प्रार्थना में महान सामर्थ्य
अनुग्रह का सिंहासन

अध्याय 2 · 42 मिनट का पठन

अनुग्रह का सिंहासन

“अनुग्रह का सिंहासन।”—इब्रानियों 4:16

ये शब्द उस अनुग्रह से भरे पद में जड़े हुए पाए जाते हैं, “इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट साहस बाँधकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे”; वे सोने के जड़ाव में जड़े हुए एक रत्न के समान हैं। सच्ची प्रार्थना परमेश्वर के आत्मा के द्वारा प्राण का परमेश्वर के सिंहासन के निकट पहुँचना है। वह शब्दों का उच्चारण नहीं है, न केवल अभिलाषाओं का अनुभव करना है, वरन् वह अभिलाषाओं का परमेश्वर की ओर बढ़ना है, हमारे स्वभाव का प्रभु हमारे परमेश्वर की ओर आत्मिक रूप से निकट आना है। सच्ची प्रार्थना केवल मन का अभ्यास नहीं, न ही वाणी का प्रदर्शन है, वरन् वह उससे कहीं अधिक गहरी है—वह आकाश और पृथ्वी के सृजनहार के साथ आत्मिक लेन-देन है। परमेश्वर आत्मा है, जिसे नश्वर आँख नहीं देख सकती, और जिसे केवल भीतरी मनुष्यत्व ही पहचान सकता है; हमारे भीतर की आत्मा, जो नये जन्म के समय पवित्र आत्मा से उत्पन्न हुई है, उस महान आत्मा को पहचानती है, उससे संगति करती है, उसके सामने अपनी विनतियाँ रखती है, और उससे शान्ति के उत्तर पाती है। वह आरम्भ से अन्त तक एक आत्मिक व्यवहार है; और उसका लक्ष्य और उद्देश्य मनुष्य पर समाप्त नहीं होता, वरन् स्वयं परमेश्वर तक पहुँचता है।

ऐसी प्रार्थना के लिये स्वयं पवित्र आत्मा का कार्य आवश्यक है। यदि प्रार्थना केवल होंठों की होती, तो प्रार्थना करने के लिये हमें अपने नथनों में केवल श्वास की आवश्यकता होती; यदि प्रार्थना केवल अभिलाषाओं की होती, तो बहुत सी उत्तम अभिलाषाएँ तो स्वाभाविक मनुष्य भी सहज ही अनुभव कर लेते हैं; परन्तु जब वह आत्मिक अभिलाषा हो, और मनुष्य की आत्मा की उस महान आत्मा के साथ आत्मिक संगति हो, तब स्वयं पवित्र आत्मा को आदि से अन्त तक उसमें उपस्थित रहना ही होगा, कि वह दुर्बलता में सहायता करे, और जीवन और सामर्थ्य दे; नहीं तो सच्ची प्रार्थना कभी चढ़ाई ही न जाएगी, वरन् जो वस्तु परमेश्वर को चढ़ाई जाएगी वह प्रार्थना का नाम तो धारण करेगी और उसका रूप भी रखेगी, परन्तु प्रार्थना का भीतरी जीवन उससे कोसों दूर होगा।

इसके अतिरिक्त, हमारे पाठ के सन्दर्भ से यह स्पष्ट है कि ग्रहणयोग्य प्रार्थना के लिये प्रभु यीशु मसीह का बीच में खड़ा होना अनिवार्य है। जैसे परमेश्वर के आत्मा के बिना प्रार्थना सचमुच प्रार्थना नहीं होगी, वैसे ही परमेश्वर के पुत्र के बिना वह प्रबल होनेवाली प्रार्थना नहीं होगी। उसे, उस महान महायाजक को, हमारे लिये परदे के भीतर जाना होगा; वरन् उसके क्रूस पर चढ़ाए गए शरीर के द्वारा परदे को पूरी रीति से हटा दिया जाना चाहिए; क्योंकि तब तक हम जीविते परमेश्वर से बाहर बन्द रहते हैं। जो मनुष्य पवित्रशास्त्र की शिक्षा के होते हुए भी उद्धारकर्ता के बिना प्रार्थना करने का यत्न करता है, वह परमेश्वर का अपमान करता है; और जो यह समझता है कि उसकी अपनी स्वाभाविक अभिलाषाएँ, बहुमूल्य लहू के छिड़काव के बिना परमेश्वर के सामने पहुँचकर, उसके सामने ग्रहणयोग्य बलिदान ठहरेंगी, वह भूल करता है; वह ऐसी भेंट नहीं लाया जिसे परमेश्वर ग्रहण कर सके, ठीक वैसे ही जैसे उसने कुत्ते का गला काटा होता, या कोई अशुद्ध बलि चढ़ाई होती। आत्मा के द्वारा हम में उपजाई गई, और परमेश्वर के मसीह के द्वारा हमारे लिये प्रस्तुत की गई प्रार्थना परमप्रधान के सामने सामर्थ्य बन जाती है, परन्तु और किसी रीति से नहीं।

प्रिय मित्रो, इसलिए कि मैं आज भोर तुम्हें प्रार्थना के लिये उभारूँ, और तुम्हारे प्राण अनुग्रह के सिंहासन के निकट आने को अगुवाई पाएँ, मेरा विचार है कि इन थोड़े से शब्दों को लेकर, जैसी योग्यता परमेश्वर मुझे दे, उन पर विचार करूँ। तुमने प्रार्थना करना आरम्भ किया है; परमेश्वर ने उत्तर देना आरम्भ किया है। यह सप्ताह इस कलीसिया के इतिहास में एक बहुत ही स्मरणीय सप्ताह रहा है। जितने लोग पहले कभी एक ही समय में मसीह का अंगीकार करने के लिये आगे आए थे, उनसे कहीं अधिक अब आगे आए हैं,—यह परमेश्वर के लोगों की विनतियों का ऐसा स्पष्ट उत्तर है, मानो परमप्रधान का हाथ स्वर्ग से बढ़कर वे आशीषें हमें थमा रहा हो जिनके लिये हमने माँगा था। तो अब, आओ हम प्रार्थना में लगे रहें, हाँ, आओ हम मध्यस्थता में और भी बल बटोरें, और जितना अधिक हम सफल हों, उतना ही अधिक यत्न करें कि और भी अधिक सफल होते जाएँ। हमारे अपने ही मनों में संकोच न हो, क्योंकि हमारे परमेश्वर में हमारे लिये कोई संकोच नहीं। यह एक भला दिन है, और शुभ समाचार का समय है, और जबकि राजा का कान हमारी ओर लगा है, तो मेरी बड़ी लालसा है कि हम हजारों औरों के लिये उससे बात करें; कि वे भी हमारी विनतियों के उत्तर में मसीह के निकट लाए जाएँ।

आज भोर इस पाठ के विषय में बोलने का यत्न करते हुए, मैं इसे इस प्रकार लूँगा: पहला, यहाँ एक सिंहासन है; फिर, दूसरा, यहाँ अनुग्रह है; फिर हम दोनों को एक साथ रखेंगे, और हमें सिंहासन पर विराजमान अनुग्रह दिखाई देगा; और उन्हें दूसरे क्रम में एक साथ रखकर हम देखेंगे कि प्रभुता अपने आप को प्रगट कर रही है, और अनुग्रह में जगमगा रही है।

II. हमारा पाठ एक सिंहासन की बात करता है:—“अनुग्रह का सिंहासन।” प्रार्थना में परमेश्वर को हमारे पिता के रूप में देखना है; यही वह रूप है जो हमें सबसे प्रिय है; तो भी हमें उसे ऐसा नहीं समझना चाहिए मानो वह हमारे ही समान हो; क्योंकि हमारे उद्धारकर्ता ने “हे हमारे पिता,” इस सम्बोधन के साथ ये शब्द जोड़ दिए हैं, “तू जो स्वर्ग में है”; और उस कृपा से झुकनेवाले नाम के ठीक पीछे-पीछे, हमें यह स्मरण दिलाने के लिये कि हमारा पिता अब भी हमसे अनन्त गुना बड़ा है, उसने हमें यह कहने की आज्ञा दी है, “तेरा नाम पवित्र माना जाए; तेरा राज्य आए”; इसलिए हमारे पिता को अब भी एक राजा के रूप में मानना है, और प्रार्थना में हम न केवल अपने पिता के चरणों में आते हैं, वरन् विश्व के महान सम्राट के सिंहासन के सामने भी आते हैं। दया का सिंहासन एक सिंहासन ही है, और हमें यह भूलना नहीं चाहिए।

