा; अर्थात यों कि हम सच में यह नहीं कह सकते कि समय है, केवल इसलिए कि उसकी प्रवृत्ति न होने की ओर है?

अध्याय 15

तौभी हम कहते हैं, “लम्बा समय” और “छोटा समय”; फिर भी, केवल बीते या आनेवाले समय का। लम्बा बीता समय (उदाहरण के लिए) हम उसे कहते हैं जो सौ वर्ष पहले हुआ; और लम्बा आनेवाला समय, जो सौ वर्ष बाद होगा। परन्तु छोटा बीता समय, हम उसे कहते हैं (मान लो) जो दस दिन पहले हुआ; और छोटा आनेवाला समय, जो दस दिन बाद होगा। परन्तु जो है ही नहीं, वह किस अर्थ में लम्बा या छोटा है? क्योंकि बीता हुआ, अब नहीं है; और भविष्य, अभी नहीं है। तो हम यह न कहें, “यह लम्बा है”; वरन बीते हुए के विषय में, “यह लम्बा रहा है”; और भविष्य के विषय में, “यह लम्बा होगा।” हे मेरे प्रभु, मेरे प्रकाश, क्या यहाँ भी तेरा सत्य मनुष्य पर हँसी न करेगा? क्योंकि वह बीता समय जो लम्बा था, क्या वह तब लम्बा था जब वह अब बीत चुका था, या जब वह अब भी वर्तमान था? क्योंकि वह तभी लम्बा हो सकता था, जब वह विद्यमान था, जो लम्बा हो सकता था; परन्तु बीत जाने पर, वह रहा ही नहीं; इसलिए वह लम्बा हो भी नहीं सकता था, जो था ही नहीं। तो हम यह न कहें, “बीता हुआ समय लम्बा रहा है”: क्योंकि हम वह पाएँगे ही नहीं, जो लम्बा रहा हो, क्योंकि जब से वह बीता, वह रहा ही नहीं; परन्तु हम यह कहें, “वह वर्तमान समय लम्बा था”; क्योंकि, जब वह वर्तमान था, तब वह लम्बा था। क्योंकि वह अभी इस प्रकार बीता न था कि न रहे; और इसलिए वह विद्यमान था, जो लम्बा हो सकता था; परन्तु बीत जाने के बाद, वह भी लम्बा न रहा, जो रहा ही न रहा।

तो हे मनुष्य के प्राण, आ देखें, कि क्या वर्तमान समय लम्बा हो सकता है: क्योंकि समय की लम्बाई को अनुभव करना और नापना तुझे ही दिया गया है। तू मुझे क्या उत्तर देगा? क्या सौ वर्ष, जब वर्तमान हों, तो लम्बा समय हैं? पहले यह देख, कि क्या सौ वर्ष वर्तमान हो सकते हैं। क्योंकि यदि इन वर्षों में से पहला अभी चल रहा है, तो वही वर्तमान है, परन्तु शेष निन्यानबे आनेवाले हैं, और इसलिए अभी हैं ही नहीं; परन्तु यदि दूसरा वर्ष चल रहा है, तो एक अब बीत चुका, दूसरा वर्तमान है, शेष आनेवाले हैं। और यों यदि हम इन सौ में से किसी बीच के वर्ष को वर्तमान मान लें, तो उससे पहले के सब बीत चुके; उसके बाद के सब आनेवाले हैं; इसलिए सौ वर्ष वर्तमान नहीं हो सकते। परन्तु कम से कम यह तो देख कि जो एक अभी चल रहा है, क्या वही वर्तमान है; क्योंकि यदि चालू महीना उसका पहला है, तो शेष आनेवाले हैं; यदि दूसरा, तो पहला पहले ही बीत चुका, और शेष अभी नहीं हैं। इसलिए, जो वर्ष अभी चल रहा है वह भी वर्तमान नहीं; और यदि वह समूचा वर्तमान नहीं, तो वर्ष वर्तमान नहीं। क्योंकि बारह महीने एक वर्ष हैं; जिनमें से चालू महीने के कारण जो भी वर्तमान है; शेष बीता, या आनेवाला है। यद्यपि वह चालू महीना भी वर्तमान नहीं; वरन केवल एक ही दिन; शेष आनेवाले हैं, यदि वह पहला है; बीते हुए, यदि वह अन्तिम है; यदि कोई बीच का, तो बीते और आनेवाले के मध्य में।

देख, कि वर्तमान समय, जिसे अकेला ही हमने पाया कि लम्बा कहा जा सकता है, घटते-घटते मुश्किल से एक दिन की लम्बाई तक सिमट गया। परन्तु आ, इसकी भी जाँच करें; क्योंकि एक दिन भी समूचा वर्तमान नहीं। क्योंकि वह रात और दिन के चौबीस घण्टों से बना है: जिनमें से, पहले के पास शेष आनेवाले हैं; अन्तिम के पास वे बीते हुए हैं; और किसी भी बीच के के पास उससे पहले के बीते हुए, और उसके पीछे के आनेवाले हैं। हाँ, वह एक घण्टा भी उड़ते हुए कणों में बीत जाता है। उसका जो कुछ उड़ गया, वह बीत चुका; जो कुछ शेष है, वह आनेवाला है। यदि समय का ऐसा एक क्षण सोचा जाए, जो पलों के छोटे से छोटे कणों में बाँटा न जा सके, तो वही अकेला है, जिसे वर्तमान कहा जा सकता है। परन्तु वह भी भविष्य से भूत की ओर ऐसी तेज़ी से उड़ जाता है, कि तनिक भी ठहराव के साथ लम्बा नहीं किया जा सकता। क्योंकि यदि वह हो, तो वह भूत और भविष्य में बँट जाता है। वर्तमान का कोई विस्तार नहीं। तब वह समय कहाँ है, जिसे हम लम्बा कह सकें? क्या वह आनेवाला है? उसके विषय में हम यह नहीं कहते, “यह लम्बा है”; क्योंकि वह अभी है ही नहीं, कि लम्बा हो; परन्तु हम कहते हैं, “यह लम्बा होगा।” तो वह कब होगा? क्योंकि यदि तब भी, जब वह अभी आनेवाला ही है, वह लम्बा न होगा (क्योंकि जो लम्बा हो सकता है, वह अभी है ही नहीं), और तब वह तभी लम्बा होगा, जब भविष्य में से जो अभी है ही नहीं, वह अब होने लगेगा, और वर्तमान हो चुकेगा, कि यों वह विद्यमान हो जो लम्बा हो सके; तब वर्तमान समय ऊपर कहे शब्दों में पुकार उठता है, कि वह लम्बा हो ही नहीं सकता।

