प्रार्थना की पाठशाला में मसीह के साथ
मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य

अध्याय 16 · 10 मिनट का पठन

मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य

‘फिर मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी भी बात के लिये जिसे वे माँगें एक मन के हों, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिये हो जाएगा। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ।—मत्ती 18:19, 20

प्रभु ने अपनी प्रार्थना की पाठशाला में जो पहले पाठों में से एक हमें सिखाया वह यह था: मनुष्यों को दिखाने के लिये प्रार्थना न करना। अपनी कोठरी में जा; पिता के साथ अकेला हो। जब उसने यों हमें सिखा दिया कि प्रार्थना का अर्थ परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत, वैयक्तिक संपर्क है, तब वह दूसरा पाठ लेकर आता है: तुम्हें केवल गुप्त, एकान्त प्रार्थना की ही नहीं, वरन् सार्वजनिक, मिलकर की गई प्रार्थना की भी आवश्यकता है। और वह हमें दो या तीन जनों की उस मिलकर की गई प्रार्थना के लिये एक बहुत ही विशेष प्रतिज्ञा देता है जो जो कुछ माँगते हैं उसमें एक मन के होते हैं। जैसे पेड़ की जड़ भूमि में छिपी रहती है और उसका तना धूप में ऊपर बढ़ता है, वैसे ही प्रार्थना को अपने पूर्ण विकास के लिये उतनी ही समान रूप से उस छिपी हुई गुप्तता की आवश्यकता है जिसमें प्राण अकेला परमेश्वर से मिलता है, और उनके साथ सार्वजनिक संगति की भी जो यीशु के नाम में अपना सांझा मिलन-स्थल पाते हैं।

इसका कारण कि ऐसा क्यों होना चाहिए, स्पष्ट है। जो बन्धन मनुष्य को उसके संगी-मनुष्यों से जोड़ता है, वह उस बन्धन से कम वास्तविक और घनिष्ठ नहीं जो उसे परमेश्वर से जोड़ता है: वह उनके साथ एक है। अनुग्रह केवल परमेश्वर के साथ ही नहीं, वरन् मनुष्य के साथ भी हमारे संबंध को नया कर देता है। हम केवल ‘मेरे पिता’ कहना ही नहीं, वरन् ‘हमारे पिता’ कहना भी सीखते हैं। इससे बढ़कर अस्वाभाविक और कुछ न होगा कि एक परिवार की सन्तान सदा अपने पिता से अलग-अलग तो मिले, परन्तु अपनी अभिलाषाओं या अपने प्रेम की मिलकर की गई अभिव्यक्ति में कभी नहीं। विश्वासी केवल एक ही परिवार के सदस्य ही नहीं, वरन् एक ही देह के भी हैं। जैसे देह का हर अंग दूसरे पर निर्भर करता है, और देह में वास करनेवाले आत्मा की पूरी क्रिया सब के मेल और सहयोग पर निर्भर करती है, वैसे ही मसीही उस पूरी आशीष तक नहीं पहुँच सकते जो परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा देने को तैयार है, सिवाय इसके कि वे उसे एक दूसरे के साथ संगति में ढूँढ़ें और पाएँ। यह विश्वासियों के मेल और संगति में ही है कि आत्मा अपनी पूरी सामर्थ्य प्रकट कर सकता है। यह उन एक सौ बीस जनों पर, जो एक ही स्थान में इकट्ठे बने रहे, और एक मन होकर प्रार्थना करते रहे, कि आत्मा महिमामय प्रभु के सिंहासन से उतर आया।

मिलकर की गई सच्ची प्रार्थना के लक्षण हमारे प्रभु के इन शब्दों में हमें दिए गए हैं। पहला है माँगी गई वस्तु के विषय में एक-मन होना। केवल सामान्य रूप से इस बात की सहमति ही नहीं होनी चाहिए कि जो कुछ दूसरा माँगे उससे सहमत हो जाएँ: कोई विशेष वस्तु होनी चाहिए, कोई ऐसी बात जो स्पष्ट रूप से मिलकर चाही गई हो; यह एक-मन होना, समस्त प्रार्थना के समान, आत्मा और सच्चाई में होना चाहिए। ऐसे एक-मन होने में हम पर बहुत स्पष्ट हो जाएगा कि हम ठीक-ठीक क्या माँग रहे हैं, क्या हम भरोसे के साथ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार माँग सकते हैं, और क्या हम यह विश्वास करने को तैयार हैं कि जो हम माँगते हैं वह हमें मिल गया है।