यदि प्रार्थना को हम सदा स्वर्ग के राजदरबार के आँगनों में प्रवेश समझें; यदि हमें किसी यशस्वी महाराज की उपस्थिति में वैसा ही आचरण करना है जैसा दरबारियों को करना चाहिए, तो हमें यह जानने में कोई कठिनाई नहीं कि प्रार्थना किस उचित आत्मा से करनी चाहिए। यदि प्रार्थना में हम एक सिंहासन के सामने आते हैं, तो स्पष्ट है कि हमारी आत्मा, पहले तो, दीन श्रद्धा की होनी चाहिए। यह अपेक्षा की जाती है कि प्रजा राजा के निकट आते हुए उसको प्रणाम और आदर दे। वह घमण्ड जो राजा को मानने से इन्कार करता है, वह राजद्रोह जो राजा की इच्छा के विरुद्ध बलवा करता है, यदि बुद्धिमान हो, तो सिंहासन के निकट आने से बचे। घमण्ड दूर ही खड़ा लगाम चबाता रहे, राजद्रोह कोनों में छिपा रहे, क्योंकि जब राजा अपने प्रताप के वस्त्र पहने विराजमान हो, तब उसके सामने केवल दीन श्रद्धा ही आ सकती है। हमारे विषय में, जिस राजा के सामने हम आते हैं वह सब सम्राटों में सबसे ऊँचा है, राजाओं का राजा, और प्रभुओं का प्रभु। सम्राट तो उसकी राजसी सामर्थ्य की परछाइयाँ मात्र हैं। वे अपने आप को ईश्वरीय अधिकार से राजा कहते हैं, परन्तु उनके पास कौन सा ईश्वरीय अधिकार है? सामान्य बुद्धि उनके दावों पर हँसकर उन्हें तुच्छ ठहराती है। ईश्वरीय अधिकार केवल प्रभु ही का है, और राज्य केवल उसी का है। वही परमधन्य और एकमात्र अधिपति है। वे तो नाममात्र के राजा हैं, जिन्हें मनुष्यों की इच्छा से, या विधाता के निर्णय से, खड़ा किया और गिराया जाता है, परन्तु केवल वही प्रभु है, पृथ्वी के राजाओं का अधिपति।

“वह किसी डाँवाडोल सिंहासन पर नहीं विराजता,

न अपने होने की अनुमति किसी से माँगता।”

हे मेरे मन, निश्चय कर कि ऐसी उपस्थिति में तू दण्डवत् करके गिर पड़े। यदि वह इतना महान है, तो अपना मुँह धूल में रख उसके सामने, क्योंकि वह सब राजाओं में सबसे सामर्थी है; उसके सिंहासन का अधिकार सब लोकों पर चलता है; स्वर्ग आनन्द से उसकी आज्ञा मानता है, नरक उसकी भौंह चढ़ने से काँपता है, और पृथ्वी को चाहे-अनचाहे उसे प्रणाम करना ही पड़ता है। उसकी सामर्थ्य बना भी सकती है और नाश भी कर सकती है। रचना करना या कुचल डालना, दोनों ही उसके लिये सहज हैं। हे मेरे प्राण, निश्चय कर कि जब तू उस सर्वशक्तिमान के निकट आए, जो भस्म करनेवाली आग के समान है, तब अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे, और अत्यन्त दीनता से उसकी आराधना कर।

फिर, वह सब राजाओं में सबसे पवित्र है। उसका सिंहासन एक बड़ा श्वेत सिंहासन है, निष्कलंक, और बिल्लौर के समान निर्मल। “स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं है, और वह अपने स्वर्गदूतों को दोषी ठहराता है।” और तू, एक पापी प्राणी, तुझे कितनी दीनता से उसके निकट आना चाहिए। वहाँ घनिष्ठता हो सकती है, परन्तु वह अपवित्र न हो। वहाँ साहस होना चाहिए, परन्तु वह ढिठाई न बने। तू अब भी पृथ्वी पर है और वह स्वर्ग में; तू अब भी धूल का एक कीड़ा है, ऐसा प्राणी जो पतंगे के समान पिस जाता है, और वह अनन्त है: इससे पहले कि पहाड़ उत्पन्न हुए, वह परमेश्वर था, और यदि सब सृजी हुई वस्तुएँ फिर मिट जाएँ, तो भी वह वैसा ही बना रहेगा। मेरे भाइयो, मुझे डर है कि हम उस अनन्त महाराज के सामने वैसे नहीं झुकते जैसे हमें झुकना चाहिए; परन्तु अब से, आओ हम परमेश्वर के आत्मा से माँगें कि वह हमें उचित मनोदशा में रखे, कि हमारी हर एक प्रार्थना ऊपर विराजमान अनन्त महाराज के निकट श्रद्धा से भरा आगमन हो।

सिंहासन है, इसलिए, दूसरे, उसके निकट भक्तिपूर्ण आनन्द के साथ आना चाहिए। यदि मैं ईश्वरीय अनुग्रह से ऐसा कृपापात्र ठहरा हूँ कि उन कृपापात्रों के बीच खड़ा होऊँ जो उसके आँगनों में आते-जाते रहते हैं, तो क्या मैं आनन्दित न होऊँ? मैं उसके बन्दीगृह में हो सकता था, परन्तु मैं उसके सिंहासन के सामने हूँ: मैं उसकी उपस्थिति से सदा के लिये निकाला जा सकता था, परन्तु मुझे उसके निकट आने की अनुमति है, हाँ, उसके राजभवन में, अनुग्रह से दर्शन देने के उसके भीतरी कक्ष में भी—तो क्या मैं धन्यवादी न होऊँ? क्या मेरा धन्यवाद उठकर आनन्द न बन जाए, और क्या मैं यह अनुभव न करूँ कि मुझे आदर मिला है, कि जब मुझे प्रार्थना करने की अनुमति मिलती है तब मुझ पर बड़े-बड़े अनुग्रह किए जाते हैं? हे विनती करनेवाले, जब तू अनुग्रह के सिंहासन के सामने खड़ा होता है, तो तेरा मुँह क्यों उतरा है? यदि तू अपने अधर्म के कामों के कारण दोषी ठहराए जाने के लिये न्याय के सिंहासन के सामने होता, तो तू भले ही अपनी कमर अपने हाथों से दबाए खड़ा रहता; परन्तु अब तुझ पर यह अनुग्रह हुआ है कि तू प्रेम के रेशमी वस्त्र पहने राजा के सामने आए, इसलिए तेरा मुख पवित्र आनन्द से चमक उठे। यदि तेरे दुःख भारी हैं, तो उन्हें उससे कह, क्योंकि वह उन्हें हलका कर सकता है; यदि तेरे पाप बहुत हैं, तो उन्हें मान ले, क्योंकि वह उन्हें क्षमा कर सकता है। हे ऐसे सम्राट के महलों के दरबारियो, तुम अत्यन्त आनन्दित हो, और अपनी प्रार्थनाओं के साथ स्तुति मिलाओ।

वह सिंहासन है, और इसलिए, तीसरे, जब भी उसके निकट आएँ, तो पूर्ण अधीनता के साथ आना चाहिए। हम परमेश्वर से इसलिए प्रार्थना नहीं करते कि उसे सिखाएँ कि उसे क्या करना चाहिए, और न ही हमें एक क्षण के लिये भी यह ढिठाई करनी चाहिए कि ईश्वरीय कार्यविधि की दिशा हम ठहराएँ। हमें परमेश्वर से यह कहने की अनुमति है, “हम चाहते हैं कि ऐसा-ऐसा हो,” परन्तु हमें सदा यह भी जोड़ना चाहिए, “परन्तु, इसलिए कि हम अज्ञानी हैं और भूल कर सकते हैं—इसलिए कि हम अब भी शरीर में हैं, और इस कारण शारीरिक उद्देश्यों से प्रेरित हो सकते हैं—जैसा हम चाहते हैं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।” सिंहासन को कौन आज्ञा देगा? परमेश्वर की कोई भी स्वामिभक्त सन्तान एक क्षण के लिये भी यह कल्पना नहीं करेगी कि उसे राजा का स्थान लेना है, वरन् वह उसके सामने झुकती है जिसे सब का प्रभु होने का अधिकार है; और यद्यपि वह अपनी अभिलाषा को उत्सुकता से, प्रबलता से, बार-बार आग्रह करके प्रगट करती है, और विनती पर विनती करती है, तो भी वह सदा इस आवश्यक शर्त के साथ करती है: “हे मेरे प्रभु, तेरी इच्छा पूरी हो; और यदि मैं कोई ऐसी वस्तु माँगूँ जो उसके अनुसार न हो, तो मेरी भीतरी इच्छा यह है कि तू इतनी भलाई कर कि अपने दास को इन्कार कर दे; यदि मैं वह माँगूँ जो तेरी दृष्टि में अच्छा नहीं लगता, और तू मुझे इन्कार करे, तो मैं उसे सच्चा उत्तर ही समझूँगा।” यदि हम इसे निरन्तर स्मरण रखते, तो मैं सोचता हूँ कि हम सिंहासन के सामने कुछ विशेष निवेदनों पर हठ करने को कम इच्छुक होते, क्योंकि हम यह अनुभव करते, “मैं यहाँ अपने ही आराम, अपनी ही सुख-सुविधा, अपने ही लाभ को ढूँढ़ रहा हूँ, और कदाचित् मैं ऐसी वस्तु माँग रहा हूँ जिससे परमेश्वर का अनादर हो; इसलिए मैं ईश्वरीय आज्ञाओं के प्रति गहरी से गहरी अधीनता के साथ बोलूँगा।”