अध्याय 16

तौभी, हे प्रभु, हम समयों के अन्तरालों को भाँप लेते हैं, और उनकी तुलना करते हैं, और कहते हैं, कुछ छोटे हैं, और कुछ बड़े। हम यह भी नापते हैं, कि यह समय उससे कितना अधिक लम्बा या छोटा है; और हम उत्तर देते हैं, “यह दुगना है, या तिगुना; और वह, बस एक ही बार, या उतना ही जितना वह।” परन्तु हम समयों को उन्हें भाँपते हुए तब नापते हैं जब वे बीत रहे होते हैं; परन्तु बीते हुए, जो अब हैं ही नहीं, या भविष्य के, जो अभी हैं ही नहीं, उन्हें कौन नाप सकता है? जब तक कोई यह कहने का दुस्साहस न करे, कि जो है ही नहीं, वह नापा जा सकता है। तब जब समय बीत रहा होता है, तब वह भाँपा और नापा जा सकता है; परन्तु जब वह बीत जाता है, तब नहीं, क्योंकि वह है ही नहीं।

अध्याय 17

मैं पूछता हूँ, हे पिता, मैं दावा नहीं करता: हे मेरे परमेश्वर, तू मुझ पर शासन कर और मेरी अगुवाई कर। “मुझे कौन बताएगा कि तीन समय नहीं होते (जैसा हम बालकपन में सीखे, और बालकों को सिखाया), बीता, वर्तमान, और भविष्य; वरन केवल वर्तमान ही, क्योंकि वे दो हैं ही नहीं? या वे भी हैं; और जब भविष्य में से वह वर्तमान होता है, तो क्या वह किसी गुप्त स्थान में से निकल आता है; और यों, जब हटता है, तो वर्तमान में से बीता हुआ हो जाता है? क्योंकि जिन्होंने आनेवाली बातों की भविष्यद्वाणी की, उन्होंने उन्हें कहाँ देखा, यदि वे अभी हैं ही नहीं? क्योंकि जो नहीं है, वह देखा नहीं जा सकता। और जो बीती हुई बातें सुनाते हैं, वे उन्हें सुना ही न सकते, यदि वे उन्हें मन में न ताड़ लेते, और यदि वे होतीं ही नहीं, तो वे किसी भी रीति से ताड़ी न जा सकतीं। तब बीती और आनेवाली बातें, हैं।”

अध्याय 18

हे प्रभु, मुझे और ढूँढ़ने की अनुमति दे। हे मेरी आशा, मेरा उद्देश्य विफल न हो। क्योंकि यदि बीते और आनेवाले समय हैं, तो मैं जानना चाहता हूँ कि वे कहाँ हैं। और यदि मैं यह न कर सकूँ, तौभी मैं इतना जानता हूँ, कि वे जहाँ कहीं हों, वहाँ वे भविष्य या भूत के रूप में नहीं, वरन वर्तमान के रूप में हैं। क्योंकि यदि वहाँ भी वे भविष्य हों, तो वे वहाँ अभी नहीं हैं; यदि वहाँ भी वे भूत हों, तो वे वहाँ अब नहीं हैं। तब जहाँ कहीं जो कुछ है, वह केवल वर्तमान के रूप में ही है। यद्यपि जब बीती हुई बातें सुनाई जाती हैं, तब स्मृति में से वे वस्तुएँ स्वयं नहीं निकाली जातीं जो बीत चुकीं, वरन वे शब्द जो, उन वस्तुओं की छवियों से गढ़े जाकर, उन्होंने बीतते समय इन्द्रियों के द्वारा मन में चिह्नों के रूप में छोड़ दिए। यों मेरा बचपन, जो अब नहीं है, बीते हुए समय में है, जो अब नहीं है: परन्तु अब जब मैं उसकी छवि को स्मरण करता हूँ, और उसकी चर्चा करता हूँ, तब मैं उसे वर्तमान में देखता हूँ, क्योंकि वह अब भी मेरी स्मृति में है। क्या आनेवाली बातों की भविष्यद्वाणी का भी कोई ऐसा ही कारण है; कि जो वस्तुएँ अभी हैं ही नहीं, उनकी छवियाँ पहले से विद्यमान होकर पहले ही भाँप ली जाएँ, यह मैं अंगीकार करता हूँ, हे मेरे परमेश्वर, कि मैं नहीं जानता। यह तो मैं निश्चय जानता हूँ, कि हम प्रायः अपने भविष्य के कामों पर पहले से सोचते हैं, और वह पहले-से-सोचना वर्तमान है, परन्तु वह काम जिसके विषय में हम पहले से सोचते हैं वह अभी है ही नहीं, क्योंकि वह आनेवाला है। जिसे, जब हम आरम्भ कर देते हैं, और जो हम पहले से सोच रहे थे उसे करने लगते हैं, तब वह काम होगा; क्योंकि तब वह भविष्य नहीं, वरन वर्तमान है।

