किसान से बातें
खत्ते में गेहूँ

अध्याय 18 · 20 मिनट का पठन

खत्ते में गेहूँ

“गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।”—मत्ती 13:30 “गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।” तब मनुष्य के पुत्र का उद्देश्य पूरा होगा। उसने अच्छा बीज बोया, और अन्त में उसका खत्ता उसी से भर जाएगा। निराश मत हो—मसीह निराश नहीं होगा। “वह अपने प्राणों का दुःख उठाकर उसे देखेगा और तृप्त होगा।” वह बहुमूल्य बीज लेकर रोता हुआ निकल गया, परन्तु वह अपनी पूलियाँ लिए आनन्द करता हुआ लौट आएगा।

“गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो;” तब शैतान की योजना विफल हो जाएगी। शत्रु ने आकर गेहूँ के बीच जंगली दाने बो दिए, इस आशा में कि नकली गेहूँ असली को नष्ट कर देगा या उसकी भारी हानि करेगा; परन्तु अन्त में वह विफल हुआ, क्योंकि गेहूँ पक गया और काटे जाने के लिये तैयार हो गया। मसीह का खत्ता भरा रहेगा; जंगली दाने गेहूँ को दबा न सकेंगे। उस दुष्ट को लज्जित होना पड़ेगा।

गेहूँ को इकट्ठा करने में भले स्वर्गदूतों को काम में लाया जाएगा: “काटनेवाले स्वर्गदूत हैं।” इससे उस बड़े दुष्ट स्वर्गदूत की हार और भी स्पष्ट हो जाती है। वह जंगली दाने बोता है, और कटनी को बिगाड़ने की चेष्टा करता है; इसलिए भले स्वर्गदूत भेजे जाते हैं कि वे उसकी विफलता पर उत्सव मनाएँ और परमेश्वर के काम की सफलता में अपने प्रभु के साथ आनन्द करें। शैतान को अपनी इस दख़लअन्दाज़ी से बहुत थोड़ा हाथ लगेगा; उसके सब प्रयत्न निष्फल कर दिए जाएँगे, और इस प्रकार वह दण्ड-वचन पूरा होगा: “तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा।”

स्वर्गदूतों को काम सौंपने के द्वारा, जितने भी बुद्धिमान प्राणियों के विषय में हम जानते हैं, वे सब अनुग्रह के काम में खींच लिए जाते हैं; चाहे द्वेष से हो या श्रद्धा-भरे भय से, छुटकारा उन सब को उत्तेजित करता है। परमेश्वर के अद्भुत काम सब के सामने प्रगट किए जाते हैं; क्योंकि ये बातें छिपकर नहीं की जातीं।

हम प्रायः स्वर्गदूतों को भूल जाते हैं। आओ, हम अपने प्रति उनकी कोमल चिन्ता को अनदेखा न करें; वे प्रभु को हमारे मन फिराव पर आनन्द करते देखते हैं, और उसके साथ आनन्द करते हैं।

वे हमारे रखवाले और प्रभु के दया के दूत हैं; वे हमें थामे रहते हैं कि हम ठोकर न खाएँ, और जब हम मरते हैं, तो वे हमें उठाकर हमारे प्रभु की उपस्थिति में पहुँचा देते हैं। हमारे आनन्दों में से एक यह है कि हम अनगिनत स्वर्गदूतों की मण्डली के संगी हैं; आओ, हम उनके विषय में स्नेह से सोचा करें।

अब मैं अपने मूल-पद से सटा रहूँगा, और लगभग एक-एक शब्द पर प्रचार करूँगा। यह “परन्तु” से आरम्भ होता है, और वह अलगाव का शब्द है।