परन्तु, हे भाइयो, चौथे, यदि वह सिंहासन है, तो उसके निकट बढ़ी हुई आशाओं के साथ आना चाहिए। हमारा भजन इसे क्या ही अच्छी रीति से कहता है:

“तू एक राजा के पास आ रहा है:

बड़ी-बड़ी विनतियाँ संग ले आ।”

प्रार्थना में हम मानो केवल परमेश्वर के दानगृह में नहीं आते जहाँ वह कंगालों को अपने उपकार बाँटता है, न ही हम दया के घर के पिछले द्वार पर टूटे-फूटे टुकड़े लेने आते हैं, यद्यपि वह भी हमारी योग्यता से अधिक होता; स्वामी की मेज से गिरनेवाले चूर चार खाना भी हमारे दावे से अधिक है; परन्तु जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम राजभवन में, महान राजा के अपने स्वागत-कक्ष के जगमगाते फर्श पर खड़े होते हैं, और इस प्रकार हम लाभ की ऊँची भूमि पर रखे गए हैं। प्रार्थना में हम वहाँ खड़े होते हैं जहाँ स्वर्गदूत अपने मुँह ढाँपे झुकते हैं; वहाँ, हाँ वहीं, करूब और साराप उसी सिंहासन के सामने आराधना करते हैं जिसकी ओर हमारी प्रार्थनाएँ चढ़ती हैं। और क्या हम वहाँ ठिगनी विनतियों, और संकरे और सिकुड़े हुए विश्वास के साथ आएँ? नहीं, राजा को यह शोभा नहीं देता कि वह पैसे और धेले बाँटता फिरे; वह सोने के बड़े-बड़े सिक्के बाँटता है; वह कंगाल मनुष्यों की नाईं रोटी के टुकड़े और बचा-खुचा भोजन नहीं बिखेरता, वरन् वह ऐसा भोज तैयार करता है जिसमें चिकना भोजन, उत्तम से उत्तम चिकना भोजन और बहुत ही निथरा हुआ दाखमधु होता है। जब सिकन्दर के एक सैनिक से कहा गया कि जो चाहे माँग ले, तो उसने अपनी योग्यता के अनुसार कंजूसी से नहीं माँगा, वरन् उसने इतनी भारी माँग की कि राजकोषाध्यक्ष ने उसे चुकाने से इन्कार कर दिया, और मामला सिकन्दर के सामने रखा, और सिकन्दर ने सच्चे राजा की रीति से उत्तर दिया: “वह जानता है कि सिकन्दर कितना महान है, और उसने एक राजा से माँगा है; जो वह माँगता है वह उसे दे दो।” सावधान रहो, कहीं यह न सोचो कि परमेश्वर के विचार और तुम्हारे विचार एक समान हैं, और उसकी गति और तुम्हारी गति एक सी है। परमेश्वर के सामने कंजूसी भरी विनतियाँ और संकरी अभिलाषाएँ लाकर यह न कहो, “हे प्रभु, इन्हीं के अनुसार कर,” परन्तु स्मरण रखो, कि उसकी और तुम्हारी गति में और उसके और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है; और इसलिए परमेश्वर के योग्य रीति से माँगो, बड़ी-बड़ी वस्तुएँ माँगो, क्योंकि तुम अनुग्रह के सिंहासन के सामने हो, क्योंकि तब वह हमारे लिये हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम करेगा।

और, प्रियो, मैं यह भी जोड़ूँ, पाँचवें, कि अनुग्रह के सिंहासन के निकट आने की उचित आत्मा अडिग भरोसे की आत्मा है। राजा पर कौन सन्देह करेगा? सम्राट के वचन पर कौन उँगली उठाने का साहस करेगा? यह ठीक ही कहा गया है कि यदि सब मनुष्यों के हृदयों से खराई निकाल भी दी जाए, तो भी उसे राजाओं के हृदयों में बसा रहना चाहिए। धिक्कार है उस राजा पर जो झूठ बोल सके। सड़कों का सबसे दीन भिखारी भी तोड़ी हुई प्रतिज्ञा से अपमानित होता है, परन्तु उस राजा के विषय में हम क्या कहें जिसके वचन पर भरोसा न किया जा सके? हाय, धिक्कार है हम पर, यदि हम स्वर्ग और पृथ्वी के राजा के सिंहासन के सामने अविश्वासी हों। जब हमारा परमेश्वर अपनी सारी महिमा में अनुग्रह के सिंहासन पर विराजमान हमारे सामने है, तो क्या हमारे हृदय यह कहने का साहस करेंगे कि हम उस पर सन्देह करते हैं? क्या हम यह कल्पना करें कि वह अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर सकता, या नहीं करेगा? ऐसे निन्दा भरे विचार दूर हों, और यदि उन्हें आना ही है, तो वे हम पर तब आएँ जब हम उसके राज्य की किसी बाहरी सीमा पर हों, यदि ऐसा कोई स्थान है भी, परन्तु प्रार्थना में नहीं, जब हम उसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति में हैं, और उसे उसके अनुग्रह के सिंहासन की सारी महिमा में देखते हैं। निश्चय वहीं वह स्थान है जहाँ सन्तान अपने पिता पर भरोसा रखे, जहाँ स्वामिभक्त प्रजा अपने सम्राट पर भरोसा रखे; और इसलिए हर प्रकार का डगमगाना या सन्देह उससे दूर रहे। दया के सिंहासन के सामने अडिग विश्वास ही प्रधान होना चाहिए।

इस विषय पर केवल एक और बात, और वह यह है, कि यदि प्रार्थना परमेश्वर के सिंहासन के सामने आना है, तो वह सदा गहरी से गहरी सच्चाई के साथ, और उस आत्मा में की जानी चाहिए जो हर बात को वास्तविक बना देती है। यदि तुम इतने विश्वासघाती हो कि राजा को तुच्छ जानो, तो कम से कम अपने ही भले के लिये, उसके मुँह पर, और जब वह अपने सिंहासन पर विराजमान हो, उसका ठट्ठा न करो। यदि तुम कहीं भी बिना मन के पवित्र शब्द दोहराने का साहस करते हो, तो वह यहोवा के राजभवन में न हो। यदि कोई व्यक्ति राजा से भेंट की अनुमति माँगे, और फिर कहे, “मैं ठीक से नहीं जानता कि मैं क्यों आया हूँ, मुझे नहीं लगता कि मुझे कुछ विशेष माँगना है; मेरे पास कोई बहुत आवश्यक निवेदन नहीं जिस पर मैं जोर दूँ;” तो क्या वह मूर्खता और नीचता दोनों का दोषी न ठहरेगा? हमारे महान राजा के विषय में, जब हम उसकी उपस्थिति में जाने का साहस करें, तो आओ हम वहाँ कोई काम लेकर जाएँ। जैसा मैंने पिछले किसी सब्त के दिन कहा था, आओ हम प्रार्थना का खेल खेलने से सावधान रहें। यह परमेश्वर के प्रति ढिठाई है। यदि मुझे सबके सामने प्रार्थना करने को बुलाया जाए, तो मुझे ऐसे शब्द बोलने का साहस नहीं करना चाहिए जो मेरे संगी आराधकों के कानों को भाने के लिये हों, वरन् मुझे यह अनुभव करना चाहिए कि मैं स्वयं परमेश्वर से बात कर रहा हूँ, और मुझे उस महान प्रभु के साथ कुछ व्यवहार करना है। और अपनी निजी प्रार्थना में, यदि भोर को अपनी खाट से उठकर मैं घुटने टेकूँ और कुछ शब्द दोहरा दूँ, या रात को विश्राम के लिये जाते समय वही नियमित रीति पूरी कर दूँ, तो मैं कुछ भला करने के बदले पाप ही करता हूँ, जब तक कि मेरा प्राण ही परमप्रधान से बात न करे। क्या तू सोचता है कि स्वर्ग का राजा तुझे चंचल जीभ और विचारहीन मन से शब्द उच्चारते सुनकर प्रसन्न होता है? तू उसे नहीं जानता। परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्चाई से आराधना करें। यदि तेरे पास बकने के लिये खोखली रीतियाँ हैं, तो जा और उन्हें अपने ही जैसे मूर्खों के कानों में उण्डेल दे, परन्तु सेनाओं के प्रभु के सामने नहीं। यदि तेरे पास कुछ ऐसे शब्द हैं जिन्हें तू उच्चारना चाहता है, और जिनके प्रति तू अन्धविश्वास भरी श्रद्धा रखता है, तो जा और उन्हें वेश्या रोम के सजे-धजे आँगनों में कह, परन्तु सिय्योन के महिमामय प्रभु के सामने नहीं। आत्मिक परमेश्वर आत्मिक आराधकों को ढूँढ़ता है, और ऐसों को वह ग्रहण करेगा, और केवल ऐसों को ही; परन्तु दुष्ट लोगों के बलिदान से यहोवा घृणा करता है, और केवल सच्चे मन की प्रार्थना से ही वह प्रसन्न होता है।