तब आनेवाली बातों का यह गुप्त पूर्वानुभव चाहे किसी भी रीति से हो; केवल वही देखा जा सकता है, जो है। परन्तु जो अभी है, वह भविष्य नहीं, वरन वर्तमान है। तब जब कहा जाता है कि आनेवाली बातें देखी जाती हैं, तो वे स्वयं नहीं देखी जातीं जो अभी हैं ही नहीं (अर्थात जो होनेवाली हैं), वरन सम्भवतः उनके कारण या चिह्न देखे जाते हैं, जो पहले से हैं। इसलिए वे उनके लिए भविष्य नहीं, वरन वर्तमान हैं जो अब उसे देखते हैं, जिससे मन में पहले से रचा जाकर भविष्य की भविष्यद्वाणी की जाती है। जो पूर्व-कल्पनाएँ फिर अब हैं; और जो उन बातों की भविष्यद्वाणी करते हैं, वे उन कल्पनाओं को अपने सामने वर्तमान देखते हैं। अब वस्तुओं की अनगिनत विविधता मुझे कोई उदाहरण दे। मैं पौ फटते देखता हूँ, मैं पहले से बताता हूँ, कि सूर्य उदय होनेवाला है। जो मैं देखता हूँ, वह वर्तमान है; जिसका मैं पूर्व-संकेत करता हूँ, वह आनेवाला है; सूर्य नहीं, जो पहले से है; वरन सूर्योदय, जो अभी नहीं है। तौभी यदि मैं अपने मन में सूर्योदय की ही कल्पना न करता (जैसे अभी जब मैं इसकी चर्चा करता हूँ), तो मैं इसकी भविष्यद्वाणी न कर सकता। परन्तु न तो वह पौ फटना जिसे मैं आकाश में ताड़ता हूँ, सूर्योदय है, यद्यपि वह उससे पहले आता है; और न मेरे मन की वह कल्पना; ये दोनों अब वर्तमान देखे जाते हैं, कि वह दूसरा जो होनेवाला है उसकी भविष्यद्वाणी की जा सके। तब भविष्य की बातें अभी हैं ही नहीं: और यदि वे अभी हैं ही नहीं, तो वे हैं ही नहीं: और यदि वे हैं ही नहीं, तो वे देखी नहीं जा सकतीं; तौभी वर्तमान वस्तुओं में से उनकी भविष्यद्वाणी की जा सकती है, जो पहले से हैं, और देखी जाती हैं।

अध्याय 19

तब तू, अपनी सृष्टि के शासक, किस रीति से प्राणों को आनेवाली बातें सिखाता है? क्योंकि तूने अपने भविष्यद्वक्ताओं को सिखाया। तू, जिसके लिए कुछ भी आनेवाला नहीं, किस रीति से आनेवाली बातें सिखाता है; या यों कहें, भविष्य के विषय में वर्तमान बातें सिखाता है? क्योंकि, जो नहीं है, वह सिखाया भी नहीं जा सकता। यह रीति मेरी पहुँच से बहुत दूर है: यह मेरे लिए बहुत ऊँची है, मैं इस तक नहीं पहुँच सकता; परन्तु तेरी ओर से मैं पहुँच सकता हूँ, जब तू इसे प्रदान करे, हे मेरी छिपी आँखों के मधुर प्रकाश।

अध्याय 20

अब जो स्पष्ट और साफ़ है वह यह है, कि न आनेवाली बातें हैं, न बीती हुई। और यह ठीक-ठीक नहीं कहा जाता, “तीन समय हैं, बीता, वर्तमान, और आनेवाला”: तौभी सम्भवतः यह ठीक-ठीक कहा जा सकता है, “तीन समय हैं; बीती बातों का एक वर्तमान, वर्तमान बातों का एक वर्तमान, और आनेवाली बातों का एक वर्तमान।” क्योंकि ये तीनों किसी न किसी रीति से प्राण में विद्यमान हैं, परन्तु और कहीं मैं इन्हें नहीं देखता; बीती बातों का वर्तमान, स्मृति है; वर्तमान बातों का वर्तमान, दृष्टि है; आनेवाली बातों का वर्तमान, प्रत्याशा है। यदि हमें यों कहने की अनुमति हो, तो मैं तीन समय देखता हूँ, और मैं अंगीकार करता हूँ कि तीन हैं। यह भी कहा जाए, “तीन समय हैं, बीता, वर्तमान, और आनेवाला”: हमारी अशुद्ध रीति से। देख, मैं न आपत्ति करता हूँ, न विरोध, न दोष निकालता हूँ, यदि जो यों कहा जाता है वह केवल इस भाव से समझा जाए, कि न जो होनेवाला है वह अब है, और न जो बीत चुका है। क्योंकि थोड़ी ही बातें ऐसी हैं, जिन्हें हम ठीक-ठीक कहते हैं, अधिकांश बातें हम अशुद्ध रीति से कहते हैं; तौभी अभिप्रेत बातें समझ ली जाती हैं।

अध्याय 21

मैंने तो अभी-अभी कहा, कि हम समयों को बीतते समय नापते हैं, ताकि हम कह सकें, यह समय उससे दुगना है; या, यह उतना ही है जितना वह; और यों समय के किसी भी और भाग के विषय में, जो नापे जा सकें। इसलिए, जैसा मैंने कहा, हम समयों को बीतते समय नापते हैं। और यदि कोई मुझ से पूछे, “तू कैसे जानता है?” तो मैं उत्तर दूँ, “मैं जानता हूँ, कि हम नापते तो हैं, और जो हैं ही नहीं उन्हें हम नाप नहीं सकते; और बीती और आनेवाली बातें, हैं ही नहीं।” परन्तु वर्तमान समय को हम कैसे नापते हैं, जब उसका कोई विस्तार ही नहीं? वह बीतते समय नापा जाता है, परन्तु जब वह बीत चुकेगा, तब नहीं नापा जाता; क्योंकि तब नापने को कुछ रहेगा ही नहीं। परन्तु नापे जाते समय वह कहाँ से, किस रीति से, और कहाँ को बीतता है? कहाँ से, केवल भविष्य से? किस रीति से, केवल वर्तमान के बीच से? कहाँ को, केवल भूत में? इसलिए उससे, जो अभी है ही नहीं, उसके बीच से, जिसका कोई विस्तार नहीं, उसमें, जो अब है ही नहीं। तौभी हम नापते क्या हैं, यदि किसी विस्तार में समय को नहीं? क्योंकि हम एकहरा, और दुगना, और तिगुना, और बराबर, या इसी प्रकार की कोई और रीति से समय की चर्चा नहीं करते, केवल समयों के विस्तारों की। तब किस विस्तार में हम बीतते समय को नापते हैं? भविष्य में, जहाँ से वह बीतता है? परन्तु जो अभी है ही नहीं, उसे हम नापते नहीं। या वर्तमान में, जिसके बीच से वह बीतता है? परन्तु जहाँ कोई विस्तार ही नहीं, वहाँ हम नापते नहीं: या भूत में, जिसमें वह बीत जाता है? परन्तु जो अब है ही नहीं, उसे भी हम नापते नहीं।

