अध्याय 13 · 12 मिनट का पठन
विश्वास की प्रार्थना का रहस्य
‘यीशु ने उन्हें उत्तर देकर कहा, परमेश्वर पर विश्वास रखो। मैं तुम से सच कहता हूँ, जो कोई अपने मन में सन्देह न करे, वरन् विश्वास करे कि जो वह कहता है वह हो जाता है, तो उसके लिये वही हो जाएगा। इसलिये मैं तुम से कहता हूँ, जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, विश्वास करो कि वह तुम्हें मिल गया है, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’—मरकुस 11:22-24
प्रार्थना के उत्तर की वह प्रतिज्ञा जो हमारे कल के पाठ का विषय थी, समस्त पवित्रशास्त्र में सबसे अद्भुत प्रतिज्ञाओं में से एक है। कितने ही हृदयों में इसने यह प्रश्न उठाया है: भला मैं वह विश्वास कैसे प्राप्त कर सकता हूँ जो जानता है कि जो कुछ वह माँगता है वह सब पाता है?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर हमारा प्रभु आज देना चाहता है। इससे पहले कि उसने अपने चेलों को वह अद्भुत प्रतिज्ञा दी, उसने एक और वचन कहा, जिसमें वह बताता है कि प्रार्थना के उत्तर में विश्वास कहाँ से उत्पन्न होता है, और सदा अपनी शक्ति कहाँ पाता है। परमेश्वर पर विश्वास रखो: यह वचन उस दूसरे वचन से पहले आता है, प्रार्थना के उत्तर की प्रतिज्ञा पर विश्वास रखो। किसी प्रतिज्ञा पर विश्वास करने की सामर्थ्य पूर्णतया, परन्तु केवल, प्रतिज्ञा करनेवाले पर विश्वास पर निर्भर करती है। व्यक्ति पर भरोसा उसके वचन पर भरोसा उत्पन्न करता है। यह केवल वहीं है, जहाँ हम परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत, प्रेममय संगति में जीते और मिलते-जुलते हैं, जहाँ स्वयं परमेश्वर ही हमारे लिये सब कुछ है, जहाँ हमारा सारा अस्तित्व निरन्तर उन प्रबल प्रभावों के लिये खुला और उजागर रहता है जो वहाँ कार्य करते हैं जहाँ उसकी पवित्र उपस्थिति प्रकट होती है, कि यह सामर्थ्य विकसित होगी कि हम विश्वास करें कि जो कुछ हम माँगते हैं वह देता है।
परमेश्वर पर विश्वास और उसकी प्रतिज्ञा पर विश्वास के बीच यह संबंध हम पर स्पष्ट हो जाएगा यदि हम सोचें कि विश्वास वास्तव में क्या है। इसकी तुलना अक्सर हाथ या मुँह से की जाती है, जिनके द्वारा हम उसे लेते और अपना बना लेते हैं जो हमें दिया जाता है। परन्तु यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि विश्वास वह कान भी है जिससे मैं सुनता हूँ कि क्या प्रतिज्ञा की गई है, वह आँख भी है जिससे मैं देखता हूँ कि मुझे क्या दिया गया है। लेने की सामर्थ्य इसी पर निर्भर करती है। मुझे उस व्यक्ति को सुनना होगा जो मुझे प्रतिज्ञा देता है: उसके स्वर का लहजा ही मुझे विश्वास करने का साहस देता है। मुझे उसे देखना होगा: उसकी आँख और मुखमण्डल के प्रकाश में लेने के मेरे अधिकार के विषय का सारा भय जाता रहता है। प्रतिज्ञा का मूल्य प्रतिज्ञा करनेवाले पर निर्भर करता है: प्रतिज्ञा पर विश्वास इस पर निर्भर करता है कि मैं प्रतिज्ञा करनेवाले को कैसा जानता हूँ।
