अध्याय 10 · 14 मिनट का पठन
अधीनता
प्रार्थना का एक और आवश्यक तत्व अधीनता है। सच्ची प्रार्थना परमेश्वर के प्रति पूरी अधीनता में ही चढ़ाई जानी चाहिए। जब हम अपनी विनतियाँ उसके सामने रख चुकें, तब हमारी भाषा यह होनी चाहिए, “तेरी इच्छा पूरी हो।” मैं हज़ार बार यही चाहूँगा कि मेरी नहीं, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो। जैसे परमेश्वर भविष्य को देखता है, वैसे मैं नहीं देख सकता; इसलिए अपने लिये स्वयं चुनने से कहीं अच्छा है कि मैं उसे ही अपने लिये चुनने दूँ। आत्मिक बातों के विषय में मैं उसका मन जानता हूँ। उसकी इच्छा यह है कि मैं पवित्र किया जाऊँ; इसलिए मैं भरोसे के साथ उसके लिये परमेश्वर से प्रार्थना कर सकता हूँ, और अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर की आशा रख सकता हूँ। परन्तु जब सांसारिक बातों की बात आती है, तो बात अलग है; हो सकता है कि जो मैं माँगता हूँ, वह मेरे विषय में परमेश्वर का उद्देश्य न हो।
जैसा किसी ने बहुत अच्छी तरह कहा है: “इस बात का निश्चय रखो, प्रार्थना का अर्थ यह नहीं कि मैं परमेश्वर को नीचे खींचकर अपने विचारों और अपने उद्देश्यों तक ले आऊँ, और उसके शासन को अपनी मूर्खतापूर्ण, ओछी और कभी-कभी पापपूर्ण धारणाओं के अनुसार मोड़ दूँ। प्रार्थना का अर्थ यह है कि मैं ऊपर उठाया जाऊँ, ताकि मेरी भावना, मेरा मेल और मेरा उद्देश्य उसके साथ एक हो जाए; कि मैं उसकी युक्ति में प्रवेश करूँ, और उसके उद्देश्य को पूरी रीति से पूरा करूँ। मुझे कभी-कभी डर लगता है कि हम प्रार्थना को बिलकुल उलटे स्वभाव की वस्तु समझते हैं, मानो उसके द्वारा हम स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता को मनाकर या प्रभावित करके उससे वह सब करवा लेते हैं जो हमारे मन में आए, और जो हमारे मूर्खतापूर्ण, अदूरदर्शी उद्देश्यों को पूरा करे। मुझे इस बात का पूरा निश्चय है कि मेरे लिये और संसार के लिये क्या सबसे अच्छा है, यह परमेश्वर मुझसे कहीं अच्छी तरह जानता है, जितना मैं कभी जान सकता हूँ; और यदि मेरे बस में यह कहना होता भी, ‘मेरी इच्छा पूरी हो,’ तो भी मैं उससे यही कहना चाहूँगा, ‘तेरी इच्छा पूरी हो।’”
एक स्त्री के विषय में कहा जाता है कि जब वह बीमार थी, तो उससे पूछा गया कि वह जीना चाहती है या मरना, और उसने उत्तर दिया, “जो परमेश्वर को भाए।” “परन्तु,” किसी ने कहा, “यदि परमेश्वर यह बात तुम्हीं पर छोड़ दे, तो तुम क्या चुनोगी?” “सच कहूँ तो,” उसने उत्तर दिया, “मैं इसे फिर उसी पर छोड़ दूँगी।” इस प्रकार वही मनुष्य परमेश्वर से अपनी इच्छा पाता है, जिसकी इच्छा परमेश्वर के अधीन हो गई है।