दूसरा लक्षण है यीशु के नाम में, या उसके नाम में मिलकर, इकट्ठा होना। हम आगे प्रार्थना में यीशु के नाम की आवश्यकता और सामर्थ्य के विषय में और भी बहुत कुछ सीखेंगे; यहाँ हमारा प्रभु हमें सिखाता है कि वह नाम ही वह मेल का केन्द्र होना चाहिए जिसमें विश्वासी इकट्ठे होते हैं, वह मेल का बन्धन जो उन्हें एक बनाता है, ठीक जैसे एक घर उन सब को समेटे और जोड़े रखता है जो उसमें हैं। ‘यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है; धर्मी उसमें भागकर सुरक्षित रहता है।’ वह नाम उनके लिये, जो उसे समझते और उस पर विश्वास करते हैं, ऐसा यथार्थ है कि उसके भीतर मिलना स्वयं उसकी उपस्थिति पाना है। उसके चेलों के प्रेम और एकता में यीशु के लिये अनन्त आकर्षण है: ‘जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ।’ यह यीशु की जीवित उपस्थिति ही है, उसके प्रेममय, प्रार्थना करनेवाले चेलों की संगति में, जो मिलकर की गई प्रार्थना को उसकी सामर्थ्य देती है।

तीसरा लक्षण है निश्चित उत्तर: ‘वह मेरे पिता की ओर से उनके लिये हो जाएगा।’ धार्मिक संगति बनाए रखने, या अपनी ही उन्नति ढूँढ़ने के लिये कोई प्रार्थना-सभा अपना उपयोग रख सकती है; उद्धारकर्ता का इसे ठहराने में यह दृष्टिकोण न था। उसने इसे प्रार्थना के विशेष उत्तर को सुनिश्चित करने का साधन ठहराया। प्रार्थना के मान्य उत्तर के बिना कोई प्रार्थना-सभा एक असंगति ही होनी चाहिए। जब हम में से किसी के कुछ स्पष्ट अभिलाषाएँ हों जिनके विषय में हम अपने आप को इतना दुर्बल अनुभव करते हैं कि आवश्यक विश्वास का प्रयोग न कर सकें, तब हमें दूसरों की सहायता में बल ढूँढ़ना चाहिए। विश्वास और प्रेम और आत्मा की एकता में, यीशु के नाम और उपस्थिति की सामर्थ्य अधिक स्वतंत्रता से कार्य करती है और उत्तर अधिक निश्चय से आता है। इस बात का लक्षण कि सचमुच मिलकर प्रार्थना हुई है, वह फल है, वह उत्तर है, उस वस्तु का पाया जाना जो हम ने माँगी: ‘मैं तुम से कहता हूँ, वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिये हो जाएगा।’

मिलकर की गई प्रार्थना का यह कैसा अवर्णनीय विशेषाधिकार है, और यह कैसी सामर्थ्य हो सकती है। यदि विश्वासी पति-पत्नी जानते कि वे यीशु के नाम में इसलिये एक साथ जोड़े गए हैं कि मिलकर की गई प्रार्थना में उसकी उपस्थिति और सामर्थ्य का अनुभव करें (1 पतरस); यदि मित्र यह विश्वास करते कि एक साथ मिलकर प्रार्थना करनेवाले दो या तीन जन एक दूसरे को कैसी प्रबल सहायता दे सकते हैं; यदि हर प्रार्थना-सभा में नाम में इकट्ठा होना, उपस्थिति पर विश्वास, और उत्तर की आशा अग्रभाग में खड़े रहते; यदि हर कलीसिया में मिलकर की गई प्रभावी प्रार्थना उन प्रमुख उद्देश्यों में से एक मानी जाती जिनके लिये वे एक साथ बँधे हैं, कलीसिया के रूप में उनकी सामर्थ्य का उच्चतम अभ्यास; यदि विश्वव्यापी कलीसिया में राज्य का आना, स्वयं राजा का आना—पहले उसके पवित्र आत्मा के प्रबल उंडेले जाने में, फिर उसके अपने महिमामय व्यक्तित्व में—सचमुच परमेश्वर के आगे निरन्तर मिलकर पुकारने की बात होती;—ओह, कौन कह सकता है कि उन पर, और उनके द्वारा, कैसी आशीष आ सकती है जो यों परमेश्वर को उसकी प्रतिज्ञा की पूर्ति में परखने पर एक-मन हो जाते हैं।