इसी कारण से यीशु, इससे पहले कि वह वह अद्भुत प्रार्थना-प्रतिज्ञा दे, पहले कहता है, ‘परमेश्वर पर विश्वास रखो।’ अर्थात्, तेरी आँख जीवित परमेश्वर की ओर खुली रहे, और उसी को निहारती रहे, उसे देखती रहे जो अनदेखा है। यह आँख के द्वारा ही है कि मैं अपने आप को उस वस्तु के प्रभाव के अधीन कर देता हूँ जो मेरे सामने है; मैं उसे भीतर आने देता हूँ, कि वह अपना प्रभाव डाले, कि वह मेरे मन पर अपनी छाप छोड़े। इसी प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करना केवल परमेश्वर की ओर और वह जो है उसकी ओर ताकना है, उसे यह अवसर देना कि वह अपनी उपस्थिति प्रकट करे, उसे समय देना और अपने सारे अस्तित्व को यह सौंप देना कि वह इस बात की पूरी छाप ग्रहण करे कि वह परमेश्वर के रूप में कैसा है, प्राण खुल जाता है कि वह उसके प्रेम की छाया में आने को ग्रहण करे और उस पर आनन्दित हो। हाँ, विश्वास वह आँख है जिसे परमेश्वर दिखाता है कि वह क्या है और क्या करता है: विश्वास के द्वारा उसकी उपस्थिति का प्रकाश और उसकी प्रबल सामर्थ्य के कार्य प्राण में उमड़ आते हैं। जैसे वह जो मैं देखता हूँ मुझ में जीता है, वैसे ही विश्वास के द्वारा परमेश्वर भी मुझ में जीता है।
और इसी प्रकार विश्वास वह कान भी है जिसके द्वारा परमेश्वर की वाणी सदा सुनी जाती और उसके साथ संगति बनी रहती है। यह पवित्र आत्मा के द्वारा ही है कि पिता हम से बोलता है; पुत्र वचन है, उस बात का सार जो परमेश्वर कहता है; आत्मा जीवित वाणी है। परमेश्वर की सन्तान को अपनी अगुवाई और मार्गदर्शन के लिये इसकी आवश्यकता है; स्वर्ग से आनेवाली वह गुप्त वाणी उसे सिखाए, जैसे उसने यीशु को सिखाया, कि क्या कहना और क्या करना है। परमेश्वर की ओर खुला हुआ कान, अर्थात् एक विश्वास करनेवाला हृदय जो उसकी बाट जोहता है कि वह जो कहे उसे सुने, उसे बोलते हुए सुनेगा। परमेश्वर के वचन केवल किसी पुस्तक के शब्द ही नहीं होंगे, वरन् परमेश्वर के मुँह से निकलकर वे आत्मा और सत्य, जीवन और सामर्थ्य होंगे। वे उसे कर्म और जीवित अनुभव में ले आएँगे जो अन्यथा केवल विचार मात्र हैं। इस खुले हुए कान के द्वारा प्राण स्वयं परमेश्वर के जीवन और सामर्थ्य के प्रभाव में ठहरा रहता है। जैसे वे शब्द जो मैं सुनता हूँ मन में प्रवेश करके वहाँ बसते और कार्य करते हैं, वैसे ही विश्वास के द्वारा परमेश्वर हृदय में प्रवेश करता है, और वहाँ बसता और कार्य करता है।
