प्रार्थना की पाठशाला में मसीह के साथ
सर्व-समावेशी वरदान

अध्याय 8 · 10 मिनट का पठन

सर्व-समावेशी वरदान

‘सो जब तुम बुरे होकर भी अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा?’—लूका 11:13।

पर्वत पर के उपदेश में, प्रभु अपने उस अद्भुत कितना अधिक? को पहले ही कह चुका था। यहाँ लूका में, जहाँ वह उस प्रश्न को दोहराता है, एक भेद है। जैसे तब अच्छी वस्तुएँ देने की बात करने के बदले, वह कहता है, ‘स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा?’ इस प्रकार वह हमें सिखाता है कि इन वरदानों में मुख्य और सर्वोत्तम पवित्र आत्मा है, या यों कहें, कि इसी वरदान में और सब समाए हुए हैं। पवित्र आत्मा पिता के वरदानों में पहला है, और वही जिसे देने में उसे सबसे अधिक आनन्द आता है। इसलिये पवित्र आत्मा वह वरदान है जिसे हमें पहले और मुख्यतः ढूँढ़ना चाहिए।

इस वरदान का अकथनीय मूल्य हम सहज ही समझ सकते हैं। यीशु ने आत्मा को ‘पिता की वह प्रतिज्ञा’ कहा; वह एक प्रतिज्ञा जिसमें परमेश्वर का पितृत्व अपने आप को प्रगट करता है। सबसे उत्तम वरदान जो कोई भला और बुद्धिमान पिता पृथ्वी पर अपने बालक को दे सकता है, वह उसकी अपनी आत्मा है। शिक्षा में पिता का यही महान् उद्देश्य है—कि वह अपने बालक में अपना ही स्वभाव और चरित्र फिर से उत्पन्न करे। यदि बालक को अपने पिता को जानना और समझना है; यदि, बढ़ते-बढ़ते, उसे उसकी सारी इच्छा और योजनाओं में प्रवेश करना है; यदि उसे अपना सर्वोच्च आनन्द पिता में, और पिता को उसमें पाना है,—तो उसे उसके साथ एक मन और एक आत्मा का होना अवश्य है। और इसलिये यह कल्पना करना असम्भव है कि परमेश्वर अपने बालक को इससे बढ़कर कोई ऊँचा वरदान दे, अर्थात् अपनी ही आत्मा। परमेश्वर जो कुछ है, अपनी आत्मा के द्वारा है; आत्मा परमेश्वर का जीवन ही है। ज़रा सोच इसका क्या अर्थ है—कि परमेश्वर अपनी ही आत्मा पृथ्वी पर अपने बालक को दे रहा है।

अथवा क्या पृथ्वी पर पुत्र के रूप में यीशु की यह महिमा न थी, कि पिता का आत्मा उसमें था? यरदन में उसके बपतिस्मे पर दो बातें एक हो गईं,—वह वाणी, जो उसे प्रिय पुत्र घोषित करती थी, और वह आत्मा, जो उस पर उतरा। और इसी प्रकार प्रेरित हमारे विषय में कहता है, ‘और तुम जो पुत्र हो, इसलिये परमेश्वर ने अपने पुत्र की आत्मा को, जो ‘हे अब्बा, हे पिता’ कहकर पुकारता है, हमारे मनों में भेजा।’ राजा अपने पुत्र की सारी शिक्षा में यह ढूँढ़ता है कि उसमें राजकीय आत्मा जगाए। स्वर्ग में हमारा पिता चाहता है कि हमें अपने बच्चों के रूप में उस पवित्र, स्वर्गीय जीवन के लिये शिक्षित करे जिसमें वह वास करता है, और इसके लिये हमें, अपने हृदय की गहराइयों से, अपनी ही आत्मा देता है। यही यीशु का सारा लक्ष्य था जब, अपने ही लहू से प्रायश्चित्त कर चुकने के बाद, वह हमारे लिये परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश कर गया, कि वह हमारे लिये पवित्र आत्मा प्राप्त करे, और उसे हम में वास करने के लिये उतार दे। पिता और पुत्र दोनों की आत्मा के रूप में, पिता और पुत्र का सारा जीवन और प्रेम उसमें है; और, हम में उतरकर, वह हमें उनकी संगति में ऊपर उठा लेता है। पिता की आत्मा के रूप में, वह पिता के उस प्रेम को, जिससे उसने पुत्र से प्रेम किया, हमारे मनों में उंडेल देता है, और हमें उसमें जीना सिखाता है। पुत्र की आत्मा के रूप में, वह हम में वह बालक-सी स्वतन्त्रता, और भक्ति, और आज्ञाकारिता फूँक देता है जिसमें पुत्र पृथ्वी पर जीया। पिता इससे बढ़कर कोई ऊँचा या अधिक अद्भुत वरदान नहीं दे सकता: अपना ही पवित्र आत्मा, पुत्रत्व का आत्मा।