श्री स्पर्जन इस विषय पर कहते हैं, “विश्वासी मनुष्य हर समय परमेश्वर के पास जाता है, ताकि ईश्वरीय मन के साथ उसकी संगति बनी रहे। प्रार्थना स्वगत-भाषण नहीं, बल्कि वार्तालाप है; अपने भीतर झाँकना नहीं, बल्कि पर्वतों की ओर देखना है, जहाँ से हमें सहायता मिलती है। किसी सहानुभूति रखनेवाले मित्र के सामने मन का बोझ उतार देने में एक चैन है, और विश्वास इसे भरपूर अनुभव करता है; परन्तु प्रार्थना में इससे भी बढ़कर कुछ है। जब आज्ञाकारी परिश्रम अपनी डोर की पूरी लम्बाई तक जा चुका हो, और फिर भी आवश्यक वस्तु हाथ न आई हो, तब परमेश्वर के हाथ पर भरोसा किया जाता है कि वह हमसे आगे जाए, ठीक वैसे ही जैसे पहले उस पर भरोसा किया गया था कि वह हमारे साथ चले। जब अपनी इच्छा परमेश्वर के मन के अनुकूल न हो, तब विश्वास उस इच्छा को पूरा करवाने की कोई लालसा नहीं रखता; क्योंकि ऐसी लालसा भीतर से उस अविश्वास की प्रेरणा होगी जो परमेश्वर के निर्णय को हमारा सबसे अच्छा मार्गदर्शक मानकर उस पर भरोसा नहीं करता। विश्वास जानता है कि परमेश्वर की इच्छा ही सबसे उत्तम भलाई है, और जो कुछ भी हमारे लिये लाभदायक है, वह हमारी विनतियों के उत्तर में दिया जाएगा।”
इतिहास बताता है कि इटली के एक लोग, तुस्कुलानी, ने रोमियों को अप्रसन्न कर दिया था, जिनकी शक्ति उनसे कहीं अधिक बढ़कर थी; और कामिल्लस एक बड़ी सेना लेकर उन्हें अधीन करने को चल पड़ा। यह जानते हुए कि वे ऐसे शत्रु का सामना नहीं कर सकते, उन्होंने उसे शान्त करने के लिये यह उपाय किया: उन्होंने विरोध का हर विचार छोड़ दिया, अपने फाटक खोल दिए, और हर मनुष्य अपने-अपने काम-धन्धे में लग गया; उन्होंने ठान लिया कि जहाँ लड़ना व्यर्थ है, वहाँ अधीन हो जाएँगे। कामिल्लस जब उनके नगर में आया, तो उनके आचरण की बुद्धिमानी और सच्चाई देखकर दंग रह गया, और उनसे इन शब्दों में बोला: “सब लोगों में से केवल तुमने ही रोमी क्रोध को शान्त करने का सच्चा उपाय ढूँढ़ निकाला है; और तुम्हारी अधीनता ही तुम्हारा सबसे अच्छा बचाव सिद्ध हुई है। इन शर्तों पर हम तुम्हें हानि पहुँचाने का मन उतना ही नहीं बना सकते, जितना किसी और शर्त पर तुम हमारा सामना करने की शक्ति नहीं जुटा सकते थे।” मुख्य न्यायाधीश ने उत्तर दिया: “हमने अपनी पिछली मूर्खता से ऐसे सच्चे मन से पछतावा किया है कि एक उदार शत्रु के प्रति उस सन्तोष के भरोसे पर हम अपना दोष मान लेने से नहीं डरते।”
अपने हृदयों को ईश्वरीय इच्छा के प्रति ऐसी पूरी अधीनता में लाना कितना कठिन है, यह देखकर हम भली-भाँति फेनेलॉन की यह प्रार्थना अपना सकते हैं: “हे परमेश्वर, मेरा हृदय ले ले, क्योंकि मैं उसे दे नहीं सकता; और जब वह तेरे पास हो, तो उसे रख ले; क्योंकि मैं उसे तेरे लिये सम्भाल कर नहीं रख सकता; और मेरे बावजूद मेरा उद्धार कर।”
