प्रबल प्रार्थना
धन्यवाद

अध्याय 5 · 10 मिनट का पठन

धन्यवाद

प्रार्थना के तत्वों में से अगली बात जिसका मैं उल्लेख करना चाहता हूँ, वह है धन्यवाद। परमेश्वर से जो कुछ हमें मिलता है, उसके लिये हमें और अधिक धन्यवादी होना चाहिए। शायद तुम माताओं में से किसी के परिवार में ऐसा बच्चा हो जो लगातार शिकायत करता रहता है—कभी धन्यवादी नहीं होता। तुम जानती हो कि ऐसे बच्चे के लिये कुछ भी करने में कोई विशेष आनन्द नहीं होता। यदि तुम्हें कोई ऐसा भिखारी मिले जो सदा बड़बड़ाता रहता है, और जो कुछ तुम उसे देते हो उसके लिये कभी धन्यवादी दिखाई नहीं देता, तो बहुत जल्द तुम उसके मुँह पर ही द्वार सदा के लिये बन्द कर देते हो। कृतघ्नता शायद सबसे कठिन बात है जिसका हमें सामना करना पड़ता है। इंग्लैंड का महान कवि कहता है:

“बह, बह, हे जाड़े की हवा— तू इतनी निष्ठुर नहीं जितनी मनुष्य की कृतघ्नता; तेरे दाँत इतने तीखे नहीं, क्योंकि तू दिखाई नहीं देती, चाहे तेरी साँस कठोर ही क्यों न हो।”

इस बुराई के विषय में हम चाहे कितना भी स्पष्ट बोलें, वह अधिक न होगा, क्योंकि यह उन लोगों को जो इसके दोषी हैं, बहुत नीचे गिरा देती है। मसीहियों में भी यह बहुत अधिक दिखाई देती है। देखो, हम दिन-प्रतिदिन परमेश्वर से आशीषें पा रहे हैं; फिर भी परमेश्वर की कलीसिया में स्तुति और धन्यवाद कितना कम है!

गर्नल अपनी पुस्तक मसीही हथियार में इन शब्दों का उल्लेख करते हुए, “हर बात में धन्यवाद करो,” कहता है: “‘धर्मी लोगों को स्तुति करना शोभा देता है।’ ‘कृतघ्न पवित्र जन’ अपने आप में एक विरोधाभास है। बुराई और कृतघ्नता जुड़वाँ हैं, जो साथ जीते और साथ मरते हैं; जैसे-जैसे कोई बुरा होना छोड़ता है, वैसे-वैसे वह धन्यवादी होने लगता है। परमेश्वर तुम्हारे हाथों से यही चाहता है; उसने तुम्हें इसी उद्देश्य से बनाया है। जब स्वर्ग में तुम्हारे अस्तित्व का—हाँ, मसीह में धन्य अस्तित्व का!—निर्णय हुआ, तो वह इसी कारण हुआ कि तुम पृथ्वी पर समय में, और स्वर्ग में अनन्तकाल तक, उसके नाम और कीर्ति का कारण बनो। यदि परमेश्वर इससे वंचित रह जाए, तो उसकी योजना का एक मुख्य भाग अधूरा रह जाएगा। वह तुम पर हर एक दया किस लिये करता है, सिवाय इसके कि तुम्हें उसकी स्तुति का गीत रचने की सामग्री मिले? ‘ये मेरी प्रजा के लोग हैं, ऐसे लड़के हैं जो धोखा न देंगे; और वह उनका उद्धारकर्ता हो गया।’