अब जब विश्वास आँख और कान के रूप में, प्राण की उस शक्ति के रूप में जिससे हम परमेश्वर को देखते और सुनते हैं, पूरी तरह कार्यरत होता है, तब वह हाथ और मुँह के रूप में अपनी पूरी सामर्थ्य प्रयोग करने योग्य होगा, जिनसे हम परमेश्वर और उसकी आशीष को अपना बना लेते हैं। ग्रहण करने की सामर्थ्य पूर्णतया आत्मिक बोध की सामर्थ्य पर निर्भर करेगी। इसी कारण यीशु ने, इससे पहले कि वह यह प्रतिज्ञा देता कि परमेश्वर विश्वास की प्रार्थना का उत्तर देगा, यह कहा: ‘परमेश्वर पर विश्वास रखो।’ विश्वास केवल समर्पण है: मैं अपने आप को उस छाप के अधीन कर देता हूँ जो मेरे सुने हुए समाचार मुझ पर डालते हैं। विश्वास के द्वारा मैं अपने आप को जीवित परमेश्वर को सौंप देता हूँ। उसकी महिमा और प्रेम मेरे हृदय को भर देते हैं, और मेरे जीवन पर प्रभुता करते हैं। विश्वास संगति है; मैं अपने आप को उस मित्र के प्रभाव में सौंप देता हूँ जो मुझ से प्रतिज्ञा करता है, और उसी के द्वारा उससे जुड़ जाता हूँ। और यह तब है जब हम इस जीवित संगति में स्वयं परमेश्वर के साथ, ऐसे विश्वास में प्रवेश करते हैं जो उसे सदा देखता और सुनता है, कि प्रार्थना के विषय में उसकी प्रतिज्ञा पर विश्वास करना सहज और स्वाभाविक हो जाता है। प्रतिज्ञा पर विश्वास प्रतिज्ञा करनेवाले पर विश्वास का फल है: विश्वास की प्रार्थना विश्वास के जीवन में जड़ पकड़े होती है। और इस रीति से वह विश्वास जो प्रभावी रीति से प्रार्थना करता है, सचमुच परमेश्वर का दान है। किसी ऐसी वस्तु के रूप में नहीं जिसे वह एक ही बार में प्रदान या संचारित कर दे, वरन् कहीं गहरे और सच्चे अर्थ में, प्राण की उस धन्य प्रवृत्ति या स्वभाव के रूप में जो उसके साथ संगति के जीवन में हम में उत्पन्न होकर बढ़ता है। निश्चय ही, जो अपने पिता को भली-भाँति जानता है, और उसके साथ निरन्तर घनिष्ठ संगति में जीता है, उसके लिये यह प्रतिज्ञा मानना सरल बात है कि वह अपने उस बालक की इच्छा पूरी करेगा जो उसी के साथ एकता में जीता है।
इसी कारण से कि परमेश्वर की बहुत-सी सन्तान विश्वास के जीवन और विश्वास की प्रार्थना के बीच इस संबंध को नहीं समझती, प्रार्थना की सामर्थ्य का उनका अनुभव इतना सीमित रहता है। जब वे परमेश्वर से उत्तर पाने की उत्कट अभिलाषा करते हैं, तो वे अपना सारा हृदय प्रतिज्ञा पर लगा देते हैं, और अपने पूरे बल से उस प्रतिज्ञा को विश्वास से थामने का प्रयत्न करते हैं। जब उन्हें सफलता नहीं मिलती, तो वे आशा छोड़ने को तैयार हो जाते हैं; प्रतिज्ञा सच्ची है, परन्तु उसे विश्वास से थाम लेना उनके बस के बाहर है। आज यीशु जो पाठ हमें सिखाता है उसे सुनो: परमेश्वर पर, जीवित परमेश्वर पर विश्वास रखो: विश्वास प्रतिज्ञा की हुई वस्तु से अधिक परमेश्वर की ओर ताके: उसका प्रेम, उसकी सामर्थ्य, उसकी जीवित उपस्थिति ही विश्वास को जगाएगी और उत्पन्न करेगी। कोई वैद्य उस व्यक्ति से जो अपनी बाँहों और हाथों में पकड़ने और थामने के लिये अधिक बल पाने का कोई उपाय माँगता है, यह कहेगा कि उसका सारा शरीर बनाया और सुदृढ़ किया जाना चाहिए। इसी प्रकार दुर्बल विश्वास का उपचार केवल इसी में मिलता है कि परमेश्वर के साथ संगति के द्वारा हमारा सारा आत्मिक जीवन बलवन्त किया जाए। परमेश्वर पर विश्वास करना सीख, परमेश्वर को थामना सीख, परमेश्वर को अपने जीवन पर अधिकार करने दे, और तब प्रतिज्ञा को थामना सहज हो जाएगा। जो परमेश्वर को जानता और उस पर भरोसा रखता है, उसे प्रतिज्ञा पर भी भरोसा करना सरल लगता है।