ध्यान दो कि जंगली दाने और गेहूँ कटनी का समय आने तक साथ-साथ बढ़ेंगे। कुछ गेहूँ के लिये जंगली दानों के साथ-साथ बढ़ना बड़े दुःख की बात है। भक्तिहीन लोग प्रभु का भय माननेवालों के लिये काँटों और ऊँटकटारों के समान हैं। भक्त हृदय कितनी बार आह भरकर कहता है: “हाय, हाय, क्योंकि मुझे मेशेक में परदेशी होकर रहना पड़ा और केदार के तम्बुओं में बसना पड़ा है!” मनुष्य के बैरी प्रायः उसके घर ही के लोग होते हैं; जिन्हें उसकी सबसे अधिक सहायता करनी चाहिए, वे ही शायद उसके मार्ग में सबसे अधिक बाधा डालें; उनकी बातचीत उसे व्याकुल करती और सताती है। उनसे बचकर निकलने का प्रयत्न प्रायः व्यर्थ ठहरता है, क्योंकि परमेश्वर के प्रबन्ध में जंगली दानों को गेहूँ के साथ बढ़ने दिया गया है, और वे अन्त तक ऐसा ही करते रहेंगे।

भक्त लोग पवित्र लोगों की बस्तियाँ बसाने के लिये दूर-दूर के देशों में जा बसे हैं, फिर भी उनके बीच में भी पापी निकल आए हैं। भक्तिहीन और विधर्मी सदस्यों को छाँटकर निकालने के प्रयत्नों से सताव और दूसरी परेशानियाँ उत्पन्न हुई हैं, और वह योजना बहुत हद तक विफल रही है। कुछ और लोगों ने संसार की परीक्षाओं से बचने के लिये अपने आप को एकान्त कुटियों में बन्द कर लिया, इस आशा में कि भागकर जय पा लेंगे; यह बुद्धि का मार्ग नहीं है। इस समय के लिये वचन यह है, “दोनों को एक साथ बढ़ने दो,” परन्तु एक समय आएगा जब अन्तिम अलगाव होगा। तब, हे प्रिय मसीही स्त्री, तुम्हारा पति फिर तुम्हें न सताएगा।

हे भक्त बहन, तुम्हारा भाई तुम्हारा उपहास करना छोड़ देगा। हे धर्मपरायण कामगार, भक्तिहीन लोग फिर तुम्हें ताने न मारेंगे। वह “परन्तु” परमेश्वर का भय माननेवालों और परमेश्वर को न माननेवालों के बीच लोहे का एक फाटक बन जाएगा; तब जंगली दाने आग में झोंक दिए जाएँगे, परन्तु कटनी का प्रभु कहेगा, “गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।”

यह अलगाव होना ही है; क्योंकि पृथ्वी पर गेहूँ और जंगली दानों का साथ-साथ बढ़ना बहुत पीड़ा और हानि का कारण बनता है, और एक उत्तम संसार में यह बना न रहेगा। भक्त स्त्री-पुरुष चाह सकते हैं कि उनकी वे सन्तानें भी, जिनका मन नहीं फिरा, स्वर्ग में उनके साथ हों; परन्तु ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि परमेश्वर अपने शुद्ध किए हुओं को अशुद्ध होने न देगा, और न अपने महिमा पाए हुओं को अविश्वासियों की उपस्थिति से परखे जाने देगा। गेहूँ की सिद्धता और उपयोगिता के लिये जंगली दानों को हटाना ही होगा। क्या तुम चाहोगे कि जंगली दाने और गेहूँ खत्ते में एक साथ ढेर कर दिए जाएँ? वह तो बहुत बुरी खेती होगी। जब तक वे पूरी रीति से अलग न किए जाएँ, तब तक उनका ठीक-ठीक उपयोग नहीं हो सकता।

इसी प्रकार, उद्धार पाए हुए और उद्धार न पाए हुए लोग यहाँ तो साथ-साथ रह सकते हैं, परन्तु आनेवाले संसार में नहीं। आज्ञा स्पष्ट है: “जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उनके गट्ठे बाँध लो, और गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।”

हे पापी, क्या तुम स्वर्ग में प्रवेश करने की आशा रख सकते हो? तुमने अपनी माता के परमेश्वर से कभी प्रेम नहीं किया, तो क्या वह तुम्हें अपने स्वर्गीय आँगनों में आने देगा? तुमने अपने पिता के उद्धारकर्ता पर कभी भरोसा नहीं किया, फिर भी क्या तुम सदा उसकी महिमा देखने की आशा रखते हो? क्या तुम स्वर्ग में अकड़ते हुए घूमोगे, मुँह से कोई शपथ निकालते हुए, या ओछे गीत गाते हुए?