अध्याय 22

मेरा प्राण इस अत्यन्त उलझी हुई पहेली को जानने के लिए आग-सा जल रहा है। इसे बन्द न कर, हे मेरे प्रभु परमेश्वर, भले पिता; मसीह के द्वारा मैं तुझ से विनती करता हूँ, इन साधारण, तौभी छिपी हुई बातों को मेरी अभिलाषा से बन्द न कर, कि वह इनमें घुसने से रोक दी जाए; वरन तेरी प्रकाशमय दया के द्वारा वे उदय हों, हे प्रभु। इन बातों के विषय में मैं किससे पूछूँ? और तुझ से बढ़कर मैं और किससे अधिक लाभ के साथ अपने अज्ञान को अंगीकार करूँ, तुझ से, जिसके लिए तेरे पवित्रशास्त्र की ओर इतनी प्रबलता से सुलगे मेरे ये अध्ययन बोझरूप नहीं? जो मैं प्रेम करता हूँ वह दे; क्योंकि मैं सचमुच प्रेम करता हूँ, और यह भी तूने मुझे दिया है। दे, हे पिता, तू जो सचमुच जानता है कि अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ कैसे देनी हैं। दे, क्योंकि मैंने जानने का बीड़ा उठाया है, और जब तक तू इसे न खोले तब तक मेरे सामने कष्ट है। मसीह के द्वारा मैं तुझ से विनती करता हूँ, उसके नाम में, परमपवित्र में, कोई मुझे विचलित न करे। क्योंकि मैंने विश्वास किया, इसी कारण मैं बोलता हूँ। यही मेरी आशा है, इसी के लिए मैं जीता हूँ, कि मैं प्रभु के मनोहर रूप का ध्यान करूँ। देख, तूने मेरे दिनों को पुराना कर दिया है, और वे बीतते जाते हैं, और कैसे, मैं नहीं जानता। और हम समय, और समय, और समयों, और समयों की चर्चा करते हैं, “उसके यह कहे कितना समय हुआ”; “उसके यह किए कितना समय हुआ”; और “मेरे उसे देखे कितना समय हुआ”; और “इस अक्षर का समय उस अकेले छोटे अक्षर से दुगना है।” ये शब्द हम बोलते हैं, और ये हम सुनते हैं, और समझे जाते हैं, और समझते हैं। ये अत्यन्त प्रकट और साधारण हैं, और वही बातें फिर बहुत ही गहराई में छिपी हैं, और उनका खोज निकालना नई बात होगी।

अध्याय 23

मैंने एक बार किसी विद्वान से सुना, कि सूर्य, चन्द्रमा, और तारों की गतियाँ समय बनाती हैं, और मैंने सहमति न दी। क्योंकि सब देहों की गतियाँ ही क्यों न समय हों? या, यदि आकाश की ज्योतियाँ बुझ जाएँ, और कुम्हार का चक्र घूमता रहे, तो क्या कोई समय न होगा जिससे हम उन घुमावों को नाप सकें, और कहें, कि या तो वह बराबर-बराबर रुकते हुए घूमा, या यदि वह कभी धीमे, कभी तेज़ घूमा, कि कुछ चक्कर लम्बे थे, और कुछ छोटे? या, जब हम यह कह रहे थे, तो क्या हम भी समय में न बोल रहे थे? या, क्या हमारे शब्दों में कुछ अक्षर छोटे, और कुछ लम्बे न होते, केवल इसलिए कि वे छोटे समय में गूँजे, और ये लम्बे में? हे परमेश्वर, मनुष्यों को यह दे कि वे किसी छोटी वस्तु में उन बातों को देख सकें जो बड़ी और छोटी दोनों वस्तुओं में समान हैं। आकाश के तारे और ज्योतियाँ, चिह्नों के लिए भी, और ऋतुओं के लिए, और वर्षों के लिए, और दिनों के लिए हैं; वे हैं; तौभी न तो मैं यह कहूँगा, कि उस काठ के चक्र का एक चक्कर एक दिन था, और न वह यह, कि वह इसलिए कोई समय न था।

मैं समय के बल और स्वभाव को जानना चाहता हूँ, जिसके द्वारा हम देहों की गतियों को नापते हैं, और कहते हैं (उदाहरण के लिए) यह गति उससे दुगनी लम्बी है। क्योंकि मैं पूछता हूँ, यह देखते हुए कि “दिन” केवल पृथ्वी पर सूर्य के ठहराव को नहीं दर्शाता (जिसके अनुसार दिन एक वस्तु है, रात दूसरी); वरन उसके पूर्व से फिर पूर्व तक के पूरे चक्कर को भी; जिसके अनुसार हम कहते हैं, “इतने दिन बीते,” और जब हम कहते हैं “इतने दिन,” तब रात भी उसमें सम्मिलित रहती है, और रातें अलग से नहीं गिनी जातीं;—तब यह देखते हुए कि एक दिन सूर्य की गति से और उसके पूर्व से फिर पूर्व तक के चक्कर से पूरा होता है, मैं पूछता हूँ, क्या केवल गति ही दिन बनाती है, या वह ठहराव जिसमें वह गति पूरी होती है, या दोनों? क्योंकि यदि पहली ही दिन है; तो हमारे पास एक दिन हो, चाहे सूर्य वह मार्ग इतने छोटे समय में पूरा कर ले, जितना एक घण्टा होता है। यदि दूसरी है, तो वह दिन न बने, यदि एक सूर्योदय और दूसरे के बीच केवल इतना छोटा ठहराव हो, जितना एक घण्टा होता है; वरन सूर्य को एक दिन पूरा करने के लिए चौबीस बार घूमना पड़े। यदि दोनों हैं, तो न वह दिन कहा जा सके; यदि सूर्य अपना पूरा चक्कर एक घण्टे के विस्तार में पूरा कर ले; और न वह, यदि, जब सूर्य ठहरा रहे, तो इतना समय बीत जाए, जितने में सूर्य प्रायः प्रातः से प्रातः तक अपना पूरा मार्ग पूरा करता है। इसलिए मैं अब यह न पूछूँगा, कि वह क्या है जिसे दिन कहते हैं; वरन, समय क्या है, जिसके द्वारा हम, सूर्य के चक्कर को नापते हुए, कहें कि वह अपने सामान्य समय के आधे में पूरा हुआ, यदि वह इतने छोटे विस्तार में, जितना बारह घण्टे, पूरा हुआ हो; और दोनों समयों की तुलना करके, इसे एकहरा समय, और उसे दुगना समय कहें; यहाँ तक कि यह मानकर भी कि सूर्य पूर्व से पूर्व तक अपना चक्कर, कभी उस एकहरे में, और कभी उस दुगने समय में पूरा करता है। तब कोई मुझ से यह न कहे, कि आकाशीय देहों की गतियाँ समय बनाती हैं, क्योंकि, जब एक जन की प्रार्थना पर, सूर्य ठहर गया, जब तक कि वह अपनी विजयी लड़ाई पूरी न कर सका, तब सूर्य ठहरा रहा, परन्तु समय चलता रहा। क्योंकि अपने ही ठहराए हुए समय के विस्तार में वह लड़ाई लड़ी और समाप्त हुई। तब मैं समय को एक प्रकार का विस्तार भाँपता हूँ। परन्तु क्या मैं इसे सचमुच भाँपता हूँ, या भाँपता-सा प्रतीत होता हूँ? तू, हे प्रकाश और सत्य, मुझे दिखाएगा।