प्रेरित पौलुस में हम बहुत स्पष्ट रूप से देखते हैं कि मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य पर उसका विश्वास कैसा यथार्थ था। रोमियों को वह लिखता है (15:30): ‘हे भाइयो, मैं आत्मा के प्रेम की दुहाई देकर तुम से विनती करता हूँ, कि परमेश्वर से मेरे लिये अपनी प्रार्थनाओं में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो।’ वह उत्तर में यह आशा रखता है कि वह अपने शत्रुओं से छुड़ाया जाए, और अपने काम में सफल हो। कुरिन्थियों को (2 कुरिन्थियों 1:11), ‘परमेश्वर हमें अब भी छुड़ाता रहेगा, जब कि तुम भी विनती के द्वारा हमारी सहायता करते रहोगे;’ उनकी प्रार्थना का उसके छुटकारे में सचमुच का भाग होना है। इफिसियों को वह लिखता है: ‘हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना और विनती करते हुए, सब पवित्र लोगों के लिये और मेरे लिये भी, कि मुझे बोलने के लिये वचन दिया जाए।’ अपनी सेवकाई में अपनी सामर्थ्य और सफलता को वह उनकी प्रार्थनाओं पर निर्भर ठहराता है। फिलिप्पियों के साथ (1:19) वह यह आशा रखता है कि उसके क्लेश उसके उद्धार और सुसमाचार की उन्नति में बदल जाएँगे, ‘तुम्हारी विनती के, और यीशु मसीह के आत्मा के दान के द्वारा।’ कुलुस्सियों को (4:3) वह प्रार्थना में दृढ़ बने रहने के आदेश में जोड़ता है: ‘इसके साथ ही हमारे लिये भी प्रार्थना करते रहो, कि परमेश्वर हमारे लिये वचन का द्वार खोल दे।’ और थिस्सलुनीकियों को (2 थिस्सलुनीकियों 3:1) वह लिखता है: ‘निदान, हे भाइयो, हमारे लिये प्रार्थना करो, कि प्रभु का वचन शीघ्र फैले और महिमा पाए, और हम अनुचित और दुष्ट मनुष्यों से छुड़ाए जाएँ।’ हर जगह यह स्पष्ट है कि पौलुस अपने आप को एक ऐसी देह का सदस्य अनुभव करता था, जिसकी सहानुभूति और सहयोग पर वह निर्भर था, और कि वह इन कलीसियाओं की प्रार्थनाओं पर भरोसा रखता था कि वे उसके लिये वह पा लें जो अन्यथा शायद न दिया जाता। कलीसिया की प्रार्थनाएँ उसके लिये राज्य के कार्य में उतना ही यथार्थ कारक थीं जितनी परमेश्वर की सामर्थ्य।

कौन कह सकता है कि कोई कलीसिया कैसी सामर्थ्य विकसित और प्रयोग कर सकती है, यदि वह अपने आप को राज्य के आने के लिये, अपने सेवकों और अपने वचन पर परमेश्वर की सामर्थ्य के लिये, प्राणों के उद्धार में परमेश्वर की महिमा के लिये, रात-दिन प्रार्थना के काम में लगा दे? अधिकांश कलीसियाएँ समझती हैं कि उनके सदस्य केवल इसलिये एक में इकट्ठे किए गए हैं कि एक दूसरे की देखभाल करें और एक दूसरे को उन्नत करें। वे नहीं जानतीं कि परमेश्वर संसार पर अपने पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के द्वारा शासन करता है; कि प्रार्थना ही वह सामर्थ्य है जिससे शैतान पर विजय पाई जाती है; कि प्रार्थना के द्वारा पृथ्वी पर की कलीसिया के पास स्वर्गीय जगत की शक्तियों पर अधिकार है। वे यह स्मरण नहीं रखतीं कि यीशु ने अपनी प्रतिज्ञा के द्वारा अपने नाम में की हर सभा को स्वर्ग का द्वार होने के लिये पवित्र किया है, जहाँ उसकी उपस्थिति अनुभव की जानी है, और उसकी सामर्थ्य उस पिता में अनुभव की जानी है जो उनकी अभिलाषाएँ पूरी करता है।