प्रभु के दिन की आराधना से तुम ऊब जाते हो; क्या तुम सोचते हो कि प्रभु ऊपर अपने मन्दिर में अनिच्छुक आराधकों को सहेगा? तुम्हें सब्त थका देनेवाला लगता है; तो तुम परमेश्वर के अनन्त विश्राम में प्रवेश करने की आशा कैसे रख सकते हो? स्वर्गीय बातों में तुम्हारी कोई रुचि नहीं, और यदि तुम्हें उनमें भाग लेने दिया जाए तो वे अपवित्र हो जाएँगी; इसलिए वह “परन्तु” आना ही है, और तुम्हें प्रभु के लोगों से सदा के लिये अलग होना ही पड़ेगा। क्या तुम अनन्तकाल तक भक्त मित्रों से अलग किए जाना सह सकोगे?

उस अलगाव में अन्त का एक भयानक अन्तर छिपा है: “जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उनके गट्ठे बाँध लो।” मैं पूरा चित्र नहीं खींच सकता; परन्तु जब एक बार गट्ठा बँध गया, तो उसका एकमात्र स्थान आग है। तुम उस सारी वेदना से बच निकलो। वह कोई छोटी बात नहीं है जिसकी उपमा प्रेम का प्रभु आग में भस्म होने से देता है। कोई भी शब्द उसके आतंक को पूरी रीति से प्रगट नहीं कर सकते। हम प्रायः आनेवाले क्रोध की चर्चा करते हैं; फिर भी निश्चय हम उसे घटाकर ही बताते हैं। कोमल, प्रेमी, अनुग्रहकारी यीशु का “जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उनके गट्ठे बाँध लो” कहने से क्या अभिप्राय था? प्रभु के लोगों और शैतान के अनुयायियों के अन्त के बीच के विशाल अन्तर पर विचार करो। गेहूँ को जला दो? नहीं—“गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।” वहाँ वे सदा के लिये सुरक्षित और आनन्द से रखे रहते हैं। ओह, स्वर्ग और नरक के बीच की अथाह खाई—एक ओर वीणाएँ और स्वर्गदूत, दूसरी ओर रोना और दाँत पीसना! उस महिमा पाए हुए पवित्र जन के, जो श्वेत वस्त्र पहने और अमरता का मुकुट धारण किए हुए है, और उस प्राण के बीच की दूरी को कौन नाप सकता है जो परमेश्वर और उसकी महिमा से सदा के लिये दूर खदेड़ दिया गया है? वह “परन्तु” भयानक है। याद रखो, वह भाई को भाई से, माँ को सन्तान से, पति को पत्नी से अलग कर देता है। “एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा।” और जब एक बार वह तलवार उतर आती है, तो फिर कोई पुनर्मिलन नहीं होता। वह अलगाव अनन्त है।

परन्तु कोई पूछ सकता है, “इतना अन्तर क्यों?” इसलिए कि अन्तर सदा से रहा है। गेहूँ मनुष्य के पुत्र ने बोया था; नकली गेहूँ शत्रु ने। स्वभाव में सदा से अन्तर रहा है—गेहूँ अच्छा, जंगली दाने बुरे। आरम्भ में यह अन्तर शायद दिखाई न दे, परन्तु जैसे-जैसे गेहूँ और जंगली दाने पकते हैं, वह प्रगट हो जाता है। वे पूरी तरह भिन्न पौधे हैं; वैसे ही नया जन्म पाया हुआ मनुष्य और नया जन्म न पाया हुआ मनुष्य पूरी तरह भिन्न प्राणी हैं। मैंने नया जन्म न पाए हुए एक मनुष्य को यह दावा करते सुना है कि वह किसी भक्त मनुष्य जितना ही भला है; ऐसा कहकर वह अपना घमण्ड ही प्रगट करता है।