अध्याय 24

क्या तू मुझे सहमति देने को कहता है, यदि कोई समय को “किसी देह की गति” कहकर परिभाषित करे? तू मुझे नहीं कहता। क्योंकि यह कि कोई देह समय के सिवा और किसी में नहीं चलती, यह मैं सुनता हूँ; यह तू कहता है; परन्तु यह कि किसी देह की गति ही समय है, यह मैं नहीं सुनता; यह तू नहीं कहता। क्योंकि जब कोई देह चलती है, तो मैं समय के द्वारा नापता हूँ, कि वह कितनी देर चलती है, उस समय से जब वह चलने लगी जब तक कि वह रुक न गई? और यदि मैंने न देखा हो कि वह कहाँ से आरम्भ हुई; और वह ऐसे चलती रहे कि मैं न देखूँ कि वह कब समाप्त होती है, तो मैं नाप नहीं सकता, केवल सम्भवतः उस समय से जब मैंने देखना आरम्भ किया, जब तक कि मैं देखना बन्द न करूँ। और यदि मैं बहुत देर तक देखूँ, तो मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि वह लम्बा समय है, परन्तु यह नहीं कि कितना लम्बा; क्योंकि जब हम कहते हैं “कितना लम्बा,” तो हम इसे तुलना के द्वारा कहते हैं; जैसे, “यह उतना ही लम्बा है जितना वह,” या “उससे दुगना लम्बा,” या इसी प्रकार का। परन्तु जब हम उन स्थानों की दूरियाँ अंकित कर सकें, जहाँ से और जहाँ को चलती हुई देह, या उसके भाग जाते हैं, यदि वह खराद की भाँति चली हो, तब हम ठीक-ठीक कह सकते हैं, कि उस देह या उसके भाग की गति, इस स्थान से उस स्थान तक, कितने समय में पूरी हुई। इसलिए यह देखते हुए कि किसी देह की गति एक वस्तु है, और वह जिसके द्वारा हम नापते हैं कि वह कितनी लम्बी है, दूसरी; कौन नहीं देखता, कि इन दोनों में से किसे समय कहना अधिक उचित है? क्योंकि यदि कोई देह कभी चलती है, कभी ठहरी रहती है, तो हम केवल उसकी गति को ही नहीं, वरन उसके ठहरे रहने को भी समय के द्वारा नापते हैं; और हम कहते हैं, “वह उतनी ही देर ठहरी रही, जितनी वह चली”; या “वह अपने चलने से दुगुनी या तिगुनी देर ठहरी रही”; या कोई और विस्तार जो हमारी नाप ने या तो निश्चित किया, या अनुमान से बताया; कम या अधिक, जैसा हम कहा करते हैं। तब समय किसी देह की गति नहीं है।

अध्याय 25

और मैं तेरे सामने अंगीकार करता हूँ, हे प्रभु, कि मैं अब तक नहीं जानता कि समय क्या है, और फिर मैं तेरे सामने अंगीकार करता हूँ, हे प्रभु, कि मैं जानता हूँ कि मैं यह समय में बोलता हूँ, और कि समय की बहुत देर चर्चा करके, वह “बहुत देर” स्वयं देर नहीं, वरन समय के ठहराव के कारण है। तब मैं यह कैसे जानता हूँ, जब मैं जानता ही नहीं कि समय क्या है? या सम्भवतः यों है कि मैं नहीं जानता कि जो मैं जानता हूँ उसे कैसे व्यक्त करूँ? हाय मुझ पर, कि मैं यह भी नहीं जानता, कि मैं क्या नहीं जानता। देख, हे मेरे परमेश्वर, तेरे सामने मैं झूठ नहीं बोलता; वरन जैसा मैं कहता हूँ, वैसा ही मेरा हृदय है। तू मेरा दीया जलाएगा; तू, हे मेरे प्रभु परमेश्वर, मेरे अंधकार को उजियाला करेगा।