केवल ध्यान दो कि यह प्राचीन काल के भक्तों में कितने स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। विश्वास की सामर्थ्य का हर विशेष प्रदर्शन परमेश्वर के किसी विशेष प्रकाशन का फल था। इसे अब्राहम में देखो: ‘और यहोवा का वचन अब्राम के पास आया, और उसने कहा, हे अब्राम, मत डर; मैं तेरी ढाल हूँ। और वह उसे बाहर ले गया, और कहा . . . और उसने यहोवा पर विश्वास किया।’ और फिर आगे: ‘यहोवा ने उसे दर्शन दिया, और उससे कहा, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। और अब्राम मुँह के बल गिरा, और परमेश्वर ने उससे बातें कीं, और कहा, मुझे देख, मेरी वाचा तेरे साथ है।’ यह स्वयं परमेश्वर का प्रकाशन ही था जिसने प्रतिज्ञा को वह जीवित सामर्थ्य दी कि वह हृदय में प्रवेश करे और विश्वास उत्पन्न करे। क्योंकि वे परमेश्वर को जानते थे, इसलिये विश्वास के ये पुरुष उसकी प्रतिज्ञा पर भरोसा करने के सिवा और कुछ कर ही नहीं सकते थे। परमेश्वर की प्रतिज्ञा हमारे लिये वही होगी जो स्वयं परमेश्वर है। वही मनुष्य प्रतिज्ञा को वास्तव में ग्रहण करेगा जो यहोवा के सम्मुख चलता है, और मुँह के बल गिरकर सुनता है जबकि जीवित परमेश्वर उससे बोलता है। यद्यपि बाइबल में हमारे पास परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हैं, और उन्हें ग्रहण करने की पूरी स्वतंत्रता है, तौभी आत्मिक सामर्थ्य की घटी बनी रहती है, सिवाय इसके कि स्वयं परमेश्वर उन्हें हम से कहे। और वह उन्हीं से बोलता है जो उसके साथ चलते और जीते हैं। इसलिये, परमेश्वर पर विश्वास रखो: विश्वास पूरी तरह आँख और कान बन जाए, वह समर्पण जिससे परमेश्वर अपनी पूरी छाप डाले, और प्राण में अपने आप को पूरी तरह प्रकट करे। परमेश्वर पर विश्वास प्रयोग करना प्रार्थना की सबसे बड़ी आशीषों में से एक समझो, उस जीवित सामर्थी परमेश्वर पर जो हम में अपनी इच्छा की सारी भलाई, और विश्वास के कार्य को सामर्थ्य के साथ पूरा करने की बाट जोहता है। उसमें प्रेम के परमेश्वर को देखो, जिसका आनन्द आशीष देने और अपने आप को दे देने में है। परमेश्वर पर विश्वास की ऐसी आराधना में यह सामर्थ्य शीघ्र ही आ जाएगी कि हम प्रतिज्ञा पर भी विश्वास करें: ‘जो कुछ तुम माँगो, विश्वास करो कि तुम्हें मिल गया है।’ हाँ, ध्यान रख कि तू विश्वास से परमेश्वर को अपना बना ले; तब प्रतिज्ञा भी तेरी हो जाएगी।