निश्चय परमेश्वर की दृष्टि में विश्वासी और अविश्वासी के बीच का अन्तर उतना ही बड़ा है जितना ज्योति और अन्धकार के बीच, या जीवन और मृत्यु के बीच। एक में जीवन है, दूसरे में नहीं; यह अन्तर जीवन-मरण का है, जड़ तक पहुँचनेवाला।

ओह, तुम इस विषय को कभी हल्के में न लो, परन्तु सचमुच प्रभु का गेहूँ बनो! गेहूँ का नाम धारण करना पर्याप्त नहीं—हम में उसका स्वभाव होना चाहिए। परमेश्वर उपहास में नहीं उड़ाया जाता; वह उन लोगों से प्रसन्न नहीं होता जो अपने आप को मसीही कहते हैं जबकि वे हैं नहीं। कलीसिया की सदस्यता से सन्तुष्ट न हो; मसीह के साथ सदस्यता खोजो। विश्वास की बातें मत करो; उसे काम में लाओ। अनुभव की डींग मत मारो; उसे पाओ। गेहूँ बनो, उसकी नकल नहीं। वह भयानक “परन्तु” सच्चे और झूठे के बीच आग के समुद्र के समान लहराएगा। हे पवित्र आत्मा, हम में से हर एक को अपनी सामर्थ्य से बदल दे।

हमारे मूल-पद का दूसरा शब्द है “इकट्ठा करो”—एकत्र करने का शब्द। यह एकत्र किया जाना कैसी आशीष है! भीड़ की भीड़ को सुसमाचार सुनने के लिये लाना आनन्द की बात है; क्या लोगों से भरे घर को देखना आनन्द नहीं, जहाँ सप्ताह के दिनों में और सब्तों में भी लोग सुसमाचार सुनने के लिये दूर से चलकर आने को तैयार हों? यह बड़ी बात है; परन्तु गेहूँ का खत्ते में इकट्ठा किया जाना इससे कहीं अधिक अद्भुत है। इकट्ठा करना अपने आप में बिखेरने से उत्तम है, और मैं प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु यीशु लोगों को सदा यहाँ खींचता रहे; क्योंकि वह बाँटनेवाला नहीं है, परन्तु उसी के विषय में लिखा है, “राज्य-राज्य के लोग उसके अधीन हो जाएँगे।” क्या उसने नहीं कहा, “और मैं यदि पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खीचूँगा”?

ध्यान दो कि हमारे मूल-पद की यह मण्डली कुशल बटोरनेवालों के द्वारा चुनी और एकत्र की जाती है: “काटनेवाले स्वर्गदूत हैं।” सेवक अकेले यह नहीं कर सकते, क्योंकि वे प्रभु के सारे गेहूँ को नहीं जानते और उनसे भूल होना सहज है—कुछ बहुत नरम होते हैं, और कुछ बहुत कठोर। मनुष्य का निर्णय कभी-कभी पवित्र लोगों को बाहर कर देता है और पापियों को भीतर ले लेता है। स्वर्गदूत अपने स्वामी की सम्पत्ति को पहचानते हैं। वे हर एक पवित्र जन को जानते हैं, क्योंकि उनके जन्म के समय वे वहाँ उपस्थित थे। स्वर्गदूत जानते हैं कि पापी कब मन फिराते हैं, और मन फिरानेवालों को कभी नहीं भूलते।

उन्होंने विश्वासियों के जीवन को देखा है और आत्मिक लड़ाइयों में उनकी सहायता की है। हाँ, स्वर्गदूत एक पवित्र सहज-बोध से पिता की सन्तानों को पहचान लेते हैं और धोखा नहीं खाते। वे सारे गेहूँ को इकट्ठा करेंगे और हर एक जंगली दाने को बाहर छोड़ देंगे।