अध्याय 26

क्या मेरा प्राण अत्यन्त सच्चाई से तेरे सामने अंगीकार नहीं करता, कि मैं समयों को नापता हूँ? तब क्या मैं नापता हूँ, हे मेरे परमेश्वर, और नहीं जानता कि मैं क्या नापता हूँ? मैं समय में किसी देह की गति नापता हूँ; और क्या मैं समय को स्वयं नहीं नापता? या क्या मैं सचमुच किसी देह की गति को यह नाप सकता कि वह कितनी लम्बी थी, और कितने लम्बे विस्तार में वह इस स्थान से उस स्थान तक आ सकती थी, बिना उस समय को नापे जिसमें वह चली? तब इसी समय को, मैं कैसे नापता हूँ? क्या हम किसी छोटे समय से किसी बड़े को नापते हैं, जैसे किसी हाथ के विस्तार से किसी छड़ के विस्तार को? क्योंकि यों तो सचमुच हम किसी छोटे अक्षर के विस्तार से किसी लम्बे अक्षर के विस्तार को नापते-से जान पड़ते हैं, और कहते हैं कि यह उस दूसरे का दुगना है। यों हम छन्दों के विस्तारों को पंक्तियों के विस्तारों से नापते हैं, और पंक्तियों के विस्तारों को गणों के विस्तारों से, और गणों के विस्तारों को अक्षरों के विस्तारों से, और लम्बों के विस्तारों को छोटे अक्षरों के विस्तार से; पृष्ठों से नहीं नापते (क्योंकि तब हम विस्तार नापते हैं, समय नहीं); परन्तु जब हम शब्दों को उच्चारते हैं और वे बीत जाते हैं, तब हम कहते हैं “यह एक लम्बा छन्द है, क्योंकि इतनी पंक्तियों से बना है; लम्बी पंक्तियाँ, क्योंकि इतने गणों से मिली हैं; लम्बे गण, क्योंकि इतने अक्षरों से लम्बे किए गए हैं; लम्बा अक्षर क्योंकि किसी छोटे का दुगना है। परन्तु न तो हम इस रीति से समय का कोई निश्चित माप पाते हैं; क्योंकि हो सकता है, कि कोई छोटी पंक्ति, अधिक भरपूर उच्चारी जाकर, किसी लम्बी से अधिक समय ले ले, जो हड़बड़ी में उच्चारी गई हो। और यों किसी पंक्ति, किसी गण, किसी अक्षर के विषय में भी। इसी से मुझे ऐसा जान पड़ा, कि समय खिंचाव के सिवा और कुछ नहीं; परन्तु किसका, यह मैं नहीं जानता; और मुझे अचम्भा है, कि कहीं वह मन ही का तो नहीं? क्योंकि, मैं तुझ से विनती करता हूँ, हे मेरे परमेश्वर, मैं क्या नापता हूँ, जब मैं या तो अनिश्चित रूप से कहता हूँ “यह उससे लम्बा समय है,” या निश्चित रूप से “यह उसका दुगना है”? कि मैं समय नापता हूँ, यह मैं जानता हूँ; तौभी मैं आनेवाला समय नहीं नापता, क्योंकि वह अभी है ही नहीं; न वर्तमान, क्योंकि वह किसी विस्तार से खींचा नहीं जाता; न बीता हुआ, क्योंकि वह अब है ही नहीं। तब मैं क्या नापता हूँ? बीतते समयों को, न कि बीते हुओं को? क्योंकि मैंने यों ही कहा।

अध्याय 27

हियाव रख, हे मेरे मन, और डटकर आगे बढ़। परमेश्वर हमारा सहायक है, उसी ने हमें बनाया, न कि हमने आप को। वहाँ आगे बढ़ जहाँ सत्य उदय होने लगता है। अब मान ले, किसी देह का शब्द गूँजने लगता है, और गूँजता है, और गूँजता रहता है, और सुन, वह थम जाता है; अब सन्नाटा है, और वह शब्द बीत चुका, और अब शब्द रहा ही नहीं। इससे पहले कि वह गूँजता, वह आनेवाला था, और नापा न जा सकता था, क्योंकि अभी वह था ही नहीं, और अब भी नहीं नापा जा सकता, क्योंकि वह अब रहा ही नहीं। तब इसलिए जब तक वह गूँजता रहा, तब तक वह नापा जा सकता था; क्योंकि तब कुछ ऐसा था जो नापा जा सकता था। परन्तु तब भी वह ठहरा हुआ न था; क्योंकि वह आगे बढ़ता, और बीतता जा रहा था। क्या वह इसी कारण कुछ अधिक नापा जा सकता था? क्योंकि बीतते समय, वह समय के किसी विस्तार में फैलता जा रहा था, कि वह नापा जा सके, क्योंकि वर्तमान का कोई विस्तार नहीं। इसलिए यदि तब वह नापा जा सकता था, तो, अब मान ले, कोई दूसरा शब्द गूँजने लगा है, और अब भी बिना किसी रुकावट के एक ही निरन्तर स्वर में गूँज रहा है; आ, जब तक वह गूँजता है तब तक उसे नापें; क्योंकि जब वह गूँजना छोड़ देगा, तब वह बीत चुकेगा, और नापने को कुछ न रहेगा; आ, हम उसे सचमुच नापें, और बताएँ कि वह कितना है। परन्तु वह अब भी गूँज रहा है, और उसे उसी क्षण से नहीं, जिसमें वह आरम्भ हुआ, उस अन्त तक जिसमें वह समाप्त हुआ, नापा जा सकता है। क्योंकि जो विस्तार बीच में है, वही वस्तु है जिसे हम नापते हैं, अर्थात किसी आरम्भ से किसी अन्त तक। इसलिए, जो शब्द अभी समाप्त नहीं हुआ, वह नापा नहीं जा सकता, कि यह कहा जा सके कि वह कितना लम्बा या छोटा है; और न वह किसी दूसरे के बराबर, या किसी एकहरे का दुगना, या इसी प्रकार का कहा जा सकता है। परन्तु समाप्त हो जाने पर, वह रहा ही नहीं। तब वह नापा कैसे जाए? तौभी हम समयों को नापते हैं; परन्तु न उन्हें जो अभी हैं ही नहीं, न उन्हें जो अब रहे ही नहीं, न उन्हें जो किसी ठहराव से लम्बे नहीं किए गए, न उन्हें जिनकी कोई सीमा नहीं। हम न आनेवाले समयों को, न बीते हुए, न वर्तमान, न बीतते हुए को नापते हैं; तौभी हम समयों को नापते हैं।

“Deus Creator omnium,” आठ अक्षरों की यह पंक्ति छोटे और लम्बे अक्षरों के बीच अदल-बदल कर चलती है। तब वे चार छोटे, अर्थात पहला, तीसरा, पाँचवाँ, और सातवाँ, उन चार लम्बों, अर्थात दूसरे, चौथे, छठे, और आठवें की तुलना में, केवल एकहरे हैं। इनमें से हर एक का, उनमें से हर एक की तुलना में, दुगना समय है: मैं उन्हें उच्चारता हूँ, उनके विषय में बताता हूँ, और ऐसा ही पाता हूँ, जैसा किसी की सीधी समझ भाँपती है। तब सीधी समझ से, मैं किसी लम्बे अक्षर को किसी छोटे से नापता हूँ, और अनुभव से पाता हूँ कि वह दुगना है; परन्तु जब एक दूसरे के बाद गूँजता है, यदि पहला छोटा हो, और पिछला लम्बा, तो मैं उस छोटे को कैसे रोक रखूँ, और नापते हुए, उसे उस लम्बे पर कैसे लगाऊँ, कि मैं इसे दुगना पाऊँ; जब कि वह लम्बा तब तक गूँजने ही नहीं लगता, जब तक कि छोटा गूँजना न छोड़ दे? और उस लम्बे को ही मैं वर्तमान के रूप में नापता हूँ, जब कि मैं उसे तब तक नापता ही नहीं जब तक वह समाप्त न हो जाए? अब उसका समाप्त होना ही उसका बीत जाना है। तब मैं नापता क्या हूँ? वह छोटा अक्षर कहाँ है जिससे मैं नापता हूँ? वह लम्बा कहाँ है जिसे मैं नापता हूँ? दोनों गूँज चुके, उड़ चुके, बीत चुके, अब रहे ही नहीं; तौभी मैं नापता हूँ, और दृढ़ता से उत्तर देता हूँ (जहाँ तक अभ्यस्त समझ पर भरोसा किया जाता है) कि समय के विस्तार के विषय में यह अक्षर केवल एकहरा है, वह दुगना। तौभी मैं यह कर न पाता, यदि वे पहले से बीत और समाप्त न हो चुके होते। तब मैं उन्हें स्वयं नहीं नापता, जो अब हैं ही नहीं, वरन अपनी स्मृति में किसी वस्तु को, जो वहाँ जमी रहती है।