“वह तुम्हारे हाथों से खरे व्यवहार की आशा रखता है। पिता अपनी प्रतिष्ठा किसे सौंपे, यदि अपने बच्चे को नहीं? राजा आदर की आशा कहाँ करे, यदि अपने कृपापात्रों के बीच नहीं? तुम्हारी दशा ऐसी है कि तुम्हारे पास जो छोटी से छोटी दया है, वह भी बाकी सारे संसार से बढ़कर है। हे मसीही, तू और तेरे थोड़े से भाई आकाश और पृथ्वी को आपस में बाँटे हुए हो! परमेश्वर के पास ऐसा क्या है जिसे वह तुम से रोक रखता है? सूर्य, चन्द्रमा और तारे तुम्हें प्रकाश देने के लिये ठहराए गए हैं; समुद्र और भूमि के भण्डार तुम्हारे उपयोग के लिये हैं; दूसरे तो उन पर अनधिकार कब्ज़ा करनेवाले हैं; उनके सच्चे वारिस तुम हो; वे कराहते हैं कि कोई दूसरा उनसे सेवा ले। स्वर्गदूत, बुरे और भले दोनों, तुम्हारी सेवा करते हैं; बुरे दूत, अपनी इच्छा के विरुद्ध, जब तुम्हारी परीक्षा करते हैं, तब रसोई के नौकरों के समान तुम्हारे अनुग्रहों को माँजने और चमकाने, और तुम्हारी अधिक शान्ति का मार्ग तैयार करने के लिये विवश किए जाते हैं; भले स्वर्गदूत तुम्हारे स्वर्गीय पिता के सेवक हैं, और तुम्हें अपनी बाँहों में उठा ले चलने को तुच्छ नहीं समझते। तुम्हारा परमेश्वर स्वयं को तुम से नहीं रोकता; वही तुम्हारा भाग है—पिता, पति, मित्र। परमेश्वर स्वयं अपना आनन्द है, और तुम्हें भी अपने में आनन्द लेने देता है। ओह, यह कैसा आदर है कि प्रजा अपने राजा के कटोरे में से पीए! ‘तू अपनी सुख की नदी में से उन्हें पिलाएगा।’ और यह सब तुम्हारे पसीने और लहू से खरीदा हुआ नहीं है; इस भोज का दाम किसी दूसरे ने चुकाया है, वह केवल इतना चाहता है कि तुम भोज के ठहरानेवाले का धन्यवाद करो। सुसमाचार के अधीन कोई पापबलि नहीं ठहराई गई; वह केवल धन्यवाद-बलियों की ही आशा रखता है।”

चार्नक, आत्मिक आराधना पर विचार करते हुए, कहता है: “छुटकारा देनेवाले अनुग्रह के प्रबन्ध के अधीन परमेश्वर की स्तुति सबसे उत्तम बलिदान और आराधना है। सुसमाचार के अधीन यही आराधना का प्रधान और अनन्त भाग है। भजनकार, सुसमाचार के समयों के विषय में बोलते हुए, इसी प्रकार की आराधना के लिये उकसाता है: ‘यहोवा के लिये नया गीत गाओ; सिय्योन के निवासी अपने राजा के कारण मगन हों; भक्त लोग महिमा के कारण प्रफुल्लित हों; और अपने बिछौनों पर भी पड़े-पड़े जयजयकार करें; उनके कण्ठ से परमेश्वर की प्रशंसा हो।’ वह दोनों भजनों का आरम्भ और अन्त यहोवा की स्तुति करो! से करता है। वह आराधना आत्मिक और सुसमाचारीय नहीं हो सकती जिसमें हृदय से परमेश्वर की स्तुति का कुछ भी अंश न हो। सुसमाचार में प्रगट हुई परमेश्वर की आराध्य सिद्धताओं पर मनन करने से हम अधिक गम्भीरता के साथ उसके पास आएँगे, अधिक भरोसे के साथ उससे आशीषें माँगेंगे, पंखोंवाले विश्वास और प्रेम के साथ उसकी ओर उड़ेंगे, और उसकी सेवा में उपस्थित होते समय और अधिक आत्मिक रीति से उसकी महिमा करेंगे।”

बाइबल में प्रार्थना से भी अधिक स्तुति के विषय में कहा गया है; फिर भी स्तुति-सभाएँ कितनी कम होती हैं! दाऊद अपने भजनों में सदा प्रार्थना के साथ स्तुति को मिलाता है। मन्दिर के समर्पण के समय सुलैमान ने प्रार्थना में परमेश्वर के सामने बड़ी प्रबलता पाई; परन्तु वह स्तुति का शब्द था जिसने उस तेज को नीचे उतारा जिससे भवन भर गया; क्योंकि हम पढ़ते हैं: “जब याजक पवित्रस्थान से निकले (जितने याजक उपस्थित थे, उन सभी ने अपने-अपने को पवित्र किया था, और अलग-अलग दलों में होकर सेवा न करते थे; और जितने लेवीय गायक थे, वे सब के सब अर्थात् पुत्रों और भाइयों समेत आसाप, हेमान और यदूतून सन के वस्त्र पहने झाँझ, सारंगियाँ और वीणाएँ लिये हुए, वेदी के पूर्व की ओर खड़े थे, और उनके साथ एक सौ बीस याजक तुरहियां बजा रहे थे।) और जब तुरहियां बजानेवाले और गानेवाले एक स्वर से यहोवा की स्तुति और धन्यवाद करने लगे, और तुरहियां, झाँझ आदि बाजे बजाते हुए यहोवा की यह स्तुति ऊँचे शब्द से करने लगे, ‘वह भला है और उसकी करुणा सदा की है,’ तब यहोवा के भवन में बादल छा गया, और बादल के कारण याजक लोग सेवा-टहल करने को खड़े न रह सके, क्योंकि यहोवा का तेज परमेश्वर के भवन में भर गया था।”