संसार के कुछ सबसे अच्छे मनुष्यों ने भी इस बात में बड़ी भूलें की हैं। मूसा इस्राएल के लिये प्रार्थना कर सकता था, और परमेश्वर के सामने प्रबल हो सकता था; परन्तु परमेश्वर ने उसकी अपने लिये की गई विनती का उत्तर नहीं दिया। उसने माँगा कि परमेश्वर उसे यरदन के पार ले जाए, कि वह लबानोन को देख सके; और जंगल में चालीस वर्ष भटकने के बाद वह प्रतिज्ञा के देश में जाना चाहता था; परन्तु प्रभु ने उसकी इच्छा पूरी नहीं की। क्या यह इस बात का चिन्ह था कि परमेश्वर उससे प्रेम नहीं करता था? कदापि नहीं। दानिय्येल के समान वह भी परमेश्वर का अति प्रिय जन था; फिर भी परमेश्वर ने उसकी यह प्रार्थना पूरी नहीं की। तुम्हारा बच्चा कहता है, “मुझे यह चाहिए, वह चाहिए,” परन्तु तुम उसकी माँग पूरी नहीं करते, क्योंकि तुम जानते हो कि बच्चे को जो कुछ वह चाहे सब दे देना उसका नाश कर देगा। मूसा प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश करना चाहता था; परन्तु प्रभु ने उसके लिये कुछ और ही रख छोड़ा था। जैसा किसी ने कहा है, परमेश्वर ने उसके प्राण को चूमकर ले लिया, और उसे अपने पास घर ले गया। “यहोवा ने उसे मिट्टी दी”—किसी नश्वर मनुष्य को दिया गया सबसे बड़ा सम्मान।
पन्द्रह सौ वर्ष बाद परमेश्वर ने मूसा की प्रार्थना का उत्तर दिया; उसने उसे प्रतिज्ञा के देश में जाने दिया, और आनेवाली महिमा की एक झलक पाने दी। रूपान्तर के पहाड़ पर, महान भविष्यद्वक्ता एलिय्याह के साथ, और पतरस, याकूब और यूहन्ना के साथ, उसने परमेश्वर के सिंहासन से आता हुआ यह शब्द सुना, “यह मेरा प्रिय पुत्र है; इसकी सुनो।” यह उस बात से कहीं अच्छा था कि वह यहोशू के समान यरदन पार जाता, और तीस वर्ष तक कनान देश में रहता। इसलिए जब सांसारिक बातों के लिये हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर न मिले, तो हम परमेश्वर की इच्छा के अधीन हो जाएँ, और जान लें कि सब कुछ ठीक है।
जब किसी ने एक गूँगे-बहरे लड़के से पूछा कि उसके विचार में वह गूँगा-बहरा क्यों पैदा हुआ, तो उसने खड़िया लेकर तख़्ते पर लिखा, “हाँ, हे पिता, क्योंकि तुझे यही अच्छा लगा।”
हैडिंग्टन के जॉन ब्राउन ने एक बार कहा। “इसमें सन्देह नहीं कि दूसरों के समान मुझ पर भी परीक्षाएँ आई हैं; फिर भी परमेश्वर मुझ पर इतना कृपालु रहा है कि मैं सोचता हूँ, यदि वह मुझे उतने ही वर्ष और दे जितने मैं संसार में जी चुका हूँ, तो मैं अपने भाग की एक भी परिस्थिति को बदलना न चाहूँगा, सिवाय इसके कि काश पाप कम होता। मेरे ताबूत पर यह लिखा जा सकता है, ‘यहाँ परमेश्वर के प्रबन्ध की देखभाल में पला एक जन सोया है, जिसने बचपन में ही माता और पिता दोनों को खो दिया, फिर भी किसी की भी देखभाल की कमी कभी न पाई।’”
एलिय्याह प्रार्थना में सामर्थी था; वह अपने बलिदान पर स्वर्ग से आग उतार लाया, और उसकी विनतियों से प्यासी भूमि पर वर्षा हुई। प्रार्थना की सामर्थ्य में वह निडर होकर राजा अहाब के सामने खड़ा हुआ। फिर भी हम उसे एक कायर के समान झाऊ के पेड़ के तले बैठे, परमेश्वर से यह माँगते हुए पाते हैं कि वह उसे मर जाने दे। प्रभु उससे इतना प्रेम करता था कि उसने ऐसा न होने दिया; वह तो उसे आग के रथ में स्वर्ग पर उठा लेनेवाला था। इसलिए हमें शैतान को यह अवसर नहीं देना चाहिए कि वह हमसे यह मनवा ले कि परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं करता, क्योंकि वह हमारी सब विनतियाँ उसी समय और उसी रीति से पूरी नहीं करता जैसे हम चाहते हैं।