हे मेरे मन, तुझ ही में मैं समयों को नापता हूँ। मुझे बीच में न रोक, अर्थात अपने प्रभावों के कोलाहल से अपने आप को बीच में न रोक। तुझ में मैं समयों को नापता हूँ; वह प्रभाव, जो वस्तुएँ बीतते समय तुझ में उत्पन्न करती हैं, उनके चले जाने पर भी बना रहता है; यही है जिसे अब भी वर्तमान पाकर, मैं नापता हूँ, न कि उन वस्तुओं को जो यह प्रभाव उत्पन्न करने को बीत जाती हैं। इसी को मैं नापता हूँ, जब मैं समयों को नापता हूँ। तब या तो यही समय है, या मैं समयों को नापता ही नहीं। तब क्या, जब हम सन्नाटे को नापते हैं, और कहते हैं कि यह सन्नाटा उतनी ही देर टिका जितनी वह वाणी? क्या हम अपने विचार को किसी वाणी की नाप तक नहीं खींच देते, मानो वह गूँज रही हो, कि यों हम किसी दिए हुए समय के विस्तार में सन्नाटे के अन्तरालों के विषय में बता सकें? क्योंकि यद्यपि वाणी और जीभ दोनों चुप रहें, तौभी विचार में हम कविताओं, और छन्दों, और किसी भी और वचन, या गतियों के परिमाणों को दोहरा जाते हैं, और समयों के विस्तारों के विषय में बताते हैं, कि यह उसकी तुलना में कितना है, ठीक वैसे ही जैसे यदि हम उन्हें मुँह से उच्चारते। यदि कोई कोई लम्बी ध्वनि निकालना चाहे, और विचार में तय कर ले कि वह कितनी लम्बी होनी चाहिए, तो वह सन्नाटे में ही समय के एक विस्तार से हो कर गुज़र चुका है, और उसे स्मृति के सुपुर्द करके, वह वाणी निकालने लगता है, जो तब तक गूँजती रहती है, जब तक कि वह ठहराए हुए अन्त तक न पहुँचाई जाए। हाँ, वह गूँज चुकी है, और गूँजेगी; क्योंकि उसका जितना भाग समाप्त हो चुका, वह पहले ही गूँज चुका, और शेष गूँजेगा। और यों वह आगे बढ़ती जाती है, जब तक कि वर्तमान अभिप्राय भविष्य को भूत में न पहुँचा दे; भविष्य के घटने से भूत बढ़ता जाता है, जब तक कि भविष्य के चुक जाने से, सब कुछ बीता हुआ न हो जाए।

अध्याय 28

परन्तु वह भविष्य कैसे घटता या चुकता है, जो अभी है ही नहीं? या वह भूत कैसे बढ़ता है, जो अब रहा ही नहीं, केवल इसके कि जो मन इसे करता है, उसमें तीन बातें की जाती हैं? क्योंकि वह प्रत्याशा करता है, वह विचार करता है, वह स्मरण करता है; कि यों जिसकी वह प्रत्याशा करता है, वह जिस पर वह विचार करता है उसके द्वारा, उसमें बीत जाए जिसे वह स्मरण करता है। इसलिए कौन इनकार करता है, कि आनेवाली बातें अभी हैं ही नहीं? तौभी, मन में आनेवाली बातों की प्रत्याशा है। और कौन इनकार करता है कि बीती बातें अब रही ही नहीं? तौभी मन में अब भी बीती बातों की स्मृति है। और कौन इनकार करता है कि वर्तमान समय का कोई विस्तार नहीं, क्योंकि वह एक पल में बीत जाता है? तौभी हमारा विचार बना रहता है, जिसके द्वारा जो वर्तमान होनेवाला है वह अनुपस्थित होता जाता है। तब वह भविष्य समय नहीं, जो लम्बा है, क्योंकि वह अभी है ही नहीं: वरन लम्बा भविष्य, “भविष्य की एक लम्बी प्रत्याशा” है, और न वह बीता समय, जो अब है ही नहीं, लम्बा है; वरन लम्बा भूत, “भूत की एक लम्बी स्मृति” है।

मैं एक भजन दोहराने को हूँ जिसे मैं जानता हूँ। इससे पहले कि मैं आरम्भ करूँ, मेरी प्रत्याशा समूचे पर फैली रहती है; परन्तु जब मैं आरम्भ कर देता हूँ, तब उसका जितना भी भाग मैं भूत में अलग करता जाऊँगा, वह मेरी स्मृति के साथ-साथ फैलता जाता है; यों मेरे इस काम का जीवन मेरी स्मृति के बीच, कि मैं क्या दोहरा चुका, और प्रत्याशा के बीच, कि मैं क्या दोहराने को हूँ, बँटा रहता है; परन्तु “विचार” मेरे संग वर्तमान रहता है, कि उसके द्वारा जो भविष्य था, वह पहुँचाया जाए, कि वह भूत हो जाए। जितना अधिक यह बार-बार किया जाता है, उतनी ही अधिक प्रत्याशा घटती हुई, स्मृति बढ़ती जाती है: जब तक कि सारी प्रत्याशा अन्त में चुक न जाए, जब वह सारा काम समाप्त होकर, स्मृति में बीत चुकेगा। और जो समूचे भजन में होता है, वही उसके हर एक अलग-अलग भाग में, और हर एक अलग-अलग अक्षर में होता है; वही उस लम्बे काम में भी लागू होता है, जिसका यह भजन एक भाग हो सकता है; वही मनुष्य के समूचे जीवन में लागू होता है, जिसके सब काम मनुष्य के भाग हैं; वही मनुष्यों की सन्तान के समूचे युग में लागू होता है, जिसके सब भाग मनुष्यों के जीवन हैं।