परन्तु यह एकत्र किया जाना बहुत कड़े नियमों के अधीन होता है। दृष्टान्त के अनुसार, पहले जंगली दाने—नकली गेहूँ—हटाए जाते हैं, और फिर स्वर्गदूत काटनेवाले केवल गेहूँ को इकट्ठा करते हैं। सर्प का वंश, जिसका पिता शैतान है, राज्य के वंश से, जो प्रतिज्ञा किए हुए छुड़ानेवाले यीशु का है, अलग किया जाता है। यही एकमात्र भेद है; और किसी बात पर विचार नहीं किया जाता। पवित्र लोगों के बीच खड़ा सबसे सुशील मनुष्य भी, यदि उसका मन नहीं फिरा, स्वर्गदूतों के द्वारा स्वर्ग नहीं पहुँचाया जाएगा, क्योंकि आज्ञा यह है, “गेहूँ को इकट्ठा करो।” चाहे सबसे ईमानदार मनुष्य कलीसिया के ठीक बीच में खड़ा हो, और सदस्य और सेवक उसे घेरकर उस पर दया के लिये गिड़गिड़ाते हों, फिर भी यदि वह विश्वासी न होता तो परमेश्वर के भण्डार में प्रवेश न कर पाता। कोई अपवाद नहीं है। स्वर्गदूतों के पास कोई विकल्प नहीं; अटल आज्ञा यह है, “गेहूँ को इकट्ठा करो,” और उन्हें किसी और को इकट्ठा नहीं करना है।

यह एकत्रीकरण बहुत दूर-दूर से होगा। कुछ गेहूँ दक्षिण सागर के द्वीपों में, चीन में, और जापान में पकता है। कुछ फ्रांस में फलता-फूलता है, और संयुक्त राज्य अमेरिका में चौड़े-चौड़े खेत लहलहाते हैं। शायद ही कोई ऐसा देश हो जहाँ परमेश्वर का कुछ अच्छा अनाज न हो। परमेश्वर का सारा गेहूँ कहाँ-कहाँ उगता है, यह मैं नहीं कह सकता। हर एक जाति और हर एक लोग के बीच अनुग्रह से चुने हुए कुछ लोग बाकी हैं; परन्तु स्वर्गदूत सारे अच्छे अनाज को एक ही भण्डार में इकट्ठा करेंगे।

“गेहूँ को इकट्ठा करो।” पवित्र लोग समाज के हर वर्ग में पाए जाएँगे। स्वर्गदूत महलों से थोड़ी-सी बालें लाएँगे, और झोंपड़ियों से बड़ी-बड़ी अँकवारें भरकर। बहुत से लोग हमारे गाँवों और पुरवों के दीन घरों से बटोरे जाएँगे, और दूसरे हमारे बड़े नगरों की पिछली गलियों से उठाकर परमेश्वर की महानगरी में पहुँचाए जाएँगे। सबसे अन्धेरे कोनों से स्वर्गदूत मधुरता और ज्योति की उन सन्तानों को लाएँगे जिन्होंने शायद ही कभी सूर्य देखा, फिर भी जिनके मन शुद्ध थे और जो अपने परमेश्वर को जानते थे। छिपे हुए और गुमनाम लोग ज्योति में लाए जाएँगे, क्योंकि प्रभु अपनों को पहचानता है, और उसके काटनेवाले उनमें से किसी को छोड़ न देंगे।

यह एक अद्भुत विचार है कि वे सब युगों से आएँगे। आओ, हम आशा रखें कि हमारा पहला पिता आदम वहाँ होगा, और माता हव्वा भी, जो अपने प्रिय पुत्र हाबिल के पदचिह्नों पर चलते हुए उसी बलिदान पर भरोसा रखते थे। हम अब्राहम, इसहाक, याकूब, मूसा, दाऊद, दानिय्येल, और सिद्ध किए हुए सब पवित्र लोगों से मिलेंगे। प्रेरितों, शहीदों और धर्मसुधारकों को देखना कैसा आनन्द होगा! मैं लूथर, कैल्विन, बनयन और व्हाइटफ़ील्ड को देखने की लालसा रखता हूँ। मुझे भले बूढ़े पिता राइलैंड की यह तुकबन्दी प्रिय है: “वे सब वहाँ होंगे, छोटे और बड़े सभी, मुझ-सा दीन भी धन्य पौलुस से हाथ मिलाएगा तभी।”

मैं ठीक-ठीक नहीं जानता कि यह कैसे होगा, परन्तु मुझे भरोसा है कि पहिलौठों की साधारण सभा और कलीसिया में, जिनके नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं, हमें हर युग के सब पवित्र लोगों के साथ संगति मिलेगी।