प्रियो, हमारी सब बातों का निचोड़ बस यही है,—प्रार्थना कोई छोटी बात नहीं। वह एक श्रेष्ठ और उच्च कार्य है। वह एक ऊँचा और अद्भुत विशेषाधिकार है। प्राचीन फारसी साम्राज्य में कुछ थोड़े से सामन्तों को किसी भी समय राजा के पास भीतर जाने की अनुमति थी, और इसे नश्वर मनुष्यों का सबसे ऊँचा विशेषाधिकार समझा जाता था। तुम्हारे और मेरे पास, जो परमेश्वर के लोग हैं, एक अनुमति-पत्र है, एक पारपत्र है कि जब चाहें तब स्वर्ग के सिंहासन के सामने आएँ, और हमें बड़े साहस के साथ वहाँ आने के लिये उत्साहित किया गया है; तो भी आओ हम यह न भूलें कि स्वर्ग और पृथ्वी के दरबारों में दरबारी होना, और उसकी आराधना करना जिसने हमें बनाया और जो हमें जीवित बनाए रखता है, कोई छोटी बात नहीं। सचमुच, जब हम प्रार्थना करने का यत्न करते हैं, तो हम उस प्रतापमय महिमा में से यह वाणी सुन सकते हैं: “घुटने टेककर दण्डवत् करो।” उन सब आत्माओं से जो हमारे स्वर्गीय पिता का मुँह देखती हैं, अभी भी मैं एक वाणी सुनता हूँ जो कहती है, “आओ हम झुककर दण्डवत् करें, और अपने कर्ता यहोवा के सामने घुटने टेकें; क्योंकि वही हमारा परमेश्वर है, और हम उसकी चराई की प्रजा, और उसके हाथ की भेड़ें हैं। पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत् करो; हे सारी पृथ्वी के लोगों उसके सामने काँपते रहो।”

II. कहीं ऐसा न हो कि “सिंहासन” शब्द की चमक और तेज नश्वर दृष्टि के लिये असहनीय हो जाए, इसलिए हमारा पाठ अब उस मनोहर शब्द की कोमल, सौम्य आभा हमारे सामने रखता है—“अनुग्रह।” हमें अनुग्रह के सिंहासन के पास बुलाया गया है, व्यवस्था के सिंहासन के पास नहीं। चट्टानी सीनै कभी व्यवस्था का सिंहासन था, जब परमेश्वर लाखों पवित्रों के मध्य में से पारान पर आया। उस सिंहासन के निकट कौन आना चाहता था? इस्राएल भी नहीं आ सकता था। पर्वत के चारों ओर सीमा बाँधी गई थी, और यदि कोई पशु भी पहाड़ को छूए, तो पथराव किया जाए, या उसे तीर से छेदा जाए। हे अपने आप को धर्मी समझनेवालो, जो आशा रखते हो कि तुम व्यवस्था का पालन कर सकते हो, और सोचते हो कि उसके द्वारा उद्धार पा सकते हो, उन ज्वालाओं को देखो जिन्हें मूसा ने देखा था, और सिकुड़ जाओ, और काँपो, और निराश हो जाओ। उस सिंहासन के पास हम अब नहीं आते, क्योंकि यीशु के द्वारा बात बदल गई है। बहुमूल्य लहू से शुद्ध किए गए विवेक के लिये ईश्वरीय सिंहासन पर कोई क्रोध नहीं, यद्यपि हमारे व्याकुल मनों को—

“कभी वह जलते क्रोध का आसन था,

और भस्म करती ज्वाला छोड़ता था;

हमारा परमेश्वर भस्म करनेवाली आग-सा दिखता था,

और उसका नाम जलनशील था।”

और, परमेश्वर धन्य हो, आज भोर हमें अन्तिम न्याय के सिंहासन की बात नहीं करनी है। उसके सामने हम सब आएँगे, और हम में से जितनों ने विश्वास किया है, वे उसे न्याय का ही नहीं, अनुग्रह का भी सिंहासन पाएँगे; क्योंकि जो उस सिंहासन पर विराजमान है, वह उस मनुष्य के विरुद्ध दण्ड की कोई आज्ञा नहीं सुनाएगा जो विश्वास से धर्मी ठहराया गया है। परन्तु आज भोर मुझे तुम्हें उस स्थान पर नहीं बुलाना है जहाँ से पुनरुत्थान की तुरही इतनी तीखी और स्पष्ट गूँजेगी। न ही हम अभी स्वर्गदूतों को अपनी पलटा लेनेवाली तलवारों के साथ परमेश्वर के बैरियों को मारने के लिये निकलते देखते हैं; अभी अथाह कुण्ड के बड़े-बड़े द्वार उन बैरियों को निगलने के लिये नहीं खोले गए जो नहीं चाहते थे कि परमेश्वर का पुत्र उन पर राज्य करे। हम अब भी प्रार्थना की भूमि पर हैं और परमेश्वर से विनती करने की स्थिति में हैं, और जिस सिंहासन के पास हमें आने की आज्ञा दी गई है, और जिसके विषय में हम इस समय बोल रहे हैं, वह अनुग्रह का सिंहासन है। वह एक ऐसा सिंहासन है जो जान-बूझकर अनुग्रह बाँटने के लिये स्थापित किया गया है; एक ऐसा सिंहासन जिससे निकलनेवाला हर वचन अनुग्रह का वचन है; उससे जो राजदण्ड बढ़ाया जाता है वह अनुग्रह का चाँदी का राजदण्ड है; उससे जो आज्ञाएँ घोषित होती हैं वे अनुग्रह की योजनाएँ हैं; उसकी सुनहरी सीढ़ियों पर से जो दान बिखेरे जाते हैं वे अनुग्रह के दान हैं; और जो उस सिंहासन पर विराजमान है वह स्वयं अनुग्रह है। जब हम प्रार्थना करते हैं तो हम अनुग्रह के सिंहासन के ही निकट आते हैं; और आओ हम एक-दो क्षण इस पर विचार करें, ताकि उन्हें सान्त्वना और प्रोत्साहन मिले जो प्रार्थना करना आरम्भ कर रहे हैं; वरन् हम सब को, जो प्रार्थना करनेवाले पुरुष और स्त्रियाँ हैं।