जैसे पुराने नियम में मूसा को किसी और पात्र से अधिक स्थान मिला है, वैसे ही नये नियम में पौलुस को—शायद स्वयं प्रभु को छोड़कर। फिर भी पौलुस नहीं जानता था कि अपने लिये कैसे प्रार्थना करे। उसने प्रभु से विनती की कि वह “शरीर में एक काँटा” दूर कर दे। उसकी माँग पूरी नहीं की गई; परन्तु प्रभु ने उसे इससे बड़ी आशीष दी। उसने उसे और अधिक अनुग्रह दिया। हो सकता है हम पर भी कोई परीक्षा हो—शरीर में कोई काँटा। यदि उसे दूर करना परमेश्वर की इच्छा नहीं है, तो हम उससे माँगें कि वह उसे सहने के लिये हमें और अधिक अनुग्रह दे। हम देखते हैं कि पौलुस अपनी विपत्तियों और अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करता था, क्योंकि उनके कारण परमेश्वर की सामर्थ्य और भी अधिक उस पर छाया करती थी। हो सकता है हम में से कुछ ऐसा अनुभव करते हों मानो सब कुछ हमारे विरुद्ध है। परमेश्वर हमें अनुग्रह दे कि हम पौलुस के मंच पर खड़े होकर कह सकें: “जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं।” इसलिए जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो हमें अधीन रहना चाहिए, और कहना चाहिए, “तेरी इच्छा पूरी हो।”
यूहन्ना रचित सुसमाचार में हम पढ़ते हैं: “यदि तुम” (वह “यदि” तो आरम्भ में ही एक पहाड़ है), “यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” पिछला भाग तो अक्सर उद्धृत किया जाता है, पर पहला नहीं। अरे, आजकल मसीह में बने रहना बहुत कम दिखाई देता है! तुम कभी-कभार उससे मिलने चले जाते हो; बस इतना ही। यदि मसीह मेरे हृदय में है, तो निश्चय ही मैं कोई ऐसी बात नहीं माँगूँगा जो उसकी इच्छा के विरुद्ध हो। और हम में से कितनों में परमेश्वर का वचन बना रहता है? हमारी प्रार्थनाओं के लिये हमारे पास कोई आधार होना चाहिए। यदि हमारे मन में कोई बड़ी लालसा है, तो हमें पवित्रशास्त्र में खोजना चाहिए कि उसे माँगना उचित है या नहीं। बहुत सी वस्तुएँ जो हम चाहते हैं, हमारे लिये अच्छी नहीं होतीं; और बहुत सी और बातें जिनसे हम बचना चाहते हैं, वास्तव में हमारी सबसे बड़ी आशीषें होती हैं। मेरा एक मित्र एक सुबह दाढ़ी बना रहा था, और उसके छोटे बेटे ने, जो अभी चार वर्ष का भी नहीं था, उससे उसका उस्तरा माँगा, और कहा कि वह उससे लकड़ी छीलना चाहता है। जब उसने देखा कि उस्तरा नहीं मिलेगा, तो वह ऐसे रोने लगा मानो उसका दिल टूट जाएगा। मुझे डर है कि हम में से बहुत से लोग उस्तरों के लिये प्रार्थना कर रहे हैं। जॉन बनयन ने बेडफ़र्ड के उस बन्दीगृह के लिये परमेश्वर को, इस जीवन में अपने साथ हुई किसी भी और बात से बढ़कर, धन्य कहा। हम कभी क्लेश के लिये प्रार्थना नहीं करते; फिर भी अक्सर वही सबसे अच्छी वस्तु होती है जो हम माँग सकते थे।