यह सत्य स्वाभाविक रूप से यह विचार सुझाता है कि परमेश्वर का यह पहला और मुख्य वरदान सारी प्रार्थना का पहला और मुख्य लक्ष्य होना अवश्य है। आत्मिक जीवन की हर आवश्यकता के लिये यही एक अवश्य वस्तु है, पवित्र आत्मा। सारी परिपूर्णता यीशु में है; अनुग्रह और सच्चाई की परिपूर्णता, जिसमें से हम अनुग्रह पर अनुग्रह पाते हैं। पवित्र आत्मा नियुक्त पहुँचाने वाला है, जिसका विशेष काम यह है कि यीशु को और जो कुछ उसमें हमारे लिये है उसे व्यक्तिगत रूप से अपनाने में, धन्य अनुभव में, हमारा बना दे। वह मसीह यीशु में जीवन की आत्मा है; जितना अद्भुत यह जीवन है, उतना ही अद्भुत वह प्रबन्ध है जिसके द्वारा ऐसा एक अभिकर्ता जुटाया गया है कि उसे हम तक पहुँचाए। यदि हम केवल अपने आप को पूरी तरह आत्मा के हवाले कर दें, और उसे हमारे साथ अपनी रीति चलाने दें, तो वह हमारे भीतर मसीह के जीवन को प्रगट करेगा। वह यह एक ईश्वरीय सामर्थ्य से करेगा, हम में मसीह के जीवन को बिना रुके निरन्तरता में बनाए रखते हुए। निश्चय ही, यदि कोई एक प्रार्थना है जो हमें पिता के सिंहासन की ओर खींचे और हमें वहाँ बनाए रखे, तो वह यही है: कि वह पवित्र आत्मा, जिसे हमने बच्चों के रूप में पाया है, अधिक परिपूर्णता से हम में भीतर बहे और हम में से बाहर।

उन नाना प्रकार के वरदानों में जिन्हें आत्मा को बाँटना है, वह विश्वासी की हर आवश्यकता को पूरा करता है। ज़रा उन नामों का विचार कर जो वह धारण करता है। अनुग्रह की आत्मा, कि जो अनुग्रह यीशु में है उस सब को प्रगट और प्रदान करे। विश्वास की आत्मा, जो हमें सदा विश्वास करते रहने में आरम्भ करना, आगे बढ़ना और बढ़ते जाना सिखाती है। लेपालकपन और निश्चय की आत्मा, जो गवाही देती है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और उस भरोसेमन्द और निश्चयपूर्ण ‘हे अब्बा, हे पिता!’ को उभारती है। सत्य की आत्मा, कि सारे सत्य में ले चले, कि परमेश्वर के हर एक वचन को काम और सच्चाई में हमारा बना दे। प्रार्थना की आत्मा, जिसके द्वारा हम पिता से बात करते हैं; ऐसी प्रार्थना जो अवश्य सुनी जाए। न्याय और जलन की आत्मा, कि मन को जाँचे, और पाप का बोध कराए। पवित्रता की आत्मा, जो हमारे भीतर पिता की पवित्र उपस्थिति को प्रगट और प्रदान करती है। सामर्थ्य की आत्मा, जिसके द्वारा हम इतने दृढ़ होते हैं कि साहस से गवाही दें और पिता की सेवा में प्रभावशाली रीति से काम करें। महिमा की आत्मा, हमारी मीरास का बयाना, आने वाली महिमा की तैयारी और उसका पहले से चखना। निश्चय ही परमेश्वर की सन्तान को सचमुच बालक के समान जी सकने के लिये केवल एक ही बात की आवश्यकता है: वह यह, कि इस आत्मा से भर जाए।