यदि प्रार्थना में मैं अनुग्रह के सिंहासन के सामने आता हूँ, तो मेरी प्रार्थना के दोषों को अनदेखा किया जाएगा। प्रिय मित्रो, प्रार्थना करना आरम्भ करते समय तुम्हें ऐसा लगता है मानो तुमने प्रार्थना की ही नहीं। जब तुम घुटनों से उठते हो, तो तुम्हारी आत्मा की कराहें ऐसी लगती हैं कि तुम सोचते हो उनमें कुछ भी नहीं। कैसी धब्बों से भरी, धुँधली, मैली प्रार्थना है यह। कोई बात नहीं; तुम न्याय के सिंहासन के पास नहीं आए, नहीं तो जब परमेश्वर प्रार्थना में दोष देखता तो वह उसे ठुकरा देता,—तुम्हारे टूटे-फूटे शब्द, तुम्हारी हाँफती साँसें, और तुम्हारा हकलाना अनुग्रह के सिंहासन के सामने हैं। जब हम में से कोई परमेश्वर के सामने अपनी सबसे अच्छी प्रार्थना प्रस्तुत करता है, यदि वह उसे वैसे देखता जैसे परमेश्वर देखता है, तो निःसन्देह वह उस पर बड़ा विलाप करता; क्योंकि जो सबसे अच्छी प्रार्थना कभी की गई, उसमें भी इतना पाप है कि वह परमेश्वर के पास से फेंक दी जाए। परन्तु मैं फिर कहता हूँ, यह न्याय का सिंहासन नहीं है, और यहीं हमारी लंगड़ी, लड़खड़ाती विनतियों के लिये आशा है। हमारा कृपालु राजा अपने दरबार में वैसा कठोर शिष्टाचार नहीं रखता जैसा मनुष्यों के बीच राजकुमारों ने रखा है, जहाँ एक छोटी सी भूल या त्रुटि के कारण निवेदक अपमान के साथ निकाल दिया जाता। नहीं, कदापि नहीं; वह अपनी सन्तानों की दोषपूर्ण पुकारों की कड़ी आलोचना नहीं करता। ऊपर के राजभवन का प्रधान राजकक्षपाल, हमारा प्रभु यीशु मसीह, हर प्रार्थना को प्रस्तुत करने से पहले उसे सुधारने और सँवारने का ध्यान रखता है, और वह अपनी सिद्धता से प्रार्थना को सिद्ध बनाता है, और अपने ही गुणों से उसे प्रबल बनाता है। परमेश्वर उस प्रार्थना को मसीह के द्वारा प्रस्तुत की हुई देखता है, और उसके भीतर के सारे दोषों को क्षमा कर देता है। इससे हम में से उन सब को कितना उत्साह मिलना चाहिए जो अपने आप को प्रार्थना में दुर्बल, भटकनेवाले, और अकुशल पाते हैं। यदि तुम परमेश्वर से वैसे विनती नहीं कर सकते जैसे बीते वर्षों में कभी-कभी करते थे, यदि तुम्हें ऐसा लगता है मानो किसी न किसी रीति से तुम्हें विनती के काम में जंग लग गया है, तो कभी हार न मानो, वरन् फिर भी आओ, हाँ, और अधिक बार आओ, क्योंकि जिसके पास तुम आते हो वह कड़ी आलोचना का सिंहासन नहीं, वह अनुग्रह का सिंहासन है।

फिर, इसके आगे, क्योंकि वह अनुग्रह का सिंहासन है, इसलिए स्वयं निवेदक के दोष उसकी प्रार्थना की सफलता को नहीं रोकेंगे। ओह, हम में कितने दोष हैं! एक सिंहासन के सामने आने के लिये हम कितने अयोग्य हैं—हम, जो भीतर और बाहर पाप से पूरी तरह अशुद्ध हैं! यदि परमेश्वर का सिंहासन अनुग्रह का सिंहासन न होता, तो क्या तुम में से कोई प्रार्थना करने की बात सोचने का साहस करता? यदि तुम कर सकते, तो मैं मान लेता हूँ कि मैं नहीं कर सकता था। एक निरपेक्ष परमेश्वर, जो अनन्त रूप से पवित्र और न्यायी है, अपने ईश्वरीय स्वभाव के अनुरूप रहते हुए मुझ जैसे पापी की कोई प्रार्थना नहीं सुन सकता था, यदि उसने ऐसी योजना न ठहराई होती जिसके द्वारा मेरी प्रार्थना अब निरपेक्ष न्याय के सिंहासन तक नहीं जाती, वरन् ऐसे सिंहासन तक पहुँचती है जो प्रायश्चित्त का ढकना भी है, जो प्रायश्चित्त है, वह स्थान है जहाँ परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा पापियों से मिलता है। आह, यदि यह अनुग्रह का सिंहासन न होता, तो मैं तुमसे, “प्रार्थना करो,” न कह सकता, तुम पवित्र लोगों से भी नहीं, और तुम पापियों से प्रार्थना की बात करना तो और भी दूर की बात होती; परन्तु अब मैं यहाँ के हर एक पापी से यह कहूँगा, चाहे वह अपने आप को अब तक के सब पापियों में सबसे बुरा समझे: जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो। अनुग्रह का सिंहासन तुम्हारे ही योग्य स्थान है: घुटनों पर आ जाओ; सरल विश्वास से अपने उद्धारकर्ता के पास जाओ, क्योंकि वही, हाँ वही अनुग्रह का सिंहासन है। उसी में परमेश्वर मनुष्यजाति के सबसे दोषी लोगों को भी अनुग्रह बाँट सकता है। परमेश्वर धन्य हो, न तो प्रार्थना के दोष और न ही विनती करनेवाले के दोष हमारी विनतियों को उस परमेश्वर से दूर रख सकेंगे जो टूटे और पिसे हुए मन से प्रसन्न होता है।

यदि वह अनुग्रह का सिंहासन है, तो विनती करनेवाले की अभिलाषाओं का अर्थ समझ लिया जाएगा। यदि मुझे वे शब्द न मिलें जिनमें मैं अपनी अभिलाषाएँ प्रगट करूँ, तो परमेश्वर अपने अनुग्रह से मेरी अभिलाषाओं को बिना शब्दों के ही पढ़ लेगा। वह अपने पवित्र लोगों का आशय, उनकी कराहों का आशय ग्रहण करता है। जो सिंहासन अनुग्रहकारी न होता, वह हमारी विनतियों का अर्थ निकालने का कष्ट न उठाता; परन्तु परमेश्वर, वह असीम अनुग्रहकारी, हमारी अभिलाषाओं के प्राण में गोता लगाएगा, और वहाँ वह पढ़ लेगा जो हम जीभ से नहीं कह सकते। क्या तुमने कभी किसी पिता को नहीं देखा, कि जब उसका बच्चा उससे कुछ कहने का यत्न कर रहा होता है, और वह भली-भाँति जानता है कि नन्हा क्या कहना चाहता है, तो वह शब्दों में उसकी सहायता करता है और उसके लिये अक्षर बोल देता है; और यदि नन्हा आधा भूल गया हो कि वह क्या कहना चाहता था, तो तुमने पिता को वह शब्द सुझाते देखा है: और इसी प्रकार सदा धन्य आत्मा, अनुग्रह के सिंहासन से, हमारी सहायता करेगा और हमें शब्द सिखाएगा, वरन् स्वयं अभिलाषाओं को हमारे हृदयों में लिख देगा। पवित्रशास्त्र में हमारे पास ऐसे उदाहरण हैं जहाँ परमेश्वर पापियों के मुँह में शब्द डालता है। “बातें सीखकर,” वह कहता है, “उससे कह, अनुग्रह से हमको ग्रहण कर, और सेंत-मेंत हमसे प्रेम कर।” वह अपने अनुग्रह से तुम्हारी आत्मा में अभिलाषाएँ भी डालेगा, और उन अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति भी; वह तुम्हारी अभिलाषाओं को उन वस्तुओं की ओर मोड़ेगा जिनकी खोज तुम्हें करनी चाहिए; वह तुम्हें तुम्हारी आवश्यकताएँ सिखाएगा, यद्यपि अभी तुम उन्हें नहीं जानते; वह तुम्हें अपनी प्रतिज्ञाएँ सुझाएगा कि तुम उन्हें लेकर विनती कर सको; वास्तव में, वह तुम्हारी प्रार्थना के लिये अल्फा और ओमेगा होगा, ठीक जैसे वह तुम्हारे उद्धार के लिये है; क्योंकि जैसे उद्धार आदि से अन्त तक अनुग्रह से है, वैसे ही पापी का अनुग्रह के सिंहासन के निकट आना भी आदि से अन्त तक अनुग्रह से है। यह कैसी सान्त्वना है। मेरे प्रिय मित्रो, जब हम इस बहुमूल्य वचन, “अनुग्रह का सिंहासन” का मधुर अर्थ चूस लेते हैं, तो क्या हम और भी अधिक साहस से इस सिंहासन के निकट न आएँगे?

