जड़ें जमाए — युवाओं के लिये परमेश्वर के साथ 30 दिन — पुस्तक 2
दिन 19 — उलटी-पुलटी खुशी

अध्याय 20 · 3 मिनट का पठन

दिन 19 — उलटी-पुलटी खुशी

“धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य हैं वे जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे। धन्य हैं वे जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे। धन्य हैं वे जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे। धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी। धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे। धन्य हैं वे जो मेल कराते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे।”

— मत्ती 5:3–9 (BSB)

एक दिन यीशु एक पहाड़ पर चढ़ गए, बैठ गए और उपदेश देने लगे। यह उपदेश पहाड़ी उपदेश कहलाता है, और शायद यह अब तक दिया गया सबसे प्रसिद्ध उपदेश है। उन्होंने ऐसे लोगों की एक सूची से आरम्भ किया जिन्हें उन्होंने “धन्य” कहा। धन्य का अर्थ है भीतर से सचमुच खुश, क्योंकि परमेश्वर तुम्हारे साथ और तुम्हारे पक्ष में है।

परन्तु यीशु की सूची चौंका देनेवाली है। यदि तुम अधिकांश लोगों से पूछो कि कौन खुश है, तो वे कहेंगे: धनी, लोकप्रिय, बलवान, जीतनेवाले। यीशु ने यह सब उलटा-पुलटा कर दिया।

आओ, कुछ पर नज़र डालें:

“धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं।” इसका अर्थ है वे लोग जो जानते हैं कि उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत है। वे यह दिखावा नहीं करते कि उनके पास सब कुछ है। वे जानते हैं कि वे स्वयं को नहीं बचा सकते।

“धन्य हैं वे जो शोक करते हैं।” वे लोग जो दुखी हैं, विशेषकर पाप के कारण और संसार के टूटेपन के कारण। परमेश्वर उन्हें शान्ति देने की प्रतिज्ञा करता है।

“धन्य हैं वे जो नम्र हैं।” नम्र का अर्थ कमज़ोर नहीं है। इसका अर्थ है वश में की हुई शक्ति: सौम्य, दीन और दबंग नहीं।

“धन्य हैं वे जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं।” वे लोग जो उतनी ही तीव्रता से भला करना चाहते हैं जितनी तीव्रता से एक भूखा व्यक्ति भोजन चाहता है।

“धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं।” वे लोग जो क्षमा करते और कृपा दिखाते हैं, तब भी जब कोई इसके योग्य न हो।

“धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं।” वे लोग जिनके मन साफ़ हैं और जो बिना किसी दिखावे के परमेश्वर से प्रेम करते हैं।

“धन्य हैं वे जो मेल कराते हैं।” वे लोग जो औरों को मिल-जुलकर रहने में मदद करते हैं और झगड़े शुरू करने के बजाय उन्हें समाप्त करने का प्रयत्न करते हैं।

संसार कहता है, “सबसे आगे बढ़ो। अपना ही ध्यान रखो। हर हाल में जीतो।” यीशु कहते हैं कि सचमुच खुश जीवन बहुत अलग दिखता है। वह उन्हीं के समान दिखता है। इनमें से हर एक बात यीशु का पूरी तरह वर्णन करती है।

तुम बहुत कोशिश करके स्वयं को ऐसा नहीं बना सकते। परन्तु जब तुम यीशु के पीछे चलते हो, तब उनका आत्मा तुम में इन बातों को उगाने लगता है।

इस पर सोचो: इन “धन्य” कहे गए वर्णनों में से कौन-सा तुम्हारे लिये सबसे कठिन है? कौन-सा तुम सबसे अधिक चाहोगे कि परमेश्वर तुम में उगाए?

यह करके देखो: आज मेल करानेवाले बनो। यदि तुम्हें घर या स्कूल में कोई झगड़ा शुरू होता दिखे, तो पक्ष लेने के बजाय उसे शान्त करने में मदद करने की कोशिश करो।

हे यीशु, तेरे मार्ग संसार के मार्गों से कितने अलग हैं। मेरी सहायता कर कि मैं मन का दीन, नम्र, दयावन्त, मन का शुद्ध और मेल करानेवाला बनूँ। मुझे भला करने का भूखा बना। मुझ में अपनी तरह की खुशी उगा। तेरे नाम से, आमीन।

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