और अब, आज यीशु अपनी पाठशाला में हमें जो पाठ सिखाता है वह यह है: कि पिता तो बस लालायित है कि वह उसे हमें दे, यदि हम केवल इस बात पर बालक-सी निर्भरता में माँगें जो वह कहता है: ‘सो जब तुम अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा कितना अधिक न देगा।’ परमेश्वर की प्रतिज्ञा के इन शब्दों में, ‘मैं अपना आत्मा बहुतायत से उंडेलूँगा;’ और उसकी आज्ञा के इन शब्दों में, ‘आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ,’ हमारे पास इसका माप है कि परमेश्वर क्या देने को तैयार है, और हम क्या पा सकते हैं। परमेश्वर के बच्चों के रूप में, हम आत्मा को पहले ही पा चुके हैं। परन्तु हमें अब भी उसके विशेष वरदानों और कार्यों के लिये माँगना और प्रार्थना करना है, जैसे-जैसे हमें उनकी आवश्यकता हो। और केवल यही नहीं, वरन् इसलिये भी कि वह पूरा और सम्पूर्ण अधिकार कर ले; उसके निरन्तर, हर पल के मार्गदर्शन के लिये। जैसे डाली, दाखलता के रस से पहले ही भरी हुई, सदा इस बात के लिये पुकारती रहती है कि वह रस निरन्तर और बढ़ता हुआ बहता रहे, कि वह अपना फल सिद्धता तक ला सके, वैसे ही विश्वासी, आत्मा को पाकर आनन्दित होते हुए, सदा और अधिक के लिये प्यासा रहता और पुकारता है। और जो महान् शिक्षक चाहता है कि हम सीखें वह यह है, कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा और परमेश्वर की आज्ञा से कम कुछ भी हमारी आशा और हमारी प्रार्थना का माप न हो; हमें बहुतायत से भरा जाना अवश्य है। वह चाहता है कि हम यह इस निश्चय में माँगें कि परमेश्वर के पितृ-प्रेम का वह अद्भुत कितना अधिक इस बात का बयाना है कि, जब हम माँगते हैं, तब हम निश्चय ही पाते हैं।

आओ अब हम इस पर विश्वास करें। जब हम आत्मा से भरे जाने के लिये प्रार्थना करें, तो आओ हम उत्तर को अपनी भावनाओं में न ढूँढ़ें। सब आत्मिक आशीषें ग्रहण की जानी अवश्य हैं, अर्थात् विश्वास से स्वीकार या ले ली जानी।1 मुझे विश्वास करने दे, कि पिता अपने प्रार्थना करते हुए बालक को पवित्र आत्मा देता है। अभी भी, जब मैं प्रार्थना कर रहा हूँ, मुझे विश्वास से कहना अवश्य है: जो मैं माँगता हूँ वह मेरे पास है, आत्मा की परिपूर्णता मेरी है। आओ हम इस विश्वास में स्थिर बने रहें। परमेश्वर के वचन के बल पर हम जानते हैं कि जो हम माँगते हैं वह हमारे पास है। आओ हम, इस धन्यवाद के साथ कि हम सुने गए हैं, इस धन्यवाद के साथ कि जो हमने पाया और लिया और अब अपना करके थामे हुए हैं, विश्वास की प्रार्थना में स्थिर बने रहें कि वह आशीष, जो हमें पहले ही दे दी गई है, और जिसे हम विश्वास से थामे हुए हैं, फूट निकले और हमारे सारे अस्तित्व को भर दे। ऐसे ही विश्वास के धन्यवाद और प्रार्थना में हमारी आत्मा खुल जाती है कि आत्मा पूरा और निर्बाध अधिकार कर ले। ऐसी ही प्रार्थना है जो न केवल माँगती और आशा रखती है, वरन् लेती और थामे रखती है, जो पूरी आशीष की वारिस होती है। अपनी सारी प्रार्थना में आओ हम उस पाठ को स्मरण रखें जो उद्धारकर्ता आज हमें सिखाना चाहता है, कि, यदि पृथ्वी पर एक बात है जिसके विषय में हम निश्चय रख सकते हैं, तो वह यही है, कि पिता चाहता है कि हम उसकी आत्मा से भरे रहें, कि उसे अपनी आत्मा हमें देने में आनन्द आता है।