हम यहोशापात के विषय में भी पढ़ते हैं कि उसने स्तुति के द्वारा अम्मोन और मोआब की सेनाओं पर विजय पाई, और वह स्तुति विश्वास से और परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से उत्पन्न हुई थी।

“वे सवेरे उठकर तकोआ के जंगल की ओर निकल गए; और चलते समय यहोशापात ने खड़े होकर कहा, ‘हे यहूदियों, हे यरूशलेम के निवासियों, मेरी सुनो, अपने परमेश्वर यहोवा पर विश्वास रखो, तब तुम स्थिर रहोगे; उसके नबियों पर विश्वास करो, तब तुम कृतार्थ हो जाओगे।’ तब उसने प्रजा के साथ सम्मति करके कितनों को ठहराया, जो कि पवित्रता से शोभायमान होकर हथियार-बन्दों के आगे-आगे चलते हुए यहोवा के गीत गाएँ, और यह कहते हुए उसकी स्तुति करें, ‘यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि उसकी करुणा सदा की है।’ जिस समय वे गाकर स्तुति करने लगे, उसी समय यहोवा ने अम्मोनियों, मोआबियों और सेईर के पहाड़ी देश के लोगों पर जो यहूदा के विरुद्ध आ रहे थे, घातकों को बैठा दिया और वे मारे गए।”

कहा जाता है कि न्यू इंग्लैंड के पहले बसनेवालों में एक बार जब बड़ी निराशा छाई हुई थी, तब उनकी एक सार्वजनिक सभा में उपवास का दिन घोषित करने का प्रस्ताव रखा गया। एक बूढ़ा किसान खड़ा हुआ; उसने कहा कि वे अपनी शिकायतों से स्वर्ग को क्रोध दिला रहे हैं, उनके उपायों की समीक्षा की, दिखाया कि उनके पास धन्यवाद करने के लिये बहुत कुछ है, और प्रस्ताव रखा कि उपवास का दिन ठहराने के बदले वे धन्यवाद का दिन ठहराएँ। ऐसा ही किया गया; और वह रीति तब से आज तक चली आ रही है।

हमारी कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी हों, या हमारे दुःख चाहे कितने भी गहरे हों, धन्यवाद के लिये सदा स्थान रहता है। थॉमस एडम्स ने कहा है: “अपनी स्मृति के सन्दूक में केवल मन्ना का मर्तबान, अर्थात् जीवन की रोटी, ही नहीं, वरन् हारून की छड़ी को भी, अर्थात् ताड़ना के उस कोड़े को भी रख छोड़, जिसके द्वारा तेरा सुधार हुआ है। अय्यूब कहता है कि यहोवा धन्य है, केवल देने के कारण नहीं, वरन् ले लेने के कारण भी। परमेश्वर, जो देखता है कि गुलाबों पर चलकर कोई स्वर्ग नहीं पहुँचता, अपनी सन्तानों को अनुशासन के मार्ग पर डालता है; और ताड़ना की आग से भ्रष्टता के जंग को खा डालता है। परमेश्वर संकट भेजता है, फिर हमें अपने को पुकारने के लिये कहता है; हमारे छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है; और अन्त में हम से केवल इतना चाहता है कि हम उसकी महिमा करें। संकट के दिन मुझे पुकार; मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करने पाएगा।” बुलबुल के समान हम भी रात में गा सकते हैं, और जॉन न्यूटन के साथ कह सकते हैं—

“जो कुछ मुझ पर बीतेगा, सब मेरी भलाई के लिये होगा, कड़वा भी मीठा है, दवा भी भोजन है; अभी चाहे पीड़ा हो, वह शीघ्र ही थम जाएगी, और तब—ओह, कितना सुहाना!—विजेता का गीत।”