हम मिलकर की गई प्रार्थना के उस धन्य सप्ताह के लिये परमेश्वर का पर्याप्त धन्यवाद नहीं कर सकते, जिससे हमारे दिनों में मसीहीजगत हर वर्ष का आरम्भ करता है। हमारी एकता और मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य पर हमारे विश्वास के प्रमाण के रूप में, अपने हृदयों को विश्वव्यापी कलीसिया की सारी आवश्यकताओं को समेटने के लिये विस्तृत करने की एक प्रशिक्षण-पाठशाला के रूप में, मिलकर दृढ़ता से बनी रहनेवाली प्रार्थना की सहायता के रूप में, वह अवर्णनीय मूल्य का है। परन्तु विशेष रूप से छोटे मण्डलों में प्रार्थना में निरन्तर एकता के लिये एक उत्तेजना के रूप में उसकी आशीष बड़ी रही है। और यह और भी बड़ी होती जाएगी, ज्यों-ज्यों परमेश्वर के लोग यह पहचानेंगे कि यह क्या है—अर्थात् सब का यीशु के नाम में एक होकर मिलना, ताकि पवित्र आत्मा में एक हुई देह के बीच में उसकी उपस्थिति हो, और साहस के साथ उस प्रतिज्ञा का दावा करें कि जो कुछ वे माँगने में एक मन होते हैं वह पिता की ओर से हो जाएगा।

‘हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा’

धन्य प्रभु! तूने अपनी महायाजकीय प्रार्थना में अपने लोगों की एकता के लिये इतनी उत्कटता से विनती की, हमें सिखा कि तू अपनी उस अनमोल प्रतिज्ञा के द्वारा जो मिलकर की गई प्रार्थना को दी गई, हमें इस एकता के लिये किस प्रकार बुलाता और उकसाता है। यह तब है जब हम प्रेम और अभिलाषा में एक होते हैं कि हमारे विश्वास को तेरी उपस्थिति और पिता का उत्तर मिलता है।

हे पिता! हम तेरे लोगों के लिये, और उन सब के हर छोटे मण्डल के लिये जो एक साथ मिलते हैं, प्रार्थना करते हैं, कि वे एक हों। हम विनती करते हैं, वह सारा स्वार्थ और आत्महित, वह सारी हृदय की संकीर्णता और मनमुटाव दूर कर, जिनसे वह एकता रुकती है। संसार और शरीर की उस आत्मा को निकाल दे, जिसके द्वारा तेरी प्रतिज्ञा अपनी सारी सामर्थ्य खो देती है। ओह, तेरी उपस्थिति और पिता की कृपा का विचार हम सब को एक दूसरे के और निकट खींच ले।

विशेषकर यह वरदान दे, धन्य प्रभु, कि तेरी कलीसिया विश्वास करे कि यह मिलकर की गई प्रार्थना की सामर्थ्य के द्वारा ही है कि वह स्वर्ग में बाँध और खोल सकती है; कि शैतान निकाला जा सकता है; कि प्राण बचाए जा सकते हैं; कि पहाड़ हटाए जा सकते हैं; कि राज्य का आना शीघ्र किया जा सकता है। और यह वरदान दे, भले प्रभु! कि जिस मण्डल के साथ मैं प्रार्थना करता हूँ, उसमें कलीसिया की प्रार्थना सचमुच वह सामर्थ्य हो जिसके द्वारा तेरा नाम और वचन महिमा पाते हैं। आमीन।

पृष्ठ 1 / 1 · 10 मिनट अध्याय में शेष