चाहे गेहूँ कभी भी या कहीं भी उगा हो, वह उसी एक खत्ते में इकट्ठा किया जाएगा—फिर कभी न बिखरने के लिये। वे अलग-अलग खेतों में उगे। कुछ उन पहाड़ी ढलानों पर फले-फूले जहाँ एपिस्कोपेलियन समृद्ध होते हैं, और कुछ उस निचली भूमि में जहाँ बैपटिस्ट बढ़ते और मेथोडिस्ट फलते-फूलते हैं। परन्तु जब गेहूँ एक बार खत्ते में आ गया, तो कोई नहीं बता सकता कि बालें किस खेत से आई थीं।

तब सचमुच स्वामी की प्रार्थना का महिमामय उत्तर मिलेगा: “कि वे सब एक हों।” सारी भ्रान्तियाँ दूर हो जाएँगी, सारी भूलें सुधारी और क्षमा की जा चुकी होंगी, एक ही प्रभु, एक ही विश्वास, और एक ही बपतिस्मा पूरी रीति से जाना जाएगा, और फिर न कोई किसी को तंग करेगा, न कोई डाह करेगा। कैसा धन्य एकत्र होना!

कैसा मिलन! परमेश्वर के चुने हुए, सब शताब्दियों के सबसे उत्तम लोग, जिनके योग्य संसार न था।

मैं वहाँ अनुपस्थित रहना नहीं चाहूँगा। यदि कोई नरक न भी होता, तो भी ऐसी स्वर्गीय संगति से वंचित रह जाना नरक ही होता। रोने और दाँत पीसने के बिना भी, प्रभु की उपस्थिति से, सदा उसकी स्तुति करने के आनन्द से, और उन श्रेष्ठतम प्राणियों से मिलने के परमसुख से, जो कभी जीवित रहे, वंचित रह जाना भयानक होता। इस युग के वाद-विवादों के बीच, मैं, जो झगड़ालू मनुष्य-सा दिखाई दिया हूँ, उस धन्य विश्राम की लालसा रखता हूँ जहाँ सब आत्मिक मन परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन के सामने अनन्त मेल में घुल-मिल जाएँगे। ओह, कि हम सब ठीक होते, कि हम सब एक आत्मा में एक हो जाते!

मूल-पद में अगला शब्द पहचान बतानेवाला शब्द है। उसकी चर्चा मैं पहले ही कर चुका हूँ। “गेहूँ को इकट्ठा करो।”

प्रभु के घर-आँगन में “गेहूँ” के सिवा और कुछ प्रवेश नहीं कर सकता। कुछ मिनटों के लिये मुझे अपना हृदय दो, जब मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि अपने आप को गहराई से जाँचो। गेहूँ प्रभु ने बोया था। क्या तुम प्रभु के बोए हुए हो? मित्र, यदि तुम्हारे पास कोई धर्म है, तो वह तुम्हें कैसे मिला? क्या वह अपने आप उग आया? यदि ऐसा है, तो वह किसी काम का नहीं। सच्चा गेहूँ मनुष्य के पुत्र ने बोया था। क्या तुम प्रभु के बोए हुए हो? क्या परमेश्वर के आत्मा ने तुम्हारे हृदय में अनन्त जीवन रोपा? क्या वह उस हाथ से आया जो क्रूस पर कीलों से ठोंका गया था? क्या यीशु तुम्हारा जीवन है? क्या तुम्हारा जीवन उसी से आरम्भ होता और उसी में पूरा होता है? यदि ऐसा है, तो भला है।

प्रभु का बोया हुआ गेहूँ उसकी देखभाल का पात्र भी है। गेहूँ को बहुत ध्यान चाहिए। यदि किसान उसकी सावधानी से चौकसी न करे तो उसे कुछ हाथ नहीं लगता। क्या तुम प्रभु की देखभाल में हो? क्या वह तुम्हें बचाए रखता है? क्या तुम्हारे प्राण के लिये यह सच है: “मैं यहोवा उसकी रक्षा करता हूँ; मैं क्षण-क्षण उसको सींचता रहूँगा। मैं रात-दिन उसकी रक्षा करता रहूँगा ऐसा न हो कि कोई उसकी हानि करे”? क्या तुम ऐसी रखवाली का अनुभव करते हो? अपने प्राण के निमित्त सच्चाई से उत्तर दो।