अध्याय 29

परन्तु इसलिए कि तेरी करुणा सब जीवनों से उत्तम है, देख, मेरा जीवन तो केवल एक बिखराव है, और तेरे दाहिने हाथ ने मुझे सम्भाला, मेरे प्रभु, मनुष्य के पुत्र में, जो तेरे, अर्थात उस एक के, और हम अनेकों के बीच मध्यस्थ है, हम जो अनेक वस्तुओं के बीच अपने अनेक-रूप बिखरावों के द्वारा अनेक हो गए हैं, कि उसके द्वारा मैं उसे थाम लूँ जिसमें मैं थामा गया हूँ, और अपने पुराने चालचलन से फिर से बटोर लिया जाऊँ, कि उस एक का अनुसरण करूँ, जो पीछे रह गया उसे भूलते हुए, और तनकर नहीं वरन आगे बढ़कर, उन वस्तुओं की ओर नहीं जो होंगी और बीत जाएँगी, वरन उन वस्तुओं की ओर जो सामने हैं, बिखरे मन से नहीं वरन एकाग्र मन से, मैं अपनी स्वर्गीय बुलाहट के प्रतिफल के लिए दौड़ता चला जाता हूँ, जहाँ मैं तेरी स्तुति का शब्द सुनूँ, और तेरे मनोहर रूप का ध्यान करूँ, जो न आनेवाला है, न बीत जानेवाला। परन्तु अब मेरे वर्ष शोक में बीतते हैं। और तू, हे प्रभु, मेरी शान्ति है, मेरा अनन्त पिता, परन्तु मैं समयों के बीच बँट गया हूँ, जिनका क्रम मैं नहीं जानता; और मेरे विचार, वरन मेरे प्राण की अन्तड़ियाँ तक, कोलाहलमय विविधताओं से फटी और छिन्न-भिन्न हैं, जब तक कि मैं तेरे प्रेम की आग से शुद्ध और गलाया जाकर, तुझ में एक साथ न बह जाऊँ।

अध्याय 30

और अब मैं खड़ा रहूँगा, और तुझ में दृढ़ हो जाऊँगा, अपने साँचे में, तेरे सत्य में; और मैं मनुष्यों के प्रश्नों को न सहूँगा, जो किसी दण्डस्वरूप रोग के कारण अपने समाने की सामर्थ्य से अधिक के प्यासे रहते हैं, और कहते हैं, “आकाश और पृथ्वी को बनाने से पहले परमेश्वर ने क्या किया?” या, “कभी पहले कुछ न बनाकर, कुछ बनाने का विचार उसके मन में आया ही कैसे?” उन्हें, हे प्रभु, यह दे कि वे भली भाँति सोच लें कि वे क्या कहते हैं, और पाएँ, कि “कभी नहीं” का दावा तब नहीं किया जा सकता, जब “समय” ही न हो। तब यह कि उसके विषय में कहा जाता है कि उसने “कभी कुछ न बनाया”; यह कहने के सिवा और क्या है, कि “किसी ‘नहीं में बनाया?” इसलिए वे यह देखें, कि समय सृजे हुए अस्तित्व के बिना नहीं हो सकता, और वह व्यर्थ की बात कहना छोड़ दें। वे भी उन वस्तुओं की ओर बढ़ें जो सामने हैं; और तुझे सब समयों से पहले समझें, जो सब समयों का अनन्त सृजनहार है, और कि कोई समय तेरे साथ समान-अनन्त नहीं, और न कोई सृष्टि, चाहे कोई सृष्टि सब समयों से पहले हो भी।

अध्याय 31

हे मेरे प्रभु परमेश्वर, तेरे भेदों का वह गुप्त स्थान कैसी गहराई है, और मेरे अपराधों के परिणामों ने मुझे उससे कितनी दूर फेंक दिया है! मेरी आँखों को चंगा कर, कि मैं तेरे प्रकाश के आनन्द का भागी हो सकूँ। निश्चय, यदि कोई मन ऐसे विशाल ज्ञान और पूर्वज्ञान से सम्पन्न हो, कि सब बीती और आनेवाली बातों को यों जान ले, जैसे मैं किसी एक जाने-पहचाने भजन को जानता हूँ, तो सचमुच वह मन अत्यन्त अद्भुत, और भय भरे विस्मय का है; इसमें कि न कोई बीती बात, न कोई आनेवाली बात, आगे के युगों में, उससे और अधिक छिपी रहती है, जितनी मुझ से, जब मैं वह भजन गाता था, यह छिपी थी कि उसका क्या, और कितना भाग आरम्भ से बीत चुका था, और क्या, और कितना अन्त तक शेष रहा। परन्तु ऐसा कभी न हो कि तू, विश्व का सृजनहार, प्राणों और देहों का सृजनहार, ऐसा कभी न हो कि तू इस रीति से सब बीती और आनेवाली बातों को जाने। बहुत, बहुत अधिक अद्भुत रीति से, और बहुत अधिक रहस्यमय रीति से, तू उन्हें जानता है। क्योंकि जैसे किसी की भावनाएँ, जो वह गाता है जिसे वह जानता है, या कोई जाना-पहचाना गीत सुनता है, आनेवाले शब्दों की प्रत्याशा से, और बीते हुओं के स्मरण से, भाँति-भाँति की होती हैं, और उसकी इन्द्रियाँ बँट जाती हैं,—वैसा तुझ पर कुछ नहीं होता, जो अपरिवर्तनीय रूप से अनन्त है, अर्थात मनों का अनन्त सृजनहार। तब जैसे तूने आदि में आकाश और पृथ्वी को अपने ज्ञान की बिना किसी भाँति-भाँति के जान लिया, वैसे ही तूने आदि में आकाश और पृथ्वी को अपने काम के बिना किसी बिखराव के बनाया। जो समझे, वह तेरे सामने अंगीकार करे; और जो न समझे, वह भी तेरे सामने अंगीकार करे। ओह, तू कितना ऊँचा है, तौभी मन के दीन तेरे निवास-स्थान हैं; क्योंकि तू झुके हुओं को उठाता है, और वे नहीं गिरते, जिनकी ऊँचाई तू है।

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