और जब एक बार हम इस प्रकार अपने लिये विश्वास करना सीख लेते हैं, और प्रतिदिन उस भण्डार में से निकालना जो हम स्वर्ग में थामे हुए हैं, तब परमेश्वर की कलीसिया पर, सब प्राणियों पर, व्यक्तियों पर, या विशेष प्रयत्नों पर आत्मा के उंडेले जाने के लिये प्रार्थना करने की कैसी स्वतन्त्रता और सामर्थ्य! जो एक बार प्रार्थना में अपने लिये पिता को जानना सीख लेता है, वह औरों के लिये भी बड़े निश्चय से प्रार्थना करना सीख लेता है। पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा देता है, कम नहीं, वरन् सबसे अधिक तब, जब वे औरों के लिये माँगते हैं।

‘हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।’

हे स्वर्ग में पिता! तू ने अपने पुत्र को इसलिये भेजा कि वह हम पर तुझे प्रगट करे, तेरे पितृ-प्रेम को, और उस सब को जो वह प्रेम हमारे लिये रखता है। और उसने हमें सिखाया है, कि सब वरदानों से बढ़कर जो वरदान तू प्रार्थना के उत्तर में देना चाहता है, वह पवित्र आत्मा है।

हे मेरे पिता! मैं यह प्रार्थना लेकर तेरे पास आता हूँ; ऐसा कुछ नहीं जिसे मैं—क्या मैं यह न कहूँ, जिसे मैं—इतना चाहता होऊँ जितना कि आत्मा से, अर्थात् पवित्र आत्मा से, भर जाना। जो आशीषें वह लाता है वे इतनी अकथनीय हैं, और ठीक वही जिनकी मुझे आवश्यकता है। वह तेरे प्रेम को मन में उंडेल देता है, और उसे तुझ से भर देता है। मैं इसके लिये लालायित हूँ। वह मुझ में मसीह के मन और जीवन को फूँक देता है, कि मैं वैसे ही जीऊँ जैसे उसने जीया, पिता के प्रेम में और उसी के लिये। मैं इसके लिये लालायित हूँ। वह मेरे सारे चलन और काम के लिये ऊपर से सामर्थ्य पहनाता है। मैं इसके लिये लालायित हूँ। हे पिता! मैं तुझ से विनती करता हूँ, आज मुझे अपनी आत्मा की परिपूर्णता दे।

हे पिता! मैं यह अपने प्रभु के वचनों पर टिककर माँगता हूँ: ‘पवित्र आत्मा कितना अधिक।’ मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि तू मेरी प्रार्थना सुनता है; जो मैं माँगता हूँ उसे मैं अब पाता हूँ; हे पिता! मैं इस पर दावा करता और इसे लेता हूँ: तेरी आत्मा की परिपूर्णता मेरी है। मैं आज फिर इस वरदान को विश्वास के वरदान के रूप में पाता हूँ; विश्वास से मैं गिनता हूँ कि मेरा पिता आत्मा के द्वारा वह सब करता है जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है। पिता को अपनी आत्मा अपने बाट जोहते हुए बालक में फूँकने में आनन्द आता है, जब वह उसी के साथ संगति में ठहरता है। आमीन।

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