यदि वह अनुग्रह का सिंहासन है, तो उसके पास आनेवालों की सब आवश्यकताएँ पूरी की जाएँगी। ऐसे सिंहासन पर से राजा यह न कहेगा, “तुझे मेरे लिये भेंटें लानी होंगी, तुझे मुझे बलिदान चढ़ाने होंगे।” वह कर वसूलने का सिंहासन नहीं; वह दान बाँटने का सिंहासन है। तो आओ, तुम जो कंगाली के समान ही कंगाल हो; आओ, तुम जिनके पास कोई पुण्य नहीं और जो सद्गुणों से खाली हो; आओ, तुम जो आदम के पतन से और अपने ही अपराधों से भिखारी जैसे दिवालिया हो गए हो; यह प्रताप का वह सिंहासन नहीं जो अपनी प्रजा पर लगाए करों से अपना निर्वाह करता है, वरन् ऐसा सिंहासन है जो भली वस्तुओं की बाढ़ के साथ सोते के समान उमड़कर अपनी महिमा प्रगट करता है। तो अब आओ, और वह दाखमधु और दूध ग्रहण करो जो सेंत-मेंत दिया जाता है; हाँ, आओ, दाखमधु और दूध बिन रुपये और बिना दाम ही आकर ले लो। निवेदक की सब आवश्यकताएँ पूरी की जाएँगी, क्योंकि वह अनुग्रह का सिंहासन है।

और इसी प्रकार, निवेदक के सब दुःखों पर तरस खाया जाएगा। मान लो मैं अपने पापों का बोझ लेकर अनुग्रह के सिंहासन के पास आता हूँ; तो सिंहासन पर एक है जिसने बहुत युग पहले पाप का बोझ अनुभव किया, और उसका भार भूला नहीं है। मान लो मैं दुःख से लदा हुआ आता हूँ; तो वहाँ एक है जो उन सब दुःखों को जानता है जिनके अधीन मनुष्यजाति हो सकती है। क्या मैं उदास और संकट में हूँ? क्या मुझे डर है कि स्वयं परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया है? सिंहासन पर एक है जिसने कहा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” वह ऐसा सिंहासन है जिससे अनुग्रह मनुष्यजाति के दुःखों को कोमल दृष्टि से देखने में, उन पर ध्यान देने में और उनसे छुटकारा देने में आनन्दित होता है। तो आओ; तो आओ; तो आओ, तुम जो केवल कंगाल ही नहीं, वरन् दुःखी भी हो, जिनके दुःख तुम्हें मृत्यु की लालसा कराते हैं, और फिर भी तुम उससे डरते हो। हे बन्दियो, अपनी जंजीरों समेत आओ; हे दासो, अपने प्राणों पर बेड़ियाँ लिये आओ; हे अंधियारे में बैठनेवालो, जैसे आँखों पर पट्टी बाँधे हो वैसे ही निकल आओ। यदि तुम अनुग्रह के सिंहासन की ओर नहीं देख सकते, तो वह तुम्हारी ओर देखेगा, और तुम्हें देगा, यद्यपि बदले में देने को तुम्हारे पास कुछ नहीं, और तुम्हें छुड़ाएगा, यद्यपि अपने आप को छुड़ाने के लिये तुम एक उँगली भी नहीं उठा सकते।

“अनुग्रह का सिंहासन।” जितना मैं इस शब्द को अपने मन में उलटता-पलटता हूँ, उतना ही यह बढ़ता जाता है, और मेरे लिये यह अत्यन्त आनन्ददायक विचार है कि यदि मैं प्रार्थना में परमेश्वर के सिंहासन के पास आऊँ, तो मैं हजार कमियाँ भले ही अनुभव करूँ, तो भी आशा है। मैं साधारणतः अपनी प्रार्थनाओं से जितना असन्तुष्ट रहता हूँ, उतना अपने किसी और काम से नहीं। मैं नहीं मानता कि सबके सामने ऐसी प्रार्थना करना सहज है जिससे एक बड़ी मण्डली की आराधना की ठीक अगुवाई हो। हम कभी-कभी सुनते हैं कि लोगों की अच्छा प्रचार करने के लिये प्रशंसा की जाती है, परन्तु यदि कोई अच्छी प्रार्थना करने के योग्य बनाया जाए, तो उसमें उतना ही बड़ा वरदान और उससे ऊँचा अनुग्रह होगा। परन्तु, हे भाइयो, मान लो हमारी प्रार्थनाओं में ज्ञान की कमियाँ हों: वह अनुग्रह का सिंहासन है, और हमारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि हमें ये सब वस्तुएँ चाहिए। मान लो विश्वास की कमियाँ हों: वह हमारे छोटे विश्वास को देखता है और फिर भी उसे ठुकराता नहीं, चाहे वह कितना ही छोटा हो। वह हर दशा में अपने दान हमारे विश्वास के परिमाण से नहीं नापता, वरन् विश्वास की सच्चाई और खरेपन से। और यदि हमारी आत्मा में भी गम्भीर कमियाँ हों, और प्रार्थना के उत्साह या दीनता में चूक हो, तो भी, यद्यपि ये वहाँ नहीं होनी चाहिए और इन पर बहुत शोक करना उचित है; अनुग्रह इन सब को अनदेखा करता है, इन सब को क्षमा करता है, और फिर भी उसका दयालु हाथ हमारी आवश्यकताओं के अनुसार हमें धनी करने के लिये बढ़ा रहता है। निश्चय यह बात बहुतों को, जिन्होंने प्रार्थना नहीं की, प्रार्थना करने के लिये प्रेरित करे, और हमें, जो बहुत समय से प्रार्थना की इस पवित्र कला का अभ्यास करते आए हैं, पहले से कहीं अधिक साहस के साथ अनुग्रह के सिंहासन के निकट आने को उभारे।

III. परन्तु अब, अपने पाठ को सम्पूर्ण रूप में देखें तो, वह हमें सिंहासन पर विराजमान अनुग्रह का विचार देता है। वह एक सिंहासन है, और उस पर कौन विराजमान है? यहाँ प्रतिष्ठा के साथ जिसे बैठाया गया है, वह साकार अनुग्रह है। और, सचमुच, आज अनुग्रह सिंहासन पर है। यीशु मसीह के सुसमाचार में अनुग्रह परमेश्वर का सबसे प्रधान गुण है। वह इतना ऊँचा कैसे उठाया गया? हम उत्तर देते हैं, अनुग्रह का सिंहासन विजय के द्वारा है। अनुग्रह उस अति प्रिय के रूप में पृथ्वी पर उतर आया, और उसकी भेंट पाप से हुई। लम्बा और कड़ा संघर्ष हुआ, और ऐसा लगा मानो अनुग्रह पाप के पाँवों तले रौंदा गया; परन्तु अन्त में अनुग्रह ने पाप को पकड़ लिया, उसे अपने ही कन्धों पर डाल लिया, और यद्यपि वह उस बोझ के नीचे लगभग पिस ही गया, तो भी अनुग्रह पाप को उठाकर क्रूस पर ले गया और उसे वहाँ कीलों से ठोंक दिया, वहीं उसे घात किया, उसे सदा के लिये मार डाला, और महिमा के साथ जय पाई। इसी कारण इस घड़ी अनुग्रह सिंहासन पर विराजमान है, क्योंकि उसने मनुष्य के पाप पर जय पाई है, मनुष्य के दोष का दण्ड उठाया है, और अपने सब बैरियों को उलट दिया है।

इसके अतिरिक्त, अनुग्रह सिंहासन पर इसलिए विराजमान है कि उसने वहाँ अपने आप को अधिकार से स्थापित किया है। परमेश्वर के अनुग्रह में कोई अन्याय नहीं। परमेश्वर जब किसी विश्वासी को क्षमा करता है, तब वह उतना ही न्यायी है जितना तब जब वह किसी पापी को नरक में डालता है। मैं अपने प्राण में विश्वास करता हूँ कि मसीह पर विश्वास करनेवाले प्राण को ग्रहण करने में उतना ही, और उतना ही शुद्ध न्याय है, जितना उन प्राणों को ठुकराने में होगा जो बिना मन फिराए मरते हैं और यहोवा की उपस्थिति से निकाल दिए जाते हैं। मसीह के बलिदान ने परमेश्वर को इस योग्य किया है कि वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे, उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो। जो “प्रतिस्थापन” शब्द को जानता है, और उसका अर्थ ठीक-ठीक समझ सकता है, वह देखेगा कि किसी विश्वासी पर दण्ड देनेवाले न्याय का कुछ भी बकाया नहीं, क्योंकि यीशु मसीह ने विश्वासी के सब ऋण चुका दिए हैं, और अब परमेश्वर अन्यायी ठहरेगा यदि वह उनका उद्धार न करे जिनके बदले मसीह ने दुःख उठाया, जिनके लिये उसकी धार्मिकता तैयार की गई, और जिनके लेखे में वह गिनी गई है। अनुग्रह विजय के द्वारा सिंहासन पर है, और अधिकार से वहाँ विराजमान है।