फिर, गेहूँ उपयोगी है, मनुष्यजाति की भलाई के लिये परमेश्वर का दान। नकली गेहूँ किसी काम का न था; वह केवल सूअरों को खिलाने के योग्य था, और उन्हें ऐसा लड़खड़ा देता था मानो वे मतवाले हों। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो समाज के लिये हितकर है—संसार के लिये रोटी के समान, कि यदि लोग तुम्हारे उदाहरण, शिक्षा और जीवन को ग्रहण करें, तो वे आशीष पाएँ? परखो कि जीवन और प्रभाव में तुम भले हो या हानिकारक।

“गेहूँ को इकट्ठा करो।” परमेश्वर को ही तुम में भलाई, अनुग्रह, बल और उपयोगिता डालनी होगी, नहीं तो तुम कभी ऐसा गेहूँ न बनोगे जो स्वर्गदूतों के द्वारा इकट्ठा किए जाने के योग्य हो। गेहूँ सब पौधों में सबसे अधिक पराश्रित है। मैंने कभी ऐसे गेहूँ के खेत के बारे में नहीं सुना जो किसी किसान की देखभाल के बिना उगा और पका हो।

कटनी के बाद कुछ बालें भले ही निकल आएँ, परन्तु मैंने कभी ऐसे मैदानों के बारे में नहीं सुना जो बिना बोए गेहूँ से ढके हों।

मनुष्य के बिना गेहूँ नहीं, और मसीह के बिना अनुग्रह नहीं। अपने अस्तित्व के लिये हम पिता के ऋणी हैं, जो किसान है। फिर भी, पराश्रित होते हुए भी, गेहूँ आदर और सम्मान पाता है; वैसे ही समझ रखनेवाले लोग भक्त जनों का आदर करते हैं। मसीह के बिना हम कुछ नहीं, परन्तु उसके साथ हम आदर से भरपूर हैं। ओह, कि हम उन लोगों में गिने जाएँ जिनके द्वारा संसार बचा रहता है, पृथ्वी के वे श्रेष्ठ जन जिनसे पवित्र लोग प्रसन्न होते हैं। परमेश्वर न करे कि हम नीच और निकम्मे जंगली दानों में गिने जाएँ!

अन्त में, गन्तव्य का एक शब्द: “गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।” इकट्ठा करने का काम न्याय के दिन पूरा होगा, परन्तु यह हर दिन चल रहा है। पवित्र लोग निरन्तर इकट्ठे किए जा रहे हैं, और अभी भी स्वर्ग की ओर बढ़ रहे हैं। मुझे यह सुनकर आनन्द होता है कि मेरी अपनी कलीसिया के दिवंगत सदस्य काटे जाने में आनन्द पाते हैं। परमेश्वर की महिमा हो, हमारे लोग अच्छी रीति से मरते हैं। अच्छी रीति से जीना सबसे उत्तम है, परन्तु अच्छी रीति से मरना प्रायः जीवित भक्ति की सबसे सामर्थी गवाही देता है। संसार विजयी मृत्यु की सामर्थ्य को भाँप लेता है।