सब प्रेरितों में पौलुस के समान किसी ने इतना दुःख नहीं उठाया; परन्तु उनमें से किसी को भी हम उसके समान इतनी बार धन्यवाद करते हुए नहीं पाते। फिलिप्पियों के नाम उसकी पत्री को लो। स्मरण करो कि फिलिप्पी में उसने क्या-क्या सहा; कैसे उन्होंने उसे बहुत बेंत लगवाकर बन्दीगृह में डाल दिया। फिर भी उस पत्री का हर एक अध्याय आनन्द मनाने और धन्यवाद करने की बात कहता है। वह प्रसिद्ध वचन है: “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” जैसा किसी ने कहा है, इसमें तीन बहुमूल्य विचार हैं: “किसी बात की चिन्ता नहीं; हर बात के लिये प्रार्थना; और किसी भी बात के लिये धन्यवाद।” परमेश्वर ने हमारे लिये जो किया है, उसके लिये धन्यवादी होने से हमें सदा अधिक मिलता है। पौलुस फिर कहता है: “हम तुम्हारे लिये नित प्रार्थना करके अपने प्रभु यीशु मसीह के पिता अर्थात् परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं।” इस प्रकार वह निरन्तर धन्यवाद करता रहता था। उसकी पत्रियों में से कोई भी उठा लो, और तुम उन्हें परमेश्वर की स्तुति से भरी हुई पाओगे।

यदि धन्यवाद करने का और कोई कारण न भी होता, तो भी यह बात सदा उसके लिये पर्याप्त कारण होती कि यीशु मसीह ने हम से प्रेम किया, और हमारे लिये अपने आपको दे दिया। एक बार नैशविल के पास एक किसान एक सैनिक की कब्र पर घुटने टेके हुए पाया गया। किसी ने उसके पास आकर कहा: “तुम इस कब्र पर इतना ध्यान क्यों देते हो? क्या तुम्हारा बेटा यहाँ गाड़ा गया है?” “नहीं,” उसने कहा। “युद्ध के समय मेरे परिवार के सब लोग बीमार थे, मैं नहीं जानता था कि उन्हें छोड़कर कैसे जाऊँ। सेना में भर्ती के लिये मेरा नाम निकल आया। मेरे पड़ोसियों में से एक मेरे पास आया और बोला: ‘तुम्हारे बदले मैं जाऊँगा; मेरा कोई परिवार नहीं है।’ वह चला गया। चिकामौगा में वह घायल हुआ। उसे अस्पताल ले जाया गया, और वहीं वह मर गया। और महोदय, मैं बहुत मील चलकर आया हूँ, कि उसकी कब्र पर ये शब्द लिख सकूँ, ‘वह मेरे लिये मरा।’”

यही बात विश्वासी अपने धन्य उद्धारकर्ता के विषय में सदा कह सकता है, और इस सच्चाई में वह भली-भाँति आनन्द मना सकता है। “इसलिए हम उसके द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें।”

परमेश्वर की स्तुति

“बोलो, हे मेरे होंठो!
और चारों ओर सुनाओ
मेरे परमेश्वर की स्तुति।
बोल, हे हकलाती जीभ!
सबसे आनन्दित स्वर में,
उसकी महान स्तुति प्रगट कर।

“बोलो, हे समुद्र और पृथ्वी!
हे स्वर्ग के सबसे दूर के तारे,
अपने दूर के राज्यों से बोलो!
यह स्वर उठा लो,
और इसे पहुँचा दो
सृष्टि की सबसे दूर की सीमा तक।

“बोलो, हे स्वर्गों के स्वर्ग!
जिसमें हमारे परमेश्वर ने
अपना उज्ज्वल निवास बनाया है।
बोलो, हे स्वर्गदूतो, बोलो!
गीतों में प्रचार करो
उसका अनन्त नाम।

“बोल, हे धूल की सन्तान!
उसने तेरा शरीर धारण किया
और तेरे लिये स्वर्ग छोड़ दिया।
बोल, हे मृत्यु की सन्तान!
उसने तेरी मृत्यु सही,
तू उस क्रूस पर चढ़ाए हुए को धन्य कह।”

— डॉ. बोनार।

अध्याय 5 पूरा हुआ

धन्यवाद

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