आज के लिये यीशु के पास हमें सिखाने को अनमोल पाठ हैं। हम परमेश्वर के दान ढूँढ़ते हैं: परमेश्वर पहले हमें स्वयं अपने आप को देना चाहता है। हम प्रार्थना को स्वर्ग से अच्छे दान नीचे खींच लाने की सामर्थ्य समझते हैं; यीशु उसे अपने आप को परमेश्वर तक ऊपर खींच ले जाने का साधन समझता है। हम द्वार पर खड़े होकर पुकारना चाहते हैं; यीशु चाहता है कि हम पहले भीतर प्रवेश करें और यह समझें कि हम मित्र और सन्तान हैं। आओ, इस शिक्षा को ग्रहण करें। प्रार्थना में हमारे विश्वास की छोटाई का हर अनुभव हमें प्रेरित करे कि हम पहले जीवित परमेश्वर पर अधिक विश्वास रखें और प्रयोग करें, और ऐसे विश्वास में अपने आप को उसे सौंप दें। परमेश्वर से भरा हुआ हृदय विश्वास की प्रार्थना के लिये सामर्थ्य रखता है। परमेश्वर पर विश्वास प्रतिज्ञा पर विश्वास उत्पन्न करता है, प्रार्थना के उत्तर की प्रतिज्ञा पर भी।
इसलिये, हे परमेश्वर की सन्तान, समय ले, समय ले, कि उसके सामने दण्डवत् करे, उसकी बाट जोहे कि वह अपने आप को प्रकट करे। समय ले, और अपने प्राण को पवित्र भय और आराधना में उस अनन्त परमेश्वर पर अपना विश्वास प्रयोग और प्रकट करने दे, और जैसे-जैसे वह अपने आप को देता और तुझ पर अधिकार करता है, विश्वास की प्रार्थना परमेश्वर में तेरे विश्वास का मुकुट बन जाएगी।
‘हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।’
हे मेरे परमेश्वर! मैं तुझ पर विश्वास करता हूँ। मैं तुझ पर पिता के रूप में विश्वास करता हूँ, जो अपने प्रेम और सामर्थ्य में अनन्त है। और पुत्र के रूप में, मेरा छुड़ानेवाला और मेरा जीवन। और पवित्र आत्मा के रूप में, शान्तिदाता और अगुवा और सामर्थ्य। हे त्रिएक परमेश्वर, मैं तुझ पर विश्वास रखता हूँ। मैं जानता और निश्चय रखता हूँ कि जो कुछ तू है वह सब तू मेरे लिये है, कि जो कुछ तूने प्रतिज्ञा की है वह सब तू पूरा करेगा।
हे प्रभु यीशु! इस विश्वास को बढ़ा। मुझे सिखा कि मैं समय लूँ, और उस पवित्र उपस्थिति में बाट जोहूँ और आराधना करूँ जब तक मेरा विश्वास वह सब ग्रहण न कर ले जो मेरे परमेश्वर में मेरे लिये है। वह उसे समस्त जीवन के स्रोत के रूप में देखे, जो संसार में और मुझ में अपनी इच्छा पूरी करने के लिये सर्वशक्तिमान बल से कार्य कर रहा है। वह उसे उसके प्रेम में देखे जो मुझ से मिलने और मेरी अभिलाषाएँ पूरी करने को तरसता है। वह मेरे हृदय और जीवन पर इस प्रकार अधिकार कर ले कि विश्वास के द्वारा केवल परमेश्वर ही वहाँ वास करे। हे प्रभु यीशु, मेरी सहायता कर! अपने सारे हृदय से मैं परमेश्वर पर विश्वास करना चाहता हूँ। परमेश्वर पर विश्वास हर क्षण मुझे भर दे।
हे मेरे धन्य उद्धारकर्ता! तेरी कलीसिया तुझे किस प्रकार महिमा दे सकती है, वह मध्यस्थता का वह कार्य किस प्रकार पूरा कर सकती है जिसके द्वारा तेरे राज्य को आना है, जब तक हमारा सारा जीवन परमेश्वर पर विश्वास न हो जाए। धन्य प्रभु! अपना वचन, ‘परमेश्वर पर विश्वास रखो,’ हमारे प्राणों की गहराइयों तक कह दे।
अध्याय 13 पूरा हुआ
विश्वास की प्रार्थना का रहस्य