डायर कहते हैं: “क्लेश हमारे लिये तब आशीष बन जाते हैं जब हम क्लेशों के लिये परमेश्वर को धन्य कह सकते हैं। दुःख ने बहुतों को पाप करने से रोका है। परमेश्वर का एक पुत्र पाप के बिना था; परन्तु बिना दुःख के उसका कोई पुत्र कभी नहीं रहा। अग्निमय परीक्षाएँ सोने जैसे मसीही बनाती हैं; पवित्र किए हुए क्लेश आत्मिक पदोन्नतियाँ हैं।”
रदरफ़र्ड पवित्र की हुई परीक्षा के मूल्य के विषय में, और उसमें परमेश्वर की इच्छा के अधीन होने की बुद्धिमानी के विषय में, कितनी सुन्दरता से लिखते हैं: “ओह, मैं अपने प्रभु यीशु की रेती का, उसके हथौड़े का, उसकी भट्ठी का कितना ऋणी हूँ, जिसने अब मुझे दिखाया है कि मसीह का वह गेहूँ कितना अच्छा है जो उसकी चक्की और उसके तंदूर में से होकर उसकी अपनी मेज़ की रोटी बनने को जाता है! परखा हुआ अनुग्रह अनुग्रह से उत्तम है; और यह अनुग्रह से बढ़कर है; यह अपनी शैशव-अवस्था में महिमा है। अब मैं देखता हूँ कि भक्ति बाहरी दिखावे से, और इस संसार की झालरों और सजावटों से, कहीं बढ़कर है। परीक्षा के बिना अनुग्रह की सच्चाई को कौन जानता है? ओह, मसीह हमसे कितना कम पाता है, सिवाय उसके जो वह (यों कहूँ) बड़े परिश्रम और पीड़ा से जीतता है! और क्रूस के बिना विश्वास कितनी जल्दी ठिठुर जाता! मेरी पीठ पर कितने ही गूँगे क्रूस रखे गए, जिनकी कभी कोई जीभ न थी कि मसीह की मिठास का बखान करें, जैसी इस क्रूस की है! जब मसीह अपने क्रूसों को जीभ देकर आशीषित करता है, तो वे हमारे प्रति मसीह का प्रेम, उसकी बुद्धि, उसकी कृपा और उसकी चिन्ता साँस-साँस में प्रकट करते हैं। मैं अपने प्रभु के हल से क्यों चौंकूँ, जो मेरे प्राण पर गहरी रेखाएँ खींचता है? मैं जानता हूँ कि वह आलसी किसान नहीं; उसके मन में एक फ़सल है। काश, यह सफ़ेद, मुरझाई हुई परती भूमि उसके लिये फ़सल लाने को उपजाऊ बन जाती, जो इसे इतनी पीड़ा के साथ जोतता है, और काश यह परती भूमि तोड़ी जाती! मैं (कैसा मूर्ख!) क्यों दुःखी हुआ कि उसने अपनी माला और अपना गुलाब मेरे सिर पर रखा—अपने विश्वासयोग्य गवाहों की महिमा और सम्मान? अब मैं मसीह से और कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहता। सचमुच, जो कुछ मैं सहता हूँ उससे उसने मेरी कोई हानि नहीं की; वह मेरा कुछ भी ऋणी नहीं; क्योंकि मेरे बन्धनों में उसके विचार मुझे कितने मीठे और सांत्वना देनेवाले रहे हैं, जिनमें मैं अपना पूरा-पूरा प्रतिफल पाता हूँ! मेरे विरोधी कितने अन्धे हैं, जिन्होंने मुझे बन्दीगृह या देश-निकाले के स्थान में नहीं, बल्कि एक भोज-भवन में, दाखमधु के घर में, मेरे प्रिय प्रभु यीशु के मनोहर भोजों में भेज दिया!”