हर घड़ी पवित्र लोग खत्ते में इकट्ठे किए जाते हैं। वहीं वे होना चाहते हैं। इस बटोरे जाने पर हमें कोई शोक नहीं होता, क्योंकि हम चाहते हैं कि हमारा प्रभु हमें सुरक्षित रख ले। यदि खेत का गेहूँ बोल सकता, तो हर एक बाल कहती: “जिस लक्ष्य के लिये हम जीते और बढ़ते हैं, वह खत्ता है, अनाज का भण्डार।” इसी उद्देश्य के लिये पाला और धूप, ओस और वर्षा, सब परिश्रम करते हैं। गेहूँ की हर एक प्रक्रिया भण्डार की ओर बढ़ती है। वैसे ही, हम में सब कुछ स्वर्ग की ओर काम करता है—उस एकत्र होने के स्थान की ओर, धर्मियों की मण्डली की ओर, हमारे छुड़ानेवाले के मुख के दर्शन की ओर। हमारी मृत्यु कोई बेसुरापन नहीं लाती; वह हमारे जीवन के संगीत को पूरा करती है। गेहूँ के लिये खत्ता सुरक्षा का स्थान है। भीतर पहुँच जाने के बाद न फफूँदी है, न पाला, न गर्मी, न सूखा, न सीलन। सारे संकट बीत गए। वह सिद्धता तक पहुँच गया है, उसने किसान के परिश्रम का प्रतिफल दे दिया है, और सुरक्षित रख लिया गया है। ओह, बहुत समय से प्रतीक्षित दिन, आरम्भ हो! ओह, हे भाइयो, वह कैसी आशीष होगी जब हम परिपक्वता तक पहुँचेंगे, और मसीह हम में अपने प्राणों के दुःख का फल देखेगा।

मुझे स्वर्ग को उसका खत्ता समझना अच्छा लगता है—कैसा विचार है! भाषा कितनी दरिद्र है कि हमें अपने पिता के घर को, यीशु के निवास को, खत्ता कहना पड़ता है। स्वर्ग राजा का महल है, फिर भी हमारे लिये एक खत्ता है, सुरक्षा, विश्राम और निश्चिन्तता का स्थान। वह मसीह का घर-आँगन है, और हम उसके लिये पक रहे हैं। परमानन्द से भरकर उसके विषय में सोचो; क्योंकि खत्ते में इकट्ठा किया जाना कटनी का उत्सव है। मनुष्य पृथ्वी की कटनी पर रोते नहीं, न आँसू बहाते हुए पूलों के पीछे चलते हैं। वे ताली बजाते, नाचते, और आनन्द से जयजयकार करते हैं। आओ, जो पहले ही भीतर रखे जा चुके हैं, उनके लिये हम भी वैसा ही करें। गम्भीर और मधुर धुनों के साथ आओ, हम उनकी कब्रों के चारों ओर गाएँ।

मृत्यु की कड़वाहट बीत चुकी है। उनकी महिमा को स्मरण करो, और उस स्त्री के समान आनन्द करो जिसने बालक को जन्म दिया है, जो “इस आनन्द से कि जगत में एक मनुष्य उत्पन्न हुआ, उस संकट को फिर स्मरण नहीं करती।” स्वर्ग में एक और प्राण गाने लगा है—हे अमरता के वारिसो, तुम क्यों रोते हो? क्या अनन्त आनन्द वह जन्म है जो मृत्यु की पीड़ाओं के बाद होता है? तो धन्य हैं वे जो मरते हैं। क्या महिमा उसी का परिणाम है जो हमारे घरों को विलाप से भर देता है? तो शोकों के लिये, दुःखभरे बिछोहों के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करो। उसने हमारे प्रियजनों को ऊँचा उठाकर आकाश तक पहुँचा दिया है! उसने उन्हें हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक आशीष दी है, और उन्हें इस थके हुए संसार से उठाकर सदा के लिये अपनी गोद में लिटा लिया है। उसका नाम धन्य हो, और किसी बात के लिये न सही, तो इसी के लिये।

क्या तुम अपने बूढ़े पिता को, जो पीड़ा और दुर्बलता से भरे हैं, यहाँ रोके रखोगे? अपनी प्रिय पत्नी को, दुःख सहते रहने के लिये? अपने पति को अमर मुकुट से दूर? अपनी सन्तान को, कि वह परमसुख छोड़कर पृथ्वी पर लौट आए? नहीं।

हम स्वयं घर जाने की लालसा रखते हैं, परन्तु जो चले गए हैं, उनके विषय में हम प्रभु के सामने ऐसा आनन्द करते हैं जैसा कटनी के समय होता है। “इसलिए इन बातों से एक दूसरे को शान्ति दिया करो।”

समाप्त

अध्याय 18 पूरा हुआ

खत्ते में गेहूँ

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