हे भाइयो, आज अनुग्रह सिंहासन पर विराजमान है, क्योंकि मसीह ने अपना कार्य पूरा किया है और स्वर्ग में चला गया है। वह सामर्थ्य में सिंहासन पर विराजमान है। जब हम उसके सिंहासन की बात करते हैं, तो हमारा अर्थ यह है कि उसके पास असीम सामर्थ्य है। अनुग्रह परमेश्वर के पाँवों की चौकी पर नहीं बैठता; अनुग्रह परमेश्वर के आँगनों में खड़ा नहीं रहता, वरन् वह सिंहासन पर विराजमान है; वह राज करनेवाला गुण है; आज वही राजा है। यह अनुग्रह का युग है, अनुग्रह का वर्ष है: अनुग्रह अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करता है। हम राज करनेवाले अनुग्रह के युग में जी रहे हैं, क्योंकि यीशु मनुष्य की सन्तानों के लिये विनती करने को सर्वदा जीवित है, इसलिए जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उनका पूरा-पूरा उद्धार कर सकता है। हे पापी, यदि तुम्हें अनुग्रह किसी पगडण्डी पर, अपनी यात्रा पर निकले किसी यात्री के समान मिल जाए, तो मैं तुमसे कहूँगा कि उससे परिचय करो और उसका प्रभाव माँगो; यदि तुम्हें अनुग्रह हाट में किसी व्यापारी के समान मिले, जिसके हाथ में धन हो, तो मैं तुमसे कहूँगा कि उसकी मित्रता पाने का यत्न करो, वह कंगाली की घड़ी में तुम्हें धनी करेगा; यदि तुम अनुग्रह को स्वर्ग के सामन्तों में से एक के समान, अति ऊँचा उठाया हुआ देखो, तो मैं तुमसे कहूँगा कि उसके कान तक पहुँचने का यत्न करो; परन्तु, ओह, जब अनुग्रह सिंहासन पर विराजमान है, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुरन्त उसे थाम लो। वह इससे ऊँचा नहीं हो सकता, इससे बड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि लिखा है, “परमेश्वर प्रेम है,” जो अनुग्रह का ही दूसरा नाम है। ओह, आओ और उसके सामने झुको; आओ और परमेश्वर की असीम दया और अनुग्रह की आराधना करो। सन्देह न करो, रुको नहीं, हिचकिचाओ नहीं। अनुग्रह राज कर रहा है; अनुग्रह परमेश्वर है; परमेश्वर प्रेम है। भला होता कि तुम, यह देखकर कि अनुग्रह इस प्रकार सिंहासन पर विराजमान है, आकर उसे ग्रहण करते। तो मैं कहता हूँ कि अनुग्रह विजय से, अधिकार से, और सामर्थ्य से सिंहासन पर विराजमान है, और मैं यह भी जोड़ूँगा कि वह महिमा में सिंहासन पर विराजमान है, क्योंकि परमेश्वर अपने अनुग्रह की महिमा करता है। अब उसका एक उद्देश्य यह है कि अपने अनुग्रह को प्रसिद्ध करे। वह मन फिरानेवालों को क्षमा करने में आनन्दित होता है, और इस प्रकार अपना क्षमा करनेवाला अनुग्रह दिखाता है; वह भटकनेवालों पर दृष्टि करके उन्हें लौटा लाने में आनन्दित होता है, कि अपना लौटा लानेवाला अनुग्रह दिखाए; वह टूटे मनवालों पर दृष्टि करके उन्हें शान्ति देने में आनन्दित होता है, कि अपना सान्त्वना देनेवाला अनुग्रह दिखाए। भाँति-भाँति का अनुग्रह पाया जा सकता है, या यों कहें कि एक ही अनुग्रह भिन्न-भिन्न रीतियों से काम करता है, और परमेश्वर अपने अनुग्रह को महिमामय बनाने में आनन्दित होता है। उस सिंहासन के चारों ओर मरकत के समान एक मेघधनुष है, उसकी करुणा और उसके प्रेम का मरकत। धन्य हैं वे प्राण जो इस पर विश्वास कर सकते हैं, और विश्वास करके तुरन्त आ सकते हैं और उसकी सामर्थ्य के उदाहरण बनकर अनुग्रह की महिमा कर सकते हैं।

IV. अन्त में, हमारा पाठ, यदि ठीक से पढ़ा जाए, तो उसमें महिमा में जगमगाती प्रभुता है,—अनुग्रह की महिमा। दया का सिंहासन एक सिंहासन है; यद्यपि वहाँ अनुग्रह है, तो भी वह सिंहासन ही है। अनुग्रह प्रभुता को उसके स्थान से हटा नहीं देता। अब, प्रभुता का गुण बहुत ऊँचा और भयानक है; उसका प्रकाश यशब के समान है, अति बहुमूल्य, और नीलम के समान, या, जैसा यहेजकेल उसका वर्णन करता है, “बर्फ के समान भयानक रीति से चमकता” हुआ। वह राजा, जिसका नाम सेनाओं का यहोवा है, यों कहता है: “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ, उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा।” “हे मनुष्य, भला तू कौन है, जो परमेश्वर का सामना करता है? क्या गढ़ी हुई वस्तु गढ़नेवाले से कह सकती है, तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया है?” “क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं, कि एक ही लोंदे में से, एक बर्तन आदर के लिये, और दूसरे को अनादर के लिये बनाए?” ये महान और भयानक वचन हैं, और इनका उत्तर नहीं दिया जा सकता। वह राजा है, और वह जैसा चाहेगा वैसा करेगा। कोई उसको रोककर उससे नहीं कह सकता है, तूने यह क्या किया है? परन्तु, आह! कहीं ऐसा न हो कि तुम में से कोई उसकी प्रभुता के विचार से उदास हो जाए, इसलिए मैं तुम्हें पाठ की ओर बुलाता हूँ। वह एक सिंहासन है,—वहाँ प्रभुता है; परन्तु हर उस प्राण के लिये जो प्रार्थना करना जानता है, हर उस प्राण के लिये जो विश्वास से यीशु के पास, जो सच्चा प्रायश्चित्त का ढकना है, आता है, ईश्वरीय प्रभुता कोई अन्धकारमय और भयानक रूप धारण नहीं करती, वरन् प्रेम से भरी रहती है। वह अनुग्रह का सिंहासन है; इससे मैं यह समझता हूँ कि परमेश्वर की प्रभुता विश्वासी के प्रति, विनती करनेवाले के प्रति, मसीह में परमेश्वर के पास आनेवाले के प्रति, सदा शुद्ध अनुग्रह में ही प्रगट होती है। तुम्हारे लिये, तुम्हारे लिये जो प्रार्थना में परमेश्वर के पास आते हो, प्रभुता सदा यों बोलती है: “मैं उस पापी पर दया करूँगा; यद्यपि वह इसके योग्य नहीं, यद्यपि उसमें कोई पुण्य नहीं, तो भी क्योंकि मैं अपने माल से जो चाहूँ वैसा कर सकता हूँ, मैं उसे आशीष दूँगा, मैं उसे अपनी सन्तान बनाऊँगा, मैं उसे ग्रहण करूँगा; जो दिन मैंने ठहराया है, उस दिन वह मेरा निज भाग ठहरेगा।” दया के सिंहासन पर परमेश्वर ने अपनी प्रभुता को अनुग्रह की रीति को छोड़ और किसी रीति से कभी नहीं चलाया। वह राज्य करता है, परन्तु इस विषय में हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करता है।

सोचने योग्य ये दो-तीन बातें हैं, और फिर मैं समाप्त करता हूँ। अनुग्रह के सिंहासन पर प्रभुता ने अपने आप को प्रेम के बन्धनों में बाँध लिया है। यहाँ मुझे चुने हुए और परखे हुए शब्दों में बोलना होगा, और ठीक वाक्य पाने के लिये मुझे हिचकना और रुकना होगा, कहीं ऐसा न हो कि सत्य को सरलता से कहने का यत्न करते हुए मैं भूल कर बैठूँ। परमेश्वर जैसा चाहेगा वैसा करेगा; परन्तु, दया के सिंहासन पर, वह बन्धनों में है—अपने ही बनाए हुए बन्धनों में, क्योंकि उसने मसीह के साथ वाचा बाँधी है, और इस प्रकार अपने चुने हुओं के साथ वाचा बाँधी है। यद्यपि परमेश्वर प्रभुतासम्पन्न है और सदा रहेगा, तो भी वह अपनी वाचा कभी न तोड़ेगा, और जो उसके मुँह से निकल चुका है, उसे न बदलेगा। वह अपनी ही बाँधी हुई वाचा से कभी मुकर नहीं सकता। जब मैं मसीह में परमेश्वर के पास, दया के सिंहासन पर विराजमान परमेश्वर के पास आता हूँ, तो मुझे यह कल्पना करने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर प्रभुता के किसी कार्य से अपनी वाचा को एक ओर कर देगा। ऐसा नहीं हो सकता: यह असम्भव है।