इस विषय पर अपनी बात हम भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के उन शब्दों के साथ समाप्त कर सकते हैं जो विलापगीत में हैं, जहाँ वह कहता है: “जो यहोवा की बाट जोहते और उसके पास जाते हैं, उनके लिये यहोवा भला है। यहोवा से उद्धार पाने की आशा रखकर चुपचाप रहना भला है। पुरुष के लिये जवानी में जूआ उठाना भला है। वह यह जानकर अकेला चुपचाप रहे, कि परमेश्वर ही ने उस पर यह बोझ डाला है; वह अपना मुँह धूल में रखे, क्या जाने इसमें कुछ आशा हो; वह अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे। क्योंकि प्रभु मन से सर्वदा उतारे नहीं रहता, चाहे वह दुःख भी दे, तो भी अपनी करुणा की बहुतायत के कारण वह दया भी करता है; क्योंकि वह मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न दुःख देता है.... यदि यहोवा ने आज्ञा न दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए? विपत्ति और कल्याण, क्या दोनों परमप्रधान की आज्ञा से नहीं होते? इसलिए जीवित मनुष्य क्यों कुड़कुड़ाए? और पुरुष अपने पाप के दण्ड को क्यों बुरा माने? हम अपने चाल चलन को ध्यान से परखें, और यहोवा की ओर फिरें! हम स्वर्ग में वास करनेवाले परमेश्वर की ओर मन लगाएँ और हाथ फैलाएँ।”
अधीनता
“हे मेरे परमेश्वर, सुन; यदि मेरे होठों ने दुस्साहस से
तेरे हाथ के नीचे कुड़कुड़ाया हो, तो अब मुझे सिखा
कि हर भीतरी विचार तेरे सामने खुला हुआ जानूँ,
और इस विद्रोही इच्छा को विश्वास में झुकाऊँ।
चाहे मैं उस उजड़ी वेदी पर फूट-फूटकर रोया,
जहाँ सांसारिक मूरतें ही तेरा स्थान घेरे थीं,
अब इस मन्दिर को शुद्ध करके अपना बना ले,
और हे प्रभु, मुझे कहना सिखा, ‘तेरी इच्छा पूरी हो!’
“मैं ऐसा क्या लाऊँ चढ़ाने को, जो मेरा अपना हो?
दुःख भरी जवानी, और पाप भरा जीवन।
तेरी पवित्र वेदी पर मैं क्या रखूँ,
कि बीते दिनों की क्षमा की एक आशा पा सकूँ?
जब मैं यों विनती करता हुआ तेरे चरणों पर झुकता हूँ,
तब भी तेरी ओर अपनी आँसू भरी आँखें उठाने का साहस करता हूँ,
मैं तेरे वचन की उस प्रतिज्ञा की दुहाई देता हूँ, कि तू
टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानेगा।
“मैं क्या लाऊँ? हे प्रभु, एक कुचली हुई आत्मा,
जो संघर्ष से थक गई है, और अब विश्राम को तरसती है,
और तेरी शान्ति के लिये ऐसे तड़पती है, जैसे कोई बेचारा पक्षी
प्रचण्ड आँधी के बीच अपनी माँ की छाती ढूँढ़ता है;
मेरा बलिदान वह मेम्ना है जो मेरे लिये मरा;
मैं तेरे निष्पाप पुत्र के गुणों की दुहाई देता हूँ;
मैं तेरी प्रतिज्ञाएँ लाता हूँ; मैं तुझ पर भरोसा रखता हूँ;
तू प्रेम में ताड़ना देता है; हे प्रभु, ‘तेरी इच्छा पूरी हो!’”
अध्याय 10 पूरा हुआ
अधीनता