इसके अतिरिक्त, अनुग्रह के सिंहासन पर परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं के द्वारा फिर से हमसे बँधा हुआ है। वाचा में बहुत सी अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञाएँ हैं, बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी। “माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।” जब तक परमेश्वर ने यह वचन, या इस आशय का कोई वचन नहीं कहा था, तब तक प्रार्थना सुनना या न सुनना उसकी अपनी इच्छा पर था, परन्तु अब ऐसा नहीं है; क्योंकि अब, यदि वह यीशु मसीह के द्वारा चढ़ाई गई सच्ची प्रार्थना है, तो उसकी सच्चाई उसे बाध्य करती है कि वह उसे सुने। एक मनुष्य पूरी तरह स्वतन्त्र हो सकता है, परन्तु जिस क्षण वह कोई प्रतिज्ञा करता है, वह उसे तोड़ने के लिये स्वतन्त्र नहीं रहता; और सनातन परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा तोड़ना नहीं चाहता। वह उसे पूरा करने में आनन्दित होता है। उसने घोषणा की है कि उसकी सब प्रतिज्ञाएँ मसीह यीशु में हाँ और आमीन हैं; परन्तु, जब हम परमेश्वर को प्रभुतासम्पन्न के ऊँचे और भयानक रूप में देखते हैं, तो हमारी सान्त्वना के लिये हमारे पास सोचने को यह बात है, कि वह उन प्राणों के प्रति विश्वासयोग्य रहने के लिये प्रतिज्ञा की वाचा के बन्धनों में बँधा है जो उसे खोजते हैं। उसका सिंहासन उसके लोगों के लिये अनुग्रह का सिंहासन ही होना चाहिए।

और, एक बार फिर, और सबसे मधुर विचार यह है, कि वाचा की हर एक प्रतिज्ञा पर लहू से हस्ताक्षर और मुहर की गई है, और सनातन परमेश्वर से यह दूर रहे कि वह अपने प्रिय पुत्र के लहू का तिरस्कार करे। जब कोई राजा किसी नगर को अधिकार-पत्र दे देता है, तो भले ही वह पहले निरंकुश रहा हो, और उसके विशेषाधिकारों पर कोई रोक न रही हो, परन्तु जब नगर के पास उसका अधिकार-पत्र होता है, तब वह राजा के सामने अपने अधिकारों की दुहाई देता है। इसी प्रकार परमेश्वर ने अपने लोगों को अनगिनत आशीषों का एक अधिकार-पत्र दिया है, और उन्हें दाऊद पर की अटल करुणा प्रदान की है। अधिकार-पत्र की वैधता बहुत कुछ हस्ताक्षर और मुहर पर निर्भर होती है, और, मेरे भाइयो, वाचा के अनुग्रह का अधिकार-पत्र कितना निश्चित है। हस्ताक्षर स्वयं परमेश्वर की लिखावट है, और मुहर एकलौते का लहू है। वाचा लहू से, उसके अपने प्रिय पुत्र के लहू से पक्की की गई है। जब हम लहू से मुहरबन्द उस वाचा की दुहाई देते हैं, जो सब बातों में ठीक की हुई और अटल भी है, तो यह सम्भव नहीं कि परमेश्वर से हमारी विनती व्यर्थ जाए। आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु परमेश्वर के सामने यीशु के लहू की सामर्थ्य कभी विफल नहीं हो सकती। जब हम चुप होते हैं तब वह बोलता है, और जब हम हार जाते हैं तब वह प्रबल होता है। वह हाबिल के लहू से उत्तम बातें माँगता है, और उसकी पुकार सुनी जाती है। आओ हम साहस बाँधकर चलें, क्योंकि हम अपने हृदयों में प्रतिज्ञा सुनते हैं। जब हम परमेश्वर की प्रभुता के कारण भयभीत हों, तो आओ हम आनन्द से गाएँ—

“सुसमाचार मेरी आत्मा को सम्भाले रहता है,

एक विश्वासयोग्य और अटल परमेश्वर

मेरी आशा की नींव डालता है

शपथों, प्रतिज्ञाओं और लहू में।”

परमेश्वर पवित्र आत्मा इस समय से आगे हमें “अनुग्रह के सिंहासन” का ठीक-ठीक उपयोग करने में सहायता करे। आमीन।

रोम, 7 दिसम्बर, 1871।

मेरी प्रिय कलीसिया और सब मित्रों के नाम,

प्रभु में प्रियो, अपनी पुरानी बीमारी को लौटने से रोकने के लिये थोड़े समय के लिये इंग्लैण्ड छोड़ना अपना कर्तव्य समझकर, मैं कृतज्ञता के साथ यह स्वीकार करने को बाध्य हूँ कि विदेश में मेरे प्रवास के समय प्रभु का भला हाथ मुझ पर रहा है। मुझे आशा है कि मैं थोड़े ही समय में लौटूँगा, और ऐसा बल पाकर कि बिना किसी और विराम के बहुत समय तक परिश्रम करता रह सकूँ। मैं इस अवसर पर अपनी स्नेही कलीसिया और कृपालु मित्रों को उनकी उदार सहानुभूति के अनगिनत कामों के लिये धन्यवाद देता हूँ, जिनके द्वारा उन्होंने हमारे कॉलेज और अनाथालय की सहायता की, और विशेष करके उन बहुत सी प्रार्थनाओं के लिये जो मेरी हाल की बीमारी में मेरी सान्त्वना और चंगाई का कारण बनीं, और जो प्रभु के लिये मेरी निरन्तर बढ़ती सेवा में मुझे सम्भाले रखने का साधन हैं। जो भलाई विश्वासयोग्य मित्रों ने मेरे लिये माँगी है, प्रभु उसे हजार गुना करके उनकी गोद में लौटा दे, और मुझे सेवकाई के द्वारा उनके लिये पहले से कहीं अधिक आशीष का साधन बनाए।

अभी मैं विनती करता हूँ कि उन प्रार्थनाओं को बढ़ी हुई उत्सुकता के साथ फिर से आरम्भ किया जाए, क्योंकि धर्म के जागरण की बड़ी आवश्यकता है; और यदि विश्वासी उसके लिये एक मन होकर प्रार्थना करें, तो यह उसके शीघ्र आने का निश्चित प्रमाण होगा। टैबरनेकल में ज्वाला पहले ही सुलग चुकी है, परन्तु उसे हवा देकर एक प्रचण्ड आग बनाना आवश्यक है। हमारे देश को ईश्वरीय भेंट की आवश्यकता है, और उसकी प्रतिज्ञा को पूरा होने के लिये केवल इतना ही चाहिए कि उसे लेकर विनती की जाए। हे भाइयो, एक मनुष्य के समान होकर, हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर से, जो महिमा का पिता है, बड़े जोर से दुहाई दो, और उससे विनती करो कि वह इस काम में अपना हाथ लगाए, और सब लोगों की दृष्टि में अपने पुत्र की बड़ाई करे। जहाँ शैतान का सिंहासन है, वहाँ दस हजार मूरतों के बीच खड़ा होकर, मैं उनसे जो आत्मा में परमेश्वर की आराधना करते हैं, विनती करता हूँ कि विश्रान्ति के दिनों के लिये प्रार्थना में मल्लयुद्ध करें, कि सब देश जान लें कि यीशु मसीह ही प्रभु है। मसीह-विरोधी की मूर्तिपूजाओं के द्वारा यीशु के नाम की निन्दा कब तक होती रहेगी? हो सकता है कि अन्धकार के दिन तब तक बने रहें जब तक ज्योति की सन्तान प्राण की वेदना के कारण रात-दिन फूट-फूटकर दुहाई न दें। तब परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय चुकाएगा, और वह भी तुरन्त।

जब मैं एप्पियन मार्ग पर चला, तो मैं आनन्दित हुआ कि यीशु, जिसका प्रचार पौलुस करता था, अब भी जीवित है, और ठीक समय पर अपने बैरियों को निश्चय गिरा देगा। वह उस कोलोसियम को पहले ही उजाड़ चुका है जहाँ उसके विश्वासयोग्य शहीदों ने अपना लहू बहाया; मूर्तिपूजक सत्ता गिर चुकी है, और वैसे ही पोप की सत्ता भी गिरेगी, और हर वह दूसरी सत्ता भी जो उसके राज्य का विरोध करती है। आओ हम एक आत्मिक धर्मयुद्ध की घोषणा करें, और दुगनी प्रार्थना के द्वारा अपने झण्डे खड़े करें। यह निश्चित है कि विनती स्वर्ग और पृथ्वी में अद्भुत परिणाम उत्पन्न करती है; उसकी सामर्थ्य हमारे अपने व्यक्तिगत अनुभव में, और कलीसिया के सारे इतिहास में प्रमाणित हो चुकी है। हे भाइयो, आओ हम प्रार्थना करें।

यीशु के निमित्त, तुम्हारा,

सी. एच. स्पर्जन।

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